मंगलवार, 13 जुलाई 2021

उत्तर प्रदेश का प्रस्तावित जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021- लक्ष्य से भटकता कानून

 


उत्तर प्रदेश का प्रस्तावित जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021- लक्ष्य से भटकता कानून

 


क्या प्रस्तावित जनसंख्या विधेयक अपना लक्ष्य प्राप्त का सकेगा ?


भारत में जनसंख्या विस्फोट को देखते हुए एक अत्यंत प्रभावी जनसंख्या नियंत्रण कानून की आवश्यकता है  जिससे  आर्थिक विकास की गति तेज हो सके और लोगों के जीवन स्तर में अपेक्षित सुधार लाया जा सके. अभी स्थिति यह है  कि देश में जितने संसाधन  उत्पन्न किए जाते हैं,  वह बढ़ती जनसंख्या के कारण पर्याप्त नहीं हो पाते हैं और इस कारण देश में अपेक्षित विकास  नहीं हो पा रहा है. 


जनसंख्या वृद्धि  कुपोषण से लेकर शिक्षा और रोजगार सभी को प्रभावित कर रही है. इसलिए उत्तर प्रदेश  जैसे  बड़े राज्य के लिए जिसकी जनसंख्या  विश्व के 4 देशों चीन, भारत अमेरिका और इंडोनेशिया को छोड़कर सभी देशों से ज्यादा है,  जनसंख्या नियंत्रण  कानून की अत्यंत आवश्यकता है, इसमें कोई संदेह नहीं  बल्कि इसे बहुत पहले प्रदेश में लागू किया जाना चाहिए था. 


भारत में जनसंख्या की समस्या : 


जनसंख्या नियंत्रण की नीति बनाते समय देश के समक्ष जनसंख्या चुनौती को भी ध्यान में रखना अनिवार्य है जिससे नियंत्रण, स्थिरीकरण  के साथ  साथ विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच संतुलन  भी बना रहे. 


यह कोई  छिपी  बात नहीं की आजादी के बाद से हिंदुओं की तुलना में मुस्लिमों की जनसंख्या में बहुत तीव्र गति से  वृद्धि  हो रही है. इसका सबसे बड़ा कारण  है कि इस समुदाय द्वारा   धार्मिक आधार पर परिवार नियोजन  न अपनाया जाना,  यद्यपि पढ़े-लिखे मुस्लिम परिवारों में  काफी हद तक  परिवार नियोजित किए जा रहे हैं. 


मुस्लिम जनसंख्या  की तेजी से वृद्धि  होना केवल भारत की नहीं बल्कि विश्व के अनेक देशों की समस्या है. कई देश ऐसे हैं जहां जनसांख्यिकी इस तरह से बदल गई  है, जहां पहले तरह तरह की समस्याएं उत्पन्न हुई  और फिर वहां के मूल निवासियों का जीना दूभर हो गया.  इसके बाद  कई देश इस्लामिक देश बन गए.  दूसरे  मत के लोगों का या तो  धर्मांतरण हो गया या पलायन हो गया.  इस सब के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सुनियोजित साजिश काम करती रहती है जिसके लिए कई मुस्लिम देश धन उपलब्ध कराते हैं. 


भारत में भी इस तरह की समस्या आजादी के बाद से ही देखी जा रही है कम से कम आठ ऐसे राज्य हैं जहां  हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं  और ऐसे राज्यों में अलगाववाद  एक नासूर  बन गया है .  जम्मू कश्मीर इसका एक  ज्वलंत उदाहरण है,  जहां से कश्मीरी पंडितों  का नरसंहार किया गया और उन्हें घाटी छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया गया. अपने ही देश में यह कश्मीरी पंडित दशकों से शरणार्थी जीवन व्यतीत कर रहे हैं. 


पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से  लगे सीमावर्ती जिलों में  जनसंख्या घनत्व तेजी से बदल गया है और कई जगह मुस्लिम जनसंख्या का प्रतिशत 90% तक पहुंच गया है. पिछले चुनाव में  पूरे देश ने देखा कि तुष्टिकरण की  छत्रछाया में  पूरे पश्चिम बंगाल में हिंसा का भयंकर तांडव हुआ.  हत्या, लूटपाट और बलात्कार की इतनी घटनाएं हुई कि लोगों को बरबस देश के विभाजन के समय हुई  घटनाओं की यादें ताजा हो गई.  पश्चिम बंगाल के लाखों लोगों ने  जान बचाने के लिए अन्य राज्यों में शरण ली.  अगर दूसरी राज्यों में  भागने का अवसर  उपलब्ध नहीं होता तो इन हिंदू शरणार्थियों के पास मरने या  धर्म बदलने के अलावा  कोई दूसरा विकल्प नहीं होता. 


  भारत में इस समय मुस्लिम आबादी बढ़ाने के  लिए एक साथ कई मोर्चों पर काम किया जा रहा है और इसमें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों शक्तियां  काम कर रही हैं और उन्होंने पूरे भारत में   अपना जाल बिछा रखा है.  इनमें धर्मांतरण,  लव जिहाद, अवैध  घुसपैठ करा कर  बांग्लादेशियों  और  रोहिंग्याओं  को पूरे भारतवर्ष में योजनाबद्ध तरीके से बसाना,  रणनीतिक स्थानों से हिंदू समुदाय  का पलायन करवाना और  परिवार नियोजन न अपना कर  ज्यादा से ज्यादा जनसंख्या बढ़ाना  शामिल है.   

 


उक्त  परिपेक्ष में  अगर हम उत्तर प्रदेश के प्रस्तावित जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) विधेयक, 2021का विश्लेषण करें तो उसमें कुछ गंभीर खामियां नजर आती  हैं. 


क्या है प्रस्तावित कानून ? 


उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन

उत्तर प्रदेश सरकार के कर्मचारी जो स्वैच्छिक रूप से परिवार नियोजन का पालन  करने के लिए नसबंदी कराएंगे उनके लिए निम्न प्रोत्साहन  की व्यवस्था है 

  •  2 अतिरिक्त वेतन वृद्धि 

  • भूखंड या मकान खरीदने हेतु अनुदान 

  • मकान खरीदने के लिए बहुत  कम ब्याज दर पर  पर सॉफ्ट लोन

  • पानी, बिजली, गृह कर और जलकर में रियायत

  • एक  साल का  पूर्ण  वेतन पर मातृत्व या  पितृत्व  अवकाश

  • नियोक्ता द्वारा एनपीएस में 3% ज्यादा अंशदान

  • मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं और  पति या पत्नी को बीमा कवर तथा

  •  अन्य सुविधाएं और लाभ जैसा कि सरकार द्वारा  समय-समय पर निर्धारित किया जाए

राज्य सरकार के कर्मचारियों के लिए विशेष लाभ 
  •  एक संतान होने पर सभी शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में वरीयता

    • ऐसी संतान को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता

    • स्नातक तक मुफ्त सुविधा

    • लड़कियों हेतु  उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति


सामान्य जनता को मिलने वाले लाभ

  •  मकान खरीदने के लिए बहुत  कम ब्याज दर पर  पर सॉफ्ट लोन

  • पानी, बिजली, गृह कर और जलकर में रियायत

  • संतानों के लिए स्नातक तक मुफ्त सुविधा

  • लड़कियों हेतु  उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति

  • गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले दंपति के लिए यदि वह एक बच्चे के बाद नसबंदी करा लेते हैं तो एकल   बालिका  संतान पर ₹100000 तथा एकल  बालक  संतान पर ₹80000 की प्रोत्साहन राशि


हतोत्साहन या दंडात्मक प्रावधान :

  •  दो से ज्यादा संतानों के होने पर सरकार द्वारा प्रायोजित कल्याणकारी योजनाओं से वंचित किया जाएगा

  •  राशन कार्ड की सीमा 4 लोगों तक ही निर्धारित होगी

  • स्थानीय निकाय के चुनाव में प्रत्याशी बनने पर प्रतिबंध 

  •  दो से  अधिक संतान होने पर सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर सकेंगे

  •  सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों को एक्ट लागू होने के 1 साल के अंदर एक अंडरटेकिंग देनी होगी कि वह 2 बच्चों के नियम का पालन करेंगे.

  •  नियम तोड़ने पर सरकारी नौकरियों में प्रोन्नति नहीं मिलेगी

  •  किसी तरह का अनुदान या सरकारी रियायत से वंचित किया जाएगा 

  • दो संतान होने के बाद भी दंपति  तीसरे बच्चे  को गोद ले सकेंगे जिसमें नियम बाधा नहीं बनेगा.

  • दोनों संतानों में से किसी एक के डिसेबिलिटी होने पर तीसरी संतान  होने पर  नियम लागू नहीं होगा.

  •  दो संतानों में से अगर किसी की मृत्यु हो जाती है तो ही तीसरी संतान के लिए यह नियम लागू नहीं होगा. 

  •  कानून  लागू होने के 1 साल के अंदर अगर  तीसरी संतान होती है तो यह नियम लागू नहीं होगा

  • सबसे अधिक आपत्तिजनक व्यवस्था बहु  पत्नी  और बहु  पति विवाह के  मामलों में की गई है, जिसमें पर्सनल ला के आधार पर बहु  पत्नी और  बहु पति  के लिए  काफी  उदार   व्यवस्था  की गई है .


 प्रस्तावित कानून के  आपत्तिजनक प्रावधान 


  1. सबसे अधिक आपत्तिजनक व्यवस्था बहु विवाह के  मामलों में की गई है जिसमें सेक्शन १९  में व्यवस्था है कि यदि किसी व्यक्ति ने, जो पर्सनल धार्मिक कानून के अंतर्गत एक से अधिक विवाह कर सकता है,  एक से अधिक विवाह किए हैं और  सभी पत्नियों के  मिला  कर  उसके दो से अधिक बच्चे हैं तो वह व्यक्ति तो इस कानून के अनुसार  सुविधाओं से वंचित होगा लेकिन उस व्यक्ति की पत्नियां अलग अलग रूप से यदि  उनमें से प्रत्येक के पास अधिकतम दो या  जुड़वा संतानों की स्थिति में  अधिकतम तीन संतानों  तक   उन्हें और उनकी संतानों को किसी लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा.  

  2. इस तरह से यदि किसी  मुस्लिम व्यक्ति  ने चार शादियां की हैं  और उसकी चारों  पत्नियों से  8 या  जुड़वा संतान होने की विशेष परिस्थितियों में 12 बच्चे हैं,  तो वह स्वयं तो  कानून के उल्लंघन का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार वह  सरकारी लाभ से  वंचित रहेगा  लेकिन उसकी चारों पत्नियां और बच्चे  सरकारी लाभ से वंचित नहीं होगे और न ही उनके विरुद्ध अन्य कोई कार्यवाही होगी.  इसका अर्थ यह हुआ एक मुस्लिम व्यक्ति को चार पत्नियों के साथ अगर पत्नी अलग-अलग दो या तीन संतान जैसा भी  हो का नियम मानती है तो उस परिवार पर कोई भी असर नहीं आएगा और उसे राज्य की योजनाओं का लाभ यथावत मिलता रहेगा उसके राशन कार्ड में भी कटौती नहीं की जाएगी.

  3.  धारा 19 में यह भी व्यवस्था है कि यदि कोई सरकारी कर्मचारी / जनता से कोई व्यक्ति पर्सनल ला के अंतर्गत दूसरी, तीसरी, या चौथी शादी करता है तो भी उस पर  दंडनीय  प्रावधान लागू नहीं  होंगे.  

  4.  एक और हास्यप्रद  व्यवस्था  बहुपति विवाह के संदर्भ में की गई है उसमें भी यदि किसी पत्नी  जिसके कई पति हैं और  सभी पतियों से उसके दो से अधिक संतान हैं तो  पत्नी  स्वयं तो  इस नियम के उल्लंघन की जिम्मेदार ठहरायी  जाएगी और उसे  सुविधाओं से वंचित किया जाएगा लेकिन यदि प्रत्येक पति के यदि दो से अधिक बच्चे नहीं है जुड़वा संतान के मामले में तीन से अधिक बच्चे नहीं है  तो वह इस नियम का उल्लंघन करने वाला नहीं माना जाएगा और उसे  तथा उसकी संतानों को सुविधाओं से वंचित नहीं किया जाएगा.  इसमें हास्यास्पद  यह है कि एक पत्नी से उत्पन्न होने वाली सभी संतानों में यह कैसे तय किया जाएगा कौन संतान किस पति की  है और किस  पति  से कितनी संताने हैं? 

  5.  अच्छा तो यह होता यदि  यह व्यवस्था  की जाती कि इस कानून के लागू होने के बाद यदि   कोई स्त्री दूसरी, तीसरी या चौथी  पत्नी के रूप में किसी व्यक्ति से शादी करती है तो वह  इस कानून के उल्लंघन की दोषी मानी जाएगी और तब  उसेऔर उसकी  संतानों  को सरकारी लाभ से वंचित किया जाएगा. 

  6. यही व्यवस्था  बहुपति विवाह में भी लागू की जा सकती है. 

  7. राज्य सरकार के कर्मचारियों को कानून लागू होने के 1 साल के अंदर एक अंडरटेकिंग देनी होगी कि वह  इस कानून का पालन करेंगे. 1 साल की व्यवस्था करने का मतलब है उन्हें एक  और संतान  के लिए अनुमति दे देना. 

  8.  जब सर्वोच्च न्यायालय   समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए केंद्र सरकार को  अनुस्मारक  दे रहा है और हाल  ही में  दिल्ली उच्च न्यायालय ने मीणा समुदाय के एक  तलाक के मामले में व्यवस्था दी है कि  अलग-अलग समुदाय के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं नहीं हो सकती  और  केंद्र सरकार को   निर्णय की कॉपी भेजते हुए समान नागरिक संहिता जल्द से जल्द लागू करने की  सलाह दी है. ऐसे समय में धार्मिक आधार पर  पर्सनल लॉ के  अनुसार छूट देकर कोई  नया कानून  बनाना तर्कसंगत और  प्रगतिशील  कदम  नहीं लगता.  

  9. प्रस्तावित कानून की धारा 5 के अंतर्गत एकल संतान पर प्रोत्साहन देना उचित प्रतीत नहीं होता.  इससे भारत में   हिंदू समुदाय में  नकारात्मक वृद्धि दर होने की संभावना है,  जिससे   विभिन्न धर्मावलंबियों के  बीच  जनसंख्या असंतुलन पैदा हो जाएगा,  जो भारत जैसे देश के लिए अत्यंत खतरनाक साबित होगा. 

    1.   चीन ने कई दशक पहले इस तरह की नीति बनाई थी जिसे  शीघ्र ही  बदल कर दो संतान में कर दिया गया  था और हाल ही में चीन ने तीन संतान की अनुमति दे दी है. 


  1.  हिंदू समुदाय में पढ़े लिखे लोग और खास तौर से नौकरी पेशे से जुड़े  लोग  पहले ही परिवार नियोजन अपनाते चले आ रहे हैं.  राज्य सरकार की कर्मचारियों के रूप में मिलने वाले प्रोत्साहन से उन्हें फायदा तो जरूर होगा लेकिन सामान्य जनता में प्रोत्साहन के लालच में  यदि दो संतान की नीति लागू हो जाती है तो विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच जनसंख्या असंतुलन पैदा हो जाएगा. इससे सबसे अधिक नुकसान हिंदू समुदाय को होगा. 


समग्र रूप से  देखें तो उत्तर प्रदेश का  प्रस्तावित जनसंख्या विधेयक  ज्यादातर हिंदू समुदाय को ही  प्रभावित करेगा और ऐसे में जबकि मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है,  उन्हें पर्सनल ला के आधार पर  न केवल परिवार नियोजन से  राहत देना बल्कि बहु विवाह   को भी  अप्रत्यक्ष रूप से अनुमति प्रदान करना होगा.  यदि इनका समस्याओं का निदान मिल जाता है तो यह कानून अच्छा शाबित हो सकता है .  


अगर हम  धार्मिक आधार पर जनसंख्या असंतुलन की बात छोड़ भी दें  तो भी ऐसा लगता है  कि प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण  कानून  केवल  राज्य सरकार के कर्मचारियों पर  निर्भर है,  और वह भी प्रोत्साहन और हतोत्साहित करने के माध्यम से, जिसमे  मुसलमानों तथा अन्य धर्मावलंबियों की संख्या कम है,  और  उन्हें बहु पत्नी  के रूप में पर्सनल ला के आधार पर काफी छूट दे दी गई है, जिसे प्रस्तावित कानून केवल हिंदू कर्मचारियों पर ही प्रभावी ढंग से लागू हो सकेगा जो अभी भी  सामान्यतया परिवार नियोजन का पालन करते हैं.

  

राशन कार्ड तथा अन्य  छोटे-मोटे प्रोत्साहनों के माध्यम से सामान्य जनता पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ेगा ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता.  पूरे भारत में भ्रष्टाचार की ऐसी लीला है कि   अवैध घुसपैठिए  राशन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट बड़े आसानी से बनवा लेते हैं वहां राशन कार्ड में यूनिट कम करने की योजना  प्रभावी ढंग से  काम करेगी इसकी संभावना भी संदिग्ध है. 

 

सरकार को अन्य कठोर कदमों  पर विचार करना  चाहिए और यह सुनिश्चित करना  चाहिए  कि  जनसंख्या कानून  सभी धार्मिक समूह पर समान रूप से लागू  किया जाए. सबसे बड़ी बात केंद्र सरकार को चाहिए कि बंगला देश सीमा को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करे जहाँ से पैसे देकर घुसपैठ करना आज भी बेहद आसान बना हुआ है. नेपाल सीमा से घुपैठ करने में तो कोई रोक टोक ही नहीं है.


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- शिव मिश्रा

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शनिवार, 10 जुलाई 2021

क्या दिल्ली उच्च न्यायलय के निर्णय से देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है?

 दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) की आवश्यकता का समर्थन करते हुए कहा कि देश में एक यूनिफॉर्म सिविल कोड - 'सभी के लिए समान कानून ' की आवश्यकता है और केंद्र सरकार से इस मामले में आवश्यक कदम उठाने को कहा है ।

उच्च न्यायालय ने कहा कि "आधुनिक भारतीय समाज में, जो धीरे-धीरे एकरूप होता जा रहा है, धर्म, समुदाय और जाति के पारंपरिक अवरोध धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं,"

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह की पीठ ने कहा, "संविधान के अनुच्छेद 44 में व्यक्त की गई आशा कि राज्य अपने नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता को सुरक्षित रखेगा, केवल एक आशा नहीं रहनी चाहिए।"

अनुच्छेद 44 के तहत की गई समान नागरिक संहिता की परिकल्पना को साकार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी समय-समय पर दोहराया गया है।

"सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में निर्देश दिया था कि सुश्री जॉर्डन डिएंगदेह (सुप्रा) के फैसले को उचित कदम उठाने के लिए कानून मंत्रालय के समक्ष रखा जाए। हालाँकि, तब से तीन दशक से अधिक समय बीत चुका है और यह स्पष्ट नहीं है कि क्या कदम उठाए गए हैं?

तदनुसार दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में लिखा कि , वर्तमान निर्णय की प्रति सचिव, कानून और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार को आवश्यक कार्रवाई के लिए सूचित किया जाए,

उच्च न्यायालय ने जोर देते हुए कहा कि "वर्तमान जैसे मामले बार-बार इस तरह के एक कोड की आवश्यकता को उजागर करते हैं - जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो सभी के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि जैसे पहलुओं के संबंध में समान सिद्धांतों को लागू किया जाए, ताकि तय किए गए सिद्धांत, सुरक्षा उपाय और प्रक्रियाएं समान हो सकें। इससे नागरिकों को विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों में संघर्षों और अंतर्विरोधों के कारण बार बार संघर्ष नहीं करना पड़ेगा.

अदालत ने कहा कि भारत के विभिन्न समुदायों, जनजातियों, जातियों या धर्मों के युवाओं को, जो अपने विवाह को संपन्न करते हैं, उन्हें विभिन्न व्यक्तिगत कानूनों, विशेष रूप से विवाह और तलाक के संबंध में मतभेद के कारण उत्पन्न होने वाले मुद्दों सेअनावश्यक संघर्ष करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी मीणा समुदाय से संबंधित पक्षों की याचिका कि उन पर हिंदू विवाह अधिनियम 1955 लागू नहीं होता क्योंकि वह राजस्थान के अनुसूचित जनजाति के मीणा समुदाय से संबंध रखते हैं, जिनके अलग कानून है.

मीणा समुदाय के इस जोड़े ने २४ जून २०१२ को शादी कर थी और हिंदू विवाह अधिनियम १९५५ की धारा १३-१ (आईए) के तहत तलाक की मांग करने वाली एक याचिका उस व्यक्ति द्वारा २ दिसंबर २०१५ को दायर की गई थी।

महिला ने तलाक की याचिका को खारिज करने के लिए प्रार्थना की कि हिंदू विवाह अधिनियम , 1955 के प्रावधान संबंधित पार्टियों पर लागू नहीं होते क्योंकि वे राजस्थान में एक अधिसूचित अनुसूचित जनजाति के सदस्य हैं.

आवेदन पर फ़ैमिली कोर्ट द्वारा निर्णय लिया गया और तलाक की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के प्रावधान मीणा समुदाय पर लागू नहीं हैं, जो एक अधिसूचित अनुसूचित जनजाति है। उस व्यक्ति ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी ।

उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को चुनौती देने और निचली अदालत के फैसलों को रद्द करने की उनकी अपील की अनुमति दी। उच्च न्यायालय ने इस मामले में समान नागरिक संहिता के अनुसार निर्णय दिया है .[1]

  • सर्वोच्च न्यायालय इसके पहले भी कई बार केंद्र सरकार को स्मरण करा चुका है कि सरकार को समान नागरिक संहिता की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए लेकिन कांग्रेस सरकार को तो करना ही नहीं था, अटल बिहारी वाजपेई सरकार के पास इतना बहुमत नहीं था और मोदी सरकार में मुमकिन हो सकता है लेकिन उन्होंने अपने राजनैतिक नारे में “सबका विश्वास” भी जोड़ दिया है, इसलिए थोड़ा मुश्किल लगता है.
  • अब तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी कह रहे हैं कि सब का डीएनए एक है तो फिर कानून क्यों अनेक हैं?
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  • - शिव मिश्रा 
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शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

उत्तर प्रदेश 2022 के चुनावों के लिए आपकी क्या भविष्य वाणी हैं? आपको क्या लगता है कौन जीतेगा?

 उत्तर प्रदेश में चुनावी   चौपाल और राजनैतिक हवा का रुख 

उत्तर प्रदेश में राजनीतिक चौपाल सजने लगी हैं और चुनावी बयार बहने लगी है .

आइये प्रदेश में इस समय चल रही राजनीतिक हवा पर एक दृष्टि डालते हैं ताकि आप स्वयं 2022 के विधानसभा चुनाव की भविष्यवाणी कर सकें -

  1. बहन जी बसपा की सफाई पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं जो यह संकेत देता है कि उनकी पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं है और कई बड़े नेता समाजवादी पार्टी के संपर्क में थे और कुछ एक ने भाजपा से भी नज़दीकियां बनाई हुई थी. मायावती जी का द्रष्टिकोण एकदम साफ है कि वह समाजवादी पार्टी या किसी अन्य पार्टी के साथ कोई भी चुनावी गठबंधन नहीं करेंगी और अकेले ही चुनाव में उतरेगी. पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ चुनावी गठबंधन किया था और उनके अनुसार उन्हें कोई बहुत फायदा नहीं हुआ था और उसी गठबंधन का परिणाम था कि उनकी पार्टी में समाजवादी पार्टी ने सेंध लगा दी थी और कई नेता बागी होकर समाजवादी पार्टी से जुड़ गए थे.
  2. समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव के नेतृत्व में यह विधानसभा और लोकसभा के चुनाव बुरी तरह से हारने के बाद अब तीसरी बार पूरे दमखम के साथ चुनाव में उतरेने को तैयार है. अखिलेश यादव का प्रयास है कि वे छोटी-छोटी पार्टियों के साथ चुनावी गठबंधन करेंगे लेकिन किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ कोई गठबंधन नहीं करेंगे इसलिए संभव हो सकता है कि वह राष्ट्रीय लोक दल, अपना दल का एक भाग, निषाद पार्टी, चंद्रशेखर उर्फ़ रावण की भीम आर्मी सहित अपने सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी आदि के संपर्क में है.
    1. पंचायत चुनाव में अपनी पीठ ठोकने वाले अखिलेश यादव को जिला पंचायत चुनाव में शुरुआती झटके लगे हैं और भाजपा लगभग 20 जिला पंचायतों में अपने अध्यक्ष निर्विरोध निर्वाचित करवाने में सफल रही. समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी या तो समय पर अपना नामांकन दाखिल नहीं कर सके या उनके नामांकन गलत पाए गए, जो संकेत देता है कि कहीं न कहीं इन प्रत्याशियों की भाजपा से मिलीभगत रही है.
    2. गुस्से में अखिलेश यादव ने इन जिलों में ज्यादातर जिला अध्यक्षों और अन्य पदाधिकारियों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. चुनावी मौसम में इस तरह की गुस्से की बारिश को शुभ नहीं माना जाता और यह यह इस बात का संकेत भी देता है कि अखिलेश यादव चुनावी जंग लड़ने के लिए रणनीतिक रूप से मजबूत सेनापति नहीं है.
    3. यहां पार्टी को मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह की कमी खल रही है. अगर यही हाल रहा तो समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनाव का युद्ध पूरे दमखम से शायद ही लड़ पाए .
  3. भाजपा के पुराने सहयोगी कायम है सिर्फ एक ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव समाज पार्टी के जिसका पूर्वांचल के कुछ विधानसभा इलाकों में प्रभाव है, छिटक गई है . भाजपा ने उनकी भरपाई के लिए राजभर समाज के एक नेता को मंत्री भी बनाया है और राजा सुहेलदेव के लिए स्मारक आदि का निर्माण कराया है इसलिए इस पार्टी के छिटक जाने का कोई फर्क शायद नहीं पड़ेगा.
    1. इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के कैडर ने जमीनी स्तर पर सामाजिक संरचना का ताना-बाना मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. जहां कहीं असंतोष के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं उन्हें किसी न किसी माध्यम से संतुष्ट करने की कोशिश की जा रही है.
    2. प्रदेश भाजपा में संगठन, सरकार और मंत्रिमंडल सदस्यों के बीच जो दरारे सामने आ रही थी और जिन्हें मीडिया द्वारा बहुत हवा दी जा रही थी, को पार्टी शांत करने में काफी हद तक सफल रही है . विपक्षी दलों और मीडिया के एक वर्ग द्वारा इस मामले को तूल दिए जाने से भाजपा कार्यकर्ताओं में एक सकारात्मक संदेश भी चला गया है कि जो भी कुछ सुनाई पड़ रहा है वह विपक्ष की साजिश है.
    3. प्रदेश में बड़ी संख्या में सामने आए लव जिहाद और धर्मांतरण के मामले से हिंदू जनमानस में एक बेचैनी घर कर गई है और ऐसे में उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स द्वारा 20 से अधिक राज्यों में छापे मारकर सुनियोजित साजिश और विदेशी षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है उसे लोगों में एक बार फिर योगी आदित्यनाथ के प्रति श्रद्धा भाव उत्पन्न हो गया है.
    4. बहुसंख्यक हिंदुओं का मानना है कि इन परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के अलावा कोई दूसरा मुख्यमंत्री शायद ही इतना प्रभावी ढंग से कार्यवाही कर सके.
  4. उत्तर प्रदेश की राजनीति में पर्दे के पीछे भी गोटियां बिछाई जा रही हैं जिसके अनुसार सभी दलो को भाजपा के विरुद्ध एकजुट करने का काम शीर्ष स्तर पर शरद पवार जैसे कद्दावर नेताओं ने अपने हाथ में ले लिया है और वह ममता बनर्जी अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव के संपर्क में हैं.
    1. समझा जाता है कि प्रशांत कुमार ने शरद पवार को सुझाव दिया है कि पश्चिम बंगाल की तरह कांग्रेस को चाहिए कि वह उत्तर प्रदेश में “फेड आउट” हो जाए यानी बिना समर्थन दिए समाजवादी पार्टी की सहायता करें जिसके अंतर्गत कमजोर प्रत्याशी खड़ा करना और बड़े नेताओं द्वारा चुनाव प्रचार न करना शामिल है. इसके बदले समाजवादी पार्टी लोकसभा चुनाव में कांग्रेसी की सहायता करें. समझा जाता है कि राहुल गांधी को यह सुझाव पसंद भी आया है क्योंकि वह भाजपा को हराने के लिए खुद को हराने से कभी पीछे नहीं हटते .
  5. कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में कमान प्रियंका वाड्रा के हाथ आने के बाद यहां भी कांग्रेसका प्रचार अभियान टूलकिट आधारित ही हो गया है और वह ज्यादातर सोशल मीडिया में ही हो रहा है.
    1. राजनीतिक हलकों के जानकार कहते हैं कि कांग्रेस के साथ अजीब संयोग होता है, पिछले चुनाव में उनका राष्ट्रीय अध्यक्ष पप्पू था, आपकी बार उनका प्रदेश अध्यक्ष लल्लू है. ऐसे में कांग्रेस क्या करेगी ?
  6. आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में दस्तक देने की कोशिश की थी लेकिन एक रणनीतिक गलती करते हुए अरविंद केजरीवाल ने सुल्तानपुर निवासी राज्यसभा सांसद संजय सिंह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया, जिनका अतीत न केवल कलंकित है बल्कि बच्चे बच्चे की जुबान पर है. उनके इसी पिछले रिकॉर्ड ने आम आदमी पार्टी की बढ़त पहले ही रोक दी थी और उस पर राम मंदिर भूमि घोटाले की हवा बनाने के चक्कर में करेला नीम पर चढ़ गया .
    1. आज की स्थितियों में आम आदमी पार्टी उत्तर प्रदेश में “न तीन में न तेरह में”की स्थिति हो गयी है .
  7. एक अन्य विचित्र राजनैतिक घटना क्रम में सोहेल देव समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी से समझौता किया है और उन्होंने दावा किया है कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस आम आदमी पार्टी और निषाद पार्टी का समर्थन प्राप्त है और उनका गठबंधन एक साथ चुनाव में लड़ेगा और उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होगा.
    1. अपनी घोषणा में राजभर ने कहा है कि पांचों दलों का एक एक वर्ष के लिए मुख्यमंत्री होगा और हर दल का एक एक उप मुख्यमंत्री होगा. इस प्रकार 5 वर्ष के शासनकाल में पांच मुख्यमंत्री और 20 उप मुख्यमंत्री होंगे और सभी दल अपना हिस्सा बराबर बराबर बांट सकेंगे.

सपा और बसपा में गठबंधन न होने के कारण भाजपा को थोड़ा नुकसान जरूर उठाना पड़ेगा. कुछ लोगों को यह शायद अजीब लगे लेकिन यह सच्चाई है और उसका कारण है कि उत्तर प्रदेश में दलितों सबसे ज्यादा अत्याचार यादव और मुसलमान ही करते हैं जो समाजवादी पार्टी का कोर वोट बैंक है. सपा बसपा के गठबंधन की स्थिति में सपा का वोट तो बसपा को ट्रांसफर हो जाता है लेकिन बसपा का वोट सपा को ट्रांसफर नहीं होता और इसकी जगह बसपा के वोटर भाजपा को वोट करते हैं. सपा और बसपा के अलग-अलग चुनाव लड़ने से भाजपा को होने वाला यह फायदा नहीं हो पाएगा.

उपरोक्त परिस्थितियों में कोई भी यह बात आसानी से समझ सकता है योगी आदित्यनाथ के रास्ते में इस समय कोई बहुत बड़ी बाधा नहीं है.

अब निष्कर्ष निकलना आपके हाथ हैं

मंगलवार, 29 जून 2021

जम्मू कश्मीर के नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की बैठक के क्या निहातार्थ है ? सरकार को क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

 कश्मीरी नेताओं के साथ प्रधानमंत्री की बैठक  के  संदेश और दूरगामी परिणाम

 


कश्यप ऋषि के नाम से बनी कश्मीर घाटी जिसमें  हजारों वर्ष पुरानी सनातन संस्कृति के साथ कश्मीर के मूल निवासी  कश्मीरी पंडितों की लगभग 6000 साल पुरानी सामाजिक, साहित्यिक, और दार्शनिक  संस्कृति समाहित है, जो   आज अपने अस्तित्व के लिए  संघर्ष के अंतिम पड़ाव पर है  और शायद  कुछ वर्षों  बाद उनका संघर्ष  स्वत: समाप्त हो जाएगा और कम से कम कश्मीर के  लिए कश्मीरी पंडित एक इतिहास बन जाने के कगार पर हैं. 


 कैसे नासूर बनी कश्मीर समस्या ? 

आज देश का बच्चा-बच्चा  जानता  है कि कश्मीर की समस्या  जवाहरलाल नेहरू की गलत नीतियों की वजह से हुई. १९४६ में  कश्मीर के राजा द्वारा उन्हें  गिरफ्तार किये जाने को वे व्यतिगत दुश्मनी मानते मानते शेख अब्दुल्ला के जिगरी दोस्त बन गए  और अंग्रेजों  के बुने जाल  में फस गए. भारत विभाजन के ठीक 2 महीने बाद पाकिस्तान द्वारा जम्मू कश्मीर पर आक्रमण और एक बड़े भूभाग पर कब्जा कर पाने के पीछे  भारत सरकार द्वारा समय पर सैन्य सहायता न  पहुंचाना मुख्य कारण और समस्या की जड़  है. सरकार ने सेनाओं को भी खुली छूट नहीं दी थी कि वह पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाके को वापस हासिल कर सकें. देश हित के विपरीत  तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर नेहरु  संयुक्त राष्ट्र संघ गए और युद्ध विराम के साथ यथास्थिति स्वीकार कर ली.  नेहरू द्वारा शेख अब्दुल्ला को  व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर अत्यधिक  महत्व देने  के कारण ही धारा 370 और 35 A  को संविधान में जोड़ा  गया.  प्रारंभ में इसको अस्थाई कहा गया लेकिन  नेहरु स्वयं १९६४ में  अपनी मृत्यु  तक प्रधान मंत्री रहे लेकिन इसे नहीं हटा सके. 5 अगस्त 2019 के पहले कोई भी सरकार इसे हटाने का साहस नहीं जुटा सकी, इस ऐतिहासिक भूल सुधारने   के लिये  मोदी सरकार प्रशंसा की पात्र है. 


1971 के बांग्लादेश युद्ध में भारत की सम्मानजनक विजय के बाद जब पाकिस्तान के हौसले पस्त हो गए थे और शेख अब्दुल्ला को भी समझ में आ गया था  कि अब उनका एजेंडा खत्म हो गया है. उसी समय शेख अब्दुल्ला और इंदिरा गांधी के एक समझौते ने शेख अब्दुल्ला को न केवल नया राजनीतिक जीवन  दे दिया बल्कि  कश्मीर की समस्या को बेहद  जटिल बना दिया.  शेख अब्दुल्ला को मुख्यमंत्री बनाने के लिए जम्मू कश्मीर के कांग्रेसी मुख्यमंत्री   मीर  कासिम ने  अपनी सीट से और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. उनकी छोड़ी सीट से विजयी  होकर आए नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्लाह को  कांग्रेस पार्टी के संसदीय दल का  नेता बनाकर मुख्यमंत्री बना दिया गया.   भारत के लोक तांत्रिक इतहास में ये  अपने तरह की अनोखी घटना है और मेरे विचार से देश को आज की स्थिति  के लिए नेहरु की भूल के साथ इसे महां भूल कहना अनुचित नहीं होगा. हो सकता है इसके पीछे धारणा इंदिरा की यह धारणा रही हो  कि शेख  अब्दुल्ला को  सत्ता का सुख देकर  उन्हें भारत के प्रति वफादार बनाया जा सकता है और कश्मीर की समस्या का निदान किया जा सकता है, जो  इंदिरा गांधी की यह भयंकर भूल  घर में जहरीला सांप पालने से भी ज्यादा खतरनाक साबित हुई. 


 5 अगस्त 2019 को धारा 370 और 35A  हटने से  पूरे भारतवर्ष ने   गर्व का अनुभव किया. गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में जो वक्तव्य दिए,उससे  जम्मू कश्मीर की समस्या के समाधान  हेतु आशा की एक नई  किरण जगी. जम्मू कश्मीर को दो  केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने को भी   संपूर्ण  भारत ने  बेहद पसंद किया . इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जितनी तारीफ की जाए कम है. यह कार्य मोदी के दूसरे कार्यकाल की सबसे महत्वपूर्ण  उपलब्धि  के रूप में  जाना जाता है.  यद्यपि  लगभग 2 साल के   बाद भी  विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए सरकार द्वारा ठोस रूप से  कुछ भी नहीं किया जा सका है और दुर्भाग्य से  जम्मू कश्मीर पर आयोजित इस बैठक में भी कश्मीरी पंडितों के किसी भी प्रतिनिधि को आमंत्रित नहीं किया गया, जिससे पूरे  देश  में लोग सशंकित हो उठे हैं और यह सवाल कर रहे हैं कि क्या केंद्र की मोदी सरकार  ने एक बार फिर  घाटी के इन  कुख्यात नेताओं को सत्ता सौंपने का मन बना लिया है?


कश्मीरी पंडितों को विश्वास  में ले सरकार

जम्मू कश्मीर  के संबंध में  केंद्र सरकार द्वारा  लिए जाने वाले   किसी भी निर्णय में  जम्मू के निवासियों और कश्मीरी पंडितों को विश्वास में  लिया जाना अत्यंत आवश्यक है. विस्थापित कश्मीरी पंडित  दशकों से  अपने ही देश में  शरणार्थी का जीवन व्यतीत करते हुए विभिन्न  यातनाएँ  सह  रहे हैं, सरकार को उनके घावों पर मरकाम लगाने में भी उतना ध्यान देना चाहिए जितना कश्मीर के विकास का अन्यथा उन लोगों के विकाश का क्या अर्थ जिन्होने कश्मीर और कश्मीरी पंडितों का विनाश किया.  उनका सबसे बड़ा दर्द है कि कि केंद्र की किसी भी सरकार ने   कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को  नरसंहार  की संज्ञा नहीं दी है  और इसलिए  कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र ने भी प्रमुखता से नहीं लिया  और इसे मानव अधिकार  के उल्लंघन का मामला भी नहीं माना जबकि अल्गाववादी और आतंकवादी अपने मानव अधिकार का मुद्दा बनाये रहते हैं जिसे पूरा विश्व सहजता से लेता है और इससे भारत के विरुद्ध अनावश्यक दुष्प्रचार होता है .


धारा 370 हटाने  के पश्चात  कश्मीर में स्थानीय निकाय के चुनाव  सफलता पूर्वक  कराए  जा चुके हैं और इन चुनावों में घाटी के सभी राजनीतिक दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने के बाद भी बहुमत हासिल नहीं कर सके.  इससे संकेत साफ़ हैं कि  यह घाटी में माहौल  धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है और लोग विकास की मुख्यधारा से जुड़ने के  लिए आतुर हैं  और इन कुख्यात राजनीतिक दलों से छुटकारा भी  पाना चाहते हैं. इसलिए भारत सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसी बैठकों के माध्यम से अलगाव वादियों और भारत विरोधी तत्वों का पुनर्वास  होने का पाप न हो .


राजनैतिक दलों  पर पैनी नजर जरूरी

गुपकार गठबंधन  धारा 370 बहाली  की  मांग  भले ही  करें लेकिन   आम  कश्मीरी नागरिक के लिए  इसका  कोई मतलब नहीं है.  धारा 370 का होना शायद जम्मू कश्मीर के अलगाववादी तत्व, स्वार्थी राजनीतिक दलों के अलावा अगर किसी को सबसे ज्यादा फायदेमंद था तो वह था पाकिस्तान,  जो लगातार अलगाववाद को बढ़ावा दे रहा है  और इसके लिए प्रशिक्षित आतंकवादियों को घाटी में भेजकर अस्थिरता उत्पन्न करता रहता है .   वास्तव में  कश्मीर की समस्या को  सिर्फ अलगाववाद कहना उचित नहीं होगा. कश्मीर  मामलों  और रक्षा   विशेषज्ञों  के अनुसार यह पाकिस्तान  और अन्य   इस्लामिक देशों द्वारा समर्थित  गजवा ए हिंद और हिमालय का इस्लामीकरण  परियोजनाओ का  एक हिस्सा है,  जिसका उद्देश्य  भारत की सनातन सभ्यता को नष्ट कर इसके सम्पूर्ण  भूभाग को कब्जाना है और जिसके लिए  भारत का संविधान, कानून और कुछ बिके हुए हिन्दू भरपूर सहायता कर रहें हैं.  इस उद्देश्य के  लिए जम्मू कश्मीर  को पूरी तरह से  मुस्लिम बाहुल्य  राज्य  बनाकर  भारत से पृथक करना और उसके बाद अन्य राज्यों पर रणनीतिक तौर पर  कब्जा करना शामिल है. अगर जम्मू कश्मीर भारत के हाथ से फिसलता है या लचर सरकारी व्यवस्था का शिकार होता है तो   इस  षड्यंत्र के अनुसार  दिल्ली भी दूर नहीं रह जाएगी भले ही  प्रधानमंत्री मोदी  दिल की दूरी और दिल्ली की दूरी   कम करने की बात  करते रहें, भले ही उनका वक्तव्य  कश्मीर के व्यापक  विकास के लिए हो.


इसलिए धारा 370 हटाने का विरोध सबसे अधिक विरोध अलगाववादी  और ऐसे स्वार्थी तत्वों / राजनीतिक दलों द्वारा ही किया गया जो आजादी के बाद से लगातार जम्मू कश्मीर की सत्ता पर काबिज है और भारत के वित्तीय शोषण से ही भारत के विरुद्ध युद्ध चला रहे हैं. हमें यह बात नहीं भूलने चाहिए  कि  कश्मीर घाटी के इन  राजनीतिक दलों ने  इस बड़े मिशन को कामयाब करने के लिए  किसी ने किसी तरह सत्ता में  बने रहने का  विकल्प  चुना है ताकि इन्हें वित्तीय संसाधन उपलब्ध होते रहें और कानून की छत्रछाया में अलगाववाद के लिए अधिकाधिक  सहयोग और समर्थन करते रहें.  मेरा मत है कश्मीर में इन लोगो के पास जितना अधिक  पैसा जाएगा उतना अधिक अलगाववाद बढेगा.


बैठक की उपलब्धियां  

धारा 370 हटाने के लगभग 2 वर्ष बाद  जम्मू कश्मीर के इन नेताओं को वार्ता के लिए दिल्ली बुलाया जाना और उनका बिना किसी विवादित बयान के शामिल होना, राज्य में लोकतांत्रिक प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में एक सकारात्मक  कदम होगा या नहीं यह तो समय ही बताएगा लेकिन इतना जरूर है कि  इससे अंतरराष्ट्रीय जगत को  समुचित संदेश जाएगा कि जम्मू कश्मीर में भारत ने जो कुछ भी किया उसका उद्देश्य  सकारात्मक है.  इस बीच  मीडिया के एक वर्ग में  यह भी कयास लगाया गया है कि शायद  यह बैठक  अमेरिका और सऊदी अरब के दबाव में आयोजित  की जा रही है. जो भी हो इससे पाकिस्तान को तो  उचित संदेश मिला ही  है और पाक अधिकृत कश्मीर के लोगों को भी उचित संदेश मिल गया है, जहाँ के लोगों को   लग रहा है कि भारतीय कश्मीर में विकास  के कार्यों को प्राथमिकता देकर लोकतंत्र मजबूत किया जा रहा है,  जबकि पाकिस्तान के कब्जे वाली कश्मीर में हालात बद से बदतर हैं और  पाक अधिकृत कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा चीन को सौंप दिया गया है और एक भाग को पुन: बेचने   की तैयारी हो रही है, जिसमें वहां के स्थानीय निवासियों के अधिकार  बुरी तरह प्रभावित होंगे. पता नहीं भारत सरकार इस मुद्दे पर मौन क्यों धारण किये रहती है ? अगर वह पाक अधिकृत कश्मीर को अपना समझती है तो तो इस तरह की गतिविधियों का विरोध क्यों नहीं करती ?


बैठक से परिसीमिन के कार्य को लगभग सभी दलों का मौन समर्थन हासिल हो गया है, जो सरकार की उपलब्धि है  लेकिन परिसीमन का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब यह चुनाव प्रक्रिया को मजबूत बनाये तथा  जम्मू  संभाग में विधान सभा सीटों की संख्या बढाकर  हिन्दू आबादी के साथ न्याय करे .  सरकार को पाक अधिकृत कश्मीर में पड़ने वाली  २४ विधान सभा सीटों, जो वस्तुत: जम्मू का ही हिस्सा है, के लिए नामांकन भी जम्मू संभाग के लोगो के बीच से करना शुरू कर देना चाहिए. ये पाक अधिकृत कश्मीर को वापस लाने की दिशा में एक छोटे से प्रयास के शुरूआत होगी .   


इस बैठक  की एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर  मीडिया में बताया गया  कि जम्मू कश्मीर के ये  नेता घाटी में चाहे जितना बोलते हो लेकिन प्रधानमंत्री के समक्ष अनुशासित  मुद्रा में  सिर झुकाए रहे.  मुझे लगता है इसका   गलत अर्थ नहीं निकाला जा रहा है क्योंकि यह  घाटी के नेताओं की  गिरगिट  वाली फितरत  है.  उन्हें जब सत्ता नजदीक आती दिखाई पड़ती  है तो वह  कुछ भी  कहने और करने से परहेज नहीं करते.  इस समय  जीवित चारों पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित  घाटी  के अन्य  सभी मुख्यमंत्रियों ने अपने कार्यकाल में  सत्ता प्राप्ति के लिए  संविधान के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ जरूर ली, भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा भी व्यक्त की लेकिन उन्होंने हमेशा अपने बड़े उद्देश्य के लिए अलगाववादियों और पाकिस्तान की नीतियों का ही समर्थन किया. इन सभी नेताओं के लिए  इनका  मजहब सबसे पहले है और इसलिए अगर मजहब के नाम पर कोई गलत शपथ लेते हैं या छलकपट  करते हैं तो उससे बिल्कुल भी नहीं हिचकते. इसलिए इन नेताओं की बातों पर बहुत अधिक विश्वास करने का कोई कारण नहीं है और  इन नेताओं के हृदय परिवर्तन पर भाजपा को किसी मुगालते में नहीं रहना चाहिए अन्यथा इंदिरा गांधी जैसी एक महाभूल की पुनरावृत्ति हो सकती है. 


नेताओं  का  अतीत  याद रखना होगा 

जहां तक भारत सरकार का प्रश्न है,  बैठक में प्रधानमंत्री ने जम्मू कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की वचनबद्धता दोहराई वही उन्होंने स्पष्ट रूप से यह बता दिया कि फिलहाल  प्राथमिकता  विधानसभा की सीटों का परिसीमन और उसके बाद चुनाव है.  महबूबा मुफ्ती के अलावा किसी भी अन्य नेता ने धारा 370  को बहाल किए जाने के बारे में बैठक में कोई मुद्दा नहीं उठाया लेकिन उमर अब्दुल्ला से लेकर महबूबा मुफ़्ती ने बैठक के बाद शांतिपूर्ण ढंग से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की बात  दोहराई  है. दिल्ली की  मीडिया  और भाजपा को इससे बहुत अधिक उत्साहित होने की जरूरत नहीं है क्योंकि इन नेताओं को इस बैठक में शामिल होना और  अनुशासित बने रहना, अपने को प्रासंगिक बनाए रहने के लिए आवश्यक हो गया था.  वैसे भी घाटी के  यह नेता  समय-समय पर  विभिन्न भूमिकाएं  बखूबी अदा करना जानते हैं.  शेख अब्दुल्ला के बारे में कहा जाता था कि वह जब कश्मीर घाटी में होते थे  तो  मजहबी  मुस्लिम शासक की भूमिका में होते थे,  जम्मू आकर प्रगतिशील हो जाते थे  और दिल्ली पहुंच कर  भारत के  संविधान के प्रति पूर्णतया समर्पित हो जाते थे. इस सब के पीछे एक ही कारण होता था  सत्ता  में बने रहना जो  उनका पाक समर्थित इस्लामिक  अजेंडा चलाने के लिए  बेहद जरूरी था.  वही हालात आज भी हैं, कुछ भी नहीं बदला सिवाय इन पाक परस्त नेताओं की पीढ़ियों के. 


सरकार को नहीं भूलना चाहिए कि परदे  के पीछे    ये सभी  राजनीतिक दल,  अलगाववादी एवं आतंकवादी संगठन और पाकिस्तान की आईएसआई  सभी मिलजुल कर एक ही उद्देश्य के लिए काम करते हैं,  जो सुनियोजित तरीके से जम्मू कश्मीर को पूर्ण रूप से  इस्लामिक राज्य  बनाना चाहते हैं .  कश्मीर घाटी में जहां  उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मुस्लिम आबादी 68% ( कुल आबादी ६९ लाख)  है,  वहीं जम्मू  संभाग में हिंदू आबादी भी  लगभग 68% ( कुल आबादी ५३ लाख ) है. इन आंकड़ो पर बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह है और लोगो का मानना है कि कश्मीर में पुस्लिम जनसँख्या को बढा  चढ़ा कर पेश किया गया है, ताकि जम्मू की तुलना में बढ़त दिखाई पड़े और जरूरत पर घुसपैठियों को खपाया जा सके . हाल की राज्य   सरकारों ने, जो वस्तुत: अब्दुल्लाओं और मुफ्तियों के पास ही रही  है,  जम्मू संभाग को भी  मुस्लिम  बाहुल्य  करने की दिशा में सरकारी संरक्षण में अनेक गैर कानूनी कार्य किए .  रोहिंग्याओं को  वर्मा से बांग्लादेश के रास्ते  लाकर जम्मू में बसाना  इसी योजना का एक हिस्सा था.


 जम्मू के  एडवोकेट  अंकुर शर्मा के अनुसार  महबूबा मुफ्ती ने  मुख्यमंत्री रहते हुए 14 फरवरी 2018 को एक कार्यकारी  आदेश  द्वारा   सभी जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिया था  कि  रोशनी एक्ट के अंतर्गत  जम्मू संभाग में अगर किसी  मुस्लिम व्यक्ति ने राजकीय,  फॉरेस्ट एरिया  या किसी की निजी जमीन पर कब्जा किया है तो उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही न की जाए.  अगर भूस्वामी  अदालत से जमीन खाली  कराने का आदेश भी ले आता है तो  उसके  लिए पुलिस सहायता उपलब्ध न कराई जाए. किसी भी मुस्लिम के विरुद्ध गौ हत्या या गोवंश की तस्करी से संबंधित  कोई भी  प्राथमिकी दर्ज न की जाए.   


एक रिपोर्ट  के अनुसार जम्मू में  जमीन पर  अवैध कब्जा करने वाले 90% से अधिक  व्यक्ति मुसलमान है. उछ न्यायलय के आदेश के विरुद्ध एक याचिका दायर की गयी जिसके अनुसार अवैध कब्जेदारों को यह भूमि आवंटित करने का मानवीय आधार पर निवेदन किया गया है . 


जम्मू से निकलने वाली तवी नदी जिसे सूर्यपुत्री कहा जाता है और  जिसे देवी का दर्जा प्राप्त है, के किनारों  की जमीन पर   ज्यादातर अवैध कब्जे दार मुस्लिम है. जम्मू कश्मीर  उच्च न्यायलय की डिवीजन बेंच के निर्देश पर  जम्मू नगर निगम की सीमा के अंतर्गत इस तरह के अवैध कब्जों  की जांच करने का जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया गया था . उच्च न्यायालय की बेंच में   सबमिट  की गई रिपोर्ट  अनुसार   हिंदू बहुल जम्मू  नगर सीमा में  तवी  नदी के किनारे की जमीन पर 668 में से 667 अवैध कब्जेदार मुस्लिम हैं,  जो स्थानीय निवासी भी नहीं है.  जम्मू के लोग  इसे  लैंड जिहाद और जम्मू की जनसंख्या परिवर्तित करने  का सरकारी षड्यंत्र बताते हैं और इन लोगों में अत्यंत रोष भी है .


बड़े आश्चर्य की बात है  की महबूबा मुफ्ती  ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई थी और भाजपा के उपमुख्यमंत्री  और कई मंत्री भी सरकार में होने के बाद कैसे इस तरह के गैरकानूनी आदेश दिए जाते रहे. कैसे  जम्मू से सांसद  और  केंद्रीय राज्यमंत्री जीतेन्द्र सिंह, जो प्रधानमंत्री कार्यालय   से सम्बद्ध  हैं,  इन बातों से अनजान रहे रहे ?  सरकार को इस पर मंथन करना चाहिए और घर में हो रही किसी साजिश  से सावधान  रहना चाहिए .


राज्य में धारा 370  की छाया बाकी है

 “एकजुट जम्मू”  के अधिवक्ता  अंकुर शर्मा के अनुसार  सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश दिया था कि   जम्मू कश्मीर राज्य में  अल्पसंख्यकों को  मिलने वाले फायदे मुस्लिमों की बजाय हिंदुओं को दिए जाय, लेकिन सरकार के हलफनामे के बाद भी  2018 से  इस पर कार्यवाही नहीं की गई है और मुस्लिमों को अल्पसंख्यकों का फायदा पूर्ववत मिल रहा है.  इन परिस्थितियों में केंद्र सरकार के लिए  परिसीमन और लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित करने  के साथ साथ  कानून का राज स्थापित करना  पहली प्राथमिकता होना चाहिए.  


कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और उन्हें घाटी से विस्थापित करके  घाटी का जनसंख्या घनत्व पहले ही परिवर्तित किया जा चुका है और अब जम्मू में  अवैध भू अतिक्रमण कर  अवैध रूप से  रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाया जाना अच्छे संकेत नहीं है. अल्पसंख्यक के रूप में भारी भरकम  सरकारी सहायता का उपयोग पहले भी भारत के विरुद्ध होता रहा है. सरकार को यह पड़ताल करने की आवश्यकता है कि वे कौन लोग हैं जो सर्वोच्च न्यायलय का निर्णय भी लागू नहीं होने देते ?


राज्य में अनेक मामलों में देखा गया है कि धारा 370 हटाने  और राज्य को केंद्र शासित प्रदेश  बनाये  जाने  के बाद भी बहुत से  सरकारी काम  पहले की तरह ही किए जा रहे हैं,  जिन्हें तुरंत रोका जाना जरूरी है अन्यथा जनता में भ्रम की स्थिति बनी रहेगी.  अभी हाल ही में राज्य में कुछ सरकारी नियुक्तियों के लिए आवेदन मांगे गए थे,  जिसमें  निर्देश था कि कश्मीर संभाग के लिए  केवल उसी संभाग के  लोग आवेदन कर सकते हैं लेकिन जम्मू संभाग के लिए निर्देश था कि उसमें पूरे राज्य के लोग आवेदन कर सकते हैं.  जम्मू के लोगों द्वारा प्रदर्शन और बबाल  किए जाने के बाद  जम्मू के लिए भी यह शर्त  कर दी गई कि केवल जम्मू संभाग के लोग ही आवेदन कर सकते हैं. यह  सब यह रेखांकित करता है  कि न केवल जम्मू  के साथ सौतेला व्यवहार अभी भी कायम है, अलगाववादियों और इन कुख्यात नेताओं के इशारे पर चलने वाली मशीनरी अभी भी पूर्ववत कार्य कर रही है. ऐसे और भी मामले हो सकते हैं. इस  सरकारी मशीनरी  की  पुरानी मानसिकता को  बहुत सख्ती  और प्रभावी ढंग से निपटाया जाना आवश्यक है.  अब जबकि जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश है  राज्य के  कैडर और  दूसरे केंद्र शासित प्रदेशों के  कैडर की अदला बदली तुरंत  आवश्यक है. 


 धारा 370 हटाने के बाद भी सरकार में  अन्य राज्यों से  आए  लोगों को   राज्य में बसने और संपत्ति खरीदने जैसे  कई मामलों में  कुछ  प्रतिबंध लगाये  गए हैं ,  इनका पुनरीक्षण  आवश्यक हो गया है ताकि लोगों को लगे कि कश्मीर भारत का अंग है.


परसीमन में जम्मू के साथ  पारदर्शी न्याय हो 

भौगोलिक क्षेत्रफल  और जनसंख्या के अनुसार  घाटी से बड़ा होने के बाद भी जम्मू में  विधानसभा की 36 और कश्मीर घाटी में 47 सीटें हैं.  प्रथम दृष्टया ऐसा  प्रतीत होता है  कि इसका उद्देश्य था  कि राज्य की सत्ता किसी न किसी तरह घाटी  के लोगों के पास रहे.  स्वतंत्रता के बाद लगातार सत्ता घाटी से संचालित होने के कारण जम्मू के लोग  भेदभाव के शिकार होते रहे हैं. प्रस्तावित परिसीमन में  सरकार को यह ध्यान रखना चाहिए की जम्मू की बहुत पुरानी मांग जिसमें परिसीमन भौगोलिक क्षेत्रफल और जनसंख्या के आधार पर करने की बात कही गई है उसकी अनदेखी न की जाए, ऐसा करना  पाकिस्तान  और उसके इशारे पर काम करने वाले  अलगाववादी और आतंकवादियों का  एजेंडे  रोकने में भी सहायक होगा. 


जम्मू कश्मीर को राज्य का दर्जा देने में जल्दबाजी  न हो 

किसी केंद्र शासित प्रदेश में अगर विधानसभा है, तो जनता द्वारा सीधे चुने हुए प्रतिनिधि शासन प्रशासन में शामिल होते हैं और  इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसे राज्य का दर्जा मिला है या वह केंद्र शासित प्रदेश है.  जम्मू के लोग 2011 की जनगणना के अनुसार परिसीमन करने का विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है की 2011 की जनगणना सिर्फ कार्यालय में बैठकर की गई थी  और इसमें कश्मीर संभाग की जनता को जनगणना को बहुत बढ़ा चढ़ा कर पेश किया गया है इस कारण कश्मीर संभाग की जनसंख्या 69 लाख  और जम्मू की जनसंख्या 53 लाख बताई गई है,  जो सही नहीं है.  लोगों का मानना है कि  परिसीमन का आधार जनसंख्या के साथ-साथ क्षेत्रफल भी होना चाहिए और जम्मू के साथ न्याय किया जाना चाहिए.  जम्मू कश्मीर  मामले को दशकों  से देख रहे लोगों का मानना है कि अब जब सरकार इतना आगे पहुंच चुकी है उसे वापस पीछे नहीं  मुड़ना  चाहिए  और पाकिस्तान सहित अन्य इस्लामिक देशों के षड्यंत्र को विफल करने के लिए जम्मू को  अलग केंद्र शासित प्रदेश और कश्मीर को 2 केंद्र शासित प्रदेशों में बांट देना चाहिए  कश्मीर के एक हिस्से में विस्थापित कश्मीरी पंडितों को बसाने ने के लिए  शीघ्र  कार्यवाही करनी चाहिए,  क्योंकि कश्मीरी पंडित  कश्मीर घाटी की  वर्तमान भौगोलिक यथास्थिति के  चलते  भय के कारण  अपनी जान जोखिम में डालकर  वहां बसने नहीं जाएंगे. 


केंद्र सरकार को याद रखना चाहिए कि जो कश्मीरी नेता दिल्ली की मीटिंग में पूरी तरह से अनुशासित और संविधान के प्रति समर्पित दिखाई पड़ रहे थे उन्होंने घाटी वापस पहुंचकर धारा 370 की बहाली  सहित   अन्य मांगों के लिए भी बयान देने शुरू कर दिए हैं.  ऐसा करके वह चाहते हैं कि केंद्र सरकार पर ज्यादा से ज्यादा दबाव बनाकर अपनी मांगे मनवा सके ताकि घाटी में लोगो के अगुआ बन सकें और सत्ता में वापसी कर सकें.  


आशा की जानी चाहिए कि वर्तमान सरकार पिछली सरकारों की तरह, मोदी सरकार  घाटी के नेताओं के झांसे में नहीं आयेगी और व्यापक राष्ट्रीय हित में ऐसे कदम उठायेगी जिससे जम्मू को न्याय और कश्मीर को स्थायित्व मिले और पूरे देश को कश्मीर के भारत में पूर्ण विलय का अहसास हो  सके .

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-शिव मिश्रा

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