मंगलवार, 21 जनवरी 2020

चुनाव : दिल्ली है दिल वालों की ...किसकी होगी ?


चुनाव : दिल्ली है दिल वालों की ...किसकी होगी ?

बेहद आश्चर्यजनक बात है कि दिल्ली में आपको कई ऐसे लोग मिलेंगे जो भाजपा समर्थक नहीं है, जिन्होंने पिछले चुनाव में  अरविंद केजरीवाल को बहुत उत्साह के साथ तन मन धन से समर्थन दिया था, अबकी बार वह तिराहे पर हैं और उनका कहना है कि ये जानते हुए भी कि  कांग्रेस  की स्थिति बहुत खराब है वे कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन इस बार केजरीवाल का समर्थन करते हुए उन्हें शर्म आ रही है. क्यों ? ऐसा क्या किया केजरीवाल ने पिछले 5 साल में कि कुछ लोगो को उनके समर्थन में शर्म रही है? क्या होगा इन चुनावों में ? कौन जीतेगा?



२. केजरीवाल की राजनीति समझने से पहले केजरीवाल को शुरू से समझना पड़ेगा . केजरीवाल ने1989 आईंआईटी खड़कपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद टाटा स्टील कंपनी ज्वाइन की.  बिना देर लगाए उन्होंने अनुपस्थित के आधार पर छुट्टी ले ली ताकि वह सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अच्छी तरह से ध्यान दे सकें. इस तरह की छुट्टी से  सैलरी तो नहीं मिलती लेकिन, नौकरी बची रहती है और उन्होंने सोचा कि अगर उनका सिविल सर्विसेज में सिलेक्शन  होता है तो ठीक वरना वापस आ जाएंगे . बीच-बीच में जब भी कभी समय मिलेगा तो आते रहेंगे  और वेतन लेते रहेंगे. यानी  उपलब्ध सुविधा का भरपूर लाभ.  इसके बाद उनका सिलेक्शन आईआरएस में हो गया और वह बाकायदा नौकरी भी करने लगे तो भी उन्होंने कई बार छुट्टियां ली . 1999 में उन्होंने एक परिवर्तन नामक गैर सरकारी संगठन बनाया और जिसका मुख्य फोकस था सूचना का अधिकार कानून . जब वह पूर्णकालिक आंदोलनकर्ता बन गए और उन्हें लगा कि ये कैरियर ज्यादा अच्छा है तब उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया .  जब उनके विरुद्ध शिकायतें आयीं, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जांच करवाई तो  पता चला  कि अवैतनिक छुट्टी के बाद भी उन्होंने कई महीने की सैलरी ली है.सभी तरह की छुट्टियां एडजस्ट करने के बाद भी लगभग दस लाख रुपए  की धनराशि उनसे रिकवरी के लिए निकली.मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद केजरीवाल ने चेक द्वारा ये धनराशि  सरकार को वापस की. ये है उनकी ईमानदारी के एक मिशाल. दिल्ली मैं जनलोकपाल के समर्थन में अन्ना हजारे का आंदोलन अप्रैल 2011 से शुरू हुआ तो उसमें केजरीवाल ने अपने सहयोगियों के साथ जोर शोर से भाग लिया. पूरे आंदोलन को सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से जन जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया और  इसका नाम दिया गया इंडिया अगेंस्ट करप्शन . ये आंदोलन बहुत अधिक प्रभावी हुआ और ऐसा लगा कि ये आंदोलनकारी  अब देश से भ्रष्टाचार मिटा कर रहेगें  .  भ्रष्टाचार रहित भारत के सपने पर सवार  लोग लगभग हर शहर में  इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़ने लगे. अन्ना आंदोलन का इतना प्रभाव हुआ  कि तत्कालीन काग्रेस की मनमोहन सरकार द्वारा अन्ना हजारे को तिहाड़ जेल भेजने और जेल से छोड़ने तक पूरे देश में आंदोलन का एक बड़ा प्लेटफार्म बन कर तैयार हो गया था .मौके का भरपूर फायदा उठाने में उस्ताद अरविंद केजरीवाल  अन्ना हजारे के प्रथम शिष्य के रूप में स्थापित हो गए.  आंदोलन की सफलता की फसल काटने के उद्देश्य से उन्होंने प्रस्ताव रखा कि  इस जन आंदोलन को राजनैतिक पार्टी में बदल दिया जाए.  अन्ना हजारे सहित संतोष हेगड़े और किरण बेदी आदि इसके खिलाफ थे किंतु अरविंद केजरीवाल  की अति महत्वाकांक्षा भविष्य के ताने-बाने बुन रही थी और उन्होंने अन्ना हजारे की इच्छा के विपरीत राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया.   पार्टी बनाने में उन्हें शांति भूषण और प्रशांत भूषण का सहयोग मिला और उसके बाद अन्य प्रमुख लोग इससे जुड़ते चले गए जिनमें कुमार विश्वास, आशुतोष कुमार,  योगेंद्र यादव आदि प्रमुख थे.





३. आम आदमी पार्टी के रूप में एक राजनीतिक दल बनाने के बाद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी और  उन्होंने वे सभी मुद्दे ढूंढ निकाले जिनसे बहुत जल्दी सफलता हासिल की जा सकती थी. शीला दीक्षित की सरकार कौमन वेल्थ खेलों में हुए घोटालों के कारण चर्चा में थी.  इसके अलावा 15 साल से सरकार सत्ता में थी तो जाहिर सी बात  है उसके विरुद्ध भी जनता की बहुत सारी शिकायतें भी  थी,  जिसमें  बिजली और पानी की बढ़ी हुई कीमतें भी शामिल थीं. केजरीवाल ने दोनों मुद्दे हाथों हाथ लिए और बिजली बिल के नाम पर कंपनी के मालिक उद्योगपतियों  के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और उस मोर्चे में सीधे मोदी को भी लपेट लिया.  हर अच्छे बुरे काम को अपने प्रचार के लिए स्तेमाल करना कोई केजरीवाल से सीखे . हर छोटी बड़ी नाकामी के लिए  वे मोदी को लपेट लेते है. उन्होंने बिजली कंपनियों के विरुद्ध कैग जांच, स्वतंत्र ऑडिट आदि को लेकर बहुत बखेड़ा खड़ा किया  हालांकि इसमें कोई भी तथ्य नहीं निकला लेकिन वे सुर्ख़ियों में बने रहे. .  केजरीवाल हाथ मे प्लास  पेंचकस लिए एक खंबे से दूसरे खंबे पर चढ़ कर कनेक्शन जोड़ने का नाटक करते  रहे.  बात बात में केजरीवाल धरने पर बैठने लगे . संभवत जनता ने उनके इस व्यवहार को जनता के हित में किए जाने वाले कार्य के रूप में लिया.



४. आम आदमी पार्टी ने 2013 का चुनाव दिल्ली में पहली बार लड़ा. कहा जाता है कि इन चुनावों में कांग्रेस  को अपनी हार अवश्यंभावी लग रही थी और इसलिए भाजपा को रोकने के लिए उसने ढके छुपे आम आदमी पार्टी को काफी सहायता दी. उनका मत था कि यदि दिल्ली का चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष में बदल जाएगा तो  तो कांग्रेस  एक बार फिर सरकार बना सकती है. कांग्रेस का यह दांव उल्टा पड़ गया और इस त्रिकोणीय संघर्ष में त्रिशंकु विधानसभा के नतीजे आए और सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस का हुआ.  15 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज कांग्रेस  की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपदस्थ हो गई. यद्यपि भारतीय जनता पार्टी सबसे बडे दल के रूप में उभरी फिर भी 70 सदस्यों की विधानसभा में 31 सीटें पाकर भी सरकार बनाने में नाकामयाब रही.  आप 28 सीटें पाकर दूसरे स्थान पर रही और कांग्रेस 8 सीटों के साथ तीसरे  स्थान पर चली गई. भारतीय जनता पार्टी ने पर्याप्त समर्थन के अभाव में सरकार बनाने से इंकार कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि यदि आप और कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनती है तो भविष्य में इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा. कांग्रेस  के सहयोग से केजरीवाल मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन जैसा कि केजरीवाल के नजदीकी लोग बताते हैं कि वह काम कम करते हैं झगड़ा ज्यादा करते हैं, सरकार  नहीं चली . वामपंथ से प्रभावित केजरीवाल बेहद जुझारू प्रवृत्ति के हैं जो आंदोलन के चलते तो केंद्र सरकार से लड़ते रहे और उसके बाद अपने सहयोगियों  से लड़ने लगे. यह सरकार बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी और केजरीवाल ने ४९ दिन में ही इस्तीफा दे दिया . नतीजतन दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. केजरीवाल यही नहीं रुके , उन्होंने वाराणसी से मोदी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव भी लड़ा जहां उन्हें भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी अपने आप को सुर्खियों में रखने में कामयाब हो गए . उन्होंने अपने विश्वसनीय कुमार विश्वास को भी अमेठी से चुनाव लड़ाया जहां से राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा की स्मृति ईरानी चुनाव लड़ रही थी. राहुल गांधी अपनी सीट हारते हारते बचे . स्मृति ईरानी ने उनको बहुत ही निकट की टक्कर दी. कुमार विश्वास कुछ भी कर पाने में सफल नहीं रहे . लेकिन यदि वह चुनाव में नहीं होते तो शायद राहुल गांधी का जीतना मुश्किल था.

५. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया जो 30 साल बाद किसी पार्टी को सांसद  में बहुमत मिला था . भाजपा ने दिल्ली की सभी 7 सीटें जीती और उसे 46% से भी अधिक मत प्राप्त हुए. लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद ही दिल्ली विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हुए . इस बीच केजरीवाल ने बेहद नाटकीय अंदाज में अपना प्रचार जारी रखा जिसके केंद्र में मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग थे.  लोकसभा चुनाव की सौ प्रतिशत सफलता के बाद भारतीय जनता पार्टी को इन चुनावों से बेहद आशा थी  किंतु इन चुनावों में बहुत बड़ा उलटफेर हुआ . आम आदमी पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली . उस ने 70 में से 67 सीटें जीतकर एक नया कीर्तिमान बनाया. भारतीय जनता पार्टी को केवल 3 सीटें प्राप्त हो सकी. कांग्रेस का सफाया हो गया.  जिस कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की हरसंभव  सहायता की थी वह उसके लिए इतनी घातक हुई कि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. नाटकीय  अंदाज के माहिर,  केजरीवाल ने बेहद चालाकी से अपने आप को दिल्ली के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित कर लिया.

६. चुनाव में मिली अपार सफलता से केजरीवाल के हौसले बुलंदियों छूने लगे और उन्होंने अपना ध्यान काम पर लगाने की बजाय केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के साथ झगड़ा करने में ज्यादा लगाया. वास्तव में ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य हमेशा अपने आप को सुर्खियों में रखना और अपने सहयोगियों से  जिनमें कई लोकप्रियता में उनके समकक्ष थे, से अपने आप को बेहतर साबित करना था. उन्होंने अपने ऐसे सहयोगियों को जिनसे भविष्य में उनको खतरा हो सकता था एक-एक करके पार्टी से बेदखल करना शुरू कर दिया. शांति भूषण , प्रशांत भूषण , संतोष हेगड़े,  कुमार विश्वास , आशुतोष कुमार , शाजिया इल्मी , कपिल मिश्रा आदि कुछेक नाम उल्लेखनीय है .




७. अगर अरविंद केजरीवाल का पिछले 5 साल का रिकॉर्ड देखा जाए तो जनता के हित में जो काम वह गिनाते है वह चालाकी भरे  शातिराना अंदाज ज्यादा दिखाई पड़ते हैं . जैसे 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली यानी अगर उपयोग 200 यूनिट के अंदर है तब तो बिजली का बिल माफ होगा अगर 200 यूनिट से एक यूनिट भी अधिक हो जाएगी तो उस बिल का पूरा भुगतान करना पड़ेगा. इसी तरह कुछ लीटर तक मुफ्त पानी . अभी हाल ही में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा शुरू की है. इसके अलावा कुछ और योजनाएं हैं जिनमें बजट खर्च के हिसाब से देखा जाए  तो कुछ काम किया हुआ लगता है लेकिन धरातल पर परिस्थितियां अलग हैं, इनमें से मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कुछ कार्य भी शामिल है.

८. अपनी हार भांपते हुए, आप ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस से गठबंधन करने की हर संभव कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी.  विधान सभा चुनाव के विपरीत 2019 में हुए लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने फिर अपनी सफलता दोहराते हुए अपने पिछले रिकॉर्ड में अत्यधिक सुधार करते हुए न केवल सभी 7 सीटें जीती वरन अपना मत प्रतिशत 46% से बढ़ाकर 56%  पर पहुंचा दिया. यह एक बड़ा कीर्तिमान है और अगर लोकसभा के चुनाव को एक संकेत माना जाए तो निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बननी चाहिए किंतु चुनाव का विशेषण और जमीनी हकीकत कुछ अलग है जो CAA प्रदर्शनों के बाद लगातार बदल रही है. एक और तकनीकी बात यह है,कि  लोकसभा का क्षेत्र काफी बड़ा होता है और एक लोकसभा के चुनाव में औसतन 10 विधानसभा की सीटें आती हैं इसलिए चुनाव क्षेत्र छोटा हो जाता है और यहां पर विभिन्न तरह के समीकरण काम कर जाते हैं और उससे थोड़े से मतों के अंतर से हार जीत हो जाती है. इस विधानसभा चुनाव में पिछले लोकसभा के चुनाव की तरह ही कांग्रेस  की स्थिति अत्यधिक खराब है .कांग्रेस  की खराब स्थिति भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी है. ऐसे मतदाता खासतौर से मुस्लिम मतदाता जो कांग्रेस को वोट करते थे अब बदले हुए माहौल में एक विशेष रणनीति के तहत आप पार्टी को वोट करेंगे. देश के अन्य हिस्सों में भी देखा गया है कि सामान्य तौर से मुस्लिम मतदाता उसी पार्टी को वोट करते हैं जो भारतीय जनता पार्टी को हराने की क्षमता रखता हो और क्योंकि वर्तमान समय में कांग्रेसका कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए कोई अन्य विकल्प न होने के कारण यह मत आम आदमी पार्टी के खाते में जाएंगे . इसलिए आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी हो सकता है . फिर भी मुकाबला बहुत दिलचस्प है क्योंकि आम आदमी पार्टी ने संशोधित नागरिक कानून के विरोध में जामिया से जेएनयू तक दिल्ली की सड़कों पर तांडव मचाने में एक वर्ग विशेष की बहुत सहायता की और यही नहीं इनके कुछ विधायकों और कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाने की शुरुआत भी की. वास्तव में जामिया से बवाल की शुरूआत  आप के नेता ने ही की बताई जाती है . आज भी शाहीन बाग में जो प्रदर्शनकारी धरने पर बैठे हैं उन्हें केजरीवाल सरकार का प्रत्यक्ष  समर्थन प्राप्त है और उन्हें बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है. आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुल्लाह और कई कार्यकर्ता प्रदर्शनकारियों के साथ भड़काऊ बयान देते हुए प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए देखे गए हैं. केजरीवाल ने स्वयं CAA  के विरुद्ध युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास किया.  मुस्लिम वर्ग में भय का माहौल पैदा करने मे लगे रहे. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने भी आग में घी डालने का हर संभव प्रयास किया उन्होंने आरोप लगाया की दिल्ली की पुलिस ने स्वयं दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन की बसों को आग लगाई जो कि निहायत गैर जिम्मेदाराना और गलत है. उनका ट्वीट अभी तक उनके अकाउंट में पड़ा है. वीडियो फुटेज और दूसरे प्रत्यक्षदर्शियों से पता चला की पुलिस ने इन बसों में पानी डालकर आग बुझाने का प्रयास किया. अरविंद केजरीवाल की बहुत ही नजदीकी और एनडीटीवी की पत्रकार ने इस बात का खुलासा किया है कि कैसे अरविंद केजरीवाल ने संशोधित नागरिक कानून की आड़ में हिंदू मुस्लिम भाईचारे को ठेस पहुंचाई. दोनों समुदायों का ध्रुवीकरण किया जाना एक सोची-समझी रणनीति है और इसका मकसद अल्पसंख्यकों वोट हासिल करना है. स्वाभाविक है कि दिल्ली में इस समय मतदाता दो ग्रुपों में बंटे हुए हैं अगर मुस्लिम मतदाता आम आदमी पार्टी को वोट देंगे  तो इसकी प्रतिक्रिया भी होगी और बहुत संभव है कि हिंदू मतदाता भी संगठित रूप से भाजपा को वोट करें और अगर ऐसा होता है तो आम आदमी पार्टी को जीतना  मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा.

९. अब बात करते हैं केजरीवाल  द्वारा किए गए उन कामों की जिनकी वजह से है कुछ खुद्दार लोगों को शर्म आती है उन्हें समर्थन करने से
·       अरविंद केजरीवाल ने अपने संघर्ष के दिनों से लेकर दिल्ली के चुनाव जीतने के पहले तक अपने आपको बेहद सीधा साधा इंसान साबित करने के लिए एक बेहद साधारण किस्म का मफलर लपेट रखा था, अब  पता नहीं वह कहां चला गया.
·       खांसी अरविंद केजरीवाल की पहचान थी अब गायब हो गई क्या यह बनावटी थी या सरकारी खर्चे पर सब कुछ हो सकता है.
·       परिवारवाद के विरुद्ध बोलने वाले केजरीवाल का पूरा परिवार आज चुनाव प्रचार में लगा हुआ है.
·       साईकिल और ऑटो से विधानसभा पहुंचने वाले केजरीवाल आज मुख्यमंत्री के पद का पूरा मजा ले रहे हैं .
·       आम आदमी का चोंगा लगाएं मुख्यमंत्री बनने के पहले से ही वह चंदे के पैसे से बिजनेस क्लास में सफर करते पाए गए .
·       पहली बार मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद भी मुख्यमंत्री को आवंटित बंगले को छोड़ने में आनाकानी करते रहे और कई महीने बाद छोड़ा .
·       हर ईमानदार और संघर्षशील साथियों  को चुन-चुन कर पार्टी से निकाल दिया उदहारण कुमार विश्वाश, आशुतोष, कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी , योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण आदि
·       जेएनयू जाकर टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ अपनी आस्था व्यक्त की यानी देश से बढ़ कर स्वार्थ .
·       इनके  प्रधान सचिव पर सीबीआई का छापा पड़ा और कई आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई
·       हाल ही में महिलाओं के लिए दिल्ली सरकार की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा
·       संशोधित नागरिक कानून के प्रति मुस्लिमों में भय का माहौल पैदा किया और पार्टी के मंत्रियों अन्य वरिष्ठ नेताओं ने जामिया से लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक हंगामा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
·       केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने विधानसभा के टिकट बेचे . इसके पहले भी  वह कुमार विश्वास का टिकट काटकर  एक उद्योगपति को राज्यसभा भेज चुके हैं.
·        केजरीवाल की बहुत नजदीकी और एनडीटीवी के पत्रकार ने उनके बारे में बहुत गोपनीय बातें साझा की जिसे पता चलता है कि हिंदू मुस्लिम समुदाय में ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया यानी सामाजिक सद्भाव से कोई लेना देना नहीं. समाज का क्या ? भारत का विभाजन भी हो जाय तो क्या ? सत्ता चाहिए. 
·       एक फ्री लांस पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई के साथ उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसे पता चला कि वह अपने साक्षात्कार कैसे मैनेज करते थे यानी इंटरव्यू भी नाटक.


  • उपराज्यपाल के साथ उन्होंने यहाँ तक  झगड़ा किया कि उनके कार्यालय में अनशन शुरू कर दिया . देश के इतिहास की शाय पहली घटना थी जब किसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी राज्यपाल के कार्यालय में कब्जा करके धरने पर बैठे थे.

·       गणतंत्र दिवस से कुछ पहले जबकि विदेशी मेहमान आ रहे थे, मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल धरने पर बैठे थे. यानी सविंधान की परवाह नहीं .
·       भारत में हो रहे हर किसी कार्य की बुराई करते हैं लेकिन उनके पास भी उसका कोई समाधान नहीं है
·       मोदी की जिन चीजों की वह बुराई करते हैं उन्हीं की बड़ी शिद्दत से नकल करते हैं जैसे कि अपने मां बाप से आशीर्वाद लेने की फोटो वायरल करते हैं. कैमरा उनके पीछे घूमता है.
·       दिल्ली का प्रदूषण केजरीवाल के लिए एक वार्षिक समारोह है, जिसमें वपड़ोसी राज्यों को रेली जलाने और दूसरी चीजों के लिए दोषी ठहराते हैं और फिर दिल्ली के करदाताओं  के खर्चे पर लगभग सभी टीवी चैनलों पर बड़े-बड़े प्रचार देकर प्रदूषण पर किए जाने वाले उपायों के बारे में बताते हैं . अपनी छवि चमकाने का सरकारी प्रयास यानी हरड़ लगे न फिटकरी रंग चोखो हो जाय.
·       प्रदूषण से मुक्ति के लिए Odd and Even मुहिम चलाते हैं और करोड़ों रुपए खर्च करके टीवी चैनल पर लंबे-लंबे प्रचार करके अपनी छवि चमकाते हैं इतने रुपयों से तो पूरी दिल्ली पर हेलिकप्टर से पानी का छिडकाव किया जा साकता था.
·       वेतन न मिलने से गुस्साए सफाई कर्मियों ने दिल्ली को बनाया कूड़ाघर. कूड़े का अम्बार लगा.

·       लगातार कहते रहते है कि मोदी काम नहीं करने देते तो अभी मोदी को कमसे कम २०२४ तक तो रहना है . कैसे करेंगे काम?
·       सादगी का ढोंग रचने वाले डिनर में मंगाते है बारह हजार प्रति प्लेट का खाना .
·       लालू से गले मिले पटना में और किया साथ साथ कम करने का वादा

·       भ्रष्टाचार के तमाम मामले सामने आये और जन लोकपाल के मुद्दे पर नेता बने केजरीवाल अपनी सरकार में भी लोकपाल नियुक्त नहीं कर पाए .
·       पार्टी के भ्रष्टाचार की जाँच के लिए एडमिरल रामदास को आन्तरिक लोकपाल बनाया गया था पता नहीं वह अब कहाँ हैं?
·       दिल्ली के करदाताओं का पैसा पूरे हिंदुस्तान में राजनैतिक उद्देश्य साधने में  बांट रहे हैं.
·       ट्रासपोर्ट मिनिस्टर को भ्रष्टाचार में स्तीफा देना पड़ा – ४५० करोड़ रुपये का नम्बर प्लेट घोटाला
·       कानून मंत्री तोमर की सभी डिग्री फर्जी पाई गयी और स्तीफा देना पड़ा.
·       मोहल्ला क्लिनिक एक अच्छा विचार लेकिन घोटालों की बुनियाद पर चल रहा है अत्यधिक किराये के मकानों से लेकर भ्रष्टाचार
·       २१ विधायक लाभ के पद पर बैठाये गए जिन्हेबाद में स्तीफा देना पड़ा . यानी रेवड़ी बाँटने में माहिर.
·       सेना के लिए अपमान सूचक शब्दावली
·       पुलवामा और एयर स्ट्राइक पर सबूत मांगे यानी राष्ट्रीय सुरक्षा से मतलब नहीं , देश के स्वाभिमान से कोइ लेनादेना नहीं .
·       केजरीवाल का वादा - काम कम, लड़ाई ज्यादा
·       अरुण जेटली सहित कई भाजपा और कांग्रेस के नेताओं पर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाये, बाद में कोर्ट में लिखित माफी मांगी
·       जनता की सहानभूति  अर्जित करने के लिए रोड शो में अपनी पार्टी के आदमी से  खुद को थप्पड़ मरवाया.


·       ईमानदारी का खोखला दावा फर्जी कंपनियों से भी चंदा लिया
·       राशन घोटाले सहित कई घोटालों में में आम आदमी पार्टी  का नाम आया
·       सगे संबंधियों को सरकारी ठेका देने का आरोप
·       करदाताओं से इकट्ठा सरकारी धन की बरबादी टीवी पर प्रचार के लिए यानी मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन
·       सेल कंपनियों से चंदा यानी सुचिता या पारदर्शिता की कोई अहमियत नहीं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन क्या सिर्फ नाटक और जनता के साथ छल ?
·       आप वोटरों को दस बिन्दुओं का गारंटी कार्ड जारी कर रही हैं यानी मतदाताओं को संतुष्टि न होने पर वे गारंटी इनवोक करेंगे  हैं ?


ये भारत  का दुर्भाग्य है कि आजादी के ७२ साल बाद भी आज देश की राजधानी सहित ज्यादातर विधानसभा और लोकसभा  चुनावों का आज भी मुद्दा होता है भूख , गरीबी , भ्रष्टाचारमहंगाई , कानून और व्यबस्था , और दमन . आज भी देश संघर्ष कर रहा है. असली मुद्दों पर तो चुनाव आ ही नहीं पाए हैं ५०० -१०००  रुपये के फायदे के लिए लोगों के वोट प्रभावित हो जाते हैं, और इसका नतीजा होता है बेहद चालबाज, भ्रष्ट और राष्ट्र हित में काम न करने वाले लोग  चुनाव  जीत कर  सरकार   बना लेते हैं. त्वरित लाभ के लिए बड़े विकास के प्रोजेक्ट आ ही नहीं पाते . भाजपा और आम आदमी पार्टी में किसकी सरकार बनती है यह तो निश्चित तौर पर आज नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात बिल्कुल संदेह से परे है कि  कांग्रेस  की दुर्गति होनी एकदम से तय है इसमें किसी तरह का कोई भी संदेह कांग्रेस पार्टी को भी नहीं है. यही बात भाजपा केलिए खतरे की घंटी हैं. अगर कांग्रेस का प्रदर्शन इन चुनावों में अच्छा रहा  तो निसंदेह भाजपा अपना लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराएगी. आज की तिथि में एक और फैक्टर काम कर रहा है वह है टीना (TINA) यानी  There Is No Alternate क्योंकि भाजपा और कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के नाम घोषित नहीं किये हैं इसलिए जनता में यही सन्देश जा रहा है कि कोई विकल्प नहीं है. 
                                       

सोमवार, 20 जनवरी 2020

JNU : हिंसा छात्रों की ...... जिम्मेदारी सरकार ??

जेएनयू में हुई हिंसा के लिए केंद्रीय गृहमंत्री , प्रधानमंत्री या केंद्र सरकार को दोष देना कितना उचित है इसका निर्णय आप मेरा लेख पढ़ने के बाद करेंगे तो मेहरबानी होगी। सबसे पहले इस बात पर विचार करना चाहिए कि जेएनयू में हिंसा क्यों हुई ? हिंसा के पीछे क्या संभावित कारण हो सकते हैं ? क्या इस हिंसा का सम्बन्ध जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से है ?

संशोधित नागरिक अधिनियम के खिलाफ दिल्ली में सबसे पहले प्रदर्शन जामिया में किए गए और इसने कुछ भी असामान्य नहीं क्योंकि हिंदुस्तान एक लोकतांत्रिक देश है और यहां विरोध करना संविधान प्रदत्त अधिकार है लेकिन अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का निर्वाहन भी बहुत जरूरी है। इसके पहले भी जामिया आतंकवादियों के मुठभेड़ के मामले में काफी चर्चा में रहा था और उसमें भी तथाकथित धर्मनिरपेक्षता वादी और लोकतंत्र की रक्षा करने के नाम पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों ने बहुत ही घड़ियाली आंसू बहाए थे और मुठभेड़ में एक शहीद पुलिस अधिकारी के विरुद्ध भी आरोप गढ़े गए थे। एक राष्ट्रीय पार्टी की तत्कालीन अध्यक्ष भी बिलख बिलख कर रोयी थी। जामिया में CAA के विरुद्ध हुए प्रदर्शन ने हिंसा का रूप ले लिया था । उपलब्ध वीडियो फुटेज और मौके पर मौजूद पत्रकारों के अनुसार प्रदर्शनकारी अपने साथ पत्थर के टुकड़े लाए हुए थे और भी पत्थर छोटी छोटी गाड़ियों में , टेंपो आदि में भरकर लाये जा रहे थे । कई ऐसे प्रदर्शनकारी थे जिनके बैग में पत्थर भरे हुए थे और उन्होंने पत्थरों का इस्तेमाल पुलिस पर किया। कश्मीर के बाहर पुलिस पर यह अपनी तरह की पत्थरबाजी की पहली घटना है । इसके पहले पत्थरबाजी सेना और पुलिस पर केवल कश्मीर घाटी में होती थी। इस प्रदर्शन में प्रदर्शनकारी पत्थरबाजी करते हुए जामिया के कैंपस के अंदर चले गए और लगातार वहां से पत्थरबाजी होती रही। कहा जाता है कि पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने जामिया के उच्च प्रबंधन से संपर्क किया लेकिन कोई जवाब न मिलने पर पुलिस को जामिया के अंदर प्रवेश करना पड़ा और ऐसा करना इस पत्थरबाजी के रूप में हो रही आतंकवाद की इस घटना को रोकने के लिए जरूरी था। जामिया कैंपस के अंदर बड़ी मात्रा में फर्जी आईडी कार्ड बरामद किए गए जिससे पता चलता है कि प्रदर्शन और पत्थरबाजी की घटना कितनी पूर्व नियोजित थी और जामिया के अंदर नियमित स्टूडेंट्स के अलावा भी उपद्रवी लोग रहते थे या उस समय मौजूद थे। इस घटना की पीछे की साजिश का पर्दाफाश होते ही साजिशकर्ता और उनके तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्रवादी लोग सक्रिय हो गए और इस पूरी घटना की भर्त्सना इस कदर की गई कि कई दिन तक टीवी चैनलों और समाचार पत्रों में सुर्खियां बटोरते रहे। बहुत दुर्भाग्य पूर्ण बात है कि कुछ बड़े नेताओं ने जामिया की तुलना जलियांवाला कांड से की और विपक्ष के लगभग हर छोटे-बड़े नेता ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के खिलाफ बिगुल बजा दिया । जामिया हिंसा का प्रचार करने के लिए समाचार पत्रों, टीवी और सोशल मीडिया का भरपूर दुरुपयोग किया गया और पूरे देश में एक लहर बनाने की कोशिश की गई कि केंद्र की भाजपा सरकार छात्र विरोधी है, मुस्लिम विरोधी है, और एक निश्चित हिंदुत्व के एजेंडे पर काम कर रही है। विपक्ष के सभी राजनीतिक दलों और तथाकथित प्रगतिशील विचारों वाले लोगों और लुटियन दिल्ली की सत्ता में स्थापित कई विद्वान लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। अब यह परिपाटी बन गई है कि जब भी नरेंद्र मोदी और अमित शाह का विरोध होता है , तथाकथित पेशेवर धर्मनिरपेक्ष संत और विद्वान लोग इतना आगे निकल जाते हैं कि उन्हें मोदी विरोध और देश विरोध में कोई अंतर समझ में नहीं आता।

जामिया के प्रदर्शन मैं जेएनयू स्टूडेंट भी शामिल हुए और उन्होंने पुलिस के खिलाफ दिल्ली पुलिस मुख्यालय घेर कर लगातार प्रदर्शन किया। जेएनयू के पेशेवर छात्रों और उनके राजनीतिक संरक्षकों ने आंदोलन को जेएनयू कैंपस तक ले आने के लिए जी तोड़ प्रयास किया और पुराने गड़े मुर्दे उखाड़े गए । एक हिंदूवादी विचारधारा से संबंधित छात्रों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा गया। कोशिश की गई कि किसी भी तरीके से जेएनयू को पुनः आंदोलन का बड़ा केंद्र बनाया जाए। इसके लिए एक विशेष विचारधारा से संबंधित स्टूडेंट्स यूनियन ने दूसरे विचारधारा से संबंधित लोगों को चेहरे ढक कर और मास्क लगाकर आक्रमण किया। इससे कई लोगों को चोटें आई। पुलिस जेएनयू के गेट पर पहुंच गई लेकिन कहते हैं कि दूध का जला मट्ठा भी फूंक फूंक कर पीता है। जामिया कांड में पुलिस पर दोषारोपण किया गया था कि वे बिना इजाजत के कैंपस में कैसे घुसी ? जिसमें जावेद अख्तर से लेकर कई गणमान्य स्वयंभू लोग शामिल है। दिल्ली पुलिस जेएनयू के अंदर नहीं घुसी और और जेएनयू गेट पर ही योगेंद्र यादव जैसे छात्रों के परम हितैषी चिल्लाते देखे गए कि पुलिस अंदर क्यों नहीं जा रही है। और बेचारी पुलिस ! अंदर जाए तो मुश्किल और न जाए तो मुश्किल। एक बड़े नेता को इतना दुख पहुंचा की उन्होंने इस मारपीट की घटना में 26/11 याद आ गया ।

अब जेएनयू के अंदर हुई हिंसा की एक उच्चस्तरीय जांच की जा रही है और कई वीडियो और सीसीटीवी फुटेज सामने आ गए हैं जिसे पता चलता है कि इस काण्ड में कई ऐसे छात्र और छात्र संगठन शामिल है जो पुलिस और सरकार पर हिंसा का आरोप लगा रहे थे । पुलिस ने ऐसे कई छात्रों को नामजद किया है और उनसे पूछताछ की जा रही है। एक बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि जेएनयू स्टूडेंट का एक वर्ग बहुमुखी प्रतिभा का इतना धनी है की कई घटनाओं को नाटकीय अंदाज में अंजाम दिया जाता है जैसे कि कोई नुक्कड़ नाटक। 5 जनवरी को जेएनयू के अंदर हुई हिंसा की चपेट में बहुत से छात्र आए और कई को ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस में भर्ती कराया गया लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि उन छात्रों के वहां पहुंचने के पहले ही कई राजनेता उनकी मिजाज पुर्सी के लिए पहुंच गए थे जैसे कि उन्हें मालूम था कि अब क्या होने वाला है। कुछ चोटिल / घायल छात्रों का फोटो विश्लेषण किया गया और पाया गया कि उनमें से कई की चोटों के स्थान बदल गए है ।जिस के बाएं हाथ में पट्टी बंधी थी , दूसरे दिन वह दाएं हाथ पर पहुंच गई । कई लोगों की गंभीर चोटों के घाव जिनमें 20 से 22 टांके लगे बताए गए थे, वह एक-दो दिन में ही ठीक हो गए और वे पट्टी बांध कर टीवी इंटरव्यू देते रहे और पुलिस के विरुद्ध प्रदर्शन भी करते रहे।

इन प्रदर्शनों में जो जेएनयू से लेकर इंडिया गेट तक और शाहीन बाग से लेकर जंतर-मंतर तक फैलते रहे, धारा 370 और कश्मीर की आजादी से संबंधित पोस्टर भी लहराए गए और नारे भी लगाए गए। इन प्रदर्शनों की एक सबसे खास बात अबकी बार यह रही कि इसमें हिंदुत्व को निशाना बनाया गया जो वास्तव में धर्म नहीं है और हिंदुत्व से आजादी के नारे भी लगाए गए । भाजपा मुर्दाबाद, मोदी ,अमित शाह मुर्दाबाद के नारों से तो शायद किसी को एतराज नहीं होगा लेकिन "हिंदुत्व की कब्र खुदेगी" के नारों से पूरा देश आक्रोशित है क्योंकि हिंदुत्व, धर्म नहीं एक जीवन विधा है और हिंदुस्तान की आत्मा है। इस तरह की वीडियो फुटेज कई टीवी चैनल पर दिखाए गए हैं। इससे ऐसा लगता है कि जो प्रदर्शन जेएनयू में हुए उसमें न तो छात्रों से संबंधित कोई मुद्दे थे और न ही संशोधित नागरिक कानून से संबंधित, बल्कि चिर परिचित मुद्दे जिसके केंद्र में कश्मीर और धारा 370, हिंदू , मोदी और अमित शाह थे।


इस बीच अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन हुए और वहां भी हिंदुत्व से आजादी और सावरकर मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाए गए । अलीगढ़ के पुलिस अधिकारी जिनके कई वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहे हैं उनकी तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने बहुत ही अच्छे तरीके से स्टूडेंट को समझाने की कोशिश की और बिना बहुत ज्यादा बल प्रयोग किए हुए आंदोलन पर काबू पाया। यूनिवर्सिटी का प्रबंध तंत्र भी प्रशंसा का पात्र है जिसने समय रहते ही पुलिस को कैंपस में आने की छूट देकर , सार्वजनिक संपत्ति और जान माल के नुकसान को बचाने का प्रयास किया। एक और यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शन हुए उसका नाम है जाधवपुर यूनिवर्सिटी लेकिन उस यूनिवर्सिटी की घटनाएं मीडिया की सुर्खियां नहीं बन सकी क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री स्वयं विरोध का झंडा लेकर धरना और प्रदर्शनों की अगुवाई कर रही हैं। CAA पर तो उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को भी एक पक्ष बनाने की अपील की, जनमत संग्रह कराने की बातें की और भी जो कुछ उनकी वोट बैंक की राजनीति के लिए आवश्यक था, कहा और किया जिससे पूरे विश्व में हिंदुस्तान की किरकिरी हुई। उनकी इन हरकतों से न केवल केंद्र सरकार बल्कि राज्य सरकार की संपत्तियों का भी अत्यधिक नुकसान हुआ। ज़ाहिर सी बात है वे मीडिया में छाई रही और जाधवपुर यूनिवर्सिटी सुर्खियों मे नहीं आ सकी। लेकिन वहां भी राज्यपाल के साथ दुर्व्यवहार, दूसरी विचारधारा के छात्रों के साथ मारपीट जैसे सभी कार्य किए गए जो जेएनयू की पहचान होते है ।

इससे यह अंदाजा लगाना बहुत आसान है कि यह प्रदर्शन चिर परिचित प्रदर्शन है और इनके पीछे वही शक्तियां काम कर रही हैं जो हिंदू और मुसलमान को बांटना चाहते हैं और पूरे देश में अराजकता की स्थिति लाना चाहती हैं। ऐसा करने वाले कौन लोग हो सकते हैं ? उत्तर बहुत आसान है ऐसा करने वाले हमारे पड़ोसी देश हो सकते हैं और ऐसे देश हो सकते हैं जो भारत को फलता फूलता नहीं देख सकते जिन्हें भारत में हो रही प्रगति बर्दाश्त नहीं हो सकती। ऐसे देश और ऐसी संस्थाएं इस तरह के आंदोलनों को बढ़ावा दे रही हैं और उसमें अनाप-शनाप पैसा भी खर्च कर रही है। और कुछ राजनैतिक दल जिन की दुकानें बंद हो चली है और कई ऐसे बिचौलिए है जो छोटे-मोटे ठेकों से लेकर रक्षा सौदा तक दलाली करते थे वह भी बेरोजगार हो गए हैं एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल तो सत्ता की आकांक्षा में कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार है , चाहे मोदी के विरुद्ध विदेशों में प्रदर्शन करना पड़े , चाहे पाकिस्तान का साथ देना पड़े या पूरे देश को आग के हवाले करना पड़े। और तो और चाहे देश का एक और विभाजन करना पड़े......सत्ता चाहिए।

क्या 2014 से पहले किसीको मालूम था कि ....

जेएनयू में राष्ट्र विरोधी नारे भी लगाए जाते हैं?
जेएनयू में 40 से 50 साल की उम्र तक छात्र पढ़ते हैं?
जेएनयू में शिक्षक भी हड़ताल और धरना प्रदर्शन में शामिल हो जाते है?
जेएनयू में हिंदू धर्म को खुलेआम गाली दी जाती है?
जेएनयू में खुलेआम हिंदुस्तान से आजादी की मांग की जाती है?
जेएनयू वामपंथी विचारधारा का गढ़ है जहां पढ़ाई लिखाई और राष्ट्रहित के कामों से बामपंथी विचारधारा सर्वोपरि है?

आज जेएनयू सहित कई ऐसी संस्थाएं इस देश में है जो देश के हितों के विरुद्ध काम कर रही हैं और इनमें अराजकता की फैक्ट्रियां चल रही है इन्हें चलाने वाले उसी विचारधारा के लोग हैं जो कभी विभाजन से पहले मुस्लिम लीग की विचारधारा थी । इन्हें देश से कुछ मतलब नहीं है , देश के लोगों से कुछ भी लेना देना नहीं है इन्हें सिर्फ आज की चिंता है यह लोग वर्तमान में जीने वाले लोग हैं ये अपने आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए भी नहीं सोचते हैं। देश बचेगा या नहीं बचेगा इनकी समझ से बाहर है और शायद इसीलिए ये कश्मीर कीआजादी , टुकड़े-टुकड़े गैंग की हिमायत , आतंकवादियों के मानवीय अधिकारों की वकालत, हिंदुत्व की कब्र खोदने के नारे लगाने का काम कर रहे हैं और संविधान बचाने की कसमें खा रहे हैं । पर वास्तविकता में सिर्फ और सिर्फ इनका स्वार्थ है। रही बात मोदी की ? तो कौन खुश है इस व्यक्ति से ? न विपक्ष के लोग, न अपनी पार्टी के लोग, न नौकरशाह , न पत्रकार और न ही न्यायपालिका । क्या यह व्यक्ति जो कर रहा है वह सिर्फ अपने लिए कर रहा है ? अपने स्वार्थ के लिए कर रहा है ? नहीं ये यह भारत के भविष्य के लिए कर रहा है, भावी पीढ़ियों के लिए कर रहा है, भारत बचाने केलिए कर रहा है क्योंकि जब भारत ही नहीं बचेगा तो कुछ भी करने का क्या फायदा ? ये लोगो को समझ में नहीं आ रहा। और अमित शाह ..........वह केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के साथ पूरी मजबूती से खड़ा हुआ है। देश के लिए वह काम कर रहा है , वह कार्य जो पिछले 70 सालों में कोई करने की हिम्मत नहीं जुटा सका । देश की अधिसंख्य जनता इन कार्यों की बड़ी शिद्दत और उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी और यही शक्ति है जो मोदी और अमित शाह के साथ है। हमें एकजुट होकर इनका इस्तीफा मांगने की जरूरत नहीं है बल्कि सामूहिक रूप से इनका उत्साहवर्धन करने की जरूरत है , हर उस कार्य के लिए जिससे देश मजबूत होता हो , तुष्टिकरण समाप्त होता हो, हिंदुत्व जो धर्म नहीं जीने की कला है , जीवन जीने की एक कला है, हिंदुस्तान की आत्मा है , की रक्षा हो सके। भारतवर्ष अपने पुराने गौरव को पुनः प्राप्त कर सके।
याद रखिए आज देश में लगभग वैसी ही परिस्थितियां हैं जैसे विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के समय थी। जब हिंदुस्तान के राजा आपस में एकजुट नहीं थे , देश में एकजुटता नहीं थी और जिसका फायदा उठाकर आक्रांताओंं ने इस देश की आत्मा को छलनी कर दिया और देश हजारों साल तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा रहा। आज .........आप की एक गलती , आपकी आने वाली पीढ़ियों को फिर से दासता की दहलीज के अंदर धकेल सकती है ।

बुधवार, 27 फ़रवरी 2019

विपक्ष ने देश को किया शर्मसार

आज कुछ राजनैतिक दलों ने, जिसमे कुछ का दिल पकिस्तान के काफी नजदीक हैं, ने मीटिंग कर पाकिस्तान को एक नया हथियार दे दिया है . राहुल की अगुआई में पढ़े गए एक वक्तब्य में पुलवामा के शहीदों के राजनीतिकरण के लिए सरकार की निंदा के गयी . यानी ४५ जवानों की शहादत के बाद सरकार को जैश के ठिकाने ध्वस्त नहीं करने चाहिए थे क्योंकि ऐसा न हो कि मोदी को कोई राजनैतिक फायदा हो जाये और उन्हें नुकसान.
राहुल की विद्वता पर तो किसी को कोई संदेह नहीं है, सभी जानते हैं किन्तु चन्द्र बाबू नायडू , ममता आदि को क्या कहा जाय जो आज राहुल के पिछलग्गू हो गए ? आज राहुल पाकिस्तान और हिन्दुस्तान दोनों जगह हेड लाइंस में हैं . पकिस्तान की सेना का खोया विश्वाश लौटने लगा है . हिन्दुस्तान के विपक्ष के समर्थन से उनके चेहरे पर मुस्कान आ गयी है. क्या देश को लोग वेबकूफ है जो ये नहीं समझ पाएंगे कि मोदी विरोध और राष्ट्र विरोध में क्या अंतर है ?
इसके पहले पकिस्तान द्वारा जितने भी आक्रमण / अतिक्रमण हुए , विपक्ष ने हमेशा सरकार का साथ दिया क्योकि यदि सरकार का मनोबल कमजोर होगा तो पकिस्तान के खिलाफ कोइ सख्त कदम नहीं उठाया जा सकेगा जिससे सैनिको का मनोबल टूटेगा और ये युद्ध जीता नहीं जा सकेगा .
आज सेना की जीत को विपक्ष ने लगभग हार में बदल दिया . ऐसे समय जब पूरा विश्व हिन्दुस्तान का समर्थन कर रहा है , हिन्दुस्तान का विपक्ष, हिन्दुस्तान के विरोध में उतर कर देश को शर्मसार कर रहा है .

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

कांग्रेस का महाभियोग ......या महाभूल ....


कांग्रेस और उनके सात सहयोगी दलों के राज्यसभा सदस्यों ने सर्वोच्च न्यायलय के मुख्य न्यायधीश श्री दीपक मिश्र के विरुद्ध महा अभियोग प्रस्ताव जो प्रस्ताव लाया था उसे उप राट्रपति ने अस्वीकार कर एक बड़े नाटक पटाक्षेप कर दिया . सुगबुगाहट तो बहुत दिनों से थी लेकिन इसे तब लाया गया जब दीपक मिश्र ने जज लोया की मौत के पुन: जाँच से इंकार कर दिया . आखिर क्या मनसा है कांग्रेस की .
चीफ जस्टिस 2 अक्टूबर को रिटायर होने वाले हैं और कांग्रेस के सहयोगी दलों के पास इतनी संख्या बल नहीं कि महाभियोग पास करा सकें तो फिर ये महाभियोग का नाटक क्यों? क्या इसका एकमात्र मकसद न्याय पालिका को धमकाना है कि अगर कांग्रेस की मांग नहीं मानी तो इज्जत बेइज्जत करेंगे और उन पर आरएसएस और बीजेपी का ठप्पा लगा देंगे ताकि भविष्य में उन्हें कोइ पद और प्रतिष्ठा न मिल सके . इस तरह के हथकंडे भारत जैसे विशाल देश में बहुत काम करते है . जिलों और तहसील स्तर पर यही हो रहा है . अधिकांश अधिकारी हार मान लेते है क्योकि कोई लफड़े में पड़ना नहीं चाहता . मै स्वयं जिलों में पोस्टिंग के दौरान ऐसा महसूस करता रहा हूँ.
राम मंदिरमुद्दे की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल मामले की सुनवाई २०१९ के बाद करे जिसे दीपक मिश्रा की बेंच ने नही माना और कांग्रेस के निशाने पर आ गए . स्वाभाविक लगता है कि ये महाभियोग का पूरा नाटक मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वकील और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल के दिमाग की उपज है।
दरअसल राम मंदिर पर नियमित सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में शुरू होने वाली है और उस बेंच को यही दीपक मिश्रा ही लीड करने वाले हैं. सुनवाई तेज़ी से होगी और चूंकि सारे साक्ष्य चाहे वो लैंड रिकार्ड्स हो या पुरातात्विक सब हिन्दू पक्ष में हैं। कांग्रेस को डर है राम मंदिर के पक्ष में फैसला 2019 के चुनाव से पहले आया तो सीधा फायदा बीजेपी को होगा।फिर आखिर महाभियोग से क्या होगा? अगर उप राट्रपति ने इसकी जाँच शुरू कर दी होती या जब सदन में महाभियोग का प्रस्ताव रखा जाता तो नियमानुसार मुख्य न्यायाधीश किसी केस की सुनवाई तब तक न कर सकते जब तक जाँच पूरी न हो और प्रस्ताव पर वोटिंग न हो। कांग्रेस जानती है के जाँच में समय लगेगा और जब तक वोटिंग होगी 3 महीने गुज़र चुके होंगे। उसे पता है के महाभियोग का प्रस्ताव गिर जाएगा लेकिन तब तक केस का काफी समय बर्बाद हो चुका होगा फिर दीपक मिश्रा के पास इतना समय नही होगा के अपने रिटायरमेंट तक केस को निपटा पाएं। 2 अक्टूबर के बाद मुख्य न्यायाधीश बनेंगे रंजन गोगोई । बाकी खेल क्या होगा कहने की ज़रूरत नही है। क्या कांग्रेस राम मंदिर निर्माण रुकवाने के लिए इतना नीचे गिर रही है ?
सबसे अच्छी बात ये रही कि कई कांग्रेस जनों ने भी महा अभियोग का साथ नहीं दिया . अब पूरे नाटक का पटाक्षेप हो गया है ऐसा नहीं है क्योकि कपिल सिब्बल ने कहा है वे उप राष्ट्रपति के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जायेंगे . किसी ऐसी बेंच के सामने उपस्थिति नहीं होंगे जिसमे दीपक मिश्र हों . जाहिर है संवैधानिक पदों पर बैठे लोगो की लानत मलानत करने, डराने धमकाने की निम्न स्तरीय राजनीति अभी होती रहेगी . उन्हें किसी का भी भरोसा नहीं चाहे वह न्यायपालिका हो, सीबीआई हो, राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति हों, लोकसभा या राज्यसभा के अध्यक्ष या उपसभापति हों या राज्यपाल हों . जबतक कांग्रेस के पक्ष में फैसला नहीं तब तक उसका विश्वास नहीं.

शायद हिंदुस्तान और इसके लोकतंत्र की अभी और दुर्गति होना बाकी है. 
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मंगलवार, 20 मार्च 2018

नवरात्रि का तीसरा दिन : मां चंद्रघंटा


आज नवरात्रि का तीसरा दिन है .

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।"
माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।
पिण्डजप्रवरारुढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता | प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता”
नवरात्र के तीसरे दिन का महत्व
अपने चंद्रघंटा स्वरूप में मां परम शांतिदायक और कल्याणकारी हैं. उनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है. इसलिए मां के इस रूप को चंद्रघण्टा कहा जाता है. इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है. इनका वाहन सिंह है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की मुद्रा है. मां चंद्रघंटा तंभ साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती है और ज्योतिष में इनका संबंध मंगल ग्रह से होता है. इनकी पूजा करने से भय से मुक्ति मिलती है और अपार साहस प्राप्त होता है. माँ का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।माँ का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। माँ चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहाँ भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।
माँ के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया साधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भाँति करते रहते हैं

माँ चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमो नमः।"
अर्थ : हे माँ! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ। हे माँ, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।
इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएँ। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए
कैसे करें पूजन
मां चंद्रघंटा को लाल फूल चढ़ाएं, लाल सेब और गुड़ चढाएं, घंटा बजाकर पूजा करें, ढोल और नगाड़े बजाकर पूजा और आरती करें, शुत्रुओं की हार होगी. इस दिन गाय के दूध का प्रसाद चढ़ाने का विशेष विधान है. इससे हर तरह के दुखों से मुक्ति मिलती है.
मां चंद्रघंटा के इस मंत्र का करें जाप:
पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
इस मंत्र का जाप भी होता है शुभकारी:
ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः
माँ चंद्रघंटा  माँ पार्वती का सुहागिन स्वरुप है. इस स्वरुप में माँ के मस्तक पर घंटे के आकार  का चंद्रमा सुशोभित है इसीलिए इनका  नाम चन्द्र घंटा पड़ा. माँ चंद्रघंटा की आराधना करने वालों का अहंकार नष्ट होता है एवं उनको असीम शांति और वैभवता की प्राप्ति होती है.  माँ चंद्रघंटा के ध्यान मंत्र, स्तोत्र एवं कवच पाठ से साधक का मणिपुर चक्र जागृत होता है जिससे  साधक को  सांसारिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है. 
प्रथम नवरात्र के वस्त्रों का रंग एवं प्रसाद
नवरात्र के तीसरे दिन आप पूजा में हरे  रंग के वस्त्रों का प्रयोग कर  सकते हैं. यह दिन ब्रहस्पति पूजा के लिए सर्वोत्तम दिन है. तीसरे  नवरात्रि के दिन दूध या दूध से बनी मिठाई अथवा खीर का भोग माँ को लगाकर ब्राह्मण को दान करें। इससे जीवन में  सभी  प्रकार के कष्टों का निवारण होता है
ध्यान मंत्र
वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।
सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥
मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।
खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥
पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥
प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।
कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥
स्तोत्र पाठ
आपदुध्दारिणी त्वंहि आद्या शक्तिः शुभपराम्।
अणिमादि सिध्दिदात्री चंद्रघटा प्रणमाभ्यम्॥
चन्द्रमुखी इष्ट दात्री इष्टं मन्त्र स्वरूपणीम्।
धनदात्री, आनन्ददात्री चन्द्रघंटे प्रणमाभ्यहम्॥
नानारूपधारिणी इच्छानयी ऐश्वर्यदायनीम्।
सौभाग्यारोग्यदायिनी चंद्रघंटप्रणमाभ्यहम्॥

कवच
रहस्यं श्रुणु वक्ष्यामि शैवेशी कमलानने।
श्री चन्द्रघन्टास्य कवचं सर्वसिध्दिदायकम्॥
बिना न्यासं बिना विनियोगं बिना शापोध्दा बिना होमं।
स्नानं शौचादि नास्ति श्रध्दामात्रेण सिध्दिदाम॥
कुशिष्याम कुटिलाय वंचकाय निन्दकाय च न दातव्यं न दातव्यं न दातव्यं कदाचितम्॥



रविवार, 28 जनवरी 2018

दर्द है ..जो रह रह कर छलकता है .....

रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन का कार्य काल मोदी सरकार ने नहीं बढ़ाया था . कारण चाहे जो भी हों लेकिन उन्होंने इसे सहजता से नहीं लिया था और कुछ विशेष राजनैतिक पार्टियों ने ऐसा माहौल बना दिया था कि मानों देश बिना रघुराम राजन के नहीं चल सकता था और राजन सिर्फ देश सेवा के लिए ही विदेश से यहाँ आये थे और उनका कार्यकाल न बढ़ाना शायद मोदी जी का देश विरोधी काम था . स्वाभाविक है, दर्द तो होना ही था . अब जब भी मौका मिलता है वे वर्तमान सरकार की निंदा करना नहीं भूलते . अक्सर बुद्धजीवी तरह के लोग ऐसा करते हैं और उनकी यही आदत उन्हें सामान्य व्यक्ति से भी कम कर देती है . अतीत में हमने कई अमर्त्यसेन भी देखे हैं .


प्रधान मंत्री मोदी के बाद रघुराम राजन भी दावोस पहुंचे और उन्होने मोदी के भाषण सहित हिन्दुस्तान की अर्थ व्यवस्था की गहन समीक्षा कर उसके नकारात्मक पहलुओं को प्रस्तुत किया . यहाँ यह ध्यान रखना उचित है कि अब उनकी पहचान भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर की होती है न कि किसी अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर की . अबकी बार उन्होंने अपने वक्तव्यों के राजनैतिक पुट भी दे दिया और मोदी ने जो लोकतान्त्रिक और विकाशशील हिंदुस्तान की झलक पेश की थी उस पर सवाल उठाये . उन्होंने मोदी के वक्तव्य " भारत में लोकतंत्र बहुरंगी आबादी और गतिशीलता देश का भाग्य तय कर रहें हैं और इसे विकाश के रस्ते पर ले जा रहे हैं ." की जमकर धाज्जिया उडाई . उन्होंने संदेह व्यक्त किया कि मोदी सरकार का काम काज लोकतान्त्रिक है ? उन्होंने कहा कि सरकार में सिर्फ कुछ लोग फैसले लेते हैं और नौकरशाहों को दरकिनार कर दिया गया है . समझा जा सकता है कि कांग्रेस और राजन का सूचना श्रोत एक ही है .


विश्व पटल पर हिन्दुस्तान की नकारात्मक छवि पेश करने से सभी को बचना चाहिए भले ही कितने ही राजनैतिक मतभेद क्यों न हों . 
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