गुरुवार, 18 मार्च 2021

बाटला हाउस का फैसला : छद्म धर्मनिरपेक्षता का मुंह काला

आखिर अदालत ने उन सभी छद्म धर्मनिरपेक्ष नेताओं के मुहं पर करारा  तमाचा मारा है जिन्होंने  2008 में हुए बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी बताया था  यद्यपि उस समय केंद्र में कांग्रेस का शासन था  और दिल्ली पुलिस केंद्र के अधीन  होती है.  सत्ता हासिल करने के लिए देश की एकता और अखण्डता का सौदा करने वाले  इन स्वार्थी नेताओं ने शहीद पुलिस इंस्पेक्टर  मोहन चंद्र शर्मा की शहादत पर भी प्रश्न चिन्ह लगा  दिया था और समूची पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल कमजोर  करने का काम किया था.

अदालत ने बाटला एनकाउंटर को इसे "दुर्लभ मामलों में सबसे दुर्लभ मामला कहा और मुठभेड़ में पुलिस इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की हत्या करने वाले  इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी अरीज़ खान को मौत की सजा का आदेश दिया। 

आतंकी  अरिज   खान  उर्फ़  जुनैद कभी आतंक की फैक्ट्री कहे जाने वाले आजमगढ़ का निवासी है और , दिल्ली, राजस्थान, गुजरात और उत्तर प्रदेश में 2008 के सिलसिलेवार विस्फोटों का मास्टरमाइंड भी हैं। 2008 में राष्ट्रीय राजधानी के अलावा जयपुर और अहमदाबाद जैसे शहरों को भी उसने बम धमाको से दहला दिया था, जिसमें १६५ लोग मारे गए थे और ५०० से भी अधिक घायल हुए थे . उस पर इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस के अलावा रु 15 लाख का इनाम घोषित किया गया था। 

इस तरह की घटनाओं में शामिल आतंकवादियों की  शैक्षणिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर जो  अन्वेषण की गई हैं  उनके तथ्य आश्चर्यजनक रूप से चिंतित करने वाले हैं.  आरिफ नाम के इस  आतंकवादी  ने मुजफ्फरनगर के एसडी इंजीनियरिंग कॉलेज से बीटेक  किया है  और यह यह  एक विस्फोटक विशेषज्ञ है।  इसके चाचा पूर्व आईएएस अधिकारी हैं  और परिवार के ज्यादातर सदस्य अच्छी शैक्षणिक पृष्ठभूमि के हैं.  फिर सवाल उठता है कि ऐसे लोग अपने कैरियर बनाने की वजह आतंक की दुनिया  में क्यों प्रवेश  करते हैं ?  लोग लाख  कहें कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता लेकिन ज्यादातर आतंकी धर्म से प्रभावित होकर या धार्मिक कृत्य करने के लिए ही  आतंक की दुनिया में प्रवेश करते हैं .  मदरसों में दी  जारी  शुरुआती शिक्षा इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.  अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की है जिसमें उन्होंने मदरसे में दी जा रही खतरनाक धार्मिक शिक्षा पर सवाल उठाया है और 26 आयतों का जिक्र किया है जिनके कारण कम उम्र के नौनिहालों का   मस्तिष्क प्रभावित करने का कार्य किया जाता है.  जो भी हो सरकार को चाहिए कि समान नागरिक संहिता लागू हो ना हो लेकिन  पूरे देश में  समान शिक्षा व्यवस्था  जरूर लागू होनी चाहिए. 

 उस समय राजनेताओं के एक बड़े समूह ने जिनकी  गिद्ध दृष्टि हमेशा मुस्लिम वोट बैंक पर रहती है  ने न केवल बाटला हाउस एनकाउंटर को फर्जी करार दिया था बल्कि मुस्लिम युवकों की हत्या के लिए दिल्ली पुलिस को दोषी ठहराया था. 

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सलमान खुर्शीद ने उस समय कहा था  कि मैंने  जब बाटला हाउस  हादसे की तस्वीरें  के सोनिया गांधी को दिखाई  तो उनके आंसू फूट पड़े और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा कि कृपया यह फोटो हमें मत दिखाइए. 






कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह भी कहां पीछे रहने वाले थे उन्होंने भी कांग्रेस के तुष्टिकरण आन्दोलन को और आगे बढ़ाया “मैं शुरू से इस बात को  कह रहा हूं, उस  पर मैं आज भी कायम हूं, मेरी नजर में यह एनकाउंटर सही नहीं है”.

तृणमूल कांग्रेस की सर्वे सर्वा  ममता बनर्जी ने कहा था कि बाटला हाउस फेक एनकाउंटर है.  यह कहने के लिए  कोई कहे कि तुम्हारा  गर्दन ले लेंगे  तो हम गर्दन दे देंगे. अगर यह एनकाउंटर सच साबित होता है तो हम राजनीति छोड़ देंगे.” आज कोई हमसे पूछे कि इतना बड़ा झूठ बोलने के बाद अब जबकि मामला  पूरी तरह  सच साबित  हो गया है तो वह राजनीति में क्यों है ?  


अभी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने कहा बाटला हाउस एनकाउंटर के ऊपर जो प्रश्न  चिन्ह लगे हैं, पुलिस एनकाउंटर के बाद जो बातें बोलती है और जो  थ्योरी  देती है वह सही नहीं हैं .  इसलिए पूरी कौम को बदनाम करना उचित नहीं है. 


 यह  कुछ नाम है, वैसे तो ज्यादातर  राजनीतिक दलों ने इस मुठभेड़ को फर्जी बताया था.  इन सब नेताओं के बयानों से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि हर कोई  बेहद जल्दबाजी में  था ताकि  तुष्टीकरण की प्रतियोगिता में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके. आम आदमी पार्टी ने तो कुछ मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक कर उनको आश्वासन दिया कि उन्होंने प्रशांत भूषण के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था जिसने  इतने प्रमाण इकट्ठे कर लिए हैं,  जिन से आसानी से सिद्ध होता है कि यह फर्जी मुठभेड़ थी  और वह सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर करके एक स्वतंत्र जांच कमेटी बनाने की मांग रखेंगे ताकि पीड़ित पक्ष  ( मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों ) को न्याय मिल सके. 

यह सब भारत में मुस्लिम तुष्टीकरण के  नये निम्न स्तर के अलावा कुछ भी नहीं था, राष्ट्र की कीमत पर वोटों की फसल काटने वाली स्वार्थी राजनेताओं यह जान कर भी अंजान बने रहे  कि आतंकवादियों का अंतिम उद्देश्य क्या था?  दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर का मरना उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता.  कुछ नेताओं को देख कर तो ऐसा लगता है कि शायद   उनका  जन्म ही  अराजकता फैलाने और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हुआ है. 

कहते हैं कि समय का पहिया हमेशा घूमता रहता है. कुछ लोग शहर अपने आप को समय के अनुकूल डाल लेते हैं और कुछ लोगों को समय बदलने के लिए मजबूर कर देता है.  भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के उदय होने के बाद हिन्दू जन  जागरण की जो ज्योति प्रज्वलित हुई थी वह   उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के उदय से और प्रखर होकर ज्वाला बन चुकी हैं. इसकी शुरुआत राहुल की मंदिर परिक्रमा, जनेऊ धारी ब्राह्मण बनने, और  गोत्र की खोज करने  और प्रचारित करने से हुई. इस प्रक्रिया में लगातार तेजी आती जा रही है . अरविंद केजरीवाल जिन्होंने ढांचे की जगह राम मंदिर बनाने का विरोध किया था, शाहीन साजिश में नकारात्मक भूमिका निभाई ,  किन्तु दिल्ली चुनाव के समय हनुमान भक्त हो गए और राम मंदिर के शिलान्यास के समय निमंत्रण की बाट जोह रहे थे और  अब दिल्ली के बुजुर्गों को राम मंदिर दर्शन के लिए अयोध्या भेजने की योजना बना रहे हैं . 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस  का मुख्यमंत्री  चेहरा प्रियंका गांधी  संगम  में   डुबकी  लगा रही हैं  और पूजा पाठ कर रही हैं.  पश्चिम बंगाल में मस्जिद के  इमामों को वेतन और भत्ते स्वीकृत करने, दुर्गा विसर्जन पर रोक लगाने, सरस्वती पूजा रोकने ,  जय श्री राम के नारे  पर  आग बबूला होने और पिछले १० वर्षों से तुष्टिकरण की सारी सीमाएं लांघने के बाद अब सार्वजनिक मंचों पर चंडी पाठ  कर  रही है,  मंदिर परिक्रमा शुरू कर रही हैं,  अपने आप को  हिंदू और  ब्राह्मण बता रही हैं. 

क्यों हो रहा है यह सब ? क्योंकि अब खेल के नियम बदल रहें हैं. अब   हिन्दुओं में तुष्टिकरण के विरुद्ध  जागरूकता और एकजुटता बढ़  रही है . राजनीति के  बेईमान  परजीवी अब तक 30% थोक वोट बैंक  के सहारे चुनाव जीतते थी और बची खुची कमी चुनाव में दंगा फसाद करने और मतपत्र लूटने से कर  लिया जाता था जिसके लिए बाहुबलियों से अनुबंध भी कर लिया जाता था. ईवीएम के कारण बाहुबलियों का खेल ख़तम हो गया है. अब 30 % वोटों के  सहारे चुनाव जीतना मुश्किल है तब जबकि  उसके भी कई दावेदार मैदान में आ गए  हों . . 

पहले इन नेताओं को लगता था  कि जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है इसलिए कुछ भी कह कर और कुछ भी करके निकल जाएंगे किन्तु  अब समय बदल  गया है, अब  जनता  इन पर लगातार नजर रख रही है  और सवाल पूछ रही है.इसलिए अब हिन्दू बनना जरूरी है. लगता है कि हिंदुस्तान के अच्छे दिन आ रहे हैं .  

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- शिव प्रकाश मिश्रा

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सोमवार, 8 मार्च 2021

पश्चिम बंगाल चुनाव इस बार इतने महत्त्व पूर्ण क्यों हो गए हैं ?

 



पश्चिम बंगाल के स्थिति दिन प्रतिदिन  बहुत ख़राब होती जा रही है , ऐसा लगता है कि सत्ता के लालच में राजनैतिक दल देश के इस भूभाग को कश्मीर बनाने में गुरेज नहीं कर रहे हैं. देखिये एक संक्षिप्त विश्लेषण.


  बंगाल 12 वीं शताब्दी तक भारत ही नहीं दुनिया में  समृद्धि शाली राज्यों में गिना जाता था. यह राज्य जितना आर्थिक रूप से समृद्ध था उतना ही कला संस्कृति और प्रगतिशील सोच में भी समृद्ध था. कहा जाता था कि बंगाल जो आज सोचता है पूरी दुनिया उसे कल सोच पाएगी. उस समय बौद्ध धर्म के प्रभुत्व वाले इस शांतिप्रिय  राज्य में 1204 में मोहम्मद बख्तियार खिलजी ने आक्रमण किया और  चूंकि  हिंदू राजा आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे, इस आक्रमण  का सभी ने सामूहिक  सामना नहीं किया और परिणाम स्वरूप बंगाल मुस्लिम आक्रांताओं के कब्जे में आ गया. बख्तियार खिलजी ने न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया बल्कि   तलवार की नोक पर बड़ी संख्या में धर्मांतरण करवाया  जिसके कारण बंगाल मुस्लिम बाहुल्य राज्य हो गया. 

लगभग 550 वर्षों तक गुलाम रहने के बाद भी कोई  हिंदू राजा या हिंदू वीर सेनानी राज्य को आक्रांताओं  के चंगुल से मुक्त नहीं करा सका. 1757 में प्लासी की लड़ाई द्वारा  ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल में अपना अधिपत्य स्थापित कर लिया.  सत्ता  की डोर एक आक्रांता से दूसरे आक्रांता को स्थानांतरित हो गई. मुस्लिम आंदोलनकारियों के दबाव में अंग्रेजी सत्ता ने  1905 में बंगाल का विभाजन किया और  मुस्लिम बाहुल्य आबादी वाले भाग  को पूर्वी बंगाल  का नाम दिया गया व दूसरे का नाम दिया गया पश्चिम बंगाल.  राष्ट्रवादी हिंदुओं केअत्यधिक विरोध के कारण 1911 में विभाजन तो रद्द कर दिया गया लेकिन प्रशासनिक विभाजन बना रहा. 1947 में भारत के विभाजन के समय इसी  आधार पर  मुस्लिम बाहुल्य  पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान को दे दिया गया जो   पूर्वी पाकिस्तान बना  और बाद में  आज के बंगला देश के नाम से एक और इस्लामिक देश भारत के पड़ोस में बन  गया.  जैसा कि अवश्यंभावी था, बांग्लादेश के इस्लामीकरण के बाद  हिंदुओं के विरुद्ध भयानक अत्याचार किए गए जिनका उल्लेख  बंगलादेशी  लेखिका तसलीमा नसरीन ने अपनी किताब " लज्जा " में किया है . पढ़कर आपके रोंगटे काँप जायेंगे. हिन्दू महिलाओं और बच्चियों  को उनके घरों से उठा लिया जाता था. उनके के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और यहां तक कि हिन्दू  पुरुषों के गुप्तांग  भी काटे  गए. तसलीमा नसरीन के खिलाफ कट्टरपंथी आंदोलित हो गए और उनके खिलाफ फतवे जारी किये गए. उनकी किताब प्रतिबंधित कर दी गयी  और उन्हें बांग्लादेश से निकाल दिया गया. उन्हें भागकर कोलकाता में शरण लेनी पडी लेकिन कट्टरपंथियों के दबाव में  कांग्रेस शासन में  कोलकाता  भी छोड़ना पडा और उनकी किताब भारत में भी प्रतिबंधित कर दी  गयी.       


बंगाल का दुर्भाग्य देखिए कि मुस्लिम आक्रांताओ  के आक्रमण और 550 के मुस्लिम शासन और लगभग 200 वर्षों की अंग्रेजी शासन की बाद भी बंगाल में जो राष्ट्रवाद की भावना की मशाल जलती रही, उसे  स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बुझाने के हर संभव प्रयास किए जाने लगे. इसके पीछे पाकिस्तान और विदेशी शक्तियों के साथ साथ  देश के स्वार्थी और लालची राजनीतिक नेताओं ने  राष्ट्रवाद और नैतिकता  को तिलांजलि देकर सत्ता प्राप्ति के लिए तुष्टीकरण की आड़ में एक और बंटवारे को निमंत्रण दे डाला . 


पाकिस्तान के  पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने अपनी किताब "द मिथ ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस" में  लिखा है कि विभाजन के समय पाकिस्तान ने पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के रूप में जो दो हिस्से  लिए थे , उनका रणनीतिक महत्व है. पूर्वी  पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल में अवैध घुसपैठ करा कर पश्चिम बंगाल की जनसंख्या में असंतुलन पैदा करना है और कालांतर में इस राज्य को पूर्वी  पाकिस्तान में मिलाना था . इसी तरह पश्चिमी पाकिस्तान में समूचे जम्मू कश्मीर को मिलाने की योजना  शामिल है.  इसलिए "हंस के लिए पाकिस्तान लड़के  लेंगे हिंदुस्तान" की पृष्ठभूमि आज भी जिंदा है, लेकिन यह हिंदुस्तान का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बिना खड़क बिना ढाल, ठेके पर आजादी दिलाने वाली कांग्रेस ने इस ओर  पूरी तरह से आंख बंद कर ली जिसका परिणाम आज देश के सामने है. 


कांग्रेस  ने  अपने शासनकाल में तुष्टिकरण की सारी सीमाएं लांग दी और बांग्लादेश से आने वाले अवैध घुसपैठियों को वोट  बैंक बनाकर  पश्चिम बंगाल और असम के सीमांत जिलों में लगातार आश्रय देते रहे जिसके कारण असम और पश्चिम बंगाल के कई जिलों में जनसंख्या का घनत्व बदल गया और स्थानीय निवासी अपनी पहचान के लिए छटपटाने लगे. आसाम मे अवैध घुसपैठियों  के विरुद्ध आंदोलन होने लगा जिसके कारण पश्चिम बंगाल  बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों का सबसे बड़ा केंद्र  बन गया. आज बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए अनेक  जिले मुस्लिम बाहुल्य जिले हो गए  हैं और इनका प्रभाव १००  से अधिक विधानसभा सीटों पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता  है. 


कांग्रेश के बाद सत्ता में आए वामपंथियों ने तो और दो कदम आगे जाकर खुलकर इन अवैध बांग्लादेशियों का साथ दिया. 90 के दशक में जब महाराष्ट्र की पुलिस मुंबई से अवैध बांग्लादेशियों को पकड़कर उन्हें बांग्लादेशी सीमा पर छोड़ने जा रही थी तो हावड़ा  रेलवे स्टेशन पर वामपंथी नेताओं ने  महाराष्ट्र पुलिस को घेर लिया और  हंगामा किया.  पुलिस के कब्जे से सभी घुसपैठियों को वामपंथी छुड़ा ले गए.  सोचिये इन अवैध घुसपैठियों के लिए और क्या  क्या नहीं किया होगा . 


आज भी  पश्चिम बंगाल में भाजपा के अलावा सभी दल मुस्लिम वोट बैंक के सहारे ही  चुनावी  वैतरणी पार करने की कोशिश कर रहे हैं.  संवैधानिक  आढ़ में भारत  की छद्म धर्मनिरपेक्षता की विडंबना देखिए की फुरफुरा  शरीफ के जिहादी मौलवी अब्बास सिद्दीकी जिन्होंने कोविड-19 के संक्रमण काल में जुमे की नमाज के बाद दुआ मांगी थी कि इससे भारत में  50 करोड लोग ( हिन्दू )  मर जाएं, विधानसभा के चुनाव में भाग लेने के लिए इंडियन सेक्युलर  फ्रंट बनाया है, और सभी राजनीतिक दल  गठबंधन करने के लिए उसके पीछे पड़े रहे. जहां ममता बनर्जी ने  करोड़ों  रुपयों की सहायता फुरफुरा  शरीफ दरगाह को देकर इस  जिहादी मौलबी को अपने पक्ष में करने की कोशिश की लेकिन सीट बंटवारे को लेकर बात नहीं बन सकी वहीं  कांग्रेस और वामपंथियों ने घुटने टेक कर इस साम्प्रादायिक उन्मादी और देश विरोधी मौलबी से समझौता कर लिया. यह  धर्मनिरपेक्ष भारत की  घिनौनी और बेहद  खतरनाक तस्वीर है, और यही तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों की कड़वी सच्चाई भी  है. कांग्रेश ने भारत विभाजन के तुरंत बाद ही मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर लिया था और वामपंथियों के हवाले पूरी शिक्षा व्यबस्था और इतिहास लेखन का कार्य सौंप दिया था जिसके कारण आर्य बाहरी आक्रमणकारी  बना दिए गए, अकबर व औरंगजेब महान  बना दिए  गए और  शिवाजी और महाराणा प्रताप को   लुटेरा और आतंकवादी बना दिया गया.  ताजमहल भारत की पहिचान बन गया और अयोध्या में मर्यादा पुरषोत्तम राम अपना अस्तित्व प्रमाणित  करने के लिए अदालतों के चक्कर लगाते रहे.  


पश्चिम बंगाल के इन चुनावों में एक और बेहद महत्वपूर्ण घटनाक्रम होने जा रहा है और वह है भारत के स्वयंभू धर्मनिरपेक्ष,  एआईएमआईएम यानी आल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन  (जिसका अर्थ है मुस्लिमों के लिए समर्पित संगठन) के  मुखिया, और हैदराबाद के रजाकार  संगठन से गहरा संबंध रखने वाले और जिन्ना के रास्ते पर  चलकर हिंदुस्तान में मुस्लिम क्रांति लाने वाले असदुद्दीन ओवैसी का प्रवेश. ओवैसी ने भी फुरफुरा  शरीफ के इसी शांतिदूत से समझौता करने का प्रयास किया लेकिन बात नहीं बन सकी. जाहिर है ओवैसी भी  अब सिर्फ मुस्लिमों का वोट पाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाएंगे. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी राज्य के चुनाव में 3 बड़े राजनीतिक दल या गठबंधन मुस्लिम वोटों के लिए आपस में लड़ेंगे.  कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है जो केवल भारत में ही संभव है  कि 30% मुस्लिम मतों के लिए तुष्टिकरण की सारी सीमाएं पार कर दी जाती है किंतु 70% हिंदुओं की भावनाओं को पूरी तरह  अनदेखा कर दिया जाता है.  दुर्गा विसर्जन की तिथियों और मुहूर्त  को दरकिनार कर मुहर्रम जुलूस के कारण  रोक  दिया जाता है, जय श्रीराम के नारे का विरोध किया जाता है, मस्जिदों के इमामों  और अजान लगाने वालों के लिए वेतन और भत्ते की व्यवस्था की जाती है, मस्जिदों, मदरसों, दरगाहों आदि पर करदाताओं के पैसे की बर्षात कर दी  जाती है जिसके कारण पूरे राज्य में गली कूंचों में  मदरसों और मस्जिदों की बाढ़ आ जाती है, उनकी गतिविधियों को पूरी तरह  नजरअंदाज किया जाता है, बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों और रोहिंग्याओं का तहे दिल से स्वागत किया जाता है. सीमांत जिलों से हिंदुओं का पलायन शुरू हो चुका है. यह सब  शुभ संकेत नहीं है और पश्चिम बंगाल में कश्मीर जैसे हालत होने में बहुत कम समय बाकी है. 


ऐसे में किसी ऐसी सरकार की अत्यंत आवश्यकता है जो न केवल तुष्टिकरण रोके बल्कि तेजी से परिवर्तित हो रहे जनसंख्या घनत्व को रोके ताकि न  केवल पश्चिम बंगाल के वर्तमान स्वरूप को बनाए रखा जा सके बल्कि भारत की एकता और अखंडता को सुनिश्चित किया जा सके. मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि  वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा के अतिरिक्त यह कार्य कोई भी राजनैतिक दल  नहीं कर सकता है. 


भाजपा  के वरिष्ठ नेताओं  विशेषतय: भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृह मंत्री अमित शाह, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन मुद्दों को  बखूबी रेखांकित किया है जिसका लोगों पर बहुत तेजी से असर हुआ है. यही कारण है कि भाजपा की राजनीतिक जमीन में निरंतर सुधार हो रहां  हैं.  पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में राज्य में भाजपा के पक्ष में तेजी से हवा चल रही है और तृणमूल के  कई नेता और ममता बनर्जी के निकट सहयोगी भाजपा में शामिल हो रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बिग्रेड ग्राउंड में हुई रैली में जितना जन सैलाब उमड अगर यह राज्य के लोगों की आकांक्षा का प्रतीक है तो परिवर्तन संभव है.  किसी जमाने के डिस्को डांसर और बॉलीवुड के सुपरस्टार मिथुन चक्रवर्ती ने भाजपा का झंडा  फहराते  हुए फिल्म अंदाज में उपस्थित जनसमूह को परिवर्तन का सीधा सीधा संकेत दे दिया. प्रधानमंत्री की यह रैली प्रदेश में हुई अब तक की सबसे विशाल  रैली थी, जिससे विपक्षी खेमे में चिंता व्याप्त हो गई है.


इससे पहले यहां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने  भी जय श्री राम के उद्घोष के साथ उत्तर प्रदेश की कानून और व्यवस्था के समक्ष नतमस्तक होते अपराधियों की बानगी प्रस्तुत की जिसे प्रदेश की शांत प्रिय जनता में  नई आशा का संचार  हुआ.  लोगों को मालूम हुआ कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में एक सन्यासी की सादगी और दृढ़ संकल्प ने न केवल उच्च स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया है बल्कि अपराधियों और माफियाओं के हौसले पस्त  कर दिए हैं. उत्तर प्रदेश में योगी राज में माफियाओं और भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध जितनी कड़ी कार्यवाही हुई है उतनी आजादी के बाद किसी भी सरकार में नहीं हुई है. आर्थिक विकास के मामले में भी प्रदेश ने  छलांग लगाते हुए नया कीर्तिमान स्थापित किया है. भाजपा शासित  प्रदेश का उत्तर प्रदेश मॉडल पश्चिम बंगाल के लोगों में आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. 



पश्चिम बंगाल में इस बार अगर सत्ता परिवर्तन नहीं होता है तो संभवत मुस्लिम तुष्टिकरण के  नए आयाम गढे  जाएंगे और जिसके परिणाम स्वरूप स्थितियां और भयावह होती जाएंगी जो आगे चलकर निश्चित रूप से भारत की एकता और अखंडता के लिए गंभीर चुनौती बनेगी. इसलिए सभी राष्ट्रवादी लोगों को चाहिए कि इन चुनावों को "अभी नहीं तो कभी नहीं" के रूप में किसी दल की सरकार बनाने के लिए नहीं अपितु भारत की  एकता और अखण्डता अक्षुण्ण बनाये  रखने के लिए अपना योगदान देना चाहिए . 

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- शिव मिश्रा 

स्वतन्त्र लेखक और  चिन्तक 

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रविवार, 21 फ़रवरी 2021

क्या इंदिरा गांधी ने बाबर की मजार पर श्रद्धांजलि दी थी ? क्या कारण हो सकता है?

 क्या इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए बाबर की मजार पर श्रद्धांजलि देने अफगानिस्तान गयी थीं, ऐसा करने के पीछे क्या कारण हो सकता है?



मुझे लगता है कि इस तरह के संवेदनशील उत्तर के साथ कुछ प्रमाण देना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए मैं संक्षेप में प्रमाण के साथ उत्तर देने का प्रयास करता हूं।

कुछ साल पहले कुंवर नटवर सिंह की एक किताब प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था वन लाइफ इज नॉट इनफ (One Life is Not Enough) [1] , इसमें इस घटना का जिक्र किया गया है.

नटवर सिंह भारतीय विदेश सेवा के 1953 बैच के अधिकारी थे और वह चीन, ब्रिटेन, अमेरिका सहित कई देशों में नियुक्त रह चुके थे।वह कुछ ऐसे लोगों में शामिल हैं जिन्होंने नेहरू गांधी परिवार की लगभग हर पीढ़ी के साथ काम किया था। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और यहां तक कि राहुल और प्रियंका के साथ भी काम किया था । 1984 में उन्होंने सेवा से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के टिकट पर संसदीय चुनाव में हिस्सा लिया था।

स्वाभाविक है कि उनकी लिखी किसी भी बात पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है। विशेष बात यह कि जब उनकी किताब प्रकाशित होने जा रही थी उस समय सोनिया गांधी ने प्रियंका को भेजकर और खुद उनके घर जाकर इस किताब में कई संभावित तथ्यों को प्रभावित या न छापने की कोशिश की थी। इस में वह कितना सफल रही यह तो नहीं मालूम लेकिन फिर भी इस किताब में कुछ ऐसे तथ्य नेहरू गांधी परिवार के संबंध में बताए गए हैं जो शायद देश को अन्यथा मालूम नहीं हो सकते थे।

नटवर सिंह के अनुसार अगस्त 1969 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने राजीव और सोनिया के साथ काबुल का संक्षिप्त दौरा किया और कारण था खान अब्दुल गफ्फार खान से मिलना। एक दिन श्रीमती गांधी ने घूमने की इच्छा व्यक्त की और उन्हें अपने साथ आने को कहा। काबुल के बाहर कुछ पेड़ों से घिरी एक जीर्ण-शीर्ण इमारत दिखाई दी जिसका नाम था बाग-ए-बाबर , श्रीमती गांधी प्रोटोकॉल की धज्जियां उड़ाते हुए कब्र पर गयी जो उनके तय कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था। कब्र पर पहुंचकर श्रीमती गांधी काफी देर तक सिर झुकाए खड़ी रही। उनसे कहा कि वह इतिहास की यादें ताजा कर रही थी। नटवर सिंह ने उनसे कहा कि भारत की महारानी के साथ बाबर को श्रद्धांजलि देना उनके लिए भी एक बड़ा सम्मान था.

इस किताब का वह अंश जिसमें इस घटना का जिक्र है -

  1. "One afternoon, Mrs Gandhi had some free time and decided to go for a drive, along with me. A few miles outside Kabul she saw a dilapidated building surrounded by a few trees, and asked the Afghan security officer what it was. Bagh-e-Babur, he told us, and Mrs Gandhi decided to drive up to it. The protocol department went into a tizzy as no security arrangements had been made. Regardless, we headed towards Babur’s grave. She stood at the grave with her head slightly lowered and I behind her. She said to me, ‘I have had my brush with history.’ I told her I had had two. ‘What do you mean?’she asked. I said that paying homage to Babur in the company of the Empress of India was a great honour."  

ऐसा करने के पीछे क्या कारण हो सकता है ?

श्रीमती गांधी की यह काबुल यात्रा किसी द्विपक्षीय आधार पर आयोजित नहीं की गई थी. इसका कारण यह बताया गया था कि श्रीमती गांधी गांधी खान अब्दुल गफ्फार खान से मिलना चाहती हैं और अपने साथ राजीव गांधी और सोनिया गांधी को भी ले गई थी. इसे ऐसा लगता है कि उन्होंने बाबर की कब्र पर श्रद्धांजलि अर्पित करने का इरादा बहुत पहले से ही कर लिया था और यह यात्रा सिर्फ इस कार्य के लिए ही पर आयोजित की गई थी. श्रीमती गांधी का उद्देश्य अगर भारत में मुस्लिम मतों को प्रभावित करना होता तो श्रद्धांजलि की इस खबर को भारत में फैला दिया गया होता लेकिन ऐसा नहीं किया गया इस बात को एक रहस्य ही रखा गया. इससे लगता है कि श्रीमती गांधी का बाबर की कब्र पर जाना और श्रद्धांजलि अर्पित करने का उद्देश्य नितांत व्यक्तिगत और उनके दिल का मामला था. और यह कुछ ऐसा था जिसे वह राजीव गांधी और सोनिया गांधी को भी बता देना चाहती थी. क्या श्रीमती गांधी बाबर को अपना पूर्वज मानती थी ?

इसे समझने के लिए एक छोटी सी और घटना का उदाहरण देना अत्यंत आवश्यक है.

  • 1984 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद राजीव गांधी ने पहली बार 15 अगस्त 1985 को जब देश को संबोधित किया तो उन्होने भी कहा कि "वह भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते हैं जहां वह अब से ढाई सौ- तीन सौ साल पहले भारत था"
    • ढाई सौ 300 साल पहले भारत में औरंगजेब का शासन था. औरंगजेब के शासनकाल में ऐसा अच्छा क्या था जिसने राजीव गांधी को इतना प्रभावित किया कि वह भारत को पुनः उसी युग में ले जाना चाहते थे ?

एक अन्य किताब है जो के एन राव लिखी है,[2] जिसमें मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, कमला नेहरू, इंदिरा, फिरोज खान, राजीव और संजय तथा अन्य समकालीन पात्रों का विस्तार से वर्णन किया है. के एन राव जवाहरलाल नेहरू के साथ काम करने वाले एक प्रशासनिक अधिकारी थे और उनकी रूचि ज्योतिष शास्त्र में बहुत अधिक थी इसलिए उन्होंने मोतीलाल नेहरू के बाद सभी की कुंडली बनाने के उद्देश्य से उनका सटीक जीवन वृतांत दिया है.

  • जवाहरलाल नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू के बारे में विकीपीडिया में लिखा हुआ है कि उनका जन्म उनके पिता गंगाधर नेहरू की मृत्यु के बाद हुआ था. न्यू परिवार कई पीढ़ियों से दिल्ली में रह रहा था और गंगाधर नेहरू दिल्ली में पुलिस कोतवाल थे जब 1857 में स्वाधीनता संग्राम का संघर्ष शुरू हुआ तो आगरा में आकर बस गए. [3]
  • बाद में मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद चले गए. लेकिन एम के सिंह ने अपनी इनसाइक्लोपीडिया ऑफ वार ऑफ़ इंडियन इंडिपेंडेंस मैं काफी विस्तार से इस बारे में बताया है.
  • दिल्ली पुलिस की वेबसाइट में अंग्रेजों और मुगलकालीन के पुलिस अधिकारियों की सूची में किसी गंगाधर नेहरु का नाम दिल्ली के कोतवाल के रूप में नहीं मिलता . इसके विपरीत 1857 मैं दिल्ली के कोतवाली गयासुद्दीन गाजी थे, जो मुगल थे और जो दिल्ली पर अंग्रेजों के आक्रमण के समय दिल्ली छोड़ कर चले गए थे और छद्म नाम से रहने लगे थे, क्योंकि अंग्रेजों की सेना मुगलों को खोज खोज कर मौत के घाट उतार रही थी.
  • कई स्वतंत्र इतिहासकारों ने अपनी खोज में गंगाधर नेहरू और गयासुद्दीन गाजी को एक ही व्यक्ति बताया है. एम के सिंह ने भी इसी तरफ इशारा किया है.
  • हिंदुस्तान टाइम्स में 9 जुलाई 2015 को छपी एक रिपोर्ट में इस पर विभिन्न दृष्टिकोण से विस्तार से चर्चा की गई है.[4]
  • एक सेवानिवृत्त आई ए एस अधिकारी डॉ वी एस गोपाल कृष्णन की खोज सर्वाधिक उपयुक्त लगती है, जिसे नीचे दिए गए लिंक से पढ़ा जा सकता है. [5]

अब अगर इन रिपोर्ट की कड़ियों को जोड़ा जाए तो ऐसा लगता है कि नेहरू परिवार के पूर्वज मुगल हो सकते हैं, लेकिन इस पूरे मामले पर इतनी धूल पड़ गयी है या डाल दी गई है, जिसके कारण तश्वीर कभी साफ़ नहीं हो पायेगी .

इंदिरा गांधी का बाबर की कब्र पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करना शायद इस संदेह को और अधिक पुख्ता करता है कि इंदिरा गांधी और नेहरु परिवार के पूर्वज मुग़ल थे .

फुटनोट


गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

भारत अपने विरोधी देश कनाडा को कोरोना वैक्सीन क्यों दे रहा है ?

 



दिल तो मेरा भी कह रहा है कि कनाडा को वैक्सीन नहीं देना चाहिए लेकिन दिमाग कह रहा है दे देना चाहिए , क्योंकि कूटनीति में और विदेश नीति में दिल से नहीं दिमाग से काम लेना चाहिए.

और ….. मोदी जी ने ही किया है.

आज कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन करो ना वैक्सीन देने का अनुरोध किया . जिसे प्रधानमंत्री ने यह जानते हुए भी कि भारत में चल रहे तथाकथित किसान आंदोलन में न केवल कनाडा में बसे खालिस्तान समर्थकों ने बल्कि स्वयं जस्टिन ट्रूडो और उनके मंत्रियों ने इस आंदोलन में आग में घी डालने का काम किया था, स्वीकार कर लिया. मोदी जी ने स्वयं ट्वीट कर इसकी जानकारी दी.

श्री नरेंद्र मोदी की वैक्सीन डिप्लोमेसी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत सौहार्द अर्जित किया है . वर्तमान परिस्थितियों में जब चीन कोरोना संक्रमण के आरोपों से घिरा हुआ है, और उसकी वैक्सीन भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फेल साबित हो गई है, भारत का मानवीय आधार पर सह्रदयता दिखाना न केवल भारत के लिए बेहतर छवि निर्माण करेगा बल्कि दवा और वैक्सीन उद्योग को नई ऊंचाइयों पर स्थापित करेगा.

कनाडा रक्षात्मक मुद्रा में पहले ही आ चुका है, वैक्सीन की इस कूटनीति से खालिस्तानियों पर भी अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बन गया है .

किसान आन्दोलन में मिलने वाले विदेशी फंड्स की जांच चल रही है जिसमें काफी पैसा कनाडा से आया है. कनाडा के जाँच में सहयोग करने मात्र से कुछ तथाकथित किसान नेता मुहं छिपाते फिरेंगे .

शनिवार, 6 फ़रवरी 2021

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के विश्वास के साथ खतरनाक खेल खेल रहें हैं?

 उग्र किसान आंदोलन से प्रभावित हुए बिना और लोक लुभावन रहित 2021 का बजट देखकर क्या आपको लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता द्वारा दिए गए विश्वास के साथ खतरनाक खेल खेल रहें हैं?



भारत में ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं जिन्हें जनता का अपार विश्वास प्राप्त होता है, नरेंद्र मोदी उन गिने चुने लोगों में से एक हैं. जनता उनका भरपूर विश्वास करती है और उसे हमेशा यह विश्वास रहता है कि मोदी जो करेंगे अच्छा ही करेंगे और जो देश व जनता के हित में होगा.

जनता का यह अगाध विश्वास मोदी की ईमानदार छवि के कारण है. यह विश्वास ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी जमा पूंजी है, जिसका वह भरपूर उपयोग करते हैं, बिना किसी संकोच और बिना किसी दबाव के.

इसीलिए राजनैतिक षड्यंत्र, धरना प्रदर्शन, अपने प्रति नफरत के भाव आदि, उन्हें प्रभावित नहीं करते और वह देश हित में आर्थिक और सामाजिक सुधारों के बड़े से बड़े कदम उठाने से नहीं हिचकते हैं.

  • उनके इस साहसिक कार्यों के पीछे केवल और केवल जनता का असीम विश्वास है लेकिन एक सबसे बड़ी बात है कि मोदी को अच्छी तरह से मालूम है की जनता उनके इस तरह के कार्यों को पसंद करेगी इसलिए विपरीत परिस्थितियों में भी वह अपने मार्ग से नहीं डिगते.
  • सामान्य राजनीतिक नेता इतने साहसिक और जोखिम भरे कदम नहीं उठाते क्योंकि उन्हें हमेशा डर बना रहता है कि वह जनता का विश्वास न खो दें, उनकी लोकप्रियता कम न हो जाए और वह चुनाव न हार जायें .
  • इसके विपरीत मोदी के कार्यों से हमेशा ऐसा लगता है कि उन्हें जैसे चुनाव की कभी चिंता ही नहीं रही और इसलिए उन्होंने नोटबंदी और जीएसटी जैसे साहसिक कदम उठाए जिसके उपरांत विपक्षी पार्टियों सहित कई बुद्धिजीवी भी यह सोचते थे कि 2019 चुनाव में दोबारा सत्ता में नहीं आ पाएंगे. किंतु जनता ने उनमें पहले से कहीं ज्यादा विश्वास जताया और मोदी ज्यादा सीटें पाकर और ज्यादा मजबूत होकर सत्ता में वापस आ गए.
  • ऐसा लगता है कि जितना जनता मोदी पर भरोसा करती है उससे कहीं ज्यादा मोदी जनता पर भरोसा करते हैं कि वह उनके हर कदम का समर्थन करेगी अन्यथा ऐसे समय जब अंतराष्ट्रीय साजिश द्वारा प्रायोजित उग्र किसान आंदोलन चल रहा हो, वह अपना दिन प्रतिदिन का काम सामान्य ढंग से कर रहे हैं, और उन्होंने बिना दबाव में आये, ठीक वैसा ही बजट प्रस्तुत किया, जैसा कि वर्तमान परिस्थितियों में देश को आवश्यकता थी.
  • यह बजट भी कम साहसिक नहीं है, इसमें न तो कोई लोकलुभावन घोषणा है और न ही उन्होंने अपने सबसे बड़े वोट बैंक मध्यम वर्ग को कोई खास रियायत दी है. मजे की बात यह है कि बजट आने के बाद सभी ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है जो इस बात का संकेत है कि प्रधानमंत्री मोदी में जनता का विश्वास दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है, और उसी अनुपात में विपक्षी दलों और नेताओं पर जनता का विश्वास घटता जा रहा है. यह सुखद आश्चर्य है और इसका कारण है कि जनता और मोदी एक दूसरे को बहुत अच्छे ढंग से समझते हैं.
  • इससे पहले केवल जवाहरलाल नेहरू के साथ ऐसा था कि सत्ता में आने के बाद भी उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई थी लेकिन उनके बाद के सभी प्रधान मंत्रियों ने सत्ता में आने के बाद अपनी लोकप्रियता खोई थी.
  • नरेन्द्र मोदी न केवल इसके अपवाद हैं बल्कि उन्होंने एक बड़ी लाइन खींच दी हैं, जिसके आगे सारा विपक्ष एक साथ जुड़ने के बाद भी बौना लगता है.

इसलिए मोदी जनता के विश्वास की पूंजी को जनता के हित में पूरे आत्म विश्वास के साथ, बड़ी दरियादिली से निवेश ( इन्वेस्टमेंट ) कर रहें हैं .

यही राजनीति का खतरनाक खेल है जो केवल मोदी ही खेल सकते हैं. आज के दिन दूसरा कोई नेता दूर दूर तक इस खेल में नजर नहीं आता .

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रविवार, 31 जनवरी 2021

पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की नई किताब "बाइ मैनी ए हैपी ऐक्सिडेंट: रीकलेक्शंस ऑफ ए लाइफ" नए खुलासे नए विवाद

 

27 जनवरी 2021 को विमोचन की गई यह किताब अमेज़न पर ₹125 मूल्य पर उपलब्ध है. इस किताब को सुर्खियों में लाने के लिए हामिद अंसारी ने नरेंद्र मोदी के साथ हुए उनके वार्तालाप और घटनाओं को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत किया है. इसके अतिरिक्त इस किताब में कुछ भी खास नहीं है.

इस किताब के बारे में विमर्श करने से पहले 26 जनवरी 2021 को हामिद अंसारी और नरेंद्र मोदी के बीच हुई एक संक्षिप्त वार्तालाप से नरेंद्र मोदी और हामिद अंसारी के बीच के रिश्ते और उनकी संवैधानिक भूमिका के बारे में काफी कुछ समझा जा सकता है.

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 26 जनवरी को राष्ट्रपति भवन में “एट होम” का आयोजन किया गया था. कोविड-19 के कारण आयोजन पहले ही काफी संक्षिप्त था, उस पर दिल्ली में हो रही घटनाओं ने इसे फीका बना दिया था. आयोजन की परंपरा के अनुसार सभी आमंत्रित लोग समय से आधे घंटे पूर्व पहुंच जाते हैं और प्रोटोकॉल के अनुसार तय समय पर सबसे पहले प्रधानमंत्री, उसके कुछ देर बाद उपराष्ट्रपति और आखिर में राष्ट्रपति आते हैं.

मोदी ने पहुंचकर अपनी आदत के अनुसार प्रत्येक मेज पर जाकर लोगों का हालचाल जाना और अभिवादन किया. हामिद अंसारी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के पास बैठे थे. मोदी जब उनके पास पहुंचे तो हामिद अंसारी ने मुस्कुराते हुए पूछा “कैसे हैं जनाब ?”

मोदी ने भी उसी तत्परता से जवाब दिया “ जी रहे हैं.. साहब, …… आपके बिना” इसके बाद हामिद अंसारी के चेहरे पर मुस्कुराहट गायब हो गई.

बात बहुत छोटी है लेकिन बहुत कुछ कहती है. पास खड़े हुए लोगों ने भी इसे शिद्दत से महसूस किया. एक वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश सिंह,जो इस आयोजन में आमंत्रित थे, ने अपने ब्लॉग में इसका उल्लेख किया है.

( २७ जनवरी २०२१ को राष्ट्रपति भवन में एट होम में हामिद अंसारी और मोदी )

स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ही कभी उपराष्ट्रपति के पद पर बैठा कोई व्यक्ति इतना विवादित रहा हो, पद पर रहने के दौरान और पद पर छोड़ने के बाद भी जितना हामिद अंसारी हैं. उनके डीएनए में भी खिलाफत आंदोलन के बीज हैं, क्योंकि उनके नाते-रिश्तेदार 19वीं सदी में धार्मिक आधार पर हुए इस पहले आंदोलन का हिस्सा रहे थे, जहां से जन्मे मुस्लिम अलगाववाद ने आखिर देश का विभाजन भी करवा दिया. धार्मिक आधार पर – हिंदुस्तान और पाकिस्तान अस्तित्व में आए. हामिद अंसारी आज भी उसी मानसिकता में जी रहें हैं.

अपनी नई किताब " बाई मैनी ए हैप्पी एक्सीडेंट रिकलेक्शन ऑफ़ ए लाइफ " में उन्होंने मोदी पर जमकर भड़ास निकाली है .

हामिद अंसारी ने बतौर उपराष्ट्रपति अपने कार्यकाल के आखिरी सवा तीन वर्षों में पीएम मोदी और उनकी सरकार को परेशान करने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

पीएम मोदी ने 10 अगस्त 2017 के अपने भाषण में गिनाया था कि किस तरह हामिद अंसारी के कैरियर का ज्यादातर समय मध्य और पश्चिम एशिया के देशों में बीता, जहां वो कूटनीति की अलग-अलग भूमिकाओं में थे. रिटायरमेंट के बाद अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रहे, फिर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, जहां से सीताराम येचुरी जैसे अपने वामपंथी मित्रों की मदद से यूपीए-1 के दौरान वो उपराष्ट्रपति बनने में कामयाब रहे थे.

( सेवा निवृत्ति के अवसर पर हामिद अन्सारी)

अंसारी ने अपनी किताब में कहा भी है कि मोदी ने खास तौर पर मुस्लिम देशों में उनके कैरियर का जिक्र और एक खास दृष्टिकोण की बात कर साफ संकेत देने की कोशिश की थी.

मोदी ने हामिद अंसारी के विदाई भाषण में माइनॉरिटी सिंड्रोम से पीड़ित होने का जो आरोप इशारों-इशारो में लगाया था और सांप्रदायिक सोच की तरफ भी इशारा किया था, उसके पीछे भी कई वजहें रहीं. हामिद अंसारी ने सार्वजनिक तौर पर कई बार इस्लामिक कार्ड खेला था. यही नहीं, मध्यपूर्व के कई मामलों में उनकी राय भारत सरकार की राय से अलग मुस्लिम प्रेम के नाते थी. पद छोड़ने के तुरंत बाद भी वो विवादास्पद संगठन, पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के केरल के एक कार्यक्रम में भी शरीक हो आए थे, जिस पर आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने के ढेरों आरोप हैं.

अंसारी ने किताब में लिखा हैं कि जिस समय एनडीए ये मांग कर रही थी डिन यानी शोर-शराबे के बीच भी महत्वपूर्ण बिल राज्य सभा में पारित कराए जाएं, उसी दौर में एक दिन पीएम मोदी बिना किसी पूर्व सूचना के उनके चेंबर में आए और बड़े अधिकार पूर्वक कहा कि उनसे ज्यादा जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वो उनकी सहायता नहीं कर रहे हैं.

सवाल ये उठता है कि अपनी पुस्तक को सनसनीखेज बनाने के लिए इस तरह की घटनाओं का जिक्र किताब में करना चाहिए था? यह उपराष्ट्रपति की गरिमा के अनुकूल नहीं है.

लगता है कि उनका इरादा दुनिया को यह बताना है कि मोदी किस तरह से उपराष्ट्रपति के पद पर बैठे शख्स को धमकाने आए थे.

बतौर राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी का कार्यकाल बेहद पक्षपात पूर्ण रहा. हामिद अंसारी ने अपनी किताब में लिखा है कि यूपीए के दौरान उन पर कभी शोर-शराबे के बीच बिल पास कराने का दबाव नहीं आया .

मोदी के साथ अपनी उसी बातचीत का जिक्र करते हुए हामिद अंसारी ने किताब में ये भी लिखा है कि पीएम मोदी राज्यसभा टीवी के कामकाज से नाराज थे और कहा था कि ये सरकार के अनुकूल नहीं है,

राज्यसभा टीवी का गठन और इसका कामकाज शुरु से विवादों के घेरे में रहा है, और इस विवाद के केंद्र में रही है खुद अंसारी की भूमिका.

राज्यसभा में नियुक्तियों में राजनीतिक विचारधारा और प्रभाव को हर तरह महत्व दिया गया, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक पत्रकार की ऐसी नियुक्ति हुई, जो कांग्रेस के बड़े नेता ( दिग्विजय सिंह ) की बाद में पत्नी बन गयीं .

राज्यसभा टीवी में उपकरणों की खरीद से लेकर बाहर से कार्यक्रम बनाए जाने के नाम पर जो करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ, उसकी जांच जरूर शुरु हो गई है, इससे भी हामिद अंसारी परेशान हैं .

कुछ लोग विवादों से बचते हैं तो हामिद अंसारी जैसे कुछ लोग विवादों का हमेशा पीछा करते हैं.

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

क्या रजिस्ट्री के बाद म्युटेशन करवाना जरूरी है और न करवाने के क्या नुकसान हैं?

ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट १८८२ के अनुसार किसी भी संपत्ति के स्वामित्व हस्तांतरण हेतु अभिलेख ( सेल डीड, गिफ्ट डीड या अन्य ) का पंजीकरण या रजिस्ट्री होना अनिवार्य है.

  • इस रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण पर सरकार कर लगाती है जो स्टैंप ड्यूटी के रूप में क्रेता को देनी पड़ती है, जिसका निर्धारण संपत्ति के मूल्य या सरकार द्वारा निर्धारित सर्किल रेट के अनुसार किया जाता है.
  • अगर संपत्ति का विक्रय किया जाता है तो इसे सेल डीड, अगर गिफ्ट दिया जाता है तो इसे गिफ्ट डीड कहा जाता है.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री की कार्यवाही रजिस्ट्रार के कार्यालय में संपादित की जाती है जो इस तरह के स्थानांतरण और विक्रय का रिकॉर्ड रखते हैं.
  • रजिस्ट्रेशन या रजिस्ट्री संपत्ति हस्तांतरण की पहली प्रक्रिया है और यह एक तरह से संपत्ति हस्तांतरण के लिए प्रमाण पत्र की तरह होती है लेकिन यह अपने आप में स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं है.

इसे थोड़ा विस्तार से समझ लेना बहुत आवश्यक है.

  • हर संपत्ति का ब्यौरा सरकार के संपत्ति रजिस्टर या सरकारी दस्तावेजों में होता है और यह किसी भी संपत्ति के स्वामित्व या मालिकाना हक का अंतिम दस्तावेज माना जाता है.
  • अगर यह कृषि भूमि है तो इसका विवरण राजस्व दस्तावेजों में होता हैं, जो तहसील या स्थानीय राजस्व कार्यालय में होते हैं.
  • अगर यह शहरी भूमि या मकान है, तो इसका विवरण संबंधित विकास प्राधिकरण, नगर निगम, नगर महापालिका या अन्य संबंधित विभाग में होता है.
  • जब भी कभी संपत्ति का क्रय - विक्रय होता है तो इन सरकारी दस्तावेजों में संपत्ति स्वामी के नाम के स्थान पर नए खरीदार का नाम लिखवाना अत्यंत आवश्यक है.
  • मूल सरकारी दस्तावेजों में नाम परिवर्तित करने की इस प्रक्रिया को म्यूटेशन, इंतकाल या दाखिल खारिज कहा जाता है. इसलिए जब तक म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज नहीं हो जाता है तकनीकी रूप से खरीदार को स्वामित्व नहीं मिलता और सम्पत्ति पर पुराने मालिक का नाम अंकित रहता है .

म्यूटेशन इंतकाल या दाखिल खारिज न करवाने के नुकसान

  • म्यूटेशन न करवाए जाने पर संपत्ति के सरकारी दस्तावेजों में पहले वाले भू -स्वामी का नाम रहता है और तकनीकी तौर पर वह संपत्ति का मालिक होता है.
  • जब तक संपत्ति रजिस्टर में पुराने भू - स्वामी का नाम है, किसी धोखाधड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता.
  • बिना धोखाधड़ी किये भी एक स्वाभाविक परेशानी होती है कि सरकारी दस्तावेजों में दर्ज भू स्वामी की मृत्यु के पश्चात उत्तराधिकार कानून के अनुसार थोड़ी सी औपचारिकता के बाद ( मृत्यु प्रमाण पत्र और उत्तराधिकार प्रमाण पत्र) तहसील, नगर निगम और नगर महापालिका में मृतक के उत्तराधिकारियों का नाम आ जाना बहुत आम बात है.
    • ये उत्तराधिकारी खरीदार को अनावश्यक कोर्ट कचहरी के चक्कर में डाल सकते हैं.
  • मूल भूस्वामी भी लालच में आकर अपनी संपत्ति की दोबारा रजिस्ट्री कर सकता है और इस तरह एक ही संपत्ति के दो खरीदार हो जाएंगे.
  • अगर दूसरा खरीदार ज्यादा तेज हुआ और उसने पहले म्यूटेशन करा लिया तो भी अनावश्यक मुकदमे बाजी शुरू हो जाएगी.
  • रजिस्ट्री कराने के बाद यदि काफी समय हो गया है तो भी संबंधित विभाग को एक लंबी प्रक्रिया का पालन करना होता है जिसके अनुसार क्षेत्रीय समाचार पत्रों में इस म्यूटेशन के आवेदन की सार्वजनिक सूचना दी जाती है ताकि यदि किसी को आपत्ति हो तो वह अपनी आपत्ति दर्ज करा सके.
    • इसमें अनावश्यक परेशानी तो होगी ही समय और पैसे की भी बर्बादी होगी.
    • दुर्भाग्य से अगर किसी ने आपत्ति दाखिल कर दी तो व्यर्थ की मुकदमे बाजी भी शुरू हो सकती है.

क्या सावधानी बरतें ?

  • जब भी कोई संपत्ति खरीदें चाहे वह कृषि भूमि हो या शहरी भूमि या कोई बना बनाया मकान , उसकी सर्च रिपोर्ट किसी वकील के माध्यम से जरूर बनवानी चाहिए.
  • यह वकील संबंधित रजिस्ट्री ऑफिस और संबंधित संपत्ति कार्यालय के कम से कम 12 साल के रिकॉर्ड देखेगा और नॉन इनकंब्रेंस सर्टिफिकेट बनाएगा.
  • इसके साथ ही वह वकील बिक्री करने वाले व्यक्ति और संपत्ति दस्तावेजों में अंकित अंतिम व्यक्ति की छानबीन करेगा और पिछले 30 सालों में संपत्ति हस्तांतरण की श्रंखला की जांच करेगा ( चैन ऑफ टाइटल डीड)
  • उपरोक्त दोनों चीजें सही होने पर ही संपत्ति खरीदनी चाहिए.
    • अगर आप किसी अच्छे बैंक से ऋण ले रहे हैं तो संभवत इन बातों का पालन किया जाएगा
      • स्टेट बैंक में बिना इन रिपोर्ट्स के ऋण नहीं दिया जा सकता . इस प्रक्रिया में काफी समय भी लगता है और थोड़ा खर्चा भी होता है इसलिए कई बार लोगों को स्टेट बैंक की प्रक्रिया काफी जटिल और लंबी लगती है.
      • मेरे राय में यह अत्यंत आवश्यक है कि जिस संपत्ति में आप इतना निवेश कर रहे हैं उसकी पूरी तरह से जांच पड़ताल होनी ही चाहिए.
  • एक बार जब आप सभी तरह की कमियों से मुक्त, साफ और स्वच्छ स्वामित्व वाली संपत्ति खरीदते हैं तो इसके तुरंत बाद संभव हो तो एक माह के अंदर नाम स्थानांतरण के लिए आवेदन कर देना चाहिए.
  • यही नहीं जब आपका नाम आ जाता है तो उसके बाद भी आप किसी वकील के माध्यम से एक छोटी सर्च रिपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं ताकि आप सुनिश्चित कर सकें कि वह संपत्ति आपके नाम आ चुकी है.

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देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...