रविवार, 14 अगस्त 2022

क्या सुशील मोदी को उप मुख्य मंत्री न बनाना , भाजपा को भारी पडा ?

 


लोग कहते हैं कि भाजपा ने सुशील मोदी को किनारे लगा कर बहुत बड़ी गलती की लेकिन ये सही नहीं है लोगों को ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि बिहार में नीतीश और सुशील मोदी की जोड़ी जय और वीरू की तरह जानी जाती थी. सुशील मोदी 2013 में भी नीतीश कुमार के साथ उपमुख्यमंत्री थे और उस समय भी नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर जंगलराज  का दामन थाम लिया था, जिसके खिलाफ़ वह भाजपा के साथ मिलकर पिछले 10 वर्षों से लड़ रहे थे. इसलिए अगर आपकी बार भी नीतीश ने भाजपा का साथ छोड़ने का मन बना लिया था तो सुशील मोदी कोई महत्वपूर्ण भूमिका अदा नहीं कर सकते थे.

अगर कांग्रेस को छोड़ दें तो बिहार की दुर्दशा के लिए तीन बड़े गुनहगार है और वे है लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी. ये तीनों विश्वविद्यालय के समय से ही बड़े अच्छे दोस्त हैं. ये तीनों ही जेपी आंदोलन की उपज है.  सुशील मोदी विद्यार्थी परिषद के माध्यम से भाजपा पहुंचे और नीतीश लालू एक ही दल में एक साथ थे वे जनता पार्टी के विघटन के बाद अलग हुए और धुर विरोधी बन गए. लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री का पद हथियाने में कामयाब हो गए और लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोककर उन्होंने  वर्ग विशेष में अपना विशिष्ट स्थान बना लिया था और उसके बाद एम् वाई  फैक्टर लालू की जीत की गारंटी बन गया था. दुर्भाग्य से नीतीश कुमार भी तुष्टीकरण के माध्यम से एम सेक्टर को हथियाने की कोशिश करते रहे लेकिन लालू यादव जैसे घाघ  नेता के समक्ष सफल नहीं हो सके.

नितीश बेहद मजबूरी में ही भाजपा के साथ सिर्फ इसलिए थे क्योंकि भाजपा के कंधे पर बैठकर वे बिहार के मुख्यमंत्री बन सकते थे. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वह केंद्रीय मंत्री थे और विधानसभा के चुनाव में भाजपा जेडीयू गठबंधन सबसे बड़ा गठबंधन साबित हुआ. नीतीश ने वाजपेयी जी को आश्वस्त किया था कि वे बहुमत का जुगाड़ कर लेंगे और इसलिए मुख्यमंत्री बन गए लेकिन 7 दिन के बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और उनका जलवा यह था कि वह पुनः केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए.

2005 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जदयू गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन गए. उस समय तक उनकी अभिलाषा सिर्फ मुख्यमंत्री बनने की थी लेकिन 2010 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा के ही कुछ नेताओं ने उन्हें इमली के पत्तों पर यह कह कर बैठा दिया कि वह प्रधानमंत्री मैटीरियल है. गलतफहमी का शिकार हुए नीतीश ने राजनीतिक शुचिता और नैतिकता का तो कभी भी पालन नहीं किया था पर पाखंड जरूर करते थे. 2013 में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया गया तो उनके अंदर बैठा हुआ प्रधानमंत्री मैटीरियल मचल उठा और उसने नैतिकता के सारे मापदंड ध्वस्त करते हुए भाजपा से किनारा कर लिया और जंगलराज का साथ पकड़ लिया. सभी आवक रह गयी लेकिन नीतीश को मनाने का कोई प्रयास नहीं किया गया. लोकसभा में भाजपा की जबरदस्त सफलता के बाद उन्हें एहसास हुआ कि बहुत बड़ी गलती हो गई है इसलिए 2015 में विधानसभा चुनाव लालू के साथ लड़ते हुए उन्होंने बहुमत जरूर हासिल किया लेकिन उन्हें संतोष नहीं हुआ और कुछ ज्यादा पाने  के लालच में उन्होंने फिर पाला बदल लिया और भाजपा के साथ चले गए. इस समय भी उनके लिए माध्यम बनने का कार्य किया सुशील मोदी ने. अगर उस समय भाजपा ने उनको साथ नहीं लिया होता तो 2020 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की स्थिति बहुत अच्छी हो सकती थी. इन चुनावों में नीतीश के साथ मिलकर भाजपा ने अपना परचम फहराया और सशक्त सीटें विधानसभा में प्राप्त की लेकिन अपने बलबूते पर बहुमत प्राप्त करने से बहुत दूर रही.

2020 के चुनाव परिणाम के बाद भाजपा को नीतीश को कंधे पर बैठाकर चलना अच्छा तो नहीं लग रहा था लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाता तो वे उसी समय फिर जंगलराज के साथ मिलकर सरकार बना लेते क्योंकि चालाकी, और विश्वासघात नीतीश की फितरत में शामिल हैं. इसलिए लालू ने उन्हें पलटूराम और सांप बताया था जो हर 2 साल में केंचुल बदल लेता है.

भाजपा जनता दल यू गठबंधन के पिछले 22 साल का विश्लेषण यह बताता है किस गठबंधन का सबसे अधिक फायदा जनता दल यू और खासतौर से नीतीश कुमार ने उठाया और भाजपा को छोटा भाई बने रहने देने की हरसंभव कोशिश की. एक राष्ट्रीय दल होने के नाते भाजपा ने बिहार में विस्तार के लिए योजना बनाई थी और उस योजना के तहत उन्होंने डॉक्टर और दवा दोनों बदल दी यानी सुशील मोदी को बिहार से निकालकर राज्यसभा भेज दिया और एक नई टीम का प्रयोग किया. दो उपमुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री सब मिलकर बिहार की सामाजिक और जातिगत ढांचे में पूरी तरह से फिट बैठते थे. नितीश इस सब से बहुत खुश नहीं थे और उनको लगता था कि अगले चुनावों तक भाजपा अपने दम पर बहुमत प्राप्त कर लेगी और फिर उनको दूध की मक्खी की तरह निकाल बाहर करेगी. भाजपा की नई टीम उनको उस तरह से काम भी नहीं करने दे रही थी जैसा सुशील मोदी के जमाने में हो जाता था और इसलिए उनकी छटपटाहट बढ़ती गयी. बहाना चाहिए आरसीपी सिंह का हो, या जनता दल यू तोड़ने का हो लेकिन असलियत यह थी कि वह अपने अस्तित्व को लेकर बहुत बेचैन थे. राष्ट्रपति बनने के लिए भी उन्होंने संदेश दिया लेकिन नरेंद्र मोदी के मन में द्रोपदी मुर्मू की योजना बहुत पहले से थी. राष्ट्रपति के बाद उपराष्ट्रपति के लिए भी संदेश दिया और इसे भी भाजपा ने सुना अनसुना कर दिया क्योंकि भाजपा को धनखड़ के जरिए जो राजनैतिक फायदा हो सकता था वह नीतीश कुमार को उप राष्ट्रपति बनाने से नहीं मिलता. इसलिए बात यह भी नहीं बनी और इसलिए बड़ी हताशा और निराशा में उन्होंने भाजपा गठबंधन तोड़ दिया और फिर उसी जंगल राज में शामिल हो गए जिससे लड़कर ही उन्होंने अपना कद बड़ा किया था.

इसलिए इस पूरे घटनाक्रम से सुशील मोदी अगर कुछ कर सकते थे तो वह समझौतावादी राजनीति होती है जो केवल नीतीश कुमार के लिए सुविधाजनक होती लेकिन भाजपा को आगे बढ़ने से रोकती. अबकी बार भी प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को बहुत पहले से मालूम था कि नीतीश कुमार पलटी मारेंगे और इसलिए भाजपा ने जनता के सामने उनके कद को इतना छोटा कर दिया था जिसे सामान्य करने में उन्हें बहुत समय लगेगा. यह भी बिल्कुल सही है कि अगर बिहार की नीतीश सरकार पूरे पांच वर्ष चलती तो नीतीश कुमार बिहार के राजनैतिक परिदृश्य में खासी पर पहुँच जाते. इसलिए राजनीति के शातिर खिलाड़ी नीतीश ने अपने जीवन का आखिरी दांव लगाया है और इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा से वह अपनी जो राजनैतिक पूंजी बचाकर लाए हैं वह आरजेडी उनसे छीन लेगी और इसके बाद नीतीश कुमार न घर के रहेंगे न घाट के. नीतीश ने ऐसा अपने दल के कई नेताओं के साथ किया है उनमें जॉर्ज फर्नांडीज और शरद यादव जैसे नेता भी शामिल है, इसलिए इतिहास अपने आप को दोहराने के कगार पर खड़ा है.

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने यह फैसला किया कि उन्हें बैसाखी से छुटकारा पाना ही होगा इसलिए नीतीश कुमार को मनाने का कोई प्रयास नहीं किया बल्कि सबका ध्यान इस पर था कि बिहार में पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को नए सिरे से बनाया जाए, मजबूत किया जाए और अपने दम पर सरकार बनाने का प्रयास किया जाए.

इसलिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व नीतीश कुमार के इस नए विश्वासघात से बिल्कुल भी चिंतित दिखाई नहीं पड़ता और सुशील मोदी भी नीतीश कुमार के विरुद्ध जमकर खड़े हो गए हैं.

इसलिए भाजपा का सुशील मोदी को बिहार से दूर करने का आशय देखिए राज्य संगठन का नए सिरे से पुनर्गठन करके जनाधार बढ़ाना था जिसपर भाजपा ने बहुत तेजी के साथ कार्य भी किया है पर पार्टी लोक सभा और विधानसभा के चुनावों की तैयारी सभी सीटों पर  पूरे जोरशोर कर रही थी, जिससे नीतीश कुमार  सशंकित थे. वर्तमान घटनाक्रम का लाभ निश्चित रूप से भाजपा को मिलेगा.  

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गुरुवार, 11 अगस्त 2022

पल्टूराम ने केंचुल बदला डाला

 पल्टूराम ने केंचुल बदला डाला 

पलटूराम ने फिर बदला केंचुल 

लालू यादव ने नीतीश कुमार को राजनीति का पलटूराम कहते हुए बताया था कि वह कभी भी पलटी मार जाते हैं. उन्होंने नितीश को ऐसा सांप बताया था जो हर 2 साल में केंचुल बदलता है. जब खुद लालू के साथ धोखा हुआ था तो उन्होंने ये बातें कहीं थीं, लेकिन नितीश जब पाला बदलकर फिर उनके साथ आ गए तो यह सब बातें गौण हो गयी. यही देश में स्वार्थपूर्ण राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना है.

नीतीश कुमार  भाजपा से दूसरी बार संबंध तोड़ कर आरजेडी के नेतृत्व में 7 पार्टियों के गठबंधन में शामिल होकर 164 विधेयकों के समर्थन के साथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए हैं. इसके बाद बिहार की राजनीति के भी दो फाड़ हो गए हैं, एक वर्ग वह है जो भाजपा के साथ है और दूसरा वह जो भाजपा के विरोध में है, जिसमे सारे दल शामिल हैं. नीतीश कुमार जैसे शातिर राजनेताओं ने संवैधानिक व्यवस्था को भी बच्चों का खेल बना दिया है. उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा सौंपा, और थोड़ी देर बाद दोबारा राज्यपाल के पास पहुंच कर सात दलों के समर्थन का पत्र सौंपा और स्वयं को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का आग्रह किया. क्या इस  असामान्य घटना पर राज्यपाल को कोई प्रश्न नहीं करना चाहिए था और संविधान विशेषज्ञों से परामर्श नहीं करना चाहिए था? लेकिन इस पर किसी भी राजनीतिज्ञ ने प्रश्न  नहीं किया है जिससे लगता है कि राजनीतिक सुचिता का अब कोई महत्त्व नहीं रह गया है.

नीतीश कुमार प्रेस कांफ्रेंस में मुस्कुराते हुए बिल्कुल सामान्य दिखाई पड़ रहे थे. ऐसा लग रहा था कि उन्हें आरजेडी के साथ जाने  की खुशी ज्यादा और भाजपा छोड़ने का कोई गम नहीं है. तेजस्वी यादव की खुशी छलक रही थी और उन्हें शायद यह याद करने की आवश्यकता भी नहीं थी कि 2 साल पहले नीतीश ने उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर नाता तोड़कर भाजपा के पाले में चले गए थे. तेजस्वी की खुशी लालू परिवार की सत्ता पाने की छटपटाहट साफ देखी जा सकती थी.

नीतीश का पाला बदलना अवश्यंभावी था इसलिए किसी को कोई हैरानी नहीं है, भाजपा को भी नहीं. शायद इसीलिये उन्हें मनाने का कोई प्रयास भी नहीं किया. उनकी पाला बदल योजना काफी पहले से काम कर रही थी और और ये उस समय और अधिक स्पष्ट हो गया था जब वह राबड़ी देवी की रोजा अफ्तार दावत में शामिल हुए और इसके बाद नीतीश कुमार की रोजा इफ्तार पार्टी में तेजस्वी और राबड़ी शामिल हुए. यह ऐसा मौका था जब नीतीश कुमार और लालू यादव के परिवार में आमने सामने बैठकर बहुत सारी बातों पर चर्चा हुई और डील फाइनल हो गयी. सेना की अग्निवीर भर्ती योजना का बिहार में बहुत हिंसक विरोध हुआ क्योंकि यह आरजेडी सहित विपक्षी दलों द्वारा समर्थित था जिस कारण बड़ी संख्या में असामाजिक तत्वों ने भी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेकर न केवल रेलवे की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया बल्कि राजनीतिक बदले की भावना से कई जगह भाजपा के कार्यालयों को भी आग के हवाले कर दिया. खुफिया एजेसियों को इसमें पीएफआई की संलिप्तता के सुराग मिले. नीतीश कुमार आश्चर्यजनक रूप से चुप रहे और उतनी ही चुप बिहार की पुलिस भी रही क्योंकि गृह मंत्रालय हमेशा की तरह  नीतीश कुमार के पास था. मैंने जून के अपने एक  लेख में लिखा था कि नीतीश कुमार फिर पलटी मारने वाले हैं.

बिहार की जनता अभी भी यह नहीं समझ पा रही है कि भाजपा के साथ केंद्र सरकार का हिस्सा होने के कारण बिहार के आर्थिक विकास के लिए नई नई योजनाएं और  अधिकतम बजटीय आवंटन मिल रहा था फिर  नीतीश कुमार को भाजपा में ऐसा क्या नहीं मिल रहा था जो आरजेडी के साथ जाने से मिलने लगेगा. स्पष्ट है कि आरजेडी के साथ जाने में बिहार जनता  की तुलना में उन्होंने व्यक्तिगत एजेंडे को ज्यादा महत्त्व दिया.

चुनाव पूर्व घोषणा के अनुसार भाजपा ने 77 विधायक होने के बाद भी कि 43 विधायको वाले जेडीयू नेता नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया. अगर भाजपा ने ऐसा नहीं किया होता तो या तो नितीश उसी समय आरजेडी के साथ चले गए होते, या जेडीयू टूट गया होता और फिर बिहार में आरजेडी की सरकार बन जाती. किसी भी सूरत में भाजपा की सरकार बनने की दूर दूर तक संभावना नहीं थी. नीतीश कुमार भाजपा की इस स्थिति को भुनाते हुए मुख्यमंत्री बने लेकिन सुशील मोदी को सरकार से बाहर रखने और दो दो उपमुख्यमंत्री बनाने तथा विधानसभा अध्यक्ष का पद भी अपने पास रखने के कारण, वह भाजपा के साथ सहज नहीं थे. वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में जेडीयू से भी उतने मंत्री बनाना चाहते थे जितने भाजपा ने बिहार से बनाये थे. भाजपा द्वारा यह मांग स्वीकार नहीं की गयी इसलिए बहुत प्रतीक्षा के बाद उन्हें केंद्र में एक मंत्री पद से संतोष करना पड़ा, और उन्होंने अपने बेहद करीबी आरसीपी सिंह को मंत्री बनाया, बाद में जिनसे  नीतीश के रिश्ते बेहद खराब हो गए और उन्होंने पार्टी से त्यागपत्र भी दे दिया.

बिहार में अभी भी जातिवादी राजनीति बहुत अधिक प्रभावी है और जीत के लिए दलित और पिछड़े मतदाताओं के अलावा मुस्लिम मतदाता बहुत महत्वपूर्ण है. आरजेडी का  राजनैतिक सफर तो मुस्लिम-यादव (एम वाई फैक्टर) पर ही आधारित है. मोदी और भाजपा के प्रति ज्यादातर भारतीय मुसलमानों का व्यवहार जगजाहिर है इसलिए भाजपा के साथ रहने के कारण नीतीश को मुस्लिम मतों का समर्थन कम होता जा रहा था. वैसे भी  उनकी लोकप्रियता में लगातार गिरावट होती रही है और  इस समय उनकी साख धरातल पर हैं. उनकी पार्टी का प्रदर्शन भी चुनाव दर चुनाव खराब होता जा रहा है.  2005 में 88, 2010 में 115, 2015 में 71 के बाद 2020 में उनकी पार्टी 43 सीटों पर सिमट गई. मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्हें अपनी पार्टी का अस्तित्व बचाने के मतदाताओं को आकर्षित करने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा था, इसलिए उन्होंने भाजपा छोड़ कर आरजेडी के साथ जाने का फैसला किया ताकि मुस्लिम और पिछड़ो के मत मिल सकें.

भाजपा नीतीश के गेमप्लान से पूरी तरह अवगत थी, इसलिए उसने नितीश को मनाने का कोई प्रयास नहीं किया. इसका एक और बड़ा कारण है कि हाल में खुफिया एजेंसियों के इनपुट के आधार पर बिहार के फुलवारी   शरीफ छापा मारकर पीएफआई के देश विरोधी एक बड़े षड्यंत्र का पर्दाफाश किया गया था जिसमें पीएफआई का एक गोपनीय दस्तावेज “मिशन 2047” मिला था जिसमें  2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की पूरी कार्ययोजना लिखी है. अन्य राज्यों से आकर लोग पीएफआई के बैनर तले बिहार में मुस्लिम नवयुवकों को अस्त्र शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देते थे. इस खुलासे से हड़कंप मच गया और चूँकि नीतीश कुमार हमेशा गृह मंत्रालय अपने पास रखते आए हैं इसलिए  शर्मिंदगी के कारण वह  चुप रहे लेकिन आरजेडी के नेताओं ने खुलकर पीएफआई और मुसलमानों का पक्ष लिया उन्होंने कहा कि जैसे आरएसएस अपने कैंप में शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देता है वैसे ये लोग देते हैं और इसमें कुछ भी गलत नहीं है. कई नेताओं ने तो यहाँ तक कहा कि अगर भाजपा और आरएसएस हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं, जिसके जवाब में अगर मुस्लिम भी इस्लामिक राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो उसमें कुछ भी गलत नहीं है.

पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के भी चार  विधायक चुने गए थे जिससे समझा जा सकता है कि राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किस हद तक हो चुका है. यह छिपी बात नहीं है कि भारत में जेहादी गतिविधियां चलाने के लिए विदेशी समर्थन और बड़ी मात्रा में पैसा मिलता है. इस्लामिक वामपंथ गठजोड़ सरकारों को अस्थिर करने का अभियान चलाता है और  मोदी और भाजपा भी इनके निशाने पर रहते हैं. शाहीन बाग, और किसान आंदोलन इसके ताजा उदाहरण है.पीएफआई की 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की कार्ययोजना का पर्दाफाश होने के बाद देशभर में ताबड़तोड़ छापे डाले गए. इसके बाद  विदेशी पैसे का खेल शुरू हो गया. राजनैतिक दलों और उनके विधायको पर दबाव बनाया गया. पीएफआई के शुभचिंतक और समर्थक  जेडीयू और आरजेडी विधेयकों पर भाजपा को सरकार से बाहर करने हेतु लगातार हर संभव दबाव बना रहे थे और सत्ता पलट हो गया.

अब जब नीतीश कुमार ने पलटी मार ही दी है तो पीएफआई मॉड्यूल की  राज्य पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती. इसलिए इसमें किसी को भी कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि इस तरह की सत्तापलट में पीएफआई का कनेक्शन भी हो सकता है क्योंकि पीएफआई को वर्ग विशेष के बड़े नेताओं और राजनैतिक आकाओं का संरक्षण प्राप्त है.

-    शिव मिश्रा ( responsetospm@gmail.com)

 

 


बुधवार, 10 अगस्त 2022

बिहार सत्ता पलट में PFI की बड़ी भूमिका

बिहार में सत्ता पलट के पीछे अन्य बातों के अलावा एफआई का कनेक्शन भी सामने आया है. आने वाले दिनों में कुछ और खुलासे होंगे .





लालू यादव ने नीतीश कुमार को एक बार पलटूराम बताया था और कहा था कि वह कभी भी पलटी मार जाते हैं इसके अलावा उन्होंने सांप की उपाधि दी थी जो हर 2 साल में केंचुल बदल देता है. आज ये बयान सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है लेकिन न तो नीतीश और ना ही लालू यादव के परिवार को इससे कोई फर्क पड़ रहा है.

अब आधिकारिक रूप से नीतीश कुमार ने भाजपा से संबंध तोड़ लिए हैं और 7 पार्टियों के गठबंधन में 164 विधेयकों के समर्थन के साथ दोबारा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. इसमें भाजपा छोड़कर सभी दल शामिल हैं.

बिहार दो भागों में बाँट गया है एक वह जो भाजपा के साथ है और दूसरा वह जो सभी दलों के गठबंधन के साथ है. भाजपा अगर सावधानी से काम लेगी तो आगे भी निकल सकती है.

नीतीश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस की उसमें बिल्कुल सामान्य दिख रहे थे और ऐसा लग रहा था कि उन्हें महागठबंधन में जाने की खुशी ज्यादा है और भाजपा छोड़ने का कोई दुख नहीं है.

वास्तव में उनके पाला बदलने की योजना काफी पहले से काम कर रही थी और और ये उस समय स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ा जब राबड़ी देवी की रोजा अफ्तार की पार्टी में नीतीश कुमार शामिल हुए और नीतीश कुमार की रोजा इफ्तार पार्टी में तेजस्वी और राबड़ी शामिल हुए. ये ऐसा मौका था जब नीतीश कुमार और लालू यादव के परिवार में आमने सामने बैठकर बहुत सारी बातों पर चर्चा हुई. बिहार में जातिवादी राजनीति अभी भी चल रही है और किसी पार्टी की जीत के लिए दलित और पिछड़े मतदाताओं के अलावा मुस्लिम मतदाता बहुत महत्वपूर्ण है.

आरजेडी की राजनैतिक सफर में तो यादव और मुस्लिम का बहुत बड़ा हाथ रहता आया है. मोदी और भाजपा के प्रति ज्यादातर भारतीय मुसलमानों का व्यवहार जगजाहिर है और अगर उनका बस चले तो वह एक मिनट भी मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर न रहने दें. लेकिन इतने मुखर विरोध के कारण ध्रुवीकरण भी बहुत तेज होता है जिसके कारण मुसलमानों के निर्णायक रहते आये मत भी भाजपा को सत्ता से नहीं हटा पाते.

हाल में खुफिया एजेंसियों के इनपुट के आधार पर बिहार के फुलवारी शरीफ इलाके के नया टोला में स्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के दफ्तर में 11 जुलाई को छापेमारी की गई। इस दौराना वहां से कई संदिग्ध दस्तावेज और आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई। इसमें पीएफआई के मिशन-2047 से जुड़ा एक गोपनीय दस्तावेज भी मिला है। इसमें भारत को अगले 25 सालों में इस्लामिक राष्ट्र बनाने की साजिश का जिक्र है। बिहार पुलिस इसकी व्यापक छानबीन कर रही है और इस संबंध में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

नीतीश तो चुप रहे लेकिन आरजेडी के नेताओं ने खुलकर पीएफआई और मुसलमानों का पक्ष लिया उन्होंने कहा कि जैसे आरएसएस अपने कैंप में शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देता है वैसे ये लोग देते हैं और इसमें गलत क्या है?

कई नेताओं ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हिंदुओं का एक वर्ग से हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करता है तो अगर मुस्लिम इस्लामिक राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो इसमें गलत क्या है?

पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के भी पांच विधायक चुने गए थे, एआईएमआईएम ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए खुला समर्थन दे रखा था. इस समय उनकी पार्टी के कई विधायक आरजेडी में शामिल हो गए हैं.

यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि भारत में जेहाद की गतिविधियों को विदेशी समर्थन भी हासिल रहता है और पैसे का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाकर सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास होता है.

चाहे शाहीन बाग हो किसान आंदोलन हो या कोई भी मौका हो लेकिन इस तरह की सभी शक्तियां एकजुट हो जाती है. अगर बिहार में लंबे समय से पीएफआई का नेटवर्क फैल रहा था तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले 15 वर्ष से भी अधिक समय से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं और गृह मंत्रालय हमेशा उनके पास रहता आया है. पीएफआई की 2047 में भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना का पर्दाफाश होने के बाद और देशभर में ताबड़तोड़ छापों के बाद PFI के अंतरराष्ट्रीय समर्थकों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया था. पैसे का खेल तो अंधाधुंध होता ही है लेकिन एक मुस्त वोटों के लालच देकर स्थानीय विधेयकों और सांसदों को भी दबाव में लेने का काम किया जाता है.

पीएफआई के बिहार के शुभचिंतकों और समर्थकों ने जेडीयू और आरजेडी विधेयकों पर दबाव बनाना शुरू किया था और किसी न किसी तरह से सख्त पुलिस कार्रवाई का विरोध भी किया था. इसलिए बिहार में पीएफआई की मिशन 2047 योजना का पर्दाफाश होने के बाद जितनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए थी वह देखने को नहीं मिली .

इसके थोड़ा और पहले जिससमय सेना में अग्निवीर की भर्ती के विरोध में देश के कुछ शहरों में प्रदर्शन हुए थे उसमें बिहार सबसे प्रमुख था जितनी हिंसक मुखर प्रदर्शन बिहार में हुए उसने पूरे भारत में कहीं नहीं हुए और आगजनी तोड़फोड़ और रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने का जितना काम बिहार में किया गया उतना कहीं नहीं किया गया. बिहार से अनेक ऐसे वीडियोआये और ऐसी खबरें भी आईं जिनमे आगजनी और तोड़फोड़ की गतिविधियों में असामाजिक तत्वों का लिप्त होना पाया गया लेकिन पुलिस ने न तो कोई कार्रवाई की और न ही यह पता चल पाया कि असामाजिक तत्व कौन थे.

पूरे घटनाक्रम पर नीतीश कुमार भी चुप रहे और उन्होंने विरोध में एक भी शब्द नहीं बोला. उस समय से ही संदेह गहराता चला जा रहा था कि नीतीश कहीं ना कहीं से खासे दबाव में है. पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू की सीखें घटकर 43 पर पहुँच गई थी इसलिए नीतीश कुमार को अपने वोटबैंक का विस्तार करने की चिंता सताई जा रही थी. इसलिए किसी भी तरह की सख्त पुलिस कार्रवाई नहीं की गई.

फुलवारी शरीफ ने पीएफआई के मॉड्यूल के खुलासे के बाद पटना के एसएसपी का बयान बेहद चौंकाने वाला रहा जिसमें उन्होंने पीएफआइ की तुलना आर एस एस सी की थी. मजेदार बात यह भी है कि उसके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. ये कहना भी अनुचित नहीं होगा कि उसी बिंदु से भाजपा और जेडीयू के बीच में दूरियां बढ़ने लगी और भाजपा जेडीयू के संबंध विच्छेद होने की पटकथा लिखी गई थी.

और अब जब नीतीश कुमार ने पलटी मार ही दी है तो फुलवारीशरीफ के पीएफआई मॉड्यूल की राज्य की पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती जब तक कि इसकी जांच एनआईए के द्वारा नहीं की जाती. इसलिए इसमें किसी को भी कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि इस तरह की सत्तापलट में पीएफआई का कनेक्शन भी हो सकता है क्योंकि पीएफआई को वर्ग विशेष के बड़े नेताओं और राजनैतिक आकाओं का संरक्षण प्राप्त है.

सोमवार, 8 अगस्त 2022

नितीश पलटी मार रहे हैं .

 



नीतीश कुमार अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी महत्वाकांक्षा को पर भी भारतीय जनता पार्टी ने ही लगाए हैं. चूंकि भाजपा बिहार में अपना प्रसारर करना चाहती थी और उसे एक विश्वसनीय साथी की तलाश थी, जो उसे जेडी यू और नीतीश में दिखाई पड़ रहा था किंतु यह वह समय था जब तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल जो एक वर्ग विशेष के फोटो की लालसा में तुष्टिकरण की राजनीति करते थे और इसलिए भाजपा को सांप्रदायिक कहकर लांछित भी करते थे और अछूत समझते थे. इसलिए भाजपा ने 1990 से जेडीयू से गठबंधन कर रखा था और बिहार में भाजपा की भूमिका एक छोटे भाई की थी.

जिस  समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी थी उसमें नीतीश कुमार कैबिनेट मंत्री थे लेकिन साल 2000 में हुए चुनाव में भाजपा जेडीयू गठबंधन बिहार में सबसे बड़ा गठबंधन बन गया लेकिन बहुमत से काफी दूर था. राज्यपाल ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन को आमंत्रित किया. अटल जी इस तरह की सरकार नहीं बनाना चाहते थे लेकिन नीतीश कुमार  को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने हाँ कर दी. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन बहुमत का जुगाड़ नहीं कर पाए और इसलिए उन्हें 7 दिन के अंदर इस्तीफा देना पड़ा. 2005 में हुए चुनाव में भाजपा जेडीयू गठबंधन ने जबरदस्त सफलता हासिल की और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और यह क्रम 2010 में भी दोहराया गया.

केंद्र में गठबंधन की सरकार बनने से नीतीश कुमार के मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना पलने लगा था और यह सपना तब कुलांचे भरने लगा जब भाजपा के ही कुछ लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री मेटीरीअल कहना शुरू कर दिया. उन्हें लगता था की कभी ऐसा दिन आ सकता है जब भाजपा बहुमत से थोड़ी सी दूर रह जाए और दूसरी पार्टियां किसी धर्मनिरपेक्ष चेहरे के नाम पर समर्थन देने का वायदा करें उस समय नीतीश का धर्मनिरपेक्ष और सुशासन बाबू का चेहरा उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचा सकता है. उन्हें गंभीर मानसिक आघात तब लगा जब 2013 में भाजपा ने प्रधानमंत्री के चेहरे के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना. इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार मैं भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया और आश्चर्यजनक रूप से अपनी धुर विरोधी आरजेडी, जिसके 10 साल के शासन को नीतीश जंगलराज कहते थे, के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली और लालू के पुत्र तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बन गए.  नीतीश का आकलन था कि यदि भाजपा को बहुमत मिल गया तो उनकी  कोई भूमिका नहीं रह जाएगी और यह नहीं मिलता है तो नीतीश को एक वर्ग विशेष के वोटों से बिहार में हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि नरेंद्र मोदी पर गुजरात दंगों के दाग चस्पां करने की कोशिश की गई थी.

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली और बिहार में भाजपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा. 2015 में हुए विधानसभा के चुनाव में नीतीश लालू के गठबंधन ने जबरदस्त सफलता हासिल की और दोबारा सरकार बनाने में कामयाब रहे लेकिन कुछ दिनों बाद ही नीतीश को फिर लगने लगा की आरजेडी के साथ सरकार बनाकर उनकी छवि को नुकसान हो रहा है जो उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है इसलिए उन्होंने भाजपा नेता  सुशील कुमार मोदी जो उनके बेहद करीबी दोस्त थे, के माध्यम से भाजपा नेतृत्व से संपर्क किया और भाजपा के साथ सरकार बना ली. दुबारा भाजपा के साथ आने के बाद लोगों को विश्वास हो गया था कि कोई भी धीर गंभीर व्यक्ति अब दोबारा नाता नहीं तोड़ देगा. इसलिए 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि किसी भी दल की सीटें कुछ भी रहे मुख्यमंत्री नीतीश ही बनेंगे और भाजपा ने यह वायदा तब भी निभाया जब नीतीश को विधानसभा में केवल 43 सीटें मिलीं और भाजपा को 77 सीटें मिलीं. नीतीश का आत्मविश्वास धरातल पर आ गया और उन्हें तब और भी खराब लगा जब उनकी इच्छा के विपरीत भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष का पद  अपने पास रखा, दो  उप मुख्यमंत्री बनाए और भाजपा का मंत्री भी अपने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर बनाए. भाजपा ने सुशील मोदी को उपमुख्यमंत्री ना बनाकर नीतीश को पहले ही एक झटका दे दिया था और राज्यसभा भेजकर बिहार की सक्रिय राजनीति से भी अलग कर दिया जिससे नीतीश बहुत परेशान हो गए.

नीतीश चाहते थे कि केंद्र सरकार में जेडीयू कोटे के दो कैबिनेट मंत्री रखे जाएं लेकिन भाजपा ने केवल एक पर हाँ की और इसलिए लंबे समय तक जेडीयू का प्रतिनिधित्व नहीं हो सका. बताना नीतीश के बेहद करीबी और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह केप्रयासों से जेडीयू केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुआ और आरसीपी सिंह एकमात्र मंत्री बने. बताओ इस बीच आरसीपी सिंह की भाजपा नेताओं से बहुत नजदीकी संबंध बन गए जिससे भी नीतीश बहुत परेशान थे और उनको लग रहा था कि महाराष्ट्र की तरह आरसीपी सिंह को इस्तेमाल करके भाजपा नीतीश कुमार को अलग थलग कर देगी. नीतीश ने आरसीपी सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल नहीं बढ़ाया और इससे उनका मंत्री पद स्वतः समाप्त हो गया जिससे आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार के बीच दूरियां बढ़ गई. भागन वीर के मामले में जब बिहार में प्रदर्शन हुए तो नीतीश ने उन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया इसलिए बिहार में सार्वजनिक संपत्ति या खासतौर से रेलवे संपत्तियों को जितना नुकसान पहुंचाया गया उतना किसी भी राज्य में नहीं किया गया. यही नहीं राज्य में भाजपा के कई कार्यालयों को आग के हवाले कर दिया गया लेकिन नीतीश खामोश रहे. नीतीश उसी समय आरजेडी के साथ महागठबंधन में शामिल होना चाहते थे लेकिन भाजपा चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव होने तक किसी भी तरह नीतीश को अपने पाले में रखा जाए और वे ऐसा करने में कामयाब रही.

नीतीश कुमार की नाराजगी फिर भी दूर नहीं हुई और वह केंद्र सरकार से बुलावे के बाद भी उसके कई समारोहों से दूर रहे. भाजपा से नजदीकी को लेकर ही जेडीयू ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए और उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया जिसपर जवाब देने की बजाय उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए. यही से ऐसा मोड़ आ गया जिसपर नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग हो जाना ही बेहतर समझा और इसलिए राज्य में माहौल एकदम से गर्म हो गया है और अगले अड़तालीस घंटों में नीतीश कुमार आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं.

मैंने 19 जून को यूट्यूब पर एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें यह भविष्यवाणी की थी कि नीतीश कुमार पलटी मारने वाले हैं.  



आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने नीतीश कुमार को पलटू राम का नाम एकदम सही दिया था क्योंकि वह बीजेपी से पलटी मार कर आरजेडी के साथ आए और फिर आरजेडी से पलटी मार कर बीजेपी के साथ गए और अब बीजेपी से फिर पलटी मार कर आरजेडी के साथ जा रहे हैं. .

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

लाल सिंह चड्ढा - फिल्म का नहीं आमिर और करीना खान का बहिष्कार है



लाल सिंह चड्ढा फ़िल्म हॉलीवुड फ़िल्म फॉरेस्ट गम्प रीमेक है जिसे ऑस्कर  अवार्ड मिल चुका है. आमिर खान ने इस कहानी को नकल करके हिंदी रूपांतरित किया है और इसका कारण है इस फ़िल्म की लोकप्रियता को हिंदुस्तान में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना और उस पैसे का हिंदुस्तान के विरुद्ध प्रोपगंडा फैलाने में इस्तेमाल करना. इसे   कोई भी स्वाभिमानी हिन्दुस्तानी विशेषता हिंदू बर्दाश्त नहीं कर सकता. इसलिए हमें ऐसे व्यक्ति की वित्तीय स्रोतों को भी रोकना पड़ेगा.

आमिर खान ने लगभग 50,000 लोगों को पूरे हिंदुस्तान में इस फ़िल्म के प्रचार में और फ़िल्म के बायकाट में लगे लोगों को जवाब देने के लिए लगा दिया है, इनमें अधिसंख्य हिंदू ही है इसलिए सभी को बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है और किसी के झांसे में नहीं आना चाहिए.

फ़िल्म की कहानी, घटनाक्रम और उसके संदेश से हमें कोई समस्या नहीं है अगर समस्या है तो वह आमिर खान और करीना खान से.

आमिर खान कट्टर पंथी मुसलमान है और उन्होंने कह रखा है कि उनकी बीवी तो हिंदू होगी लेकिन बच्चे मुसलमान होंगे और इसी लव जिहाद के दृष्टिकोण से उन्होंने अभी तक दो शादियां की हैं और वह भी दोनों हिंदू लड़कियों से. पहली हिंदू पत्नी रीना दत्ता को तलाक दे दिया जिनसे पैदा हुए दोनों  बच्चे मुसलमान हैं. दूसरे लव जेहाद के बाद उन्होंने किरण राव से शादी की और उससे भी दो बच्चे हैं, दोनों मुसलमान है और किरण राव  को भी बिना किसी कारण के तलाक दे चूके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध शेखर गुप्ता को एक इंटरव्यू देते हुए उन्होंने उनकी जमकर भर्त्सना की थी और उन्हें और उनके हिंदू साथियों को मुस्लिम नरसंहार का जिम्मेदार ठहराया था, जबकि गोधरा नरसंहार के बारे में उन्होंने जबान भी नहीं खोली थी. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद दूसरे कट्टरपंथियों की हाँ में हाँ मिलाते हुए उन्होंने भी वक्त भी दिया था कि उन्हें हिंदुस्तान में डर लग रहा है और उनकी पत्नी किरण राव बच्चों को लेकर चिंतित रहती है और किसी इस्लामिक देश में बसना चाहती है.

आमिर खान की फ़िल्म पीके को कौन भूल सकता है जिसमे उन्होंने हिंदी देवताओं का इतना अपमान किया कि अगर कोई इतना इस्लाम के बारे में करे तो शायद कयामत आ जाएगी.

इस फ़िल्म की दूसरी पात्र हैं करीना खान जो ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं जिसे विभाजन के समय पाकिस्तान मैं उसके मुस्लिम पड़ोसियों ने  मार मार कर भगा दिया गया था लेकिन उसी खानदान की लड़की ने एक अफगान लुटेरे के वंशज से शादी की जो भी चाल चलन और चरित्र में आमिर खान जैसा ही है उसने भी दो शादियां की और दोनों हिंदू लड़कियों से. पहली पत्नी से पैदा हुए दोनों बच्चे मुसलमान हैं और अमृता सिंह को तलाक दे दिया. दूसरी पत्नी करीना खान से पैदा दोनों बच्चे हिंदुओं को अपमानित करने वाले हैं क्योंकि एक का नाम है तैमूर और दूसरे का नाम है जहाँगीर. जो हिंदू लड़की अपने बच्चे का नाम तैमूर रख सकती है उसे किसी भी हिंदू से सहानुभूति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. उसने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में कहा था की तो लोग मेरी फ़िल्म देखने ना जाए क्यों जाते हैं. अभी हाल ही में एक बयान दिया है कि लाल सिंह चड्ढा के विरुद्ध बायकॉट नहीं चलेगा और लोग बड़ी संख्या में फ़िल्म देखने सिनेमाघरों में आएँगे, जिसे सभी स्वाभिमानी हिंदुओं ने चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया है.

अब फैसला आपका है आपको क्या करना है. अच्छा तो यह है कि आप जो रुपए टिकट पर बर्बाद करेंगे वह गरीब बच्चों पर खर्च कर दे और अगर आपके पास अधिक पैसा नहीं है तो कम से कम अपने बच्चों के लिए बचा कर रखें.

ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म फॉरेस्ट गम्प यू ट्यूब पर मुफ्त में उपलब्ध है उसे देखिए और इन दोनों को सबक सिखाइए.

-    Shiv Mishra www.bakjhak.com

 

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Lal Singh Chaddha film is a remake of Hollywood film Forrest Gump which has received Oscar Award. Aamir Khan has copied this story. The reason for which is to earn maximum money by redeeming the popularity of this film in India and use that money to spread propaganda against India. This cannot be tolerated by any self-respecting Indian more especially Hindu. So, we have to curb the financial sources of such person.

Aamir Khan has engaged about 50,000 people all over India to promote this film and reply to the boycott campain of the film, majority of them are Hindus. So, everyone needs to be very careful and do not fall prey to anyone's hoax. should not come.

We have no problem with the story, events, and social message of the film, but Hindus have   problems  with Aamir Khan and Kareena Khan.

Aamir Khan is a fanatic Muslim, and he has said that his wives will be Hindu, but children will be Muslims. From the love jihad point of view, he has done two marriages so far and that too with both Hindu girls. He has already divorced the first Hindu wife Reena Dutta, from whom both the children born are Muslims. After the second love jihad, he married Kiran Rao and has two children from her, both are Muslims and have also divorced Kiran Rao without any reason.

While giving an interview to Shekhar Gupta he had strongly condemned Modi and held him and his Hindu ministers responsible for the Muslim massacre in Gujrat, while he did not even open his mouth about the Godhra massacre of Hindus.

Soon after Narendra Modi became the Prime Minister, he along with the other extremists, said  that he is afraid of  in India and his wife Kiran Rao is worried about children and wants to settle in an Islamic country.

Who can forget Aamir Khan's film PK, in which he insulted Hindi Gods so much that if someone does this much about Islam, then perhaps doom will come?

The second character in this film is Kareena Khan, who belongs to a family that was lynched by her Muslim neighbors in Pakistan at the time of partition, but the girl of the same family married the descendant of an Afghan robber Saif Ali Khan. He is similar to Aamir Khan in character, he also did two marriages and both with Hindu girls. Both the children born to the first wife are Muslims and divorced Amrita Singh. Both the children born to second wife Kareena Khan are going to humiliate Hindus because one's name is Taimur and the other's name is Jahangir. A Hindu girl who can name her child Taimur should not expect sympathy from any Hindus. She had said in an interview a few days ago that why do people go to see my film. More recently, a statement has been made that the boycott will not work against Lal Singh Chaddha and people will come in large numbers to the cinema halls to watch the film, which has been accepted as a challenge by all self-respecting Hindus.

Now the decision is yours what you must do. It is better that the money that you will be wasting on the ticket should be spent on poor children and if you do not have much money then at least save it for your children.

Watch the Oscar-winning film Forrest Gump for free on YouTube and teach them a lesson.

Jai Hind.

-    Shive Mishra www.bakjhak.com

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