गुरुवार, 20 जनवरी 2022

स्वाधीनता की प्रतीक्षा में सनातन धर्म


 


भारत में स्वतंत्रता मिले या सत्ता का हस्तांतरण हुए 70 वर्ष से भी अधिक हो गए हैं लेकिन सनातन धर्म और सनातन  संस्कृति अभी भी स्वतंत्रता प्राप्ति  करने के लिए संघर्ष कर रहा है. लगभग सभी परतंत्र देशों में, यह सामान्य बात हुई है कि  शासकों  ने उस देश की संस्कृति को  नष्ट भ्रष्ट  करने के  हर संभव प्रयास किए, वहां के बौद्धिक संपदा को नुकसान पहुंचाया, स्थानीय समाज के  मूल चरित्र को बदलने के क्रम में उस सभ्यता की प्राचीन उपलब्धियों को दबाया छिपाया और वहां का इतिहास ही बदल दिया ताकि आगे आने वाली पीढ़ियां अपनी सभ्यता और संस्कृति पर  गर्व महसूस करने के वजाय शर्म महसूस करें. भारत में इस्लामिक आक्रमणकारियों और अंग्रेजों ने बहुत क्रूरता और धूर्तता से यह सब कुछ किया और उनके इस कुकृत्य में कुछ भारतीयों ने उनका साथ दिया.  

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ऐसे सभी नव स्वतन्त्र  देशों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनर्स्थापना के लिए बहुत मेहनत और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ कार्य किया और समाज में नव चेतना का संचार किया. आज ऐसे सभी देश जो लगभग उसी समय स्वतंत्र हुए जब भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी, भारत से बहुत  आगे हैं किन्तु  भारत आज भी आक्रमणकारियों, आतताइयों और पूर्व शासकों के बुने हुए जाल में फंसा हुआ है. इसका एकमात्र कारण यह है कि अंग्रेजों से सत्ता का हस्तांतरण जिन लोगों को हुआ वह भी आचार विचार और व्यवहार से अंग्रेज ही थे. इन लोगों की सिर्फ चमड़ी ही काली नहीं  थी,  दिल भी  काला था.

 

गांधी ने देश को धोखे में रखा कि उनकी लाश पर ही देश का विभाजन होगा किन्तु उनकी सहमति से सांप्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ. एक देश पाकिस्तान बना और दूसरा हिंदुस्तान बना.  स्वाभाविक रूप से जनसंख्या की अदला बदली होनी चाहिए थी, जैसा कि डॉक्टर भीमराव अंबेडकर और सरदार वल्लभभाई पटेल के अलावा समस्त हिन्दू  जनमानस चाहता था लेकिन एक नियोजित षडयंत्र के तहत जिन लोगों ने पाकिस्तान बनाने में संघर्ष किया था, वे पाकिस्तान नहीं गए और लगभग सब के सब हिंदुस्तान में हीं जमें रहे. उन्हें भारत में  रोकने का पाप  चाचा और बापू ने किया. वसुधैव कुटुम्बकम के प्रणेता  सनातन धर्म का मतलब  धर्मनिरपेक्ष होता है फिर भी भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया. चूंकि पूरी कांग्रेस पार्टी सरदार बल्लभ भाई पटेल को प्रधानमंत्री बनाना चाहती थी, गांधी ने अपनी प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करके जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंप दी. अपनी कमजोर स्थिति को मजबूत करने के लिए नेहरू अपना एक वोट बैंक बनाना चाहते थे जिसे उन्होंने मुसलमानों को हिंदुस्तान में रोककर और हिंदुओं से अधिक महत्व देकर बना लिया. 



स्वतंत्रता के बाद अपेक्षा की जाती थी कि लगभग 800 वर्ष की गुलामी के दौरान राक्षसी प्रवृत्ति के लुटेरों, आक्रमणकारियों, और देश पर  बलात कब्जा करने वाले  अंग्रेजों ने प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जो क्षति पहुंचाई है, उसे सुधारने के प्रयास किए जाएंगे. राष्ट्रीय अस्मिता के जिन स्थलों को तोड़ा गया है, उन्हें  पुनर्स्थापित किया जाएगा  और भारत विश्व गुरु वाली अपनी छवि के पुनर्निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाना शुरू करेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.  इसके उलट सनातन धर्म के पैरों में और अधिक बेड़ियां डाल दी गई. संविधान में ऐसे प्रावधान किए गए और ऐसे कानून बना दिए गए जिससे स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले की यथास्थिति बनाए रखने का दंड भी सनातन धर्मियों  को दिया गया. हिंदू समाज का दुर्भाग्य देखिए कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता के जिन  प्रतीकों और धर्म स्थलों को मुस्लिम आतताइयों  ने तोड़ा था, उनका पुनर्निर्माण स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी नहीं किया जा सका. यह कैसी स्वतंत्रता है? और संपूर्ण सनातन समाज के लिए ऐसी स्वतंत्रता का  क्या अर्थ  है ?




यह देश के बहुसंख्यक समाज के साथ की गई  ऐसी धोखाधड़ी है, जिस की पीड़ा से पूरा हिंदू जनमानस कराह  रहा है. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण 500 साल के संघर्ष, जिसमें  70 वर्ष स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हैं, के बाद सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर हो रहा है, लेकिन मथुरा और काशी जिनका  भारत की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति के साथ-साथ धार्मिक और पौराणिक महत्व है, अभी भी अस्मिता पर गहरा आघात है. इन सभी धर्म स्थलों  पर विवाद उन  मुसलमानों ने, जो बंटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं गए थे, दायर कर रखा है.  कांग्रेसी  सरकारों ने राम को काल्पनिक पात्र ही नहीं बताया बल्कि  धर्म स्थलों की 1947 की पहली वाली यथास्थिति को बनाए रखने का कानून बनाने का महापाप भी किया है. राम का नाम लेकर सत्ता में आयी  भाजपा भी  इस दिशा में किंकर्तव्यविमूढ़ दिखाई पड़ती है.

 

हिंदुओं के मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है. श्रद्धालुओं के  चढ़ावे  से होने वाली आमदनी सरकारी खजाने में  जाती है और  केवल एक छोटा सा हिस्सा मंदिरों के रखरखाव पर खर्च किया जाता है. कई राज्यों में मंदिरों से होने वाली आय  मुस्लिम और क्रिश्चियन धर्म स्थलों और उनके द्वारा चलाई जा रही संस्थाओं को दी जाती है. शायद आज की सरका रें ही  नहीं, हम सब भी भूल गए हैं कि देश की  सभ्यता, कला व संस्कृति,  और भारतीय दर्शन के  उद्भव और विकास में इन मंदिरों का अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है. शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में इन मंदिरों के कारण भारत के विश्व गुरु बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ था. सनातन का दुर्भाग्य देखिये कि इनके  मंदिर आज भी स्वतंत्र नहीं है. इसके  विपरीत दूसरे धर्म के पूजा स्थलों  को सरकारी धन उपलब्ध कराया जा रहा है बल्कि उन्हें बड़ी मात्रा में विदेशी धन भी  प्राप्त होता है और इस धन का  बड़ा भाग धर्मांतरण और सनातन संस्कृति को लांछित  करने पर खर्च किया जाता है. इस समय जब मंदिर मुक्ति के लिए आंदोलन चलाए जा रहे हैं, भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने  चारो धाम का अधिग्रहण करने का दुस्साहस किया था, भारी विरोध के बाद इसे वापस लिया गया है.



 

कुछ समय पहले संत महात्माओं द्वारा आयोजित धर्म संसद में कालीचरण महाराज द्वारा गांधी के प्रति कुछ शब्दों का प्रयोग किया गया था, जिसके कारण  कांग्रेस की  छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र सरकार द्वारा उनके विरुद्ध मुकदमा पंजीकृत कर  गिरफ्तार किया गया था. किसी भी अमर्यादित भाषा का समर्थन तो नहीं किया जा सकता लेकिन संत कालीचरण महाराज के बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा होनी चाहिए. गांधी को पैगंबर बनाकर सनातन धर्म के संत और महात्माओं का निरादर किया जाना स्वीकार नहीं किया जा सकता. इसी तरह हरिद्वार धर्म संसद में दिए गए भाषण के आधार पर जितेंद्र नारायण त्यागी ( पूर्व वसीम रिजवी) को गिरफ्तार किया गया था. उनकी रिहाई को लेकर यति नरसिंहानंद हरिद्वार में उपवास कर रहे थे, उन्हें भी गिरफ्तार किया गया है और उन पर धर्म संसद के अलावा अन्य कई मामले दर्ज किए गए हैं.




कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि  वसीम रिजवी द्वारा कुरान की आयतों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय जाने,  मोहम्मद नाम की एक पुस्तक लिखने और बाद में  सनातन धर्म अपनाने के कारण वह वामपंथी इस्लामिक गठजोड़ के निशाने पर हैं. चूंकि वसीम रिजवी का धर्मांतरण डासना मंदिर में यति नरसिंहानंद की देखरेख में हुआ था जिन्होंने वसीम रिजवी को अपना गोत्र प्रदान किया था, वह  भी आतंकवादियों सहित इस गठजोड़ के निशाने पर हैं. बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि भाजपा की उत्तराखंड सरकार ने तथाकथित धर्मनिरपेक्ष इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ के दबाव में इन्हें गिरफ्तार किया है. इससे हिंदू जनमानस में बहुत रोष व्याप्त है. उत्तराखंड में पिछले 5 साल में भाजपा तीन मुख्यमंत्री बदल चुकी है, पर ऐसा लगता है कि भाजपा ने अब सरेंडर कर दिया है और इस देव भूमि में पुन: सरकार न बनाने का आत्मघाती  निर्णय ले लिया है.

 

धर्म संसद के विरुद्ध  याचिकाकर्ता के वकील कपिल सिब्बल और उनकी पार्टी कांग्रेस का  हिंदू और सनातन धर्म  विरोध जग जाहिर है. इसलिए उन्होंने जो टिप्पणियां की उस पर आश्चर्य नहीं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने जिस तरह इन याचिकाओं पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और त्वरित कार्यवाही की वह अवश्य चौंकाने  वाली है. कुछ समय पहले कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार पर दायर की गई एक जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहते हुए सुनवाई नहीं की थी कि इसमें अत्यधिक विलंब हो चुका है. 15 मिनट के लिए पुलिस हटाने (ओवैसी) , २०  करोड़ मुसलमान 100 करोड़ हिंदुओं पर भारी पड़ेंगे (वारिस पठान) , मोदी की बोटी बोटी  काट देंगे  ( इमरान मसूद), हर हिंदू आतंकवादी नहीं होता पर हर आतंकवादी हिंदू ही क्यों होता है (रहमानी), जैसे बयानों  पर सर्वोच्च न्यायालय खामोश रहता है. कुछ समय पहले कांग्रेस के सहयोगी तौकीर रजा ने कानून अपने हाथ  में लेकर  हिंदुओं के खात्में की  चेतावनी देते हुए कहा था उन्हें हिंदुस्तान में छिपने  की कोई जगह नहीं मिलेगी, इस पर भी  सर्वोच्च न्यायालय मौन रहा. 


न्यायालय द्वारा इस तरह की  कुछ खास याचिकाओं पर ही त्वरित कार्यवाही जनमानस को उद्वेलित करती है लेकिन सबसे बड़ी पहेली यह है कि  पिछले कुछ वर्षों से मोदी सरकार भी इस तरह के मामलों में शिथिल हो गई लगती है और कई मामलों में तो ऐसा लगता है कि सरकार सर्वोच्च न्यायालय के कंधे पर ही बंदूक रखकर चलाना चाहती है. मामला चाहे शाहीन  बाग का हो, किसान आंदोलन का हो,  विधानसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हुए हिंदुओं के भयानक नरसंहार का हो या फिर स्वयं प्रधानमंत्री की पंजाब में हुई षड्यंत्रकारी सुरक्षा चूक का हो, यह समझ से परे है कि क्यों इस तरह के  मामलों  में सरकार लुंज पुंज और  असहाय नजर आती है?

 

सरकार की मजबूरियां हो सकती है लेकिन सनातन हिंदू समाज की तो कोई मजबूरी नहीं है. पूरे समाज को संगठित होकर, जाति, उपजाति, वर्ण आदि का भेद भूलकर जन जागरण करना होगा और  सरकार पर दबाव बनाना होगा. समय तेजी से निकल रहा है और सनातन समाज नित नए चक्र व्यूह  में फंसता जा रहा है. स्थिति "अभी  नहीं तो कभी नहीं" वाली आ गई है.  पूरे हिन्दू समाज को संगठित होकर अपने हित में आवाज उठानी  होगी अन्यथा बहुत देर हो जायेगी.

-                                                                                                                         --        शिव  मिश्रा

शुक्रवार, 14 जनवरी 2022

शास्त्री जी को किसने मारा ? और क्यों मारा ?


 

लाल बहादुर शास्त्री को किसने मारा और उनकी ह्त्या क्यों की गयी थी, एक खुला रहस्य है, जो कांग्रेसी सरकारों के निहित स्वार्थ, ह्त्या के कलंक और उससे उपजने वाली जनता की नाराजगी से बचने के लिये बनाए रखा गया. लेकिन जनता सरकार क्यों चुप रही, अटल सरकार ने क्यों कुछ नहीं किया और अब मोदी सरकार क्यों चुप है समझ से परे हैं .


इस सम्बन्ध में मेरा एक लेख एक समाचार पत्र में उ लाला बहादुर शास्त्री की ५६वीं पुण्य तिथि पर प्रकाशित हुआ है, वही उद्दृत है


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बीते 11 जनवरी 2022 को लाल बहादुर शास्त्री की ५६वीं पुण्य तिथि पर भी उनकी मौत पर रहस्य जस का तस है. 1966 में ताशकंद में शास्त्री जी की रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी. यद्यपि विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के अनुसार ऐसा लगता है कि सुनियोजित तरीके से उनकी हत्या की गयी थी, लेकिन भारत सरकार ने अभी भी बहुत से गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए हैं, इसलिए रहस्य पर अभी पर्दा पडा है. यद्दपि आधिकारिक तौर पर यही बताया गया था कि उनकी मौत ह्रदय गति रुक जाने हुई .

कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी "ताशकंद फाइल्स" जिसमें शास्त्री जी की मौत से संबंधित कई रहस्यमई परिस्थितियों का फिल्मांकन किया गया था लेकिन फ़िल्मी कहानी की अपनी एक सीमा होती है और उन रहस्यों को उजागर नहीं किया जा सकता था जो शास्त्री जी के परिवार को मालूम होते हुए भी सरकार ने सार्वजनिक नहीं किए थे.

हाल ही में पत्रकार अनुज धर की एक किताब प्रकाशित हुई है जिसका शीर्षक है "योर प्राइम मिनिस्टर इज डेड" इस पुस्तक के प्रकाशन के लिए अनुज धर ने वर्षों कड़ी मेहनत की है और बहुत से ऐसे दुर्लभ और गुप्त दस्तावेजों को प्राप्त कर पुस्तक में सम्मिलित किया है जिससे शास्त्री जी की मौत या हत्या के कारण बिल्कुल स्पष्ट हो गए लगते हैं. लेखक ने सही अर्थों में खोजी पत्रकारिता की सार्थकता सिद्ध कर दी है. इस पुस्तक के प्रकाशन के बाद शास्त्री जी की मौत एक बार फिर चर्चा में आ गयी है.


शास्त्री जी ताशकंद में युद्ध के बाद के हालात पर वार्ता करने के लिए पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान से शांति समझौते के लिए गए हुए थे। इस समझौते के बाद कुछ ही घंटों के अंदर उनकी अचानक मौत हो गई थी । यद्दपि भारत सरकार ने इस बारे में जनता को कभी कुछ नहीं बताया फिरभी यह मानने के कोई कारण नहीं है कि भारत सरकार को कोई जानकारी नहीं थी. भारत सरकार ने रूस से कुछ पूंछने या जानने की कोशिश नहीं की बल्कि मौत के कारण जनता से छिपाने की लगातार हर संभव कोशिश की गई. ऐसा कांग्रेसी सरकारों ने तो किया ही लेकिन गैर कांग्रेसी सरकारों ने भी शास्त्री जी की मौत से संबंधित गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक नहीं किया. आधिकारिक तौर पर यही बताया गया कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत हृदयाघात के कारण हुई थी.

(क्या नेता जी सुभाष चन्द्र बोस तासकंद में शास्त्री जी के साथ थे ?)


शास्त्री जी के नाती ( बेटी के बेटे ) संजय नाथ सिंह के अनुसार पूरे परिवार का मानना है शास्त्री जी की हत्या हुई थी और उनको जहर दिया गया था. इस संदर्भ में उन्होंने एक इंटरनेट चैनल से बात करते हुए कई अनसुनी बातें बताई. उन्होंने बताया कि ताशकंद में शास्त्री जी और उनकी टीम के सभी सदस्यों के रुकने के लिए एक आधुनिक होटल में व्यवस्था की गई थी जहां स्वास्थ्य सुविधा के लिए इंटेंसिव केयर यूनिट बनाया गया था ताकि किसी भी आपात स्थिति का सामना किया जा सके.

प्रधानमंत्री शास्त्री के दौरे से पहले भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्री, व्यवस्था देखने के लिए ताशकंद गए थे और उन्होंने यह कह कर कि शास्त्री जी बहुत ही साधारण जीवन जीते हैं, इसलिए वह यहां फाइव स्टार होटल में नहीं ठहरेंगे और फिर अकेले शास्त्री जी की रहने की व्यवस्था उस होटल से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक विला में करा दी गई था. शास्त्री जी के व्यक्तिगत डॉक्टर सहित उनकी टीम के सभी सदस्यों को उसी होटल में ठहराया गया था . इसलिए जब उन्हें तथाकथित रूप से हृदयाघात पड़ा या उनकी हत्या की गई, और जब उन्हें सहायता की नितांत आवश्यकता थी, उनके पास कोई भी नहीं था. आपको उत्सुकता होगी कि वह सूचना और प्रसारण मंत्री कौन थे, वह थीं श्रीमती इंदिरा गांधी, जो शास्त्री जी की मौत के बाद बने अंतरिम प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा के बाद प्रधानमंत्री बनी थीं.

श्रीमती गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा था शास्त्री जी एक पुरातन पंथी हिंदू थे जिनके पास आधुनिक और नवोन्मेषी विचारों का पूरी तरह अभाव था.

शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बन जाने से नेहरु / गांधी परिवार बेहद गुस्से में था . नेहरु की बहिन विजय लक्ष्मी पंडित ने संसद में शास्त्री की जी भर कर आलोचना की थी जबकि वह कांग्रेस पार्टी में थी विपक्ष में नहीं .

राज नारायण ने बताया था और जो उनके हवाले से संसदीय दस्तावेजों में दर्ज है कि श्रीमती गांधी ने शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद कहा था कि मेरे घर का नौकर प्रधानमंत्री बन गया और मैं तो ऐसे ही रह गयी .

शास्त्री जी की अचानक हुई मृत्यु से रूस बहुत असहज स्थिति में था उन्होंने शास्त्री जी का पोस्टमार्टम कराने का प्रस्ताव दिया था ताकि उनकी हत्या का कारण पता चल सके और भारतीय प्रधानमंत्री की मृत्यु दोनों देशों के संबंधों के बीच बाधा ना बने. बताया जाता है कि रूस में भारत के तत्कालीन राजदूत टी एन कौल ने पोस्टमार्टम कराने से यह कहकर मना कर दिया कि यह हिंदुओं में अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि इससे मृत शरीर दूषित हो जाता है. टी एन कौल किसके नजदीकी थे यह बताने की आवश्यकता नहीं. 

 नीचे फोटो में नेहरु के पीछे खड़े हैं कौल .

शास्त्री जी के मृत शरीर को कन्धा देते रूसी प्रीमियर और पकिस्तान के राष्ट्रपति


जब शास्त्री जी का मृत शरीर भारत में पालम एअरपोर्ट पर आया तो सभी दुखी थे लेकिन कुछ लोग खुश भी थे . क्यों ?



शास्त्री जी का परिवार और स्टाफ विलाप कर रहा था. सभी अश्रु पूरित थे . जब उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया तो परिवार वालों को काफी समय तक मृत शरीर के पास नहीं जाने दिया गया. बाद में परिवार वालों और कई प्रत्यक्षदर्शियों को उनके चेहरे और शरीर पर अप्राकृतिक नीले और सफेद धब्बे नजर आए। इतना ही नहीं उनके पेट और गर्दन के पीछे कटने के निशान भी देखे गए थे।

उस समय शास्त्री जी की मां जिंदा थी और उन्हें संदेह हुआ तो उन्होंने देसी घी शास्त्री जी के होंठो पर लगाकर कुछ परीक्षण किया और फिर रोते हुए कहा कि उनके बेटे को जहर दिया गया है. परिवार वालों ने शास्त्री जी का पोस्टमार्टम कराने का अनुरोध किया जिसे तत्कालीन सरकार ने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि इससे अंतरराष्ट्रीय जगत में भारत की छवि को धक्का लगेगा और इस प्रकार शास्त्री जी के मृत शरीर का न तो पोस्टमार्टम कराया गया और न ही कोई अन्य परीक्षण कराया गया.

बड़े दुख और हैरानी की बात है कि एक प्रधानमंत्री की मृत्यु के बाद उसके परिवार वालों के साथ कुछ घंटे पुरानी कांग्रेस की गुलजारी लाल नंदा (जो कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे) सरकार का ऐसा व्यवहार क्यों था ? क्या भारत सरकार का कोई प्रभावशाली व्यक्ति शास्त्री जी की हत्या के षड्यंत्र के पीछे था जो हर हालत में शास्त्री जी की मौत को एक सामान्य मौत दिखाना चाहता था.

संजय नाथ सिंह के अनुसार जब वह ताशकंद में थे तो उन्होंने घरवालों से फोन पर बात की और जब उन्हें बताया गया कि पाकिस्तान से समझौते के विरोध में अटल बिहारी वाजपेई और राम मनोहर लोहिया ने ऐलान किया है कि वह काले झंडों से उनका स्वागत करेंगे तो शास्त्री जी ने बताया कि वह ऐसा कुछ लेकर भारत आ रहे हैं, जिसे वह लोग भी पसंद करेंगे और यह मुद्दा बहुत छोटा हो जाएगा. परिवार वालों का अनुमान है कि वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में बात कर रहे थे. आखिर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सार्वजनिक हो जाने से किस परिवार या राजनीतिक दल को खतरा था, यह समझना मुश्किल नहीं.

फरवरी 1966 में संसद में शास्त्री जी की मौत को लेकर काफी हंगामा हुआ. अटल बिहारी बाजपेई, लाल कृष्ण आडवाणी, राम मनोहर लोहिया और राज नारायण ने सरकार से ऐसे ऐसे प्रश्न किए जिसके जवाब में सरकार ने बताया कम, छिपाया ज्यादा. बाजपेई जी ने पूछा कि सोने के पहले शास्त्री जी को दूध का गिलास किसने दिया था, उनका इशारा भारत के तत्कालीन राजदूत टी एन कौल के सरकारी रसोईया जान मोहम्मद की तरफ था, जिसे मास्को से लाकर ताशकंद में शास्त्री जी के रसोइए के साथ बिना वजह लगाया गया था. बाजपेई ने यह भी पूछा कि शास्त्री जी के कमरे में टेलीफोन क्यों नहीं लगा था, जिसके कारण उन्हें अपने घर बात करने के लिए बीमारी की हालत में चलकर दूसरे कमरे में जाना पड़ा. सरकार ने जवाब दिया कि सुइट (कई कमरों वाला फ्लैट नुमा निवास) में टेलीफोन लगा हुआ था यानी किसी अन्य कमरे में था. अटल जी द्वारा यह पूछने पर कि क्या उस समय धर्मा तेजा मास्को में था, सरकार ने जवाब दिया कि वह ताशकंद में नहीं था. इसका मतलब वह मास्को में था. धर्मा तेजा नेहरू जी के दरबारी और कृपापात्र उद्योगपति थे और गांधी परिवार से अंत तक उसके अत्यंत मधुर सम्बन्ध रहे किंतु शास्त्री जी से उसके संबंध मधुर नहीं थे क्योंकि शास्त्री जी ने उसके विरुद्ध कार्यवाही की थी. सरकार ने सदन में स्पष्ट कर दिया कि चूंकि सरकार को शास्त्री जी की मौत के संबंध में संदेह नहीं है, इसलिए कमिशन ऑफ इंक्वायरी गठित नहीं की जाएगी.

1991 में भारत में उपलब्ध सोवियत लैंड नाम की मैगजीन में एक प्रकाशित हुआ जिसे केजीबी की एक पूर्व अधिकारी ने लिखा था उसने बताया कि शास्त्री जी जिस कमरे में ठहरे थे उसे बग किया गया था यानी उसकी कॉल रिकॉर्डिंग के साथ-साथ पूरी जासूसी की जा रही थी. इसमें लिखा है जब शास्त्री जी का सीजर किया गया तो रूस को मालूम हो गया लेकिन भारत सरकार को इसलिए आगाह नहीं किया जा सका क्योंकि तब इस बात का खुलासा हो जाता कि जासूसी की जा रही थी.

अनुज धर की खोज में यह बात सामने आई है कि १९९८ में रूस के एक अखबार में अहमद सत्ताराव, जिसे रूस ने शास्त्री जी के विला में रसोइए के रूप में लगाया था, का इंटरव्यू छपा जिसमें सता राव ने बताया की शास्त्री जी की मौत रात में 1:00 बजे हुई थी और 3:00 बजे उसे केजीबी ने पूछताछ के लिए पकड़ लिया था क्योंकि केजीबी को शक था कि शास्त्री जी को भोजन में जहर दिया गया था. थोड़ी देर बाद ही भारतीय कुक जान मोहम्मद को भी पकड़ कर वहां लाया गया था. चूंकि जान मोहम्मद भारतीय दूतावास का कर्मचारी था, इसलिए बिना दूतावास को सूचना दिए उसे गिरफ्तार नहीं किया गया होगा. इससे स्पष्ट है कि केवल शास्त्री जी के परिवार वालों को ही उन्हें जहर दिए जाने का संदेह नहीं था बल्कि रूस को उसी समय शक हो गया था और उसने उस पर कार्यवाही भी शुरू कर दी थी. फिर क्या कारण था कि भारत सरकार ने इस विषय में जांच नहीं करवाई. सरकार ने उस समय संसद में भी झूठ बोला था.

2009-10 में कुलदीप नैयर जो शास्त्री जी के प्रेस सलाहकार थे और ताशकंद में उनके साथ थे, ने करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें भी शास्त्री जी को जहर दिए जाने का शक था. नैयर ने यह भी बताया कि रूस में भारत के तत्कालीन राजदूत टी एन कौल बाद में विदेश सचिव बन गए थे और तब उन्होंने नैयर पर जहर देने की साजिश पर बात करने पर चेतावनी दी थी.

दहया भाई पटेल जो सरदार बल्लभ भाई पटेल के पुत्र और लोकसभा सांसद थे, ने अपनी किताब में शास्त्री जी की मौत के बारे में बहुत बेबाकी से लिखा था और जहर देकर उनकी ह्त्या काआरोप लगाया था. दुर्भाग्य से दयाभाई की किताब भारत में कहीं भी उपलब्ध नही है. शास्त्री जी का जो सामान वापस आया था उसमें उनका चश्मा भी था. चश्में के खोल में एक छोटी सी पर्ची निकली जिसमें शास्त्री जी की राइटिंग में लिखा था कि मेरे साथ धोखा हुआ है. संजय नाथ सिंह ने यह भी बताया कि जब श्रीमती गांधी उनके परिवार से मिलने आयीं तो उन्होंने कहा था कि अगर शास्त्री जी की ह्त्या हुई है तो सोचिये कि प्रधान मंत्री की ह्त्या करने वाले कितने ताकतवर लोग होंगे और वे आपके परिवार के लिए अब भी ख़तरा हैं इसलिए चुप रहना ही बेहतर है.

लेकिन वह दिन और आज का दिन, सरकार चुप है. केंद्र की वर्तमान मोदी सरकार ने कई मामलों से संबंधित गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं फिर भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस या लाल बहादुर शास्त्री दोनों की मौत पर रहस्य ज्यों का त्यों है. देश हित में सरकार को चाहिए शास्त्री जी की मौत से संबंधित सभी गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक करें और एक जांच समिति / आयोग बनाये ताकि उनकी मौत के कारण स्पष्ट हो सकें.

लेकिन सरकार अगर कुछ भी न करे तो क्या आपको मालूम नहीं हो सका कि ह्त्या किसने करवाई और क्यों करवाई ?

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- शिव मिश्रा 




गुरुवार, 6 जनवरी 2022

गांधी जी राष्ट्रपिता या कांग्रेस के पैगम्बर ?

 








गांधी वाद या पैगम्बरवाद  

 रायपुर में धर्म संसद में गांधीजी के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग करने के कारण संत  कालीचरण महाराज के विरुध्द धारा 294, 505(2) 153 अ (1)(अ), 153 इ (1)(अ), 295,505(1)(इ), 124अ के अंतर्गत छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में मुकदमें दर्ज किये गये. छत्तीसगढ़ पुलिस ने आनन-फानन में उन्हें भी  गिरफ्तार कर लिया. वहां से महाराष्ट्र पुलिस भी उन्हें गिरफ्तार करके पुणे ले गयी. जिन धाराओं में मुकदमा पंजीकृत किया गया है उनमें राजद्रोह और विभिन्न समुदायों के बीच वैमनष्यता उत्पन्न करना शामिल है. ये अपने आप में प्रश्न है कि कैसे कालीचरण महाराज का भाषण देश द्रोह और दो समुदायों में वैमनष्यता  की श्रेणी में आ गया.

इस समय  पूरे देश में बहस चल रही  है कि क्या  कांग्रेस गांधी को पैगम्बर मानती है ? और अगर मानती है तो क्यों ? आजकल तो पैगंबर पर भी  बात हो रही  है, राम और कृष्ण पर बात हो रही  है, तो फिर गांधी क्या इन सबसे ऊपर है जो उन पर चर्चा भी नहीं की जा सकती.

आइये विश्लेषण करते हैं.

अमर्यादित भाषा  का समर्थन नहीं किया जा सकता है चाहे  संत कालीचरण हों या कोई और  लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर  चुप भी नहीं रहा जा सकता है.   जिस तरह कांग्रेस शासित प्रदेशों ने ताबड़तोड़ कार्यवाही की है उससे भ्रम होता  है कि क्या इन  प्रदेशों में गांधी जी के पैगम्बारवाद लिए ईश निंदा का कानून लागू है. 





"गांधी  वाज दि  बेस्ट पुलिसमेन, दि  ब्रिटिश एवर हैड  इन इंडिया" (गांधी  भारत में ब्रिटेन के सबसे अच्छी पुलिसकर्मी थे. यह  मैं नहीं कह रहा हूं यह बात ब्रिटिश संसद सदस्य एलेन विलकिंसन जो लेबर पार्टी  की नेता थीं  और १९४५ से फरवरी 1947 तक ब्रिटेन की  शिक्षा मंत्री थीं,  ने कही थी.  ऐसे अनेक प्रख्यात व्यक्ति हैं जिन्होंने गांधीजी  पर  इस  तरह की टिप्पणियां की है. अब तक जो नए खुलासे हुए हैं और जो बातें सामने आई है वे सब  भारतीय जनमानस में में गांधी की छवि  के विपरीत हैं.जो भी हो सच्चाई सामने आनी ही चाहिए और  सूचना और प्रौद्योगिकी के इस युग में कोई चाहे भी तो सच्चाई को छुपाया नहीं जा सकता.


 


सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और प्रेस क्लब ऑफ इंडिया  के पूर्व अध्यक्ष मारकंडे  काटजू अपने ब्लॉग में लिखा है  कि "गांधीजी एक ब्रिटिश एजेंट थे  और  उन्होंने देश का कितना  नुकशान किया इसकी कल्पना नही की जा सकती. उन्होंने वह  सब  किया जो ब्रिटिश चाहते थे ताकि भारत में ब्रिटेन की सत्ता निसकंटक  और निर्बाध रूप से चलती रहे.  गांधी ने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन, जिसे रामप्रसाद बिस्मिल (जिन्होंने 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' गीत लिखा था), चंद्रशेखर आजाद,भगत सिंह राजगुरु जैसे क्रांतिकारी चला रहे थे, को असफल कर दिया। गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम के  इस क्रांतिकारी आंदोलन के स्थान  पर  सत्याग्रह के नाम से एक  आंदोलन चलाया  ताकि अंग्रेजों  को कोई असुविधा  न हो. इससे अधिक भारत में ब्रिटिश सरकार की कोई सहायता  नहीं की जा सकती थी. ऐसा कोई आंदोलन जो  ब्रिटिश  सरकार के खिलाफ कारगर  होता दिखाई पड़ता, गांधी उसे  बीच में ही रोक देते थे. उन्होंने सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया और हमेशा मुसलमानों का पक्ष लिया." यह बातें  काटजू के ब्लॉग  पर उपलब्ध है.



क्लेमेंट अटली जो  १९४५ से १९५१ तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे, ने कहा था कि भारत को स्वतंत्रता दिलाने में प्रथम द्रष्टया  नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की सेना का बहुत बड़ा हाथ था  जबकि अहिंसा और सत्याग्रह आन्दोलन की भूमिका अत्यंत सीमित थी जैसा कि जी डी बक्शी की  किताब  "बोस एन इंडियन समुराई"  उद्धृत किया गया है. 




संविधान निर्माता बाबा साहेब भीराव आंबेडकर ने  खुले तौर पर  गांधीजी  की आलोचना की थी. उन्होंने गांधीजी  को महात्मा मानने से भी इनकार कर दिया था. डॉ भीम राव आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "व्हॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स?"में गांधी और कांग्रेस दोनों पर  ढोंग करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा था कि हजारों साल पहले भगवान बुद्ध ने दुनिया को सत्य और अहिंसा का संदेश दिया था?   अज्ञानी मूर्ख  के अलावा कोई भी गांधी को इसका श्रेय नहीं देगा. उन्होंने  कहा था कि छल और कपट दुर्बलों के हथियार हैं. और, गांधी ने हमेशा इन .हथियारों का इस्तेमाल किया है. उन्होंने महात्मा गांधी की राजनीति को बेईमान राजनीति की संज्ञा दी थी. आंबेडकर ने कहा था कि गांधी राजनीति से नैतिकता को खत्म करने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति हैं और, उन्होंने भारतीय राजनीति में व्यावसायिकता की शुरुआत की.

 

यह भी एक तथ्य है कि  हम सभी भारतवासियों  को गांधी जी के प्रति सम्मान संस्कारों से मिला है. बचपन से घर में, स्कूल में, कहानियों में, इतिहास  में जहाँ कहीं जो भी पढ़ा है उसमें गांधी जी का बहुत गुणगान किया गया है.  हर जगह  यह बताया गया है कि  गांधीजी ने बिना खड़ग, बिना ढाल के अहिंसा की  दम पर भारत को आजादी दिलवा दी. किसी  के भी  मन में गांधी के  इस महिमामंडन के प्रति अविश्वास भी पैदा नहीं होता क्योंकि उन्हें साबरमती का संत, महात्मा और यहां तक कि राष्ट्रपिता तक बना दिया गया. खुद  गांधी जी ने भी अपनी आत्मकथा और  अन्य किताबों  में अपनी छवि को बेहद करीने से ऐसे प्रस्तुत किया हैं जिसकी  वास्तविकता पर भ्रम होने लगता है .  

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में जब सोशल मीडिया पर प्रत्येक विषय पर खुलकर चर्चा होती है, गांधीजी के बारे में भी बहुत सी नयी  बातें  सामने आ रही हैं. विदेशी इतिहासकारों और लेखकों की बातें जिन्हें  भारत में जानबूझकर छुपाया गया था, आज  उन पर व्यापक चर्चा हो रही है. प्रोफेसर कपिल कुमार की एक नयी  किताब शीघ्र  ही आने वाली है, जिसमें  "ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर " से सम्बंधित नए खुलासे आने वाले हैं.    


आजादी के कुछ पहले से बहुत सी  बातों को लेकर गांधीजी के खिलाफ पूरे देश में बहुत भयंकर आक्रोश था. गांधी जी  ने भारत के लोगों से जो कहा उसका ठीक उल्टा किया उन्होंने कहा था कि देश का बंटवारा उनकी लाश पर होगा लेकिन उन्होंने पाकिस्तान बनाने के प्रस्ताव को स्वयं स्वीकार किया, जो  जिन्ना के अलावा केवल ब्रिटिश सरकार की  इच्छा थी. अहिंसा के जिस  अस्त्र  का इतना ढिंढोरा पीटा जाता है, वह उस समय एकदम  बेकार साबित हुआ जब बंटवारे के कारण भयानक  हिंदू मुस्लिम दंगे हुए और लाखों लोग दंगों की भेंट चढ़ गए. गांधीजी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति ने  हिंदुओं का  सबसे अधिक अहित  किया, जिसका खामियाजा हिंदू समुदाय आज तक भुगत रहा है. गांधीजी  पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को जोड़ने के लिए भारत के बीच से एक कॉरिडोर देने पर भी सहमत  थे, जिसके लिए स्वयं जवाहरलाल नेहरू भी  तैयार नहीं थे. उन्होंने पाकिस्तान को पचपन करोड़ों रुपए की सहायता देने का दबाव बनाया और इसके लिए अनशन शुरू कर दिया, किन्तु भारी विरोध के   कारण यह धन  राशि पाकिस्तान को नहीं  मिल  सकी जो उनकी हत्या के विभिन्न कारणों में से एक था. जब वह अनशन पर थे तो बाहर “गांधी को मर जाने दो” जैसे नारे भी लगते थे.



गांधी के ब्रह्मचर्य के प्रयोग से लोग आश्चर्यचकित थे और बेहद गुस्से में थे. उम्र के उस पड़ाव पर जब इन्द्रियां स्वयं शिथिल पड़ने लगती हैं, इस तरह के प्रयोग का क्या औचित्य था, यह आज भी समझ से परे है. आज उन प्रयोगे के लगभग ७० साल बाद भी आम जनमानस इसे स्वीकार नहीं कर सकता  तो उस समय क्या स्थिति रही होगी, समझना मुश्किल नहीं.     

 

पाकिस्तान से आये शरणार्थी,  जो दिल्ली में जामा मस्जिद सहित ऐसी अन्य जगहों पर ठहरे हुए  थे, जो मुस्लिमों  के पाकिस्तान जाने से खाली  हुये  थे,  उन्हें गांधी जी के कहने से जबरदस्ती  उस समय बाहर निकाला गया जब दिल्ली में कड़ाके की ठण्ड पड रही थी. बहुत सी बातें आज सोशल मीडिया में हैं और लोग गांधी को महात्मा के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. तैयार तो उस समय भी नहीं थे लेकिन सुनियोजित  रूप से  कांग्रेस ने  अपने हित में उन्हें इतना  महान बनाया कि उसी महानता की पूंजी आज तक खा रही हैं.


गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा भी कांग्रेस ने दिया जिसे कोई  सामान्य बुद्धि और विवेक का व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता. भारत एक सनातन देश है और सभ्यता और  संस्कृति विश्व में सबसे  पुरानी है, जहाँ  पृथ्वी को माता मना जाता हो, राष्ट्र  को भारत माता कहा जाता हो और उसे देवी का दर्जा दिया जाता हो, वहां गांधी जी जैसे व्यक्ति को राष्ट्रपिता का दर्जा देना बेहद चालाकी भरा कदम है.  अच्छा तो यह होता कि  गांधी स्वयं इसका विरोध करते.  कांग्रेस द्वारा  गांधी जी के विरोधियों के बारे में बहुत  दुष्प्रचार किया गया और  उनका नाम इतिहास  से भी मिटाने की कोशिश की गयी. आज जैसे जैसे लोगों में जागरूकता बढ़ रही है, गांधीवाद का तिलिस्म टूट रहा है और उसी गति से कांग्रेस की राजनैतिक पूंजी समाप्त  होती जा रही है. कांग्रेस गांधी को पैगम्बर बना कर  कई हिंदूवादी संगठनो और महान देशभक्तों को बदनाम करने का दुष्चक्र चलाती रही है.


आज भी कांग्रेस की चिंता  अपने  पैगम्बर की छवि  बचाने से ज्यादा अपना राजनैतिक भविष्य बचाने की है  क्योंकि जब असली गांधी की छवि विकृति हो जायेगी तो नकली गांधियों का क्या होगा, ये समझना बेहद आसान है.



-    -    - शिव मिश्रा           

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

भ्रष्टाचार का इत्र में राजनीति की बदबू

 


ये कहानी है भ्रष्टाचार के इत्र की जिससे राजनीति की बदबू फैल रही है.

इस विषय पर मेरा एक लेख हिन्दी समाचार पत्र में छपा जिसका विवरण प्रस्तुत है .

हाल ही में एक इत्र व्यवसायी के कानपुर और कन्नौज के आवास और प्रतिष्ठानों पर जीएसटी इंटेलिजेंस ने छापेमारी की, जिसका आधार था गुजरात में चार ट्रक बिना कागजात के पान मसाला पकड़ा जाना. जाँच की आंच पियूष जैन तक पहुँची और आश्चर्यजनक रूप से उसके आवास से बड़ी मात्रा में ₹500 और ₹2000 के नोटों की गड्डियों के रूप में २८७ करोड़ से भी अधिक की नकदी बरामद हुई. जैन के कन्नौज स्थित आवास में छापा मारने पर भी बड़ी मात्रा में नकदी, 6 क्विंटल से अधिक चंदन का तेल, लगभग ६४ किलो सोने की विदेशी मार्क वाली ईंटें, बड़ी मात्रा में चांदी आदि बरामद हुई.

कन्नौज जैसी एक छोटी सी जगह में एक बड़ी सी कोठी का उपयोग नकदी, सोना, चांदी और अन्य बहुमूल्य चीजों के भंडारण के लिए किया जा रहा था. मकान में एक बड़ी सुरंग भी पाई गई जिसमें नोटों की गड्डियां बोरो में भरी रखी थी. सोना चांदी कंक्रीट की दीवारों में छुपा कर रखा गया था दीवारों में बायोमेट्रिक लाकर भी पाए गए. मकान की दीवारों और फर्श का स्कैन करने के लिए आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की टीम का सहारा लिया गया. ३० ऐसी रहस्यमय चाभियाँ मिली हैं, जिनके तालों की तलाश है और यह ताले विभिन्न लॉकर तथा अन्य गुप्त स्थानों के हो सकते हैं जहां पर नकदी और सोने-चांदी के अलावा बहुमूल्य प्राचीन वस्तुएं होने की संभावना है. छापों में जीएसटी इंटेलिजेंस टीम के अलावा आयकर और इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट की टीमें भी शामिल हैं, जिनके लिए यह अब तक की सबसे बड़ी बरामदगी है.


उ.प्र. में चुनाव के इस मौसम में राजनीति गरमा गयी है . विश्वस्त सूत्रों के अनुसार ये वही पियूष जैन हैं जिन्होंने कुछ समय पहले सपा के लिए समाजवादी इत्र तैयार किया था, तब सपा नेता अखिलेश यादव ने कहा था कि समाजवादी इत्र की खुशुबू पूरे प्रदेश में फैलेगी और भाजपा का सफाया कर देगी. बाईस में बाइसिकल का यह दांव उलटा पड़ता दिखाई पड रहा है.

कन्नौज के इत्र व्यापारियों ने कहा है कि पियूष जैन इत्र व्यापारी नहीं हैं, उनका व्यापर क्या है, सरकार को इसकी जांच करनी चाहिए. यह भी पता चला है कि पियूष जैन की इत्र कंपनी का टर्न ओवर लगभग ५ करोड़ है, अगर पूरे टर्न ओवर को लाभ मान लिया जाय तो भी इतनी बड़ी रकम नहीं बनायी जा सकती. फिर सवाल है कि पीयूष जैन ने कुबेर का खजाना कहां से इकट्ठा किया। एजेंसियों की शुरूआती जांच में ये बात सामने आयी है कि पीयूष इत्र के कारोबारी जरूर हैं लेकिन करोबार इतना बड़ा नहीं है कि इतनी कमाई हो. पीयूष जैन टैक्स चोरी से भी इतनी बड़ी रकम नहीं जुटा सकते हैं। वैसे उनका परिवार बेहद सादगी से रहता है, पीयूष जैन स्वयं स्कूटर से चलते हैं और उनके परिवार के पास लगभग 10 साल पुरानी कार है. ऐसा बहुत कम होता है कि इतनी धन संपत्ति के मालिक का पूरा परिवार इतनी सादगी से जीवन बिताये.

नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के बाद व्यापार और कारोबार पर बुरा असर पड़ा था और इसके बाद कोरोना काल में लॉकडाउन में हुई बंदी से व्यापार और व्यवसाय अत्यधिक प्रभावित हुए थे। नोटबंदी और कोरोना काल के बाद कोई इत्र कारोबारी इतनी बड़ी रकम व्यवसाय से इकट्ठा नहीं कर सकता है। पियूष जैन ने कहा है कि यह पूरी रकम उन्ही की है, उन्होंने टैक्स नहीं चुकाया है जिसे चुकाने के लिए वह तैयार हैं. बाद में बयान बदलते हुए कहा कि उन्होंने परिवार का सोना बेचकर रकम इकट्ठी की है. उनके पारिवारिक आवास से 64 किलो सोने की विदेशी मार्क वाली ईंटे बरामद की गई हैं, जिसका वह जवाब नहीं दे सके. इतने बड़ी रकम इकट्ठा करने के लिए लगभग ६ कुंतल सोने की आवश्यकता है और इतना सोना उनके परिवार के पास कहां से आया, यह भी एक यक्ष प्रश्न है. उन्होंने किसे, कब और कहाँ सोना बेचा, इसका ब्योरा भी नहीं दे सके. यह निश्चित है कि इतनी बड़ी रकम अकेले पीयूष जैन की नहीं हो सकती है।

उ.प्र. में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं इसलिए यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि हवाला के जरिए इत्र कारोबारी के ठिकानों पर रकम इकट्ठा की जा रही थी जिसे विधानसभा चुनाव में खपाने की तैयारी थी। आखिर किस राजनीतिक दल ने ऐसा किया है, यह जांच का विषय है और पीयूष जैन इस पूरे घटनाक्रम का एक मुख्य किरदार है. उसका मुंह खुलते ही प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ जाएगा. अभी 18 नवंबर को अखिलेश यादव के चार करीबियों के यहाँ लखनऊ, मऊ, मैनपूरी में छापेमारी हुई थी। इस छापेमारी के बाद सपा ने इस पर तीखी प्रतिक्रया व्यक्त की थी लेकिन इस बार अखिलेश खामोश हैं. पियूष जैन सपा के एमएलसी पम्मी जैन के करीबी हैं, और समाजवादी इत्र के निर्माता हैं, इसलिए शक की सूई सपा की तरफ घूमना स्वाभाविक है.

भारत में राजनीति बहुत बड़ा और सर्वाधिक लाभ देने वाला उद्योग बन चुका है, इसलिए कई राजनैतिक दल इसमें अनाप-शनाप निवेश करते हैं और इसके लिए सालों से काला धन इकठ्ठा कर चुनाव की तैयारी करते हैं. जिसे एकबार भी सत्ता प्राप्त हो जाती है उसके लिए कालाधन बनाना आसान हो जाता है . स्वाभाविक रूप से कालेधन का श्रोत भ्रष्टाचार ही होता है जो जनता की गाड़ी कमाई और करदाताओं के पैसे पर डाका होता है लकिन कौन परवाह करता है इसकी. सभी पैसा, पद, प्रतिष्ठा के लिए सत्ता प्राप्ति की जोड़तोड़ करते हैं. इसलिए गठबंधन बनते हैं, सरकार बनाने के लिए समझौते होते हैं, मंत्री पद के बंटवारे होते हैं और ऐसा करने के लिए देश और समाज के हित को ताक पर रख दिया जाता है.

दुर्भाग्य से भारत का विभाजन भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के कारण हुआ था और आज भारत जिस दुर्गति में है उसका कारण भी राजनैतिक महत्वाकांक्षा के कारण सत्ता पर काबिज बने रहना ही है. इसके लिए राष्ट्र हित को बार बार दांव पर लगाया गया, भ्रष्टाचार से सत्ता का दोहन किया गया और रक्षा समझौतों मे भी जमकर कमीशन बाजी की गयी. कई सत्ताधीशों ने भ्रष्टाचार की काली कमाई विदेशी बैंकों में जमा की, और चुनावों में भी इसका जमकर दुरूपयोग किया. कई राज नेताओं की असामयिक मौत के कारण उनकी काली कमाई देश में वापस भी नहीं आ पाई. आज चुनाव इतने महंगे हो गए है कि कोई सामान्य ईमानदार व्यक्ति विधायक या संसद का चुनाव लड़ कर जीत नहीं सकता.

भ्रष्टाचार की काली कमाई इतनी आकर्षक होती गयी कि कई राजनैतिक दल केवल परिवार की संपत्ति बन गए और सत्ता के सिंहांसन पर पीढी दर पीढी परिवार के लोग बैठते गए, राज्य खोखले होते गए और देश भी पनप नहीं सका. परिवारवाद की राजनीति ने ऐसे ऐसे लोगो को सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया जो इतने अयोग्य हैं जिन्हें आज खुले बाजार में १० -१५ हजार रुपये की नौकरी भी नहीं मिल सकती, लेकिन वे करोडो लोगों के भाग्य विधाता बन चुके हैं या बनने का प्रयास कर रहे हैं. क्या होगा इस देश का या समाज का, इसकी उन्हें न कोई चिंता है और न ही समझ . ऐसे लोगो का एकमेव उद्देश्य सत्ता हाशिल करना और भ्रष्टाचार से कमाई करना है. ऐसा केवल एक राज्य में हो ऐसा भी नहीं है. लगभग हर राज्य में इस तरह के उदाहरण हैं. जब तक ऐसा होता रहेगा तब तक भ्रष्टाचार कभी ख़त्म नहीं हो सकता और काले धन की समस्या कमोवेश बनी रहेगी.

कालेधन को ख़त्म करने के उद्देश्य से लाई गयी नोटबंदी काले धन को ख़त्म करने में अपेक्षित सफल भले ही न हुई हो लेकिन इतना तो अवश्य हुआ कि कई राजनैतिक दलों का खजाना लुट गया और इसलिए जितना विरोध राजनीतिक दलों ने किया उतना आम जनता ने नहीं किया. चुनाव लड़ने में इन दलों को वित्तीय संकट का सामना करना पडा और इस कारण कई दलों को राज्यसभा, लोकसभा और विधान सभा / विधान परिषद् के टिकट नीलाम करने पड़े . इस कारण भ्रष्टाचार और कालाधन और बढ़ने की संभावना है.

इन परस्थितियों में केवल चुनाव सुधार की नहीं बल्कि राजनीतिक सुधार की आवश्यकता है, जिसमें दो दलीय चुनाव प्रणाली की सख्त आवश्यकता है, जिससे क्षेत्रीय दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों को रोका जा सके. चुनाव आयोग को इतना स्वतन्त्र करना होगा कि वह राजनैतिक दलों में आतंरिक लोकतंत्र सुनिश्चित कर सके जिससे परिवारवाद की राजनीति पर रोक लग सके. इससे तुष्टिकरण की राजनीति पर भी रोक लगेगी और लोग राष्ट्रहित के मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित कर सकेंगे.

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- शिव मिश्रा 



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