सोमवार, 3 अप्रैल 2023
शनिवार, 1 अप्रैल 2023
बुधवार, 29 मार्च 2023
सोमवार, 27 मार्च 2023
सरकार योगी की, सिस्टम किसका
सरकार योगी की, सिस्टम किसका
सरकारें बदल जाती है और नये तरीके से काम भी शुरू कर देती है, लेकिन तंत्र (सरकारी
मशीनरी) में बदलाव के लिए बहुत अधिक ध्यान केंद्रित नहीं करती. इसलिए सिस्टम में
बदलाव या तो आता ही नहीं या फिर थोड़े बदलाव में इतना अधिक समय लग जाता है कि सरकार
के बहुत से अच्छे प्रयास व्यर्थ चले जाते हैं. ये सही है कि व्यवस्था में बदलाव
लाना आसान नहीं होता क्योंकि सुधारात्मक और गुणात्मक परिवर्तन का विरोध मानवीय
स्वभाव है. भारत में सरकारी कर्मचारियों की मन: स्थिति अनुशासन, कार्यकुशलता और
ईमानदारी के प्रति सामान्यतय: अनुकूल नहीं होती. इसलिए जो सरकार स्वयं इनका पालन
करते हुए जब सुधारात्मक कदम उठाती है, सरकारी कर्मचारी असहज हो जाते हैं और उसका
प्रत्यक्ष या परोक्ष विरोध करते हैं. कई बार यह विरोध इतना तीव्र होता है कि
सरकारों को कार्य करना भी मुश्किल पड़ जाता है. इसलिए ज्यादातर सरकारे बीच का
रास्ता अपनाती हैं और ईमानदारी, सुचिता, समयपालन, कार्यकुशलता आदि ऊपर से यानी
मंत्रिमंडल स्तर से शुरू करती हैं, जो बेहद आसान होता है. इससे सरकार की छवि अच्छी
बन जाती है और उच्च स्तरपर बदलाव दिखाई पड़ने लगता है, भले ही वह अस्थायी
हो. लेकिन यह पर्याप्त नहीं होता
क्योंकि ऊपर से नीचे तक जो कड़ी बनी होती है वह नहीं टूटती. इसलिए जनता को सरकार
परिवर्तन का जितना लाभ मिलना चाहिए, उतना नहीं मिल पाता क्योंकि उसे उन
विभागों के भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल पाती, जहाँ निरंतर
उसका काम पड़ता है.
विभिन्न सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार भारत की एक प्रमुख समस्या है. सरकारी तंत्र के इस दुर्गुण का भरपूर फायदा असामाजिक, दबंग तथा पैसे वाले लोग उठाते हैं. धीरे धीरे जनता को भी लगने लगा है कि भ्रष्टाचार प्रत्येक सरकार का अभिन्न हिस्सा है, और इसलिए कई बार लोग बेहद निराशा में कहते हैं “कोई नृप होय हमें क्या हानि”. बहुत से सरकारी कर्मचारियों सहित अन्य लोग जो स्वयं ईमानदार होते हैं, भ्रष्टाचार के चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनने की बजाय, बेहद मजबूरी में दान दक्षिणा देने को मजबूर हो जाते हैं. भ्रष्टाचार का यह तंत्र जब अपराध जगत से जुड़ जाता है, तो स्थितियां देश और समाज के लिए अत्यंत भयावह हो जाती है.
अगर उत्तरप्रदेश की बात करें तो यहाँ योगी सरकार का दूसरा कार्यकाल चल
रहा है. उनके कार्यकाल में उच्च स्तर पर कोई भ्रष्टाचार सामने नहीं आया. अपराधियों
के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति ने अपराधियों में भय उत्पन्न किया और इससे प्रदेश
की कानून व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार हुआ. महिलाएं और युवतियां बिना भय के घर से
बाहर निकलने लगी. प्रदेश साम्प्रदायिक वातावरण से भयमुक्त होकर दंगामुक्त हो गया.
धरना, प्रदर्शन और आंदोलन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुई क्षति की वसूली करने
की नीति के कारण सार्वजनिक संपत्तियों को होने वाला नुकसान भी लगभग बंद हो गया. इसलिए
स्वाभाविक रूप से वर्तमान परिस्थितियों में जनता ने सर्वोत्तम विकल्प के रूप में योगी को पुनः सत्ता में पहुंचाया लेकिन अभी भी
जनता सरकारी विभागों के भ्रष्टाचार और गैर पेशेवर कार्यशैली से बुरी तरह त्रस्त है.
इनमें कचहरी, तहसील, ब्लॉक, पुलिस थाना और रजिस्ट्री कार्यालय आदि प्रमुख हैं. अपराधी,
माफिया और बाहुबलियों के पुलिस तथा अन्य सरकारी विभागों से संबंध आज भी खतरनाक
स्तर पर बने हुए हैं.
बांदा जेल में बंद पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के भतीजे और प्रदेश
के चर्चित माफिया मुख्तार अंसारी के विधायक पुत्र अब्बास अंसारी को हाई सेक्युरिटी
जेल चित्रकूट में अधिकारियों की मिलीभगत से ऐशो आराम की सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा
रही थी. सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए अब्बास अंसारी की पत्नी लगभग रोज़ ही
अपने पति से 3-4 घंटे जेल के अन्दर “प्राइवेट रूम” में मिलती थी. जांच के अनुसार इसके
लिए जेल अधिकारियों, कर्मचारियों को भारी
भरकम धनराशि अदा की गई थी. जेल से ही
अब्बास फ़ोन करके लोगों को धमकाने और रंगदारी वसूल करने का कारोबार चलाता था. विडंबना
देखिए कि जिस पुलिस ने उसे पकड़ कर जेल में बंद किया, वही जेल से ही उसे अपराधिक
गतिविधिया चलाने के लिए सभी सुविधाएँ उपलब्ध करा रही थी. पुलिस की कार्यशैली देखिए
कि पिता-पुत्र को पास पास की जेलों में बंद किया, शायद इसलिए कि मिलने आने वालों
को कोई समस्या न हो? मामले का भंडाफोड़ होने के बाद अब्बास अंसारी को अन्य जेल में स्थान्तरित
कर दिया गया और उसकी पत्नी को गिरफ्तार करके उसी चित्रकूट जेल में रखा गया, जहाँ
उसने जेल कर्मचारियों से संपर्क बनाकर अपने पति के लिए सुविधाएँ जुटाने का कार्य
किया था.
दूसरा मामला एक
अन्य माफिया अतीक अहमद का है जो इस समय
गुजरात की एक जेल में बंद है. पुलिस रिपोर्ट के अनुसार उसके इशारे पर बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के
मुख्य गवाह उमेश पाल की दिनदहाड़े गोलियां और बम मारकर हत्या कर दी गई. पुलिस की
प्रारंभिक रिपोर्ट से पता चलता है कि अतीक अहमद ने गुजरात की जेल से वीडियो
कॉन्फ्रेन्सिंग के माध्यम से अपनी पत्नी और गिरोह के अन्य सदस्यों से बात करके
हत्याकांड की योजना बनाई थी. गुजरात में भी अतीक को जेल में विडियो कॉन्फ़्रेंसिंग की
सुविधा उपलब्ध हो जाती है. गुजरात में भाजपा पांचवीं बार सत्ता में आई है लेकिन
सिस्टम अभी भी पूरी तरह से बदल नहीं पाया है.
ये दोनों मामले यह रेखांकित करने के लिए
पर्याप्त हैं कि योगी सरकार में भी पुराना सिस्टम अभी भी काम कर रहा है. अपराधियों
के लिए बुलडोजर का अभिनव प्रयोग करने वाले योगी के कार्य को देश में बहुत सराहना
मिली और इस कारण देश विदेश में उन्हें बुलडोजर बाबा के नाम से जाना जाता है. उनकी
बुल्डोजर सफलता के कारण अन्य राज्यों में भी बुलडोजर का प्रयोग प्रारम्भ हो गया है.
शुरू में बुलडोजर का बहुत अधिक विरोध हुआ था. इसे गैर कानूनी बताकर मामला उच्च
न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय तक गया, जहाँ प्रदेश सरकार यह सिद्ध करने में सफल रही
कि बुलडोजर केवल अवैध और गैरकानूनी निर्माण पर चलाए जाते हैं जिसके लिए अतीत में
नोटिस भी जारी किये जा चुके हैं. इसके बाद बुल्डोजर के विरोध में विपक्षी दलों
द्वारा बयान तो दिए जाते हैं लेकिन कोई न्यायालय जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता.
यक्ष प्रश्न यह है कि प्रदेश में कितने अवैध और गैर कानूनी निर्माण है? कितनी सरकारी संपत्तियों पर माफियाओं और अपराधियों का कब्जा है? आज की तारीख में सरकार के पास शायद इस तरह का कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं होगा क्योंकि इसे कभी महत्वपूर्ण समझा ही नहीं गया. एक अनुमान के अनुसार शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहाँ अवैध और गैरकानूनी निर्माण न किये गए हो और सरकारी सम्पत्तियों सहित अन्य व्यक्तियों की निजी संपत्तियों पर कब्जे न किए गये हों. इनकी संख्या बहुत अधिक है. जिम्मेदार सरकारी अधिकारी और कर्मचारी पैसा ऐंठकर बड़ी आसानी से बचकर निकल जाते हैं. यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. प्रदेश में न जाने कितने ऐसे लोग हैं जिनकी निजी जमीनों, मकानों और संपत्तियों पर अपराधियों / माफियाओं का आज भी कब्जा है. लोग सरकारी विभागों के चक्कर लगा कर थक जाते हैं लेकिन वांछित कार्रवाई नही होती. अनेक मामले न्यायालयों में लंबित है जिनके निपटारे की संभावना निकट भविष्य में नहीं है.
प्रदेश में
कितनी ही ऐसी संपत्तियां हैं जिन्हें अतीत में सरकारी संरक्षण में अपराधी और भूमाफियाओं
ने हड़प लिया था. कानपुर में देहली सुजानपुर योजना के अंतर्गत भारतीय स्टेट बैंक के
अधिकारियों की हाउसिंग सोसाइटी के लगभग ₹300
करोड़ मूल्य के 200 से भी अधिक भूखंडों पर एक
राजनैतिक दल से संबंध रखने वाले माफिया का आज भी कब्जा है. ये अधिकारी संबंधित
विभागों से लेकर सचिवालय तक चक्कर लगा लगा कर थक चुके हैं. इन्हें अपने जीवनकाल
में भूखंड वापस मिलने की आशा क्षीण हो चुकी है. पिछली सरकारों में अधिकारियों ने
माफियाओं को कब्जा करने में सहयोग दिया था लेकिन आज सरकार बदलने के इतने साल बाद
भी ये अधिकारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसी माफिया का समर्थन कर रहे हैं, जो
हैरान करने वाली बात है. यह भू माफियाओं
और अधिकारियों के गठजोड़ की निरंतरता को रेखांकित करता है. यह तो सिर्फ एक उदाहरण
है, न जाने कितने ऐसे मामले होंगे.
किसी बड़ी वारदात
के बाद सरकारी अधिकारी अपराधियों के अवैध
और गैरकानूनी निर्माण तथा कब्जा की गई संपत्तियों की तुरंत पहचान कर लेते हैं और
उन पर बुलडोजर चलता है, जो सर्वथा उचित है लेकिन वे कौन हैं जिन्होंने अवैध
निर्माण और कब्जे होने दिए? अधिकारी नियमित रूप से अवैध निर्माण ओर कब्जा के
विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं करते? इसका भी कारण यही है कि सरकारी सिस्टम कमोबेश आज
भी वैसा ही काम कर रहा है, जैसा पहले कर रहा था.
ऐसा नहीं है की
सिस्टम बदला नहीं जा सकता. एक समय था जब पासपोर्ट बनवाना टेढ़ी खीर थी लेकिन आज
बिना विलम्ब और बिना भ्रष्टाचार के बहुत आसानी से पासपोर्ट बन जाता है. इस तरह का सिस्टम
संपत्तियों की खरीद फरोख्त के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस में बड़ी आसानी से लागू किया जा
सकता है. परिवहन विभाग, पुलिस थाना, तहसील, कचहरी, चकबंदी आदि जहां पुराना सिस्टम आज
भी संस्थागत रूप में काम कर रहा है, में भी नवाचार और आउटसोर्सिंग से बहुत सारी
समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है.
फ़िल्म ‘द कश्मीर
फाइल्स’ का एक संवाद “सरकार उनकी है, लेकिन
सिस्टम हमारा है” बहुत प्रासंगिक है. अगर सरकार बदली है, तो सिस्टम भी बदलना ही
चाहिए. अब समय आ गया है कि योगी जी को इस पुराने सिस्टम पर भी प्रहार करना चाहिए
ताकि आम जनता को दिन प्रतिदिन होने वाली मुसीबतों से छुटकारा मिल सके और प्रदेश
रामराज्य की ओर तेजी से बढ़ सके.
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_ शिव मिश्रा
शनिवार, 18 मार्च 2023
भाजपा के शुभ रत्न राहुल गांधी
भाजपा के शुभ रत्न राहुल गांधी
राहुल गाँधी विदेशी भूमि पर भारत के लोकतंत्र की दुर्दशा पर आंसू बहाकर और अमेरिका तथा पश्चिमी देशो से भारतीय राजनीति में दखल देने की गुहार लगा कर वापस उसी संसद में पहुंचे, जहाँ वे स्वयं भी लोकतांत्रिक पद्धति से चुनकर पहुँचे थे और जहाँ कांग्रेस सहित सभी विपक्षी सांसद उनके बयानों को न्यायोचित ठहराने के लिए लोकतंत्र की मर्यादा को तार तार कर रहे थे. इससे संभवतः कोई भी असहमत नहीं होगा कि राहुल गाँधी विदेशी भूमि पर जितनी बेशर्मी से भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय संस्कृति का अपमान करते है, स्वतंत्र भारत के इतिहास में इसका उदाहरण मिलना मुश्किल है. संसद में जहाँ सत्तापक्ष राहुल गाँधी द्वारा माफी मांगने पर अड़ा हुआ है, वही भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई के भय से काँपता विपक्ष एक दूसरे की बाहं थामे, राहुल की माफी के विरोध को तिनके का सहारा समझकर लटक गया हैं.
भारत में विपक्ष वैसे एकजुट भले ही न होता लेकिन केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई के विरोध में सब एक दूसरे को भ्रष्टाचार को राजनीतिक उत्पीड़न बताकर ढांकने में सहायता कर रहे हैं. पहले के विपक्ष और आज के विपक्ष के विरोध का यह उल्लेखनीय अंतर है. आज विपक्ष के पास मोदी सरकार के विरुद्ध भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए विपक्ष अडानी और अंबानी को मोदी के साथ जोड़ने की कोशिश करता है. राहुल के मोबाइल में पेगेसिस नहीं, दिमाग में अडानी मलवेयर इंस्टाल हो गया है, इसलिए ऐसा कोई भाषण नहीं होता जिसमें अडानी का जिक्र न हो. जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है लेकिन ज्यादातर लोग अभी नहीं भूले होंगे कि कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में तो भ्रष्टाचार की अति हो गई थी. नित नए घोटाले सामने आते थे, और सरकार के समूचे कार्यकाल में भ्रष्टाचार की राशि अरबों रुपए में थी. शायद ही ऐसा कोई मंत्रालय रहा हो जिस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप ना लगे हो. जांच के उपरांत वित्त मंत्री / गृहमंत्री सहित कई केंद्रीय मंत्रियों को जेल हुई, कई जमानत पर हैं और अनेक आज भी जांच का सामना कर रहे हैं. स्वयं राहुल और सोनिया नेशनल हेराल्ड - यंग इंडिया मामले में जमानत पर चल रहे हैं.
मैं हमेशा लिखता आया हूँ और मेरा निश्चित मत है कि भारत में राजनीति बहुत बड़ा उद्योग है अन्य देशों के तुलना में भारत में राजनीति समाज सेवा नहीं, सबसे फायदेमंद परंपरागत पारिवारिक उद्योग है. इसलिए ज्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय दलों की बाढ़ आ गई है और वे किसी भी कीमत पर सत्ता पर काबिज होने का उपक्रम करते हैं और प्राप्त भी करते हैं. स्वार्थ सिद्धि में लगे ऐसे राजनीतिक दल पारिवारिक उद्योग के अलावा और कुछ नहीं, जिन्होंने परंपरागत ढंग से अगली पीढ़ी को सत्ता हस्तांतरण भी शुरू कर दिया है.
स्वतंत्रता के बाद बड़ी आसानी से सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण और जाति आधारित वोट बैंक का ऐसा राजनैतिक ताना बाना बुना जिसके चलते भ्रष्टाचार कभी मुद्दा नहीं बना. सामाजिक, आर्थिक विकास और गरीबी उन्मूलन जैसे मुद्दें केवल आकर्षक राजनीतिक नारों तक सीमित रहे. संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग और लोकतंत्र पर अधिनायकवाद की छाया इतनी प्रबल रही कि विपक्ष हमेशा हाशिए पर रहा. विपक्ष तभी एकजुट हो सका जब कांग्रेस ने भारत के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया और आपातकाल लगा कर सामान्य जनता पर ज्यादितियों की पराकाष्ठा पार कर दी.
राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ जैसे देश व्यापी और देश के सबसे बड़े गैर राजनीतिक संगठन और उसके अनुशासित तथा प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की बहुत बड़ी संख्या के बावजूद, उसकी अनुषांगिक और एकमात्र दक्षिण पंथी राजनीतिक दल (भाजपा) को अपने बलबूते केन्द्रीय सत्ता में पहुंचने में 67 साल लग गए. 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश ने अलग राजनैतिक संस्कृति और विकासोन्मुख योजनाएं देखी और सरकारी योजनाओं का फायदा जरूरतमंद तक बिना भ्रष्टाचार और बिचौलिए के पहुँचते देखा. लोगों का सरकार के प्रति नया दृष्टिकोण बना और उन्होंने राजनीति को अलग ढंग से देखना शुरू किया. इसमे सोशल मीडिया ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई. इस सबके बीच कांग्रेस लगातार कमजोर होकर पृष्ठभूमि में गिरती गयी. कांग्रेस की इस दुर्गति के लिए गाँधी परिवार और उसकी स्वार्थपूर्ण नीतियां जिम्मेदार हैं, जिसे वह न तो समझने के लिए तैयार है और न हीं खुद को बदलने के लिए. इसलिए उसके लिए स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं लेकिन आज भी उसे लगता है कि कांग्रेस के अलावा और किसी भी राजनीतिक दल को देश पर शासन करने का अधिकार नहीं है.
पूर्ण बहुमत प्राप्त करनेवाली मोदी सरकार लगातार अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करने जा रही है, इससे केवल कांग्रेस ही नहीं, वे सभी राजनीतिक दल और संगठन भी परेशान हैं जिन्हें कांग्रेस के शासनकाल में देश को लूटने सहित, कुछ भी करने की छूट थी. इसलिए ये सभी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठन कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने में बहुत बड़ी भूमिका निर्वहन करते थे. अब उनकी दुकानें बंद हो गई है. स्वाभाविक है कि मोदी सरकार के विरुद्ध सभी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय गिरोह एकजुट हो गए हैं और वे आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव में किसी भी कीमत पर मोदी सरकार की वापसी नहीं होने देना चाहते हैं. इसके लिए सभी आपसी समन्वय के साथ मोदी सरकार को घेरने के लिए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरह तरह के के उपक्रम कर रहे हैं ताकि न केवल मोदी की बल्कि भारत की भी छवि खराब हो और चुनाव के पहले देश का माहौल इतना विषाक्त कर दिया जाए कि जनता में मोदी के प्रति संदेह बढे और वह मोदी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दें.
पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घट रही घटनाओं पर अगर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि चाहे शाहीनबाग जमावड़ा हो, किसान आंदोलन हो, बीबीसी डॉक्यूमेंट्री हो, हिंडनबर्ग की रिपोर्ट हो, या जॉर्ज सोरोस का भारत के विरुद्ध बयान हो, सबका उद्देश्य एक ही है. अडानी और अंबानी राहुल का हिंडनवर्ग की रिपोर्ट बिना पढ़े ही कोई बता सकता है कि वह राहुल गाँधी के एजेंडे को ही आगे बढ़ाने का प्रयास है. राहुल की भारत जोड़ों यात्रा का उद्देश्य भी वही है, और संवैधानिक मर्यादाओं के अंतर्गत लोकतांत्रिक रूप से सरकार का विरोध करने में कुछ भी अनुचित नहीं है लेकिन अगर भारत भारत जोड़ों यात्रा के सह यात्रियों की सूची देखी जाए तो उसमें कई ऐसे कुख्यात नाम मिलेंगे जिनका राष्ट्र विरोधी कार्यों में लिप्त होने का लम्बा इतिहास है. आखिर जॉर्ज सोरेस के कर्मचारी सलिल शेट्टी, राष्ट्रविरोधी आंदोलनों के खलनायक योगेन्द्र यादव, मेधा पाटेकर जैसे अनेक कुख्यात व्यक्तियों और अलगाववादियों का भारत जोड़ों से क्या संबंध हो सकता है.
राहुल गाँधी अपनी विदेश यात्राओ के कारण हमेशा से सुर्खियों में रहते आए हैं लेकिन अबकी बार कारण पूरी तरह से अलग है क्योंकि उन्होंने विदेशी भूमि पर भारत की राष्ट्रीय गरिमा को ठेस पहुंचाई, सेना का अपमान किया, कश्मीरी अलगाववादियों की तरफदारी की, तुष्टिकरण को आगे बढ़ाते हुए मोदी को अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का जिम्मेदार ठहराया. एक तरह से उन्होंने पूरी दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि मोदी के शासनकाल में, संविधान और लोकतंत्र सब कुछ नष्ट हो गया है. अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किए जा रहे हैं, राजनीतिक व्यक्तियों का उत्पीड़न किया जा रहा है. सुरक्षा बलों द्वारा कश्मीर में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया जा रहा है. भारत का बच्चा बच्चा राहुल को जानता है और इसलिए देश में उन्हें कोई गंभीरता से नहीं लेता लेकिन विदेशों में उनकी मानसिकता को कोई नहीं समझता, इसलिए मामला अत्यधिक गंभीर हो जाता है.
केजरीवाल के शिक्षा मंत्री सतेंद्र जैन मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में लंबे समय से जेल में हैं. शराब घोटाले में अब उनके उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी सलाखों के पीछे पहुँच गए हैं. जांच की आंच तेलंगाना की सत्तारूढ़ पार्टी भारत राष्ट्र समिति तक पहुँच गई है और मुख्यमंत्री चन्द्र शेखर राव की बेटी को प्रवर्तन निदेशालय ने समन किया है. दक्षिण शराब लॉबी के कई शराब माफिया गिरफ्तार हो चूके हैं. पश्चिम बंगाल में कई बड़े घोटाले सामने आ चूके हैं, और तृणमूल सरकार के कई नेता और मंत्री जेल में हैं और अनेक जांच का सामना कर रहे हैं. चारा घोटाले के बाद, रेल मंत्री के रूप में नौकरियों के घोटाले में बुरी तरह फंसे लालू यादव से केन्द्रीय जांच ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय पूछ्ताछ कर रहा है. अस्वस्थता के कारण उनको जमानत मिल गई है. ऐसे में भ्रष्टाचार में फंसे सभी राजनैतिक दलों और नेताओं को केन्द्रीय जांच एजेंसियों ने एक दूसरे का हाथ थामने के लिए मजबूर कर दिया है और इसी मजबूरी में ये सभी राहुल के विवादास्पद बयानों का बचाव कर रहे हैं ताकि यह संदेश दिया जा सके कि मोदी सरकार विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित कर रही है.
कांग्रेस पार्टी की सबसे बड़ी मुसीबत स्वयं गाँधी परिवार है, जिसे कोई कांग्रेसी स्वीकार नहीं करना चाहता और इसलिए उन्हें अभी भी राहुल गाँधी में देश का तो नहीं, अपना भविष्य जरूर दिखाई पड़ता है. यही कारण है कि कांग्रेस के कई विद्वान प्रवृत्ति के नेता भी आंख बंद करके राहुल के बयानों का बचाव ही नहीं करते, उनकी हाँ में हाँ भी मिलाते हैं.
राहुल के बचाव में अब कई विपक्षी पार्टियां भी आ गई है. इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों का भविष्य भी दांव पर लग जाएगा क्योंकि राहुल गाँधी के रूप में भारतीय जनता पार्टी को एक ऐसा रत्न प्राप्त हो गया है, जो कभी भी भारतीय जनता पार्टी को चुनाव हारने नहीं देगा.
इसलिए 2024 के चुनाव की तस्वीर धीरे धीरे साफ हो रही है और मोदी की एक और जीत का आगाज अवश्यंभावी होता जा रहा है.
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
रविवार, 12 मार्च 2023
यूपीआई, शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता, बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण
यूपीआई , शुल्क और राजनीति: डिजिटल संप्रभुता , बाज़ार की हकीकत और कूटनीति का त्रिकोण — शिव प्रकाश मिश्रा ...
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