सोमवार, 23 अगस्त 2010

छोटा सा बादल ......

स्मित मुस्कान हो,
लाल आसमान हो,
पलके उठे झुके,
लब थर थराए रुके,
पास तुम बैठी रहो,
लहराती आंचल ॥


गुल मोहर खिले कहीं
दो पल मिले कहीं
और एक साथ गिने
हृदय की धड़कने
चांदनी ढके रहे
छोटा सा बादल ॥ ॥

****शिव प्रकाश मिश्र ******

बुधवार, 18 अगस्त 2010

प्रेम बंधन .......

जिन्दगी के मोड़ ले आये कहाँ पर,
मै सुबह से शाम तक चलता गया.
कल्पना का इन्द्र धनुषी मधुर उपवन,
कर्मनाशा की लहर को छू  गया..
आग सी तपती छुधा की रेत पर,
कामना का बीज कोई बो गया.
आस्था के चाँद सीमित बिदुओं में,
सत्य खुद का ही बबंडर बन गया..
प्रेम के बंधन बंधे है रबर जैसे,
पास होकर दूर कोई कर गया..
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शिव प्रकाश मिश्र
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रविवार, 15 अगस्त 2010

दो ऑंखें ......

दो ऑंखें
निरंतर,
 मेरा पीछा करती है,
हडबडाहट और बेचैनी में,
 अधजली सिगरेट सी,
 छोड़ देता हूँ,
 अपनी बातें,
रह रह कर
 जो मेरे अन्दर बुझती  है,
सुलगती है,
मसल देता हूँ अकेले में,
 अनजाने में,
 खुद ही जिन्हें
अपलक चाहता हूँ,
 निहारना,
 दिन में कई बार जिन्हें.
धुंए की  तरह खो जाती है,
 उनकी बहमूल्य जवानी,
स्वतन्त्र अस्तित्व
और बिखर जाती है,
 सजी सवरी कहानी,
शब्दों
की  सांत्वना में,
 मिलती है समाज की
भोड़ी सलाखे,
मूक हो,
 निगूड़ खड़ा वहीँ हूँ मै,
 और
मेरे पीछे है वही,
 दो\आँखे.........
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शिव प्रकाश मिश्र
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सिर्फ ...एक बार .......

मर चूका हूँ मै कभी का,
मातम नहीं मनाता कोई.
जिज्ञासु सा खुद रो रहा हूँ,
धाडस नहीं बंधाता कोई .
मेरी लाश भी
 न जाने कब से अकेली पड़ी है,
सुनते सभी है,
 पर गरज क्या पड़ी है ?
जो कोई
 निस्वार्त के पास आये,
मनुष्यत्व, अपनत्व
या
झूठी औपचारिकता ही निभाए,
और मेरी लाश पर
 मेरा ही कफ़न ओडाये,
यद्यपि हमें
कोई संक्रामक रोग नहीं है,
पर हमारा
उनसे कोई योग तो नहीं है,
सोचते होंगे
 कि सिरफिरा हूँ मै ,
यद्यपि
उनके लिए ही मरा हूँ मै,
और फिर मर सकता हूँ,
 कई बार ...
सबके लिए ,
पर
क्या उनके सहारे,
 जीने कि कल्पना कर सकता हूँ?
सिर्फ ......एक बार
अपने लिए ??
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शिव प्रकाश मिश्र
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शनिवार, 14 अगस्त 2010

तुम्हारी हंसी .....

है फूलों सी नाज़ुक
तुम्हारी हंसी ,
कितनी प्यारी दुलारी
तुम्हारी हंसी,
जिन्दगी धूप में
तप रही रेतहै ,
प्यार की छाँव
देती तुम्हारी हंसी,
कोई सावन कहीं
झूम के आ गया
है फुहारे सी झरती,
तुम्हारी हंसी,
मन पपीहा सा
व्याकुल फिरे घूमता,
है स्वाति की बूँद
तुम्हारी हंसी,
चाँद बदल में
जाने कहाँ जा छिपा,
है सितारों का उपवन
तुम्हारी हंसी,
एक उफनती नदी
तोड़ बंधन चली ,
मोहक झरने बनाती
तुम्हारी हंसी,
मोर जंगल में नाचे
पृकृति खिल उठे ,
और घुँघरू बजाती
तुम्हारी हँसी ,
मृग वन मन भटक
ढूद्ता फिर रहा ,
कोष कस्तूरी का है
तुम्हारी हंसी ,
सुर्ख जोड़ा पहिन
एक दुल्हन सजी,
कंगनों सी खनकती
तुम्हारी हंसी,
एक तूफ़ान आकर
कहीं थम गया,
शोख बिजली गिराती
तुम्हारी हंसी,
शब्द होटों पे आयें
न आया करें ,
मूक आमंत्रण देती
तुम्हारी हंसी,
दिल की अमराइयों में
बसंत आ गयी,
कूक कोयल की मीठी
तुम्हारी हंसी,
तुम रहो न रहो
ये रहेगी हंसी,
रोज मुझको रुलाती
तुम्हारी हंसी,

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--शिव प्रकाश मिश्र

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गुरुवार, 12 अगस्त 2010

भविष्य........

कैसे मुस्कान हो ,
निरुद्वेग अधरों पर,
बदलो सा मिलना,
निकलना भी छूट गया.

जीवन के कतिपय अंश
स्वस्ति के लिए हव्य,
आशातीत बेडा एक,
 सपना सा टूट गया..

कच्ची पगडण्डी सी,
 किस्मत की रेखाए,
धूमिल आशाओं में,
 वर्तमान भटक गया.

अतीत के दलदल में ,
डूबती       तस्वीरे,
कल्पना का यान जीर्ण,
 दूब में अटक गया..

शक्ति के समन्वय में,
 शांति के प्रणेता से ,
वर्षो का खोटा सिक्का,
 गांठ से निकल गया..

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शिव प्रकाश मिश्र
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बुधवार, 11 अगस्त 2010

सड़क पर ........

फुटपाथ पर लेटते हैं ,
हाथ का तकिया लगा कर ।
ओढ़ते अम्बर दिसम्बर में ,
अख़बार की रद्दी बिछा कर॥
सड़क पर ही दिन निकलता ,
रात भी होती सड़क पर ,
सड़क पर ही प्रसव होता ,
मौत भी होती वहीँ पर ।
अभावो में बाल लीला ,
टेकती घुटने सिमट कर॥
गलिया सुन बड़े होते ,
रो रहे होते सिसक कर ।
भूख होती प्यास होती ,
छत नहीं होती सिरों पर ॥
बाल दिवस हर वर्ष होता ,
जान नहीं पाते उम्र भर ॥
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शिव प्रकाश मिश्र

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...