मंगलवार, 15 जून 2021

राम मंदिर जमीन विवाद क्या है? विपक्षी दल इसको इतना तूल क्यों दे रहे हैं?

 राम मंदिर जमीन विवाद :  हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाने की साजिश




सभी हिंदुओं को खास तौर से सभी राम भक्तों को एक   प्राचीन वैदिक सिद्धांत, जो आज भी प्रबंधन का सर्वश्रेष्ठ नियम है, याद रखना चाहिए कि- 

"अगर हम किसी व्यक्ति  या संस्था पर विश्वास करते हैं तो यह संपूर्ण होना चाहिए . इसका मतलब है कि यदि हम किसी व्यक्ति या संस्था पर विश्वास करते हैं तो उसके कार्यों पर संदेह नहीं करना चाहिए."

हम टुकड़ों टुकड़ों में विश्वास नहीं कर सकते  कि एक काम पर तो हम विश्वास करें और दूसरे कार्य पर संदेह करें. यदि पौराणिक काल से लेकर आज तक अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं का विवेचन करें तो पाएंगे कि  जानबूझ कर अविश्वास फैलाने के पीछे हमेशा कोई न कोई  बड़ा  षड्यंत्र और दुर्भावना होती है.

राम मंदिर निर्माण के संदर्भ में  खरीदे गए भूखंड  पर  विपक्ष द्वारा जो आरोप लगाए जा रहे हैं वह भी एक राजनीतिक षड्यंत्र के अलावा कुछ नहीं है.  हमें याद रखना होगा  कि राम मंदिर  निर्माण के  हर काम में कुछ न कुछ साजिश और  अड़ंगे   हमेशा लगाए जाते रहे हैं और आगे भी लगाये जाते रहेंगे.  लगभग 500 वर्षों के  सतत  संघर्ष  के बाद अब जबकि राम मंदिर निर्माण का सुअवसर आया है तो भी  कुछ लोग  कुत्सित  राजनीति करने से बाज नहीं आ रहे हैं. 

हम उन लोगों की बातों का कैसे विश्वास कर सकते हैं  जिन्होंने - 

  • जिन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के साथ धोखा किया हो ?

  • हजारों राम भक्तों  पर  अंधाधुंध   गोलियां  चलाकर  अयोध्या को रक्तरंजित कर दिया हो ?

  • राम के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगाया हो?

  • रामसेतु तोड़ने का प्रयास किया हो?

  • राम मंदिर के न्यायिक निर्णय को विलंबित करने का प्रयास किया हो?

अब  इस पूरे मामले  का  विस्तार से विश्लेषण करते हैं.

भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने यह निर्णय लिया है कि मंदिर से लगी और मंदिर के रास्तों में पडने वाली ज्यादा से ज्यादा जमीनों को खरीदा जाए ताकि श्री राम के भव्य मंदिर के साथ-साथ, वास्तु को भी सुधारा जा सके और अयोध्या को पौराणिक भव्यता प्रदान करने के लिए सभी संबंधित निर्माण कार्य किए जा सकें तथा श्रद्धालुओं को भी राम मंदिर पहुंचने   में कोई कठिनाई न हो.  ट्रस्ट ने इसके लिए बड़े पैमाने पर योजना तैयार की है और मंदिर के लिए महत्वपूर्ण जमीन चिन्हित भी कर ली हैं और लोगों से जिसमें दोनों समुदाय के लोग हैं, जमीन खरीदने हेतु विमर्श शुरू कर दिया गया है. ट्रस्ट का यह निर्णय अत्यंत दूरदर्शी और स्वागत योग्य है क्योंकि हमने देखा है कि ज्यादातर पौराणिक और प्रसिद्ध मंदिरों में जगह के अभाव के कारण  श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है जिससे श्रद्धालुओं को असुविधा के साथ साथ दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं. ट्रस्ट के इस फैसले के बाद विपक्षी राजनीतिक खेमों में इस बात का विरोध किया गया और कहा गया कि ऐसा करना एक अलग हिंदू शहर बसाने जैसा होगा जिससे अयोध्या में रहने वाले अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होगी. 

वह  भूखंड जिस पर  आम आदमी पार्टी  समाजवादी पार्टी  सहित  अन्य विपक्षी राजनीतिक पार्टियां घोटाले का आरोप लगा कर कह रही हैं कि 5 मिनट के अंदर 2 करोड़ की जमीन 18.5 करोड़ की कैसे हो गई? 

वास्तव में यह बहुत साधारण मामला है लेकिन आजकल एक चलन है की मूर्खता की  बात केवल  मूर्ख  ही नहीं  बुद्धिमान व्यक्ति भी करते हैं  जिसके पीछे का षड्यंत्र होता है जनता को भ्रमित करना  और यही इस पूरे मामले में किया गया है.  आजकल पत्रकारिता का स्तर भी यह हो गया है  कि बिना  जाने समझे  और छानबीन किए  ऐसी खबरें प्रसारित और प्रकाशित  होने  लगती  हैं,  और ऐसी सनसनीखेज खबरों से टीआरपी के साथ-साथ जनता का भ्रम बढ़ना भी स्वाभाविक है.   आसानी से समझने के लिए  इस भूखंड से  जुड़े  क्रय विक्रय  को    क्रम से देखते हैं

  •  4 मार्च 2011 को महफूज आलम तथा  अन्य  ने  अपने स्वामित्व वाले भूखंड (गाटा संख्या 242,243,244 और 246 कुल भूमि 2.334 हेक्टेयर)  बेचने के लिए  कुसुम पाठक, हरीश पाठक और मोहम्मद इरफान के साथ एक   विक्री  एग्रीमेंट  किया जो 3 साल के लिए वैध था और इस  भूखंड की  विक्रय राशि 1 करोड़  रुपए थी. 

  •  दिनांक 04.03.2011 को  निष्पादित इस बिक्री एग्रीमेंट को 04.03.2014 को रद्द कर दिया गया था।

  •  पुनः 20/11/2017 को महफूज आलम और  अन्य  ने कुसुम पाठक और उनके पति हरीश पाठक  को वही  भूखंड  के लिए (समान 4 गाटा संख्या, कुल भूमि 2.334 हेक्टेयर)  एक बिक्री विलेख पंजीकृत किया  जिसका विक्रय मूल्य  दो करोड़ रुपये  था.   इस एग्रीमेंट  में  एक अंतर यह आया  कि किए एग्रीमेंट कुसुम पाठक और उनके पति के पक्ष में था और क्रेताओं में से मोहम्मद इरफान  बाहर हो गए.  संभवत एग्रीमेंट निरस्त करने के पीछे यही कारण रहा होगा.   

  •  21/11/2017 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने   यही भूखंड इच्छा राम सिंह, जितेंद्र कुमार सिंह और राकेश कुमार सिंह को रु. 2.16 करोड़  मैं बेचने हेतु एक बिक्री एग्रीमेंट किया । यह समझौता  भी 17/09/2019 को रद्द कर दिया गया था। 

  •  उसी दिन  यानी 17/09/2019 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक द्वारा उपरोक्त भूमि को इच्छा राम सिंह, विश्व प्रताप उपाध्याय, मनीष कुमार, सूबेदार, बलराम यादव, रवींद्र कुमार दुबे, सुल्तान अंसारी और राशिद हुसैन को दो करोड़ में बेचने के लिए एक  नया विक्रय  समझौता किया  जिसकी वैधता अवधि 3 वर्ष थी । यह  विक्रय अनुबंध  भी 18/03/2021 को रद्द करने के लिए पंजीकृत किया गया था।

  •  इसी दिन  यानी 18/03/2021 को कुसुम पाठक और हरीश पाठक ने रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी  को एक बिक्री विलेख द्वारा गाटा संख्या 243, 244 और 246 क्षेत्र 1.2080 हेक्टेयर भूमि  को   रु. 2 करोड़  में बैनामा कर दिया .  यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि इसमें गाटा संख्या 242 जिसका क्षेत्रफल 1.126 हेक्टेयर था,  विक्रेता कुसुम पाठक और उनके पति ने अपने पास रखा.  विक्रय किये गए इस  भूखंड पर  सर्किल रेट के अनुसार स्टाम्प  ड्यूटी दी गई. 

  •  उसी दिन  क्रेता  रवि मोहन तिवारी और सुल्तान अंसारी ने इस जमीन को राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र  ट्रस्ट को बेचने का समझौता किया जिसकी  विक्रय  राशि रु. 18.50 करोड रुपये  है . इस समझौते के एवज में   ट्रस्ट द्वारा  ऑनलाइन ट्रांजेक्शन से 17 करोड़ रुपए एडवांस के तौर पर  भुगतान किए  गए . 

  • विक्रेताओं के पक्ष में बैनामा और विक्रेताओं द्वारा राम मंदिर के पक्ष में रजिस्टर्ड सेल एग्रीमेंट करने के बीच 5 मिनट का अंतर है जिसका कारण यह हो सकता है कि जब राम मंदिर ट्रस्ट की उस भूखंड के मालिकों से खरीदने की बात पक्की हो गई तो उन्हें इसका बैनामा या रजिस्ट्री करवाना आवश्यक हो गया था  क्योंकि इसके बिना वह सेल एग्रीमेंट नहीं कर सकते थे.

  • राम मंदिर ट्रस्ट की रणनीति के अनुसार विक्रेताओं  के पक्ष में बैनामा होने के तुरंत बाद उन्हें अपना रजिस्टर्ड एग्रीमेंट करवाना था ताकि विक्रेता किसी राजनीतिक दबाव में जमीन बेचने से मुकर न जाएं
  • इसलिए विक्रेताओं के बैनामा और राम मंदिर ट्रस्ट के रजिस्टर्ड एग्रीमेंट का एक ही समय तय किया गया.
  • पहले विक्रेताओं ने अपने नाम पर बैनामा कराया और इसके बाद राम मंदिर ट्रस्ट के पक्ष में रजिस्टर्ड एग्रीमेंट कर दिया.
  • बिक्रेतओं के पक्ष में जो बैनामा हुआ वह वर्षों पहले तय कीमत के अनुसार ही हुआ और  राम मंदिर ट्रस्ट का इससे कोई लेना-देना नहीं है.  ट्रस्ट को तो यह भूखंड वर्तमान कीमत पर खरीदना है  और यह भूखंड ट्रस्ट के लिए किसी भी कीमत पर खरीदना उचित इसलिए है क्योंकि  रेलवे स्टेशन के पास यहीं पर  मंदिर का प्रवेश द्वार बन रहा है. 
  • चूंकि  विक्रेताओं ने  इस भूखंड को सितम्बर 2019 में उस समय खरीदा था  जब राम मंदिर निर्माण का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला नहीं आया था  और उस समय  अयोध्या में जमीन की कीमत  सामान्य थी,  इसलिए इस भूखंड की कीमत उस समय काफी कम थी. इस भूखंड की रजिस्ट्री कभी भी की जाए  पुरानी कीमत पर ही की जाएगी, हां उस पर वर्तमान सर्किल रेट के आधार पर स्टैंप ड्यूटी देनी होगी जो उन्होंने दी है. 
  • ट्रस्ट ने यह भूखंड वर्तमान मूल्य पर खरीदा है इसलिए बहुत स्वाभाविक रूप से इसकी कीमत में अंतर होगा ही  क्योंकि राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद अयोध्या में दिन-प्रतिदिन कीमतें आसमान छू रही हैं . इसे ५ मिनट के अंतर पर  इतनी अधिक मूल्य वृद्धि  का भ्रम  फैलाना राजनीतिक उद्देश्य के अलावा और कुछ भी नहीं है.   
 

एक  सबसे बड़ी बात यह है कि राम मंदिर ट्रस्ट एक प्राइवेट ट्रस्ट है जिसका सरकार से कोई लेना देना नहीं है और यह ट्रस्ट किसी भी व्यक्ति या संस्था से आपसी विचार विमर्श और तय कीमत के अनुसार कोई भी संपत्ति खरीदने के लिए स्वतंत्र है. यह भी संभव है कि राम मंदिर ट्रस्ट को कुछ संपत्तियां बाजार मूल्य से ज्यादा कीमत पर भी खरीदनी पड़े क्योंकि अयोध्या में इस समय जमीन की कीमत आसमान छू रही है और मंदिर के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जमीन के मालिक जमीन बेचने से इंकार कर सकते हैं या मुंह मांगे पैसे मांग सकते हैं लेकिन ट्रस्ट को  अगले  50  वर्ष  के विस्तार को ध्यान में रखते हुए  यह संपत्तियां खरीदनी ही चाहिए.  राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र  ट्रस्ट प्राइवेट ट्रस्ट होने के कारण सरकार इन संपत्तियों का अधिग्रहण कर के ट्रस्ट को नहीं दे सकती.

समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता पवन पांडे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के इस मुद्दे को उछाला जिसे आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने हाथों-हाथ लपक लिया. प्रियंका वाड्रा भी कहाँ पीछे रहने वाली थी तो वह भी इस अभियान में शामिल हो गई. इन  नेताओं और  इनके दलो  का अतीत ऐसा है कि  उन  पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं किया जाना चाहिए.

राम मंदिर निर्माण  आस्था से जुड़ा बहुत संवेदनशील  मामला  है जिसने हिंदू जनमानस को बहुत प्रभावित किया है,  यह प्रभाव आगामी विधानसभा  और लोकसभा चुनाव में भी दिखाई पड़ सकता है.  इसलिए विपक्षी पार्टियां मंदिर मुद्दे की धार को कमजोर करना चाहती हैं.   अपने  कुत्सित  राजनीतिक  उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अभी और भी अनर्गल प्रलाप सामने आएंगे लेकिन  अब जनता बहुत जागरूक है  इसलिए यह राजनीतिक दल  भ्रम फैलाने में  सफल नहीं होगे  बल्कि  उन्हें इसके दुष्परिणाम  भोगने पड़ सकते हैं.

आजकल भारत की राजनीति, गिरावट की  सभी सीमाएं तोड़कर  कुछ भी कर गुजरने को तत्पर दिखती है  और इस विडंबना देखिए कि मंदिर ट्रस्ट पर दान की रकम का दुरुपयोग और हेराफेरी करने  का आरोप  वही लोग लगा रहे हैं जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए एक  पैसे का दान नहीं किया.   क्या  ऐसे लोगों को दान में दुरुपयोग की बात कहने का तो कोई नैतिक अधिकार  है ? 


राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े हुए लोग  लोभ,  लालच   से दूर हैं और जिनकी सत्य निष्ठा किसी भी संदेह से परे है.  ये ऐसे लोग हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर निर्माण के लिए समर्पित कर दिया  और अब राम के काम के अंतिम पड़ाव में  उन पर आरोप लगाना    पूरे  हिंदू जनमानस  की  धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना है.  आरोप लगाने वाले  वही लोग हैं  जिन्होंने मंदिर मुद्दे पर पूरे हिंदू समाज को अपमानित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. इन्होंने राम के अस्तित्व को ही  नकारते हुए   उन्हें  एक काल्पनिक चरित्र  बताया था .  इनमें से एक ऐसी पार्टी भी है जिसने राम मंदिर के स्थान पर सार्वजनिक शौचालय बनाने की भी बात की थी.  मजे की बात यह है कि आरोप लगाने वालों में  वे  दल  सबसे आगे हैं  जिन्होंने  अपने शासनकाल में  भ्रष्टाचार के नए-नए कीर्तिमान  गढ़े  थे .  कुछ दलों ने  फिल्मी सितारों के नाच गाने पर सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च किये थे  और अपने कार्यकाल में इतना भ्रष्टाचार किया जिसकी कुल राशि कई राज्यों की सकल घरेलू उत्पाद से भी ज्यादा हो सकती है . 


कुछ दलों ने  पारिवारिक  ट्रस्ट  के लिए  केंद्रीय बजट से आवंटन भी कराया और  राष्ट्रीय हितों को दरकिनार कर  कई  देशों से  चंदा  भी लिया.  जिनके रिश्तेदारों पर सरकारी सहयोग से  कौड़ियों के मोल जमीन खरीद कर   हजारों करोड़  रुपए कमाने के आरोप लगे. कुछ राजनीतिक दलों  के नेताओं पर कोरोना महामारी के दौरान  ऑक्सीजन  और महत्वपूर्ण दवाओं की कालाबाजारी और  सरकारी विज्ञापनों में  कमीशन खाने, अस्पतालों में  फर्जी नामों से बेड बुक करा कर जनता को बेवजह मारने  के आरोप लगे.  कुछ राजनीतिक दलों  के दामन पर प्रवासी श्रमिकों को  पलायन के लिए मजबूर  करने के भी दाग  है. महामारी के दौरान कुछ राजनीतिक दलों पर केंद्र सरकार की मुफ्त राशन योजना के दुरुपयोग का आरोप भी है जिसे  तथाकथित रूप से  अपात्र  लोगों, बांग्लादेशी घुसपैठियों  और रोहिंग्याओं को  उपलब्ध कराने का संगीन आरोप भी सामने आया है . 


उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव  नजदीक  हैं, जहाँ   समाजवादी पार्टी  सत्ता पाने के लिए बेकरार है,  तो कांग्रेश पार्टी अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाश रही  है, वही  आम आदमी पार्टी  दिल्ली के बाहर पांव पसारने   के लिए व्याकुल है.   इन सब पार्टियों के पास कोई बड़ा और गंभीर  मुद्दा नहीं है इसलिए वे मुद्दे ढूंढ कम,  खोद  ज्यादा रहे  हैं.  यह मुद्दा भी एक खोदा हुआ मुद्दा है. ऐसा लगता है कि 2024 के   लोकसभा चुनाव तक  विपक्ष इस तरह के स्टंट लगातार करता रहेगा.   ऐसे में सभी देशवासियों को चाहिए कि  किसी राजनैतिक दल  की  कोई भी बात सुनने से  पहले  उनकी नियति  और उसका अतीत अवश्य  ध्यान में  रखें तो सबकुछ स्पष्ट हो जाएगा.


                        " उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू" 

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- शिव मिश्रा

  


शुक्रवार, 11 जून 2021

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का आखिर कांग्रेस इतना विरोध क्यों कर रही है? क्या है इसके पीछे का असली एजेंडा? क्या इसमें भी सांप्रदायिकता का खेल है?

 सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध, असली एजेंडा सांप्रदायिकता का खेल



गांधी परिवार का सत्ता प्रेम जगजाहिर है. सरदार वल्लभ भाई पटेल के पक्ष में बहुमत होने के बाद भी गांधी जी के कारण जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी मिल गई, इसके बाद नेहरु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और सत्ता को 7 पीढ़ियों तक बनाए रखने के लिए जो भी हो सकता था वह उन्होंने किया.

जवाहरलाल नेहरू के हिंदू होने पर भी तमाम सवालिया निशान है, जो खोज का विषय हैं लेकिन उन्होंने स्वयं भी कहा था कि- मैं शिक्षा से अंग्रेज, संस्कृति से मुसलमान और संयोगवस हिंदू हूं।

(“I am Englishman by education, Muslim by culture and Hindu merely by accident of birth.”)

संयोग से ही सही एक हिंदू बहुल देश में नेहरू को प्रधानमंत्री बने रहने के लिए हिंदू बने रहना मजबूरी भी थी . एक और छिपी हुई कड़वी सच्चाई यह है कि वह दिल से वामपंथी थे और अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि बनाने के चक्कर में वामपंथी सोवियत रूस के साथ खड़े होकर भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अगुआ बनने का नाटक करते रहे.

इस दौरान वह पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक- वामपंथ गठजोड़ की गिरफ्त में आ गए थे . धीरे-धीरे उन्होंने भारत के इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को इस गठजोड़ के हवाले करना शुरू कर दिया और श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद तो इस पर इस्लामी वामपंथ गठजोड़ का पूरी तरह से कब्जा हो गया.

ऐसा नहीं कि है यह सब संयोग से या अनजाने में हो गया था, इसके प्रभाव और परिणामों से नेहरू और श्रीमती गांधी दोनों ही भली भांति परिचित थे लेकिन इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ के प्रति स्वाभाविक प्रेम और वोटबैंक की राजनीति ने उन्हें देश के प्रति हो रहे इस भितरघात के प्रति आंखें बंद करने के लिए मजबूर कर दिया.

अगर यह नहीं हुआ होता तो क्या भारत का इतिहास इतना विकृत हुआ होता ? आजादी के 70 साल बाद भी सनातन संस्कृति का स्वरूप इतना बदहाल होता? आक्रांताओं के भयानक जुल्म और ज्यादितियाँ सहकर भी अपनी सनातन पहचान बचाए रखने वाले लोग, अब जान बचाने के लिए अपने ही देश में शरणार्थी बनकर भटक रहे होते ?

तुष्टिकरण और वोट बैंक की इस नीति के कारण न केवल मुगल और अंग्रेजी साम्राज्य में बनी इमारतों को ऐतिहासिक स्मारकों / धरोहरों में बदलने बल्कि हिन्दू धार्मिक स्थलों को तोड़कर बनाए गए गुलामी के प्रतीकों को भी संरक्षित और महिमा मंडित करने का षड्यंत्र रचा गया. तत्कालीन सरकारों ने समय समय पर अनेक कानून बना कर इस षड़यंत्र को सफल बनाने और बहुसंख्यक हिन्दुओं के हाँथ बांधने का पाप भी किया. यही नहीं इन इमारतों को इस्लाम धर्म और मुस्लिम स्वाभिमान से भी जोड़ने का कुत्सित प्रयास किया गया ताकि हिन्दू मुस्लिम विद्वेष के कारण लम्बे समय तक वोटों की फसल काटी जा सके. अंग्रेजों ने भारत में यही किया था और अंग्रेजों से सत्ता संभालने वाले भी काले अंग्रेजों ने भी वही किया .

सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट रोकने में कांग्रेस के अपने स्वार्थ हैं, जिसके लिए तरह तरह के कुतर्क दिए जा रहे हैं और भारत में आजमाए जा चुके सभी पुराने नुस्खे प्रयोग किये जा रहे हैं, इनमें सबसे अचूक है उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका.के माध्यम से सरकार को घेरना, परियोजना में विलम्ब करना और मुफ्त का प्रचार पाना है . उसके अलावा सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में भी जमकर दुष्प्रचार किया जा रहा है.

लेकिन इस सब का एक अत्यंत स्याह पक्ष है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जा रहा दुष्प्रचार, जिससे देश की छवि को अपूरणीय क्षति पहुंचाई जा रही है. बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया हाउस भी इस अभियान में शामिल हैं, जिनमें झूठी और सनसनीखेज खबरें छापी जा रही है. चूंकि प्रधानमंत्री मोदी हैं, तो आवश्यक रूप से गुजरात दंगों की यादें तो ताजा की ही जाएंगी , हिंदू सांप्रदायिकता, हिंदू उग्रवाद, और हिंदू तालिबान जैसे नए और सनसनीखेज नारे भी गढ़े जाएंगे.

आजकल तो टूलकिट का जमाना आ गया है जिसके हिसाब से नए-नए नैरेटिव बनाए जा रहे हैं. और कुछ लोग अगर यह ठान ले कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि कितनी ही खराब क्यों न हो जाए, मोदी की छवि खराब होनी चाहिए, तो फिर वैसा ही होगा जैसा इस समय हो रहा है.

इन सब कारनामों के पीछे असली एजेंडा है किसी भी तरह भारत की सत्ता पर कब्जा करना, जो राहुल गांधी के अनुसार केवल मोदी की छवि ख़राब करके ही पाई जा सकती है.

इसलिए एक सुनियोजित एजेंडा के अंतर्गत मोटे तौर पर दो मोर्चों पर पर कार्य हो रहा है -

१. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोदी की छवि खराब करना ताकि देश में ही नहीं पूरे विश्व में में भ्रम फैले कि भारत में कुछ भी ठीक नहीं, सब कुछ गलत हो रहा है-

  • चाहे वह कोरोना का प्रबंधन हो,

  • टीकाकरण हो

  • सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट हो,

  • किसान आंदोलन हो,

  • राज्यों के चुनाव हो या या राष्ट्र हित कोई और मुद्दा

२. मुस्लिम समुदाय को अपने पक्ष में करने के लिए कुछ भी करना पड़े, सब किया जाए चाहे तुष्टिकरण की सीमाएं तोड़ने से देश ही क्यों न टूट जाय.

सेंट्रल विस्टा परियोजना से इतनी नफरत क्यों ?

सेंट्रल विस्टा परियोजना इसी बड़े षड्यंत्र का एक छोटा बिंदु मात्र है जिसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोर शोर से उठाकर भारत को कलंकित करना और मोदी को कट्टर हिन्दू और घनघोर मुस्लिम विरोधी साबित करना है . इन घटनाओं का क्रम देखिये -

  • सेंट्रल विस्टा परियोजना के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने परियोजना को हरी झंडी दिखा दी.

  • इसके बाद भी दिल्ली उच्च न्यायालय में कोरोना महामारी में परियोजना जारी रखने के विरुद्ध जनहित याचिका दायर की गई. उच्च न्यायालय ने परियोजना को रोकने की याचिका को दुर्भावना से प्रेरित बताते हुए इसे खारिज कर दिया और कहा कि सेंट्रल विस्टा एक अहम, आवश्यक राष्ट्रीय परियोजना है. अदालत ने याचिकाकर्ताओं पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया.

  • इसके बाद हाई कोर्ट के इस फैसले को चुनौती देते हुए पुन: सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की गयी है ।

  • सोशल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया में सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रायोजित दुष्प्रचार किया जा रहा है, जिसके लिए प्रधानमंत्री मोदी पर व्यक्तिगत हमले भी किए जा रहे हैं.

आप यह जान कर हैरान होंगे कि जहां राष्ट्रीय क्षितिज पर सेंट्रल विस्ता परियोजना का विरोध के लिए कोरोना महामारी और और वित्तीय संसाधनों को महामारी पर खर्च करने को आधार बनाया जा रहा है वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसके निर्माण के पीछे हिंदू कट्टरता और इस्लाम के प्रति मोदी की घृणा को रेखांकित और प्रचारित किया जा रहा है. पुरानी संसद को मुस्लिम प्रेरित ऐतिहासिक धरोहर और प्रस्तावित नयी ईमारत को हिन्दू वादी स्मारक प्रचारित किया जा रहा है. जबकि तथ्य है कि पुरानी संसद इमारत को तो स्मारक की तरह ही सहेजे जाने का प्रस्ताव है और तोड़ा नहीं जा रहा है. इस परियोजना की शुरूआत तो स्वयं कांग्रेस सरकार ने की थी जो अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं की तरह फाइलों में बंद रह गयी

सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट का मामला वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयार्क टाइम्स, दि गार्जियन, बीबीसी आदि में प्रमुखता से छाया हुआ है. सभी में सेंट्रल विस्ता प्रोजेक्ट के पीछे मोदी की कट्टर हिंदूवादी सोच बताई जा रही है जो भारत से इस्लाम को किसी भी कीमत पर निकाल बाहर करना चाहते हैं और मुगलों से जुड़ी हुई किसी भी चीज को किसी भी कीमत पर ध्वस्त कर देना चाहते हैं..

इनमे प्रकाशित लेखों में पुरानी संसद भवन की इमारत को मुगल शैली से प्रेरित इस्लामिक इमारत बता कर कहा गया है कि इसे मोदी जैसा हिंदू तालिबानी, मुस्लिमों के प्रति अपनी घृणा के कारण ध्वस्त करना चाहता है और एक ऐसी नई इमारत बनाना चाहता है जो हिंदुओं के स्मारक की तरह दिखाई पड़े.

पिछले कुछ समय से द गार्जियन में भारतीय मूल के एक लेखक जो पेशे से मूर्तिकार हैं, और भारत के एक प्रमुख राजनीतिक दल के बेहद करीबी बताए जाते हैं, ऐसे सनसनी खेज लेख छाप रहे हैं. कुछ प्रमुख लेखो के शीर्षक पढ़कर आप हैरान हो जाएंगे -

  • मोदी का संसद पर बुलडोजर चलाना उन्हें एक हिंदू तालिबान के रूप में दर्शाता है, (Modi's bulldozing of parliament shows him as the architect of a Hindu Taliban - The Guardian Jun 2021)

  • कट्टरपंथी मोदी भारत की विरासत को नष्ट करने के लिए कोरोना संकट का उपयोग कर रहे हैं, (Modi the fanatic is using the Coronavirus crisis to destroy India's heritage - The Guardian May 2020)

  • भारत में हिंदू तालिबान का शासन है,( India is ruled by Hindu Taliban- The Guardian)

गार्जियन  के एक लेख Modi’s bulldozing of parliament shows him as the architect of a Hindu Taliban से कुछ अंश जिनसे यह पता चलता है कि भारत के विरुद्ध अन्तराष्ट्रीय स्तर पर षड़यंत्र कितना गहरा है और उससे भी चिंता का विषय है कि इसमें भारत के राजनैतिक दल भी शामिल है.

उद्धरण
" मोदी का संसद पर बुलडोजर चलाना उन्हें एक हिंदू तालिबान के रूप में दर्शाता है. राजसी मुगल-प्रेरित इमारतों को ध्वस्त  करना भारत को इस्लाम से मुक्त करने के लिए घृणित, घमंड से भरे अभियान का नवीनतम चरण है 

भारत की राजधानी नई दिल्ली के केंद्र में, एक मुगल-प्रेरित स्मारक है, जिसमें भारतीय संसद की सीट है। 1911 और 1931 के बीच ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियन द्वारा निर्मित, संसद भवन और उनके भव्य सड़क मार्ग और जल चैनल ईरान के इस्लामी शासकों द्वारा स्थापित और समरकंद के इस्लामी सल्तनत और भारत के मुगल शासकों द्वारा विस्तृत रूप का पालन करते बनायी गयी  हैं। 

लुटियंस ने शायद आधुनिक समय की सबसे महत्वपूर्ण इस्लामी-प्रेरित इमारत को डिजाइन किया था। इमारतें हिंदू मंदिरों और महलों से स्थापत्य प्रतीकों को उद्धृत तो करती हैं, लेकिन भव्य योजना मुगल-इस्लामी परिदृश्य के डिजाइन का अनुसरण करती है, जिसमें रोमन विजयवाद को हल्का संकेत दिया गया है। मेरे विचार से यह दुनिया में कहीं भी सरकारी भवनों का सबसे बड़ा समूह है। 

अप्रत्याशित रूप से, इन इमारतों की इस्लामी उत्पत्ति दिल्ली में वर्तमान शासन को अपमानित करती है। इसलिए तानाशाह मोदी और उसके गुर्गे इसे बर्बाद कर रहे हैं। जैसा कि मैं लिखता हूं, विनाश हो रहा है। यह एक घृणित बात है कि भारत को इस्लाम से मुक्त करने के मोदी के नफरत भरे अभियान को विश्व स्तरीय स्मारक के विनाश के माध्यम से जारी रखने की अनुमति है। हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र विरासत मंच चुप है और विश्व धरोहर निकायों ने अपना मुंह मजबूती से बंद रखा है। क्या वे मोदी से डरते हैं, या उन्हें परवाह नहीं है कि भारत में क्या हो रहा है? 

मोदी ने तीसरे दर्जे के बिमल पटेल को अपना वास्तुकार नियुक्त किया है। पटेल इसके प्रतिस्थापन को इस तरह से डिजाइन करेंगे जैसे अल्बर्ट स्पीयर ने अपने फ्यूहरर के नेतृत्व का अनुसरण किया, लेकिन, निश्चित रूप से, पटेल के पास स्पीयर की प्रतिभा का एक भी हिस्सा नहीं है। 

यह वैचारिक रूप से प्रेरित, नफरत से भरा विनाश 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस और पूरे भारत में इस्लामी और मुगल स्मारकों की बर्बरता का अनुसरण करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मोदी भारत के सभी इस्लामी स्मारकों को मिटाने और 200 मिलियन भारतीय मुसलमानों को हटाने से कम कुछ नहीं चाहते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने पहले ही लाखों भारतीय मुसलमानों से भारतीय नागरिकता जबरन छीन ली है और उन्हें राज्यविहीन कर दिया है - एक ऐसा अपराध जिसके लिए उन्हें दंडित नहीं किया गया है, भले ही भारत संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकारों की घोषणा का एक हस्ताक्षरकर्ता है। जिनमें से नागरिकता एक केंद्रीय सिद्धांत है। 

संसद के लिए जगह की कमी के कारण इस भव्य दृश्य के विनाश को उचित ठहराने का ढोंग कमजोर है। भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय, जिसे ध्वस्त होने वाली इमारतों में से एक में रखा गया है, को कला के कई अमूल्य और नाजुक कार्यों को खतरे में डालते हुए, अपने अद्भुत संग्रह के लिए अपर्याप्त स्थान पर ले जाया जाना है। मोदी के कार्यकाल की समाप्ति से पहले काम खत्म करने के लिए यह सब ख़तरनाक गति से किया जाएगा। भारतीय अदालतों पर इस मूर्खतापूर्ण योजना को मानने के लिए दबाव डाला गया और पत्रकारों और अन्य टिप्पणीकारों को धमकाया गया। 

दुख की बात है कि कोविड -19 ने देश को तबाह कर दिया है, लेकिन बेपरवाह तानाशाह विचारधारा यह सुनिश्चित करती है कि केंद्रीय विस्टा परियोजना का खर्च  $ 2 बिलियन है, जबकि भारत के करोड़ों गरीब और निराश्रितों को अपने लिए खर्च करना पड़ता है। वे सैकड़ों हजारों की संख्या में मर रहे हैं। अदृश्य और अनाम नागरिकों की लाशों पर मोदी अपने लिए एक अश्लील स्मारक बना रहे हैं। 

मैं यहां मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब से तुलना करता हूँ, जिसने १७वीं शताब्दी में पूरे भारत में धार्मिक घृणा के कारण हिंदू स्मारकों और मंदिरों को नष्ट कर दिया था। मोदी हमारे समय के लिए औरंगजेब हैं। उनके शासन की तुलना अफगानिस्तान में तालिबान से की जाती है, जो वैचारिक उत्साह के साथ शासन करने का भी प्रयास करते हैं। 

सांस्कृतिक स्वीकृति और वर्चस्व स्थापित करने के लिए मोदी के हिंदू तालिबान को स्मारकों की जरूरत है। सभी फासीवादी-झुकाव वाले राजनेताओं की तरह, मोदी को उम्मीद है कि राष्ट्र के दिल में छवियों को नियंत्रित करके, वह अपने भारत की एक नई दृष्टि तैयार करेंगे, जो उन्हें महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल के साथ केंद्र में रखता है। 

इसमें प्रदर्शित अहंकार और उनकी अन्य व्यर्थ परियोजनाओं ने भारतीय लोकतंत्र को भारी जोखिम में डाल दिया है। मोदी ने हाल ही में उत्तर कोरिया में किम जोंग-उन की हंसी-मजाक वाली मिमिक्री में खुद के नाम पर एक क्रिकेट स्टेडियम खोला। उन्होंने हिंदू-गुजराती स्वतंत्रता सेनानी वल्लभभाई पटेल की एक स्मारकीय प्रतिमा बनवायी। यह स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से चार गुना बड़ा है, अकल्पनीय रूप से अश्लील है और इसकी कीमत $400m से अधिक है। ये अति-राष्ट्रवादी मोदी तालिबानियों के लिए रैली करने के लिए इमारतें हैं। 

ब्रिटिश सिविल सेवक जॉन स्ट्रैची ने 1884 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दिए गए एक व्याख्यान में घोषणा की कि "भारत जैसा कोई देश नहीं है और यह भारत के बारे में पहला और सबसे आवश्यक तथ्य है जिसे सीखा जा सकता है"। भारत में एकीकृत धर्म, संस्कृति और परंपरा की तलाश में, वह उन्हें नहीं मिला। वे जो देखने में असफल रहे, वह है विविधता के लिए भारत की क्षमता, भारत की अपरिहार्य बहुस्तरीय जटिलता, भारत का विलक्षणता से इंकार। वह भारत को एक साझा भाषा या परंपरा के बिना एक समग्र बनाने के रूप में नहीं देख सकता था। उनकी राष्ट्र-राज्य मानसिकता एकता और विविधता को साथ-साथ रहते हुए नहीं देख सकती थी। 

भारतीयों को एक प्रणाली में मजबूर करने के ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रयासों ने अकाल और दासता को जन्म दिया। इसने भारतीयों को सांस्कृतिक हीनता के लिए मजबूर कर दिया ताकि ईसाई नैतिकता हावी हो सके और ब्रिटिश व्यापारिक हित फल-फूल सकें। मेरा मानना ​​है कि आज भारत में फासीवादी सरकार वही कर रही है जो अंग्रेज नहीं कर सकते थे। मोदी और उनके नव-औपनिवेशिक गुर्गे देश पर हिंदू विलक्षणता थोप रहे हैं। 

संसद भवनों का विनाश एक फासीवादी शासन द्वारा भारतीय मानस पर अधिकार करने का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी अति-राष्ट्रवादी दृष्टि किसी भी कीमत पर सभी भारतीयों पर हिंदू प्रभुत्व की है, और मोदी इसके वास्तुकार के रूप में भारत पर शासन करेंगे, अपने दाहिने हाथ को सलामी, हथेली खोलकर, हिंदू भगवान विष्णु की नकल करते हुए। " उद्धरण समाप्त

ये एक लेख के कुछ अंश हैं दूसरे लेख और भी ज्यादा खरतनाक भाषा में हैं और जब ऐसे लेख विदेशों के बड़े बड़े मीडिया में हों तो इसका मतलब आसानी से समझा जा सकता है .

ऐसे लेख सामान्यतय: प्रायोजित होते है और ऐसे अनेक लेख विदेशी मीडिया में हैं. भारत से सम्बंधित नकारात्मक फोटो और सामिग्री ऊंचे दामों में बिक रही है. सूचना हैं कि बरखा दत्त और राणा अयूब के शमशान में जलते शव और गंगा में बहती लाशों से सम्बंधित फोटो और सामिग्री अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में लाखों डालर में बेंचे जा रहें हैं . ये सब क्या हो रहा है ? कितने लोग भारत में इसके बारें में जानते हैं और समझते हैं और सोचते हैं ?

पूरे भारत में पक्ष और विपक्ष में लोग खड़े हैं, कम से कम सोशल मीडिया से तो यही लगता है. देश में बिलकुल वैसे ही हालात हैं जैसे विदेशी आक्रान्ताओं के भारत पर आक्रमण के समय थे. ऐसे हालातों के कारण ही भारत एक हजार वर्ष तक गुलाम रहा और सनातन संस्कृति को इतनी क्षति हुई, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो पायेगी . अब स्थितियां ज्यादा ख़राब है और अगर ऐसा ही चलता रहा तो अगले २० -३० वर्षों में भारत की तश्वीर एकदम से बदल जायेगी. उस समय आप सब का क्या होगा ? जरा कल्पना कीजिये.

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- शिव मिश्र


मंगलवार, 8 जून 2021

क्या उत्तर प्रदेश में भाजपा नेतृत्व परिवर्तन करने वाली है?

 



 योगी की योग्यता परखना भाजपा के  लिए आत्मघाती होगा

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कुछ दिनों से  सोशल मीडिया में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी को बदलने की अफवाह  जोरों पर है. अफवाहों में सभी ने अपने अपने तर्क दिए हैं, कुछ ने कहा है कि योगी और मोदी के बीच में   मतभेद  गहराते  जा रहे हैं तो कुछ ने  कहा कि  योगी  किसी  मंत्री या कार्यकर्ता की  नहीं सुनते और उनकी कार्यशैली बिल्कुल तानाशाह जैसी हो गई है.   विपक्ष और मीडिया ने कोरोना की दूसरी लहर में   पूरे प्रदेश में  हुई  अत्यधिक मौतों को इसका कारण बताया है  जिस के समर्थन में उन्होंने गंगा में बहते हुए शवों  और   श्मशान घाटों में में लंबी-लंबी कतारों  का लगना बताया है, यह भी दावा किया गया है  कि यह सब तब है जबकि  उत्तर प्रदेश सरकार ने  मौत के  आंकड़े छुपाए हैं. कुछ स्वयंभू और गिद्ध पत्रकारों ने भी  इन अफवाहों को  ऑक्सीजन  देने का  काम किया है,  जो कुछ दिन पहले तक श्मशान घाट से सजीव प्रसारण कर रहे थे और गंगा में बहती लाशों  का विश्लेषण कर रहे थे.  


विपक्ष ने भी  इन अफवाहों को इसे हाथों-हाथ लपक लिया और उनके कार्यकर्ताओं ने भी सोशल मीडिया में हो रही इस अफवाह बाजी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया.  आजकल सोशल मीडिया में  झूठ को भी तेजी से  फैलाने  के लिए  कई  प्रोफेशनल एजेंसियां उपलब्ध हैं जो पैसे लेकर इस तरह  के काम  करती  हैं, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक  यह  है कि किसी राज्य से जुड़े मामले में विदेशी मीडिया भी बहुत सक्रिय  है.  यह भी  कम आश्चर्यजनक बात  नहीं है कि  भाजपा का आईटी सेल जिसे   भारत के सभी राजनीतिक दलों में सबसे मजबूत और  हमलावर  माना जाता है,  इन  दुर्भाग्यपूर्ण अफवाहों को रोकने  और समुचित  जवाब देने में सफल नहीं  हो सका.


योगी के विरुद्ध इस तरह के  दुष्प्रचार नये   नहीं है उनके पूरे कार्यकाल में  देश विरोधी और समाज विरोधी ताकते  इस तरह के कारनामे करती रही हैं, जो स्वयं में  स्पष्ट करता है  कि  उन्होंने  योगी की शक्ति का सही मूल्यांकन  भाजपा से कहीं ज्यादा  अच्छे ढंग से किया है.   प्रदेश में  सांप्रदायिक दंगे न होने देने,  संशोधित नागरिकता विरोधी  आंदोलन  से सख्ती से निपटने,  सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली करने, वांछित अपराधियों की फोटो चौराहों पर लटकाने,  गुंडे और माफियाओं को उनकी औकात दिखाने और प्रदेश की  कानून व्यवस्था को उस मुकाम पर पहुंचाने सहित  योगी ने कई ऐसे काम किए हैं, जिसके लिए प्रदेश कई दशकों से तरस रहा था.  


बहुत कम लोगों को यह बात मालूम होगी कि प्रदेश में जातीय विद्वेष फैलाने, सांप्रदायिक दंगे भड़काने,  कानून व्यवस्था खराब करने और महिलाओं पर अत्याचार के नाम पर योगी की छवि को आघात पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर साजिशें होती  रही हैं. हाथरस में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना  के परिपेक्ष में  पीएफआई सहित कई ऐसे संगठनों ने  भी एक बड़ी साजिश रची थी  जिसके लिए बड़ी मात्रा में  धन इकट्ठा किया  दया था  ताकि पूरे प्रदेश को जातीय  और सांप्रदायिक हिंसा में लपेटा जा सके.  उनके इस मिशन में कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने भी जमकर राजनीतिक  रोटियां सेंकने  और स्थिति खराब करने की कोशिश की.  नफरत भरे पोस्टर बनाए गए,  सोशल मीडिया पर  फर्जी अकाउंट के माध्यम से झूठी खबरों की बमबारी की गई, लेकिन उनके प्रयास सफल नहीं हो पाए. 


योगी को बदनाम करने के लिए अभी हाल में एक फर्जी ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया में वायरल की गई जिसमें  यह बताया जाता है कि  योगी के पक्ष में ट्वीट करने पर प्रति  ट्वीट  ₹2 दिए जाएंगे.  इस फर्जी ऑडियो क्लिप को एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी  द्वारा भी  ट्वीट कर  योगी टूल किट के नाम से चलाया गया.  इनके ट्वीट  यह माध्यम से  द वायर की पत्रकार रोहनी सिंह ने भी  योगी के विरुद्ध जमकर दुष्प्रचार  किया.  यद्यपि उत्तर प्रदेश की साइबर पुलिस ने इस फर्जीवाड़े का  शीघ्र भंडाफोड़ कर दिया  और अभियुक्तों को गिरफ्तार भी कर लिया,लेकिन दुष्प्रचार तो हो चुका था .  


 उत्तर प्रदेश में गुंडों और माफियाओं के विरुद्ध योगी ने सघन अभियान चलाया जिसके कारण  कुख्यात माफिया   या तो सलाखों के पीछे हैं या  दूसरे राज्यों में छिपे हुए हैं और कुछ को एनकाउंटर में  पुलिस ने मार गिराया गया है.  इन माफियाओं द्वारा  सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों पर  बनाई गई  इमारतों को ध्वस्त किया गया  और हजारों करोड़  रुपए मूल्य की   सरकारी जमीन  को खाली कराया गया.  हाल ही में मुख्तार अंसारी  की  पंजाब  से  उत्तर प्रदेश वापसी की कहानी पूरे   देश ने देखी और सुनी, जिसे पंजाब सरकार  निहित स्वार्थ बस जानबूझकर उत्तर प्रदेश  नहीं भेज रही थी और इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा  खटखटाना  पड़ा लेकिन  योगी सरकार ने इस कुख्यात माफिया को उत्तर प्रदेश की जेल में डाल कर ही दम लिया.   उत्तर प्रदेश  सरकार के  ऐसे कार्यो ने  जनता को  सबसे अधिक  प्रभावित किया है.


कानपुर के विकरू  कांड जिसमें एक उपाधीक्षक सहित आठ पुलिस  वालों की हत्या कर दी गई थी,   के  कुख्यात अपराधी  विकास दुबे को जब एक एनकाउंटर में पुलिस ने मार गिराया  तो अफवाह गैंग तुरंत सक्रिय हो गया और पुनः जातीय विद्वेष फैलाने की कोशिश की  जाने लगी.  सोशल मीडिया  और  दूसरे माध्यमों से  यह अफवाह फैलाई गई कि योगी  ठाकुर हैं और घोर  ब्राह्मण विरोधी है इसलिए  ब्राह्मणों की हत्या  की जा रही है. एक सन्यासी  सामाजिक जातिगत वर्गीकरण  और सांसारिकताओं से ऊपर होता है और मैं योगी आदित्यनाथ को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं  कि वह  सनातन हिंदूवादी तो है, जो उन्हें होना भी चाहिए, लेकिन किसी जाति  या धर्म विशेष के लिए उनके मन में कोई विद्वेष की भावना नहीं  है. एक ऐसा सन्यासी जो  कोरोना महामारी   की प्रचंडता  के बीच  प्रदेश की जनता के  प्रति  अपने दायित्व  निर्वहन के  राजधर्म के कारण अपने पिता के अंतिम दर्शन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली नहीं गया हो और उनकी मृत्यु के पश्चात उनके अंतिम संस्कार में भी सम्मिलित नहीं हुआ हो,   उसके ऊपर इस तरह के निम्न स्तरीय  आक्षेप लगाना  प्रदेश की जनता को बहुत नागवार गुजरा है . 


 जहां तक कोरोना महामारी  का प्रश्न है,   योगी ने पूरे देश में कुशल मुख्यमंत्री होने का एक उदाहरण स्थापित किया है. जब ज्यादातर प्रदेशों के मुख्यमंत्री सोशल मीडिया और टीवी  वार्ताओं तक ही सीमित थे,   उन्होंने प्रदेश के हर जिले का सघन दौरा किया,  अस्पतालों में गए,  और स्थिति का जायजा  लेकर प्रभाव कारी कदम उठाए.   जब  दिल्ली सरकार द्वारा  उत्तर प्रदेश और बिहार के  प्रवासी मजदूरों  को  डीटीसी की बसों में भरकर  उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर छोड़  दिया गया था  ,  तो योगी ने इन हजारों प्रवासी  श्रमिकों के रहने खाने-पीने की समुचित व्यवस्था की  और  उनके गंतव्य तक पहुंचने का भी पूरा इंतजाम किया.  इसमें बड़ी संख्या में बिहार के प्रवासी श्रमिक भी थे. यही नहीं योगी ने  कांग्रेस के बस घोटाले का भी मुंह तोड़ जवाब दिया और जनता के सामने कांग्रेस का झूठ उजागर कर दिया.   बहुत  बड़ी संख्या में दिल्ली, मुंबई और अन्य जगहों से  लौटे  प्रवासी मजदूरों  की व्यवस्था करना किसी भी सरकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था, जिसे योगी सरकार ने बहुत कुशलता से  संभाला. कोरोना की पहली और दूसरी लहर में  योगी सरकार के प्रबंधन की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी जमकर तारीफ की है और  प्रधानमंत्री मोदी   तो  समय-समय पर  योगी के कोरोना प्रबंधन  पर उनकी पीठ थपथपाते रहे हैं. 


 लगभग 25 करोड़ की  जनसंख्या वाला उत्तर प्रदेश विश्व में 4 देशों को छोड़कर सभी देशों से बड़ा है  और  स्वास्थ्य  की सीमित मूलभूत सुविधाओं के बावजूद  प्रदेश में  संक्रमितों  की संख्या और मृत्यु दर  ज्यादातर प्रदेशों और विश्व के ज्यादातर देशों  की तुलना में बहुत अच्छी रही है.   यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि योगी के 4 साल के अब तक के कार्यकाल का  डेढ़ साल सिर्फ कोरोना  महामारी    के आकस्मिक  प्रबंधन करते हुए  बीता. इस सब के बाद भी  उत्तर प्रदेश आर्थिक विकास के पथ पर तेजी से कार्य किया और नए एयरपोर्ट के साथ देश में सबसे अधिक साथ एयरपोर्ट वाला राज्य बन गया. प्रदेश में  सड़कों में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं  इनमें कुछ पूरी हो चुकी हैं और कुछ तेजी से पूरी  होने की ओर अग्रसर है.   इनमें पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, गंगा एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे,  गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे,  बलिया लिंक एक्सप्रेस वे सहित अन्य राष्ट्रीय  राजमार्ग शामिल है. प्रदेश की कई महत्वाकांक्षी परियोजनायें   अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा और काशी में चल रही हैं,  जिनसे सनातन संस्कृति के प्रसार के साथ-साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक गतिविधियां बढ़ेगी. नोएडा में फिल्म सिटी का कार्य भी काफी प्रगति पर है .  ऐसी अनेकों औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश एक बीमारू राज्य की  स्थिति से उबर चुका है और  2020-21 में वह पूरे देश में महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद तीसरे नंबर की सबसे  बड़ी  नॉमिनल जीडीपी (  17  लाख करोड़  से अधिक  ) वाला प्रदेश  बन चुका  है. 


उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठन और सरकार में बदलाव की अफवाहों को तब और बल मिला जब दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय महासचिवों और प्रभारियों की बैठक के बाद उत्तर प्रदेश  के भाजपा  प्रभारी राधा मोहन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव संगठन  बीएल संतोष ने  लखनऊ का दौरा किया .  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के लखनऊ दौरे को भी उन्हीं अटकलों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है. राधा मोहन सिंह ने तो  राज्यपाल आनंदीबेन  और विधानसभा अध्यक्ष श्री  हृदय नारायण दीक्षित से भी मुलाकात की जिससे अटकलों का बाजार और गर्म हो गया.  यद्यपि राधा मोहन सिंह ने  इन मुलाकातों को शिष्टाचार मुलाकात बताया और  अपने दौरे का उद्देश्य 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से संबंधित बताया किंतु एक सामान्य राजनीतिक   समझ    वाला व्यक्ति भी  यह अनुमान जरुर लगाएगा कि कुछ न कुछ तो चल रहा है अन्यथा राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष से मिलने की क्या  जरूरत  थी ?    इन मुलाकातों  का 2022 के विधानसभा चुनाव से क्या संबंध हो सकता है यह अभी भी एक अबूझ पहेली है .   


इन नेताओं द्वारा दे गए स्पष्टीकरण के बाद   जनता को  आश्वस्त होना चाहिए कि  उत्तर प्रदेश में भाजपा मुख्यमंत्री बदलने नहीं जा रही है  और  मंत्री स्तर के बदलाव से जनता पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता.   


जो भी हो भाजपा कैडर आधारित विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है  और उसे यह  अवश्य मालूम  होगा कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80  सीटें हैं और केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर ही जाता है लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यह  जरूर  समझ लेना चाहिए कि पंचायत चुनाव में प्रदर्शन किसी भी राजनीतिक  दल के लिए विधानसभा और लोकसभा  चुनावों के लिए कोई बहुत  महत्वपूर्ण संकेत नहीं होता, अगर यह  इतना ही महत्वपूर्ण होता तो 2017 में भाजपा को इतनी सफलता कैसे मिली ?  अभी कुछ माह पहले इंडिया टुडे द्वारा कराए गए  एक जनमत सर्वेक्षण में   यह बात सामने आई थी कि उत्तर प्रदेश में   योगी की लोकप्रियता के आगे  भाजपा या विपक्ष का कोई नेता कहीं दूर दूर तक नहीं ठहरता.   इसलिए  भाजपा को यह भी अवश्य ध्यान रखना चाहिए  कि उत्तर प्रदेश में की गई एक छोटी सी भूल भी पार्टी के लिए  बहुत  विनाशकारी साबित हो सकती है. 

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  • शिव मिश्रा

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मंगलवार, 1 जून 2021

मोदी सरकार के 7 वर्ष के कार्य काल की बैलेंस शीट और विश्लेषण

 


( यह लेख परिवर्धित रूप में हिन्दी साप्ताहिक माधव भूमि के ५ जून के अंक में प्रकाशित हुआ है )

मोदी सरकार के 7 वर्ष पूरे होने पर जहां सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई, वही कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया और यह बहुत स्वाभाविक भी है. किन्तु दलगत राजनीति से अलग सरकार के इन 7 वर्षों के कार्यकाल को देशहित और जनहित के दृष्टिकोण से देखने और सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं का सम्यक विश्लेषण करना नितांत आवश्यक है ताकि है पता चल सके कि-

  • देश ने इस अवधि में क्या खोया और क्या पाया ?

  • देशवासियों की कौन सी आकांक्षाएं पूरी हुई और कौन सी अभी भी प्रतीक्षित है ?

  • इस कारण जनता में सरकार के प्रति क्या धारणा बन रही है ?

उपलब्धियां :

  • अगर हम सरकार की उपलब्धियों की चर्चा करें तो मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि जनता के बीच आज भी धारा 370 का हटना ही है, और उसी से जुड़ी उपलब्धि है जम्मू कश्मीर का विभाजन करके 2 केंद्र शासित प्रदेश बनाना और धारा 35 A हटाना. इससे मोदी मोदी की छवि में तो इजाफा हुआ ही देश ने अमित शाह को भी सरदार पटेल की तरह सिर माथे उठा लिया. जो पिछले 70 साल में नहीं हो सका वह मोदी के कार्यकाल में हो गया. राम मंदिर का निर्माण मोदी के कार्यकाल की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जिसने सरकार की छवि को गांव और गली तक बहुत मजबूत कर दिया, यद्यपि यह सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय था और इसमें मोदी सरकार की भूमिका बहुत सीमित थी, फिर भी जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमाम विरोधी स्वरों के बाद भी अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास किया और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के प्रति श्रद्धा प्रकट की, जिसने पूरे हिंदू जनमानस में मोदी की हिंदूवादी छवि को और अधिक मजबूत किया. स्वाभाविक था कि लोगों की उनसे अपेक्षाएं और भी बढ़ गई. अब लोगों के मन में काशी और मथुरा की आकांक्षा कुलांचे भर रही है.


  • पाकिस्तान के अंदर घुस कर की गई बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक ने भारतीय जनमानस में मोदी के अदम्य साहस को बहुत गहराई में अंकित कर दिया. विपक्षी दलों द्वारा इस पर सवाल उठाए जाने से लोगों में न केवल नाराजगी हुई बल्कि वह बहुत मजबूती से मोदी के साथ खड़े हो गए. गलवान घाटी में चीनी सेना के समक्ष भारत के पराक्रम में लोगों ने मोदी की इसी मजबूत इरादों वाली छवि के ही दर्शन किए . कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा फैलाई गई अफवाहों ने भी आश्चर्यजनक रूप से मोदी को ही मजबूत किया.


  • मुसलमानों की तीन तलाक प्रथा को भी खत्म करने के लिए मोदी के साहसिक कदम की सर्वत्र सराहना हुई जिससे लोगों को शाहबानो मामले में कांग्रेस का आत्मसमर्पण बरबस याद आ गया और बिना कुछ किए ही कांग्रेस को लाचार और बेबस बना दिया वहीं मोदी और मजबूत होकर उभरे .


  • वैसे तो मोदी सरकार ने अनेक कल्याणकारी योजनाएं चलाई लेकिन जिसने सबसे अधिक महिलाओं विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों की, को प्रभावित किया, वह है उज्जवला योजना और जिसने सबसे अधिक किसानों को प्रभावित किया वह है किसान सम्मान योजना . देश हित में अगर देखा जाए तो आयुष्मान योजना संभवत: विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है जिससे भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या को लाभ होगा यद्यपि इस योजना का अधिकतम लाभ मिलना बाकी है जिसके लिए केंद्र सरकार को और अधिक प्रयास करना होगा.


  • वित्तीय क्षेत्र में भी सरकार ने बहुत मजबूती से कई कदम उठाए जो भविष्य में देश के आर्थिक विकास में अत्यधिक सहायता पहुंचाएंगे. इनमें सबसे बड़ा कार्य है एक देश एक कर प्रणाली जिसे जीएसटी के नाम से जानते हैं. इतने बड़े देश में इस तरह की परियोजना की शुरुआत करना हमेशा मुश्किल होता है इसलिए शुरुआती दौर में इससे बहुत समस्याएं आई और उत्पादों पर करो की ऊंची दरों ने, इस प्रणाली को बदनाम करने के लिए कांग्रेस और विपक्षी दलों का ही सहायता की और राहुल गांधी ने तो इसे गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा दी थी. यह प्रणाली अब व्यवस्थित हो चुकी है और इसके वांछित परिणाम आने शुरू हो गए हैं आने वाले कुछ वर्षों में इससे देश में आर्थिक विकास की वृद्धि में अत्यधिक सहायता मिलेगी. जहां दुनिया के बहुत से देश अभी भी इस तरह की कर प्रणाली लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, स्व. अरुण जेटली प्रयासों और नरेंद्र मोदी के परियोजना क्रियान्वयन क्षमता ने भारत जैसे विशाल देश में इसे काफी कम समय में लागू कर दिखाया .


  • जनधन खातों ने आजादी के बाद पहली बार कमजोर वर्ग को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का काम किया और इस कारण ही उनके खातों में सीधे सहायता राशि भेजने का काम संभव हो सका और इस व्यवस्था ने काफी हद तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और सरकारी संसाधनों की बचत भी की. वित्तीय क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक कानून दिवाला एवं शोधन कानून 2016 ( इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) बनने से बैंकों में फंसे हुए बड़े कर्ज़ों की वसूली में अत्यधिक सहायता मिलेगी, और भविष्य में होने वाले एनपीए में कमी भी आएगी.


  • मोदी सरकार के कार्यकाल में एक बहुप्रतीक्षित कानून बना जिसके विरुद्ध कोई हो हल्ला भी नहीं हुआ और वह हैं श्रम कानून जो बहुत शांति पूर्वक लागू भी हो गया. इसके विपरीत नए कृषि कानून जिनका पुरजोर विरोध किया जा रहा है. अगर यह कृषि कानूनों लागू हो पाए तो देश के अधिकतर किसानों का बहुत फायदा होगा और अगले 5 वर्षों में में उनकी आर्थिक स्थिति में अत्यधिक सुधार देखने को मिलेंगे. दुर्भाग्य से इन कानूनों का आढ़तियों और बिचौलियों द्वारा विरोध किया जा रहा है जिसे राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त है इसके साथ ही इस पूरे आंदोलन को कुछ विकसित देशों द्वारा भी धार दी जा रही है क्योंकि उन्हें डर है कि इन कृषि कानूनों के कारण भविष्य में भारत खाद्यान्न का बहुत बड़ा निर्यातक बन सकता है जिससे उनके हित प्रभावित होंगे.


  • एक अन्य परियोजना है जिसका पूरी सरकार की उपलब्धियों में बहुत कम उल्लेख होता है वह है ग्रामीण विद्युतीकरण जिसके द्वारा भारत के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच चुकी है. 70 वर्ष बाद ही सही लेकिन यह भारत जैसे विशाल देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है. राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में भी मोदी सरकार ने अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है और निर्माण की गति आजादी के बाद अब तक की सर्वश्रेष्ठ गति है जिसके लिए नितिन गडकरी को श्रेय दिया जाना आवश्यक है.

  • एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु बहु प्रतीक्षित मुद्दा “वन रैंक वन पेंशन” जो देश के सीमा प्रहरियों से सीधे जुड़ा था, शांति पूर्वक सुलझा लिया गया. सरकार की एक अन्य अब तक की उपलब्धि है भ्रष्टाचार रहित सरकार, जो पिछले 10 वर्षों की सरकार के बिलकुल उलट है जब हर दिन कोई न कोई घोटाला सामने आया था और अखबारों की सुर्खियां बना था.

विफलताएं :

अब बात करते हैं उन क्षेत्रों की जहां या तो सरकार को वांछित सफलता नहीं मिली या सरकार कुछ भी करने में विफल रही.

  • इसमें सर्वाधिक चर्चा कोरोना की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की कोरोना प्रबंधन को लेकर है. इसमें कुछ तो सच्चाई भी है लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारों की विफलता का बोझ भी मोदी सरकार के कंधे पर आ गया है जिसे टूल किट की नई संस्कृति ने मोदी की छवि खराब करने के साथ साथ देश की छवि भी खराब करने में भी कोई संकोच नहीं किया. सोशल मीडिया के निरंकुश प्लेटफार्म, विदेशी मीडिया और इंटरनेट मीडिया के अन्य साधनों ने जो कई देशों की राजनीति में भी सीधा दखल देते हैं, ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया .


  • यह जानते हुए भी कि यह जो कुछ भी प्रचारित किया जा रहा है, सही नहीं है, इसका दोष निश्चित रूप से मोदी सरकार को ही देना उचित होगा क्योंकि मोदी के इस कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के निष्पादन बेहद निराशाजनक हैं. आए दिन कभी फिल्मों में, कभी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर, कभी सोशल मीडिया पर तो कभी सार्वजनिक मंच पर, देश और हिंदुओं के विरुद्ध विष वामन होता रहता है लेकिन यह दोनों ही मंत्रालय इस दिशा में कुछ भी नहीं कर सके और यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता भी है.


  • अगर इन दोनों मंत्रालयों के कार्य में तुरंत सुधार नहीं हुआ या इन मंत्रियों को नहीं बदला गया तो 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. 2004 के आम चुनाव के पहले बाजपेयी सरकार के एक मंत्री के सहारे कांग्रेस के राजीव शुक्ला ने दूरदर्शन पर सोनिया गांधी का बहुत मार्मिक साक्षात्कार प्रस्तुत किया था और इसके बाद अटल बिहारी वाजपेई की शाइनिंग इंडिया ध्वस्त हो गई थी. कुछ प्रतिशत मतों ने कई लोकसभा की अनेक सीटों को प्रभावित किया था, जिसे करण कांग्रेस बहुमत न पाते हुए भी सत्ता की दहलीज के पास पहुंच गई और भाजपा सत्ता से बहुत दूर हो गई. कुछ भाजपाइयों में कांग्रेस से तार जोड़े रखने की यह संस्कृति आज भी देखने को मिल रही है.


  • मोदी सरकार ने नक्सल और माओवादियों के विरुद्ध कोई मजबूत अभियान नहीं चलाया और आज भी इसके कारण बड़ी संख्या में जवान मौत के घाट उतारे जा रहे हैं.


  • पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र सरकार को बार-बार ललकारती रही हैं, और कई बार तो स्थिति यह हो गई है जिससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को भी आंच आई लेकिन सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार के विरुद्ध कोई भी सख्त कार्यवाही नहीं की यहां तक कि चुनाव के पहले भी राष्ट्रपति शासन लगाना जरूरी नहीं समझा. चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री सहित भाजपा के स्टार प्रचारकों ने जनता का बहुत उत्साहवर्धन किया था और जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों द्वारा पोलिंग बूथों की सुरक्षा तो की लेकिन जनता को घर से निकलने के लिए न तो सुरक्षा मिली और न ही भय रहित वातावरण और इस कारण भाजपा जीती हुई बाजी हार गई और इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि जिन लोगों ने भाजपा का साथ दिया भाजपा उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में भी नाकाम रही . अपने ही देश में पश्चिम बंगाल के लोग शरणार्थी बनकर असम में रह रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हिंसा, जघन्य हत्या, बलात्कार, आगजनी और लूटपाट ने देश के बंटवारे की याद ताजा कर दी. अनेक लोग भाजपा का साथ देकर पछता रहे हैं, जिसके कारण भाजपा “पुनः मूषक: भव” की इस स्थिति में आ गई है . अगर दोबारा चुनाव हो जाए तो भाजपा को विधानसभा की अपनी पुरानी 3 सीटें भी जीतना मुश्किल हो सकता है.

  • जनता का एक बेहद कौतूहल वाला प्रश्न है कि क्या कारण है कि शाहीन बाग और किसान आंदोलन के साथ इतनी नरमी बरती गई ? अब तो पानी सिर के ऊपर से गुजर गया है. 26 जनवरी के दिन लाल किले पर तिरंगे का अपमान किया गया, जो गणतंत्र दिवस पर पूरे गणतंत्र और लोकतंत्र का अपमान है. सरकार की क्या मजबूरी है, जनता नहीं समझ पा रही? आज भारत में बच्चा-बच्चा जानता है कि देश का इतिहास झूठ का पुलिंदा है, इसमें सनातन संस्कृति और राष्ट्र को नीचा दिखाने की कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी गई है लेकिन इतिहास सही करने की दिशा में सरकार एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी. हिंदूवादी नेताओं से सामान्य हिंदू जनमानस यह अपेक्षा रखता है कि सत्ता में आने मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त किया जाएगा लेकिन सरकार ने यहां भी अब तक तो बहुत निराश किया है.

मोदी ने अपने पहले उद्घोष वाक्य “सबका साथ, सबका विकास” में अब “सबका विश्वास” भी जोड़ दिया है. सबके विश्वास के चक्कर में मोदी को जिनका विश्वास मिल रहा था कहीं उनका भी विश्वास न खो दें?

अगर ऐसा हुआ तो यह केवल भाजपा का नहीं राष्ट्र के रूप में भारत का भी बहुत बड़ा नुकसान होगा. हम सभी ने देखा कि 2004 में वाजपेयी सरकार की पराजय के बाद 10 वर्षों का समय केवल भाजपा के लिए ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र के लिए एक संकट का समय रहा. परत दर परत भ्रष्टाचार होता रहा, राष्ट्र की अस्मिता और अखंडता के साथ खिलवाड़ होता रहा, भगवा आतंकवाद गढ़ा जाता रहा, बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किया जाता रहा और देश के संसाधनों पर उनका प्रथम अधिकार सिद्ध किया जाता रहा.

सरकार को इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है, अन्यथा बहुत देर हो जाएगी

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- शिव मिश्रा

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