शनिवार, 5 फ़रवरी 2022

भारत का बजट २०२२ : एक द्रष्टिकोण

 विकासोन्मुख बजट में आत्मविश्वास की झलक



मेरी याद में यह पहला बजट है जो राजनीतिक रूप से तटस्थ (पॉलिटिकली न्यूट्रल) है, अन्यथा  आम तौर से यह धारणा बन गई है कि केंद्रीय  बजट रेवड़ियां  बांटने का त्यौहार होता है. इसलिए उद्योगपति, व्यापारीमिडिल क्लास विशेषतय:  नौकरी पेशा वर्ग हर व्यक्ति, बजट की तरफ आशा भरी निगाहों से देखता है और कुछ न कुछ पाने के लिए अपेक्षा करता है. बजट पर शेयर मार्केट की प्रतिक्रिया भी  तुरंत देखने को मिलती है. अतीत में कई  बार बजट के कारण सेंसेक्स उछला  और कई बार भारी  गिरावट से बंद हुआ और कई बार तो ऐसा भी हुआ कि  बजट शुरू होते ही शेयर मार्केट चढ़ने लगा और बजट समाप्त होने तक धडाम  हो गया .

इस बार बजट के  राजनीतिक रूप से तटस्थ और लोकलुभावन न होने पर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि 5 राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं जिसमें उत्तर प्रदेश सबसे महत्वपूर्ण राज्य है क्योंकि दिल्ली के सिंहासन का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही निकलता है. इस बात के लिए मोदी सरकार की जितनी तारीफ की जाए, कम है. मोदी का यह  इस साहसिक बजट उनके इस आत्मविश्वास को  भी रेखांकित  करता है कि वह उत्तर प्रदेश में  पार्टी की विजय को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त हैं और अन्य राज्यों में भी चुनाव को लेकर चिंतित  नहीं हैं. 

अपने कार्यकाल में मोदी ने अपने  फैसलों  से कई बार  लोगों को चौंकाया है क्योंकि तुरंत लाभ पहुंचाने वाली  योजनाओं के बजाय  उन्होंने आम लोगों के जीवन की मूलभूत समस्याओं को छूआ है और उनके दर्द को सहलाया है. इसलिए जनता नें उन्हें  दूसरी बार भी  और ज्यादा बहुमत से सत्ता में पहुंचाया. मोदी का  जनता पर और जनता का मोदी  पर विश्वास कायम है.  इससे यह सन्देश भी  साफ़ है कि  लंबी अवधि की प्रभावी राजनीति तभी की जा सकती है जब करोड़ों गरीब देशवासियों के  जीवन में कुछ सुधार किया जाय.

बजट पेश किये  जाने से  पहले  कांग्रेस नें भविष्यवाणी की थी  कि यह चुनाव पूर्व बजट होगा यानी कांग्रेस को  आशा थी कि  इसमें घोषणाओं का अंबार होगारेवड़ियों  की भरमार होगी लेकिन बजट के बाद सपा नेता रामगोपाल यादव  ने कहा यह बजट  एकदम बेकार है, सोचा था उत्तर प्रदेश में चुनाव है तो कुछ तो देंगे, लेकिन कुछ नहीं दिया. इसका मतलब लोगों को समझ में नहीं आया कि बजट में क्या है क्या  नहीं. कांग्रेस के अर्थशास्त्री और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने प्रतिक्रिया दी कि यह बजट अब तक का सबसे  पूंजीवादी बजट  है क्योंकि इसमें गरीब शब्द केवल दो बार आया है. इसे कहते हैं कोरी राजनीति, जिसे लोग अब समझने लगे हैं.   

बजट के राजनीतिकरण से राजस्व का ज्यादातर भाग कर्मचारियों के वेतन-भत्ते, पेंशन तथा अनुदान में ही चला जाता है, और पूंजीगत निवेश के लिए बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं रह जाती. इस कारण मूलभूत संरचना सहित लंबी अवधि की परियोजनाओं पर ध्यान नहीं दिया जा पाता है. कई बार राजनैतिक अस्थिरता, गठबंधन की सरकार भी रेवड़ियां बाँटने का कारण होता है. सौभाग्य से अब यह नहीं है क्योंकि मोदी की पूर्ण बहुमत की सरकार है.  इसलिए सरकार साहसिक फैसले लेने में सक्षम है और सरकार ऐसा कर भी रही है. अबकी बार का बजट ऐसा है जिसमें  प्रत्यक्ष तौर पर किसी को कुछ  मिलता दिखाई नहीं  पड़ता है, यानी न तो लोलीपोप हैं और न आंकड़ो की बाजीगरी लेकिन है बहुत कुछ सबके लिए.  मेरा हमेशा से मानना  रहा है कि भारत में हमेशा से अर्थ व्यवस्था पर राजनीति हाबी  रही है और  देश के पिछड़ेपन  का कारण भी यही हैं. ज्यादातर सालों के  बजट में निरंतरता का आभाव होता आया है, जो अबकी बार दूर हो गया लगता है.

इस बजट में सरकार के  पूंजीगत खर्चों को बढ़ाकर ७.५ लाख कर दिया है, जो पिछले साल की तुलना में ३५.५% अधिक है.  इससे निजी निवेशको का भी भरोसा बढेगा और वे निवेश के लिए आगे आयेंगे. इससे रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे. राजकोषीय घाटा ६.९% लक्ष्य से मामूली अधिक है.  गति  शक्ति परियोजना  के अंतर्गत 25000 किलोमीटर रोड बनाने का प्रावधान किया गया है और इसके लिए ₹2 लाख करोड़  का आवंटन किया गया है. मोदी सरकार के कार्यकाल में राष्ट्रीय राजमार्गएक्सप्रेस वे आदि में उल्लेखनीय कार्य हुआ है, और इसका श्रेय नितिन गडकरी को भी जाता है, जिनके कारण भारत में इस समय  प्रतिदिन 40 किलोमीटर हाईवे बनाया जा रहा है, जो अगले वित्त वर्ष में बढ़ाकर 50 किलोमीटर प्रतिदिन कर दिया जाएगा.  

कांग्रेस को शायद आज याद नहीं है कि 1971 में इंदिरा जी ने गरीबी हटाओ के नारे से ही सत्ता प्राप्त की थी, और  मोदी तो सचमुच  गरीबों के दर्द को समझने और उसका उपचार करने का प्रयास कर रहे हैं. गरीब लोगों के लिए रोटी, कपड़ा और मकान आज भी  बुनियादी जरूरत है. मोदी ने गरीबों के लिए ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवास उपलब्ध कराए हैं,  मुफ्त  राशन दिया है, ग्रामीण अंचल में  महिलाओं को रसोई गैस उपलब्ध कराई है और  शौचालय उपलब्ध कराने काम किया है. हर गांव में बिजली उपलब्ध करा दी गई है. अब हर गांव में “हर घर में नल का जल” उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है. बजट में नल से  5.5 करोड़ घरों में पानी पहुंचाने का प्रावधान किया गया है. प्रधानमंत्री योजना के अंतर्गत 80 लाख नए मकान बनाने का प्रावधान भी किया गया है. नारी सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी गई है. बेहतर बुनियादी ढांचे और सुविधाओं वाली आंगनबाड़ियों को उच्चीकृत  करने का प्रावधान किया गया है. एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य है 2025 तक सभी गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर बिछाने का लक्ष्य जिससे ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल जाएगी. 5G स्पेक्ट्रम की शुरुआत की इसी वर्ष की जाएगी जो ग्रामीण क्षेत्रों में भी उपलब्ध होगी.

अटल सरकार के समय शुरू की गई नदी जोड़ो परियोजना कार्य को आगे बढ़ाया गया है और उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या के निराकरण के लिए केन बेतवा परियोजना को शुरू किया गया है. इससे बुंदेलखंड के लोगों की पानी की बहुत पुरानी समस्या का समाधान हो सकेगा.

खेती में महत्वपूर्ण बदलाव के लिए लाए गए तीनों कृषि कानून वापस होने के बाद ऐसा लगने लगा था कि शायद मोदी सरकार ने कृषि सुधारों की तरफ से कदम खींच लियें हैं लेकिन इस बजट के माध्यम से कृषि सुधारों को जारी रखने की सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय मिलता है.  खेती में  आधुनिक तकनीक से उत्पादन बढ़ाने और उससे किसानों की आय बढ़ाने पर जोर दिया गया है. स्टार्टप के माध्यम से निजी निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है.  गंगा के किनारे किनारे 5 किलोमीटर क्षेत्र में  केमिकल मुक्त खेती की शुरुआत होगी जिससे किसानों की आय के साथ साथ लोगो को केमिकल मुक्त कृषि  उपज  उपलब्ध हो सकेगी. बिचौलियों को दूर करने के उद्देश्य न्यूनतम समर्थन मूल्य की राशि सीधे किसानों के खाते में भेजी जाएगी. कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए ड्रोन के इस्तेमाल, ऑर्गेनिक खेती और तिलहन के उत्पादन पर जोर दिया जाएगा. इस सबसे खेती में सुधार  होगा और किसानो की आय बढ़ेगी .

बजट का सबसे प्रभावी और आकर्षक भाग है डिजिटलीकरण पर जोर देना, जो आत्मनिर्भर भारत की उमीदों के अनुरूप है. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा डिजिटल करेंसी की शुरुआत की जाएगी. करोना काल में शुरू हुई ऑनलाइन पढ़ाई को आगे बढ़ाने के लिए 200 नहीं टीवी चैनल शुरू करने की पहल की गई है. शिक्षकों को डिजिटल प्रणाली का प्रशिक्षण दिया जाएगा.  75 जिलों में डिजिटल बैंक की स्थापना की जाएगी. बजट में डिजिटल यूनिवर्सिटी बनाने का संकल्प लिया गया है. चिप युक्त  डिजिटल इ-पासपोर्ट जारी करने की घोषणा की गई है जो डिजिटल क्षेत्र में भारत  की मजबूत स्थित प्रदर्शित करता  है. प्रदूषण कम करने के लिए इलेक्ट्रिक व्हीकल  को बढ़ावा दिया जाएगा और नए चार्जिंग स्टेशन बनाए जाएंगे जहाँ  बैटरी स्वैप सिस्टम लागू किया जाएगा. 

बजट की सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें न तो  कोई  बड़ी राहत दी गई है और न ही कोई बोझ डाला गया है. क्रिप्टोकरंसी को यद्यपि कानूनी मान्यता नहीं दी गई है, लेकिन इसे कर के दायरे में लाया गया है और इसके लाभ पर 30% टैक्स लगाया गया है. डिजिटल एसेट्स  ट्रांसफर करने पर भी  टैक्स देना होगा. रिटर्न भरते समय कई छोटे-मोटे लाभ खासतौर से डिजिटल मोड़ से प्राप्त लाभ प्राय: छूट जाते हैं जिसे आयकर रिटर्न में परेशानी होती है. इसे देखते हुए बजट में आयकर रिटर्न में 2 वर्ष तक सुधार करने का मौका दिया गया है.

निश्चित रूप से बजट में किये गए ये उपाय भविष्योंमुखी  है और इनसे अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी लेकिन इन उपायों के साथ ही लालफीताशाही और इंस्पेक्टर राज को ख़त्म करने की दिशा में भी सक्रियता से काम करना होगा ताकि ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नस” में सुधार कर निवेशकों, निर्माता कंपनियों और पूरे विश्व को सन्देश दिया जा  सके  और  स्वतंत्रता के सौवे वर्ष २०४७ तक देश को   सशक्त – समर्थ भारत   बनाने का अपना सपना पूरा कर सके. 

-    शिव मिश्रा

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रविवार, 30 जनवरी 2022

क्या नेहरू एक अय्याश व्यक्ति थे?


यह एक खुला रहस्य है और इसमें जितना गहराई तक जायेंगे उतनी ही गंदगी दिखाई पड़ेगी. इसलिए मेरा मानना है कि इसमें बहुत अधिक पड़ने की आवश्यकता नहीं है लेकिन आज के युवा वर्ग को सच्चाई जानने की उत्सुकता रहती है, इसलिए इस तरह के प्रश्न बार बार आते रहेंगे. उनका जबाब दिया ही जाना चाहिए.

गांधी और नेहरू के बारे में भारतीय बच्चों को कम से कम 10+2 वही सब कुछ मालूम होता है जो पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया जाता है वही परीक्षा में पूछा जाता है और स्वाभाविक रूप से बच्चे रट लेते हैं. इसलिए उनके मन में गांधी नेहरू के प्रति श्रद्धा और लोकप्रियता के किस्से जबरदस्ती ठूंसे गए हैं. भारत के इतिहास में नेहरू को बेहद महान, प्रगतिशील और भारत के भाग्य विधाता वाली छवि कृत्रिम रूप से गढ़ी गई है और उसे ही पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है.

जिस किसी भी लेखक ने नेहरू के बारे में सच्चाई लिखी उन किताबों को प्रतिबंधित कर दिया गया. सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में कुछ भी छुपाना मुश्किल है और इसलिए नेहरू के बारे में बहुत सी जानकारी, जिन्हें विदेशी लेखकों ने लिखा उपलब्ध है. भारतीय लेखकों की प्रतिबंधित पुस्तकें भी आज इंटरनेट पर उपलब्ध है.

इन सब के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जवाहरलाल नेहरू का चरित्र साफ सुथरा नहीं था. अय्यासी उनके चरित्र का अनिवार्य हिस्सा थी. वह सेक्स के शौकीन थे. स्त्री बच्चे और यहां तक कि कुछ पुरुषों के प्रति भी उनका आकर्षण था.

नेहरू ने अपने सात साल के लंदन प्रवास में एक ख़्वाब जैसी जिंदगी जी थी - अच्छी पढ़ाई, शानदार सोसाइटी व रिश्ते , बेहतरीन शामें, हसीन रातें, खुली, उन्मुक्त और आज़ाद जिंदगी. भारत में इसे आप अय्यासी ही कहेंगे. यहीं से अय्यासी उनके जीवन का हिस्सा बन गयी लेकिन यह उनका निजी मुद्दा है और देश को इससे ज्यादा मतलब नहीं बशर्ते इससे उनका कर्तव्य निर्वहन बाधित नहीं होता हो.

लेडी माउंटबेटन या एडविना से उनका दिव्य प्रेम सार्वजनिक है और इसे नेहरू ने भी कभी छुपाया नहीं. एडविना के लिए उन्होंने सबकुछ दावं पर लगा दिया था, देश को भी, क्या इसे कोई उचित ठहरा सकता है. कुछ लोग इसका जबाब हाँ में दे सकते हैं क्योंकि यह सच्चाई अब सामने आ चुकी है कि नेहरु को प्रधानमंत्री बनाने में एडविना की प्रमुख भूमिका थी. इसके बाद वाइसराय ( माउंट बैटिन ) ने गांधी जो को तैयार किया जिन्होंने चालाकी से सरदार बल्लभ भाई पटेल को किनारे कर दिया.

एडविना को उपहार देना, प्रेमपत्र लिखना तो ठीक है लेकिन यदि देश का विभाजन, कश्मीर का एक भाग पाकिस्तान को सौपना (अप्रत्यक्ष रूप से कश्मीर का भी विभाजन ) आदि के पीछे भी एडविना है, और जिन्ना ने एडविना का स्तेमाल किया है तो इसे क्या कहा जाएगा ? दुर्भाग्य से नेहरू की इस चरित्रहीनता ने भारत को बहुत अधिक प्रभावित किया आजादी के पहले भी और उसके बाद तो आज तक हम सभी भुगत रहें हैं.

मॉर्गन जेनेट ने अपनी किताब ‘एडविना माउंटबेटन: अ लाइफ ऑफ़ हर ओन’ में लिखा है कि वे नेहरू को समझाने मशोबरा - एक हिल स्टेशन - ले गईं. नेहरु मान गए थे.

एडविना की बेटी ने एक किताब " India Remebered" लिखी है जिसमें आज़ादी के पहले और बाद की बहुत सी ऐसी बातें लिखी हैं जिनमे एडविना द्वारा नेहरु के स्तेमाल की साफ़ झलक है.

(एडविना की बेटी पामेला की किताब से लिया गया चित्र )

ब्रिटिश इतिहासकार फिलिप जिएग्लर ने माउंटबेटन की जीवनी में एक चिट्ठी का जिक्र किया है जो डिकी ने अपनी बेटी पेट्रिशिया को लिखी थी. नेहरू और एडविना का रिश्ता माउंटबेटन की जिंदगी के सबसे बड़े काम यानी विभाजन को आसान बना रहा था. वे यह भी समझते थे कि नेहरू के लिए एडविना उन्हें छोड़ नहीं सकतीं. इसलिए कहीं न कहीं वे इसे बढ़ावा भी दे रहे थे.

एलेक्स वॉन तुन्जलेमन ने अपनी किताब ‘इंडियन समर’ में एडविना और नेहरु की चिट्ठियों का ज़िक्र किया है. जवाहरलाल जहां भी कहीं जाते, एडविना के लिए तोहफ़े ख़रीदते. उन्होंने इजिप्ट से लायी गयी सिगरेट, सिक्किम से फ़र्न - एक तरह का पौधा, और एक बार उड़ीसा के सूर्य मंदिर में उकेरी हुई कामोत्तेजक तस्वीरों की किताब एडविना माउंटबेटन को भेजी और लिखा, ‘इस किताब को पढ़कर और देखकर एक बार तो मेरी सांसे ही रुक गयीं. इसे मुझे तुम्हें भेजते हुए किसी भी तरह की शर्म महसूस नहीं हुई और न ही मैं तुमसे कुछ छुपाना चाह रहा था.’

एडविना इसके जवाब में लिखती हैं कि उन्हें ये मूर्तिया रिझा रही हैं. ‘मैं संभोग को सिर्फ ‘संभोग’ की तरह से ही नहीं देखती यह कुछ और भी है, यह आत्मा की खूबसूरती जैसा है..’

जवाहरलाल नेहरू के संदर्भ में वैसे तो अनगिनत उदाहरण है लेकिन उनके निजी सचिव रहे एम ओ मथाई ने अपनी किताब 'Reminiscences of the Nehru Age', page 206. में लिखा है कि - 1948 की शरद ऋतु में बनारस की एक युवती श्रद्धा माता नामक संन्यासी के रूप में नई दिल्ली पहुंची, जिन्हें नेहरु के एक कर्मचारी एस.डी. उपाध्याय लाये थे.

वह एक संस्कृत विद्वान थीं और प्राचीन भारतीय शास्त्रों में पारंगत थीं. वह युवा, सुडौल और सुंदर थी. उनके प्रवचन सुनने के लिए सांसदों सहित लोग उनके पास उमड़ पड़े। नेहरू ने उन्हें अपना इंटरव्यू दिया था बाद में नेहरू की उनसे मुलाकात रात में अपना काम खत्म करने के बाद बार -बार होने लगी । एक दिन श्रद्धा माता ने उन्हें एक पत्र भेजा जिसे पढ़ कर नेहरु परेशान हो गए और उन्हें आधी रात में बुलाया गया . वह आयीं और इसके बाद अचानक श्रद्धा माता गायब हो गईं।

नवम्बर 1949 में बंगलौर एक कान्वेंट से पत्रों के एक बण्डल के साथ एक व्यक्ति प्रधान मंत्री आवास पहुंचा, ये पत्र नेहरु ने श्रद्धा माता को लिखे थे . उसने बताया कि उत्तर भारत से एक युवती यहां पहुंची थी जिसने कुछ महीने पहले कॉन्वेंट में एक बच्चे को जन्म दिया। उसने अपना नाम बताने या कोई विवरण देने से इनकार कर दिया था. जैसे ही वह बाहर जाने लाइक ठीक हो गई, वह बच्चे को छोड़ कर चली गयी लेकिन यह चिट्ठियों का यह बण्डल वहीं छूट गया था .

मथाई लिखते हैं कि उन्होंने बच्चे का पता लगाने की बहुत कोशिश की लेकिन पता नहीं चल सका. नेहरु के संज्ञान में यह बात आयी तो उन्होंने रहत की साँस ली.

सरोजिनी नायडू की बेटी पद्मजा नायडू के आलावा 50 के दशक तक देश के शीर्ष उद्योगपति रहे रामकृष्ण डालमिया की बेटी नीलिमा और गुजरात के व्यापारी साराभाई परिवार की बेटी मृदुला से भी उनके प्रसंगो की हवा खूब उडी थी.

अब आप सोच सकते हैं, फैसला कर सकते हैं कि नेहरू का चरित्र कैसा था और उससे देश कैसे प्रभावित हुआ ?

बहुत से लोग नेहरु को आधुनिक भारत का निर्माता कहते हैं और यह बिलकुल सही है और मेरा इरादा नेहरु की महानता को कम करना बिलकुल भी नहीं है.

लेकिन कल्पना करिए कि आप भारत के पहले प्रधान मंत्री होते तो क्या अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य से राष्ट्र निर्माण के लिए जी जान एक नहीं कर देते ? बिलकुल करते. और शायद भारत की अस्मिता और सार्वभौमिकता पर आंच भी नहीं आने देते


शुक्रवार, 28 जनवरी 2022

नेताजी, भारतीय गणतंत्र और आजादी का अमृत महोत्सव






नेताजी,  भारतीय गणतंत्र और आजादी का अमृत महोत्सव

 

वैसे तो यह संयोग है कि  नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती ( 23 जनवरी ) के तीन दिन  बाद गणतंत्र दिवस आता है लेकिन शायद  यह बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत को आजादी मिलने  और  उसके कारण गणतंत्र की स्थापना  का सौभाग्य नेताजी के कारण ही  मिला है. ऐसे  समय जब भारत स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है, नेताजी की 125 वीं जयंती और उसके बाद पड़ने  वाला  ७३ वां  गणतंत्र दिवस काफी उत्साहजनक रहा. इसका कारण था प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा  दिल्ली में राजपथ पर नेताजी की प्रतिमा की स्थापना की घोषणा  और उनकी होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण करना.

नेताजी की प्रतिमा उसी स्थान पर स्थापित की जाएगी जहां कभी ब्रिटिश के राजा जॉर्ज पंचम की मूर्ति लगाई गई थी, जो स्वतंत्र भारत में 1968 तक इंडिया गेट पर पूरे शान शौकत के साथ लगी रही और इसे हटाया भी तभी गया जब राष्ट्रवादी लोगों ने ब्रिटेन के राजा की इस प्रतिमा को क्षत-विक्षत  करके इस पर कालिख पोत दी थी . लोगों के भारी रोष के कारण इसे दिल्ली  स्थिति कोरोनेशन पार्क  में रख दिया गया था. तबसे इंडिया गेट पर विशेष रूप से बनाई गई यह छतरी खाली पड़ी थी.  इसके बाद कई कांग्रेसी सरकारें आई और  गई लेकिन कोई भी सरकार उस स्थान पर  किसी अन्य प्रतिमा को रखने का साहस नहीं जुटा सकी यद्यपि  इंदिरा गांधी ने जवाहरलाल नेहरू की, और मनमोहन सरकार ने  इंदिरा गांधी की प्रतिमा लगाने पर गंभीरता से विचार किया लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी. 

आखिरकार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने  ब्रिटेन  के राजा की प्रतिमा की जगह नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा लगाने का निर्णय लिया जिसका पूरे देश में तहे दिल से स्वागत किया गया. लोगों ने यह भी  मांग की है कि  ब्रिटेन की राजा के नाम पर बने राजपथ का नामकरण भी  आजाद हिंद पथ किया जाय जो पूरी तरह उचित है. कहना अनुचित नहीं होगा कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस को उनकी 125 वीं जयंती पर भारत में उन्हें पहले से ज्यादा और बहुत  गर्मजोशी से याद  किया गया.


नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती  और सत्ता हस्तांतरण के 75 वर्ष बाद, उनकी मौत का रहस्य आज भी  बरकरार है. भारत को स्वतंत्रता दिलाने का  श्रेय नेताजी  और उनकी आजाद हिंद फौज को जाता है. चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे अनेक क्रांतिकारियों  का संघर्ष और  बलिदान भी स्वतंत्रता दिलाने में मेल का पत्थर साबित हुआ. क्लेमेंट अटली जो  १९४५ से १९५१ तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, ने भारत यात्रा के दौरान बताया था  कि भारत को स्वतंत्रता दिलाने में प्रथम द्रष्टया  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द सेना का बहुत बड़ा हाथ था  जबकि अहिंसा और सत्याग्रह आन्दोलन की भूमिका अत्यंत सीमित थी. जनरल जी डी बक्शी ने भी अपनी किताब  "बोस एन इंडियन समुराई" में  बहुत विस्तार से इस बात का उल्लेख किया है कि भारत की आजादी में नेताजी और उनकी आजाद हिन्द फौज का सबसे बड़ी भूमिका थी.   

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में, सोशल मीडिया की सक्रियता और तमाम गुप्त दस्तावेजों के सार्वजनिक कर दिए जाने से  जो तथ्य सामने आए हैं, उनसे यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई  है कि  "दे दी हमें आजादी बिना खडक बिना ढाल" केवल एक जुमला है और भारत को स्वतंत्रता दिलाने में इसकी और भारत छोड़ो आंदोलन की कोई खास भूमिका नहीं थी.  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद  नवंबर 1945 में लाल किले में हुए आई एन ए के वार ट्रायल के दौरान जब ऐसे पोस्टर देखे गए  जिसमें लिखा था कि अगर आजाद हिंद फौज के किसी भी सैनिक को  फांसी पर लटकाया जाता है तो एक भी अंग्रेज भारत से जिंदा वापस नहीं जाएगा. तब ब्रिटिश सरकार ने  इस बात को शिद्दत से महसूस किया कि अब भारत में और अधिक शासन करना संभव नहीं है. १८५७ के  स्वतंत्रता संग्राम से सहमें अंग्रेज परिवारों में असुरक्षा की भावना घर कर गई और कुछ  अंग्रेज परिवार भारत छोड़कर वापस जाने लगे.  नौसेना के विद्रोह ने  इस बात को और पुख्ता कर दिया कि यदि सेना ने  विद्रोह किया  तो भारत में शासन करना तो दूर की बात, अंग्रेजों को  जान बचा कर भागना  भी संभव नहीं हो पाएगा. यह भी एक तथ्य है लालकिला में हुए वॉर ट्रायल में किसी को भी फांसी की सजा नहीं सुनाई  गयी थी.  अंग्रेजों ने भारत से सुरक्षित निकलने की योजना बनायी, सत्ता हस्तातंरण जिसका महत्वपूर्ण भाग था.    

यह बात समझने योग्य है कि भारत में अंग्रेजों ने भारतीयों के माध्यम से ही  क्रूरतायें  की और  शासन किया. कुल मिलाकर लगभग 5000 अंग्रेज  ही भारत में थे, जो  उच्च पदों पर थे. उन्होंने सेना तथा सरकारी विभागों में  भारतीयों को नियुक्त किया और उनकी स्वामिभक्ति से ही भारत पर शासन किया. इसलिए आनन-फानन में ब्रिटिश सरकार ने सत्ता छोड़ने का निर्णय लिया और कांग्रेस से वार्ता करके उसे अपनी शर्तों पर सत्ता हस्तांतरण करने का फैसला किया और सत्ता के लालच में कांग्रेश, विशेषकर जवाहरलाल नेहरू ने सभी शर्तों को सहर्ष  को स्वीकार कर लिया. यह अब कोई छिपी  बात नहीं है कि अंग्रजों ने  कांग्रेस का गठन अपनी सत्ता को निष्कंटक बनाने   अनवरत चलाने  के लिए किया था और  ब्रिटिश सरकार को गांधी के बाद सबसे अधिक प्रिय जिन्ना और जवाहरलाल नेहरू ही  थे. नेहरु और  जिन्ना  लार्ड माउंट बैटन  से अपनी  निकटता के कारण सत्ता के शिखर पर पहुंचे लेकिन सही अर्थों में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही अविभाज्य  भारत के मुखिया थे और उनकी सरकार को कई देशों ने मान्यता भी दी थी.   

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिन लोगों को  अंग्रेजों ने सत्ता का हस्तांतरण किया उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायकों  नेताजी सुभाष चंद्र बोस और  क्रांतिकारियों के  नाम इतिहास से मिटाने का पाप किया ताकि  आजादी दिलाने का एक मात्र श्रेय  गांधी और नेहरू जैसे कांग्रेसी नेताओं के नाम  सुरक्षित किया जा सके और इसी कारण नेताजी की मौत का रहस्य आज भी  रहस्य बना हुआ है.

नेताजी की मृत्यु से संबंधित तीन विचारधाराएं  हैं. पहली विचारधारा के अनुसार नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 ताइवान में एक हवाई दुर्घटना हो गई थी जब वह जापान जा रहे थे. दूसरी विचारधारा के अनुसार द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की हार के बाद नेताजी सोवियत रूस चले गए थे जहां उन्हें गिरफ्तार करके साइबेरिया की एक जेल में रखा गया था और वही उनकी मौत हो गई. तीसरी विचारधारा के अनुसार नेताजी सोवियत रूस गए थे और वहां ताशकंद समझौते के समय  लाल बहादुर शास्त्री के साथ उनकी मुलाकात भी हुई थी. यह भी कहा जाता है कि शास्त्री जी उन्हें अपने साथ भारत लाना चाहते थे  लेकिन ताशकंद में शास्त्री जी  की मृत्यु हो गई. छद्म वेश में  कुछ समय बाद नेताजी भारत वापस आ गए और फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रूप में रहते रहे.

गुमनामी बाबा की मृत्यु के बाद उनके पास से बरामद सामान में वह सब कुछ मिला जिससे उनके नेताजी होने की पुष्टि होती है, लेकिन चूंकि  अटल  सरकार द्वारा गठित मुखर्जी आयोग को गुमनामी बाबा और नेता जी के डीएनए में समानता की पुष्टि नहीं हो सकी इसलिए अधिकारिक रूप से इस विचारधारा को भी स्वीकार नहीं किया गया.  उनके  छद्म  वेश में  सन्यासी के रूप में  रहने का कारण लोग कयास लगते थे कि तत्कालीन केंद्र  सरकार ने ब्रिटेन के साथ गुप्त  समझौता किया था कि यदि नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत में जिंदा पाए जाते हैं तो उन्हें गिरफ्तार करके ब्रिटिश सरकार को सौंप दिया जाएगा. जन सामान्य को विश्वास था कि महात्मा गांधी और  जवाहरलाल नेहरू कभी भी ऐसा नहीं कर सकते हैं, लेकिन अभी इस तरह की बातें सामने आ रही हैं, कि सत्ता हस्तांतरण के समय एक गुप्त समझौता किया गया था जिसमें इस तरह की शर्त भी हो सकती है.  इसके पहले गठित दो आयोग शाहनवाज आयोग (१९५६) और खोशला आयोग(१९७०)  ने नेता जी की मृत्यु का रहस्य सुलझाने के गंभीर प्रयास नहीं किये.

 

यद्दपि मोदी सरकार द्वारा  राजपथ पर नेताजी की प्रतिमा स्थापित करने से देश ने नेताजी के एक बड़े कर्ज का छोटा सा फर्ज अदा करने का कार्य किया गया है लेकिन  सरकार को  चाहिए कि वे नेता जी की  मृत्यु के  रहस्य  की गुत्थी तुरंत  सुलझाए और इसके लिए आवश्यक है कि  सत्ता हस्तांतरण के समय हुए गुप्त समझौते को तुरंत सार्वजनिक करें और नेताजी की आजाद हिंद फौज के खजाने को लूटने वाले नेताओं के नाम भी उजागर करें  क्योंकि इस खजाने में भारतीय महिलाओं द्वारा नेता जी को दिए गए अपने सुहाग के स्वर्ण आभूषणों का भी दान शामिल था. इसलिए इस खजाने को  लूटने और व्यक्तिगत और राजनैतिक  इस्तेमाल करने वाले भारतीय नेताओं के नाम जनता को जानने का अधिकार है, जिनमें से कुछ को  आधुनिक भारत का निर्माता और भाग्य विधाता भी कहा जाता है.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस को वह स्थान मिलना ही चाहिए जिसके वह वास्तविक हकदार हैं और जिसे स्वार्थी राजनेताओं द्वारा इतिहास से उनका नाम मिटा कर वंचित करने का महापाप किया  गया है.

-                                                                                                                                      - शिव मिश्रा

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

स्वाधीनता की प्रतीक्षा में सनातन धर्म


 


भारत में स्वतंत्रता मिले या सत्ता का हस्तांतरण हुए 70 वर्ष से भी अधिक हो गए हैं लेकिन सनातन धर्म और सनातन  संस्कृति अभी भी स्वतंत्रता प्राप्ति  करने के लिए संघर्ष कर रहा है. लगभग सभी परतंत्र देशों में, यह सामान्य बात हुई है कि  शासकों  ने उस देश की संस्कृति को  नष्ट भ्रष्ट  करने के  हर संभव प्रयास किए, वहां के बौद्धिक संपदा को नुकसान पहुंचाया, स्थानीय समाज के  मूल चरित्र को बदलने के क्रम में उस सभ्यता की प्राचीन उपलब्धियों को दबाया छिपाया और वहां का इतिहास ही बदल दिया ताकि आगे आने वाली पीढ़ियां अपनी सभ्यता और संस्कृति पर  गर्व महसूस करने के वजाय शर्म महसूस करें. भारत में इस्लामिक आक्रमणकारियों और अंग्रेजों ने बहुत क्रूरता और धूर्तता से यह सब कुछ किया और उनके इस कुकृत्य में कुछ भारतीयों ने उनका साथ दिया.  

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ऐसे सभी नव स्वतन्त्र  देशों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना के लिए बहुत मेहनत और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ कार्य किया और समाज में नव चेतना का संचार किया. आज ऐसे सभी देश जो लगभग उसी समय स्वतंत्र हुए जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी, भारत से बहुत  आगे हैं किन्तु  भारत आज भी आक्रमणकारियों, आतताइयों और पूर्व शासकों के बुने हुए जाल में फंसा हुआ है. इसका एकमात्र कारण यह है कि अंग्रेजों से सत्ता का हस्तांतरण जिन लोगों को हुआ वह भी आचार विचार और व्यवहार से अंग्रेज ही थे. इन लोगों की सिर्फ चमड़ी ही काली नहीं  थी,  दिल भी  काला था.

 

गांधी ने देश को धोखे में रखा कि उनकी लाश पर ही देश का विभाजन होगा किन्तु उनकी सहमति से सांप्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ. एक देश पाकिस्तान बना और दूसरा हिंदुस्तान बना.  स्वाभाविक रूप से जनसंख्या की अदला बदली होनी चाहिए थी, जैसा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल के अलावा समस्त हिन्दू  जनमानस चाहता था लेकिन एक नियोजित षडयंत्र के तहत जिन लोगों ने पाकिस्तान बनाने में संघर्ष किया था, वे पाकिस्तान नहीं गए और लगभग सब के सब हिंदुस्तान में हीं जमें रहे. उन्हें भारत में  रोकने का पाप  चाचा और बापू ने किया. वसुधैव कुटुम्बकम के प्रणेता  सनातन धर्म का मतलब  धर्मनिरपेक्ष होता है फिर भी भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया. चूंकि पूरी कांग्रेस पार्टी सरदार बल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी, गांधी ने अपनी प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करके जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दी. अपनी कमजोर स्थिति को मजबूत करने के लिए नेहरू अपना एक वोट बैंक बनाना चाहते थे जिसे उन्होंने मुसलमानों को हिंदुस्तान में रोककर और हिंदुओं से अधिक महत्व देकर बना लिया. 



स्वतंत्रता के बाद अपेक्षा की जाती थी कि लगभग 800 वर्ष की गुलामी के दौरान राक्षसी प्रवृत्ति के लुटेरों, आक्रमणकारियों, और देश पर  बलात कब्जा करने वाले  अंग्रेजों ने प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जो क्षति पहुंचाई है, उसे सुधारने के प्रयास किए जाएंगे. राष्ट्रीय अस्मिता के जिन स्थलों को तोड़ा गया है, उन्हें  पुनर्स्थापित किया जाएगा  और भारत विश्व गुरु वाली अपनी छवि के पुनर्निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू करेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.  इसके उलट सनातन धर्म के पैरों में और अधिक बेड़ियां डाल दी गई. संविधान में ऐसे प्रावधान किए गए और ऐसे कानून बना दिए गए जिससे स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले की यथास्थिति बनाए रखने का दंड भी सनातन धर्मियों  को दिया गया. हिंदू समाज का दुर्भाग्य देखिए कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता के जिन  प्रतीकों और धर्म स्थलों को मुस्लिम आतताइयों  ने तोड़ा था, उनका पुनर्निर्माण स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी नहीं किया जा सका. यह कैसी स्वतंत्रता है? और संपूर्ण सनातन समाज के लिए ऐसी स्वतंत्रता का  क्या अर्थ  है ?




यह देश के बहुसंख्यक समाज के साथ की गई  ऐसी धोखाधड़ी है, जिस की पीड़ा से पूरा हिंदू जनमानस कराह  रहा है. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण 500 साल के संघर्ष, जिसमें  70 वर्ष स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हैं, के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हो रहा है, लेकिन मथुरा और काशी जिनका  भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ धार्मिक और पौराणिक महत्व है, अभी भी अस्मिता पर गहरा आघात है. इन सभी धर्म स्थलों  पर विवाद उन  मुसलमानों ने, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं गए थे, दायर कर रखा है.  कांग्रेसी  सरकारों ने राम को काल्पनिक पात्र ही नहीं बताया बल्कि  धर्म स्थलों की 1947 की पहली वाली यथास्थिति को बनाए रखने का कानून बनाने का महापाप भी किया है. राम का नाम लेकर सत्ता में आयी  भाजपा भी  इस दिशा में किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई पड़ती है.

 

हिंदुओं के मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है. श्रद्धालुओं के  चढ़ावे  से होने वाली आमदनी सरकारी खजाने में  जाती है और  केवल एक छोटा सा हिस्सा मंदिरों के रखरखाव पर खर्च किया जाता है. कई राज्यों में मंदिरों से होने वाली आय  मुस्लिम और क्रिश्चियन धर्म स्थलों और उनके द्वारा चलाई जा रही संस्थाओं को दी जाती है. शायद आज की सरका रें ही  नहीं, हम सब भी भूल गए हैं कि देश की  सभ्यता, कला व संस्कृति,  और भारतीय दर्शन के  उद्भव और विकास में इन मंदिरों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है. शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में इन मंदिरों के कारण भारत के विश्व गुरु बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ था. सनातन का दुर्भाग्य देखिये कि इनके  मंदिर आज भी स्वतंत्र नहीं है. इसके  विपरीत दूसरे धर्म के पूजा स्थलों  को सरकारी धन उपलब्ध कराया जा रहा है बल्कि उन्हें बड़ी मात्रा में विदेशी धन भी  प्राप्त होता है और इस धन का  बड़ा भाग धर्मांतरण और सनातन संस्कृति को लांछित  करने पर खर्च किया जाता है. इस समय जब मंदिर मुक्ति के लिए आंदोलन चलाए जा रहे हैं, भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने  चारो धाम का अधिग्रहण करने का दुस्साहस किया था, भारी विरोध के बाद इसे वापस लिया गया है.



 

कुछ समय पहले संत महात्माओं द्वारा आयोजित धर्म संसद में कालीचरण महाराज द्वारा गांधी के प्रति कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया था, जिसके कारण  कांग्रेस की  छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनके विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर  गिरफ्तार किया गया था. किसी भी अमर्यादित भाषा का समर्थन तो नहीं किया जा सकता लेकिन संत कालीचरण महाराज के बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए. गांधी को पैगंबर बनाकर सनातन धर्म के संत और महात्माओं का निरादर किया जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता. इसी तरह हरिद्वार धर्म संसद में दिए गए भाषण के आधार पर जितेंद्र नारायण त्यागी ( पूर्व वसीम रिजवी) को गिरफ्तार किया गया था. उनकी रिहाई को लेकर यति नरसिंहानंद हरिद्वार में उपवास कर रहे थे, उन्हें भी गिरफ्तार किया गया है और उन पर धर्म संसद के अलावा अन्य कई मामले दर्ज किए गए हैं.




कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि  वसीम रिजवी द्वारा कुरान की आयतों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाने,  मोहम्मद नाम की एक पुस्तक लिखने और बाद में  सनातन धर्म अपनाने के कारण वह वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ के निशाने पर हैं. चूंकि वसीम रिजवी का धर्मांतरण डासना मंदिर में यति नरसिंहानंद की देखरेख में हुआ था जिन्होंने वसीम रिजवी को अपना गोत्र प्रदान किया था, वह  भी आतंकवादियों सहित इस गठजोड़ के निशाने पर हैं. बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने तथाकथित धर्मनिरपेक्ष इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ के दबाव में इन्हें गिरफ्तार किया है. इससे हिंदू जनमानस में बहुत रोष व्याप्त है. उत्तराखंड में पिछले 5 साल में भाजपा तीन मुख्यमंत्री बदल चुकी है, पर ऐसा लगता है कि भाजपा ने अब सरेंडर कर दिया है और इस देव भूमि में पुन: सरकार न बनाने का आत्मघाती  निर्णय ले लिया है.

 

धर्म संसद के विरुद्ध  याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल और उनकी पार्टी कांग्रेस का  हिंदू और सनातन धर्म  विरोध जग जाहिर है. इसलिए उन्होंने जो टिप्पणियां की उस पर आश्चर्य नहीं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह इन याचिकाओं पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और त्वरित कार्यवाही की वह अवश्य चौंकाने  वाली है. कुछ समय पहले कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार पर दायर की गई एक जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए सुनवाई नहीं की थी कि इसमें अत्यधिक विलंब हो चुका है. 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने (ओवैसी) , २०  करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे (वारिस पठान) , मोदी की बोटी बोटी  काट देंगे  ( इमरान मसूद), हर हिंदू आतंकवादी नहीं होता पर हर आतंकवादी हिंदू ही क्यों होता है (रहमानी), जैसे बयानों  पर सर्वोच्च न्यायालय खामोश रहता है. कुछ समय पहले कांग्रेस के सहयोगी तौकीर रजा ने कानून अपने हाथ  में लेकर  हिंदुओं के खात्में की  चेतावनी देते हुए कहा था उन्हें हिंदुस्तान में छिपने  की कोई जगह नहीं मिलेगी, इस पर भी  सर्वोच्च न्यायालय मौन रहा. 


न्यायालय द्वारा इस तरह की  कुछ खास याचिकाओं पर ही त्वरित कार्यवाही जनमानस को उद्वेलित करती है लेकिन सबसे बड़ी पहेली यह है कि  पिछले कुछ वर्षों से मोदी सरकार भी इस तरह के मामलों में शिथिल हो गई लगती है और कई मामलों में तो ऐसा लगता है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर ही बंदूक रखकर चलाना चाहती है. मामला चाहे शाहीन  बाग का हो, किसान आंदोलन का हो,  विधानसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुए हिंदुओं के भयानक नरसंहार का हो या फिर स्वयं प्रधानमंत्री की पंजाब में हुई षड्यंत्रकारी सुरक्षा चूक का हो, यह समझ से परे है कि क्यों इस तरह के  मामलों  में सरकार लुंज पुंज और  असहाय नजर आती है?

 

सरकार की मजबूरियां हो सकती है लेकिन सनातन हिंदू समाज की तो कोई मजबूरी नहीं है. पूरे समाज को संगठित होकर, जाति, उपजाति, वर्ण आदि का भेद भूलकर जन जागरण करना होगा और  सरकार पर दबाव बनाना होगा. समय तेजी से निकल रहा है और सनातन समाज नित नए चक्र व्यूह  में फंसता जा रहा है. स्थिति "अभी  नहीं तो कभी नहीं" वाली आ गई है.  पूरे हिन्दू समाज को संगठित होकर अपने हित में आवाज उठानी  होगी अन्यथा बहुत देर हो जायेगी.

-                                                                                                                         --        शिव  मिश्रा

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