गुरुवार, 19 जनवरी 2023
मंगलवार, 17 जनवरी 2023
जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड
जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड
योगी
आदित्यनाथ के हाल के मुंबई दौरे में हिंदी फिल्म जगत के लोगों से भी उनकी वार्ता
प्रस्तावित थी जिसका मुख्य विषय उत्तर प्रदेश के नोएडा में बन रही फिल्म सिटी था
किंतु विषय से अलग हटकर सुनील शेट्टी द्वारा योगी से बायकाट बॉलीवुड रोकने का आग्रह किया गया. सुनील शेट्टी ने जितने आत्मविश्वास से यह कहा कि
योगी और मोदी बॉयकॉट रुकवा सकते हैं, उससे न केवल उनकी बुद्धि
विवेक का पता चला, बल्कि यह भी उजागर हुआ कि वह किसी अन्य का मुखौटा बनकर बॉलीवुड
का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जैसा अपेक्षित था, सुनील शेट्टी
के इस बयान का वीडियो मीडिया में वायरल हो गया, इस
प्रकार एक बार फिर “बायकॉट बॉलीवुड” सुर्खियों में आ गया.
बॉयकॉट
यानी बहिष्कार, विरोध का गांधीवादी तरीका है,
जिसे स्वयं तथाकथित महात्मा ने कई बार आजादी के आंदोलन में प्रयोग
किया था और देशवासियों
को भी उससे जोड़ा था. बहिष्कार से दो प्रभाव होते हैं - एक तो समस्या चर्चा के
केंद्र में आ जाती है और दूसरा इसके समर्थक आपस में जुड़ जाते हैं. इस समूह के लोग
समस्या के पक्ष विपक्ष के विचारों का आदान प्रदान करते हैं. इस
प्रकार जागरूकता का दायरा बड़ा होता जाता है. यही बहिष्कार की सबसे बड़ी शक्ति है.
प्रश्न है कि जिस अहिंसक हथियार का प्रयोग स्वाधीनता संग्राम में किया गया,
उसी अहिंसक हथियार का विरोध आज क्यों किया जा रहा है. यह बहिष्कार
किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि
फिल्मों में सनातन संस्कृति का विकृत चित्रण और हिंदुओं के खिलाफ दिखाई जा रही
आपत्तिजनक सामिग्री के विरोध में है. हिंदी फिल्मों में अश्लीलता स्तर यह हो गया है
कि शायद ही कोई फिल्म अब ऐसी आती हो जो परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके.
इसके
विपरीत दक्षिण भारत की फिल्में आज भी भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होती हैं और यही
उनकी सफलता का रहस्य भी है. दर्शक दक्षिण भारत की फिल्मों के नायक नायिकाओं को
देवतुल्य मानते हैं और जब भी कभी उनकी कोई नई फिल्म आती है तो लोग पटाखे फोड़ते
हैं,जश्न मनाते हैं. लोगों में होड़ लग जाती है कि कैसे फिल्म को पहले दिन पहले शो
में देखा जाय. दक्षिण भारत की ज्यादातर फिल्में जो हिंदी में डब की जाती हैं, वह भी सुपरहिट हो जाती हैं. इनमें ऐसा क्या खास होता है, यह हिंदी फिल्म जगत को समझ में क्यों नहीं आता. दक्षिण भारत की फिल्मों के
विरुद्ध कभी बहिष्कार या विरोध प्रदर्शन की नौबत नहीं आई बल्कि इसके नायक - नायिकाओं
के प्रति दर्शकों में सम्मान की भावना का ज्वार इतना अधिक होता है कि जब कभी वे सार्वजनिक
जीवन में आते हैं तो सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले जाते हैं. आंध्र प्रदेश और
तमिलनाडु में ऐसे नायक और नायिकाएं मुख्यमंत्री बने और
जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया. इसके विपरीत हिंदी फिल्म जगत में मदांध नायक स्वयं
अपने को किंग और बादशाह घोषित कर देते हैं.
जहां
तक योगी से की गई अपील का प्रश्न है, तो उसमें गंभीरता का अभाव है. ऐसा लगता है कि सुनील शेट्टी ने निहित
स्वार्थ के कारण योगी की इन्वेस्टर्स मीट में जानबूझकर यह शिकायत उछाली. अगर
उनकी अपील में गंभीरता थी तो इसके पहले उन्होंने योगी से संपर्क क्यों नहीं किया. यदि
उनमें साहस था तो उन्हें अपनी बात बॉयकॉट ट्रेंड चलाने
वालों के समक्ष रखनी चाहिए थी और उनका पक्ष भी समझना चाहिए था. अगर उन्हें यह भी
नहीं मालूम कि बॉलीवुड का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है, तो
फिर वह जनता और समाज से पूरी तरह से अलग-थलग है और यही बॉलीवुड की सबसे बड़ी
समस्या भी है. शेटटी ने अप्रत्यक्ष रूप से योगी और मोदी दोनों को बॉलीवुड बॉयकॉट के समर्थक और संरक्षक के रूप
में आरोपित भी कर दिया.
आजादी
के बाद से ही बॉलीवुड में वामपंथ - इस्लामिक गठजोड़ के स्वयंभू उदारवादियों ने
कब्जा कर लिया था. हिंदू देवी देवताओं का अपमान करके हिंदू धर्म को निकृष्ट साबित
करने का कार्य उसी समय से शुरू कर दिया गया था ताकि विश्व की सबसे प्राचीन सनातन
संस्कृति को धीमा जहर दे कर मारा जा सके. हिंदू धर्म और संस्कृति को हिंदुओं की
नजरों में ही इतना विकृत कर दिया जाए कि उनका विश्वास डगमगाने लगे. इसके विपरीत एक
धर्म विशेष को बहुत बड़ा चढ़ाकर आदर्श स्थिति में प्रस्तुत किया जाए कि लोग इसके
प्रति आकर्षित हों. इन दोनों योजनाओं का एक ही उद्देश्य था हिंदुओं को आसान शिकार बनाकर धर्मांतरण को गति प्रदान करना. इसमें फिल्म जगत के छोटे बड़े सभी कलाकार शामिल हैं. इसके
लिए छल कपट का सहारा लिया गया और हिंदुओं को भ्रमित करने के लिए कई मुस्लिम कलाकारों ने अपने हिन्दू नाम रख लिए. विडंबना है कि ज्यादातर
हिंदू कलाकार भी इसी टोली में शामिल हो गए. आश्चर्यजनक है कि यह तब हो रहा था जब
हिंदी फिल्म उद्योग की कमाई का 95% हिस्सा हिंदुओं से आ रहा था.
इस
दुष्प्रचार का असर यह हुआ है कि आज हिंदुओं में बड़ी संख्या में इसे लोग हैं
जो अपने हिंदू धर्म के विरुद्ध ऊटपटांग टिप्पणियां करते हैं. सामान्य हिंदू वर्ग इतना
सहिष्णु है कि कभी दूसरे धर्मों का अपमान
नहीं करता, इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय में ऐसे निम्न मानसिकता वाले तथाकथित बड़े
शायर, गीतकार, टिप्पणीकार, चित्रकार आदि की कमी नहीं है, जिन्होंने हिंदू देवी देवताओं का और सनातन
संस्कृति का घोर अपमान किया और यह कार्य आज भी अनवरत जारी है.
सोशल
मीडिया की सक्रियता के कारण सनातन चेतना का पुनर्जागरण हुआ है इसलिए क्रिया के
विरुद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो गयी हैं. परिणाम स्वरुप बॉलीवुड उद्योग में कुख्यात
व्यक्तियों का बहिष्कार शुरू हो गया है. इन राष्ट्र वादियों का आक्रोश पूरे हिंदी फिल्म जगत से नहीं है बल्कि उन
लोगों से है जो अपनी फिल्मों में सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म का अपमान करते हैं.
क्या किसी समुदाय की सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचा कर उनको जबरदस्ती
सिनेमाघरों तक लाकर ऐसी फिल्में दिखाई जा सकती हैं. आखिर कोई घटिया और निम्न
स्तरीय फिल्मों पर अपने पैसे क्यों बर्बाद करें.
आज
जो बॉयकॉट बॉलीवुड से हिंदी फिल्म जगत को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, वे तब कहां रहते हैं, जब पीके, काली, लाल सिंह चड्ढा आदि जैसी फ़िल्में बनती हैं. जब फिल्मों में हिंदू साधू, सन्यासियों को ढोंगी, चोर,
ठग और बलात्कारी दिखाया जाता है. जब 786 का बिल्ला लगाने वाले जूते पहनकर मंदिर में
घुसते दिखाये जाते हैं. जब गोमांस खाने और उसे महिमा
मंडित करने वाले कलाकार हिंदू धार्मिक चरित्र निभाते हैं. जब कुछ अभिनेता अपने बच्चों के नाम उन क्रूर अक्रांताओं के नाम पर रखते हैं जिन्होंने
लाखों हिंदुओं को मौत के घाट उतारा था.
इंडियन
इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद के तत्कालीन प्रोफेसर धीरज शर्मा के 2015 में एक अध्ययन में यह बात सामने
आई कि बॉलीवुड की फिल्में हिंदू और सिख धर्म के
विरुद्ध झूठे विमर्श गढ रही हैं और लोगों के दिमाग में धीमा ज़हर भर रही हैं. उनके
अध्ययन के अनुसार बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया
गया है. 62% फिल्मों में बेईमान कारोबारी को वैश्य दिखाया
गया है. 74% सिख किरदारों को मज़ाक का पात्र बनाया गया है. 78% मामलों में बदचलन
महिलाओं को ईसाई दिखाया गया है. 84 प्रतिशत फिल्मों
में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला और बेहद ईमानदार दिखाया गया
है, अगर वह घृणित अपराधी है, तो भी उसूलों का पक्का दिखाया जाता है. यह संयोग नहीं, षड़यंत्र है.
दुर्भाग्य से इसके विरुद्ध कोई आवाज बॉलीवुड के अन्दर से आज तक नहीं उठायी गयी.
बहिष्कार
किसी समस्या का समाधान नहीं है, और बॉलीवुड का
बहिष्कार भी किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है. जिन फिल्मों में अश्लीलता और हिंदू
धर्म विरोधी काली करतूतें पता चलती हैं, तो विरोध होता है और आपत्तिजनक दृश्यों को हटाने की मांग की जाती
है. जब लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा नहीं किया जाता तो लोग बहिष्कार
जैसी रणनीति अपनाते हैं. आखिर ऐसी परिस्थिति पैदा ही क्यों हो कि बहिष्कार करने की
नौबत आए. लगभग 100 वर्ष पुराने हिंदी फिल्म जगत में क्या
अभी तक इतनी समझ नहीं आ पाई है कि समाज को क्या स्वीकार्य नहीं है.
जब दक्षिण भारत की "आरआरआर"
फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सफलता के झंडे गाड़ रही है और उसके
एक लोक गीत नाटू नाटू को गोल्डन ग्लोब अवार्ड 2023 मिल चुका
है, उस समय बॉलीवुड बहिष्कार के संघर्ष से जूझ रहा है. हिंदी
फिल्म जगत को यह समझ लेना चाहिए कि उसकी काली करतूतों का भंडाफोड़ हो चुका है और
यदि वह अपना एजेंडा नहीं छोड़ता और फिल्मों में कलात्मकता, सृजनात्मकता,
राष्ट्रीय भावना, सनातन संस्कृति और सभी
धर्मों के प्रति सम्मान की
भावना अंगीकार नहीं करता, तो उसका विनाश निश्चित है, जिसे न योगी बचा सकते हैं न मोदी. इसे बचाने
के लिए स्वयं बॉलीवुड को आगे आकर आत्म विश्लेषण करना चाहिए और शीघ्रातिशीघ्र सुधारात्मक कदम लागू करना चाहिए.
- शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)
शुक्रवार, 13 जनवरी 2023
बुधवार, 11 जनवरी 2023
मंगलवार, 10 जनवरी 2023
रविवार, 8 जनवरी 2023
कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार
कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार
जम्मू
कश्मीर में रजौरी के पास डांगरी गांव में 4 हिंदुओं की हत्या के बाद दूसरे दिन भी
घर के बाहर फिट की गई आईईडी द्वारा विस्फोट किया गया जिसमें 2 बच्चों की मृत्यु
हुई और अनेक घायल हुए. आतंकवादियों ने घरों में आधार कार्ड देख कर और यह सुनिश्चित
करके कि वे हिंदू हैं, उनकी हत्या की.
हिंदुओं को लक्ष्य करके की जा रही हत्याएं काफी समय से हो रही हैं. स्कूल शिक्षिका,
बैंक मैनेजर, राज्य कर्मचारियों
सहित अनेक हिंदुओं की हत्याये की जा चुकी हैं. राज्य के हिंदू भयाक्रांत हैं और
उन्होंने खुलकर कहना शुरू कर दिया है कि 1990 का दौर
फिर शुरू हो गया है. इसके पहले भी कई कर्मचारियों की हत्याएं हो चुकी हैं और इसके
बाद सरकार ने प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू कर्मचारियों को जम्मू संभाग में
स्थानांतरित करना शुरू कर दिया, जो किसी भी हालत में समस्या
का समाधान नहीं हो सकता.
आश्चर्य
की बात है कि जब केंद्र सरकार पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि
घाटी में सब कुछ सामान्य हो चुका है और घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी की जा
रही है, ऐसे में एक बार फिर हिन्दुओं का पलायन शुरू हो जाना
यह रेखांकित करता है कि सरकार शायद समस्या की जड़ पर प्रहार करने से कतरा रही है अन्यथा
कश्मीरी पंडितों और अन्य विस्थापित हिंदुओं द्वारा दिए गए सुझाव पर सरकार अवश्य
ध्यान देती.
इसे
विडंबना ही कहा जाएगा कि मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में आज भी मुसलमानों को
अल्पसंख्यकों की सारी सुविधाएं दी जा रही हैं और हिंदू आबादी को समस्याओं का बंधक
बनाकर रखा गया है. सरकार से हताश होकर ही पहले भी हिंदू आबादी
ने घाटी से पलायन किया था और अब पलायन की आग जम्मू तक आ पहुंची है.
वैसे तो आजादी के समय ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस राज्य को व्यक्तिगत
संबंधों के आधार पर एक चरमपंथी पाकिस्तान समर्थक के हवाले कर दिया था जिसने
पाकिस्तान की सहायता से जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की भी कोशिश की और
पाकिस्तान के साथ मिलाने की भी. जिसकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी ने भी उसी कार्य को
आगे बढ़ाया और भारत सरकार के तमाम संसाधनों पर ऐशो आराम की जिंदगी जीते हुए कभी भी
हृदय से अपने आप को भारतीय स्वीकार नहीं किया. धारा 370 खत्म होने के बाद उनके
वित्तीय स्रोतों पर कुछ असर जरूर पड़ा लेकिन भारत सरकार से की गई लूट उनकी कई
पीढ़ियों के लिए पर्याप्त है. आज ये बयान दे रहे हैं कि हत्यायें तब तक नहीं
रुकेगी जब तक कश्मीर के साथ इंसाफ नहीं होता. हाल में हुए हिंदू नरसंहार को भी
उन्होंने देश में फैलाये जा रहे मुस्लिम विरोधी नफरत के माहौल का परिणाम बताया. यह
अलग बात है कि 1990 में जब घाटी में हिंदूओं का वीभत्स नरसंहार हुआ था और जिसके
बाद बड़े पैमाने पर हिंदुओं का पलायन हुआ, उस समय वह राज्य के मुख्यमंत्री थे. उस समय केंद्र में भाजपा की सरकार भी
नहीं थी तो नफरत का माहौल भी नहीं रहा होगा. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी
घाटी में हो रही हत्याओं का कारण पूरे देश में मुस्लिमों के विरुद्ध बनाए जा रहे
माहौल को बताया.
जम्मू
कश्मीर में हिन्दू के विरुद्ध आतंकवाद को मुस्लिम नेताओं द्वारा
प्रायः कुछ भटके हुए मुस्लिम युवकों की कार्यवाही बताया जाता है और
साथ में यह भी जोड़ दिया जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. दुर्भाग्य से
उनके इस झूठे कथन को ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता है. इस तरह से
समस्या के कारणों को बड़ी आसानी से दबा दिया जाता है. जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल
मनोज सिन्हा ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में लगभग
इसी स्वर में कहा कि "ये सच है कि कुछ कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाते हुए
हमले हुए हैं मगर कुछ और लोगों पर भी हुए हैं और आतंकवादी हमलों को किसी धर्म के
चश्मे से नहीं देखना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर देखेंगे तो कश्मीरी
मुसलमानों की भी जान गई है और वह संख्या ज़्यादा ही होगी कम नहीं. दूसरी बात ये कि
यहाँ सड़कों पर 125-150 निर्दोष लोग मारे जाते थे, यहाँ
पिछले तीन सालों में एक भी व्यक्ति सुरक्षा बलों की गोलियों से नहीं मारा गया है.
ये सामान्य बात नहीं है." उनके इस वक्त विषय सरकार की मन: स्थिति
समझी जा सकती है. इस तरह के
मन, वचन और आधे अधूरे प्रयासों से हिंदुओं का नरसंहार कभी रुकेगा, इसकी कल्पना
करना मुश्किल है.
अतीत
में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में राज्य की ग्राम रक्षा समितियों ( वीडीजी) ने बहुत
अच्छा कार्य किया था और इस कारण आतंकी वारदातों पर काफी हद तक रोक लगी थी. इस
योजना के अंतर्गत समितियों के सदस्यों को हथियार उपलब्ध कराए गए थे. कुछ समय पहले
ही रजौरी में इन समितियों के विरोध के बाद भी जिला प्रशासन ने उनके हथियार वापस ले
लिये थे जिसकी जांच तो आवश्यक है ही, साथ ही ग्राम रक्षा समितियों को अधिक से अधिक
हथियार तुरंत उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिससे ग्रामीणों में न केवल सुरक्षा की भावना
कर कर सके बल्कि लोग आतंकवादियों के विरुद्ध खड़े हो सके.
धारा
370 खत्म करने के बाद जब जम्मू कश्मीर का विभाजन दो केंद्र शासित प्रदेशों में
किया गया था तब भी मेरा मत था कि कश्मीर
और जम्मू को भी दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना देने चाहिए थे ताकि घाटी में
हो रहे आतंकवाद और नरसंहार की आग से कम से कम जम्मू को बचाया जा सके. जम्मू के
लोगों को राज्य के डीलिमिटेशन से भी काफी उम्मीदें थी कि
शायद जम्मू संभाग में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़
जाएगी या फिर पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली 23
विधानसभा सीटों को जम्मू संभाग में जोड़ दिया जाएगा. जिससे राज्य की सत्ता में
जम्मू की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी और राज्य अलगाववाद तथा पाकिस्तान समर्थक राजनीतिक
धंधेबाजों के चंगुल से निकल सकेगा. केंद्र सरकार ने न
केवल एक सुनहरा अवसर खो दिया बल्कि जम्मू के राष्ट्रवादियों को भी निराश किया.
जम्मू
में सरकारी भूमि और तवी नदी के रिवर बेड पर बांग्लादेशियों और रोहिंग्या
घुसपैठियों को अनधिकृत किंतु योजनाबद्ध ढंग से, खासतौर से सैन्य प्रतिष्ठानों के
आसपास बसाये जाने को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. यह सब अनायास नहीं हुआ
यह एक बड़े षड्यंत्र का छोटा सा हिस्सा है जिसके द्वारा जम्मू का भी जनसांख्यिकी
बदले जाने का प्रयास किया गया है.
छद्म धर्मनिरपेक्षता की बीमारी से
ग्रस्त ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि आतंकवादी सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने
की कोशिश करते हैं लेकिन इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी
देने से कतराते हैं कि आखिरकार इन आतंकवादियों का उद्देश्य क्या है? और इन्हें
स्थानीय मुस्लिम राजनेताओं का संरक्षण और देश के अन्य
मुस्लिम राजनेताओं व धर्म गुरुओं का समर्थन क्यों
हासिल होता है? इसका स्पष्ट उत्तर है - गजवा ए हिंद, जिसके
द्वारा केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र का
इस्लामीकरण करना है ताकि इसके बाद पूरी दुनिया पर
इस्लामिक शासन के सपने को साकार किया जा सके.
आजादी के समय मुस्लिमों का एक वर्ग
भारत विभाजन द्वारा एक अलग देश की मांग कर रहा था जबकि दूसरा वर्ग चाहता था कि वह
भारत में रहकर ही जिहाद के माध्यम से गजवा ए हिंद की संकल्पना को साकार कर सकें.
भारत विभाजन में देवबंद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका
थी, जो आज भी किसी ने किसी तरह से गजवा ए हिंद का केंद्र बिंदु बने हुए
हैं, और सरकार असहाय है. इस्लामिक ठेकेदार अरब देशों का मानना है कि बिना
गजवा ए हिंद के पूरी दुनिया पर इस्लाम का शासन संभव नहीं है
क्योंकि उनके पास पैसा तो है लेकिन पानी और उर्वरक भूमि नहीं है, जो भारतीय
उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण से ही प्राप्त हो सकती है और इससे प्राप्त प्राकृतिक
संसाधनों और धर्मान्तरित हुए मानव संसाधनों को आतंकवाद की
विभीषिका में झोंक कर इस्लामिक विश्व विजय का सपना साकार किया जा सकता है.
कुछ हिंदुओं सहित भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का इस परियोजना को
समर्थन प्राप्त है. "सबका साथ और सबका विश्वास" की
धुन में केंद्र सरकार भी इस कड़वी सच्चाई को अनदेखा कर रही है. आजादी के बाद इन 75 सालों में
भारत की जनसंख्यकी किस तरह से बदली है और पूरे भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किस
तरह हुआ है, यह भारत के उन सभी
राष्ट्र वादियों के लिए जो भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति को बचाना चाहते हैं, एक
गंभीर चेतावनी है.
जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश
बन जाने के कारण राज्य कर्मचारी, केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर में शामिल हो गए
हैं लेकिन सरकार ने व्यापक रूप से राज्य कर्मचारियों को अन्य केंद्र शासित
प्रदेशों में स्थानांतरित नहीं किया है. राज्य का पुलिस विभाग भी
उसमें से एक है, जिसमें
अलगाववाद के प्रति हमदर्दी रखने और उन्हें समर्थन करने वालों की बड़ी संख्या है,
जिसकी संदिग्ध भूमिका भी कई घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है. अन्य विभागों में भी
ऐसी ही स्थिति है. इसलिए केंद्र सरकार को अधिक से अधिक कर्मचारियों का अनिवार्य रूप से
अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानांतरण किया जाना चाहिए. राज्य
में खासतौर से घाटी में, पूर्व सैनिकों की बस्तियां बसाने का कार्य किया जाना
चाहिए और उन्हें हथियार उपलब्ध कराए जाने चाहिए.
केंद्र सरकार
को कम से कम जम्मू कश्मीर में खुले मन से कार्य करके पूरे भारत में लोगों को संदेश
देना चाहिए कि वह पृथ्वी पर जन्मी देश की इस प्राचीन सभ्यता को बचाने के लिए कृत संकल्प है. सरकार द्वारा
जम्मू-कश्मीर में सनातन संस्कृति को बचाने के प्रयास और उनकी सफलता ही भारत में इस
संस्कृति के भविष्य का निर्धारण करेंगे, यह बात मोदी जी को अवश्य ध्यान में रखनी
चाहिए.
- शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)
देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था
भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...
-
हिंदू एकता और ब्राह्मण होने का दर्द: ऐतिहासिक षड्यंत्र से वर्तमान संकट तक || क्या भारत का प्रबुद्ध वर्ग (ब्राह्मण) आज के दौर का 'नया द...
-
गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारा और शांति का शोर || इस्लामिक राष्ट्र में रहने के लिए आप कितने तैयार ? || राजनीतिक इस्लाम का वैश्विक है प्रभाव पि...
-
मद्रास उच्च न्यायलय के न्यायाधीश जी आर स्वामीनाथन पर महाभियोग || न्यायपालिका नहीं, सनातन पर प्रहार || भारतीय राजनीतिज्ञ इस्लामपंथियों के ज...

