बुधवार, 19 अप्रैल 2023

तुष्टीकरण का वीभत्स स्वरूप

 


                                    - शिव मिश्रा 

भारत में तुष्टीकरण अब  शर्मनाक से खतरनाक स्तर पर पहुँच चुकी है. सभी राजनैतिक दल मुस्लिम वोटों को सत्ता प्राप्त करने की कुंजी मानते हैं और इसलिए उनके हर अच्छे बुरे काम का पुरज़ोर समर्थन करते रहते हैं. ऐसा ही वातावरण कुख्यात माफिया सरगना अतीक के बेटे अशद के पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने को लेकर बनता दिखाई पड़ रहा है. उत्तर प्रदेश के दो प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने पुलिस एनकाउंटर पर प्रश्नचिन्ह लगाया है. जहाँ समाजवादी पार्टी ने एनकाउंटर को फर्जी बताते हुए, इसे हिंदू मुस्लिम भाई चारा नष्ट करने का भाजपाई षड्यंत्र बताया है, वहीं बहुजन समाज पार्टी ने एनकाउंटर की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. असदुद्दीन ओवैसी ने हमेशा की तरह सम्प्रदायिक रंग देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार धर्म के आधार पर इन काउंटर करती है और इसे मुस्लिमों के खिलाफ़ पक्षपाती कार्रवाई बताया है. ऐसा कई अन्य विपक्षी दलों ने भी किया. स्वाभाविक तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ इसे भारत में मुस्लिमों के नरसंहार के रूप में अतिरंजित करेगा.

अभी हाल में देश के अनेक भागों में रामनवमीं जुलूसों पर धर्मविशेष द्वारा किये गए आक्रमण को भी इसी तरह रंजित किया गया. अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने  पश्चिम बंगाल और बिहार के सत्ताधारी दल के नेताओं के बयानों के आधार पर सनसनीखेज खबरें बनाईं और उन्हें ऐसे प्रस्तुत किया है जैसे भारत में मुस्लिमों पर अत्याचार किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल में रामनवमीं के जुलूसों पर धर्म स्थलों और मकानों की छतों से पत्थरों से किए गए हमले पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने सरकार पर तीखी टिप्पणियां करते हुए हमले को सुनियोजित बताया है और ममता बेनर्जी के बयानों को आग में घी डालने वाला बताया है. नेशनल ह्यूमन राइट कमीशन की टीम ने भी इसी सच्चाई को उजागर किया है. लेकिन इससे पहले ही इन नेताओं के बयानों के आधार पर ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कंट्रीज़ ने भारत में मुसलमानों की स्थिति पर भारत की निंदा कर दी थी.

24 फरवरी 2023 को प्रयागराज में बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड के एकमात्र चश्मदीद गवाह और उच्च न्यायालय के एडवोकेट उमेश पाल की दिनदहाड़े गोलियां और बम मारकर हत्या कर दी गई थी. उनकी जान को खतरा देखते हुए राज्य सरकार ने पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराई थी. इस दर्दनाक घटना में हमलावारों ने उनकी सुरक्षा में तैनात दोनों पुलिसकर्मियों की भी हत्या कर दी थी. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर सभी हमलावारों की पहचान कर ली गई थी. पुलिस की जांच के अनुसार हमलावर अतीक अहमद गैंग के थे और वारदात में अतीक का बेटा भी शामिल था. पुलिस सरगर्मी से सभी अपराधियों की तलाश कर रही थी. कुछ ने आत्मसमर्पण कर दिया था और कुछ चकमा देकर एक शहर से दूसरे शहर भाग रहे थे. झांसी के पास पुलिस दल ने जब उन्हें घेर कर गिरफ्तार करने का प्रयास किया तो उन्होंने पुलिस पर गोली बारी शुरू कर दी. नतीजन पुलिस की जवाबी फायरिंग अतीक का बेटा असद और उसका शूटर मारे गए. इस पूरे घटनाक्रम का विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि जिन राजनीतिक दलों ने अतीक के बेटे असद की एनकाउंटर में मौत के बाद इनकाउंटर पर प्रश्नचिन्ह लगाया है, उनकी संवेदना अतीक अहमद के साथ है क्योंकी वह  समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों से जुड़ा रहा है. पुलिस की कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह लगाने का कारण भी तुष्टिकरण की पराकाष्ठा है.

प्रयाग में दिन दहाड़े उमेश पाल सहित दो पुलिसकर्मियों की हत्या पर सभी विपक्षी दलों ने विधानसभा में राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था का मामला उठाया था ओर राज्य सरकार को अपराधियों के साथ सख्ती से निपटने में असफल बताया था. योगी सरकार के समक्ष अपराधियों को जल्द से जल्द कानून की गिरफ्त में लाने की चुनौती थी. इसलिए पुलिस प्रशासन पूरी मुस्तैदी के साथ अपराधियों की धर पकड़ कर रहा था. तुष्टीकरण में लगे राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया उसी समय आने लगी थी जब वारदात में शामिल अपराधियों के गैरकानूनी निर्माण तथा सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा कर किए गए निर्माण पर बुलडोजर चलाया जा रहा था.

इस बात में कोई संदेह नहीं कि योगी के शासनकाल में माफियाओं के प्रति अपनाई जा रही ज़ीरो टॉलरेंस की नीति के कारण ही प्रदेश की कानून और व्यवस्था में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है. योगी का बुलडोजर मॉडल पूरे विश्व में चर्चा का विषय है. दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री भी इस मॉडल को अपना रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार समुदाय विशेष के कट्टरपंथियों के निशाने पर हमेशा रहती है. क्या कारण है कि भारत के ज़्यादातर राजनीतिक दल सत्ता के लालच में राष्ट्र की एकता और अखंडता को दांव पर लगा रहे हैं. क्यों उन्हें इस बात का अहसास नहीं है कि स्वतंत्रता के बाद  इन 75 सालों में देश में इतना बड़ा बदलाव आ चुका है कि कट्टरपंथियों ने विदेशी धन के बल पर कश्मीर से केरल तक और काठियावाड़ से असम तक अपना जाल फैला रखा है. हिमाचल और उत्तराखंड की ऊंची पहाडियों पर भी अवैध कब्जा और अनाधिकृत बस्तियों बसा कर खतरनाक खेल खेला जा रहा है. देश के लगभग हर हिस्से में जिहादी तत्व अपनी पकड़ मजबूत करते जा रहे हैं. उनकी तैयारियां देखकर 1947 के विभाजन के समय की स्थितियां बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसका परिणाम क्या होगा, जानना बिलकुल मुश्किल नहीं क्योंकि पीएफआई सहित अनेक कट्टरपंथी पृथकतावादी ताकतों का लक्ष्य सभी को ज्ञात है. बड़े आश्चर्य की बात है कि ये सब जानते हुए भी राजनैतिक दल क्यों आंख बंद किए हुए हैं और क्यों जानबूझकर राष्ट्रांतरण को आमंत्रित कर रहे हैं.

यह सही है कि स्वतंत्र भारत को मुस्लिम तुष्टीकरण विरासत में मिला है. तुष्टीकरण की शुरुआत किसने की, गाँधी ने या नेहरू ने, लोग इस बहस तो करते रहे किंतु इस मानसिकता से बाहर निकलने की कोशिश भी करते रहे. यह देश का दुर्भाग्य ही है कि केंद्र में सत्ताधारी कांग्रेस न केवल तुष्टीकरण का अभियान चलाती रही बल्कि धर्म विशेष के अराजक तत्वों की राष्ट्रविरोधीऔर धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों को नजर अंदाज भी करती रही. देश की एकता अखंडता से लगातार समझौता किया जाता रहा. इसके परिणामस्वरूप ही  देश के कई हिस्सों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन होता चला गया. जम्मू कश्मीर में जो कुछ हुआ वह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे अश्रु पूरित दुखद अध्याय है. राज्य  के मूल निवासी अपने ही देश में शरणार्थी बनकर आज भी नरकीय जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं.  लेकिन, कश्मीर में जो हुआ वह खेल अभी भी बंद नहीं हुआ है बल्कि लगातार एक राज्य से दूसरे राज्य में फैलता चला जा रहा है. केरल में भी कश्मीर का प्रयोग दोहराने के बाद, वही खेल पश्चिम बंगाल में दोहराया जा रहा है और बिहार तथा झारखंड में इसकी शुरुआत हो चुकी  है.

लोग अभी भी भूले नहीं है कि कैसे राजनीतिक दलों ने तुष्टीकरण के लिए  दुर्दांत आतंकवादियों तक का समर्थन किया और उनके विरुद्ध दर्ज किए गए मुकदमे वापस लिए. कई राजनीतिक दलों ने एनकाउंटर में मारे गए आतंकवादियों के लिए आंसू बहाए और मौत की सजा पाए आतंकवादियों की फांसी रुकवाने के लिए रात 12:00 बजे सर्वोच्च न्यायालय भी खुलवाया. कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए वक्फ बोर्ड और पूजा स्थल विधेयक जैसे राष्ट्र और सनातन विरोधी कानून भी बनाए लेकिन अपने पास  सत्ता बनाए नहीं रख सके. हिंदू पुनर्जागरण के कारण सत्ताच्युत हुए दलों ने कभी इस पर विचार नहीं किया कि देश के बहुसंख्यकों को भी लुभाकर चुनाव जीते जा सकते हैं.  इसके विपरीत  वे न केवल और अधिक तीव्र गति से तुष्टीकरण में जुट गए बल्कि हिंदू समाज को जाति और उप जातियों में  बांटने का भी प्रयास करने लगे. ये दलों  सियासी समीकरण बनाकर कुछ जातियों को मुस्लिम मतों के साथ जोड़कर सत्ता प्राप्त करने की योजना पर काम कर रहे हैं. अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को शरण दे रहे हैं. उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा रहे हैं और उनके नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा रहे हैं. उन्हें इस बात की ज़रा भी चिंता नहीं है कि वे ऐसा करके राष्ट्र को गहरी खाई में धकेल रहे हैं. इन राजनीतिक दलों की केवल एक ही चिंता है कि कोई दूसरा राजनीतिक दल उनके मुस्लिम वोटबैं क में सेंध न लगाने पाए और इस कारण तुष्टीकरण से ओतप्रोत एक से एक खतरनाक कदम उठाये जा रहे हैं.

तुष्टीकरण की यह बीमारी इतनी संक्रामक और खतरनाक क्यों है. क्यों यह बीमारी हर राजनीतिक दल को अपनी चपेट में लेती चली जा रही है, निश्चित रूप से इस पर शोध की आवश्यकता है. केंद्र की वर्तमान तथाकथित हिन्दूवादी सरकार भी तुष्टीकरण से भी चार  कदम आगे जाकर, तृप्तिकरण में लग गई है. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले अगर ये सरकार भी कोई बड़ा खतरनाक खेल खेले तो कोई अचरज की बात नहीं.

विश्व पटल पर कई देश उदाहरण हैं जिन्होंने भारत की तरह तुष्टीकरण भी नहीं किया केवल मानवीय आधार पर अल्पसंख्यकों और समुदाय विशेष के शरणार्थियों और अवैध  घुसपैठियों की मानवीय सहायता की. बिना किसी भेदभाव के उनका जीवन स्तर भी सुधारा. कालान्तर में अल्पसंख्यकों, उस समुदाय के  शरणार्थियों और अवैध घुसपैठियों ने मिलकर मूल निवासियों के विरुद्ध खूनी संघर्ष शुरू कर दिया और पूरे देश पर कब्जा कर लिया. राष्ट्रांतरण करके एक धर्म विशेष का देश बना दिया. भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से सबक नहीं लेना चाहता जहाँ हिंदू लगभग समाप्त हो चुके हैं, लेकिन उसे लेबनान से सबक जरूर लेना चाहिए, जो आज एक मजहबी देश है. समय आ गया है जब सभी राष्ट्रवादियों को चाहिए कि वह तुष्टिकरण करने वाले राजनीतिक दलों का जमकर बहिष्कार करें, और भारत को बचाने का प्रयास करें.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

 

 

कश्मीर रहा है सनातन हिंदू संस्कृति का गढ़

 

कश्मीर रहा है सनातन हिंदू संस्कृति का गढ़

                                             - प्रहलाद सबनानी



अतिप्राचीन भारत में कैलाश पर्वत के आसपास भगवान शिव के गणों की सत्ता थी। उक्त इलाके में ही दक्ष राजा का भी साम्राज्य था। ऐसा माना जाता है कि कश्यप ऋषि कश्मीर के पहले राजा थे। कश्मीर को उन्होंने अपने सपनों का राज्य बनाया था और कश्यप ऋषि के नाम पर ही कश्यप सागर (कैस्पियन सागर) और कश्मीर का प्राचीन नाम पड़ा था। शोधकर्ताओं के अनुसार कैस्पियन सागर से लेकर कश्मीर तक ऋषि कश्यप के कुल के लोगों का राज फैला हुआ था। कश्यप की एक पत्नी कद्रू के गर्भ से नागों की उत्पत्ति हुई जिनमें प्रमुख 8 नाग थे- अनंत (शेष), वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख और कुलिक। इन्हीं से नागवंश की स्थापना हुई। आज भी कश्मीर में इन नागों के नाम पर ही कई स्थानों के नाम हैं। कश्मीर का अनंतनाग नागवंशियों की राजधानी हुआ करता था। हाल में अखनूर से प्राप्त हड़प्पा कालीन अवशेषों तथा मौर्य, कुषाण और गुप्त काल की कलाकृतियों से जम्मू के प्राचीन इतिहास का पता चलता है। 1184 ईसा पूर्व के राजा गोनंद से लेकर राजा विजय सिम्हा (1129 ईसवी) तक के कश्मीर के प्राचीन राजवंशों और राजाओं के प्रमाणिक दस्तावेज उपलब्ध हैं।

 

जम्मू कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र पहले हिन्दू शासकों और फिर बाद में मुस्लिम सुल्तानों के अधीन रहा। बाद में यह क्षेत्र अकबर के शासन में मुगल साम्राज्य का हिस्सा बन गया। वर्ष 1756 से अफगान शासन के बाद वर्ष 1819 में यह क्षेत्र पंजाब के सिख साम्राज्य के अधीन हो गया था। जब भारत को अंग्रेजों से राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब धर्म के नाम पर भारत के एक बड़े भूभाग को अलग कर पाकिस्तान बना दिया गया था। उस समय भी जम्मू, कश्मीर और लद्दाख ये तीनों अलग अलग क्षेत्र थे और यह तीनों क्षेत्र एक ही राजा के अधीन थे तथा 26 अक्टोबर 1947 को इस क्षेत्र के शासक महाराज हरी सिंह ने अपने क्षेत्र के भारतीय संघ में विलय समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए थे। विभाजन की इस त्रासदी के समय भी पाकिस्तानी सेना ने कबाईलियों के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर क्षेत्र पर आक्रमण कर इसके बहुत बड़े भू भाग पर कब्जा कर लिया था। इस आक्रमण का भारतीय सेना मुंहतोड़ जवाब देते हुए कब्जा मुक्ति का अभियान बहुत सफलतापूर्वक चला रही थी लेकिन बीच में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी जिसके कारण लगभग आधा जम्मू कश्मीर आज भी पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। यह तत्कालीन नेहरू सरकार की सबसे बड़ी राजनैतिक भूल मानी जाती है, जिसके चलते यह क्षेत्र पिछले लगभग 70 वर्षों तक अशांत क्षेत्र बना रहा है। हालांकि कश्मीर सनातन हिंदू संस्कृति का गढ़ रहा है परंतु कश्मीर का इतिहास और भूगोल दोनों ही बदल दिए गए हैं। हमें ऐसा आभास कराया जाता है कि कश्मीर क्षेत्र इस्लाम के कब्जे के क्षेत्र रहा है।

 

तत्कालीन नेहरू सरकार की जम्मू कश्मीर से सम्बंधित दूसरी सबसे बड़ी गल्ती थी राज्य में धारा 370 लागू करवाना। इस धारा के अंतर्गत केंद्र सरकार को रक्षा, विदेश एवं संचार जैसे कुछ क्षेत्रों को छोड़कर शेष समस्त क्षेत्रों के लिए भारत सरकार के कानून जम्मू कश्मीर में लागू करने के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेना आवश्यक होता था। अतः भारत सरकार के कानून जम्मू कश्मीर में लागू नहीं होते थे। इसका परिणाम यह निकलता था कि भारत के अन्य राज्यों से कोई भी भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर की सीमा के अंदर जमीन या सम्पत्ति नहीं खरीद सकता था। जम्मू कश्मीर के लिए भारतीय तिरंगा के अलावा एक अलग राष्ट्रीय ध्वज भी होता था, इसलिए वहां के नागरिकों द्वारा भारतीय तिरंगा के सम्मान नहीं करने पर उन पर कोई अपराधिक मामला दर्ज नहीं हो सकता था। यहां तक कि जम्मू और कश्मीर के सम्बंध में भारत की सुप्रीम कोर्ट द्वारा यदि कोई आदेश दिया जाता है, तो वहां के लिए यह जरूरी नहीं है कि वे इसका पालन करें। जम्मू और कश्मीर की कोई महिला यदि भारत के किसी अन्य राज्य के किसी व्यक्ति से शादी कर लेती है, तो उस महिला से उसके कश्मीरी होने का अधिकार छिन जाता था। इसके विपरीत यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान में रहने वाले किसी व्यक्ति से निकाह करती है, तो उसकी कश्मीरी नागरिकता पर कोई असर नहीं होता था। साथ ही, कोई पाकिस्तानी नागरिक यदि कश्मीरी लड़की से शादी करता था और फिर कश्मीर में आकर रहने लगता था तो उस व्यक्ति को भारतीय नागरिकता भी प्राप्त हो जाती थी। यह किस प्रकार के नियम बनाए गए थे जिनके अनुसार एक भारतीय नागरिक जम्मू कश्मीर में नहीं बस सकता था परंतु एक पाकिस्तानी नागरिक यहां बस सकता था और आतंकवाद फैला सकता था।

 

कुल मिलाकर धारा 370 के चलते, नागरिकों के हितार्थ पूरे देश में भारत सरकार द्वारा चलाई जा रही कई योजनाओं का लाभ जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख के नागरिकों को नहीं मिल पा रहा था एवं इन क्षेत्रों का विकास भी नहीं हो पा रहा था क्योंकि अत्यधिक आतंकवाद के चलते कोई भी उद्योगपति अपना निवेश इस क्षेत्र में करने को तैयार ही नहीं होता था। इस क्षेत्र के नागरिकों को लाभ पहुंचाने, इस क्षेत्र के आर्थिक विकास को गति देने एवं आतंकवाद को समूल नष्ट करने के उद्देश्य से दिनांक 5 अगस्त 2019 को भारत सरकार ने जम्मू एवं कश्मीर को खास दर्जा देने वाली धारा 370 को कानूनी रूप से खत्म कर दिया था। इसके बाद से वहां कई बदलाव दृष्टिगोचर हैं। अब केंद्र के समस्त कानूनों एवं अन्य कई आर्थिक योजनाओं को वहां लागू कर दिया गया है इससे आम नागरिकों को बहुत सुविधा एवं लाभ हुआ है। आतंकी घटनाओं में भारी कमी आई है। आतंकवादियों की कमर तोड़ दी गई है। हजारों की संख्या में स्थानीय नागरिकों को सरकारी नौकरियां प्रदान की गई हैं।  

 

जम्मू कश्मीर में जिस तरह इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हो रहा है, कनेक्टिविटी बढ़ रही है, उससे राज्य में पर्यटन गतिविधियों का विस्तार हुआ है और केलेंडर वर्ष 2022 में रिकार्ड वृद्धि के साथ 26 लाख से अधिक पर्यटक वहां पहुंचे हैं। भारत की आजादी के बाद से वर्ष 2019 तक जम्मू कश्मीर में तकरीबन 14,700 करोड़ रुपए का निवेश हो पाया था, जबकि पिछले केवल 3 वर्षों में यह चार गुना बढ़कर 56,000 करोड़ रुपए से अधिक का हो गया है। स्वास्थ्य से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का भी तेजी से विकास हो रहा है। 2 नए एम्स, 7 नए मेडिकल कॉलेज, 2 स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट और 15 नर्सिंग कॉलेज खुलने जा रहे हैं।  इस सबसे स्थानीय नागरिकों के लिए रोजगार के नए अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है।

 

प्रहलाद सबनानी

सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

के-8, चेतकपुरी कालोनी,

झांसी रोड, लश्कर,

ग्वालियर - 474 009

मोबाइल क्रमांक - 9987949940

-मेल - psabnani@rediffmail.com

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