शनिवार, 7 मई 2022

नरेन्द्र मोदी - विरोध और लोकप्रियता साथ साथ



नरेंद्र मोदी  लंबे समय से सत्ता में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री  के रूप में सत्ता विरोधी लहर से बेअसर हैं। मोदी  इतने लोकप्रिय क्यों हैं?



नरेन्द्र मोदी – विरोध और लोकप्रियता साथ साथ

नरेंद्र मोदी  लंबे समय से सत्ता में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री/प्रधानमंत्री  के रूप में सत्ता विरोधी लहर से बेअसर हैं। आखिर मोदी की   लोकप्रियता इतनी मजबूत  क्यों हैं? ये देश और दुनियां में चर्चा का विषय है. 

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के दो प्रमुख कारण है-

वह जनता से जुड़ने की हर संभव कोशिश करते हैं, जुड़ते हैं, उनकी समस्याओं को समझते हैं और कैसे उनकी समस्याओं का समाधान किया जाए इसका भरपूर प्रयास करते हैं. प्रधानमंत्री के रूप में भी सामान्य जनता से कई माध्यमों से वह सीधा संवाद स्थापित करते हैं. वहअच्छे कार्य और उपलब्धियां भी गिनाते हैं, चाहे वह स्वयं की हो पार्टी की है राज्य की हों या पूरे देश की हो.

 

२. उनके विरोधी भी विरोध के हर तौर तरीके का इस्तेमाल करके और किसी भी हद तक जाकर लगातार मोदी विरोध अभियान चलाकर उनकी लोकप्रियता को कम नहीं होने देते.

 

 लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी के विरुद्ध हिंदुओं में उनकी समस्याओं के निस्तारण में बेहद धीमी गति या “सबका विश्वास” के कारण जान बूझकर उनकी अनदेखी करने से  अंदर ही अंदर असंतोष पनप रहा है, जो धीरे धीरे विकराल होकर उन्हें सत्ता से बाहर कर सकता है. चूँकि हिंदुओं के पास भाजपा और मोदी के अलावा कोई राजनीतिक विकल्प आज की परिस्थितियों में उपलब्ध नहीं है, इसलिए वोट तो उन्हें ही करेंगे जब तक कि भाजपा का पूरी तरह से कांग्रेसीकरण नहीं हो जाता.  

 

आइए इन बिंदुओं पर विस्तार से विश्लेषण करते हैं -

 

१. नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और 2014 में देश के प्रधानमंत्री बनने के पहले वह लगातार गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे. यह एक संयोग ही कहा जाएगा कि वह पहली बार विधायक बने और मुख्यमंत्री बन गए पहली बार सांसद बने और प्रधानमंत्री बन गए. समाज के हर वर्ग से जुड़ने के प्रयास और उनके लिए कुछ करने की आकांक्षा और अदम्य इच्छाशक्ति के कारण उन्होंने जो गुजरात मॉडल विकसित किया उसे लोगों ने खूब सराहा. तब से आज तक भाजपा गुजरात में लगातार सत्ता में है और आज भी उसे कोई बड़ी चुनौती नहीं है.

 

2014 में केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का श्रेय नरेंद्र मोदी को ही जाता है. उनके नेतृत्व में पूर्ण बहुमत वाली कोई सरकार 1984 के बाद पहली बार बनी थी. इसके बाद 2019 में भी पहले से अधिक बहुमत के साथ सत्ता में वापसी के बाद उनके नेतृत्व में भाजपा चुनाव जीतने की मशीन बन गई जिसमें सबसे प्रमुख है 2017 के  उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जिसमें सारे समीकरणों, भविष्यवाणियों और चुनावी रणनीतियों को ध्वस्त करते हुए भाजपा ने अपार जन समर्थन से सरकार बनाई और सपा और बसपा को हाशिए पर ला दिया. 2022 के चुनाव में भी उत्तर प्रदेश में योगी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी, जो इस मामले में एक कीर्तिमान है कि आजादी के बाद से कोई भी मुख्यमंत्री 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद पुनः सत्ता में नहीं आ सका था. वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए 2024 में मोदी की वापसी के लिए किसी भी भविष्यवाणी की आवश्यकता नहीं है.

 

अधिकांश नेताओं को एक या दो कार्यकाल के बाद जनता किनारे कर देती है लेकिन मोदी की बढ़ती लोकप्रियता को लेकर यह प्रश्न  बहुत स्वाभाविक है कि इतने लंबे समय तक वह  लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर कैसे बने हुए हैं?

 

गुजरात में जब  राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही थी, भाजपा ने अपने कद्दावर नेता केशुभाई पटेल को हटा कर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री बनाया, परिणाम स्वरूप पार्टी के अंदर भी गुटबंदी और अस्थिरता की  कोशिश हुई. इसी बीच गोधरा कांड हो गया जिसमें 59 कारसेवकों को साबरमती ट्रेन की एक बोगी में जिंदा जलाकर मार दिया गया. इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप गुजरात में दंगा भड़क उठा. मोदी पर विपक्ष और पार्टी के अंदर से भी प्रहार होने लगा. कांग्रेस ने मोदी के राजनीतिक सफर को यहीं समाप्त कर देने के लिए वह सब कुछ किया जो सोचा भी नहीं जा सकता लेकिन सारी बाधाओं और चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करते हुए मोदी ने न केवल अपना कार्यकाल पूरा किया बल्कि दूसरे कार्यकाल के लिये भारी जीत हासिल की जो राज्य में उनकी स्वीकार्यता और लोकप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण था. वह भाजपा के निर्विवाद नेता बन गए और भाजपा एक के बाद एक सभी चुनाव जीतती चली गई.

 

गुजरात में  मोदी ने उद्योगों और व्यवसायियों की समस्याओं का बहुत बारीकी से अध्ययन किया और उन्हें अधिकाधिक सुविधाएं देते हुए लालफीताशाही पर अंकुश लगाया और सरकारी अवरोध खत्म किए. जिससे राज्य में औद्योगिक और व्यवसायिक गतिविधियों में बहुत तेजी आई. रोजगार के अवसर बढ़े. कई उद्योगपतियों ने दूसरे राज्यों से अपने उद्योगों को गुजरात स्थानांतरित किया. लोगों को टाटा नैनो का उदाहरण आज भी याद होगा. इसके साथ-साथ मोदी ने समाज के कमजोर वर्ग की रोजमर्रा की कठिनाइयों को समझने और सहायता पहुंचाने का काम किया. गुजरात में आए भूकंप से राज्य के समक्ष जो चुनौती खड़ी हुई थी उसका भी मोदी ने डटकर मुकाबला किया. उनकी "मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस" नीति लोगों को बहुत पसंद आई.

 

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने गुजरात के  मुख्यमंत्री  के अनुभव का भरपूर स्तेमाल किया और समाज के कमजोर और वर्ग के लोगों को किसी न किसी रूप में सहायता पहुंचाने की पहल की है. उन्होंने ऐसे ऐसे काम किए हैं, जिनके बारे में आजादी के बाद पिछले 70 सालों में किसी ने सोचा भी नहीं था. घर-घर शौचालय, अपना घर, गरीब महिलाओं को रसोई गैस, किसान सम्मान निधि, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन, आयुष्मान योजना, आदि न जाने कितनी योजनाये हैं जिन्होंने गरीबों के सपने साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की. यह लाभार्थी वर्ग मोदी का सबसे बड़ा वोट बैंक है जिसके सहारे मोदी चुनाव दर चुनाव जीते चले आ रहे हैं.

 

मोदी ने सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और गौरव को पुन: स्थापित करने के लिए कई प्रयास किए हैं और विशेष तौर से हिंदू जनमानस के रेगिस्तान में आशाओं की नई किरणें उगाई हैं. धारा 370 समाप्त करने, राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने, संशोधित नागरिकता कानून बनाने जैसे अन्य कई मुद्दों ने भारतीय जनमानस में विश्वास की एक फसल तैयार हो रही है और पिछले कई दशकों में मोदी ऐसे पहले नेता हैं जिन पर जनता आंख बंद करके भरोसा करती है और शायद यही “मोदी है तो मुमकिन है” का प्रमाणिक सत्य  है .

 

अपनी छवि के लिए देश को दांव पर लगाने वाले जवाहरलाल नेहरु की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता कितनी  थी और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के बाहर उनकी स्वीकार्यता कितनी थी, इस पर आज कोई चर्चा नहीं करता जबकि विश्व पटल पर अत्यंत लोकप्रिय और देश हित में महाशक्तियों और विकसित राष्ट्रों के साथ दोस्ताना संबंध बनाने और भुनाने वाले मोदी की विदेश यात्राओं पर लोग प्रश्न करते हैं, और भूल जाते हैं कि इसके पहले के प्रधानमंत्री विदेशी दौरों में कक्षा क कमजोर विद्यार्थी की तरह मुँह लटकाकर लिखा हुआ भाषण पढ़कर कर लौट आते थे. आज भारत की विदेश नीति मजबूत और मुखर है. रूस और यूक्रेन के युद्ध के बाद अमेरिका और पश्चिमी देशों सहित अधिकांश वैश्विक शक्तियां यूक्रेन के पक्ष में खड़ी हैं जिन्होंने भारत पर यूक्रेन के पक्ष में बहुत दबाव बनाया लेकिन मोदी नहीं झुके. रूस पर वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद भारत आज रूस  से तेल भी खरीद रहा है और अमेरिका भारत आकर टू प्लस टू की वार्ता भी कर रहा है और पश्चिम के देश मोदी को गले लगा रहे हैं.

 

२. मेरा मानना है कि मोदी की लोकप्रियता में मोदी विरोधियों का भी बहुत बड़ा योगदान है, जिनमें वामपंथी और संप्रदाय विशेष के अतरिक्त सरकारी सहायता से देश की कीमत पर ऐशो आराम की जिंदगी जीने वाले जेबी पत्रकार, गैर सरकारी संगठन, स्वयंभू बुद्धिजीवी, भ्रष्ट नौकरशाह और देश विरोधी ताकतें भी शामिल है. मोदी 8 साल से प्रधानमंत्री हैं लेकिन ये लोग अभी भी यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि मोदी जैसा  साधारण परिवार का हिन्दूवादी व्यक्ति इस देश का प्रधानमंत्री कैसे बन सकता है, जहां गांधी नेहरू परिवार सहित अनेक फाइव स्टार और डिज़ाइनर नेता मौजूद हों. इसलिए ये मोदी की हर बात का विरोध करते हैं, उनकी शिक्षा, संस्कार, और समझ पर प्रश्न खड़े करते हैं. उन्हें रूढ़िवादी, सांप्रदायिक, मौत का सौदागर, हिंदू आतंकवादी, जहर की खेती करने वाला, फेंकू, जुमलेबाज आदि विशेषण से संबोधित करते हैं . मोदी की शिक्षा और डिग्री पर प्रश्न खड़े किए गए लेकिन क्या किसी को मालूम है कि इंदिरा गांधी के पास कौन सी डिग्री थी? राजीव गांधी और संजय गांधी कितना पढ़े लिखे थे? राहुल और प्रियंका की शिक्षा कहां तक हुई? कठपुतली प्रधानमंत्री की डोर अपने हाथ में रखने वाली सोनिया कितना पढ़ी लिखी हैं? मोदी को चायवाला संबोधित करने वालों ने यह कभी नहीं बताया कि सोनिया आरंभिक दिनों में क्या करती थी?

 

कभी-कभी ऐसा लगता है कि कुछ लोगों के पास मोदी विरोध के अलावा कोई काम ही नहीं बचा. राहुल गांधी जैसे राजनेता अपनी पार्टी के अभियान चलाने से ज्यादा मोदी विरोध के अभियान चलाते हैं. उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक चुकी है, और उन्हे पता भी नहीं. अमेठी हार चुके हैं, इसका उन्हें गम नहीं और वायनाड हारने जा रहे हैं, इसकी उन्हें कानो कान खबर नहीं.

 

बात बात पर और हर बात पर मोदी का विरोध करने वालों ने जनता में उनके विरुद्ध प्रतिरोधक कवच (रजिस्टेंस) उत्पन्न कर दिया है जिससे विरोध का प्रभाव उल्टा होता है. जितना मोदी का विरोध किया जाता है उनकी लोकप्रियता उतनी ही बढ़ती जाती है. उनके विरोधी खींझ रहे हैं अब तो उन्होंने भारत के प्रबुद्ध मतदाताओं को भी जोकर, नासमझ, अज्ञानी, अनपढ़ , गाय गोबर वाले मूर्ख आदि बताना शुरू कर दिया है जिसका प्रभाव भी निश्चित ही उल्टा होगा और मोदी की लोकप्रियता और बढ़ेगी.

 

 

 लेकिन मोदी सब कुछ अच्छा और वही कर रहे हैं जो देश में वर्तमान परस्थितियों में होना चाहिए, ऐसा भी नहीं है. कश्मीर के लिए नेहरु को जैसा दोष दिया जाता है, क्या बंगाल में जो हो रहा है, उसका दोष मोदी के सिर नहीं जाएगा? सिखों को  हर संभव संतुष्ट करने के प्रयासों के बाद भी पंजाब में ९० के दशक वाला खेल शुरू हो गया है, क्या मोदी इसके लिए जिम्मेदार नहीं होंगे ?

 

महाराष्ट्र में राजनैतिक नंगनांच व कानून का खुला दुरूपयोग, बंगाल और केरल में हिन्दुओं की राजनैतिक हत्याएं और बढ़ता इस्लामिक आतंक, राजस्थान के औरंगजेबी सन्देश, दक्षिण के राज्यों में बढ़ते इस्लामिक प्रसार , पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ता ईसाईकरण आदि अनेक ऐसे मामले हैं, जिसके कारण धीरे धीरे देश में गृह युद्ध की स्थिति पैदा होती जा रही है, और इसके लिए निश्चित रूप से  मोदी को कटघरे में खड़ा किया जाएगा. समान नागरिकता कानून, मुस्लिमों को अल्पसंख्यक का अनावश्यक दर्जा और मदरसों का  अनापसनाप वित्त पोषण, मंदिर मुक्ति के प्रति उदासीन रवैया, संशोधित नागरिकता कानून को ठंडे बस्ते में डालना जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मसलों पर ढुलमुल रवैया, मोदी के लिए बहुत भारी पड़ेंगा  और अगर भाजपा ने इस दिशा में कोइ ठोस कदम नहीं उठाये  तो केंद्र की सत्ता में उसका सफ़र बहुत लंबा नहीं  होगा और तब बहस होगी कि मोदी अचानक इतने अलोकप्रिय कैसे हो गए?                        

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         -शिव मिश्रा

ResponseToSPM@gmail.com

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शनिवार, 30 अप्रैल 2022

Be Truly Secular

 

My compliments to Republic TV for this campaign. 

Bharat that is India had been secular because of Sanatan Dharma and its Vasudhaiv Kutumbkam Sanskriti. Pseudo secularism started in  a way when Gandhi started practicing Muslim minoritism. After partition of India both Gandhi and Nehru did not allow all the Muslims to go to Pakistan because of vested interest. Nehru in order to strengthen his weak  position in the Congress, started Muslim appeasement while claiming himself as champion of the secularism. That was a period when pseudo  secularism got  Momentum in India and there after all governments except Vajpayee and Modi governments continued the Muslim appeasement policy. 

Almost all the Regional political parties are following appeasement policy for vote bank politics. Gradually the secularism in India has been changed to criticizing Hindu and appeasing Muslims. now Hindu temples are controlled by the government and the religious places of other communities are free from any interference.  In fact, money of temples is being spent on other religious institutions. 

See few recent examples of secularism -

1. Maharashtra government issued instruction that Azan on loudspeakers will go as it is and 15 minutes before and after Azan no loudspeaker can be played within the 100 meters of Mosque  area. At the same time the same government has  arrested  MP Navneet Rana and his husband an independent MLA for merely declaration to recite Hanuman Chalisa in front of Matoshree.

2. Rajasthan government blocked the roads and  closed the Markets  in Jaipur and made all necessary arrangements including fitting of  loudspeakers on   poles with full volumes  in the city for performing   Namaz on the roads. 

Same Rajasthan government did not provide any security to the processions on  Ram Navami and Hanuman Janmotsav, resulting into stone pelting on the procession by minority community.   

 3. Yogi Govt. in UP  ensured that Namaz is not performed on roads to avoid inconvenience to the public in general . He also ensured  removal of  loudspeakers from temples, mosques and Gurudwaras and lowering down the volume of the remaining to ensure Supreme Court's  instructions. 

There was not even a single clash on Ram Navami, Hanuman Janmotsav and Alvida Namaj.  

Now imagine  who is more secular ? Yogi is branded communal but Uddhav and  Gehlot are secular. 

This is the country where - 

  • One can find place for Namaz in every Airport. 
  • All the states have Haz Houses.
  • Rioters, stone palters  are called secular,  but bulldozers are communal.

Please do not tolerate appeasement and pseudo secularism.   

Let everybody “Be truly secular” in India.

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- Shiv Mishra 

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2022

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2022 में किस राजनीतिक दल ने सबसे ज्यादा अवसर गवा दिए ?

 

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव कई मायनों में बहुत रोमांचकारी रहे. इसमें भाजपा और सपा गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला था. बसपा और कांग्रेसी भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहे थे लेकिन एआई एमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने  उत्तर प्रदेश में प्रयोग कर रहे थे   कि क्या मुस्लिम मतदाता किसी मुस्लिम पार्टी के पक्ष में लामबंद हो सकते हैं.

जहां भाजपा मोदी और योगी की लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर दूसरी बार सत्ता पाने के लिए आत्मविश्वास पूर्वक मैदान में थी, वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव सत्ता विरोधी लहर पर सवार होकर योगी को खलनायक के रूप में पेश करते हुए मैदान में ताल ठोक रहे थे. वह 2012 में समाजवादी पार्टी को मिली सफलता को दोहराना चाह रहे थे. उन्होंने छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था और भाजपा से कुछ मंत्रियों और विधायकों को तोड़कर योगी विरोधी लहर बनाने की कोशिश की.

बात करते हैं  राष्ट्रीय लोक दल के नेता जयंत चौधरी की जिन्होंने  अखिलेश यादव के साथ गठबंधन किया था. एक साल तक दिल्ली की सीमाओं पर तंबू कनात लगाए बैठे तथाकथित किसान आंदोलनकारियों को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बाहुल्य क्षेत्र की भी सहानुभूति हासिल थी और उसके पीछे कारण थे राकेश टिकैत जो जाट होने के साथ साथ भारतीय किसान यूनियन नेता भी थे और इस कारण क्षेत्र में ऐसा माहौल बनाया गया था जिसे लगता था कि इस बार यहां भाजपा का सूपड़ा साफ हो जाएगा, जहां भाजपा ने पिछले तीन चुनावों, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव, में लगातार शानदार सफलता हासिल की थी. यही जयंत मात खा गए.  

वैसे तो जयंत चौधरी चौधरी अजीत सिंह के बेटे और चौधरी चरण सिंह के पौत्र हैं और यही उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक हैसियत भी है, अन्यथा पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका कोई खास वजन नहीं है. हमेशा जाट पहचान से जुड़े होने के कारण चौधरी चरण सिंह भी सीटों की संख्या में  आशातीत बढ़ोतरी नहीं कर सके थे . राजनीतिक विस्तार के लिए उन्होंने पहले अजगर ( AJGR-अहीर,जाट, गुर्जर और राजपूत ) और बाद में मजगर (MAJGR - मुसलमान, जाट, गुर्जर और राजपूत) मतदाताओं को संगठित करने की कोशिश की लेकिन फिर भी अपने दम पर बड़े दल के रूप में नहीं उभर पाए.

चौधरी अजीत सिंह ने अपने पिता चरण सिंह की विरासत को संभाला जरूर  लेकिन राजनीतिक विस्तार में उन्हें भी कोई अप्रत्याशित सफलता नहीं मिली और उनका आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कुल सीटों तक ही सीमित रहा. उन्हें यह गलतफहमी कभी नहीं रही कि वह अपने राजनीतिक दल के सहारे कभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन पाएंगे इसलिए अपने अत्यंत छोटे संख्या बल के सहारे भी अपने राजनीतिक कौशल से लगभग हर राजनीतिक दल की केंद्र सरकार में मंत्री पद प्राप्त करने में सफल रहे और शायद  यही  उनकी सबसे बड़ी सफलता थी.

जयंत चौधरी अपने पिता के इस राजनैतिक कौशल को ठीक से समझ नहीं पाए. राष्ट्रीय लोक दल के नेता के रूप में वह चाहे जितने भी गठबंधन करें वह कभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी प्राप्त नहीं कर सकते हैं, और ना ही केंद्र में कभी किंग मेकर की भूमिका में आ सकते हैं. इसलिए उनके समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है अपना राजनीतिक वजूद बनाए रखना जिसके लिए उन्हें किसी ऐसे राजनीतिक दल से गठबंधन करने की आवश्यकता हमेशा पड़ेगी जो या तो सत्ता में हो या जिसकी सत्ता में आने की संभावना हो, जिसके सहारे वह सत्ता में भागीदारी कर सकें और अपने मतदाताओं की अपेक्षाओं को भी पूरा कर सकें. लंबे समय तक विपक्ष में रहकर कोई भी राजनीतिक दल अपना अस्तित्व बचाकर नहीं रख सकता.

जयंत चौधरी के पास गठबंधन करने के लिए दो अच्छे विकल्प थे भाजपा और सपा. उन्होंने सपा से गठबंधन किया जो तभी  सार्थक हो सकता था जब सपा सत्ता में आती और उन्हें कुछ मंत्री पद हासिल हो जाते. भाजपा के साथ गठबंधन करने से उन्हें गारंटीड रिटर्न  मिल  सकता था. यदि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनती  तो उन्हें यहां सत्ता में भागीदारी मिलती  और यदि प्रदेश में भाजपा सरकार नहीं भी बनती तो भी  केंद्र में सत्ता में भागीदार बनने की भरपूर संभावना थी. भाजपा ने उनसे गठबंधन करने के संकेत भी दिए थे, अमित शाह ने इसका जिक्र भी किया था,  जिसे  वह ठीक से समझ नहीं सके. केंद्रीय मंत्रिमंडल में अभी भी जाटों का प्रतिनिधित्व कम है. आज की परिस्थितियों में उनके पास सिवाय असमंजस के कुछ भी नहीं बचा है, यहाँ तक की भाजपा का उनकी फिलहाल जरूरत नहीं  है.  

अखिलेश यादव जिस तरह की राजनीति कर रहे हैं उसके चलते अगर उनका सपा के साथ गठबंधन चलता भी रहा  तो भी अगले लोकसभा चुनाव में भी उनके पास बहुत अवसर नहीं है और उसके बाद 2027 के विधानसभा चुनाव में भी कोई अच्छे आसार नजर नहीं आते. उनकी पार्टी भी इतनी बड़ी नहीं है जिससे किसी चमत्कार होने की आशा हो. 

हाल ही में उन्होंने सपा के असंतुष्ट नेता आजम खान के  परिवार से मुलाकात की और एक नए राजनीतिक गठबंधन के संकेत दिए. अगर ऐसा हो भी जाता है तो वह अखिलेश यादव का तो बहुत नुकसान होगा  लेकिन उनका अपना कितना फायदा होता है, यह देखने की बात होगी. वैसे आजम खान भी पुराने नेता है और वह राष्ट्रीय लोक दल जैसे एक  छोटे राजनीतिक दल में  शामिल होंगे इसकी संभावना नहीं लगती. हां अगर आजम खान अपनी अलग पार्टी बनाते हैं तो राष्ट्रीय लोक दल के साथ गठबंधन कर सकते हैं, लेकिन ऐसा गठबंधन सत्ता में पहुंचेगा इसकी संभावना नहीं लगती.

यद्यपि पिछले विधानसभा चुनाव की अपेक्षा जयंत चौधरी के विधायकों की संख्या बढ़ गई है फिर भी भाजपा के साथ गठबंधन करने में उनका बहुत फायदा था जिसे नजरअंदाज करके उन्होंने राजनीतिक अदूरदर्शिता का ही  परिचय दिया है. इसलिए उनके  विधायकों की संख्या तो बढी लेकिन वह जीत कर भी जीत नहीं पाए.  हो सकता है कि उन्हें भी इसका मलाल हो लेकिन राजनीति में उचित समय पर उचित निर्णय का बहुत महत्त्व होता है और इस मामले में जितिन प्रसाद और नितिन अग्रवाल इनसे बीस साबित हो गए.  

- शिव मिश्रा 


मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

हिन्दुस्तान में हनुमान चालीसा पढ़ने की घोषणा भी राष्ट्रद्रोह

 

क्या हिंदुस्तान में हनुमान चालीसा पढ़ना राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है ?


हनुमान चालीसा पढ़ने की घोषणा करने पर किसी पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दायर करने की खबर अगर आप मीडिया में सुनते हैं या समाचार पत्र में पढ़ते हैं, तो आप पक्का समझ ले कि यह हिन्दुस्तान तो नहीं होगा, भारत होगा.

अब आते हैं हनुमान चालीसा पर जिसके पढ़ने की घोषणा मात्र से राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज किया जाता है मुंबई में अमरावती की सांसद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा पर. उन्हें राष्ट्रद्रोह, दो समुदायों के बीच वैमनस्यता फैलाने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.

नवनीत राणा ने घोषणा की थी कि वह मातोश्री के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करेंगी. उनका ऐसा कहना मुंबई में लाउडस्पीकर से हनुमान चालीसा के पाठ पर प्रतिबंध लगाए जाने के विरोध स्वरूप किया गया था, जो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है. यद्यपि बाद में प्रधानमंत्री के मुंबई में कार्यक्रम को देखते हुए उन्होंने अपनी इस घोषणा को वापस ले लिया था लेकिन इसके
बाद शिवसेना कार्यकर्ताओं ने उनके निवास पर काफी हुड़दंग मचाया, उनके घर कि चारों ओर मेडिकल एंबुलेंस लगाकर रास्ता बंद कर दिया गया. रात में ही राणा दंपति को गिरफ्तार कर लिया गया. रात भर उन्हें पुलिस लॉकअप में रखा गया और दूसरे दिन शाम को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. सभी सरकार की समझदारी पर हैरान है.

नवनीत राणा निर्दलीय सांसद है और उनके पति भी निर्दलीय विधायक हैं. आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि जो व्यक्ति निर्दलीय चुनाव लड़ कर बड़े दलों को हरा सकता है उसकी लोकप्रियता अपने क्षेत्र में कितनी होगी. हिंदूवादी विचारधारा के कारण वह भाजपा नेताओं के काफी करीब है, यह भी एक कारण है.
वैसे तो
महाराष्ट्र की उद्धव सरकार पहले दिन से ही गलत कारणों से सुर्खियों में रहती आयी है लेकिन नवनीत राणा का मामला उद्धव सरकार का निहायत अविवेकपूर्ण और बदले की भावना से किया गया मामला है. स्वयं संजय राउत और उद्धव ठाकरे ने अपने बयानों से स्पष्ट कर दिया है कि पुलिस कार्यवाही राणा दंपति को सबक सिखाने के लिए की गई है.

संजय राउत ने कहा है कि १."मातोश्री से जो पंगा लेगा उसे जमीन में 30 फीट नीचे गाड़ दिया जाएगा". वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने दोहराया कि जो मातोश्री को चुनौती देना चाहता है वह अपने अंतिम संस्कार के सामान का इंतजाम भी कर ले." एक लोकतांत्रिक देश में एक सांसद द्वारा कहे गए ये शब्द है, और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और मानवतावादी लोगों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. हो सकता है यह
विनाश काले विपरीत बुद्धि" की भावना को चरितार्थ कर रहा हो लेकिन केंद्र सरकार की क्या जिम्मेदारी है?


महाराष्ट्र में हनुमान चालीसा ने भूचाल ला दिया है. इसकी शुरुआत तब हुई जब सिने जगत की सुप्रसिद्ध गायिका अनुराधा पौडवाल ने पास की मस्जिद के अत्यधिक शोरगुल से होने वाली पीड़ा साझा की और ध्वनि को नियंत्रित करने की मांग की. सोशल मीडिया में इस पर खूब चर्चा हुई. यह पाया गया कि ध्वनि नियंत्रित करने के संबंध में मुंबई हाई कोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय के के दिशा निर्देश है, जिनका पालन नहीं किया जा रहा है और धार्मिक स्थलों में पूरे वॉल्यूम के साथ लाउडस्पीकर बजाए जा रहे हैं. अजान के शोर और रमजान का महीना होने के कारण रात भर चलने वाले शोर से लोग परेशान हैं .

मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने उद्धव सरकार से विशेष संप्रदाय के धार्मिक स्थलों से कानून को दरकिनार करते हुए पूरे वॉल्यूम में लाउडस्पीकर बजाने पर रोक लगाने की मांग की है . उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा भी कि अगर 3 मई के बाद यह जारी रहता है तो वह मुंबई के हर मंदिर में हर चौराहे पर पांचों वक्त लाउडस्पीकर से हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे. 3 मई तक का समय इसलिए दिया गया ताकि रमजान का महीना खत्म हो जाए और सरकार को सोचने का समय भी मिल जाए.

इसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने निर्देश जारी किये कि अजान के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जाएगा और अजान जैसे चल रही थी वैसे ही चलेगी. पुलिस ने यह भी कहा की अजान के समय के 15 मिनट पहले और 15 मिनट बाद तक किसी भी मस्जिद के 100 मीटर के दायरे में कोई लाउडस्पीकर नहीं बजाया जा सकता, चाहे वह भजन - कीर्तन हो या अन्य कोई धार्मिक कर्मकांड क्यों न हो. इस फैसले ने राज ठाकरे को एक बहुत बड़ी चुनौती दे दी है और इसी चुनौती ने राज ठाकरे को एक बार फिर राजनीति में स्थापित होने में बड़ी सहायता की है. इसलिए 3 मई के बाद टकराव तो होगा ही क्योंकि राज ठाकरे मुंबई वासियों का समर्थन मिल रहा है भले ही वह कोरी राजनीति कर रहे हो.

कुल मिलाकर महाराष्ट्र सरकार और उसके शुभचिंतकों ने हनुमान चालीसा के पाठ को इस तरह से प्रस्तुत किया जैसे यह कोई संगीन अपराध हो. इसी से आहत होकर सांसद नवनीत राणा ने घोषणा की कि वह मातोश्री (उद्धव ठाकरे का निवास) के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करेंगी. यह लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है, उन्होंने सिर्फ घोषणा की थी, राणा दंपति मातोश्री के सामने पहुंचे भी नहीं थे. सामान्यतः पुलिस रोकने या गिरफ्तार करने की कार्यवाही तब करती है प्रदर्शनकारी प्रदर्शन स्थल पर पहुंचते हैं, लेकिन उनकी घोषणा के तुरंत बाद शनिवार शाम को ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया यद्यपि रविवार को मुंबई में प्रधानमंत्री के कार्यक्रम को देखते हुए उन्होंने अपना विरोध प्रदर्शन टाल दिया था लेकिन फिर भी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. नवनीत राणा की शिकायत पर लोकसभा अध्यक्ष ने  मुंबई पुलिस से 24 घंटे के अंदर जवाब मांगा है. 

सरकार से सामान्यतया जिस तरह के कार्यों की अपेक्षा की जाती है उस पर उद्धव सरकार कितनी खरी उतरी है यह तो अलग विमर्श का मुद्दा है संतुष्ट होना तो दूर, जनता स्तब्ध है और इस तरह के कारनामों से बरबस उन्हें हिन्दू ह्रदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे की याद आ जाती हैं. तरह-तरह के कांड इस सरकार के इस कार्यकाल में उजागर हुए हैं. वसूली और भ्रष्टाचार के मामले में सरकार के गृह मंत्री सहित 2 कैबिनेट मंत्री जेल में हैं.

कोविड-19 में सरकार ने जैसा किया उसे लोग कभी नहीं भूलेंगे.
तीन विभिन्न विचारधाराओं के दलों कि ये सरकार कभी एक दिशा में नहीं चलती है लोगों का मानना है कि शरद पवार ही इस सरकार के निर्माता है और पर्दे के पीछे से सरकार के संचालक भी. इसलिए लोगों की धारणा है कि शरद पवार शिव सेना को पूरी तरह से बर्बाद करके ही दम लेंगे . उनके पीछे चलना उद्धव की मजबूरी है, जिस दिन उद्धव अलग चलेंगे सरकार गिर जाएगी लेकिन क्या सरकार बचाने और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए कोई कुछ भी कर सकता है. जो भी हो उद्धव ने राणा दंपत्ति को एक झटके महाराष्ट्र में हिंदुत्व के बड़े नायक के रूप में स्थापित कर दिया .

मुंबई उच्च न्यायालय ने राणा दंपति की FIR निरस्त करने की याचिका खारिज कर दी है, जिस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि अर्णव गोस्वामी, पालघर में पुलिस के सामने साधुओं की हत्या और कंगना रानौत के मामले में भी मुंबई उच्च न्यायालय का रुख पूरे देश में चर्चा का विषय था. निचली अदालत जिसने राणा दंपत्ति 14 दिन की न्यायिक हिरासत का आदेश दिया, उनके विवेक पर तो कोई बात करना ही बेकार है.

सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि केंद्र सरकार इतने बेबस और लाचार क्यों है? महाराष्ट्र को अभी क्या देखना बाकी है?
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- शिव मिश्रा
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रविवार, 24 अप्रैल 2022

रघुराम राजन का बयान "अल्पसंख्यक विरोधी" छवि भारत और भारतीय कंपनियों को नुकसान पहुंचाएगी.

रघुराम राजन ने कहा है कि "अल्पसंख्यक विरोधी" छवि भारत और भारतीय कंपनियों को नुकसान पहुंचाएगी। 


राहुल गांधी और रघुराम राजन के बीच क्या संबंध है? के लिए शिव मिश्रा (Shiv Mishra) का जवाब

रघुराम राजन ने जो कहा है उस पर विश्लेषण करने के पहले मैं आपको यह बताना चाहता हूं कि मेरी राय में रघुराम राजन बहुत अच्छे और स्तरीय अर्थशास्त्री नहीं है, लेकिन भारत में उनका बहुत ज्यादा महिमामंडन किया गया है जिसका कारण है एंटी मोदी और एंटी इंडिया मीडिया और भारत का एक तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग जो मोदी के विरोध में खड़े हर व्यक्ति के साथ खड़ा हो जाता है.

आज यह बिल्कुल प्रमाणित है कि वह भारत विरोधी हैं और केंद्र में भाजपा और मोदी सरकार होने की वजह से देश के हालात को भारत विरोधी विदेशी लॉबी के चश्मे से देखते हैं.

उनकी नियुक्ति यूपीए के शासनकाल में हुई थी और उनके कार्यकाल का कुछ हिस्सा कांग्रेस सरकार और बाकी मोदी सरकार में था.

उनकी हार्दिक इच्छा राहुल गांधी के मनमोहन सिंह बनने की थी ( राहुल प्रधानमंत्री और वह वित्तमंत्री ). वह सोचते थे कि अगर 2019 में कांग्रेस की सरकार बनती है तो वह वित्त मंत्री बन जाएंगे और उसके बाद अगर मिली जुली गठबंधन की सरकार का दौर चला तो कांग्रेश और गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा के कारण सर्वसम्मति के प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं. उन्हें प्रधानमंत्री का पद अपने से सिर्फ दो कदम दूर लगता था एक कदम वित्त मंत्री बनना और दूसरा कदम प्रधानमंत्री बन जाना.

रिजर्व बैंक के गवर्नर की नियुक्ति 3 साल के लिए होती है जिसे और २ साल के लिए बढ़ाया जा सकता है. उनके कार्यकाल के दौरान डॉ सुब्रमण्यम स्वामी अनेक ऐसे तथ्य लाए जिनसे साबित होता था कि वह भारतीय अर्थव्यवस्था और सरकार के विरुद्ध कार्य कर रहे हैं. मोदी सरकार आने के बाद भी वह लगातार अपने गुरु पी चिदंबरम के संपर्क में रहते थे और उनकी सलाह पर कार्य करते थे. डॉक्टर स्वामी के जबरदस्त विरोध के कारण ही मोदी सरकार ने रघुराम राजन का कार्यकाल नहीं बढ़ाया. तब से लेकर आज तक रघुराम राजन मोदी और भाजपा सरकार के विरोध में खड़े हैं और हर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सरकार की आलोचना करने का कोई भी अवसर हाथ से नहीं जाने देते.

रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में डॉक्टर रघुराम राजन ने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में कोई खास सुधार तो नहीं किया लेकिन मोदी सरकार के आने के बाद सरकार से उनका सामंजस्य टूट गया था. वैसे तो रिजर्व बैंक एक स्वायत्तशासी संस्था है लेकिन अगर रिजर्व बैंक सरकार से सहयोग करना बंद कर दें तो अर्थव्यवस्था की दुर्गति हो सकती है.

राजन के नीतिगत फैसलों के कारण बैंकिंग व्यवस्था चरमरा गई थी. बैंकों से ढूंढ ढूंढ कर एनपीए निकालना और उसके विरुद्ध प्रोविजन करना उनके कार्यकाल का एक प्रमुख कार्य कहा जा सकता है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की साख को बहुत धक्का लगा.

मजेदार तथ्य है कांग्रेश शासन के समय उन्होंने भारत में इस्लामिक बैंकिंग शुरुआत करने को सिद्धांत मंजूरी दे दी थी और प्रायोगिक तौर पर केरल में इसकी शुरुआत भी कर दी गई थी. रिजर्व बैंक से उनकी विदाई के बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

आज अगर रघुराम राजन कहते हैं कि "भारत में तानाशाही है जो अपने अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करता है, जिसकी खबरें इकोनॉमिस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स और वाशिंगटन पोस्ट में छपती हैं. देश में मौत के आंकड़े भी छिपाये जा रहे हैं।" इन सब बातों से बिल्कुल स्पष्ट है कि उनका रुख भारत विरोधी है और वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को बहुत नुकसान पहुंचा रहे हैं. उनका यह कहना कि "अल्पसंख्यक विरोधी छवि भारत और भारतीय कंपनियों को नुकसान पहुंचाएगी" एक तरह से विदेशी निवेशको और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भारत के प्रति प्रतिकूल संदेश देना है. उनके कथन के ठीक विपरीत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अन्य संस्थाएं भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रशंसा कर रही हैं, जैसे नीचे के चार्ट से देखा जा सकता है

वैसे तो उन्होंने कई भारतीय मुद्दों जैसे अर्थव्यवस्था की रिकवरी, श्रम कानून, न्यूनतम समर्थन मूल्य और निजीकरण आदि पर विवादित और बकवास पूर्ण बयान दिए हैं.

समझा जा सकता है कि आरबीआई के गवर्नर के रूप में उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था का क्या हाल किया होगा. अच्छी बात यह है कि देश और विदेश में लोग उन्हें समझ गए हैं इसलिए उनकी बातों का कोई बहुत फर्क नहीं पड़ता. मेरी व्यक्तिगत राय है कि हम सभी को डॉ सुब्रमण्यम स्वामी का शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने अपने व्यक्तिगत प्रयासों से ऐसी ऐसी सूचनाएं सार्वजनिक की जिसे कारण भाजपा सरकार भी बैक फुट पर आ गयी और उसने राजन का कार्यकाल नहीं बढ़ाया और देश का बड़ा नुकसान होने से बच गया हालाँकि इस पर बहुत दिनों शोर शराबा किया जाता रहा.
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- शिव मिश्रा 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

पकिस्तान बनाने के बाद भी मुस्लिम भारत में क्यों रहे?

भारत और पाकिस्तान के धार्मिक  आधार पर विभाजन के समय सारे मुसलमान पाकिस्तान क्यों नहीं गए?



यह बहुत बड़ा षड्यंत्र है. इसे समझाने के लिए थोडा पीछे जाना पडेगा.  भारत के मुसलमानों में लगभग सभी धर्मातरित हैं और वे  पहले हिंदू थे, लेकिन ये  सब इतने कट्टर हो गए कि वे स्वयं भी काफिरों का  यानी अपने हिंदू भाइयों का सफाया करने लगे. अंग्रेजों के शासन से मुक्ति के लिए जब 1857 में सैन्य विद्रोह हुआ और स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम आंदोलन शुरू हुआ तो उसमें भी हिंदू और मुसलमानों के बीच मतैक्य नहीं था. जब बहेलिया के जाल में दो अलग-अलग प्रजातियों के पक्षी फसते हैं तो मुक्ति के लिए दोनों साथ-साथ प्रयास करते हैं लेकिन यहां ऐसा भी नहीं हो पाया. मुसलमान चाहते थे कि अंग्रेजों ने मुगलों से शासन छीना है तो स्वतंत्रता के बाद शासन की बागडोर मुसलमानों के हाथ होनी चाहिए. 

इस मानसिकता के साथ उनकी मांग थी कि आंदोलन का मुखिया कोई मुसलमान हो. उस समय हिंदुओं की जनसंख्या 90% से भी अधिक थी फिर भी हिंदुओं ने दिल पर पत्थर रखकर अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर द्वितीय को आंदोलन का नेता स्वीकार कर उनकी अगुवाई में आंदोलन शुरू किया गया. बहादुर शाह जफर की उम्र लगभग 80 वर्ष थी और वह अपने पाजामे का नाड़ा भी खुद नहीं बाँध पाते थे. वह अंग्रेजों के मुखबिर बन गए और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के सभी सेनानी एक-एक करके अंग्रेजी सेना के हाथों मारे गए. यहां से मुसलमानों को लगने लगा कि वह संख्या में कम होने के बाद भी जो चाहे कर सकते हैं.

1885 में अंग्रेजों ने कांग्रेश की स्थापना की ताकि इसके माध्यम से स्वतंत्रता की चाह रखने वाले लोगों को उलझा कर रखा जाए और अगले 100 वर्ष तक निश्चिंत होकर भारत पर शासन किया जा सकें. इस बीच हिंदू मुस्लिमों के बीच दूरियां बढ़ने लगी और 1906 मुस्लिम लीग की स्थापना के बाद सभी को यह आभास हो गया था कि मुस्लिम कुछ गड़बड़ करेंगे. मुस्लिम नेताओं ने अंग्रेजों पर दबाव बनाकर भारत के साथ अन्य कई देशों जहां अंग्रेजों का शासन था, को शामिल करके बृहत भारत बनाने का सुझाव दिया ताकि उसमें मुसलमानों की संख्या इतनी ज्यादा हो जाए कि वे स्वयं सरकार बनाने में सक्षम हो जाएं, लेकिन जब ऐसा नहीं हो सका तो उन्होंने भारत की सत्ता पर काबिज होने के लिए अंग्रेजों पर दबाव बनाया. आखिरी दांव के तौर पर 1940 में लाहौर में प्रस्ताव पास करके मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान बनाने की मांग कर दी.

भारत में ऐसे मुसलमानों की संख्या लगभग नगण्य थी जो पाकिस्तान की पक्षधर नहीं थे इससे कई हिन्दू  बुद्धिजीवियों को भरोसा था कि विभाजन के बाद  हिंदू और मुसलमान शांतिपूर्वक रह सकेंगे लेकिन देश का भौगोलिक बंटवारा इतना आसान नहीं था क्योंकि हिंदू और मुसलमान लगभग पूरे भारतवर्ष में मिलीजुली आबादी में  थे. इसलिए पाकिस्तान बनाने के लिए ऐसे भौगोलिक स्थान चुने गए जहां मुस्लिम जनसंख्या घनत्व बहुत ज्यादा था. 

बेहद चालाकी से पूर्वी और पश्चिमी छोर पर स्थान चिन्हित किए गए और ऐसे राज्य भी पाकिस्तान में मिलाने के प्रयास किए गए जहां पर शासक मुस्लिम थे लेकिन अधिकतर जनसंख्या हिंदू थी. इनमें जूनागढ़ और हैदराबाद प्रमुख थे. निजाम ने तो हैदराबाद में मुस्लिम जनसंख्या बढ़ाने के लिए बर्मा और चीन से भी मुसलमानों को लाकर बसाया. टर्की, मलेशिया, सऊदी अरब, अफगानिस्तान आदि के मुस्लिम धार्मिक  संगठन भारतीय मुसलमानों को निर्देश दे रहे थे कि वह पाकिस्तान मिल जाने के बाद भी  भारत में रह कर जिहाद करें  ताकि ghazwa-e-hind का काम लगातार चलाया जा सके.  इसलिए भारतीय मुस्लिम नेताओं का निष्कर्ष यही था कि मुसलमानों को पाकिस्तान नहीं जाना चाहिए. एक समय ऐसा भी आया जब पाकिस्तान ने भी भारतीय मुसलमानों को संदेश दिया कि उन्हें हैदराबाद जाकर बसना चाहिए.

गांधी के बारे में अनेक तथ्य सामने आए हैं वह अंग्रेजों के एजेंट थे या नहीं यह विमर्श का विषय हो सकता है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि गांधी हिंदुओं के परीक्षा मुसलमानों के ज्यादा बड़े हितैषी थे. नेहरू के बारे में भी इस तरह की तमाम बातें की जाती हैं और उनकी हिंदू होने पर संदेह किया जाता है क्योंकि उनके पिता मोतीलाल नेहरू से आगे के वंश का कोई प्रमाणिक पारिवारिक इतिहास नहीं मिलता है. नेहरू की स्थिति कांग्रेस में अत्यंत कमजोर थी लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री का पद मिला जो उनकी योग्यता या लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आधार पर नहीं बल्कि एडविना माउंटबेटन की सहायता और गांधी के कांग्रेश पर तानाशाही पूर्ण वर्चस्व के कारण ही मिल सका था. कांग्रेस कार्यसमिति ने भारी बहुमत के आधार पर सरदार बल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री के रूप में चयनित किया था जिसे गांधी ने अपने तानाशाही वीटो से पलट दिया था और नेहरू को प्रधानमंत्री बना दिया था .

पूरा देश जिन्ना के साथ-साथ गांधी और नेहरू को विभाजन का प्रमुख गुनाहगार मानता था और इसलिए इन दोनों की लोकप्रियता में भारी गिरावट आ गई थी. गांधी मुस्लिम प्रेम में पागल थे और उनके लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार थे. लोग गांधी के सामने ही उनको भलाबुरा कहते थे गली देते थे. गांधी के बड़े  बेटे ने गांधी से स्वयं कहा था कि वह हिन्दुओं के नाम पर कलंक हैं.   

गांधी- नेहरू ने  मिलकर विभाजन के बाद मुसलमानों को हिंदुस्तान में  रोकने के लिए अनेक षड्यंत्र किये. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान या भारत का विभाजन में लिखा है बिना जनसंख्या की अदला-बदली के हिंदुस्तान बनने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि पूरे विश्व में मुसलमानों के व्यवहार को देखते हुए अगर थोड़े से  मुसलमान भी हिंदुस्तान में बच जाते हैं तो वह हिंदुओं को शांति  से नहीं रहने देंगे और इसका सबसे अधिक नुकसान दलित समुदाय को होगा. डॉक्टर अंबेडकर ने जवाहरलाल नेहरू को इस संबंध में एक पत्र भी लिखा, जिसके जवाब में नेहरू ने बेहद हास्यास्पद बयान दिया था. उनका कहना था कि जनसंख्या की  अदला बदली करते हुए उनकी (नेहरु की ) पूरी उम्र निकल जाएगी, और कार्य पूरा नहीं हो पाएगा. मुसलमानों के जाने से उद्योग धंधों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी, देश में भुखमरी फैल जाएगी और हम अपनी जनता को मरता हुआ नहीं देख सकते. 


गांधी ने तो यहां तक कहा कि भारत से कोई भी मुसलमान  पाकिस्तान न जाय  बल्कि जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए हैं उनको वापस लाया जाएगा. एक  अत्यंत हृदय विदारक बात गांधी ने  कही  कि पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों को भारत न आने  दिया जाए, और जो आ गए हैं उन्हें वापस पाकिस्तान भेजा जाएगा. पूर्वी पाकिस्तान से आने वाली हिंदू शरणार्थियों के लिए नेहरू ने कहा था कि उनके लिए परमिट व्यवस्था लागू की जाए ताकि वहां से  अनावश्यक रूप से हिंदू  शरणार्थी भारत में प्रवेश न कर सके। गांधी ने नवंबर 1947 में  कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में एक प्रस्ताव पास करवाया जिसमें कहा गया था कि मुसलमानों को भारत से पाकिस्तान नहीं जाने दिया जाएगा और जो मुसलमान पाकिस्तान चले गए हैं उन्हें वापस लाकर बसाया जाएगा.  गांधी में विश्वास रखने वाले पकिस्तानी इलाकों रहने वाले हिन्दुओं की लाशे ही रेलों से भारत आ सकीं.


नेहरू ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश से किसी मुसलमान को पाकिस्तान न  जाने देने के आदेश दिए थे। देश का इससे अधिक दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि पाकिस्तान आंदोलन के मुस्लिम लीग के एक नेता को नेहरू ने संविधान सभा में शामिल कर लिया और जब 15 अगस्त 1947 को नेहरु स्वतंत्रता मिलने की घोषणा करने वाले थे उस दिन पाकिस्तान आंदोलन के कई नेता उनके साथ मंच पर बैठे थे.

 

पाकिस्तान आंदोलन की प्रमुख भूमिका निभाने वाली लखनऊ की बेगम एजाज रसूल भी पाकिस्तान नहीं गई और नेहरू ने उन्हें न केवलसंविधान सभा का सदस्य बनाया, बल्कि पद्म भूषण से सम्मानित भी किया. लखनऊ के जोश मलीहाबादी को नेहरू ने व्यक्तिगत अनुरोध करके भारत में रहने को कहा और इसकी एवज में उन्हें ऑल इंडिया रेडियो में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई. जोस  का परिवार पाकिस्तान जा चुका था जिसके लिए नेहरू ने विशेष तौर से उनको एक साल में 4 महीने का वेतन सहित अवकाश पाकिस्तान अपने परिवार से मिलने जाने के लिए स्वीकृत किया था. 


नेहरू ने एक षड्यंत्र के तहत मुस्लिम लीग के सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं और अन्य मुस्लिमों से कांग्रेस की चार आने वाली सदस्यता ग्रहण करने के लिए कहा ताकि वह देश में अपने लिए एक महत्वपूर्ण वोट बैंक की स्थापना कर सकें. हिंदुओं का नरसंहार करने वाले रजाकार संगठन के प्रमुख कासिम रिजवी तो पाकिस्तान चले गए थे लेकिन उनके संगठन के ज्यादातर सदस्य कांग्रेस में शामिल हो गए और कुछ ने एआईएमआईएम नाम की पार्टी बना ली और इस पार्टी ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया. आजकल असदुद्दीन ओवैसी इसके नेता है. 


विडंबना देखिए किस मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की आधारशिला रखी उसके भी अधिकतर लोग पाकिस्तान नहीं गए और उन्होंने मुस्लिम लीग  आगे  इंडियन यूनियन लगाकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग बना ली और जवाहरलाल नेहरू ने  उसके साथ गठबंधन भी कर लिया. 


नेहरू जहां अपने लिए वोट बैंक की स्थापना कर रहे थे वही टर्की से लेकर मलेशिया तक और सऊदी अरब से लेकर अफगानिस्तान तक मुस्लिम संगठन भारतीय मुसलमानों को निर्देश दे रहे थे कि वह पाकिस्तान मिल जाने के बाद भी  भारत में रहे ताकि ghazwa-e-hind का काम लगातार चलाया जा सके. 


विभाजन के समय भारतीय क्षेत्रों में लगभग चार करोड़ मुस्लिम आबादी थी, जिसमें से केवल 72 लाख मुस्लिम ही पाकिस्तान गए और इसमें से भी 50 लाख केवल पंजाब प्रांत से गए, शेष 22 लाख पूरे भारतवर्ष से गए. उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जहां पर मुस्लिम बड़ी संख्या में थे और जिन्होंने दंगे फसाद करने से लेकर पाकिस्तान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, अधिकतर मुस्लिम पाकिस्तान नहीं गए. 


इस तरह एक षड्यंत्र के तहत धार्मिक आधार पर पाकिस्तान की स्थापना हो जाने के बाद भी शेष भारत को हिंदू और मुसलमानों की ज्वाइंट प्रॉपर्टी बना दिया गया. कई बेशर्म जिनका नाम मिट्टी में मिल गया था, वह यह कहने से नहीं चूके कि  उनका खून भी शामिल है यहां की मिट्टी में. 


भारत अब एक फिर हिंदू मुस्लिम तनाव से झुलस रहा है और अविभाजित भारत की तरह शेष भारत पर भी एक विभाजन का खतरा मंडरा रहा है या संपूर्ण देश को गजवा ए हिंद का खतरा सता रहा है. अबकी बार यह खतरा पहले से कहीं बड़ा है क्योंकि  वामपंथी विचारधारा वाले हिंदू भी मुसलमानों के आक्रामक रुख में पूरी तरह भागीदार हैं. 

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- शिव मिश्रा 


सन्दर्भ -

१. भारत का विभाजन - डॉ आंबेडकर,

२. विभाजन के गुनाहगार - राम मनोहर लोहिया

३. अन ब्रेकिंग इंडिया - संजय दीक्षित

४. इंडिया विन्स फ्रीडम - अबुल कलाम आजाद

५. फ्रीडम एट मिडनाइट -लार्री कॉलिंस और डोमेनिक लेप्रे

६. सेलेक्ट वर्क्स ऑन नेहरु 






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