मंगलवार, 17 जनवरी 2023

जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड

 

जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड

योगी आदित्यनाथ के हाल के मुंबई दौरे में हिंदी फिल्म जगत के लोगों से भी उनकी वार्ता प्रस्तावित थी जिसका मुख्य विषय उत्तर प्रदेश के नोएडा में बन रही फिल्म सिटी था किंतु विषय से अलग हटकर सुनील शेट्टी द्वारा योगी से बायकाट बॉलीवुड रोकने का आग्रह किया गया. सुनील शेट्टी ने जितने आत्मविश्वास से यह कहा कि योगी और मोदी बॉयकॉट रुकवा सकते हैं, उससे न केवल उनकी बुद्धि विवेक का पता चला, बल्कि यह भी उजागर हुआ कि वह किसी अन्य का मुखौटा बनकर बॉलीवुड का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जैसा अपेक्षित था, सुनील शेट्टी के इस बयान का वीडियो मीडिया में वायरल हो गयाइस प्रकार एक बार फिर “बायकॉट बॉलीवुड” सुर्खियों में आ गया.

बॉयकॉट यानी बहिष्कार, विरोध का गांधीवादी तरीका है, जिसे स्वयं तथाकथित महात्मा ने कई बार आजादी के आंदोलन में प्रयोग किया था  और  देशवासियों को भी उससे जोड़ा था. बहिष्कार से दो प्रभाव होते हैं - एक तो समस्या चर्चा के केंद्र में आ जाती है और दूसरा इसके समर्थक आपस में जुड़ जाते हैं. इस समूह के लोग  समस्या के पक्ष विपक्ष के विचारों का आदान प्रदान करते हैं. इस प्रकार जागरूकता का दायरा बड़ा होता जाता है. यही बहिष्कार की सबसे बड़ी शक्ति है. प्रश्न है कि जिस अहिंसक हथियार का प्रयोग स्वाधीनता संग्राम में किया गया, उसी अहिंसक हथियार का विरोध आज क्यों किया जा रहा है. यह बहिष्कार किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि फिल्मों में  सनातन संस्कृति का विकृत चित्रण और हिंदुओं के खिलाफ दिखाई जा रही आपत्तिजनक सामिग्री के विरोध में है. हिंदी फिल्मों में अश्लीलता स्तर यह हो गया है कि शायद ही कोई फिल्म अब ऐसी आती हो जो परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके. 

इसके विपरीत दक्षिण भारत की फिल्में आज भी भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होती हैं और यही उनकी सफलता का रहस्य भी है. दर्शक दक्षिण भारत की फिल्मों के नायक नायिकाओं को देवतुल्य मानते हैं और जब भी कभी उनकी कोई नई फिल्म आती है तो लोग पटाखे फोड़ते हैं,जश्न मनाते हैं. लोगों में होड़ लग जाती है कि कैसे फिल्म को पहले दिन पहले शो में देखा जाय. दक्षिण भारत की ज्यादातर फिल्में जो हिंदी में डब की जाती हैं, वह भी सुपरहिट हो जाती हैं. इनमें ऐसा क्या खास होता है, यह हिंदी फिल्म जगत को समझ में क्यों नहीं आता. दक्षिण भारत की फिल्मों के विरुद्ध कभी बहिष्कार या विरोध प्रदर्शन की नौबत नहीं आई बल्कि इसके नायक - नायिकाओं के प्रति दर्शकों में सम्मान की भावना का ज्वार इतना अधिक होता है कि जब कभी वे सार्वजनिक जीवन में आते हैं तो सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले जाते हैं. आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ऐसे नायक और नायिकाएं  मुख्यमंत्री बने और जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया. इसके विपरीत हिंदी फिल्म जगत में मदांध नायक स्वयं अपने को किंग और बादशाह घोषित कर देते हैं.

जहां तक योगी से की गई अपील का प्रश्न है, तो उसमें गंभीरता का अभाव है. ऐसा लगता है कि सुनील शेट्टी ने निहित स्वार्थ के कारण योगी की इन्वेस्टर्स मीट में जानबूझकर यह शिकायत उछाली. अगर उनकी अपील में गंभीरता थी तो इसके पहले उन्होंने योगी से संपर्क क्यों नहीं किया. यदि उनमें साहस था तो उन्हें अपनी बात बॉयकॉट ट्रेंड  चलाने वालों के समक्ष रखनी चाहिए थी और उनका पक्ष भी समझना चाहिए था. अगर उन्हें यह भी नहीं मालूम कि बॉलीवुड का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है, तो फिर वह जनता और समाज से पूरी तरह से अलग-थलग है और यही बॉलीवुड की सबसे बड़ी समस्या भी है. शेटटी ने अप्रत्यक्ष रूप से योगी और मोदी दोनों को  बॉलीवुड बॉयकॉट के  समर्थक और संरक्षक के रूप में आरोपित भी कर दिया. 

आजादी के बाद से ही बॉलीवुड में वामपंथ - इस्लामिक गठजोड़ के स्वयंभू उदारवादियों ने कब्जा कर लिया था. हिंदू देवी देवताओं का अपमान करके हिंदू धर्म को निकृष्ट साबित करने का कार्य उसी समय से शुरू कर दिया गया था ताकि विश्व की सबसे प्राचीन सनातन संस्कृति को धीमा जहर दे कर मारा जा सके. हिंदू धर्म और संस्कृति को हिंदुओं की नजरों में ही इतना विकृत कर दिया जाए कि उनका विश्वास डगमगाने लगे. इसके विपरीत एक धर्म विशेष को बहुत बड़ा चढ़ाकर आदर्श स्थिति में प्रस्तुत किया जाए कि लोग इसके प्रति  आकर्षित हों. इन दोनों  योजनाओं का एक ही उद्देश्य था हिंदुओं को आसान शिकार बनाकर धर्मांतरण को गति प्रदान करना. इसमें फिल्म जगत के छोटे बड़े सभी कलाकार शामिल हैं. इसके लिए छल कपट का सहारा लिया गया और हिंदुओं को भ्रमित करने के लिए कई  मुस्लिम कलाकारों ने अपने हिन्दू नाम रख लिए. विडंबना है कि ज्यादातर हिंदू कलाकार भी इसी टोली में शामिल हो गए. आश्चर्यजनक है कि यह तब हो रहा था जब हिंदी फिल्म उद्योग की कमाई का 95% हिस्सा हिंदुओं से आ रहा था.

 

इस दुष्प्रचार का असर यह हुआ है कि आज हिंदुओं में बड़ी संख्या में इसे लोग हैं जो अपने हिंदू धर्म के विरुद्ध ऊटपटांग टिप्पणियां करते हैं. सामान्य हिंदू वर्ग इतना सहिष्णु है  कि कभी दूसरे धर्मों का अपमान नहीं करता, इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय में ऐसे निम्न मानसिकता वाले तथाकथित बड़े शायर, गीतकार, टिप्पणीकार, चित्रकार आदि की कमी नहीं है, जिन्होंने हिंदू देवी देवताओं का और सनातन संस्कृति का घोर अपमान किया और यह कार्य आज भी अनवरत जारी है.

सोशल मीडिया की सक्रियता के कारण सनातन चेतना का पुनर्जागरण हुआ है इसलिए क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो गयी हैं. परिणाम स्वरुप बॉलीवुड उद्योग में कुख्यात व्यक्तियों का बहिष्कार शुरू हो गया है. इन राष्ट्र वादियों का आक्रोश पूरे हिंदी फिल्म जगत से नहीं है बल्कि उन लोगों से है जो अपनी फिल्मों में सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म का अपमान करते हैं. क्या किसी समुदाय की सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचा कर उनको जबरदस्ती सिनेमाघरों तक लाकर ऐसी फिल्में दिखाई जा सकती हैं. आखिर कोई घटिया और निम्न स्तरीय फिल्मों पर अपने पैसे क्यों बर्बाद करें. 

आज जो बॉयकॉट बॉलीवुड से हिंदी फिल्म जगत को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, वे तब कहां रहते हैंजब पीके, काली, लाल सिंह चड्ढा आदि जैसी फ़िल्में बनती हैं. जब फिल्मों में हिंदू साधू, सन्यासियों को ढोंगी, चोर, ठग और बलात्कारी दिखाया जाता है. जब 786 का बिल्ला लगाने वाले जूते पहनकर मंदिर में घुसते  दिखाये जाते हैं. जब गोमांस खाने और उसे महिमा मंडित करने वाले कलाकार हिंदू धार्मिक चरित्र निभाते हैं. जब  कुछ अभिनेता अपने बच्चों के नाम उन क्रूर अक्रांताओं के नाम पर रखते हैं जिन्होंने लाखों हिंदुओं को मौत के घाट उतारा था.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद  के तत्कालीन प्रोफेसर धीरज शर्मा के 2015 में एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि  बॉलीवुड की फिल्में हिंदू और सिख धर्म के विरुद्ध झूठे विमर्श गढ रही हैं और लोगों के दिमाग में धीमा ज़हर भर रही हैं. उनके अध्ययन के अनुसार बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है. 62% फिल्मों में बेईमान कारोबारी को वैश्य  दिखाया गया है. 74% सिख किरदारों को मज़ाक का पात्र बनाया गया है. 78% मामलों में बदचलन महिलाओं को ईसाई दिखाया गया है.  84 प्रतिशत फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला और बेहद ईमानदार दिखाया गया है, अगर वह घृणित अपराधी है, तो भी उसूलों का पक्का दिखाया जाता है. यह संयोग नहीं, षड़यंत्र है. दुर्भाग्य से इसके विरुद्ध कोई आवाज बॉलीवुड के अन्दर से आज तक नहीं उठायी गयी.

बहिष्कार किसी समस्या का समाधान नहीं है, और बॉलीवुड का बहिष्कार भी किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है. जिन फिल्मों में अश्लीलता और हिंदू धर्म विरोधी काली करतूतें पता चलती हैं, तो विरोध होता है और आपत्तिजनक दृश्यों  को हटाने की मांग की जाती है. जब लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा नहीं किया जाता तो लोग बहिष्कार जैसी रणनीति अपनाते हैं. आखिर ऐसी परिस्थिति पैदा ही क्यों हो कि बहिष्कार करने की नौबत आए. लगभग 100 वर्ष पुराने हिंदी फिल्म जगत में क्या अभी तक इतनी समझ नहीं आ पाई है कि समाज को क्या स्वीकार्य नहीं है. 

जब दक्षिण भारत की  "आरआरआर"  फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सफलता के झंडे गाड़ रही है और उसके  एक लोक गीत नाटू नाटू  को गोल्डन ग्लोब अवार्ड 2023 मिल चुका है, उस समय बॉलीवुड बहिष्कार के संघर्ष से जूझ रहा है. हिंदी फिल्म जगत को यह समझ लेना चाहिए कि उसकी काली करतूतों का भंडाफोड़ हो चुका है और यदि वह अपना एजेंडा नहीं छोड़ता और फिल्मों में कलात्मकता, सृजनात्मकता, राष्ट्रीय भावना, सनातन संस्कृति और सभी धर्मों के  प्रति  सम्मान की भावना अंगीकार नहीं करता, तो उसका विनाश निश्चित है, जिसे न योगी बचा  सकते हैं न मोदी. इसे बचाने के लिए स्वयं बॉलीवुड को आगे आकर आत्म विश्लेषण करना चाहिए और  शीघ्रातिशीघ्र  सुधारात्मक कदम लागू करना चाहिए. 

                                 - शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)



रविवार, 8 जनवरी 2023

कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार

 

कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार



जम्मू कश्मीर में रजौरी के पास डांगरी गांव में 4 हिंदुओं की हत्या के बाद दूसरे दिन भी घर के बाहर फिट की गई आईईडी द्वारा विस्फोट किया गया जिसमें 2 बच्चों की मृत्यु हुई और अनेक घायल हुए. आतंकवादियों ने घरों में आधार कार्ड देख कर और यह सुनिश्चित करके कि वे  हिंदू हैं, उनकी हत्या की. हिंदुओं को लक्ष्य करके की जा रही हत्याएं काफी समय से हो रही हैं. स्कूल शिक्षिका, बैंक मैनेजर, राज्य कर्मचारियों सहित अनेक हिंदुओं की हत्याये की जा चुकी हैं. राज्य के हिंदू भयाक्रांत हैं और उन्होंने खुलकर कहना शुरू कर दिया  है कि 1990 का दौर फिर शुरू हो गया है. इसके पहले भी कई कर्मचारियों की हत्याएं हो चुकी हैं और इसके बाद सरकार ने प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू कर्मचारियों को जम्मू संभाग में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया, जो किसी भी हालत में समस्या का समाधान नहीं हो सकता.

आश्चर्य की बात है कि जब केंद्र सरकार पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि घाटी में सब कुछ सामान्य हो चुका है और घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी की जा रही है, ऐसे में एक बार फिर हिन्दुओं का पलायन शुरू हो जाना यह रेखांकित करता है कि सरकार शायद समस्या की जड़ पर प्रहार करने से कतरा रही है अन्यथा कश्मीरी पंडितों और अन्य विस्थापित हिंदुओं द्वारा दिए गए सुझाव पर सरकार अवश्य ध्यान देती.

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में आज भी मुसलमानों को अल्पसंख्यकों की सारी सुविधाएं दी जा रही हैं और हिंदू आबादी को समस्याओं का बंधक बनाकर रखा गया है. सरकार से हताश होकर ही पहले भी हिंदू आबादी  ने घाटी से पलायन किया था और अब पलायन की आग जम्मू तक आ पहुंची है. वैसे तो आजादी के समय ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस राज्य को व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर एक चरमपंथी पाकिस्तान समर्थक के हवाले कर दिया था जिसने पाकिस्तान की सहायता से जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की भी कोशिश की और पाकिस्तान के साथ मिलाने की भी. जिसकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी ने भी उसी कार्य को आगे बढ़ाया और भारत सरकार के तमाम संसाधनों पर ऐशो आराम की जिंदगी जीते हुए कभी भी हृदय से अपने आप को भारतीय स्वीकार नहीं किया. धारा 370 खत्म होने के बाद उनके वित्तीय स्रोतों पर कुछ असर जरूर पड़ा लेकिन भारत सरकार से की गई लूट उनकी कई पीढ़ियों के लिए पर्याप्त है. आज ये बयान दे रहे हैं कि हत्यायें तब तक नहीं रुकेगी जब तक कश्मीर के साथ इंसाफ नहीं होता. हाल में हुए हिंदू नरसंहार को भी उन्होंने देश में फैलाये जा रहे मुस्लिम विरोधी नफरत के माहौल का परिणाम बताया. यह अलग बात है कि 1990 में जब घाटी में हिंदूओं का वीभत्स नरसंहार हुआ था और जिसके बाद बड़े पैमाने पर हिंदुओं का पलायन हुआ, उस समय वह राज्य के मुख्यमंत्री थे. उस समय केंद्र में भाजपा की सरकार भी नहीं थी तो नफरत का माहौल भी नहीं रहा होगा. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी घाटी में हो रही हत्याओं का कारण पूरे देश में मुस्लिमों के विरुद्ध बनाए जा रहे माहौल को बताया. 

जम्मू कश्मीर में हिन्दू के विरुद्ध आतंकवाद को मुस्लिम नेताओं द्वारा   प्रायः कुछ भटके हुए मुस्लिम युवकों की कार्यवाही बताया जाता है और साथ में यह भी जोड़ दिया जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. दुर्भाग्य से उनके इस झूठे कथन को ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता है. इस तरह से समस्या के कारणों को बड़ी आसानी से दबा दिया जाता है. जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने  बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में  लगभग इसी स्वर में कहा कि "ये सच है कि कुछ कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाते हुए हमले हुए हैं मगर कुछ और लोगों पर भी हुए हैं और आतंकवादी हमलों को किसी धर्म के चश्मे से नहीं देखना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर देखेंगे तो कश्मीरी मुसलमानों की भी जान गई है और वह संख्या ज़्यादा ही होगी कम नहीं. दूसरी बात ये कि यहाँ सड़कों पर 125-150 निर्दोष लोग मारे जाते थे, यहाँ पिछले तीन सालों में एक भी व्यक्ति सुरक्षा बलों की गोलियों से नहीं मारा गया है. ये सामान्य बात नहीं है." उनके इस वक्त विषय सरकार की मन: स्थिति  समझी जा सकती है.  इस तरह के मन, वचन और आधे अधूरे प्रयासों से हिंदुओं का नरसंहार कभी रुकेगा, इसकी कल्पना करना मुश्किल है. 

अतीत में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में राज्य की ग्राम रक्षा समितियों ( वीडीजी) ने बहुत अच्छा कार्य किया था और इस कारण आतंकी वारदातों पर काफी हद तक रोक लगी थी. इस योजना के अंतर्गत समितियों के सदस्यों को हथियार उपलब्ध कराए गए थे. कुछ समय पहले ही रजौरी में इन समितियों के विरोध के बाद भी जिला प्रशासन ने उनके हथियार वापस ले लिये थे जिसकी जांच तो आवश्यक है ही, साथ ही ग्राम रक्षा समितियों को अधिक से अधिक हथियार तुरंत उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिससे ग्रामीणों में न केवल सुरक्षा की भावना कर कर सके बल्कि लोग आतंकवादियों के विरुद्ध खड़े हो सके.

धारा 370 खत्म करने के बाद जब जम्मू कश्मीर का विभाजन दो केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया था तब भी मेरा  मत था कि कश्मीर और जम्मू को भी दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना देने चाहिए थे ताकि घाटी में हो रहे आतंकवाद और नरसंहार की आग से कम से कम जम्मू को बचाया जा सके. जम्मू के लोगों को  राज्य के डीलिमिटेशन से भी काफी उम्मीदें थी कि शायद  जम्मू संभाग में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ जाएगी या फिर  पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली 23 विधानसभा सीटों को जम्मू संभाग में जोड़ दिया जाएगा. जिससे राज्य की सत्ता में जम्मू की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी और राज्य अलगाववाद तथा पाकिस्तान समर्थक राजनीतिक धंधेबाजों  के चंगुल से निकल सकेगा. केंद्र सरकार ने न केवल एक सुनहरा अवसर खो दिया बल्कि जम्मू के राष्ट्रवादियों को भी निराश किया.

जम्मू में सरकारी भूमि और तवी नदी के रिवर बेड पर बांग्लादेशियों और रोहिंग्या घुसपैठियों को अनधिकृत किंतु योजनाबद्ध ढंग से, खासतौर से सैन्य प्रतिष्ठानों के आसपास बसाये जाने को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. यह सब अनायास नहीं हुआ यह एक बड़े षड्यंत्र का छोटा सा हिस्सा है जिसके द्वारा जम्मू का भी जनसांख्यिकी बदले जाने का प्रयास किया गया है.

छद्म धर्मनिरपेक्षता की बीमारी से ग्रस्त ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि आतंकवादी सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन  इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी देने से कतराते हैं कि आखिरकार इन आतंकवादियों का उद्देश्य क्या है? और इन्हें स्थानीय मुस्लिम राजनेताओं का संरक्षण और देश  के अन्य मुस्लिम राजनेताओं व धर्म गुरुओं का समर्थन क्यों हासिल होता है? इसका स्पष्ट उत्तर है - गजवा ए हिंद, जिसके द्वारा केवल  भारत ही नहीं बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र का इस्लामीकरण करना है ताकि इसके बाद पूरी दुनिया पर इस्लामिक शासन के सपने को साकार किया जा सके.

आजादी के समय मुस्लिमों का एक वर्ग भारत विभाजन द्वारा एक अलग देश की मांग कर रहा था जबकि दूसरा वर्ग चाहता था कि वह भारत में रहकर ही जिहाद के माध्यम से गजवा ए हिंद की संकल्पना को साकार कर सकें. भारत विभाजन में देवबंद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी, जो आज भी किसी ने किसी तरह से गजवा ए हिंद का केंद्र बिंदु बने हुए हैं, और सरकार असहाय है. इस्लामिक ठेकेदार अरब देशों का मानना है कि बिना गजवा ए हिंद  के पूरी दुनिया पर इस्लाम का शासन संभव नहीं है क्योंकि उनके पास पैसा तो है लेकिन पानी और उर्वरक भूमि नहीं है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण से ही प्राप्त हो सकती है और इससे प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों और धर्मान्तरित हुए मानव संसाधनों को आतंकवाद की विभीषिका में झोंक कर इस्लामिक विश्व विजय का सपना साकार किया जा सकता है.  कुछ हिंदुओं सहित भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का इस परियोजना को समर्थन प्राप्त है. "सबका साथ और सबका विश्वास" की धुन में केंद्र सरकार भी इस कड़वी सच्चाई को अनदेखा कर रही है. आजादी के बाद इन 75 सालों में भारत की जनसंख्यकी किस तरह से बदली है और पूरे भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किस तरह हुआ है, यह भारत के उन सभी राष्ट्र वादियों के लिए जो भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति को बचाना चाहते हैं, एक गंभीर चेतावनी है. 

जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के कारण राज्य कर्मचारी, केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर में शामिल हो गए हैं लेकिन सरकार ने व्यापक रूप से राज्य कर्मचारियों को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानांतरित नहीं किया है. राज्य का पुलिस विभाग भी  उसमें से एक है, जिसमें अलगाववाद के प्रति हमदर्दी रखने और उन्हें समर्थन करने वालों की बड़ी संख्या है, जिसकी संदिग्ध भूमिका भी कई घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है. अन्य विभागों में भी ऐसी ही स्थिति है. इसलिए केंद्र सरकार को  अधिक से अधिक कर्मचारियों का अनिवार्य रूप से अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में  स्थानांतरण किया जाना चाहिए. राज्य में खासतौर से घाटी में, पूर्व सैनिकों की बस्तियां बसाने का कार्य किया जाना चाहिए और उन्हें हथियार उपलब्ध कराए जाने चाहिए. 

केंद्र सरकार को कम से कम जम्मू कश्मीर में खुले मन से कार्य करके पूरे भारत में लोगों को संदेश देना चाहिए कि वह पृथ्वी पर जन्मी  देश की इस प्राचीन सभ्यता को बचाने के लिए कृत संकल्प है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में सनातन संस्कृति को बचाने के प्रयास और उनकी सफलता ही भारत में इस संस्कृति के भविष्य का निर्धारण करेंगे, यह बात मोदी जी को अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए.

-     शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)    



   

शनिवार, 31 दिसंबर 2022

भारत का विकृत इतिहास

 भारत का विकृत इतिहास

भारत का इतिहास इतना तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है कि सच्चाई को लगभग छिपा देने का प्रयास हुआ है और यह बात किसी से छिपी नहीं है. दिल्ली में  वीर बाल दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस बात को एक बार फिर दोहराया कि भारत में इतिहास के रूप में हमें षड्यंत्र पूर्वक गढ़ा गया विमर्श पढ़ाया गया है. भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों को छुपाया गया और राष्ट्रीय नायकों के अनुकरणीय और प्रेरणादायक योगदान को अनदेखा किया गया और आक्रान्ताओं को महिमामंडित किया गया. हिंदू और राष्ट्र विरोधी शक्तियों ने यह सब जानबूझकर इसलिए किया ताकि हिंदू समाज कभी भी अपनी संस्कृति, धर्म, पूर्वजों की महान विरासत और उल्लेखनीय उपलब्धियों पर गौरवान्वित न हो सके.

वीर बाल दिवस, जिसका आयोजन गुरु गोविंद सिंह के दो साहिब जादों के प्रेरणादायक बलिदान को स्मरण करने और भावी पीढ़ियों को उनके अदम्य साहस, और धर्म के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए आयोजित किया गया है, स्वयं एक ऐसा उदाहरण है जिसे स्वतंत्रता के 75 साल बाद गैर कांग्रेसी सरकार के समय सार्वजनिक किया जा सका. इतने बड़े बलिदान और अदम्य साहस की कहानी को न तो इतिहास में सम्मानजनक जगह  मिल सकी और ना ही सरकार ने अपने स्तर से कभी भावी पीढ़ियों को इससे प्रेरणा लेने के लिए पाठ्यक्रमों में शामिल किया.

क्रूर और बहसी मुगल शासक औरंगजेब ने हिंदुओं और सनातन संस्कृति में विश्वास करने वाले लोगों का जितना धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न किया, ऐसा उदाहरण संसार में कहीं नहीं मिलता. क्रूर हत्यारे औरंगजेब ने सबक सिखाने के उद्देश्य गुरु गोविंद सिंह के दो पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह, जिनकी उम्र 6 और 9 वर्ष थी, को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए डराया और उनके इनकार करने पर उन्हें दीवाल में जिंदा चुनवा दिया. इतनी छोटी उम्र में जान देकर भी धर्म परिवर्तन से इंकार करने का साहस, निडरता और निर्भीकता, भावी पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है जिसे जानबूझकर अनदेखा किया गया. आज सरकार की अनदेखी और सामाजिक पतन का यह स्तर आ  गया है कि 1 किलो चावल, 2 किलो गेहूं, के लिए  भी धर्म परिवर्तन हो जाता है. आज लव जिहाद राष्ट्रव्यापी अभियान बन चुका है.

इतिहास में झूठे विमर्श  गढ़े जाने का कारण  राष्ट्रीय जन मानस में विशेषतया हिंदुओं में हीन भावना उत्पन्न करना है, ताकि वे कभी स्वाभिमान से अपना सिर ऊंचा न कर सकें और उन्हें हमेशा इस बात का मानसिक तनाव रहे कि उन पर मुस्लिमों और अंग्रेजों ने शासन किया था क्योंकि वे कमतर हैं.  यह सनातन राष्ट्र अपनी गुलामी की मानसिकता से बाहर आकर विश्व को यह  कभी न बता सके कि वे इस पृथ्वी पर सबसे पुरानी सभ्यता हैं, तथा सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक धरातल पर वे विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे, इसलिए विश्व गुरु थे. ज्ञान और विज्ञान की जिस पराकाष्ठा को इस सभ्यता ने हजारों वर्ष पहले पार कर लिया था, संपूर्ण विश्व को उसकी जानकारी कई हजार वर्ष बाद तक नहीं हो पाई थी. यह वही संस्कृति है, नालंदा में जिसके ज्ञान के भण्डार को अनपढ़, जाहिल और जंगली मुस्लिम आक्रांताओं ने आग  के हवाले किया था और दुर्लभ ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों को जलने में 6 से 7 माह लग गए थे.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ की दुरभि संधि  में शामिल होकर तथाकथित चाचा ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, इतिहास और राष्ट्रीय गौरव को मौलाना आजाद के हवाले कर दिया था, जिन्होंने कुछ वामपंथी इतिहासकारों को खरीद कर वह सब कुछ लिखवा डाला जो मुस्लिम जगत को चाहिए था. इन गुलाम इतिहासकारों ने अकबर को महान, औरंगजेब को धर्मनिरपेक्ष और बाबर को लोकप्रिय शासक बना दिया. महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे वीरों  को लुटेरा बना दिया. चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्रांतिकारी वीरों  को आतंकवादी बना दिया. ये केवल कुछ उदाहरण है, भारत का पूरा इतिहास इस तरह के मनगढ़ंत झूठ का पुलिंदा है. अगर  स्वतंत्र इतिहासकारों की अत्यंत सीमित संख्या में पुस्तकें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध न होती, तो शायद हमें अपने पूर्वजों के बारे में  भी सच मालूम नहीं होता.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतिहास की इस विकृति  विसंगति के बारे में कई बार देश को सावधान किया है. गृहमंत्री अमित शाह और कई केंद्रीय मंत्री भी हमेशा यही बातें दोहराते रहते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साधारण प्रचारक से लेकर सरसंघचालक तक और उनकी सभी अनुषांगिक संगठन के पदाधिकारी प्रायः इतिहास में लिखे गए झूठ के बारे में बताते हैं. यह बहुत अच्छी बात है. सोशल मीडिया के इस युग में जनता बहुत जागरूक है और  उन सभी से पूरी तरह सहमत भी है.  जागरूक होता हिंदू जनमानस स्वत: स्फूर्ति से इतिहास की वास्तविक स्थिति का आदान प्रदान कर रहा है. छोटी कक्षाओं से स्नातकोत्तर की पाठ्य पुस्तकों में आज भी वही गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है. एनसीईआरटी और विश्वविद्यालयों की पुस्तकों में भी झूठ और मनगढ़ंत बातें आज भी बेरोकटोक चल रही हैं. स्वतंत्रता के 75 साल बाद देश के नौनिहाल झूठा और मनगढ़ंत इतिहास पढ़ रहे हैं और आत्मसात कर रहे हैं. यही इनका सच बन जाता है. ऐसी भावी पीढ़ियों से देश क्या अपेक्षा कर सकता है. 

प्रधानमंत्री मोदी की यह बात अत्यंत हृदयस्पर्शी है कि झूठे और गढे गए विमर्श को बदले जाने की आवश्यकता है. पूरा देश उनकी बात से सहमत हैं लेकिन यह कार्य करेगा कौन? यह कार्य किसी व्यक्ति  द्वारा नहीं सरकार द्वारा किया जाना है. इतिहास को परिमार्जित करना वर्तमान सरकार का उत्तरदायित्व ही नहीं, नैतिक धर्म भी है. भाजपा और उनके अनुषांगिक संगठन दशकों से इतिहास की इन विसंगतियों की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं.  अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भाजपाई नेताओं ने संसद में इस मुद्दे पर अनेक बार अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपनी बातें रखीं. यह सब तब की बातें हैं जब भाजपा विपक्ष में थी. आज पिछले 8 वर्षों से  केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है, लेकिन भाजपा के नेता आज भी उसी तरह से बात कर रहे हैं जैसे तब करते थे जब वह विपक्ष में थे. विश्व का इतिहास गवाह है कि 8 वर्ष का समय कम नहीं होता. इतने समय में कई देशों ने अपना इतिहास परमार्जित कर डाला, राष्ट्रीय अस्मिता पर कलंक के धब्बों को धो डाला, और जरूरत पड़ने पर संविधान भी बदल डाला और राष्ट्रहित के विरुद्ध काम करने वालों  को समझा डाला.  

ऐसा नहीं है कि इतिहास को कुरूपित और विकृत करने का कार्य सिर्फ भारत में किया गया. ऐसा हर उस देश में हुआ जो पराधीन था, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन देशों ने जो काम सबसे पहले किया वह था अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्थापित करना, इतिहास को परिमार्जित करना और गुलामी के कलंक धोना. दुर्भाग्य से भारत में स्वतंत्रता के बाद परतंत्रता की निशानियां और गुलामी के कलंक हटाना तो दूर की बात तत्कालीन सरकारों ने भारत के इतिहास को और अधिक विकृत और कलंकित करने का कार्य  किया. परतंत्रता की त्रासदी के जख्म, आक्रांताओं की  क्रूर और भयावह कार्यवाही के अवशेष, देश के मूल निवासियों पर किए गए अत्याचारों की दर्द भरी दास्तान और उसके  प्रमाण यहां वहां हर जगह पूरे देश में बिखरे पड़े हैं. पिछली सरकारों ने तो इन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता उपाय किए और भविष्य में भी इन्हें सजा सवांर कर रखने के लिए कानून बनाकर राष्ट्र के मूल निवासियों के पैर में बेड़ियां डाल दी. आज विश्व की इस प्राचीनतम सभ्यता के मूल निवासियों को यह अधिकार भी नहीं है कि वह अपने ऊपर की गई ज्यादितियों का प्रतिकार कर सकें, दासता के कलंकित कार्यों का  परिष्कार कर सकें और गुलामी के प्रतीक हटाकर स्वतंत्रता का एहसास कर सकें.

 

यह  दुखद है कि  पिछले 8 वर्षों में केंद्र सरकार ने इतिहास की इन  विसंगतियों, झूठे विमर्श, सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म को कलंकित करने वाले मनगढ़ंत कहानियोंराष्ट्रीय नायकों और महान विभूतियों की अनदेखी को न्यायोचित सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. केवल शिक्षा मंत्रियों को बदलने और शिक्षा नीति में बदलाव प्रस्तावित करने से ही इतिहास परिमार्जित नहीं हो जाया करता. जब स्मृति ईरानी शिक्षा मंत्री थी तब थोड़ा कार्य शुरू जरूर  हुआ था लेकिन दबाव में उनका मंत्रालय बदल गया और उसके बाद निशंक, जावड़ेकर और धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में इस संबंध में कोई प्रगति हुई हो ऐसा नहीं लगता.

क्या भारतीय इतिहास की इन विसंगतियों को अफगानिस्तान का तालिबान या पाकिस्तान ठीक करेगा? या भारत के उस वर्ग, जो  आक्रांताओं को अपना पूर्वज मानता है, से अपेक्षा की जा सकती है कि वह आगे आकर इतिहास का भूल सुधार करेगा

भारत के  विकृत और विसंगतियों भरे इतिहास का समय-समय पर उलाहना देना अगर भाजपा के लिए केवल एक नारा है, तब तो कुछ नहीं हो सकता, लेकिन यदि भाजपा गंभीर है तो उसे तत्काल इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने चाहिए क्योंकि भारत में राष्ट्रीय जन जागरण का  अभियान आज जिस चरम पर है, यह काम मुश्किल नहीं है लेकिन इसमें अड़चन है भाजपा में इच्छाशक्ति की कमी.  अब तो 2024 के लोकसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी  है, अगर अभी भी इसकी शुरुआत नहीं हो सकी तो मानना चाहिए कि इसकी शुरुआत कभी नहीं होगी और यह कार्य भी कभी पूर्ण नहीं होगा, विशेषकर तब जब भाजपा पर “सबका विश्वास” प्राप्त करने का दबाव या सनक सवार हो गई हो. 

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~~







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