मंगलवार, 8 जून 2021

क्या उत्तर प्रदेश में भाजपा नेतृत्व परिवर्तन करने वाली है?

 



 योगी की योग्यता परखना भाजपा के  लिए आत्मघाती होगा

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कुछ दिनों से  सोशल मीडिया में उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी को बदलने की अफवाह  जोरों पर है. अफवाहों में सभी ने अपने अपने तर्क दिए हैं, कुछ ने कहा है कि योगी और मोदी के बीच में   मतभेद  गहराते  जा रहे हैं तो कुछ ने  कहा कि  योगी  किसी  मंत्री या कार्यकर्ता की  नहीं सुनते और उनकी कार्यशैली बिल्कुल तानाशाह जैसी हो गई है.   विपक्ष और मीडिया ने कोरोना की दूसरी लहर में   पूरे प्रदेश में  हुई  अत्यधिक मौतों को इसका कारण बताया है  जिस के समर्थन में उन्होंने गंगा में बहते हुए शवों  और   श्मशान घाटों में में लंबी-लंबी कतारों  का लगना बताया है, यह भी दावा किया गया है  कि यह सब तब है जबकि  उत्तर प्रदेश सरकार ने  मौत के  आंकड़े छुपाए हैं. कुछ स्वयंभू और गिद्ध पत्रकारों ने भी  इन अफवाहों को  ऑक्सीजन  देने का  काम किया है,  जो कुछ दिन पहले तक श्मशान घाट से सजीव प्रसारण कर रहे थे और गंगा में बहती लाशों  का विश्लेषण कर रहे थे.  


विपक्ष ने भी  इन अफवाहों को इसे हाथों-हाथ लपक लिया और उनके कार्यकर्ताओं ने भी सोशल मीडिया में हो रही इस अफवाह बाजी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया.  आजकल सोशल मीडिया में  झूठ को भी तेजी से  फैलाने  के लिए  कई  प्रोफेशनल एजेंसियां उपलब्ध हैं जो पैसे लेकर इस तरह  के काम  करती  हैं, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक  यह  है कि किसी राज्य से जुड़े मामले में विदेशी मीडिया भी बहुत सक्रिय  है.  यह भी  कम आश्चर्यजनक बात  नहीं है कि  भाजपा का आईटी सेल जिसे   भारत के सभी राजनीतिक दलों में सबसे मजबूत और  हमलावर  माना जाता है,  इन  दुर्भाग्यपूर्ण अफवाहों को रोकने  और समुचित  जवाब देने में सफल नहीं  हो सका.


योगी के विरुद्ध इस तरह के  दुष्प्रचार नये   नहीं है उनके पूरे कार्यकाल में  देश विरोधी और समाज विरोधी ताकते  इस तरह के कारनामे करती रही हैं, जो स्वयं में  स्पष्ट करता है  कि  उन्होंने  योगी की शक्ति का सही मूल्यांकन  भाजपा से कहीं ज्यादा  अच्छे ढंग से किया है.   प्रदेश में  सांप्रदायिक दंगे न होने देने,  संशोधित नागरिकता विरोधी  आंदोलन  से सख्ती से निपटने,  सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों से वसूली करने, वांछित अपराधियों की फोटो चौराहों पर लटकाने,  गुंडे और माफियाओं को उनकी औकात दिखाने और प्रदेश की  कानून व्यवस्था को उस मुकाम पर पहुंचाने सहित  योगी ने कई ऐसे काम किए हैं, जिसके लिए प्रदेश कई दशकों से तरस रहा था.  


बहुत कम लोगों को यह बात मालूम होगी कि प्रदेश में जातीय विद्वेष फैलाने, सांप्रदायिक दंगे भड़काने,  कानून व्यवस्था खराब करने और महिलाओं पर अत्याचार के नाम पर योगी की छवि को आघात पहुंचाने के लिए बड़े पैमाने पर साजिशें होती  रही हैं. हाथरस में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना  के परिपेक्ष में  पीएफआई सहित कई ऐसे संगठनों ने  भी एक बड़ी साजिश रची थी  जिसके लिए बड़ी मात्रा में  धन इकट्ठा किया  दया था  ताकि पूरे प्रदेश को जातीय  और सांप्रदायिक हिंसा में लपेटा जा सके.  उनके इस मिशन में कांग्रेस सहित लगभग सभी विपक्षी पार्टियों ने भी जमकर राजनीतिक  रोटियां सेंकने  और स्थिति खराब करने की कोशिश की.  नफरत भरे पोस्टर बनाए गए,  सोशल मीडिया पर  फर्जी अकाउंट के माध्यम से झूठी खबरों की बमबारी की गई, लेकिन उनके प्रयास सफल नहीं हो पाए. 


योगी को बदनाम करने के लिए अभी हाल में एक फर्जी ऑडियो क्लिप सोशल मीडिया में वायरल की गई जिसमें  यह बताया जाता है कि  योगी के पक्ष में ट्वीट करने पर प्रति  ट्वीट  ₹2 दिए जाएंगे.  इस फर्जी ऑडियो क्लिप को एक सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी  द्वारा भी  ट्वीट कर  योगी टूल किट के नाम से चलाया गया.  इनके ट्वीट  यह माध्यम से  द वायर की पत्रकार रोहनी सिंह ने भी  योगी के विरुद्ध जमकर दुष्प्रचार  किया.  यद्यपि उत्तर प्रदेश की साइबर पुलिस ने इस फर्जीवाड़े का  शीघ्र भंडाफोड़ कर दिया  और अभियुक्तों को गिरफ्तार भी कर लिया,लेकिन दुष्प्रचार तो हो चुका था .  


 उत्तर प्रदेश में गुंडों और माफियाओं के विरुद्ध योगी ने सघन अभियान चलाया जिसके कारण  कुख्यात माफिया   या तो सलाखों के पीछे हैं या  दूसरे राज्यों में छिपे हुए हैं और कुछ को एनकाउंटर में  पुलिस ने मार गिराया गया है.  इन माफियाओं द्वारा  सरकारी भूमि पर किए गए अवैध कब्जों पर  बनाई गई  इमारतों को ध्वस्त किया गया  और हजारों करोड़  रुपए मूल्य की   सरकारी जमीन  को खाली कराया गया.  हाल ही में मुख्तार अंसारी  की  पंजाब  से  उत्तर प्रदेश वापसी की कहानी पूरे   देश ने देखी और सुनी, जिसे पंजाब सरकार  निहित स्वार्थ बस जानबूझकर उत्तर प्रदेश  नहीं भेज रही थी और इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार को सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा  खटखटाना  पड़ा लेकिन  योगी सरकार ने इस कुख्यात माफिया को उत्तर प्रदेश की जेल में डाल कर ही दम लिया.   उत्तर प्रदेश  सरकार के  ऐसे कार्यो ने  जनता को  सबसे अधिक  प्रभावित किया है.


कानपुर के विकरू  कांड जिसमें एक उपाधीक्षक सहित आठ पुलिस  वालों की हत्या कर दी गई थी,   के  कुख्यात अपराधी  विकास दुबे को जब एक एनकाउंटर में पुलिस ने मार गिराया  तो अफवाह गैंग तुरंत सक्रिय हो गया और पुनः जातीय विद्वेष फैलाने की कोशिश की  जाने लगी.  सोशल मीडिया  और  दूसरे माध्यमों से  यह अफवाह फैलाई गई कि योगी  ठाकुर हैं और घोर  ब्राह्मण विरोधी है इसलिए  ब्राह्मणों की हत्या  की जा रही है. एक सन्यासी  सामाजिक जातिगत वर्गीकरण  और सांसारिकताओं से ऊपर होता है और मैं योगी आदित्यनाथ को व्यक्तिगत रूप से जानता हूं  कि वह  सनातन हिंदूवादी तो है, जो उन्हें होना भी चाहिए, लेकिन किसी जाति  या धर्म विशेष के लिए उनके मन में कोई विद्वेष की भावना नहीं  है. एक ऐसा सन्यासी जो  कोरोना महामारी   की प्रचंडता  के बीच  प्रदेश की जनता के  प्रति  अपने दायित्व  निर्वहन के  राजधर्म के कारण अपने पिता के अंतिम दर्शन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान दिल्ली नहीं गया हो और उनकी मृत्यु के पश्चात उनके अंतिम संस्कार में भी सम्मिलित नहीं हुआ हो,   उसके ऊपर इस तरह के निम्न स्तरीय  आक्षेप लगाना  प्रदेश की जनता को बहुत नागवार गुजरा है . 


 जहां तक कोरोना महामारी  का प्रश्न है,   योगी ने पूरे देश में कुशल मुख्यमंत्री होने का एक उदाहरण स्थापित किया है. जब ज्यादातर प्रदेशों के मुख्यमंत्री सोशल मीडिया और टीवी  वार्ताओं तक ही सीमित थे,   उन्होंने प्रदेश के हर जिले का सघन दौरा किया,  अस्पतालों में गए,  और स्थिति का जायजा  लेकर प्रभाव कारी कदम उठाए.   जब  दिल्ली सरकार द्वारा  उत्तर प्रदेश और बिहार के  प्रवासी मजदूरों  को  डीटीसी की बसों में भरकर  उत्तर प्रदेश बॉर्डर पर छोड़  दिया गया था  ,  तो योगी ने इन हजारों प्रवासी  श्रमिकों के रहने खाने-पीने की समुचित व्यवस्था की  और  उनके गंतव्य तक पहुंचने का भी पूरा इंतजाम किया.  इसमें बड़ी संख्या में बिहार के प्रवासी श्रमिक भी थे. यही नहीं योगी ने  कांग्रेस के बस घोटाले का भी मुंह तोड़ जवाब दिया और जनता के सामने कांग्रेस का झूठ उजागर कर दिया.   बहुत  बड़ी संख्या में दिल्ली, मुंबई और अन्य जगहों से  लौटे  प्रवासी मजदूरों  की व्यवस्था करना किसी भी सरकार के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था, जिसे योगी सरकार ने बहुत कुशलता से  संभाला. कोरोना की पहली और दूसरी लहर में  योगी सरकार के प्रबंधन की विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी जमकर तारीफ की है और  प्रधानमंत्री मोदी   तो  समय-समय पर  योगी के कोरोना प्रबंधन  पर उनकी पीठ थपथपाते रहे हैं. 


 लगभग 25 करोड़ की  जनसंख्या वाला उत्तर प्रदेश विश्व में 4 देशों को छोड़कर सभी देशों से बड़ा है  और  स्वास्थ्य  की सीमित मूलभूत सुविधाओं के बावजूद  प्रदेश में  संक्रमितों  की संख्या और मृत्यु दर  ज्यादातर प्रदेशों और विश्व के ज्यादातर देशों  की तुलना में बहुत अच्छी रही है.   यहां यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि योगी के 4 साल के अब तक के कार्यकाल का  डेढ़ साल सिर्फ कोरोना  महामारी    के आकस्मिक  प्रबंधन करते हुए  बीता. इस सब के बाद भी  उत्तर प्रदेश आर्थिक विकास के पथ पर तेजी से कार्य किया और नए एयरपोर्ट के साथ देश में सबसे अधिक साथ एयरपोर्ट वाला राज्य बन गया. प्रदेश में  सड़कों में भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं  इनमें कुछ पूरी हो चुकी हैं और कुछ तेजी से पूरी  होने की ओर अग्रसर है.   इनमें पूर्वांचल एक्सप्रेस वे, गंगा एक्सप्रेस वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे,  गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस वे,  बलिया लिंक एक्सप्रेस वे सहित अन्य राष्ट्रीय  राजमार्ग शामिल है. प्रदेश की कई महत्वाकांक्षी परियोजनायें   अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा और काशी में चल रही हैं,  जिनसे सनातन संस्कृति के प्रसार के साथ-साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा और आर्थिक गतिविधियां बढ़ेगी. नोएडा में फिल्म सिटी का कार्य भी काफी प्रगति पर है .  ऐसी अनेकों औद्योगिक गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश एक बीमारू राज्य की  स्थिति से उबर चुका है और  2020-21 में वह पूरे देश में महाराष्ट्र और तमिलनाडु के बाद तीसरे नंबर की सबसे  बड़ी  नॉमिनल जीडीपी (  17  लाख करोड़  से अधिक  ) वाला प्रदेश  बन चुका  है. 


उत्तर प्रदेश भाजपा में संगठन और सरकार में बदलाव की अफवाहों को तब और बल मिला जब दिल्ली में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, राष्ट्रीय महासचिवों और प्रभारियों की बैठक के बाद उत्तर प्रदेश  के भाजपा  प्रभारी राधा मोहन सिंह, राष्ट्रीय महासचिव संगठन  बीएल संतोष ने  लखनऊ का दौरा किया .  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले के लखनऊ दौरे को भी उन्हीं अटकलों के साथ जोड़कर देखा जा रहा है. राधा मोहन सिंह ने तो  राज्यपाल आनंदीबेन  और विधानसभा अध्यक्ष श्री  हृदय नारायण दीक्षित से भी मुलाकात की जिससे अटकलों का बाजार और गर्म हो गया.  यद्यपि राधा मोहन सिंह ने  इन मुलाकातों को शिष्टाचार मुलाकात बताया और  अपने दौरे का उद्देश्य 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों से संबंधित बताया किंतु एक सामान्य राजनीतिक   समझ    वाला व्यक्ति भी  यह अनुमान जरुर लगाएगा कि कुछ न कुछ तो चल रहा है अन्यथा राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष से मिलने की क्या  जरूरत  थी ?    इन मुलाकातों  का 2022 के विधानसभा चुनाव से क्या संबंध हो सकता है यह अभी भी एक अबूझ पहेली है .   


इन नेताओं द्वारा दे गए स्पष्टीकरण के बाद   जनता को  आश्वस्त होना चाहिए कि  उत्तर प्रदेश में भाजपा मुख्यमंत्री बदलने नहीं जा रही है  और  मंत्री स्तर के बदलाव से जनता पर कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता.   


जो भी हो भाजपा कैडर आधारित विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है  और उसे यह  अवश्य मालूम  होगा कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80  सीटें हैं और केंद्र में सरकार बनाने का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही होकर ही जाता है लेकिन भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यह  जरूर  समझ लेना चाहिए कि पंचायत चुनाव में प्रदर्शन किसी भी राजनीतिक  दल के लिए विधानसभा और लोकसभा  चुनावों के लिए कोई बहुत  महत्वपूर्ण संकेत नहीं होता, अगर यह  इतना ही महत्वपूर्ण होता तो 2017 में भाजपा को इतनी सफलता कैसे मिली ?  अभी कुछ माह पहले इंडिया टुडे द्वारा कराए गए  एक जनमत सर्वेक्षण में   यह बात सामने आई थी कि उत्तर प्रदेश में   योगी की लोकप्रियता के आगे  भाजपा या विपक्ष का कोई नेता कहीं दूर दूर तक नहीं ठहरता.   इसलिए  भाजपा को यह भी अवश्य ध्यान रखना चाहिए  कि उत्तर प्रदेश में की गई एक छोटी सी भूल भी पार्टी के लिए  बहुत  विनाशकारी साबित हो सकती है. 

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  • शिव मिश्रा

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मंगलवार, 1 जून 2021

मोदी सरकार के 7 वर्ष के कार्य काल की बैलेंस शीट और विश्लेषण

 


( यह लेख परिवर्धित रूप में हिन्दी साप्ताहिक माधव भूमि के ५ जून के अंक में प्रकाशित हुआ है )

मोदी सरकार के 7 वर्ष पूरे होने पर जहां सरकार ने अपनी पीठ थपथपाई, वही कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया और यह बहुत स्वाभाविक भी है. किन्तु दलगत राजनीति से अलग सरकार के इन 7 वर्षों के कार्यकाल को देशहित और जनहित के दृष्टिकोण से देखने और सरकार की उपलब्धियों और विफलताओं का सम्यक विश्लेषण करना नितांत आवश्यक है ताकि है पता चल सके कि-

  • देश ने इस अवधि में क्या खोया और क्या पाया ?

  • देशवासियों की कौन सी आकांक्षाएं पूरी हुई और कौन सी अभी भी प्रतीक्षित है ?

  • इस कारण जनता में सरकार के प्रति क्या धारणा बन रही है ?

उपलब्धियां :

  • अगर हम सरकार की उपलब्धियों की चर्चा करें तो मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि जनता के बीच आज भी धारा 370 का हटना ही है, और उसी से जुड़ी उपलब्धि है जम्मू कश्मीर का विभाजन करके 2 केंद्र शासित प्रदेश बनाना और धारा 35 A हटाना. इससे मोदी मोदी की छवि में तो इजाफा हुआ ही देश ने अमित शाह को भी सरदार पटेल की तरह सिर माथे उठा लिया. जो पिछले 70 साल में नहीं हो सका वह मोदी के कार्यकाल में हो गया. राम मंदिर का निर्माण मोदी के कार्यकाल की दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि है जिसने सरकार की छवि को गांव और गली तक बहुत मजबूत कर दिया, यद्यपि यह सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय था और इसमें मोदी सरकार की भूमिका बहुत सीमित थी, फिर भी जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमाम विरोधी स्वरों के बाद भी अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास किया और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के प्रति श्रद्धा प्रकट की, जिसने पूरे हिंदू जनमानस में मोदी की हिंदूवादी छवि को और अधिक मजबूत किया. स्वाभाविक था कि लोगों की उनसे अपेक्षाएं और भी बढ़ गई. अब लोगों के मन में काशी और मथुरा की आकांक्षा कुलांचे भर रही है.


  • पाकिस्तान के अंदर घुस कर की गई बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक ने भारतीय जनमानस में मोदी के अदम्य साहस को बहुत गहराई में अंकित कर दिया. विपक्षी दलों द्वारा इस पर सवाल उठाए जाने से लोगों में न केवल नाराजगी हुई बल्कि वह बहुत मजबूती से मोदी के साथ खड़े हो गए. गलवान घाटी में चीनी सेना के समक्ष भारत के पराक्रम में लोगों ने मोदी की इसी मजबूत इरादों वाली छवि के ही दर्शन किए . कांग्रेस और विपक्षी दलों द्वारा फैलाई गई अफवाहों ने भी आश्चर्यजनक रूप से मोदी को ही मजबूत किया.


  • मुसलमानों की तीन तलाक प्रथा को भी खत्म करने के लिए मोदी के साहसिक कदम की सर्वत्र सराहना हुई जिससे लोगों को शाहबानो मामले में कांग्रेस का आत्मसमर्पण बरबस याद आ गया और बिना कुछ किए ही कांग्रेस को लाचार और बेबस बना दिया वहीं मोदी और मजबूत होकर उभरे .


  • वैसे तो मोदी सरकार ने अनेक कल्याणकारी योजनाएं चलाई लेकिन जिसने सबसे अधिक महिलाओं विशेष कर ग्रामीण क्षेत्रों की, को प्रभावित किया, वह है उज्जवला योजना और जिसने सबसे अधिक किसानों को प्रभावित किया वह है किसान सम्मान योजना . देश हित में अगर देखा जाए तो आयुष्मान योजना संभवत: विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना है जिससे भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या को लाभ होगा यद्यपि इस योजना का अधिकतम लाभ मिलना बाकी है जिसके लिए केंद्र सरकार को और अधिक प्रयास करना होगा.


  • वित्तीय क्षेत्र में भी सरकार ने बहुत मजबूती से कई कदम उठाए जो भविष्य में देश के आर्थिक विकास में अत्यधिक सहायता पहुंचाएंगे. इनमें सबसे बड़ा कार्य है एक देश एक कर प्रणाली जिसे जीएसटी के नाम से जानते हैं. इतने बड़े देश में इस तरह की परियोजना की शुरुआत करना हमेशा मुश्किल होता है इसलिए शुरुआती दौर में इससे बहुत समस्याएं आई और उत्पादों पर करो की ऊंची दरों ने, इस प्रणाली को बदनाम करने के लिए कांग्रेस और विपक्षी दलों का ही सहायता की और राहुल गांधी ने तो इसे गब्बर सिंह टैक्स की संज्ञा दी थी. यह प्रणाली अब व्यवस्थित हो चुकी है और इसके वांछित परिणाम आने शुरू हो गए हैं आने वाले कुछ वर्षों में इससे देश में आर्थिक विकास की वृद्धि में अत्यधिक सहायता मिलेगी. जहां दुनिया के बहुत से देश अभी भी इस तरह की कर प्रणाली लागू करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, स्व. अरुण जेटली प्रयासों और नरेंद्र मोदी के परियोजना क्रियान्वयन क्षमता ने भारत जैसे विशाल देश में इसे काफी कम समय में लागू कर दिखाया .


  • जनधन खातों ने आजादी के बाद पहली बार कमजोर वर्ग को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का काम किया और इस कारण ही उनके खातों में सीधे सहायता राशि भेजने का काम संभव हो सका और इस व्यवस्था ने काफी हद तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया और सरकारी संसाधनों की बचत भी की. वित्तीय क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक कानून दिवाला एवं शोधन कानून 2016 ( इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड) बनने से बैंकों में फंसे हुए बड़े कर्ज़ों की वसूली में अत्यधिक सहायता मिलेगी, और भविष्य में होने वाले एनपीए में कमी भी आएगी.


  • मोदी सरकार के कार्यकाल में एक बहुप्रतीक्षित कानून बना जिसके विरुद्ध कोई हो हल्ला भी नहीं हुआ और वह हैं श्रम कानून जो बहुत शांति पूर्वक लागू भी हो गया. इसके विपरीत नए कृषि कानून जिनका पुरजोर विरोध किया जा रहा है. अगर यह कृषि कानूनों लागू हो पाए तो देश के अधिकतर किसानों का बहुत फायदा होगा और अगले 5 वर्षों में में उनकी आर्थिक स्थिति में अत्यधिक सुधार देखने को मिलेंगे. दुर्भाग्य से इन कानूनों का आढ़तियों और बिचौलियों द्वारा विरोध किया जा रहा है जिसे राजनीतिक समर्थन भी प्राप्त है इसके साथ ही इस पूरे आंदोलन को कुछ विकसित देशों द्वारा भी धार दी जा रही है क्योंकि उन्हें डर है कि इन कृषि कानूनों के कारण भविष्य में भारत खाद्यान्न का बहुत बड़ा निर्यातक बन सकता है जिससे उनके हित प्रभावित होंगे.


  • एक अन्य परियोजना है जिसका पूरी सरकार की उपलब्धियों में बहुत कम उल्लेख होता है वह है ग्रामीण विद्युतीकरण जिसके द्वारा भारत के प्रत्येक गांव में बिजली पहुंच चुकी है. 70 वर्ष बाद ही सही लेकिन यह भारत जैसे विशाल देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है. राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में भी मोदी सरकार ने अत्यंत प्रशंसनीय कार्य किया है और निर्माण की गति आजादी के बाद अब तक की सर्वश्रेष्ठ गति है जिसके लिए नितिन गडकरी को श्रेय दिया जाना आवश्यक है.

  • एक अन्य अत्यंत महत्वपूर्ण किंतु बहु प्रतीक्षित मुद्दा “वन रैंक वन पेंशन” जो देश के सीमा प्रहरियों से सीधे जुड़ा था, शांति पूर्वक सुलझा लिया गया. सरकार की एक अन्य अब तक की उपलब्धि है भ्रष्टाचार रहित सरकार, जो पिछले 10 वर्षों की सरकार के बिलकुल उलट है जब हर दिन कोई न कोई घोटाला सामने आया था और अखबारों की सुर्खियां बना था.

विफलताएं :

अब बात करते हैं उन क्षेत्रों की जहां या तो सरकार को वांछित सफलता नहीं मिली या सरकार कुछ भी करने में विफल रही.

  • इसमें सर्वाधिक चर्चा कोरोना की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की कोरोना प्रबंधन को लेकर है. इसमें कुछ तो सच्चाई भी है लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारों की विफलता का बोझ भी मोदी सरकार के कंधे पर आ गया है जिसे टूल किट की नई संस्कृति ने मोदी की छवि खराब करने के साथ साथ देश की छवि भी खराब करने में भी कोई संकोच नहीं किया. सोशल मीडिया के निरंकुश प्लेटफार्म, विदेशी मीडिया और इंटरनेट मीडिया के अन्य साधनों ने जो कई देशों की राजनीति में भी सीधा दखल देते हैं, ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया .


  • यह जानते हुए भी कि यह जो कुछ भी प्रचारित किया जा रहा है, सही नहीं है, इसका दोष निश्चित रूप से मोदी सरकार को ही देना उचित होगा क्योंकि मोदी के इस कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के निष्पादन बेहद निराशाजनक हैं. आए दिन कभी फिल्मों में, कभी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर, कभी सोशल मीडिया पर तो कभी सार्वजनिक मंच पर, देश और हिंदुओं के विरुद्ध विष वामन होता रहता है लेकिन यह दोनों ही मंत्रालय इस दिशा में कुछ भी नहीं कर सके और यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता भी है.


  • अगर इन दोनों मंत्रालयों के कार्य में तुरंत सुधार नहीं हुआ या इन मंत्रियों को नहीं बदला गया तो 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. 2004 के आम चुनाव के पहले बाजपेयी सरकार के एक मंत्री के सहारे कांग्रेस के राजीव शुक्ला ने दूरदर्शन पर सोनिया गांधी का बहुत मार्मिक साक्षात्कार प्रस्तुत किया था और इसके बाद अटल बिहारी वाजपेई की शाइनिंग इंडिया ध्वस्त हो गई थी. कुछ प्रतिशत मतों ने कई लोकसभा की अनेक सीटों को प्रभावित किया था, जिसे करण कांग्रेस बहुमत न पाते हुए भी सत्ता की दहलीज के पास पहुंच गई और भाजपा सत्ता से बहुत दूर हो गई. कुछ भाजपाइयों में कांग्रेस से तार जोड़े रखने की यह संस्कृति आज भी देखने को मिल रही है.


  • मोदी सरकार ने नक्सल और माओवादियों के विरुद्ध कोई मजबूत अभियान नहीं चलाया और आज भी इसके कारण बड़ी संख्या में जवान मौत के घाट उतारे जा रहे हैं.


  • पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र सरकार को बार-बार ललकारती रही हैं, और कई बार तो स्थिति यह हो गई है जिससे प्रधानमंत्री पद की गरिमा को भी आंच आई लेकिन सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार के विरुद्ध कोई भी सख्त कार्यवाही नहीं की यहां तक कि चुनाव के पहले भी राष्ट्रपति शासन लगाना जरूरी नहीं समझा. चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री सहित भाजपा के स्टार प्रचारकों ने जनता का बहुत उत्साहवर्धन किया था और जनता ने उनका भरपूर साथ दिया. केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों द्वारा पोलिंग बूथों की सुरक्षा तो की लेकिन जनता को घर से निकलने के लिए न तो सुरक्षा मिली और न ही भय रहित वातावरण और इस कारण भाजपा जीती हुई बाजी हार गई और इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि जिन लोगों ने भाजपा का साथ दिया भाजपा उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में भी नाकाम रही . अपने ही देश में पश्चिम बंगाल के लोग शरणार्थी बनकर असम में रह रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हिंसा, जघन्य हत्या, बलात्कार, आगजनी और लूटपाट ने देश के बंटवारे की याद ताजा कर दी. अनेक लोग भाजपा का साथ देकर पछता रहे हैं, जिसके कारण भाजपा “पुनः मूषक: भव” की इस स्थिति में आ गई है . अगर दोबारा चुनाव हो जाए तो भाजपा को विधानसभा की अपनी पुरानी 3 सीटें भी जीतना मुश्किल हो सकता है.

  • जनता का एक बेहद कौतूहल वाला प्रश्न है कि क्या कारण है कि शाहीन बाग और किसान आंदोलन के साथ इतनी नरमी बरती गई ? अब तो पानी सिर के ऊपर से गुजर गया है. 26 जनवरी के दिन लाल किले पर तिरंगे का अपमान किया गया, जो गणतंत्र दिवस पर पूरे गणतंत्र और लोकतंत्र का अपमान है. सरकार की क्या मजबूरी है, जनता नहीं समझ पा रही? आज भारत में बच्चा-बच्चा जानता है कि देश का इतिहास झूठ का पुलिंदा है, इसमें सनातन संस्कृति और राष्ट्र को नीचा दिखाने की कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी गई है लेकिन इतिहास सही करने की दिशा में सरकार एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सकी. हिंदूवादी नेताओं से सामान्य हिंदू जनमानस यह अपेक्षा रखता है कि सत्ता में आने मंदिरों को सरकारी चंगुल से मुक्त किया जाएगा लेकिन सरकार ने यहां भी अब तक तो बहुत निराश किया है.

मोदी ने अपने पहले उद्घोष वाक्य “सबका साथ, सबका विकास” में अब “सबका विश्वास” भी जोड़ दिया है. सबके विश्वास के चक्कर में मोदी को जिनका विश्वास मिल रहा था कहीं उनका भी विश्वास न खो दें?

अगर ऐसा हुआ तो यह केवल भाजपा का नहीं राष्ट्र के रूप में भारत का भी बहुत बड़ा नुकसान होगा. हम सभी ने देखा कि 2004 में वाजपेयी सरकार की पराजय के बाद 10 वर्षों का समय केवल भाजपा के लिए ही नहीं वरन पूरे राष्ट्र के लिए एक संकट का समय रहा. परत दर परत भ्रष्टाचार होता रहा, राष्ट्र की अस्मिता और अखंडता के साथ खिलवाड़ होता रहा, भगवा आतंकवाद गढ़ा जाता रहा, बहुसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण किया जाता रहा और देश के संसाधनों पर उनका प्रथम अधिकार सिद्ध किया जाता रहा.

सरकार को इस दिशा में त्वरित कदम उठाने की आवश्यकता है, अन्यथा बहुत देर हो जाएगी

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- शिव मिश्रा

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शनिवार, 29 मई 2021

वीर सावरकर : एक प्रखर राष्ट्रवादी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, कवि , लेखक और विचारक

 वीर सावरकर को कोटिश : नमन !




भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी और राष्ट्रवादी नेता विनायक दामोदर सावरकर की आज 28 मई 2021 को 138वीं जयंती है। वीर सावरकर को शत शत नमन !

इस उपलक्ष पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर कई अन्य मंत्रियों ने भी सावरकर को नमन करते हुए श्रद्धांजलि दी है।

कभी अटल बिहारी वाजपेई ने इन शब्दों में वीर सावरकर को श्रद्धांजलि अर्पित की थी.



2018 में धानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंडमान की सेलुलर जेल जाकर जेल की उसी कोठी में रखी वीर सावरकर की फोटो के सामने बैठकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए .

मेरी सेलुलर जेल यात्रा :

  1. दिसंबर 2017 में मैं जब अंडमान निकोबार के पोर्ट ब्लेयर स्थित  इस सेल्यूलर जेल  देखने पहुंचा तो क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों द्वारा किए गए अत्याचार  उनके परमाणु देखकर ह्रदय द्रवित हो गया.   

  2. वीर सावरकर की कोठरी जो लगभग 12-13 फीट लंबी और 7 फीट चौड़ी थी,  जिसमें  उन्हें हथकड़ियां और बेड़िया लगाकर रखा जाता था. उस कोठरी में  कोई खिड़की नहीं थी सिर्फ लोहे का दरवाजा था. कोठरी  के किनारे पर पानी पीने का मिट्टी का एक बर्तन और लघु शंका से निवृत होने के लिए भी एक मिट्टी का बर्तन रखा  जाता था.   

  3. जरूरत पड़ने पर दीर्घ शंका  भी कैदियों को वही कोठरी  में करनी पड़ती थी.   

  4. यह कोठरी वीर सावरकर को जानबूझ कर दी गई थी, क्योंकि इसके ठीक नीचे फांसी घर  और यातना घर  बने हुए थे ताकि  कैदियों पर हो रहे अत्याचार के स्वर  लगातार  उनके कानों में जाते रहे  और उन्हें मानसिक  रूप से भी तोड़ा  जा सके.  

  5. भूतल पर लगे हुए तेल निकालने के कोल्हू में कैदियों को बैल की तरह जोता जाता था  और निश्चित मात्रा में प्रतिदिन तेल निकालना  प्रत्येक कैदी के लिए आवश्यक होता था.   

  6. इसी कोठरी में सावरकर ने  अपने जीवन के लगभग 10 साल बिताए. 

  7. मन  में लगातार एक प्रश्न  कौंधता  रहा कि  एक तरफ ऐसे  प्रखर राष्ट्रवादी  क्रांतिकारी थे   जिन्होंने इतनी  यातनाएं  सही  और दूसरी तरफ  जवाहरलाल नेहरू  जैसे  तथाकथित स्वतंत्रता सेनानी भी थे  जिन्हें जेल में  वीआईपी सुविधाएं मिलती थी, जिनसे  प्रतिदिन  पूछा जाता था कि वे नाश्ते में क्या खाएंगे, लंच  और डिनर में  में क्या खाएंगे.  जिन की लिखी हुई चिट्ठियों को  डाक घर तक पहुंचाने के लिए एक  जेल कर्मचारी  की ड्यूटी लगाई जाती थी.  ऐसा व्यक्ति  देश का प्रधानमंत्री बन जाता है  और वीर सावरकर  जैसे क्रांतिकारियों के  कार्यों को भी इतिहास से मिटाने की भरपूर कोशिश की जाती है, उन्हें बदनाम किया जाता है  ताकि कोई भी देश भक्त  उसे प्रेरणा ले सकें.   अंग्रेजों ने कांग्रेस की स्थापना  अपने शासन की निरंतरता बनाए रखने के लिए की थी और कांग्रेस  सरकार  ने  क्रांतिकारियों  और राष्ट्रवादियों  की वीर गाथाएं इतिहास से हटाकर और उन्हें लांछित  कर अपनी  सत्ता  बनाए रखने का असफल प्रयास किया . अंग्रेज तो केवल शारीरिक  यातनाएं  देते थे,  लेकिन कांग्रेस ने धार्मिक सांस्कृतिक और राष्ट्रवाद पर चोट करने की  ऐसी भयंकर यातनाएं इस देश को दी हैं,  जिसका उद्देश्य  समूचे  राष्ट्र का विध्वंस करना है, इसके   दुष्परिणाम  देश को कम से कम  अगले  100 वर्ष तक भोगने पड़ेंगे.  

महाराष्ट्र के नासिक के निकट भागुर गांव में 28 मई 1883 को जन्में वीर सावरकर एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। राजनीति में हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को विकसित करने में सावरकर का बहुत बड़ा योगदान है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य न होते हुए भी संघ परिवार में वीर सावरकर का बहुत सम्मान है क्योंकि वह राष्ट्र भक्ति की जीती जाती मिसाल थे.

वह वीर सावरकर ही थे जिन्होंने पूरे विश्व में हिंदुओं का मान बढ़ाने के लिए हिंदुत्व की अवधारणा को शब्द प्रदान किए . वह प्रखर राष्ट्रवादी और हिंदुत्व के पुरोधा थे उनके द्वारा लिखे गए साहित्य को सावरकर साहित्य के नाम से जाना जाता है, जिसमें राष्ट्रवाद कूट कूट कर भरा हुआ है. उनकी हर एक रचना राष्ट्रवाद की भावना को बेहद मजबूत करती है और यही कारण है कि उनकी पुस्तकें हैं ब्रिटेन जर्मनी पोलैंड आदि देशों में चलती थी लेकिन भारत में उन्हें प्रतिबंधित किया गया था. नेहरू ने आजादी के 5 साल तक दी इन किताबों से प्रतिबंध नहीं उठाया जब तक कि राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और लाल बहादुर शास्त्री ने इसके लिए आवाज उठाई .

सावरकर ने दी थी हिंदुत्व की ये परिभाषा -

सावरकर ने एक पुस्तक लिखी 'हिंदुत्व - हू इज़ हिंदू?' इस किताब में उन्होंने पहली बार राजनीतिक विचारधारा के तौर पर हिंदुत्व का इस्तेमाल किया था। सावरकर के अनुसार भारत में रहने वाला हर व्यक्ति मूलत: हिंदू है और यही हिंदुत्व शब्द की परिभाषा है।

जिस व्यक्ति की पितृ भूमि, मातृभूमि और पुण्य भूमि भारत हो वही इस देश का नागरिक है। हालांकि यह देश किसी भी पितृ और मातृभूमि तो बन सकती है, लेकिन पुण्य भूमि नहीं।

  • वीर सावरकर १८५७ में हुए सैन्य विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहां था और इस में मारे गए सैनिकों को शहीद का दर्जा दिया था लेकिन कांग्रेस के लोग इसे पसंद नहीं करते थे कांग्रेस के अनुसार यह केवल सैनिक विद्रोह था जिसे अंग्रेजों ने कुचल दिया था .

  • हकीकत यह है कि अंग्रेज भारतीय क्रांतिकारियों से बहुत डरते थे और अट्ठारह सौ सत्तावन की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो इसलिए 1885 में ए ओ ह्यूम नाम के एक अंग्रेज से जो उस समय इटावा के कलेक्टर हुआ करते थे कांग्रेस की स्थापना स्वयं अंग्रेजी शासन नहीं कराई थी.

  • इतिहासकार और लेखक विक्रम संपथ की किताब “सावरकर - इकोज फॉर्म फॉरगगोटिन पास्ट” ( Savarkar - Echos from forgotten past) में लिखते हैं की कांग्रेसका उद्देश्य भारत को स्वतंत्रता दिलाना हरगिज़ भी नहीं था कांग्रेस की स्थापना करने का मतलब था कि सावरकर जैसे बुद्धिजीवी क्रांतिकारियों को भारत की सोच सामान्य जनमानस को प्रभावित न करने पाए. संपथ ने इस किताब में वीर सावरकर के जीवन से जुड़ी अनेक अनसुनी बातें बताई हैं.

  • आजादी के बाद ज्यादातर शासन करने वाली कांग्रेस के समय हमेशा प्रयास किया गया की देशभक्ति का पाठ पढ़ाने वाले देश के असली नायकों को इतिहास से बाहर कर दिया जाए ताकि आगे की पीढ़ियों उनके नाम भी ना जान सके .

  • अक्तूबर, 1906 में लंदन में मोहनदास करमचंद गांधी को अपने यहाँ खाने पर बुला रखा था ( जो उस समय महात्मा गांधी नहीं थे ) जो दक्षिण अफ़्रीका में रह रहे भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय के प्रति दुनिया का ध्यान आकृष्ट कराने लंदन आए हुए थे.

    • उन्होंने सावरकर से कहा कि अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ उनकी रणनीति ज़रूरत से ज़्यादा आक्रामक है. दोनों के बीच कुछ ऐसा हुआ कि गांधी बिना खाए हे चले गए .

  • १९०९ वीर सावरकर ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम था द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस, जिसमें उन्होंने 1857 में हुए स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम आंदोलन का विस्तार से वर्णन किया था. अंग्रेज इस किताब से इतना डरे हुए थे कि उन्हें इस किताब को प्रतिबंधित कर दिया.

  • प्रखर हिंदूवादी होने के कारण मार्क्सवादी राजनीतिज्ञों, विश्लेषकों व इतिहासकारों ने हमेशा उनकी आलोचना की और उनकी स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका को लेकर भी लगातार सवाल उठाए और सावरकर को नाज़ीवाद व फासीवाद से जोड़ने की भी भरपूर कोशिश की.

  • लेकिन भारत के वामपंथियों का ढोंग ही कहा जाएगा क्योंकि एक ऐतिहासिक तथ्य यह है कि कार्ल मार्क्स के पोते लोंगुएट ने हिंदुत्व के पुरोधा सावरकर का एक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में में न केवल बचाव किया था बल्कि उनके व्यक्तित्व और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी भूमिका की जबरदस्त प्रशंसा भी की थी.

    • यद्दपि वह सावरकर को बचा नहीं सके और फैसला अंग्रेजों के पक्ष में गया. जिसके कारण 1911 में वीर सावरकर को काले पानी की सजा सुनाई गई और उन्हें अंडमान की सेल्यूलर जेल में भेज दिया गया.

  • उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएं सुनाई गईं . उन्हें 698 कमरों की सेल्युलर जेल में 13.5 गुणा 7.5 फ़ीट की कोठरी नंबर 52 में रखा गया.

  • मैं जब स्वयं इस सेलुलर जेल और सावरकर की कोठरी के दर्शनार्थ पहुंचा तो विश्वास करिए आपके आंसू आ जायेंगे .

    • इस छोटी सी कोठी में ही उन्हें लघु शंका से निवृत होना पड़ता था जिसके लिए मिट्टी का एक बर्तन रखा रहता था और जरूरत पड़ने पर उन्हें दीर्घ शंका भी वही करनी पड़ती थी. हथकड़ी और बेड़ियों से जकड़ा व्यक्ति तो बैठ भी नहीं सकता था. सभी कैदियों का जीवन नर्क से भी बदतर था.

( सेलुलर जेल और वह कोठरी जहां सावरकर को रखा गया था- मेरे द्वारा स्वयं ली गई फोटो)

अंडमान में सरकारी अफ़सर बग्घी में चलते थे और राजनीतिक कैदी इन बग्घियों को खींचा करते थे. उन्हें कोनों में बैल की जगह जूता जाता था जहां पर नारियल से तेल निकालने का काम उनसे कराया जाता था.

(सेलुलर जेल के अंदर बना तेल निकालने का कोल्हू जिसमें सावरकर को बैल की तरह जोता जाता था - मेरे द्वारा स्वयं ली गई फोटो )

( सेलुलर जेल के अंदर बना शहीद स्मारक- मेरे द्वारा स्वयं ली गई फोटो )

जेल में बिताए अपने अनुभवों के आधार पर सावरकर ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक है “मेरा आजीवन कारावास” जिसमें जेल में उन्हें दी गई यातनाओं का बहुत लोम हर्षक वर्णन किया गया है.

दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने सेलुलर जेल के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएं लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई 10 हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा।

वर्ष 1949 में सावरकर पर गांधी हत्याकांड में शामिल होने का आरोप लगा था और उन्हें इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन सबूतों के अभाव में अदालत द्वारा उन्हें बरी कर दिया गया था।

26 फरवरी 1966 को भारत के इस महान क्रांतिकारी का निधन हुआ। उनका संपूर्ण जीवन स्वराज्य की प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हुए ही बीता। वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अग्रिम पंक्ति के सेनानी एवं प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे।

कांग्रेस ने अपने शासनकाल में वीर सावरकर के नाम को हमेशा बदनामी के गर्त दबाने की कोशिश की. जनता पार्टी के शासन काल में अंडमान के पोर्ट ब्लेयर स्थित सेलुलर जेल को स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक बनाया गया.

( सिग्नल जेल के अंदर लगा पत्थर - फोटो मेरे द्वारा स्वयं ली गई )

वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' देने का प्रस्ताव भेजा था, लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था.

उन्हें भारत रत्न देने की मांग यदा-कदा चलती रहती है यदि अब उन्हें भारत रत्न दिया जाता है तो शायद कोई और नहीं है लेकिन मेरा मानना है वीर सावरकर का जो स्थान है सभी देश भक्ति भारतीयों के हृदय में है उसके लिए भारत रत्न कोई बात नहीं रखता है हां यदि भारत रत्न दिया जाता है तो निश्चित रूप से भारत रखती ही गौरवान्वित होगा.

References - [1] [2] [3]

फुटनोट

[1] मार्क्स के पोते ने की थी सावरकर की पैरवी, भारत के मार्क्सवादियों द्वारा उनका विरोध कितना तर्कसंगत

[2] तो ऐसे विनायक दामोदर सावरकर के नाम के आगे लग गया था 'वीर'

[3] वीर सावरकर : स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी नेता। Vinayak Damodar Savarkar

बुधवार, 26 मई 2021

रजाकार कौन थे और निजाम के शासन में उनके क्या कार्यकलाप थे?

 रजाकार  निजाम  शासन में हिन्दुओं के नृशंस हत्यारे ! 

( रजाकार दस्ता )

रजाकार कट्टरपंथी मुस्लिमों का हथियारबंद संगठन था जो हैदराबाद में निजाम के शासन के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार करके उन्हें मुस्लिम बनने पर मजबूर करता था. यह नृशंस हत्यारों का समूह था जो निजाम के इशारे पर हैदराबाद में काफिरों के सफाये में संलग्न था. इसे उत्तर प्रदेश में जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा पाए कासिम रिजवी ने बनाया था. इस संगठन ने हैदराबाद में लाखों हिंदुओं का कत्ल किया, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

यह हथियारबंद रजाकार संगठन हिंदू गांवों पर आक्रमण करता था, लूटपाट करता था, महिलाओं के साथ बलात्कार करता था. पुरुषों और बच्चों के मौत के घाट उतार देता था

यह बात उल्लेखनीय है कि असदुद्दीन ओवैसी इसी नृशंस रजाकारों के वंशज हैं.

निजाम को क्यों जरूरत पड़ी रजाकार संगठन की ?

निजाम को हिंदुओं के विरुद्ध बनाए गए कानूनों को सख्ती से लागू करने और न मानने वाले लोगों को मौके पर ही दंडित करने के लिए एक संगठन की जरूरत थी जिसके लिए रजाकार संगठन बनाया गया.

हिंदुओं के विरुद्ध निजाम के प्रतिबंध

  • निजाम सरकार के एक फरमान जिसे गस्ती निशान 53 यानी सरकारी आदेश संख्या 53 के द्वारा हिंदुओं को सार्वजनिक रूप से पूजा अर्चना करने की अनुमति नहीं थी.
  • हिंदू अपने देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकालने की सोच भी नहीं सकते थे. मंदिरों पर पाबंदी थी. हिंदुओं की कोई भी धार्मिक सभा आयोजित नहीं की जा सकती थी. यहां तक कि हिंदू कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं कर सकते थे चाहे वह गैर धार्मिक ही क्यों न हो .
  • कभी कभी रात के अंधेरे में चार छह हिंदू लोग मिलकर अपने घरों में बहुत धीमे-धीमे स्वरों में पूजा कथा और भजन कीर्तन कर लेते थे. अगर इसकी भनक रजाकार संगठन को लग जाती थी तो उस पूरे मोहल्ले को सजा दी जाती थी, जिसमें मौके पर ही उनकी हत्या करना भी शामिल था.
  • हिंदुओं के किसी भी धार्मिक आयोजन जैसे रामलीला, यक्षगान, कथा भागवत आदि पर पूरी तरह से प्रतिबंध था.
  • अगर कोई हवन यज्ञ करता हुआ पाया जाता था तो उसे तुरंत मौत के घाट उतार दिया जाता था.
    • निजामाबाद के एक युवक राधा कृष्ण मोदानी ने यज्ञ और हवन पर निजाम के प्रतिबंध का विरोध करते हुए बाजार में सार्वजनिक रूप से यज्ञ का आयोजन किया. रजाकार संगठन ने यज्ञ करते हुए ही राधा-कृष्ण गोदानी का कत्ल कर दिया. निजामाबाद के इस मुख्य बाजार को हिंदुओं ने राधा-कृष्ण गंज का नाम दिया था जो आज भी प्रचलित है.
  • भैरनपल्ली नाम के गांव में रजाकारों द्वारा 200 हिंदुओं को शांति वार्ता के लिए बुलाया गया और वहीं पर उन सभी को कत्ल कर दिया गया.
    • इसी तरह चिंतडपल्ली में स्वाधीनता सेनानियों को वार्ता के लिए बुलाया गया और सभी को मौत के घाट उतार दिया गया.
    • इस तरह के अनेक गांव हैं, जहां रजाकारों ने जाकर पूरे के पूरे गांव को जमींदोज कर दिया, पुरुषों और बच्चों की हत्या कर दी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और उन्हें अपने साथ ले गए.
  • राज्य में हिन्दी, तेलुगु और मराठी पर पूरी तरह प्रतिबंध था और कोई भी स्कूल हिंदी, तेलुगु या मराठी माध्यम से पढ़ाई नहीं कर सकते थे.
    • स्कूलों कॉलेजों में हिंदुओं को भारतीय परिधान पहनने की अनुमति नहीं थी उन्हें मुस्लिम रिवाज और शरीयत के अनुसार ही कपड़े पहनने पढ़ते थे.
  • निजाम के शासनकाल में एक स्लोगन चलता था “अनअल मालिक” यानी (I am the Ruler) मैं शासक हूं और हर मुस्लिम हिन्दुओं से यही कहता था और अपने आप को निजाम समझता था.
  • भारत का दुर्भाग्य देखिए कि जिन पी वी नरसिम्हा राव ने निजाम शासन के विरुद्ध हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी में धोती आंदोलन शुरू किया था, वह जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने आंध्र प्रदेश के आर्कियोलॉजिकल विभाग से हैदराबाद की इतिहास के चार वॉल्यूम प्रकाशित करवाएं जिसमें दो वॉल्यूम सिर्फ निजाम शासन से संबंधित हैं लेकिन 800 पेज के इन दोनों वॉल्यूम में रजाकार संगठन का कोई जिक्र नहीं है.
    • आसानी से समझा जा सकता है की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने वोटों की खातिर इतिहास को भी बदल डाला.
    • आज तेलंगाना, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के लोग अपना वास्तविक इतिहास खोज रहे हैं.
    • इंटरनेट मीडिया पर मजलिस और निजाम शासन के गुणगान करने वाला इतिहास मिलेंगे यहां तक कि तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों की सहमति से कुछ लोगों ने रजाकार संगठन के कासिम रिजवी को स्वतंत्रता सेनानी भी घोषित कर दिया है और इससे सम्बंधित कई झूठी और फरेबी वीडियो यूट्यूब और गूगल सर्च में मिल जाएंगे.

( हैदराबाद से हिन्दुओ का पलायन )

हैदराबाद का ऑपरेशन पोलो :

  • निजाम ने हैदराबाद के भारत में विलय से आनाकानी की, और इसे या तो पाकिस्तान में मिलाने या स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश की. इसके लिए उसने अपनी सेना और रजाकार संगठन को विरोध करने के लिए आगे कर दिया. इस विरोध को जिन्ना का भी समर्थन प्राप्त था जिन्होंने पाकिस्तान का बॉर्डर बंद कर दिया था और पाकिस्तान जाने की इच्छा रखने वाले वाले सभी मुसलमानों से कहा था कि वह हैदराबाद में जाकर आबाद हो.  
  • अपने इरादे से अटल सरदार पटेल को हैदराबाद के विलय के लिए ऑपरेशन पोलो चलाना पड़ा. बताया जाता है कि कुछ गांव ऐसे थे जो पूर्णरूपेण रजाकारों के ही गांव थे, जहां भारतीय सेना और पुलिस पर जबरदस्त आक्रमण किए गए लेकिन इसमें निजाम की सेना और रजाकार संगठन को भारी क्षति पहुंची.  
  • विडंबना देखिए जब रजाकार सेना हिंदुओं पर अत्याचार करती थी तो कहा जाता था कि यह चंद भटके हुए लोगों का संगठन है लेकिन ऑपरेशन पोलो में मारे गए यह भटके हुए रजाकार अचानक मुस्लिम हो गए, जिनकी की मौत पर नेहरू जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने एक तीन सदस्य गुडविल मिशन हैदराबाद भेजा जिसकी अध्यक्षता पंडित सुंदरलाल कर रहे थे और इसके अन्य सदस्य थे काजी अब्दुल गफ्फार और मौलाना अब्दुल्लाह मिसरी.  
  • अफवाह उड़ाई गई कि ऑपरेशन पोलो में 50 हजार से 2 लाख के बीच मुस्लिमों की हत्या कर दी गई है ताकि सरदार पटेल को नीचा दिखाया जा सके और उनकी लोकप्रियता को कम किया जा सके. यद्यपि गुडविल मिशन न तो कोई आयोग था और ना ही कोई कमेटी इसलिए इसे रिपोर्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं थी लेकिन सरदार पटेल को नीचा दिखाने के लिए नेहरू ने दबाव बनाकर इन सदस्यों से एक रिपोर्ट बनवाई ताकि तथाकथित मुस्लिम नरसंहार की कहानी सामने लाई जा सके. अन्य कांग्रेसी मंत्रियों के विरोध के कारण इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया जिसके कारण गलतफहमी और बढ़ती गई लेकिन यह रिपोर्ट आज भी इंटरनेट मीडिया पर धड़ल्ले से उपलब्ध है.  

      (The Nizam of Hyderabad receiving Sardar Patel after Operation Polo at Begum pet Airport

      कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए हैदराबाद का इतिहास इस तरह बदल डाला कि हिंदुओं की नई पीढ़ी के लोगों को इन राजाकारों के बारे में सही जानकारी मिल सके. हैदराबाद के राका सुधाकर राव जैसे समाजसेवी इस दिशा में अथक प्रयास कर रहें हैं . [1]

      आज रजा कारों की उत्तराधिकारी ए आई एम आई एम (ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन), जिसके नेता असदुद्दीन ओवैसी हैं, से टीआरएस और कांग्रेस दोनों ही गठबंधन के लिए उतावले रहते हैं .

      शायद आज भी हिंदुओं के इस देश में, एक हजार साल की गुलामी के अत्याचारों को सहते हुए अपनी अस्मिता और धार्मिक रक्षा करके आज जो हिंदू शेष है, उनकी सुनने वाला कोई भी नहीं है.

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      References

      [1] Who were the Razakars and what were their activities under the Nizam's rule?

      [2] https://www.youtube.com/watch?v=7b3PUCmCSFs&t=1157s

      [3] https://indusscrolls.com/how-hyderabad-nizams-beastly-army-unleashed-a-reign-of-terror-on-hindus/

      [4] https://www.youtube.com/watch?v=ohqIiuLw8CI

      [5] Unaccounted reports of Hindu genocide under the Nizam of Hyderabad

      [6] https://www.youtube.com/watch?v=_1TSsytza-8

      [7] https://www.youtube.com/watch?v=ARe5cH_wc5s

      [8] Survivor of Razakars’ brutality reminisces

      फुटनोट

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               -शिव मिश्रा 

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      भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...