रविवार, 8 जनवरी 2023

कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार

 

कब रुकेगा हिन्दू नरसंहार



जम्मू कश्मीर में रजौरी के पास डांगरी गांव में 4 हिंदुओं की हत्या के बाद दूसरे दिन भी घर के बाहर फिट की गई आईईडी द्वारा विस्फोट किया गया जिसमें 2 बच्चों की मृत्यु हुई और अनेक घायल हुए. आतंकवादियों ने घरों में आधार कार्ड देख कर और यह सुनिश्चित करके कि वे  हिंदू हैं, उनकी हत्या की. हिंदुओं को लक्ष्य करके की जा रही हत्याएं काफी समय से हो रही हैं. स्कूल शिक्षिका, बैंक मैनेजर, राज्य कर्मचारियों सहित अनेक हिंदुओं की हत्याये की जा चुकी हैं. राज्य के हिंदू भयाक्रांत हैं और उन्होंने खुलकर कहना शुरू कर दिया  है कि 1990 का दौर फिर शुरू हो गया है. इसके पहले भी कई कर्मचारियों की हत्याएं हो चुकी हैं और इसके बाद सरकार ने प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू कर्मचारियों को जम्मू संभाग में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया, जो किसी भी हालत में समस्या का समाधान नहीं हो सकता.

आश्चर्य की बात है कि जब केंद्र सरकार पूरी दुनिया को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि घाटी में सब कुछ सामान्य हो चुका है और घाटी में कश्मीरी पंडितों की वापसी की जा रही है, ऐसे में एक बार फिर हिन्दुओं का पलायन शुरू हो जाना यह रेखांकित करता है कि सरकार शायद समस्या की जड़ पर प्रहार करने से कतरा रही है अन्यथा कश्मीरी पंडितों और अन्य विस्थापित हिंदुओं द्वारा दिए गए सुझाव पर सरकार अवश्य ध्यान देती.

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में आज भी मुसलमानों को अल्पसंख्यकों की सारी सुविधाएं दी जा रही हैं और हिंदू आबादी को समस्याओं का बंधक बनाकर रखा गया है. सरकार से हताश होकर ही पहले भी हिंदू आबादी  ने घाटी से पलायन किया था और अब पलायन की आग जम्मू तक आ पहुंची है. वैसे तो आजादी के समय ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने इस राज्य को व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर एक चरमपंथी पाकिस्तान समर्थक के हवाले कर दिया था जिसने पाकिस्तान की सहायता से जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की भी कोशिश की और पाकिस्तान के साथ मिलाने की भी. जिसकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी ने भी उसी कार्य को आगे बढ़ाया और भारत सरकार के तमाम संसाधनों पर ऐशो आराम की जिंदगी जीते हुए कभी भी हृदय से अपने आप को भारतीय स्वीकार नहीं किया. धारा 370 खत्म होने के बाद उनके वित्तीय स्रोतों पर कुछ असर जरूर पड़ा लेकिन भारत सरकार से की गई लूट उनकी कई पीढ़ियों के लिए पर्याप्त है. आज ये बयान दे रहे हैं कि हत्यायें तब तक नहीं रुकेगी जब तक कश्मीर के साथ इंसाफ नहीं होता. हाल में हुए हिंदू नरसंहार को भी उन्होंने देश में फैलाये जा रहे मुस्लिम विरोधी नफरत के माहौल का परिणाम बताया. यह अलग बात है कि 1990 में जब घाटी में हिंदूओं का वीभत्स नरसंहार हुआ था और जिसके बाद बड़े पैमाने पर हिंदुओं का पलायन हुआ, उस समय वह राज्य के मुख्यमंत्री थे. उस समय केंद्र में भाजपा की सरकार भी नहीं थी तो नफरत का माहौल भी नहीं रहा होगा. पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने भी घाटी में हो रही हत्याओं का कारण पूरे देश में मुस्लिमों के विरुद्ध बनाए जा रहे माहौल को बताया. 

जम्मू कश्मीर में हिन्दू के विरुद्ध आतंकवाद को मुस्लिम नेताओं द्वारा   प्रायः कुछ भटके हुए मुस्लिम युवकों की कार्यवाही बताया जाता है और साथ में यह भी जोड़ दिया जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. दुर्भाग्य से उनके इस झूठे कथन को ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलता है. इस तरह से समस्या के कारणों को बड़ी आसानी से दबा दिया जाता है. जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने  बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में  लगभग इसी स्वर में कहा कि "ये सच है कि कुछ कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाते हुए हमले हुए हैं मगर कुछ और लोगों पर भी हुए हैं और आतंकवादी हमलों को किसी धर्म के चश्मे से नहीं देखना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि अगर देखेंगे तो कश्मीरी मुसलमानों की भी जान गई है और वह संख्या ज़्यादा ही होगी कम नहीं. दूसरी बात ये कि यहाँ सड़कों पर 125-150 निर्दोष लोग मारे जाते थे, यहाँ पिछले तीन सालों में एक भी व्यक्ति सुरक्षा बलों की गोलियों से नहीं मारा गया है. ये सामान्य बात नहीं है." उनके इस वक्त विषय सरकार की मन: स्थिति  समझी जा सकती है.  इस तरह के मन, वचन और आधे अधूरे प्रयासों से हिंदुओं का नरसंहार कभी रुकेगा, इसकी कल्पना करना मुश्किल है. 

अतीत में आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में राज्य की ग्राम रक्षा समितियों ( वीडीजी) ने बहुत अच्छा कार्य किया था और इस कारण आतंकी वारदातों पर काफी हद तक रोक लगी थी. इस योजना के अंतर्गत समितियों के सदस्यों को हथियार उपलब्ध कराए गए थे. कुछ समय पहले ही रजौरी में इन समितियों के विरोध के बाद भी जिला प्रशासन ने उनके हथियार वापस ले लिये थे जिसकी जांच तो आवश्यक है ही, साथ ही ग्राम रक्षा समितियों को अधिक से अधिक हथियार तुरंत उपलब्ध कराए जाने चाहिए जिससे ग्रामीणों में न केवल सुरक्षा की भावना कर कर सके बल्कि लोग आतंकवादियों के विरुद्ध खड़े हो सके.

धारा 370 खत्म करने के बाद जब जम्मू कश्मीर का विभाजन दो केंद्र शासित प्रदेशों में किया गया था तब भी मेरा  मत था कि कश्मीर और जम्मू को भी दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना देने चाहिए थे ताकि घाटी में हो रहे आतंकवाद और नरसंहार की आग से कम से कम जम्मू को बचाया जा सके. जम्मू के लोगों को  राज्य के डीलिमिटेशन से भी काफी उम्मीदें थी कि शायद  जम्मू संभाग में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ जाएगी या फिर  पाक अधिकृत कश्मीर के लिए खाली 23 विधानसभा सीटों को जम्मू संभाग में जोड़ दिया जाएगा. जिससे राज्य की सत्ता में जम्मू की हिस्सेदारी बढ़ जाएगी और राज्य अलगाववाद तथा पाकिस्तान समर्थक राजनीतिक धंधेबाजों  के चंगुल से निकल सकेगा. केंद्र सरकार ने न केवल एक सुनहरा अवसर खो दिया बल्कि जम्मू के राष्ट्रवादियों को भी निराश किया.

जम्मू में सरकारी भूमि और तवी नदी के रिवर बेड पर बांग्लादेशियों और रोहिंग्या घुसपैठियों को अनधिकृत किंतु योजनाबद्ध ढंग से, खासतौर से सैन्य प्रतिष्ठानों के आसपास बसाये जाने को भी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया है. यह सब अनायास नहीं हुआ यह एक बड़े षड्यंत्र का छोटा सा हिस्सा है जिसके द्वारा जम्मू का भी जनसांख्यिकी बदले जाने का प्रयास किया गया है.

छद्म धर्मनिरपेक्षता की बीमारी से ग्रस्त ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि आतंकवादी सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन  इस प्रश्न का उत्तर जानते हुए भी देने से कतराते हैं कि आखिरकार इन आतंकवादियों का उद्देश्य क्या है? और इन्हें स्थानीय मुस्लिम राजनेताओं का संरक्षण और देश  के अन्य मुस्लिम राजनेताओं व धर्म गुरुओं का समर्थन क्यों हासिल होता है? इसका स्पष्ट उत्तर है - गजवा ए हिंद, जिसके द्वारा केवल  भारत ही नहीं बल्कि पूरे हिमालय क्षेत्र का इस्लामीकरण करना है ताकि इसके बाद पूरी दुनिया पर इस्लामिक शासन के सपने को साकार किया जा सके.

आजादी के समय मुस्लिमों का एक वर्ग भारत विभाजन द्वारा एक अलग देश की मांग कर रहा था जबकि दूसरा वर्ग चाहता था कि वह भारत में रहकर ही जिहाद के माध्यम से गजवा ए हिंद की संकल्पना को साकार कर सकें. भारत विभाजन में देवबंद और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका थी, जो आज भी किसी ने किसी तरह से गजवा ए हिंद का केंद्र बिंदु बने हुए हैं, और सरकार असहाय है. इस्लामिक ठेकेदार अरब देशों का मानना है कि बिना गजवा ए हिंद  के पूरी दुनिया पर इस्लाम का शासन संभव नहीं है क्योंकि उनके पास पैसा तो है लेकिन पानी और उर्वरक भूमि नहीं है, जो भारतीय उपमहाद्वीप के इस्लामीकरण से ही प्राप्त हो सकती है और इससे प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों और धर्मान्तरित हुए मानव संसाधनों को आतंकवाद की विभीषिका में झोंक कर इस्लामिक विश्व विजय का सपना साकार किया जा सकता है.  कुछ हिंदुओं सहित भारतीय मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का इस परियोजना को समर्थन प्राप्त है. "सबका साथ और सबका विश्वास" की धुन में केंद्र सरकार भी इस कड़वी सच्चाई को अनदेखा कर रही है. आजादी के बाद इन 75 सालों में भारत की जनसंख्यकी किस तरह से बदली है और पूरे भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किस तरह हुआ है, यह भारत के उन सभी राष्ट्र वादियों के लिए जो भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति को बचाना चाहते हैं, एक गंभीर चेतावनी है. 

जम्मू कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बन जाने के कारण राज्य कर्मचारी, केंद्र शासित प्रदेशों के कैडर में शामिल हो गए हैं लेकिन सरकार ने व्यापक रूप से राज्य कर्मचारियों को अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में स्थानांतरित नहीं किया है. राज्य का पुलिस विभाग भी  उसमें से एक है, जिसमें अलगाववाद के प्रति हमदर्दी रखने और उन्हें समर्थन करने वालों की बड़ी संख्या है, जिसकी संदिग्ध भूमिका भी कई घटनाओं के लिए जिम्मेदार होती है. अन्य विभागों में भी ऐसी ही स्थिति है. इसलिए केंद्र सरकार को  अधिक से अधिक कर्मचारियों का अनिवार्य रूप से अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में  स्थानांतरण किया जाना चाहिए. राज्य में खासतौर से घाटी में, पूर्व सैनिकों की बस्तियां बसाने का कार्य किया जाना चाहिए और उन्हें हथियार उपलब्ध कराए जाने चाहिए. 

केंद्र सरकार को कम से कम जम्मू कश्मीर में खुले मन से कार्य करके पूरे भारत में लोगों को संदेश देना चाहिए कि वह पृथ्वी पर जन्मी  देश की इस प्राचीन सभ्यता को बचाने के लिए कृत संकल्प है. सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर में सनातन संस्कृति को बचाने के प्रयास और उनकी सफलता ही भारत में इस संस्कृति के भविष्य का निर्धारण करेंगे, यह बात मोदी जी को अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए.

-     शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)    



   

शनिवार, 31 दिसंबर 2022

भारत का विकृत इतिहास

 भारत का विकृत इतिहास

भारत का इतिहास इतना तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया है कि सच्चाई को लगभग छिपा देने का प्रयास हुआ है और यह बात किसी से छिपी नहीं है. दिल्ली में  वीर बाल दिवस के अवसर पर आयोजित एक समारोह में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस बात को एक बार फिर दोहराया कि भारत में इतिहास के रूप में हमें षड्यंत्र पूर्वक गढ़ा गया विमर्श पढ़ाया गया है. भारतीय संस्कृति की महान उपलब्धियों को छुपाया गया और राष्ट्रीय नायकों के अनुकरणीय और प्रेरणादायक योगदान को अनदेखा किया गया और आक्रान्ताओं को महिमामंडित किया गया. हिंदू और राष्ट्र विरोधी शक्तियों ने यह सब जानबूझकर इसलिए किया ताकि हिंदू समाज कभी भी अपनी संस्कृति, धर्म, पूर्वजों की महान विरासत और उल्लेखनीय उपलब्धियों पर गौरवान्वित न हो सके.

वीर बाल दिवस, जिसका आयोजन गुरु गोविंद सिंह के दो साहिब जादों के प्रेरणादायक बलिदान को स्मरण करने और भावी पीढ़ियों को उनके अदम्य साहस, और धर्म के प्रति समर्पण की भावना से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए आयोजित किया गया है, स्वयं एक ऐसा उदाहरण है जिसे स्वतंत्रता के 75 साल बाद गैर कांग्रेसी सरकार के समय सार्वजनिक किया जा सका. इतने बड़े बलिदान और अदम्य साहस की कहानी को न तो इतिहास में सम्मानजनक जगह  मिल सकी और ना ही सरकार ने अपने स्तर से कभी भावी पीढ़ियों को इससे प्रेरणा लेने के लिए पाठ्यक्रमों में शामिल किया.

क्रूर और बहसी मुगल शासक औरंगजेब ने हिंदुओं और सनातन संस्कृति में विश्वास करने वाले लोगों का जितना धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न किया, ऐसा उदाहरण संसार में कहीं नहीं मिलता. क्रूर हत्यारे औरंगजेब ने सबक सिखाने के उद्देश्य गुरु गोविंद सिंह के दो पुत्रों जोरावर सिंह और फतेह सिंह, जिनकी उम्र 6 और 9 वर्ष थी, को इस्लाम धर्म स्वीकार करने के लिए डराया और उनके इनकार करने पर उन्हें दीवाल में जिंदा चुनवा दिया. इतनी छोटी उम्र में जान देकर भी धर्म परिवर्तन से इंकार करने का साहस, निडरता और निर्भीकता, भावी पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय उदाहरण है जिसे जानबूझकर अनदेखा किया गया. आज सरकार की अनदेखी और सामाजिक पतन का यह स्तर आ  गया है कि 1 किलो चावल, 2 किलो गेहूं, के लिए  भी धर्म परिवर्तन हो जाता है. आज लव जिहाद राष्ट्रव्यापी अभियान बन चुका है.

इतिहास में झूठे विमर्श  गढ़े जाने का कारण  राष्ट्रीय जन मानस में विशेषतया हिंदुओं में हीन भावना उत्पन्न करना है, ताकि वे कभी स्वाभिमान से अपना सिर ऊंचा न कर सकें और उन्हें हमेशा इस बात का मानसिक तनाव रहे कि उन पर मुस्लिमों और अंग्रेजों ने शासन किया था क्योंकि वे कमतर हैं.  यह सनातन राष्ट्र अपनी गुलामी की मानसिकता से बाहर आकर विश्व को यह  कभी न बता सके कि वे इस पृथ्वी पर सबसे पुरानी सभ्यता हैं, तथा सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक धरातल पर वे विश्व में सर्वश्रेष्ठ थे, इसलिए विश्व गुरु थे. ज्ञान और विज्ञान की जिस पराकाष्ठा को इस सभ्यता ने हजारों वर्ष पहले पार कर लिया था, संपूर्ण विश्व को उसकी जानकारी कई हजार वर्ष बाद तक नहीं हो पाई थी. यह वही संस्कृति है, नालंदा में जिसके ज्ञान के भण्डार को अनपढ़, जाहिल और जंगली मुस्लिम आक्रांताओं ने आग  के हवाले किया था और दुर्लभ ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों को जलने में 6 से 7 माह लग गए थे.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ की दुरभि संधि  में शामिल होकर तथाकथित चाचा ने भारत की शिक्षा व्यवस्था, इतिहास और राष्ट्रीय गौरव को मौलाना आजाद के हवाले कर दिया था, जिन्होंने कुछ वामपंथी इतिहासकारों को खरीद कर वह सब कुछ लिखवा डाला जो मुस्लिम जगत को चाहिए था. इन गुलाम इतिहासकारों ने अकबर को महान, औरंगजेब को धर्मनिरपेक्ष और बाबर को लोकप्रिय शासक बना दिया. महाराणा प्रताप, शिवाजी जैसे वीरों  को लुटेरा बना दिया. चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्रांतिकारी वीरों  को आतंकवादी बना दिया. ये केवल कुछ उदाहरण है, भारत का पूरा इतिहास इस तरह के मनगढ़ंत झूठ का पुलिंदा है. अगर  स्वतंत्र इतिहासकारों की अत्यंत सीमित संख्या में पुस्तकें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध न होती, तो शायद हमें अपने पूर्वजों के बारे में  भी सच मालूम नहीं होता.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतिहास की इस विकृति  विसंगति के बारे में कई बार देश को सावधान किया है. गृहमंत्री अमित शाह और कई केंद्रीय मंत्री भी हमेशा यही बातें दोहराते रहते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साधारण प्रचारक से लेकर सरसंघचालक तक और उनकी सभी अनुषांगिक संगठन के पदाधिकारी प्रायः इतिहास में लिखे गए झूठ के बारे में बताते हैं. यह बहुत अच्छी बात है. सोशल मीडिया के इस युग में जनता बहुत जागरूक है और  उन सभी से पूरी तरह सहमत भी है.  जागरूक होता हिंदू जनमानस स्वत: स्फूर्ति से इतिहास की वास्तविक स्थिति का आदान प्रदान कर रहा है. छोटी कक्षाओं से स्नातकोत्तर की पाठ्य पुस्तकों में आज भी वही गलत इतिहास पढ़ाया जा रहा है. एनसीईआरटी और विश्वविद्यालयों की पुस्तकों में भी झूठ और मनगढ़ंत बातें आज भी बेरोकटोक चल रही हैं. स्वतंत्रता के 75 साल बाद देश के नौनिहाल झूठा और मनगढ़ंत इतिहास पढ़ रहे हैं और आत्मसात कर रहे हैं. यही इनका सच बन जाता है. ऐसी भावी पीढ़ियों से देश क्या अपेक्षा कर सकता है. 

प्रधानमंत्री मोदी की यह बात अत्यंत हृदयस्पर्शी है कि झूठे और गढे गए विमर्श को बदले जाने की आवश्यकता है. पूरा देश उनकी बात से सहमत हैं लेकिन यह कार्य करेगा कौन? यह कार्य किसी व्यक्ति  द्वारा नहीं सरकार द्वारा किया जाना है. इतिहास को परिमार्जित करना वर्तमान सरकार का उत्तरदायित्व ही नहीं, नैतिक धर्म भी है. भाजपा और उनके अनुषांगिक संगठन दशकों से इतिहास की इन विसंगतियों की तरफ जनता का ध्यान आकर्षित करते रहे हैं.  अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज भाजपाई नेताओं ने संसद में इस मुद्दे पर अनेक बार अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अपनी बातें रखीं. यह सब तब की बातें हैं जब भाजपा विपक्ष में थी. आज पिछले 8 वर्षों से  केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार है, लेकिन भाजपा के नेता आज भी उसी तरह से बात कर रहे हैं जैसे तब करते थे जब वह विपक्ष में थे. विश्व का इतिहास गवाह है कि 8 वर्ष का समय कम नहीं होता. इतने समय में कई देशों ने अपना इतिहास परमार्जित कर डाला, राष्ट्रीय अस्मिता पर कलंक के धब्बों को धो डाला, और जरूरत पड़ने पर संविधान भी बदल डाला और राष्ट्रहित के विरुद्ध काम करने वालों  को समझा डाला.  

ऐसा नहीं है कि इतिहास को कुरूपित और विकृत करने का कार्य सिर्फ भारत में किया गया. ऐसा हर उस देश में हुआ जो पराधीन था, लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन देशों ने जो काम सबसे पहले किया वह था अपनी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्थापित करना, इतिहास को परिमार्जित करना और गुलामी के कलंक धोना. दुर्भाग्य से भारत में स्वतंत्रता के बाद परतंत्रता की निशानियां और गुलामी के कलंक हटाना तो दूर की बात तत्कालीन सरकारों ने भारत के इतिहास को और अधिक विकृत और कलंकित करने का कार्य  किया. परतंत्रता की त्रासदी के जख्म, आक्रांताओं की  क्रूर और भयावह कार्यवाही के अवशेष, देश के मूल निवासियों पर किए गए अत्याचारों की दर्द भरी दास्तान और उसके  प्रमाण यहां वहां हर जगह पूरे देश में बिखरे पड़े हैं. पिछली सरकारों ने तो इन्हें सुरक्षित रखने के पुख्ता उपाय किए और भविष्य में भी इन्हें सजा सवांर कर रखने के लिए कानून बनाकर राष्ट्र के मूल निवासियों के पैर में बेड़ियां डाल दी. आज विश्व की इस प्राचीनतम सभ्यता के मूल निवासियों को यह अधिकार भी नहीं है कि वह अपने ऊपर की गई ज्यादितियों का प्रतिकार कर सकें, दासता के कलंकित कार्यों का  परिष्कार कर सकें और गुलामी के प्रतीक हटाकर स्वतंत्रता का एहसास कर सकें.

 

यह  दुखद है कि  पिछले 8 वर्षों में केंद्र सरकार ने इतिहास की इन  विसंगतियों, झूठे विमर्श, सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म को कलंकित करने वाले मनगढ़ंत कहानियोंराष्ट्रीय नायकों और महान विभूतियों की अनदेखी को न्यायोचित सुधारने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. केवल शिक्षा मंत्रियों को बदलने और शिक्षा नीति में बदलाव प्रस्तावित करने से ही इतिहास परिमार्जित नहीं हो जाया करता. जब स्मृति ईरानी शिक्षा मंत्री थी तब थोड़ा कार्य शुरू जरूर  हुआ था लेकिन दबाव में उनका मंत्रालय बदल गया और उसके बाद निशंक, जावड़ेकर और धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में इस संबंध में कोई प्रगति हुई हो ऐसा नहीं लगता.

क्या भारतीय इतिहास की इन विसंगतियों को अफगानिस्तान का तालिबान या पाकिस्तान ठीक करेगा? या भारत के उस वर्ग, जो  आक्रांताओं को अपना पूर्वज मानता है, से अपेक्षा की जा सकती है कि वह आगे आकर इतिहास का भूल सुधार करेगा

भारत के  विकृत और विसंगतियों भरे इतिहास का समय-समय पर उलाहना देना अगर भाजपा के लिए केवल एक नारा है, तब तो कुछ नहीं हो सकता, लेकिन यदि भाजपा गंभीर है तो उसे तत्काल इस संबंध में आवश्यक कदम उठाने चाहिए क्योंकि भारत में राष्ट्रीय जन जागरण का  अभियान आज जिस चरम पर है, यह काम मुश्किल नहीं है लेकिन इसमें अड़चन है भाजपा में इच्छाशक्ति की कमी.  अब तो 2024 के लोकसभा चुनाव की दुंदुभी बज चुकी  है, अगर अभी भी इसकी शुरुआत नहीं हो सकी तो मानना चाहिए कि इसकी शुरुआत कभी नहीं होगी और यह कार्य भी कभी पूर्ण नहीं होगा, विशेषकर तब जब भाजपा पर “सबका विश्वास” प्राप्त करने का दबाव या सनक सवार हो गई हो. 

~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~~~~~~







शनिवार, 24 दिसंबर 2022

लखनऊ में रोहिंग्या और बंगलादेशी

 

लखनऊ के घेरे हैं बंगलादेशी और रोहिंगिया

लखनऊ से प्रकाशित होने वाले एक राष्ट्रीय हिंदी समाचार पत्र ने लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों में बसी अवैध बस्तियों पर श्रृंखलाबद्ध ढंग से खोजी समाचार प्रकाशित किये. समाचार पत्र ने झुग्गी झोपड़ियों की अवैध बस्तियां बसाने वाले माफियाओं, पुलिस, संबंधित  विभागों और राजनेताओं की संलिप्तता और इन झुग्गी झोपड़ियां को  बसाए जाने के पीछे का अर्थतंत्र उजागर किया. कई दिन तक लगातार प्रकाशित होने वाले  इन समाचारों ने प्रमाण सहित बताया कि लखनऊ में ऐसा कोई  क्षेत्र नहीं, ऐसी कोई दिशा नहीं, जहाँ इस तरह की अवैध झुग्गी झोपड़ियों की बस्तियां न हो. सबसे चिंताजनक बात है कि इन झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाले बड़ी संख्या में अवैध रूप से भारत में प्रवेश करने वाले बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठये हैं, जिन्हें सरकारी भूमि पर बिजली पानी की सुविधा देकर आधार कार्ड तक उपलब्ध करा दिया गया है, ताकि उनके भारत के नागरिक होने में किसी को कोई संदेह न हों और सरकारी सुविधाएँ भी उन्हें उपलब्ध हो सकें. यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, राष्ट्र द्रोह है.

ऐसा नहीं है कि मामले का खुलासा सिर्फ समाचार पत्र द्वारा ही किया गया. इससे पहले स्थानीय निवासी बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की इन अवैध बस्तियों की शिकायत संबंधित विभागों से करते करते थक चुके हैं, लेकिन किसी भी विभाग के अधिकारी ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की. स्थानीय निवासियों ने मुख्यमंत्री की जनसुनवाई पोर्टल पर भी शिकायत की लेकिन उसका भी कोई असर नहीं हुआ. आश्चर्यजनक लग सकता है कि हजरतगंज में आईएएस अधिकारियों की कॉलोनी बटलर पैलेस और मंत्रियों के लिए बनी बहुखंडी इमारत के सामने भी बांग्लादेशियों की अवैध बस्ती है, जो उनकी सुरक्षा को भी गंभीर खतरा है लेकिन मंत्रियों और उच्च अधिकारियों का आँखें बंद करना या असहाय होना यही संदेश देता है कि उन सभी को देश की इतनी बड़ी गंभीर समस्या की कोई परवाह नहीं.  यही स्थिति  देश के हर बड़े शहर की है. कुछ राज्य सरकारों ने तो इन्हें बाकायदा अपना वोट बैंक भी बना लिया है .  

मुख्यमंत्री ने समाचार पत्र में छपी इन खबरों का संज्ञान लेते हुए तुरंत कार्रवाई का निर्देश दिया जिसका परिणाम हुआ की अब तक कई झुग्गी झोपड़ियों की बस्तियों को खाली कराया जा चुका है. प्रश्न उठता है कि पहले संबंधित विभागों ने यह कार्रवाई क्यों नहीं की. इसका सीधा और संक्षिप्त उत्तर है कि भारत में भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत स्वार्थ की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उच्च सरकारी अधिकारी और राजनेता भी स्वार्थ और लालच में राष्ट्रीय एकता और अखंडता को भी  ताक पर रख देते हैं. यह एक प्रमुख कारण है जिससे भारत और सनातन समाज आज इस अधोगति को प्राप्त हो चुका है, और इस कारण ही भविष्य में राष्ट्र की  स्थिति कितनी संकट पूर्ण होने वाली है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है.

इन झुग्गी झोपड़ियों से मासिक किराया, बिजली और पानी की कीमत की अवैध वसूली की जाती है.  यह सब करोड़ रुपयों का बहुत बड़ा खेल है, जिसे राष्ट्रीय हितों को अनदेखा कर भ्रष्ट अधिकारी और कर्मचारियों के सहयोग से कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा किया जा रहा है. इतनी बड़ी संख्या में झुग्गी झोपड़ियों में कटिया डालकर सप्लाई की जा रही बिजली और जलनिगम की पाइप लाइन काटकर दिए जा रहे पानी से संबंधित विभागों का कितना नुकसान हुआ है, इस पर कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई. यह कार्य बिना संबंधित विभाग के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिली भगत के नहीं हो सकता. आज के इस युग में जब बिजली कंपनिया बिजली चोरी रोकने के लिए आंतरिक वितरण के लिए भी मीटर लगाती हों, इतनी बड़ी बिजली चोरी इतने लम्बे समय से कैसे होती रह सकती है. नियमित कनेक्सन वालों को प्रीपेड और अवैध कनेक्शन पर आँखे बंद कर अवैध वसूली, यह अचंभित करने वाला नहीं है. भ्रष्टाचार और व्यक्तिगत स्वार्थ प्राय: राष्ट्रीय हितों की भी तिलांजलि दे देता है लेकिन इस पूरे खेल में बड़े  षड्यंत्र की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. सरकार को इस पर विस्तार जांच करवाने की आवश्यक्ता है. इसमें कोई संदेह नहीं कि नगर निगम, जल निगम और विकास प्राधिकरण के कर्मचारी पूरे शहर में व्यापक गस्त करते रहते हैं. आप कोई नया निर्माण शुरू करें तो पायेंगे कि विकास प्राधिकरण का कर्मचारी दूसरे दिन ही पहुँच जाएगा, यही हाल नगर निगम, जल निगम और बिजली विभाग का है. इनमें से अधिकांश का उद्देश्य कानून का पालन करवाना नहीं बल्कि कैसे कानून तोड़कर पैसे देकर कुछ भी किया जा सकता है,यह बताना होता है. पुलिस का मूक दर्शक बने रहना ही भ्रष्टाचार में उसकी संलिप्तता का सबसे बड़ा प्रमाण होता है, जो इस मामले में भी है.      

इतनी बड़ी संख्या में फर्जी आधार कार्ड बन जाना राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर ख़तरा है लेकिन इसकी कोई जांच भी शुरू नहीं हुई. सरकारी अधिकारी गंभीर मामलों की किस तरह अनदेखी  करते हैं इसका उदहारण हैं, कुछ संविदा कर्मचारियों की बर्खास्तगी और कुछ असामाजिक तत्वों की गिरफ्तारी, जिन्हें भी उनके संरक्षक शीघ्र ही जमानत दिलवा देंगे. इतनी बड़ी संख्या में अवैध झुग्गी झोपड़ियां बिना उच्च स्तरीय संरक्षण  के संभव नहीं है लेकिन आज तक किसी भी बड़े अधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही होना तो दूर स्पष्टीकरण भी नहीं लिया गया है. क्या यह संभव है कि सम्बंधित अधिकारियों ने, जो लखनऊ में ही रहते हैं, कभी आते जाते  बांग्लादेशियों और रोहिंगयाओं की इन झुग्गी झोपड़ियों को नहीं देखा होगा.

लखनऊ शहर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बसी  बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं की अवैध बस्तियों, और उनको दी जा रही सुविधाओं के खुलासे के बाद बुलडोजर बाबा के नाम से विख्यात योगी  की छवि को बहुत धक्का लगा है. पूरे देश में उनके प्रशंसक और समर्थक बेहद मायूस हैं जो उन्हें मोदी के बाद देश का प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि जब लखनऊ को भी बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं ने घेर रखा है, तो फिर दिल्ली की ऐसी स्थिति के लिए केजरीवाल को दोष कैसे दिया जा सकता है. भारत में यही स्थिति आज हर बड़े शहर की है.  

 यद्यपि मामला सुर्खियों में आने के बाद योगी ने सख्त रुख अपनाया और अधिकारियों को कार्रवाई करनी पड़ी लेकिन की गई कार्रवाई खाना पूर्ति या दिखावे के लिए ही की गई लगती है. उन जगहों को तो खाली करवा लिया गया है जहाँ झुग्गी झोपड़ियां डालकर बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को बसाया गया था लेकिन यक्ष प्रश्न है कि यहाँ से निकलकर ये बांग्लादेशी और रोहिंग्या कहाँ गए. स्वाभाविक है कि ये सब  म्यांमार या बांग्लादेश तो  नहीं लौट  जाएंगे.

जिन्हें विस्थापित किया गया है, उन्हें सर्दी के इस मौसम में बेसहारा न छोड़ा जाय, और उन्हें कहीं अन्यत्र बसाया जाय” मुख्यमंत्री योगी की  इस सहानभूति पूर्ण बयान का भी शातिर और भ्रष्ट सरकारी तंत्र अवश्य दुरूपयोग करेगा और इन सभी को  एक जगह से हटा कर दूसरी जगह बसा देगा. शायद योगी जी से यह बात छिपाई गयी है कि इनमे बड़ी संख्या बंगलादेशियों  और रोहिंगयाओं की है जिन्होंने अपना काम धंधा भी यहीं पर फैला रखा है. नगर निगम का सफाई ठेकेदार जिन लोगों से शहर की सफाई कराता है, उनमें ज्यादातर बांग्लादेशी और रोहिंग्या ही है, यह बात अधिकारियों को क्यों दिखाई नहीं पड़ती. कमोबेश यही हाल अन्य विभागों का भी है जहाँ ठेकेदारी व्यवस्था है. घरो से कूड़ा इकट्ठा करने वाले भी यही हैं.

आज हर गली मोहल्ले में ड्रग बड़ी आसानी से उपलब्ध हो रही है, उसका बहुत बड़ा कारण भी ये अवैध झुग्गी झोपड़ियां ही है जहाँ से इस पूरे ड्रग व्यापार का संचालन होता है. चोरी, छेड़खानी, अवैध शराब व ड्रग कारोबार सहित अन्य आपराधिक वारदातों में बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं का हाथ होता है, जो कानून और व्यवस्था के लिए बहुत बड़ी चुनौती है. उत्तर प्रदेश में कुछ बांग्लादेशियों को ह्यूमन ट्रैफिकिंग के मामले में भी पकड़ा गया था। कई बांग्लादेशियों द्वारा जिस्मफरोशी का कारोबार करने की भी बात सामने आ चुकी है। कई बड़ी चोरियों और हत्याओं में भी इन्हें पकड़ा जा चुका  है. विडम्बना देखिये कि जो अपराधी और घुसपैठिये  पुलिस राडार पर होने चाहिए थे, वे पुलिस संरक्षण में ही फलफूल रहे हैं.

योगी जी से मैं व्यक्तिगत रूप परिचित हूँ इसलिए विश्वाश है कि अगर उन्हें मामले की सच्चाई पता होती तो उनका रुख बेहद कड़ा होता और अब तक कई बड़े अधिकारियों के विरुद्ध भी सख्त कार्रवाई हो चुकी होती. योगी जी के पहले कार्यकाल में कई शातिर अधिकारियों और राजनेताओं के कारण ही सत्ता उनके हाथ से फिसलते फिसलते बची. दूसरे कार्यकाल में अधिकारियों ने उनके चारों तरफ़ ऐसी मजबूत घेराबंदी कर रखी है कि वास्तविक स्थित उनके पास तक या तो पहुँच ही नहीं पाती या बहुत देर से केवल आधी अधूरी जानकारी ही पहुंचती है.

अतीत में योगीजी को जिन कार्यों से पूरे देश में वाह वाही मिली थी, उनमें आज कई बेपटरी हो गए हैं. इनमें एक था मस्जिदों से लाउड स्पीकर हटाना. अधिकारियों ने आवाज कम करने के नाम पर इस पूरे कार्यक्रम की हवा निकाल दी और केवल आंकड़ों की बाजीगरी  करके उत्तर प्रदेश के इस कार्य को सुर्खियों में रखा, अब सब कुछ पहले जैसा है. एक दूसरा कार्य था मदरसों का सर्वे जिसकी पूरे देश में बड़ी चर्चा हो रही थी लेकिन अधिकारियों और उनके कुछ विश्वासपात्रों ने इसे भी टांय टांय फिस्स कर दिया. 

मुश्किल यह है कि योगी के शुभचिन्तक असलियत लेकर उनके पास पहुँच भी नहीं पाते हैं जो योगी की भविष्य की राजनैतिक यात्रा के लिए शुभ नहीं है. ऐसा लगता है जैसे पहले योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व, मुख्यमंत्री के पद पर भारी पड़ता था, अब मुख्यमंत्री का पद योगी आदित्यनाथ के व्यतित्व पर हाबी होने लगा है.  

आज जब देशवासी प्रधानमंत्री के रूप में उनमें बड़ी संभावना देखते  हैं, योगी का दायित्व बनता है उन्हें अपने समर्थकों और प्रशंसकों को निराश नहीं करना चाहिए.   

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~


 


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