बुधवार, 26 मई 2021

रजाकार कौन थे और निजाम के शासन में उनके क्या कार्यकलाप थे?

 रजाकार  निजाम  शासन में हिन्दुओं के नृशंस हत्यारे ! 

( रजाकार दस्ता )

रजाकार कट्टरपंथी मुस्लिमों का हथियारबंद संगठन था जो हैदराबाद में निजाम के शासन के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार करके उन्हें मुस्लिम बनने पर मजबूर करता था. यह नृशंस हत्यारों का समूह था जो निजाम के इशारे पर हैदराबाद में काफिरों के सफाये में संलग्न था. इसे उत्तर प्रदेश में जन्मे और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा पाए कासिम रिजवी ने बनाया था. इस संगठन ने हैदराबाद में लाखों हिंदुओं का कत्ल किया, जिसमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं.

यह हथियारबंद रजाकार संगठन हिंदू गांवों पर आक्रमण करता था, लूटपाट करता था, महिलाओं के साथ बलात्कार करता था. पुरुषों और बच्चों के मौत के घाट उतार देता था

यह बात उल्लेखनीय है कि असदुद्दीन ओवैसी इसी नृशंस रजाकारों के वंशज हैं.

निजाम को क्यों जरूरत पड़ी रजाकार संगठन की ?

निजाम को हिंदुओं के विरुद्ध बनाए गए कानूनों को सख्ती से लागू करने और न मानने वाले लोगों को मौके पर ही दंडित करने के लिए एक संगठन की जरूरत थी जिसके लिए रजाकार संगठन बनाया गया.

हिंदुओं के विरुद्ध निजाम के प्रतिबंध

  • निजाम सरकार के एक फरमान जिसे गस्ती निशान 53 यानी सरकारी आदेश संख्या 53 के द्वारा हिंदुओं को सार्वजनिक रूप से पूजा अर्चना करने की अनुमति नहीं थी.
  • हिंदू अपने देवी-देवताओं की शोभायात्रा निकालने की सोच भी नहीं सकते थे. मंदिरों पर पाबंदी थी. हिंदुओं की कोई भी धार्मिक सभा आयोजित नहीं की जा सकती थी. यहां तक कि हिंदू कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं कर सकते थे चाहे वह गैर धार्मिक ही क्यों न हो .
  • कभी कभी रात के अंधेरे में चार छह हिंदू लोग मिलकर अपने घरों में बहुत धीमे-धीमे स्वरों में पूजा कथा और भजन कीर्तन कर लेते थे. अगर इसकी भनक रजाकार संगठन को लग जाती थी तो उस पूरे मोहल्ले को सजा दी जाती थी, जिसमें मौके पर ही उनकी हत्या करना भी शामिल था.
  • हिंदुओं के किसी भी धार्मिक आयोजन जैसे रामलीला, यक्षगान, कथा भागवत आदि पर पूरी तरह से प्रतिबंध था.
  • अगर कोई हवन यज्ञ करता हुआ पाया जाता था तो उसे तुरंत मौत के घाट उतार दिया जाता था.
    • निजामाबाद के एक युवक राधा कृष्ण मोदानी ने यज्ञ और हवन पर निजाम के प्रतिबंध का विरोध करते हुए बाजार में सार्वजनिक रूप से यज्ञ का आयोजन किया. रजाकार संगठन ने यज्ञ करते हुए ही राधा-कृष्ण गोदानी का कत्ल कर दिया. निजामाबाद के इस मुख्य बाजार को हिंदुओं ने राधा-कृष्ण गंज का नाम दिया था जो आज भी प्रचलित है.
  • भैरनपल्ली नाम के गांव में रजाकारों द्वारा 200 हिंदुओं को शांति वार्ता के लिए बुलाया गया और वहीं पर उन सभी को कत्ल कर दिया गया.
    • इसी तरह चिंतडपल्ली में स्वाधीनता सेनानियों को वार्ता के लिए बुलाया गया और सभी को मौत के घाट उतार दिया गया.
    • इस तरह के अनेक गांव हैं, जहां रजाकारों ने जाकर पूरे के पूरे गांव को जमींदोज कर दिया, पुरुषों और बच्चों की हत्या कर दी महिलाओं के साथ बलात्कार किया और उन्हें अपने साथ ले गए.
  • राज्य में हिन्दी, तेलुगु और मराठी पर पूरी तरह प्रतिबंध था और कोई भी स्कूल हिंदी, तेलुगु या मराठी माध्यम से पढ़ाई नहीं कर सकते थे.
    • स्कूलों कॉलेजों में हिंदुओं को भारतीय परिधान पहनने की अनुमति नहीं थी उन्हें मुस्लिम रिवाज और शरीयत के अनुसार ही कपड़े पहनने पढ़ते थे.
  • निजाम के शासनकाल में एक स्लोगन चलता था “अनअल मालिक” यानी (I am the Ruler) मैं शासक हूं और हर मुस्लिम हिन्दुओं से यही कहता था और अपने आप को निजाम समझता था.
  • भारत का दुर्भाग्य देखिए कि जिन पी वी नरसिम्हा राव ने निजाम शासन के विरुद्ध हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी में धोती आंदोलन शुरू किया था, वह जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने आंध्र प्रदेश के आर्कियोलॉजिकल विभाग से हैदराबाद की इतिहास के चार वॉल्यूम प्रकाशित करवाएं जिसमें दो वॉल्यूम सिर्फ निजाम शासन से संबंधित हैं लेकिन 800 पेज के इन दोनों वॉल्यूम में रजाकार संगठन का कोई जिक्र नहीं है.
    • आसानी से समझा जा सकता है की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने वोटों की खातिर इतिहास को भी बदल डाला.
    • आज तेलंगाना, हैदराबाद और आंध्र प्रदेश के लोग अपना वास्तविक इतिहास खोज रहे हैं.
    • इंटरनेट मीडिया पर मजलिस और निजाम शासन के गुणगान करने वाला इतिहास मिलेंगे यहां तक कि तत्कालीन कांग्रेसी सरकारों की सहमति से कुछ लोगों ने रजाकार संगठन के कासिम रिजवी को स्वतंत्रता सेनानी भी घोषित कर दिया है और इससे सम्बंधित कई झूठी और फरेबी वीडियो यूट्यूब और गूगल सर्च में मिल जाएंगे.

( हैदराबाद से हिन्दुओ का पलायन )

हैदराबाद का ऑपरेशन पोलो :

  • निजाम ने हैदराबाद के भारत में विलय से आनाकानी की, और इसे या तो पाकिस्तान में मिलाने या स्वतंत्र मुस्लिम राष्ट्र बनाने की कोशिश की. इसके लिए उसने अपनी सेना और रजाकार संगठन को विरोध करने के लिए आगे कर दिया. इस विरोध को जिन्ना का भी समर्थन प्राप्त था जिन्होंने पाकिस्तान का बॉर्डर बंद कर दिया था और पाकिस्तान जाने की इच्छा रखने वाले वाले सभी मुसलमानों से कहा था कि वह हैदराबाद में जाकर आबाद हो.  
  • अपने इरादे से अटल सरदार पटेल को हैदराबाद के विलय के लिए ऑपरेशन पोलो चलाना पड़ा. बताया जाता है कि कुछ गांव ऐसे थे जो पूर्णरूपेण रजाकारों के ही गांव थे, जहां भारतीय सेना और पुलिस पर जबरदस्त आक्रमण किए गए लेकिन इसमें निजाम की सेना और रजाकार संगठन को भारी क्षति पहुंची.  
  • विडंबना देखिए जब रजाकार सेना हिंदुओं पर अत्याचार करती थी तो कहा जाता था कि यह चंद भटके हुए लोगों का संगठन है लेकिन ऑपरेशन पोलो में मारे गए यह भटके हुए रजाकार अचानक मुस्लिम हो गए, जिनकी की मौत पर नेहरू जी बहुत दुखी हुए और उन्होंने एक तीन सदस्य गुडविल मिशन हैदराबाद भेजा जिसकी अध्यक्षता पंडित सुंदरलाल कर रहे थे और इसके अन्य सदस्य थे काजी अब्दुल गफ्फार और मौलाना अब्दुल्लाह मिसरी.  
  • अफवाह उड़ाई गई कि ऑपरेशन पोलो में 50 हजार से 2 लाख के बीच मुस्लिमों की हत्या कर दी गई है ताकि सरदार पटेल को नीचा दिखाया जा सके और उनकी लोकप्रियता को कम किया जा सके. यद्यपि गुडविल मिशन न तो कोई आयोग था और ना ही कोई कमेटी इसलिए इसे रिपोर्ट करने की कोई आवश्यकता नहीं थी लेकिन सरदार पटेल को नीचा दिखाने के लिए नेहरू ने दबाव बनाकर इन सदस्यों से एक रिपोर्ट बनवाई ताकि तथाकथित मुस्लिम नरसंहार की कहानी सामने लाई जा सके. अन्य कांग्रेसी मंत्रियों के विरोध के कारण इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया जिसके कारण गलतफहमी और बढ़ती गई लेकिन यह रिपोर्ट आज भी इंटरनेट मीडिया पर धड़ल्ले से उपलब्ध है.  

      (The Nizam of Hyderabad receiving Sardar Patel after Operation Polo at Begum pet Airport

      कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अपने वोट बैंक को मजबूत करने के लिए हैदराबाद का इतिहास इस तरह बदल डाला कि हिंदुओं की नई पीढ़ी के लोगों को इन राजाकारों के बारे में सही जानकारी मिल सके. हैदराबाद के राका सुधाकर राव जैसे समाजसेवी इस दिशा में अथक प्रयास कर रहें हैं . [1]

      आज रजा कारों की उत्तराधिकारी ए आई एम आई एम (ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन), जिसके नेता असदुद्दीन ओवैसी हैं, से टीआरएस और कांग्रेस दोनों ही गठबंधन के लिए उतावले रहते हैं .

      शायद आज भी हिंदुओं के इस देश में, एक हजार साल की गुलामी के अत्याचारों को सहते हुए अपनी अस्मिता और धार्मिक रक्षा करके आज जो हिंदू शेष है, उनकी सुनने वाला कोई भी नहीं है.

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      References

      [1] Who were the Razakars and what were their activities under the Nizam's rule?

      [2] https://www.youtube.com/watch?v=7b3PUCmCSFs&t=1157s

      [3] https://indusscrolls.com/how-hyderabad-nizams-beastly-army-unleashed-a-reign-of-terror-on-hindus/

      [4] https://www.youtube.com/watch?v=ohqIiuLw8CI

      [5] Unaccounted reports of Hindu genocide under the Nizam of Hyderabad

      [6] https://www.youtube.com/watch?v=_1TSsytza-8

      [7] https://www.youtube.com/watch?v=ARe5cH_wc5s

      [8] Survivor of Razakars’ brutality reminisces

      फुटनोट

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               -शिव मिश्रा 

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      पी वी नरसिम्हाराव का धोती आन्दोलन

       


      पीवी नरसिम्हा राव का धोती आंदोलन क्या था और इसकी उन्हें क्या सजा मिली थी?

      हैदराबाद में निजाम के शासन काल में हिंदुओं पर तरह तरह की पाबंदियां लगाई गई थी. हिंदुओं की पूजा और मंदिरों पर प्रतिबंध था. सभी हिंदुओं को फर्शी सलाम करना पड़ता था ( झुक कर सलाम करना जिसमें हाथ जमीन से छूता रहें).[1]

      हिंदी मराठी और तेलुगू भाषाओं पर प्रतिबंध था किसी भी स्कूल कॉलेज में यह भाषाएं नहीं पढ़ाई जाती थी. तत्कालीन हैदराबाद रियासत में केवल निजाम कॉलेज और उस्मानिया यूनिवर्सिटी ही थे. जहाँ हिंदू छात्रों के साथ दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह व्यवहार किया जाता था. उनके लिए छात्रावास अलग थे और उन्हें विश्वविद्यालय या छात्रावास में कहीं पर भी भारतीय परिधान पहनने की छूट नहीं थी. उन्हें मुस्लिम पोशाक या शरीयत के अनुसार पोशाक पहननी पड़ती थी. छात्रावास के अंदर भी भारतीय धोती पहनने पर प्रतिबंध था.

      इसके विरोध में छात्रों ने उस्मानिया यूनिवर्सिटी में 15 दिन तक आंदोलन किया और इस आंदोलन का नेतृत्व किया पीवी नरसिम्हा राव ने, इस आंदोलन को धोती आंदोलन कहा जाता है.

      इस आंदोलन के कारण पीवी नरसिम्हाराव सहित लगभग 242 छात्रों को उस्मानिया से निष्कासित कर दिया गया. उस्मानिया यूनिवर्सिटी द्वारा देश के सभी विश्वविद्यालयों को पत्र भेजा गया कि इन छात्रों को प्रवेश न दिया जाए. किंतु महाराष्ट्र के नागपुर विश्वविद्यालय ने इन सभी 242 छात्रों को अपने यहां न केवल प्रवेश दिया बल्कि पढ़ाई की सारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जिसके कारण इन छात्रों की पढ़ाई पूरी कर सके.

      निजाम के शासनकाल में यह अपनी तरह का पहला आंदोलन था जिसने बाद में निजाम शासन के विरुद्ध आंदोलन करने का रास्ता खोल दिया. स्वतंत्रता के बाद जब निजाम ने भारत में विलय से आनाकानी की तो इस आंदोलन से प्रेरित बहुत से लोगों ने निजाम के विरुद्ध जनादेश बनाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की.

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      - शिव मिश्रा

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      मंगलवार, 25 मई 2021

      26 मई २०२१, को है सुपर मून और इसे कहा जा रहा है सुपर ब्लड मून

       

      क्या होता है सुपरमून ?

      पृथ्वी की चंद्रमा से दूरी 384400 किलोमीटर मानी जाती है तथा चन्द्रमा के पृथ्वी के चक्कर लगाने के कारण इसकी पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूर होने पर ये दूरी लगभग 405696 किलोमीटर मानी जाती है। इस स्थिति को अपोगी कहते हैं।

      इसके ठीक विपरीत चंद्रमा के पृथ्वी के सबसे ज्यादा करीब होने की स्थिति को पेरिगी कहते हैं जिसमें पृथ्वी और चंद्रमा की बीच की दूरी लगभग 357000 किलोमीटर रह जाती है। यदि चंद्रमा के पेरिगी की स्थिति में पूर्णिमा पड़ती है तो सुपरमून दिखाई देता है।यानी जब चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है तो उस समय पृथ्वी वासियों को इसका आकार बड़ा दिखाई पड़ता है और इसकी चमक भी अधिक दिखाई पड़ती है.

      26 मई २०२१ को चंद्रमा सामान्य दिनों के मुकाबले करीब 7 % अधिक बड़ा दिखाई देगा। आकार के अलावा इसकी चमक भी आम दिनों की तुलना में करीब 16 % अधिक होगी। इस दिन चंद्रमा धरती के सबसे करीब होगा। वर्ष में न्यूनतम 12 पूर्णिमा पड़ती हैं। कभी-कभी 13 पूर्णिमा भी होती हैं। मगर ऐसा कम ही होता है कि पेरीगी की स्थिति में पूर्णिमा भी पड़े। अतः यह एक खास घटना है। इस दिन सुपरमून का नजारा देखा जा सकता है।

      इस बार एक खास बात ये है कि लॉकडाउन के कारण मौसम साफ है और इस कारण यह ज्यादा साफ और अच्छा देखा जा सकेगा.

      26 मई २०२१ को दोपहर 01.53 पर चंद्रमा पृथ्वी के सबसे ज्यादा करीब होगा। इस समय चंद्रमा की पृथ्वी से दूरी मात्र 357309 किलोमीटर रह जाएगी। चंद्रमा की ये स्थिति पेरिगी की स्थिति कहलाती है और इस स्थिति से चन्द्रमा हमें काफी बड़ा दिखना शुरू हो जाएगा। मगर सुपर मून देखने के लिए हमें सूर्यास्त का इंतजार करना होगा क्योंकि पूर्णिमा की स्थिति 26 मई को ही दोपहर 4.44 पर हमें प्राप्त होगी जबकि चंद्रमा शाम लगभग 06.54 पर उदय होगा। ऐसे में सूर्यास्त के साथ ही हम सब इस सुपर मून के अद्भुद नजारे का पूरी रात अवलोकन कर सकेंगे।

      क्यों कहां जा रहा है इसे सुपर ब्लड मून ?

      चंद्र ग्रहण के दौरान चांद पृथ्वी की छाया में चला जाता है. इसी दौरान कई बार चांद पूरी तरह लाल भी दिखाई देगा. इसे ब्लड मून कहते हैं.

      नासा के मुताबिक सूरज की किरणें धरती के वातावरण में घुसने के बाद मुड़ती हैं और फैलती हैं. नीला या वायलेट रंग, लाल या नारंगी रंग के मुकाबले अधिक फैलता है. इसलिए आकाश का रंग नीला दिखता है. लाल रंग सीधी दिशा में आगे बढ़ता है, इसलिए वो हमें सूर्योदय और सूर्यास्त के वक्त ही दिखाई देता है. उस वक्त सूर्य की किरणें धरती के वातावरण की एक मोटी परत को पार कर हमारी आंखों तक पहुंच रही होतीं हैं.

      क्या भारत में दिखेगा ब्लड मून?

      नहीं, भारत के ज़्यादातर हिस्सों के लिए पूर्ण ग्रहण के दौरान चंद्रमा पूर्वी क्षितिज से नीचे होगा और इसलिए देश के लोग ब्लड मून नहीं देख पाएंगे. लेकिन कुछ हिस्सों में, ज्यादातर पूर्वी भारत के लोग केवल आंशिक चंद्र ग्रहण के अंतिम क्षणों के देख सकेंगे. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई समेत देश के ज़्यादातर हिस्सों में लोग ग्रहण नहीं देख पाएंगे



      बुधवार, 19 मई 2021

      हिन्दू गुलाम क्यों हुआ ?

       अब तक का महत्वपूर्ण परन्तु अनुत्तरित प्रश्न: हिंदू गुलाम क्यों हुआ?

      यह बहुत ही अच्छा प्रश्न है और इस तरह के प्रश्न प्राय: अनेक संगोष्ठियों में और अन्य अवसरों पर उठाया जाता है . अक्सर लोग लोक कथाओं और अन्य दृष्टांतों के माध्यम से दार्शनिक भाव में बताने की कोशिश करते हैं, जो उचित भी है किंतु उनमें कोई भी इस प्रश्न का सही और सटीक जवाब देकर मुझे संतुष्ट नहीं कर पाया. पहली बार जब मैंने स्वर्गीय राजीव भाई दीक्षित जी का एक भाषण सुना, जिसमें उन्होंने इस पहलू को काफी हद तक छुआ था और उसे मैं बहुत प्रभावित हुआ था.

      इस प्रश्न का उत्तर और उसके के पीछे छिपी उत्कंठा और कसमसाहट समझने के लिए हमें सनातन धर्म की मूल भावना को समझना होगा और भारतवर्ष की प्राचीन आध्यात्मिक और धार्मिक विकास यात्रा को भी ध्यान में रखना होगा.

      भारत विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता है और इसलिए सांस्कृतिक आध्यात्मिक और धार्मिक रूप से आज भी विश्व में सबसे समृद्ध है. सनातन धर्म में साधना / तपस्या सत्कर्म द्वारा मोक्ष प्राप्त करना जीवन का प्रमुख उद्देश्य माना जाता है. जिस संस्कृति में नदी, समुद्र, पहाड़, वृक्ष, गाय, सिंह, सांप आदि प्रकृति के सभी रूपों की पूजा की जाती हो, अहिंसा धर्म का अभिन्न हिस्सा हो, राह चलते चींटी भी धोखे से न कुचल जाए, इसका ध्यान रखा जाता हो, ऐसी संस्कृति और धर्म में सत्कर्म, शांति, सहिष्णुता और मानवीय मूल्यों का स्थान कितना ऊंचा होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है.

      लेकिन इसके बाद भी शासक और सम्राट “अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च” का पालन करते थे. इस श्लोक का भावार्थ है कि अहिंसा ही मनुष्य का परम धर्म हैं और जब जब धर्म पर आंच आये तो उस धर्म की रक्षा करने के लिए की गई हिंसा उससे भी बड़ा धर्म हैं।

      दुर्भाग्य से कालांतर में विभिन्न कारणों से हमें केवल “ अहिंसा परमो धर्म:” ही याद कराया गया और इस कारण राष्ट्र और धर्म की रक्षा करने के लिए भी हम अहिंसक नहीं हो सके. आधुनिक युग के बदलते परिवेश में ऐसा माना जाता है कि जो जितना बड़ा हिंसक होता है वह उतना ही शक्तिशाली माना जाता है. इसलिए अहिंसक तो कमजोर ही होगा और फिर गुलाम होना उसकी नियति बन जाएगी.

      आइए इसे विस्तार से समझते हैं .

      त्रेता में अयोध्या के राजा श्री राम का राजधर्म आज तक पूरे विश्व के लिए उदाहरण है, जिसे राम राज्य कहा जाता है और जिसमें उन्होंने अपने मर्यादा पुरुषोत्तम स्वरूप का उदाहरण मानव जाति के सम्मुख प्रस्तुत किया था . इतना सब करते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने राक्षसों का संहार किया और धर्म तथा राष्ट्र की संप्रभुता की रक्षा के लिए हिंसा करने से पीछे नहीं हटे.

      द्वापर में श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करने के लिए के लिए युद्ध को उचित भी ठहराया और बेहिचक स्वीकार भी किया. भर के लोगों के लिए यह बहुत बड़ा संदेश था लेकिन यहां के लोगों ने 5 हजार वर्ष बाद ही भूलना शुरु कर दिया.

      जैन धर्म और बौद्ध धर्म के उदय के बाद किसी भी तरह की हिंसा को अनुचित माना जाने लगा. लोगों को सांसारिक सुखों से विरत होकर त्याग और सादगी अपनाने पर जोर दिया गया . इसका व्यापक प्रभाव जनमानस पर हुआ उन्हें शांति और सद्भावना पूर्ण जीवन मिला और लोग अहिंसक होते चले गए.

      जैन और बौद्ध धर्म के प्रभाव में आकर कई राजाओं ने भी इसे अपना लिया और और वे युद्ध से विरत रहने लगे. इसका परिणाम यह हुआ, कि सैन्य बल भी कमजोर हुआ और रक्षा क्षेत्र में नए हथियारों और उपकरणों का विकास लगभग पूरी तरह से बंद हो गया.

      प्राचीन काल में भारत का साम्राज्य पूरे जंबूद्वीप में था, चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में चाणक्य की राष्ट्रनीति के कारण अफगानिस्तान, ईरान और अरब उसके साम्राज्य का हिस्सा था, जो सम्राट अशोक के शासनकाल तक ज्यों का त्यों रहा.

      महाराजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का वर्णन भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। भारत के वामपंथी और इस्लामिक इतिहासकारों ने तो भारत के इतिहास को पूरी तरह से विकृत कर दिया है. इससे अच्छा और विश्वसनीय वर्णन तो विदेशी इतिहासकारों ने किया है. विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य में वर्णन मिलता है कि उस समय उनका शासन अरब और मिश्र तक तक फैला था। संपूर्ण धरती के लोग उनके नाम से परिचित थे। विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम किनतोई ने अपनी पुस्तक ‘सायर-उल-ओकुल’ में किया है

      मगध के प्रतापी सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य अपने अंतिम दिनों में जैन हो गए थे और उन्होंने पूरी तरह से हिंसा का परित्याग कर दिया था. उनके पौत्र अशोक महान भारतीय इतिहास का एकमात्र ऐसा सम्राट था जिस के शासनकाल में किसी भी विदेशी आक्रांता ने भारत की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं की थी, लेकिन वह कलिंग युद्ध की भीषण मारकाट और नरसंहार से इतना दुखी हुए कि उन्होंने भी बौद्ध धर्म अपना लिया और राज्य के सैन्य बल और सीमाओं के रक्षण पर ध्यान दिया जाना लगभग बंद हो गया . उनका पूरा ध्यान बौद्ध धर्म के प्रचार और प्रसार पर था उन्होंने अपने बेटे और बेटी को भी इसी काम पर लगा दिया और बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करने के लिए बौद्ध भिक्षु के रूप में उन्हें अनेक देशों में भेजा गया.

      कहते हैं कि “यथा राजा तथा प्रजा” . प्रजा भी अपना पौरुष भूलती जा रही थी, सेना में भर्ती न होने के कारण नव युवकों में देशभक्ति की भावना भी कम हो रही थी और शारीरिक सौष्ठव प्राथमिकता में नहीं था. भारत की अहिंसक प्रवृत्ति और कमजोर रक्षा तंत्र पर विदेशियों की नजर थी और इसका फायदा उठाते हुए मोहम्मद बिन कासिम ने भारत पर पहला आक्रमण किया यद्यपि उसका इरादा सिर्फ लूटपाट करना था, सत्ता स्थापित करना नहीं .

      अफगानिस्तान सभी लोग बौद्ध धर्मावलंबी थे, उन्हें पराजित करने और लूटने में इन विदेशी आक्रांताओं को कोई मेहनत नहीं करनी पड़ी. इसके बाद विदेशी लुटेरों का अनवरत क्रम शुरू हो गया. महमूद गजनवी ने 17 बार सोमनाथ मंदिर को लूटा और यहां के अनेक मंदिरों को तोड़ा संपत्तियां लूटी, भारत के राजघरानों में जमा अकूत धन-दौलत लूटी और वापस चला गया. वह इतनी बार भारत में लूटने के इरादे से आया लेकिन एक बार भी भारतीय राजाओं ने एक होकर उसे मुंह तोड़ जवाब नहीं दिया .

      इससे भारत की कमजोरी बुरी तरह से उजागर हो गई थी और इसके बाद तो जैसे विदेशी आक्रमणों का न खत्म होने वाला सिलसिला शुरू हो गया .

      मोहम्मद गोरी ने भी वही किया. पृथ्वीराज चौहान ने उसे कई बार हराया और वह हार कर वापस चला जाता रहा लेकिन पृथ्वीराज चौहान सहित भारत के किसी भी राजा ने उसका पीछा करके उसे सदा सर्वदा के लिए समाप्त करने की कोशिश नहीं की. इसका परिणाम यह हुआ कि तराइन के युद्ध में उसने पृथ्वीराज चौहान को उसके एक रिश्तेदार और कन्नौज के राजा जयचंद की सहायता से पराजित कर दिया.

      पृथ्वीराज चौहान की आंखें फोड़ दी गई और उसे बंदी बनाकर घसीटते हुए ले गया. यहां तक कि अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, जिस की दरगाह पर हजारों हिंदू प्रतिवर्ष चादर चढ़ाने जाते हैं, के आदेश के अनुसार उसकी पत्नी संयोगिता को नग्न करके मोहम्मद गौरी के बहसी सैनिकों को दुष्कर्म के लिए सौंप दिया गया. किसी भी भारतीय राजा ने प्रतिरोध नहीं किया यहां तक कि कन्नौज के राजा जयचंद ने भी नहीं जबकि पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता उसकी बेटी थी. गोरी ने बाद में जयचंद को भी हराया और उसके पुत्र  की भी बहुत निर्मलता से हत्या कर दी थी.

      भारतीय राजा आपस में एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सदैव तत्पर रहते थे और इसके लिए उन्हें अगर शत्रु की सहायता भी करनी पड़ जाए तो करते थे.

      भारतीय समाज भी वर्ण और जातियों में बुरी तरह विभाजित था. देश की रक्षा करने का दायित्व केवल क्षत्रिय समुदाय पर था जिसकी जनसंख्या बहुत कम थी . धीरे-धीरे समस्त उत्तर भारत पर आक्रांताओं ने कब्जा किया और यहां पर सत्ता स्थापित कर ली.

      बंगाल राज्य के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और बहुत थोड़े से सैनिकों की मदद से बिना किसी प्रतिरोध के मुस्लिम आक्रमणकारियों ने अपना शासन स्थापित कर लिया था . 1757 में इतिहास ने फिर एक बार अपने आप को दोहराया और ईस्ट इंडिया कंपनी के मात्र 300 सैनिकों ने प्लासी की लड़ाई में सिराजुद्दौला की अट्ठारह हजार सैनिकों की विशाल सेना को मीर जाफर की सहायता से हरा दिया. अंग्रेजों के इन 300 सैनिकों ने 18000 हजार भारतीय सैनिकों को बंदी बना लिया और सड़क के रास्ते से बंगाल की राजधानी मुर्शिदाबाद ले गए. रास्ते के दोनों ओर भारी भीड़ तमाशा देखने के लिए उमड़ पड़ी, किसी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया .

      क्लाइव लायड ने अपने संस्मरण में लिखा है कि उस समय वहां उपस्थित जनसमूह ने अगर एक छोटा कंकण भी फेंक दिया होता तो अंग्रेजों का भारत से अस्तित्व ही खत्म हो गया होता. इसी कायरता, बुजदिली, समझौता वादी स्वभाव और आपसी मतभेदों के कारण भारत में पहले मुस्लिम आक्रांताओं और लुटेरों ने सत्ता स्थापित की और बाद में भारत पर अंग्रेजों का शासन स्थापित हो गया .

      थोड़े से अंग्रेजों ने भारतीय मूल के सैनिकों और भारतीय मूल के सरकारी कर्मचारियों की मदद से 200 वर्ष तक भारत पर शासन किया. भारतीयों ने ही भारतीयों पर अत्याचार किए. विश्व इतिहास में ऐसा कहीं भी देखने में नहीं आता कि उस देश की बहुसंख्यक जनता ने कभी प्रतिरोध न किया हो.

      हांगकांग जैसे छोटे से देश के लोग आज भी भारतीयों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखते क्योंकि कुछ हजार अंग्रेजों ने करोड़ों भारतीयों पर शासन किया और भारतीयों ने ही भारतीयों पर अत्याचार किए, यातनाएं दी. भारत के विपरीत हांगकांग के मूल निवासियों ने अंग्रेजों की सेना में भर्ती होने से साफ इंकार कर दिया था वहां के मूल निवासी न तो कभी सेना या पुलिस में शामिल हुए और न ही कभी सरकारी कर्मचारी बने क्योंकि वह अपनों पर अत्याचार नहीं कर सकते थे.

      अंग्रेजों ने साम दाम दंड भेद की नीति अपनाई और भारतीयों द्वारा किसी भी संभावित प्रतिरोध से बचने के लिए स्वयं ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना करवाई जिसका प्रचारित उद्देश्य भारत की जनता को आजादी दिलाना था लेकिन असली उद्देश्य भारत में अगले 100 साल तक और शासन करना था . अपने मिशन की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अंग्रेजों ने गांधी जी को भी दक्षिण अफ्रीका, से हिंदुस्तान बुला लिया क्योंकि अंग्रेज दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी द्वारा अंग्रेजी सत्ता की सहायता करने से अत्यंत प्रभावित थे.

      गांधीजी के आने के बाद भारत में भी अहिंसा का दक्षिण अफ्रीकी प्रयोग शुरू हो गया जिसकी अंग्रेजों को अत्यंत आवश्यकता थी.

      1885 में कांग्रेस की स्थापना के 61 वर्ष बाद 1947 में भारत को आजादी नसीब हो सकी, इसलिए नहीं कि कांग्रेस ने बहुत जोरदार आंदोलन चलाएं बल्कि इसलिए कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था बहुत खराब हो गई थी, और कई अन्य अंतरराष्ट्रीय कारणों से वह भारत में शासन जारी रखने की स्थिति में नहीं थे. अगर द्वितीय विश्व युद्ध नहीं हुआ होता तो अंग्रेज कांग्रेस और गांधीजी की सहायता से शायद आज भी शासन कर रहे होते.

      निष्कर्ष :

      • हिंदू ही क्यों ? भारत राष्ट्र क्यों गुलाम हुआ ? क्या अब भी यह समझना बहुत मुश्किल है?
      • सनातन धर्म की अति शन्तिप्रियता, नैतिकता, सदाचार, जैन और बौद्ध धर्म की अहिंसा और त्याग की भावना ने हिंदुओं के साहस और वीरता को इतना गहरा आघात पहुंचाया जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती. आज भी किसी हिंदू के घर में सब्जी काटने वाले चाकू के अलावा शायद ही कोई हथियार मिले.
      • वर्णों और जातियों में विभाजित हिंदू समाज कभी एकजुट होकर आक्रांताओं का मुकाबला नहीं कर सका और आपस की इस फूट ने आक्रांताओं का काम आसान कर दिया.
      • हमने इतिहास से भी कुछ नहीं सीखा. सीखना क्या हमने तो सही इतिहास लिखना भी नहीं सीखा. राष्ट्र विरोधी इतिहासकार रोमिला थापर और इरफ़ान हबीब के अनुसार भारत केवल अंग्रेजों का गुलाम हुआ था जैसे मुस्लिम आक्रान्ताओं को भारत ने स्वयं आप्मंत्रित करके सत्ता सौपी थी.

      • हिंदू समाज में आज भी वही सब कारक पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति में विद्यमान हैं, हमने समाज के रूप में कुछ भी नहीं सीखा है. हम आज भी मानसिक रूप से गुलाम ही हैं और शायद यह गुलामी हमारे खून में आ गयी है. अगर हमने इस बीमारी का उपचार अब भी नहीं किया तो अब हमें गुलामी नहीं मर मिटने के लिए तैयार रहना होगा.

      • शिव मिश्रा

      शनिवार, 15 मई 2021

       क्या अखिलेश यादव दुबारा मुख्यमंत्री बन सकते हैं ?

      जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है, इसलिए बहुत खराब बातें भी ज्यादा दिन याद नहीं रहती. भारत में इसके अनगिनत उदाहरण है.

      1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल और उसमें हुई भयंकर ज्यादतियों के प्रतिकार स्वरूप जनता ने 1977 के चुनाव में कांग्रेस सरकार को उखाड़ फेंका और स्वयं इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गई लेकिन इसके ढाई साल बाद 1980 में हुए मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आ गई. जनता सरकार के भ्रष्टाचार रहित कार्यकाल और तमाम अच्छे कार्यों के बावजूद पार्टी की आंतरिक कलह और उठापटक के कारण जनता ने पुनः इंदिरा गांधी की सरकार बना दी.

      इसलिए उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी ? सटीक तो नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात अवश्य है कि प्रदेश के लोग इस बात को खुले आम स्वीकारते हैं कि योगी सरकार का अब तक का कार्यकाल पिछले 15- 20 साल में रहे मुख्यमंत्रियों राजनाथ सिंह, मायावती, मुलायम सिंह और अखिलेश यादव से काफी बेहतर है. ये भ्रष्टाचार रहित और अपराध मुक्त रहा है. कानून व्यवस्था की इतनी अच्छी स्थिति पिछले 20 साल में प्रदेश में कभी नहीं रही.

      उत्तर प्रदेश की जनसंख्या मिश्रित है और यह की राजनीति अगड़ों, पिछड़ों, दलित और अल्पसंख्यक में बुरी तरह विभाजित है. 2017 के विधानसभा चुनाव में अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला हिट रहा और भाजपा को अभूतपूर्व सफलता मिली. 2022 की जीत भी काफी हद तक इसी सोशल इंजीनियरिंग और योगी सरकार के कामकाज पर निर्भर करेगी.

      इस बीच कोरोना महामारी के परिणाम स्वरूप स्वास्थ्य ढांचा चरमरा जाने के कारण सरकार के प्रति लोगों में तात्कालिक आक्रोश है क्योंकि कोरोना की दूसरी लहर में ग्रामीण अंचल की बहुत बुरी तरह प्रभावित हैं, जहां पर स्वास्थ्य सुविधाएं नाममात्र को है, यद्यपि इसका दोष केवल योगी सरकार का नहीं है लेकिन जनता का आक्रोश तो वर्तमान सरकार के प्रति ही होता है और जब कोई अपनों को इस तरह खोता है तब वह राजनीति का राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व भूल जाता है.

      चुनाव में अभी समय है, जनता के आक्रोश की भरपाई की जा सकती है और निश्चित रूप से भाजपा और योगी सरकार इसमें कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेगी क्योंकि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश होकर जाता है.

      अब बात करते हैं अखिलेश यादव के २०२२ में मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं पर .

      इसके लिए उनके पिछले कार्यकाल की उपलब्धियों और मुख्य विपक्षी पार्टी के रूप में उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनके योगदान की चर्चा करनी पड़ेगी.

      पिछले चुनाव में अखिलेश यादव के विरुद्ध एक नारा भाजपा ने उछाला था “ जो अपने बाप का नहीं हुआ वह आपका क्या होगा” इसका जनता पर व्यापक असर हुआ था और यह नारा उत्तर प्रदेश में आज भी जीवित है. इसकी संक्षिप्त कहानी यह है कि अखिलेश यादव ने अपने पिता मुलायम सिंह यादव की जीवन भर की कमाई के रूप में बनाई समाजवादी पार्टी पर बलात कब्जा कर लिया था और उन्हें पार्टी के सभी पदों से हटाकर स्वयं पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए . चाचा शिवपाल सिंह को भी बेइज्जत करके निकाल दिया . यह षड्यंत्र इतने अच्छे और गुपचुप ढंग से किया गया कि पार्टी के ज्यादातर विधायक और सांसद अखिलेश के साथ लामबंद हो गए. मुलायम सिंह यादव को उम्र के इस पड़ाव पर उनकी बेटे ने दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया. इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा अपमान और इतनी बड़ी पीड़ा उनके अपने जिगर के टुकड़े ने दी जिसे उन्होंने स्वयं मुख्यमंत्री बनाया था. उन्होंने अखिलेश का नाम प्यार से टीपू (सुल्तान) रखा था, जिसने पूरे मुगलिया अंदाज में अपने पिता को पदच्युत कर दिया. महीनों मुलायम सिंह इस सदमे से उबर नहीं सके थे. इसके बाद अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के सर्वे सर्वा बन गए .

      समाजवादी पार्टी का ताना-बाना भी समझ लेना बहुत आवश्यक है.

      मुलायम सिंह यादव ने बहुत मेहनत और तिकड़म से पार्टी बनाई थी. उन्होंने यह अच्छी तरह समझ लिया था कि गुंडे, अपराधी और माफिया लोगों के बिना राजनीति पर मजबूत पकड़ बनाना मुश्किल है इसलिए उन्होंने पार्टी में प्रदेश स्तर से लेकर बूथ स्तर तक गुंडे और माफियाओं को भी शामिल किया जो लोगों को डराने धमकाने से लेकर फर्जी वोटिंग और बूथ कैप्चरिंग तक का काम करते थे. बदले में इन अपराधियों को वसूली करने की पूरी छूट मिलती थी. इसलिए बीहड़ों के कई नामी-गिरामी डाकू और पूर्व डाकू भी समाजवादी पार्टी का समर्थन करते थे. दस्यु सुंदरी फूलन देवी तो समाजवादी पार्टी के टिकट पर सांसद चुनी गई थी. उत्तर प्रदेश के जितने भी बाहुबली और माफिया डॉन के नाम आपने सुने होंगे वह सब सपा के साथ कभी न कभी जरूर जुड़े रहे होंगे.

      तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह कार्यकाल में तो अपहरण उद्योग बन गया था, हत्या सामान्य बात थी और बलात्कार लड़कों से हुई छोटी मोटी गलती हुआ करती थी. उनके कार्यकाल में मुख्तार अंसारी सरीखे बड़े बड़े माफिया जेल में बंद रहते हुए फाइव स्टार होटल की सुविधाएं प्राप्त करते थे और उनके साथ बैडमिंटन खेलने के लिए जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक पहुंचते थे.

      पूर्वांचल के उनके एक विधायक के घर में बने एक तालाब में मगरमच्छ पाले जाते थे. लोग बताते हैं कि विधायक या सपा विरोधी लोगों को इस तालाब में फेंक कर मगरमच्छों के हवाले कर दिया जाता था.

      कुख्यात गेस्ट हाउस काण्ड जिसमें मायावती को इज्जत बेइज्जत एवं शर्मसार करने तथा उन्हें जान से मारने का षड्यंत्र किया गया था, मायावती चाहे भले ही भूल जाय, जनता नहीं भूल सकती.

      2007 से 2012 तक मुख्यमंत्री रही मायावती के मूर्ति प्रेम, मुस्लिम तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार से परेशान होकर जनता ने समाजवादी पार्टी को सत्ता सौंप दी . पार्टी को पहली बार अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिला था. मुलायम सिंह के अंदर प्रधानमंत्री बनने का सपना हिलोरे ले रहा था इसलिए उन्होंने अपने भाई शिवपाल सिंह को दरकिनार करते हुए अपने बेटे अखिलेश यादव उर्फ़ टीपू को तश्तरी में सजा कर मुख्यमंत्री का पद भेंट कर दिया.

      लोगों का कहना है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव में बहुत समानता है. अंतर सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी हैं और अखिलेश यादव राज्य स्तर के खिलाड़ी हैं.

      अखिलेश यादव ने अपनी पारी की शुरुआत जीत के जश्न के साथ शुरू की

      जिसे उन्होंने अपने गांव सैफई में फिल्मी कलाकारों के नाच गाने से किया था. राज्य सरकार के सैकड़ों करोड़ रुपए खर्च करके इस आयोजन में फिल्मी कलाकारों को लखनऊ हवाई अड्डे से उनके गांव सैफई तक मुख्यमंत्री के हेलीकॉप्टर को टैक्सी की तरह इस्तेमाल करके लाया ले जाया गया.

      साढ़े चार मुख्यमंत्री :

      अखिलेश यादव के कार्यकाल में एक कहावत प्रचलित थी कि प्रदेश में साढ़े चार मुख्यमंत्री हैं, मुलायम सिंह, आजम खान, शिवपाल सिंह, राम गोपाल सिंह और आधे वह स्वयं. समाजवादी पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि अखिलेश यादव अनुभवहीन होने के कारण स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पा रहे थे इसलिए मुलायम के एक बेहद करीबी राजेंद्र चौधरी को उनके पीछे लगा दिया गया था जो हमेशा साये की तरह उनके साथ देखे जाते थे. अखिलेश यादव मुख्यमंत्री के कार्यालय में कम ही आते थे और उनके आने जाने का कोई समय निर्धारित नहीं था. सरकारी कर्मचारियों की तरह जल्दी कार्यालय से निकल जाते थे और मुख्यमंत्री आवास में अपने बच्चों और उनके दोस्तों के साथ क्रिकेट आदि खेला करते थे. आप समझ सकते हैं कि प्रदेश में क्या-क्या नहीं हुआ होगा.

      अखिलेश यादव का कार्यकाल दंगों के लिए हमेशा याद रखा जाएगा .

      अखिलेश के कार्यकाल में कितने दंगे हुए उसका ठीक-ठीक आकलन करना बहुत मुश्किल है. लगभग 2500 से अधिक छोटे-बड़े दंगे हुए जिसका औसत 500 दंगे प्रतिवर्ष से भी अधिक है. कार्यकाल के अंतिम समय तक वोट बैंक के तुष्टिकरण के कारण अखिलेश यादव दंगों पर कोई नियंत्रण नहीं कर सके. आजम खान जैसे कई मंत्री तो लगता था कि जैसे सिर्फ दंगे करवाने के लिए ही मंत्री बनाए गए थे .

      अखिलेश के कार्यकाल में पूरा प्रदेश भयानक सांप्रदायिकता की चपेट में रहा. पुलिस और पीएसी की इतनी छीछालेदर आजादी के बाद कभी नहीं हुई. सपा समर्थित अपराधियों द्वारा कितने पुलिस वालों को इज्जत - बेइज्जत किया जाता था, सरेआम पीटा जाता था और कितनों को मौत के घाट उतार दिया गया इसके आंकड़े शर्मसार करने वाले हैं.

      संपत्तियों की लूट और मथुरा कांड

      हर शहर और कस्बे में सपाइयों द्वारा संपत्तियों की लूट चल रही थी. बंद मकान का ताला तोड़कर कब्जा कर लेना बहुत सामान्य घटना थी. कितनो ने ऋण लेकर मकान बनवाए थे जिन पर सपाइयों का कब्जा था, क़िस्त वह अदा करते थे रहते सपाई थे.

      कानपुर में स्टेट बैंक के अधिकारियों के 250से अधिक भूखण्डों पर सपा के एक स्थानीय नेता का आज भी कब्ज़ा है .

      मथुरा के 280 एकड़ के जवाहर पार्क पर सपा के करीबी रामवृक्ष यादव ने कब्जा कर लिया और एक छोटा-मोटा शहर बसा लिया. सुर्खियां बनने पर जब पुलिस ने खाली कराने की कोशिश की तो गोलीबारी में 24 पुलिस के जवान शहीद हो गए जिसमें पुलिस अधीक्षक और उपाधीक्षक स्तर के अधिकारी भी शामिल थे.

      इन मृत पुलिस अधिकारियों को आर्थिक सहायता देने में भी हिंदू और मुसलमान का भेदभाव किया गया. मथुरा में मारे गए पुलिस अधिकारी हिंदू थे तो उन्हें ₹20 लाख की आर्थिक सहायता दी गई लेकिन कुंडा में जिया उल हक नाम के एक पुलिस उपाधीक्षक की मौत पर ₹50 लाख का मुआवजा दिया गया था और उसकी पत्नी को सीधे पुलिस उपाधीक्षक नियुक्त किया गया था जो उत्तर प्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ था.

      कुख्यात दादरी हत्याकांड

      जिसमें अखलाक की हत्या कर दी गई थी, जिसे जानबूझकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में ला दिया गया. अपनी नाकामी छुपाने के लिए सपा सरकार ने इस हत्याकांड को मोदी सरकार की असहिष्णुता बता कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया और इसके लिए नरेंद्र मोदी कटघरे में खड़ा किया गया .

      अखिलेश यादव का कार्यकाल प्रदेश में महिलाओं के लिए नर्क से भी बदतर रहा

      बदायूं में दो नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद मौत के घाट उतार दिया गया और उनकी लाश को गांव के बाहर पेड़ से लटका दिया गया. बदायूं और बुलंदशहर बलात्कार कांड सीधे सपा नेताओं से जुड़े थे और जिस पर लड़कों की छोटी गलती बता कर पल्ला झाड़ लिया जाता था .

      शाहजहांपुर के एक पत्रकार जोगिंद्र सिंह को जिंदा जला दिया गया

      क्योंकि उन्होंने समाजवादी पार्टी के एक नेता के बलात्कार की कहानी सुर्खियों में ला दी थी. अपने मृत्यु पूर्व बयान में पत्रकार ने अखिलेश के एक मंत्री का नाम लिया लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में अखिलेश यादव उसको बचाने में लगे रहे .

      उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर परिवार

      के करीबी अनिल यादव को बैठा दिया गया जिसकी योग्यता लोक सेवा आयोग में क्लर्क बनने के लायक भी नहीं थी . आगरा निवासी अनिल यादव के विरुद्ध अनेक मुकदमे दर्ज है. उन्होंने भ्रष्टाचार के नए आयाम बनाए और चयन सूची में एक जाति विशेष और एक धर्म विशेष के लोग होते थे और मेधावी युवा हाथ मलते रह जाते थे.

      इनके विरुद्ध छात्रों ने जबरदस्त आंदोलन छेड़ा तब जाकर कहीं 2011 की सिविल सेवा परीक्षा उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद रद्द की गई.

      उच्च न्यायालय ने यादव को इस पद के लिए अयोग्य ठहराया और बर्खास्त कर दिया था. अखिलेश यादव के कार्यकाल में कई प्रतिष्ठित संस्थानों और चयन आयोगों के अध्यक्ष पदों पर ऐसे अयोग्य, जातिवादी , भ्रष्ट और बेईमान लोगों को बिठाया गया जिसकी सड़ांध के बहुत दूरगामी परिणाम होंगे. ऐसे चार अध्यक्षों को उच्च न्यायालय ने स्वयं बर्खास्त कर दिया.

      यादव सिंह या मनी मिन्टिंग मशीन,

      सपा के एक करीबी यादव सिंह नोएडा के चीफ इंजीनियर बनाए गए जो जूनियर इंजीनियर से प्रोन्नति पाते हुए तमाम वरिष्ठ इंजीनियरों को लांघते हुए इस पद पर पहुंच गए और हजारों करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार का अंबार लगा दिया . उत्तर प्रदेश के इतिहास में शायद यह पहला मौका था जब कोई जूनियर इंजीनियर इतने कम समय में नोएडा जैसे जगह चीफ इंजीनियर बना दिया गया हो .

      गायत्री प्रजापति ने भ्रष्टाचार का नया कीर्तिमान बनाया

      मुलायम सिंह के बेहद करीबी गायत्री प्रजापति को खनन राज्य मंत्री बनाया गया. जैसे-जैसे उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते गए वैसे वैसे उनका प्रमोशन होता गया. गायत्री प्रजापति ने सपा के लिए धन इकट्ठा करने में सारी मर्यादा तोड़ दी, उन पर बलात्कार और हत्या के आरोप भी हैं . आजकल वह जेल में है.

      लखनऊ के तत्कालीन आईजी पुलिस अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर एक सामाजिक कार्यकर्ता है उन्होंने गायत्री प्रजापति के खिलाफ कई शिकायत की थी जिसके कारण मुलायम सिंह यादव ने स्वयं आईजी अमिताभ ठाकुर को फोन करके धमकाया जिसका ऑडियो टेप वायरल हो गया और शायद इसी कारण आईजी को निलंबित कर दिया गया था .

      माइनिंग माफिया का एक और कारनामा अखिलेश यादव के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गया

      जब उन्होंने गौतम बुद्ध नगर जिले की जिला अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल को खनन माफिया के विरुद्ध कार्रवाई करने के कारण निलंबित कर दिया. इससे सभी अधिकारियों को संदेश दे दिया गया था कि जो हो रहा है उसे होने दिया जाए.

      लोकायुक्त नियुक्त करने में षड्यंत्र

      सपा के बेहद करीबी जस्टिस वीरेंद्र सिंह को प्रयागराज उच्च न्यायालय में 2009 में न्यायाधीश नियुक्त किया गया था, लेकिन प्रदेश में लोकायुक्त की जगह खाली होने पर उन्हें इस्तीफा दिला कर सेवानिवृत्त न्यायाधीश बना लिया गया ताकि वह लोकायुक्त बनने के लिए पात्र हो सके. लोकायुक्त के पैनल में उनका नाम शामिल किया गया जिस पर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा नेता विपक्ष ने आपत्ति की थी. वीरेंद्र सिंह पर सरकारी भूमि पर पर कब्जा करने जैसे कई गंभीर आरोप भी थे. सपा द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर गुमराह किया गया जिसके कारण सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें लोकायुक्त बनाने का निर्देश दिया. बाद में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने के बाद उनका शपथ ग्रहण रोक दिया गया और उनकी नियुक्ति निरस्त की गई.

      भ्रष्टाचार के मामले में अखिलेश सरकार ने मायावती और मुलायम सिंह की सरकारों को मीलों पीछे छोड़ दिया.

      सी ए जी की रिपोर्ट में खुलासा किया गया है की बेरोजगारी भत्ते के नाम पर अखिलेश सरकार ने खुली लूट की. ऑडिट में सामने आया कि 1. 25 लाख युवाओं में ₹20 करोड़ का बेरोजगारी भत्ता बांटने के लिए हुई मीटिंग में ₹15 करोड़ केवल चाय नाश्ते के मद में खर्च दिखाकर हड़प लिए गए. अखिलेश ने जो चेक समारोह आयोजित कर बेरोजगार युवाओं में बांटे भी उन्हें भी बेहद धांधली की गई “अंधा बांटे रेवड़ी आपन आपन देय” .

      लखनऊ की रिवर फ्रंट योजना

      लखनऊ में गोमती नदी के दोनों किनारों को सुंदर बनाने के लिए गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट तैयार किया गया जिसके लिए 550 करोड रुपए का प्रावधान बजट में किया गया लेकिन इसके विरुद्ध इस पर बिना किसी स्वीकृत के 1500 करोड़ से अधिक खर्च किए गए जिसके लिए फर्जी बिलों का सहारा लिया गया. मामले की जांच चल रही है और कई इंजीनियर और अधिकारी जेल में है और कुछ जांच के दायरे में है.

      लखनऊ आगरा एक्सप्रेस वे

      इसको अखिलेश यादव अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि बताते हैं लेकिन इसे बनाने में जितना रुपया खर्च किया गया उससे इस तरह के कम से कम ४ एक्सप्रेस वे बनाए जा सकते थे. इस परियोजना को स्वीकृत करने के पहले ही सपा परिवार के नजदीकियों ने एक्सप्रेस वे में आने वाले खेत खरीद लिए और बाद में सरकारी अधिग्रहण में कई गुना पैसा मुआवजा के तौर पर सरकार से लिया और एक्सप्रेस वे के किनारे की जमीन में भी अच्छा खासा पैसा कमाया. अन्य परियोजनाओं की तरह अखिलेश इस परियोजना को भी अपने कार्यकाल में पूरा नहीं कर सके केवल तीन चार किलोमीटर के टुकड़े पर सेना के लड़ाकू विमान को उतार कर वाहवाही लूटने का कार्य किया गया. परियोजना योगी सरकार आने के 2 साल बाद पूरी हो सकी.

      लखनऊ मेट्रो परियोजना भी अधर में छोड़ी

      केंद्र सरकार द्वारा 550 करोड़ रुपए की केंद्रीय सहायता और 3500 करोड़ों रुपए का ऋण उपलब्ध कराने के बाद भी लखनऊ मेट्रो का प्रथम चरण भी पूरा नहीं कर सके और केवल 9 किलोमीटर का एक ट्रैक बनाकर परियोजना का उद्घाटन कर दिया . इस परियोजना का बचा हुआ कार्य योगी सरकार में पूरा किया गया.

      अखिलेश यादव किसी भी बड़ी परियोजना को अपने कार्यकाल में पूरा नहीं कर सके और इस कारण अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम, जयप्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय केंद्र, जनेश्वर मिश्रा पार्क, डायल 100, और यहां तक कि अपने लिए मुख्यमंत्री का हाईटेक कार्यालय भी 5 साल में पूरा नहीं कर सके . बताया जाता है कि अपने बंगले में उन्होंने अनेक कार्य कराए थे लेकिन मुख्यमंत्री का बंगला खाली करने के बाद उनके बाथरूम की टोटियां गायब मिली, स्विमिंग पूल सहित इटालियन टाइल्स के फ्लोर टूटे मिले.

      2017 में सपा और कांग्रेस ने गठबंधन करके चुनाव लड़ा और “यूपी के लड़के” की थीम पर प्रशांत किशोर ने काफी जोर आजमाइश की लेकिन चुनाव में पराजय का सामना करना पड़ा. पलायनवादी प्रवृत्ति और योगी के प्रति उनकी एलर्जी के कारण वह राज्य में विपक्षी नेता के रूप में अपने आप को सहज नहीं कर सके और 2019 के चुनाव में लोकसभा पहुंच गए.

      योगी सरकार आने के बाद और कोरोना महामारी में भी वह अपने आप को संयत नहीं कर सके. हमेशा ट्विटर पर नकारात्मक वक्तव्य देना उनकी आदत में शामिल है. अखिलेश के ट्वीट और वक्तव्य राहुल गांधी से काफी मेल खाते हैं . उत्तर प्रदेश में प्रियंका के उदय के बाद लोगों की कांग्रेस के प्रति गंभीरता लगभग खत्म हो गई है और अखिलेश यादव को भी अब लोग बहुत गंभीरता से नहीं लेते .

      प्रदेश के लोग अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री के रूप में देख चुके हैं और वोट करते समय निश्चित रूप से योगी और अखिलेश की तुलना करेंगे और इस तुलना में अखिलेश कहीं नहीं ठहरते.

      कोरोना महामारी के समय मायावती की बहुत ही जिम्मेदार और संयत भूमिका देखने को मिली और इस हिसाब से अखिलेश यादव की तुलना में मायावती का पलड़ा भारी है. सपा और बसपा दोनों ही मुस्लिम मतों पर आश्रित हैं और पिछले दो चुनावों में देखने को मिला है कि मुस्लिम मत दोनों ही पार्टियों को मिलते रहे हैं और अगर यह सिलसिला आगामी चुनाव में भी होता है तो न तो सपा और न ही बसपा सत्ता की दहलीज तक पहुंच पाएगी.

      योगी आदित्यनाथ अपनी व्यक्तिगत साफ-सुथरी हिंदूवादी किंतु संवेदनशील छवि, कठोर किंतु कुशल प्रशासक, और 5 सालों में भ्रष्टाचार रहित सरकार के लोकप्रिय और जन हितकारी कार्यों के आधार पर जनता की अदालत में पहुंचेंगे. मुकाबला बेहद रोमांचकारी होगा लेकिन योगी तो योगी हैं, उनका पलड़ा सबसे भारी है.

      इसलिए इस बात की संभावना नहीं दिखाई देती कि जनता अखिलेश यादव को दुबारा मुख्यमंत्री बनायेगी, और इसके बहुत उचित कारण भी हैं .[1] [2] [3]

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      - शिव मिश्रा

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