शनिवार, 19 मार्च 2022

ख्वाजा मैनुद्दीन चिस्ती की दरगाह – महामूर्ख हिन्दुओं का तीर्थ

 

ख्वाजा की दरगाह पर वही हिन्दू जाते हैं जिन्हें ख्वाजा मैनुद्दीन चिश्ती का काला इतिहास मालूम नहीं. इसके विपरीत वामपंथ और इस्लामिक प्रचार तंत्र ने इसका इतना महिमा मंडन कर रखा है कि वहां जाने से मन की मुराद पूरी हो जाती हैं. शायद इसी लालसा से मुशीबत में फंसे हिन्दू भी वहां पहुँच जाते हैं. बहुत कम लोग जानते होंगे कि दरगाह अपनी मार्केटिंग भी करता है, जिसके कारण बॉलीवुड सहित हर क्षेत्र के प्रमुख लोगों को सालाना उर्स में आमंत्रित भी किया जाता है. बॉलीवुड ने तो बहुत फिल्मो में उनका गुणगान किया है , जिसके कारण भी लोग पहुँच जाते हैं.

लेकिन ये ये एकदम सही  है कि ख्वाजा मैनुद्दीन चिस्ती की दरगाह – महामूर्ख हिन्दुओं का तीर्थ है.  


 



 राजस्थान के शहर  अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जहाँ  प्रतिवर्ष लाखों अज्ञानी श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए जाते हैं और चादर चढ़ाते हैं इनमें ज्यादातर हिंदू होते हैं. ख्वाजा मैनुद्दीन चिश्ती को एक सूफी संत बताया जाता है लेकिन इसे  समझने से  पहले हमें यह समझ लेना जरूरी है कि सूफी  कौन थे ? ये भारत में क्यों आए थे? और इन्होने भारत में क्या किया?


सूफी वे मुस्लिम होते हैं जो गाने बजाने से इस्लाम का प्रचार करते हैं. भारत में षड्यंत्र के तहत  इन्हें किसने संत कहना शुरू किया  पता नहीं लेकिन  सूफी संत “शांति और भाई चारे” का सन्देश देते हैं, इसका झूठा प्रचार किया स्वयं स्वार्थी हिन्दुओं ने. इस मिथक को  कई सदियों तक इस्लामिक विचारकों और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा खूब फैलाया गया है। वास्तविकता यह है कि इन सूफी संतों को भारत में इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, ‘काफिरों’ (हिन्दुओं) के धर्मांतरण और इस्लाम को स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था।

ऐसे ही एक सूफी हुए हैं  ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) , जिन्हें  हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी जाना जाता है। मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में हुआ था, उन्हें भारत आकर इस्लाम के प्रचार के लिए भारत भेजा गया था. यहाँ  अजमेर में  इस्लाम के प्रचार में लग गए. उसे  अजमेर में ही  दफनाया गया था जहाँ उसकी दरगाह है. सूफियों के बारें में देखते हैं इतिहासकारों के विचार -

 

  • · इतिहासकार के एस लाल ने अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम शासन की विरासत’ (Legacy of Muslim Rule in India) में  लिखा है, “मुस्लिम मुशाहिक (सूफी आध्यात्मिक नेता) उलेमाओं की तरह ही धर्मांतरण के कार्य में पूरी तरह संलग्न थे, और  इन सूफी ‘संतों’ को लेकर आम धारणा के विपरीत, ये हिंदुओं के प्रति बिल्कुल भी दयालु नहीं थे. वे चाहते थे कि यदि हिंदू इस्लाम अपनाने से इनकार करते हैं तो उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए या फिर दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रखा जाए।”
  • ·       लेखक राम ओहरी ने अपनी पुस्तक "दि सिंस्टर  साइड ऑफ सूफीवाद"  लिखा है, “कोई  मुगल, और सूफी, कभी भी हिन्दुओं को मंदिर में पूजा करने देने के लिए राजी नहीं हुये, और न ही इनके मन में हिन्दुओं और  हिंदू देवी-देवताओं के प्रति कोई  सम्मान था. इन सभी का उद्देश्य इस्लाम का विस्तार करना और छल, कपट से किसी भी  कीमत पर हिंदुओं का धर्मांतरण करना था.
  • ·       इतिहासकार एम ए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे, तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार ही  रखते थे, जो  मुख्यधारा ( हिन्दुओं )  के लिए बेहद खतरनाक होते थे।

 

काफिरों’ ( हिन्दुओं / मूर्ती पूजकों)  को लेकर सूफीवाद के इन  तथाकथित  विद्वानों का दृष्टिकोण तालिबान या आईएसआईएस  के दृष्टिकोण से बिलकुल भी अलग नहीं है। इसके कुख्यात उदाहरण सूफी विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक माने जाने वाले मोइनुद्दीन चिश्ती और औलिया हैं, जिन्होंने वो काम सदियों पहले कर दिया था, जिसे ISIS,  तालिबान और अन्य   कट्टर इस्लामिक संगठन आजकल कर रहे हैं.

कहने के लिए तो सूफी, इस्लाम धर्म का प्रचार करते थे और इस्लाम को प्रेम और भाईचारे का मजहब बताते थे और लोगों में शांति का संदेश देते थे लेकिन किसी  भी सूफी संत ने या  तथाकथित रहस्यवादी संतों ने कभी भी  मुसलमानों द्वारा हिंदुओं की हत्याओं का विरोध नहीं किया और न ही किसी मंदिर को नष्ट करने को कभी गलत बताया.  

इन  सूफियों ने तथाकथित काफिर पुरुषों और महिलाओं को बगदाद और गजनी में  बेंचने,  उन्हें गुलाम  बनाने और उनके साथ भयानक अत्याचार करने का  भी कभी विरोध नहीं किया. इसके विपरीत हमेशा मुस्लिम शासकों पर  ऐसे हिंदुओं का उत्पीड़न करने का दबाव बनाया  जो तमाम प्रयासों के बाद भी मुस्लिम नहीं बने थे। इन  सूफियों ने हमेशा पैगंबर और शरीयत द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने के लिए  सुल्तानों पर भी दबाव बनाया.

यह कोई रहस्य नहीं है कि इनके धर्म प्रचार और उपदेशों का एकमात्र उद्देश्य धर्मांतरण और  हिंदुओं में  मुस्लिम शासकों के प्रति प्रतिरोध  कम करना था ताकि वह मुस्लिम शासकों के विरुद्ध हथियार ना उठाएं और धीरे धीरे पूरे हिन्दुस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाया जा सके, जिसके लिए उन्हें हिन्दुस्तान भेजा गया था.   

सभी सूफियों ने शांति और धार्मिक सद्भाव का बहाना बनाकर हिंदुओं के साथ भयानक छल किया। पंजाब के  सूफी संत,  अहमद सरहिंदी ने  लिखा भी है कि जहांगीर द्वारा सिख  गुरु अर्जुन देव की फांसी एक महान इस्लामी जीत थी (नक़शबंदी आदेश (1564-1634). उसने  खुले तौर पर घोषणा की कि इस्लाम और हिंदू धर्म एक दूसरे के विरोधी थे और इसलिए सह-अस्तित्व में नहीं हो सकते। नकाश बंदी सूफियों के जहांगीर और औरंगजेब के साथ बहुत करीबी संबंध थे। लेकिन फिर भी चिश्ती सूफी मियां मीर, जो गुरु अर्जुन देव के घनिष्ठ  मित्र थे, ने भी  सिख गुरु की फांसी देने का विरोध नहीं किया और  जहांगीर ने उन्हें गिरफ्तार कर फाँसी दे  दी. ऐसी दोस्ती निभाते थे ये सूफी और ऐसा ही भाई चारा फैलाते थे.

अजमेर की दरगाह में दफन ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भी बेहद  क्रूर, दुश्चरित्र और कट्टरपंथी मुसलमान था जिसने अपने जीते जी  असंख्य   हिंदुओं को  धर्मान्तरित करने के लिए मजबूर किया जिन्होंने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार किया उनकी  गर्दनें  कटवा दीं. "सिरत अल क़ुतुब"  के अनुसार इसने 7 लाख हिन्दुओं को अपने जीवनकाल में मुसलमान  बनाया था।

हिंदू सामान्यता बहुत सीधे-साधे और दूसरों पर सहज विश्वास करने वाले होते हैं और ऐसा करने वाले ज्यादातर लोगों को मूर्ख बनाया जाता है, और हिन्दू न केवल मूर्ख बनते गए बल्कि शायद स्थायी रूप से मूर्ख बन गए. हिंदूओं की मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए कि ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाने वालों में सबसे अधिक हिंदू ही होते है.

 







मजलिस सूफिया’ नामक ग्रंथ के अनुसार जब मैनुद्दीन चिस्ती  मक्का हज करने गया तो वहां उसे ये निर्देश दिया गया कि वह हिंदुस्तान जाये और वहां पर कुफ्र के अंधकार को दूर करके वहां इस्लाम का राज्य स्थापित करे। इसी उद्देश्य से  हिंदुओं के प्रति नफरत का भाव लिए यह व्यक्ति एक ‘इस्लामिक बम’ के रूप में भारत में आया.

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले यह चिस्ती  गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बसा था. यहाँ उसने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

  • मध्ययुगीन लेखक ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि  चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।
  • मारकत इसरार नामक ग्रंथ के अनुसार चिश्ती ने  तीसरी शादी एक नाबालिग  हिन्दू लड़की को जबरन धर्मान्तरित करके की थी । वह हिंदू लड़की नहीं चाहती थी कि इस धर्मांध और अत्याचारी बर्बर मुसलमान मुस्लिम के साथ उसकी शादी हो.  ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती ने उस लडकी के पिता को एक युद्ध में हराकर कर इस नाबालिग लडकी को उठाया था।  इस्लामिक कानून के अंतर्गत यह नाबालिग लड़की भी माले गनीमत थी और काफिर की बेटी को वह  जैसे चाहे भोग सकता था। इसलिए  उसके साथ जबरदस्ती निकाह किया और उसका  नाम  उम्मत अल्लाह रखा। इससे हुई पुत्री का नाम हफिजा जमाल रखा। जिसकी मजार चिश्ती की ही दरगाह में मौजूद है। ऐसे व्यक्ति को संत कहना पूरे संत समाज का अपमान है.  
  • तारिख ए औलिया” (पुस्तक) के मुताबिक ख्वाजा ने अजमेर नरेश पृथ्वीराज चौहान को दीन  की दावत दी यानी मुसलमान बनने का अनुरोध किया । चौहान के इंकार करने पर ख्वाजा ने कहा ये इस्लाम पर ईमान नहीं लाता इसे  मैं  लश्करे इस्लाम के हवाले  करवाऊँगा। चिश्ती ने मोहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने को बुलाया।

पृथ्वीराज चौहान ने 16 बार गौरी को युद्ध में हराया और हर बार गौरी कुरान की कसम खाकर पैरों में पड़ जाता और पृथ्वीराज उसे क्षमा कर देते पर 17वें युद्ध में मैनुद्दीन चिस्ती  के छल कपट और जयचंद  की गद्दारी के कारण पृथ्वीराज पराजित हुए। गौरी उन्हें बंदी बना कर घोड़े से बाँध कर घसीटता हुआ ले गया। पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता को पकड़ने के लिए गोरी की सेना उनके अजमेर के महल में प्रवेश नहीं कर पा रही थी क्योंकि महल के चारों तरफ गहरी खाई थी जिससे इसी  चिश्ती की सलाह के बाद  खाई को हिंदुओं की लाशों से पाट दिया गया. लाशों के ऊपर से हाथी निकाला गया जिसकी टक्कर से महल का फाटक तोड़ना था लेकिन फाटक पर बड़े-बड़े कीले   लगे हुए थे जिससे हाथी अपने सिर की टक्कर नहीं मार पा रहा था. इसी चिस्ती  के कहने पर ही जयचंद के बेटे को फाटक से सटाकर खड़ा कर दिया गया और उस पर हाथी ने टक्कर मारी जिससे फाटक टूट गया और जयचंद को भी उसकी  गद्दारी की सजा मिल गई.

 


संयोगिता के बारे में वामपंथी इतिहासकारों ने सफेदी पोत दी है लेकिन  उपलब्ध जानकारी के अनुसार भी दो मत है. 

  1. एक मत के अनुसार मोइनुद्दीन चिश्ती के कहने पर ही गोरी की सेना ने संयोगिता को पकड़कर निर्वस्त्र करने के बाद दुष्कर्म करने के लिए मुस्लिम सैनिकों के सुपुर्द कर दिया. बाद में संयोगिता की पुत्रियों ने बदला लेने के लिए आत्मघाती बनकर चिस्ती को मार डाला. 
  2. दूसरे मत के अनुसार जब तक गोरी की सेना फाटक तोड़कर अंदर महल में पहुंची तब तक संयोगिता ने अपनी इज्जत बचाने के लिए अन्य महिलाओं के साथ आग में कूदकर जौहर  कर लिया था. 

सच्चाई जो भी हो लेकिन हर षड्यन्त्र के पीछे इस मोइनुद्दीन चिश्ती की साजिश पर सभी एकमत है.

 

पृथ्वीराज की हार  के बाद चिश्ती ने अजमेर के सारे मंदिर तुड़वा दिए और उनके मलबे से एक मस्जिद बनवाई, जिसका नाम है ढाई दिन का झोपड़ा क्योंकि इसे बेहद जल्दी में  केवल ढाई दिन में बना कर तैयार किया गया था । इसके पहले वहां सरस्वती मंदिर था.   दुर्भाग्य से ज्यादातर हिंदू पर्यटक इसे भी देखने जाते हैं. इसमें हिन्दू मन्दिरों के स्तेमाल किये गए अवशेष साफ़ दिखाई पड़ते हैं.  




विडम्बना देखिये कि  सृष्टि के रचियता ब्रह्मा की यज्ञस्थली और ऋषियों की तपस्थली तीर्थराज  पुष्कर का क्षेत्र है ये लेकिन ज्यादातर हिन्दू, फ़िल्मी सितारे और अन्य प्रसिद्ध हस्तियाँ यहाँ नहीं जाते. अजमेर से उत्तर-पश्चिम में करीब 11 किलोमीटर दूर पुष्कर में अगस्तय, वामदेव, जमदाग्नि, भर्तृहरि इत्यादि ऋषियों के तपस्या स्थल के रूप में उनकी गुफाएं आज भी नाग पहाड़ में हैं. 

पुराणों के अनुसार  ब्रह्माजी ने पुष्कर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णमासी तक यज्ञ किया था, जिसकी स्मृति में अनादि काल से यहां  कार्तिक मेला लगता आ रहा है। पुष्कर के मुख्य बाजार के अंतिम छोर पर ब्रह्माजी का मंदिर बना है। आदि शंकराचार्य ने संवत् 713 में ब्रह्मा की मूर्ति की स्थापना की थी। यह विश्व में ब्रह्माजी का एकमात्र प्राचीन मंदिर है। 

तीर्थराज पुष्कर को सब तीर्थों का गुरु माना  जाता है। इसे धर्मशास्त्रों में पांच तीर्थों में सर्वाधिक पवित्र माना गया है। पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गया, हरिद्वार और प्रयाग को पंचतीर्थ कहा गया है। अर्धचंद्राकार आकृति में बनी पवित्र एवं पौराणिक पुष्कर झील धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था  का जागृत  केंद्र है।

पौराणिक मान्यता  है कि ब्रह्माजी के हाथ से यहीं पर कमल पुष्प गिरने से जल प्रस्फुटित हुआ, जिससे इस झील का उद्भव हुआ। झील के चारों ओर 52 घाट व अनेक मंदिर बने हैं। 

महाभारत के वन पर्व के अनुसार योगिराज श्रीकृष्ण ने पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की थी। सुभद्रा के अपहरण के बाद अर्जुन ने पुष्कर में विश्राम किया था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने पिता दशरथ का श्राद्ध पुष्कर में किया था। ऐसे पौराणिक  तीर्थ स्थल के बारे बहुत कम लोग जानते हैं और शायद इसलिए जितने लोग दरगाह जाते हैं, उतने यहाँ नहीं पहुंचते.  

चिश्ती की दरगाह के बारे में एक और तथ्य है कि इसे एक अत्यंत  प्राचीन शिव मंदिर को तोड़कर बनाया गया है. इसके बारें में द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती ने बहुत विस्तार से बताया कि  जिस जगह पर अजमेर शरीफ की मजार है, उसके ठीक नीचे आज भी शिवलिंग विराजमान हैं.


निजामुद्दीन चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया और उनके  खून से मंदिरों को लाल कर दिया था। यही नहीं, इस तथा कथित सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे उसने स्वीकार किया.  इस क्रूर और दुश्चरित्र राक्षस  मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में इतिहास में दर्ज ये तथ्य बॉलीवुड की फिल्मों, गानों, सूफी संगीत और वामपंथी इतिहास से एकदम अलग हैं। अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि ये सूफी भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे, जिसके लिए उन्होंने हिन्दुओं पर बेहद क्रूरता की .

ऐसे दुष्ट-दानव ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को महामूर्ख  हिंदू आज भी  पूजते हैं, उसकी दरगाह पर मन्नते मांगने जाते हैं, इससे ज्यादा दुःख और शर्म की  बात और क्या हो सकती हैं?

हिंदू इतिहास से कुछ सीख नहीं रहा है या इतना पथ भ्रष्ट और स्वार्थी  हो गया है कि उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसने हिन्दुओं के साथ क्या किया और किसने सनातन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया और कितना नुकशान पहुंचाया. मोइनुद्दीन चिश्ती के खानदान के लगभग ११ हजार लोग दरगाह पर आये चढ़ावे पर एशो आराम का जीवन जीते हैं, जो मुख्यतया हिन्दू ही  चढाते हैं. चिश्ती जिसने जीते जी हिन्दुओं को मारा, मरने के बाद आज भी मार रहा है.

फोटो - गूगल 

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-    शिव मिश्रा


चुनावी चक्रव्यूह भेदकर अपराजेय महारथी बने योगी

 

चुनावी  चक्रव्यूह भेदकर अपराजेय महारथी बने योगी

 


उत्तर प्रदेश में 37 सालों के बाद योगी आदित्यनाथ ने ने ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है कि जब कोई निवर्तमान मुख्यमंत्री 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा करके लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहा है. भाजपा की  दो तिहाई बहुमत के साथ  सत्ता में वापसी,  और 2014 के बाद प्रदेश के सभी चुनाव में पताका फहराना भी अपने आप में बहुत बड़ा कीर्तिमान है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका श्रेय भाजपा की चुनावी टीम को जाता है जिसने अथक प्रयास किए लेकिन फिर भी इस जीत के पीछे मुख्यतय:  योगी सरकार का सुशासन और मोदी सरकार की कल्याणकारी  योजनाएं रहीं जिन्हें योगी ने अपने सुशासन के माध्यम से बड़ी सुगमता और ईमानदारी  से लाभार्थियों तक पहुंचा दिया. कोरोना संकट के समय जब मोदी और योगी प्रदेश के 15 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन पहुंचा कर अपने राजनीतिक  जमीन बना रहे थे तब ज्यादातर विपक्ष के नेता ट्विटर योद्धा बनकर केवल हवा बना कर जातीय और सांप्रदायिक चक्रव्यूह रच रहे थे, लेकिन लाभार्थियों का एक बड़ा  वर्ग जातीय समीकरण और सांप्रदायिक  गोलबंदी को ध्वस्त करते हुए मोदी-योगी के साथ मजबूती से खड़ा हो गया.

योगी आदित्यनाथ  के दृढ़ निश्चयी और कड़े फैसलों  ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को उस मुकाम पर पहुंचा दिया जिसके लिए जनता दशकों से इंतजार कर रही थी. यद्यपि विपक्ष ने उनकी  "ठोक दो" की नीति का जमकर विरोध किया और उन्हें बुलडोजर बाबा की उपाधि भी दी लेकिन जब अपराधी गले में तख्तियां लटका कर स्वयं थाने पहुंचकर जेल भेजने की प्रार्थना करने लगे तो शायद जनता को यह बहुत अच्छा लगा और इसकी चर्चा पूरे  भारत में ही नहीं विश्व के कई अन्य  देशों में भी हुई. विकरू  कांड के अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद तो विपक्ष ने योगी के विरुद्ध एक सुनियोजित अभियान चलाया और उन्हें ब्राह्मण विरोधी बताया. सपा और बसपा दोनों ने ही पूरे प्रदेश में ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किये और भगवान परशुराम की मूर्तियां स्थापित करने के साथ यह भ्रम फैलाने की कोशिश की योगी आदित्यनाथ ब्राह्मण विरोधी हैं.

यह योगी आदित्यनाथ का सख्त प्रशासन ही था कि संशोधित नागरिकता कानून के विरोध में हो रहे आंदोलनकारियों के निशाने पर रहे  उत्तर प्रदेश में आंदोलनों का कोई ख़ास  असर नहीं हो पाया और जिसने  भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की उससे वसूली की कार्यवाही की गई, तथा फरार अपराधियों के पोस्टर शहर के मुख्य चौराहों पर लगाए गए. यह सब ऐसे असाधारण कार्य हैं जिन्हें पूरे देश में उदाहरण के तौर पर लिया जाता है. प्रदेश के बड़े बड़े माफिया और अपराधी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए जो पिछली सरकारों के समय अति महत्वपूर्ण हुआ करते थे और   जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जैसे जिले के वरिष्ठ अधिकारी जेल में उनके साथ बैडमिंटन खेलते थे. आसानी से समझा जा सकता है कि प्रदेश में कितना कानून का, और कितना माफिया का राज था. माफियाओं और अपराधियों पर शिकंजा कसने के कारण ही यह संभव हो सका कि योगी कार्यकाल में प्रदेश में एक भी दंगा नहीं हुआ जबकि पिछली अखिलेश सरकार में लगभग ७०० दंगे  हुए थे. भू माफियाओं के कब्जे पर बुलडोजर चला कर  सरकारी जमीन मुक्त कराई गई और उन पर गरीबों के लिए मकान बनाए गए. जनता को यह कार्य कितना पसंद आया कि उसने योगी को बुलडोजर बाबा का एक नाम भी दे दिया. 

जनता की स्वीकार्यता के बाद भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त विपक्ष और अनेक देश विरोधी ताकतों ने योगी के विरुद्ध नए-नए विमर्श गढ़ने  का कार्य किया, उन्हें हिंदू मिलिटेंट मोंक, भगवा आतंकी, और ढोंगी बाबा तक कहा गया.  न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट, बीबीसी आदि में  उनके विरुद्व विद्वेष पूर्ण लेख लिखे गए. पाकिस्तान के समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर  उनके विरुद्ध जहर उगला जाता रहा. वामपंथ और इस्लामिक गठजोड़ से सम्बद्ध एक बहुत बड़ा वर्ग  भारत में भी है, जो उनके नाम से चिढ़ता है, और  उनके विरुद्ध लगातार दुष्प्रचार करता रहता है. इन सभी ने योगी  की छवि एक मुस्लिम विरोधी रूढ़िवादी और कट्टरपंथी हिंदू की बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोडी. वह रूढ़िवादी तो बिल्कुल भी नहीं यह इससे भी साबित होता  है कि वह कई बार नोएडा गए जिसके बारे में कहा जाता है कि जो मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है और इस कारण मायावती और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री रहते हुए कभी नोएडा नहीं गए थे .

देश में अभी तक  धर्मनिरपेक्षता का मतलब हिंदू विरोध और मुस्लिम तुष्टिकरण होता था, लेकिन योगी आदित्यनाथ ने कभी यह कहने में संकोच नहीं किया कि वह हिंदू है और हिंदुत्व ही उनकी सांस्कृतिक पहचान है. हिंदुस्तान के उन राजनेताओं को , जो टोपी पहनने और टोपी पहनाने में माहिर हैं,  यह रास नहीं आता था और  ये  योगी के  विरुद्ध हमेशा जहर उगलने का काम करते थे  कि धर्मनिरपेक्ष भारत में  संप्रदायिक आचरण  स्वीकार्य  नहीं है.  ऐसे नेताओं ने जिन्ना और हिजाब प्रकरणसे  इन चुनावों में से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की भरपूर कोशिश की लेकिन  हिंदुओं के वोट भी हासिल करने के लिए अपने आप को धार्मिक हिंदू साबित करने के लिए माथे पर चंदन लगाकर, रामनामी भगवा दुपट्टा ओढ़ कर मंदिरों में दर्शन करते हुए फोटो खिंचवाना नहीं भूले  . इस तरह योगी ने उत्तर प्रदेश के चुनाव में राजनीतिक  विमर्श की दिशा ही  बदल दी और इन चुनावों से यह साबित भी हो गया कि चाहे कितना ही मुस्लिम तुष्टिकरण क्यों न किया जाए,  केवल मुस्लिम ट्रंप कार्ड के सहारे  चुनाव नहीं जीते जा सकते.

यद्यपि योगी सरकार को विकास के कार्य करने के लिए केवल दो से ढाई वर्ष का समय ही मिला क्योंकि बाकी समय कोरोना की जंग लड़ते ही बीता जो जनसंख्या यह हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण था लेकिन इससे निपटने के तौर-तरीकों के लिए योगी सरकार को जहां विश्व स्वास्थ्य संगठन की सराहना मिली वहीं विपक्ष और देश विरोधी ताकतों नें गंगा में बहती लाशों, श्मशान घाट की तस्वीरों के माध्यम से पूरे विश्व में योगी और मोदी की ही नहीं बल्कि पूरे भारत की छवि धूमिल करने का कुत्सित प्रयास किया. कुछ नेताओं ने तो स्वदेशी वैक्सीन को भाजपा की वैक्सीन बताकर बहिष्कार करने का आह्वान किया.

योगी सरकार का बीते 5 वर्ष का कार्यकाल पिछली  सरकारों  की तुलना में इसलिए भी उल्लेखनीय है कि मंत्रिमंडल  स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई भी आरोप नहीं लगाया जा सका है. आज  जब  ईमानदारी का तमगा लेकर घूमने वाले देश के कई मुख्य मंत्रियों और पूर्व मुख्य मंत्रियों की भ्रष्टाचार की कहानियां चौक चौराहों पर चर्चा का विषय हों,  योगी आदित्यनाथ का 5 वर्षों का बेदाग कार्यकाल अपने आप में एक बहुत बड़ा उदाहरण है.

अपराधियों और अराजक तत्व के विरुद्ध जितनी सख्त कार्यवाही योगी आदित्यनाथ ने की, उतनी कल्याण सिंह के अलावा शायद ही किसी मुख्यमंत्री ने की हो. सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा करके खड़ी की गई आलीशान इमारतें भी बुलडोजर बाबा ने धराशाई कर दी और उन पर गरीबों के लिए मकान बनाए गए. राज्य में लड़कियों और महिलाओं ने अपने आप को सुरक्षित महसूस किया जिसके लिए उनके मन में योगी के प्रति बहुत सम्मान हैं. दूरदराज की ग्रामीण महिलाएं चुनाव प्रचार के लिए जाने वाले लोगों से कहती थी वे मोदी का नमक ( राशन के साथ मिलने वाला नमक) और योगी द्वारा दी गई सुरक्षा का प्रतिदान अवश्य करेंगी.

2017 में भाजपा ने जब योगी को मुख्यमंत्री बनाया तो राजनीतिक पंडितों ने नए-नए विमर्श गढ़े धर्मनिरपेक्ष देश में एक कट्टर हिंदू (योगी) जनता पर जबरदस्ती थोप दिया गया है और जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगी. 2022 का चुनाव इस मामले में बिल्कुल स्पष्ट है. भाजपा ने योगी को मुख्यमंत्री के रूप में पहले से ही घोषित कर दिया था और अब जब जनता ने अपार समर्थन से उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाया है तो इस बात की पुष्टि हो गई है जनता को उनका और राजनीति का यही रूप पसंद है. इससे आगामी चुनाव अभियानों की दिशा बदल जाएगी.

इन चुनावों में जिन्ना और हिजाब के माध्यम से हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने की जबरदस्त कोशिश की गई जिसके परिणाम स्वरूप सपा को मुस्लिम समुदाय के लगभग शत प्रतिशत वोट मिले. यही कारण है कि हैदराबादी भाईजान कोई करिश्मा नहीं कर सके और बसपा धराशाई हो गई. जो लोग समझते थे कि एमवाई ( मुस्लिम - यादव) फैक्टर से चुनाव बहुत आसानी से जीता जा सकता है, उन्हें  भाजपा ने अपने एमवाई  ( मोदी- योगी) फैक्टर से इसे धराशाई कर दिया.

मेरा व्यक्तिगत मत है उत्तर प्रदेश के इन चुनावों से राजनीतिक दलों की धारणा बदलेगी और वे मुस्लिम वोटों को ट्रंप कार्ड की तरह इस्तेमाल करना बंद करेंगे और इससे तुष्टिकरण की राजनीति पर लगाम लगेगी. उत्तर प्रदेश में जब तक तुष्टिकरण का प्रयोग होता रहेगा योगी अपराजेय योद्धा बने रहेंगे.

-    - - शिव मिश्रा







 

शुक्रवार, 11 मार्च 2022

यूक्रेन रूस युद्ध से भारत को संदेश

 



आज के युग में जब दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने और जीवन की संभावना के लिए उचित वातावरण की खोज पर के लिए  बड़ी मात्रा में धन खर्च किए जा रहा हो, ऐसे में यूक्रेन-रूस  युद्ध में हजारों लोगों की जान जाना और लाखों लोगों  का बेघर हो जाना बेहद दुखी करने वाला है. युद्ध का कारण सिर्फ यह है कि यूक्रेन नाटो का सदस्य बनना चाहता था ताकि उसे सुरक्षा कवच मिल सके और  यदि यूक्रेन को नाटो की सदस्यता मिल गई होती तो अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो ने यूक्रेन में परमाणु हथियार और परमाणु मिसाइलें तैनात कर दी होती और तब रूस के अस्तित्व को हमेशा खतरा बना रहता. इस बीच कथित रूप से जैसे ही रूस को यह सूचना मिली कि यूक्रेन बायोलॉजिकल हथियार बना रहा है, उसने यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया. रूस ने युद्ध रोकने की शर्त भी यही रखी कि न तो यूक्रेन नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन करेगा और ना ही न तो उसे सदस्यता प्रदान करेगा और उसे इस बात की  गारंटी चाहिए. फिलहाल न तो  यूक्रेन इसे स्वीकार कर रहा है, और न ही  अमेरिका इस संबंध में कोई आश्वासन दे रहा है और इसलिए यूक्रेन की धरती पर भयंकर युद्ध चल रहा है और रूस की सेना भारी तबाही मचा रही है. हजारों लोग मारे जा चुके हैं, औद्योगिक प्रतिष्ठान, रिहायशी इलाके, सड़कें, पुल, सैनिक अड्डे और बड़ी बड़ी  इमारतें ही नहींऔर  पूरे के पूरे शहर तबाह हो चुके हैं. यूक्रेन के परमाणु बिजली घर रूस  के कब्जे में आ चुके हैं. यूक्रेन केवल नाक की लड़ाई लड़ रहा है इस युद्ध का परिणाम  यूक्रेन की बर्बादी के अलावा कुछ भी नहीं होगा.  

 

विश्व समुदाय की सहानुभूति स्वाभाविक रूप से यूक्रेन के साथ है क्योंकि आक्रमण रूस ने किया है और यूक्रेन में भारी धन जन की हानि हो रही है. भारत विश्व का पहला देश था जिसने अपने छात्रों और नागरिकों को निकालने की पहल की. अन्य देशों के नागरिकों के साथ यूक्रेन के  सामान्य लोग भी पलायन कर रहे हैं, जिनकी संख्या 20 लाख से ऊपर पहुंच चुकी है. इस बीच अमेरिका और यूरोपीय समुदाय ने रूस के खिलाफ कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं जिस कारण  यूरोप और अमेरिका  की कई  आईटी, फार्मा और वित्तीय क्षेत्र की कंपनियों ने रूस में अपना कारोबार बंद करने का फैसला किया है, इनमें एप्पल,  गूगल, मास्टर कार्ड वीजा कार्ड, अमेरिकन एक्सप्रेस और पेपाल  जैसी कंपनियां भी शामिल है. इसका रूस पर व्यापक असर दिखने लगा है.  कार्ड और पेमेंट सेटेलमेंट से संबंधित कंपनियों वीजा,  मास्टरकार्ड और अमेरिकन एक्सप्रेस के कारोबार बंद कर देने से क्रेडिट कार्ड बुरी  तरह से प्रभावित हो गए हैं और एटीएम कार्ड कैश निकालने का साधन मात्र रह गए हैं. ऑनलाइन खरीदने के आदी हो चुके लोगों को   ज्यादातर नकद  खरीदना पड़ेगा. ऐसे में एटीएम के बाहर लंबी लंबी कतारें लगी हैं और बैंक की शाखाओं में घुसने की जगह नहीं है क्योंकि सभी को कैश  चाहिए. इस कारण  अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह तेजी से बढ़ेगा और ऑनलाइन व्यापार भी बुरी तरह से प्रभावित होकर कैश ऑन डिलीवरी तक सीमित रह जाएगा. गूगल हमारे दैनिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है. बात चाहे गूगल पर जाकर कुछ खोजने की हो, या  रास्ता ढूंढने की, गूगल सर्च इंजन के बिना हमारे जीवन में एक बहुत बड़ी रिक्तिता आ जाएगी.  जिन अमेरिकन कंपनियों के उत्पाद रूसी जनता ने खरीदे हैं उनके  पार्ट्स उपलब्ध न होने से "आफ्टर सेल्स सर्विस" बंद हो जाएगी और देश को बहुत बड़ा वित्तीय नुकसान होगा. हवाई क्षेत्र की कंपनी बोइंग जिसके बहुत सारे यात्री विमान रूस  ने खरीद रखे हैं उनका  रखरखाव और मरम्मत का कार्य बहुत मुश्किल हो जाएगा. यद्यपि इन अमेरिकन कंपनियों के रूस से  काम समेटने से उनका स्वयं उनका बहुत वित्तीय नुकसान होगा, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण डालर रूबल भुगतान बंद  हो जाने के कारण इन कंपनियों के लिए लिए कार्य करना संभव भी नहीं रह गया है.

इन प्रतिबंधों से भारत सहित दुनिया के देशों को तीन बहुत बड़े संदेश प्राप्त होते हैं-

१.पहला संदेश यह है कि जनता को अपने देश के सरकार का चुनाव  बहुत सावधानी से करना चाहिए  और उसका  मुखिया यानी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति कौन होगा इस पर  गंभीरता  पूर्वक करना चाहिए कि उनके वोट से जो  व्यक्ति  सरकार का मुखिया बनने  जा रहा हैं, उस व्यक्ति में  इस जिम्मेदारी के  निर्वाहन की क्षमता है भी या नहीं क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए. यूक्रेन में जनता ने 3 साल पहले जब वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की को राष्ट्रपति चुना था तब वह एक प्रसिद्ध कॉमेडियन थे लेकिन  बिना उनकी  राजनीति क्षमताओं को जाने केवल इस आधार पर कि वह एक अच्छे कलाकार हैं, राष्ट्रपति बना दिया. यह सही है कि रूस के आक्रमण के बाद जेलेंसिकी ने स्वयं सेना की वर्दी पहन ली और  जनता में राष्ट्रवाद की ऐसी अलख जगाई कि आज सेना के साथ आम नागरिक भी रूसी सेनाओं से लड़ने के लिए तैयार हैं . निश्चित रूप से इसकी प्रशंसा की जानी चाहिए लेकिन अगर जेलेंस्की की जगह यूक्रेन का राष्ट्रपति कोई सक्षम राजनीतिक सिटी युवा इस चर्चा व्यक्ति होता तो शायद युद्ध की नौबत ही नहीं आती. बिना नाटो की सदस्यता के भी यूक्रेन अपनी एकता अखंडता और संप्रभुता बनाए रख सकता था और रूस सहित  दुनिया के अन्य देशों के साथ अच्छे संबंध भी बनाए रख सकता था.

प्राप्त सूचनाओं के अनुसार अब जेलेंस्की ने रूस के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है कि वह नाटो की सदस्यता नहीं लेंगे और पूर्वी यूक्रेन के  दोनों क्षेत्र  डोनेत्स्क और लुहान्स्क पर रूस द्वारा घोषित स्वायत्तता स्वीकार करेंगे. इतने  बड़े राष्ट्रीय  नुकसान और जनधन की हानि कराने  के बाद जिस का आकलन करना बहुत मुश्किल है, जो रूस चाहता था, उससे कहीं ज्यादा  किया. एक देश के राष्ट्रपति में  राजनीतिक परिपक्वता के अभाव ने देश का इतना बुरा हाल कर दिया इसकी सहज कल्पना करना भी मुश्किल है. इस संबंध में भारत के मतदाताओं की समझदारी की प्रशंसा करनी होगी  जिन्होंने 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का 30 साल बाद मौका दिया था और उन्हें  निराश नहीं होना पड़ा  बल्कि  2019 में जनता ने पुनः मौका दिया. 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को आशातीत बहुमत देकर  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के 5 वर्ष के कार्यकाल को देखा और आज  जिन  राज्यों के चुनाव घोषित हुए हैं उनमें उत्तर प्रदेश सहित चारों भाजपा शासित राज्यों में जनता ने भाजपा को भारी बहुमत से पुनः विजयी  बनाया. 

 

२. दूसरा संदेश जिसे भारत और अन्य देशों को बहुत गंभीरता से ग्रहण करना चाहिए वह यह है कि बिना आत्मनिर्भरता के कभी भी बड़ा संकट सामने आ सकता है, विशेष तौर से वित्तीय, औद्योगिक और खाद्यान्न उत्पादन.  वित्तीय एवं बैंकिंग क्षेत्र में भारत ने  कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं, आज भारत की भुगतान व्यवस्था विश्व में सर्वश्रेष्ठ है. आरटीजीएस, एनईएफटी, आइएमपीएस और  यूपीआई भारतीय बैंकिंग व्यवस्था में नवाचार के उत्कृष्ट उदाहरण है. कार्ड भुगतान और सेटलमेंट व्यवस्था में रूपे लगातार प्रगति कर रहा है और आज भारत में इस्तेमाल होने वाले कुल डेविड कार्ड में 60% की हिस्सेदारी रुपे कार्ड की है. यद्यपि क्रेडिट कार्ड क्षेत्र में रूपे  का दबदबा डेबिट कार्ड की तरह नहीं बन पाया है फिर भी सरकारी प्रोत्साहन के कारण रुपए ने उल्लेखनीय प्रगति की है और हम आशा कर सकते हैं कि आगामी वर्षों में  भुगतान और सेटलमेंट  हेतु  वीजा और मास्टरकार्ड जैसी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता बहुत कम या खत्म हो जायेगी. प्रतिबंधों के बाद क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड  की भुगतान व्यवस्था से संबंधित जिन परेशानियों का सामना रूस की जनता को करना पड़ रहा है संभवत उस तरह की परेशानियां उन परिस्थितियों में भारत को नहीं आएगी.

 

३.     ३. तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है शिक्षा का क्षेत्र जिसमें  प्रत्येक देश को जितना संभव हो सके आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए. भारत के लगभग  24000 छात्र यूक्रेन में चिकित्सा शिक्षा की डिग्री प्राप्त करने हेतु अध्ययन कर रहे थे, रूस के आक्रमण के बाद भारत सरकार को उन्हें ऑपरेशन गंगा के तहत निकालना पड़ा. इसमें एमबीबीएस प्रथम वर्ष से लेकर अंतिम वर्ष तक के छात्र हैं और ऐसे छात्र भी हैं जो इंटर्नशिप कर रहे थे. इन सभी के यूक्रेन वापस जाकर शिक्षा पूरी करने की संभावनाएं निकट भविष्य में बहुत कम है. इन सभी का भविष्य दांव पर लग गया है इनकी बची हुई पढ़ाई भारतीय मेडिकल कॉलेज में करवा पाना मुश्किल होगा और अगर ऐसा किया जाता है तो यह चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता करना होगा. वैसे भी जब कोई छात्र रूस, यूक्रेन, चीन, बांग्लादेश और नेपाल से एमबीबीएस की डिग्री लेकर आते हैं तो उन्हें भारत में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित प्रोफेशनल  परीक्षा पास करनी होती है और इसे भी बहुत कम छात्र पास कर पाते हैं. जो यह परीक्षा पास नहीं कर पाते हैं वी डॉक्टर नहीं बन पाते हैं और कोई दूसरा व्यवसाय या नौकरी चुनते हैं लेकिन इन छात्रों द्वारा विदेश में चिकित्सा शिक्षा प्राप्त करने के लिए किया गया बड़ा खर्चा बेकार चला जाता है.

 

यूक्रेन से लौटे हुए इन छात्रों के समक्ष एक नई चुनौती खड़ी हो गई है इसमें ज्यादातर ऐसे छात्र हैं  जिन्हें अभी मेडिकल डिग्री भी नहीं मिल पाई है, ऐसे में इन छात्रों को भारतीय मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश देना बहुत बड़ी चुनौती है. भारत में मेडिकल कॉलेज खोलने की गति इतनी धीमी रही है कि इनसे निकलने वाले डॉक्टर देश की बढ़ती जनसंख्या के लिए पर्याप्त नहीं है. इसलिए देश में हर जिले में राजकीय या निजी क्षेत्र मैं मेडिकल कॉलेज खोले जाएं जिससे एमबीबीएस की कुल उपलब्ध सीटों की संख्या बढ़ाई जा सके और छात्रों को चिकित्सा शिक्षा हेतु विदेश ना भाग ना पड़े.

-शिव मिश्रा

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