बुधवार, 10 अगस्त 2022

बिहार सत्ता पलट में PFI की बड़ी भूमिका

बिहार में सत्ता पलट के पीछे अन्य बातों के अलावा एफआई का कनेक्शन भी सामने आया है. आने वाले दिनों में कुछ और खुलासे होंगे .





लालू यादव ने नीतीश कुमार को एक बार पलटूराम बताया था और कहा था कि वह कभी भी पलटी मार जाते हैं इसके अलावा उन्होंने सांप की उपाधि दी थी जो हर 2 साल में केंचुल बदल देता है. आज ये बयान सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है लेकिन न तो नीतीश और ना ही लालू यादव के परिवार को इससे कोई फर्क पड़ रहा है.

अब आधिकारिक रूप से नीतीश कुमार ने भाजपा से संबंध तोड़ लिए हैं और 7 पार्टियों के गठबंधन में 164 विधेयकों के समर्थन के साथ दोबारा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. इसमें भाजपा छोड़कर सभी दल शामिल हैं.

बिहार दो भागों में बाँट गया है एक वह जो भाजपा के साथ है और दूसरा वह जो सभी दलों के गठबंधन के साथ है. भाजपा अगर सावधानी से काम लेगी तो आगे भी निकल सकती है.

नीतीश कुमार ने प्रेस कांफ्रेंस की उसमें बिल्कुल सामान्य दिख रहे थे और ऐसा लग रहा था कि उन्हें महागठबंधन में जाने की खुशी ज्यादा है और भाजपा छोड़ने का कोई दुख नहीं है.

वास्तव में उनके पाला बदलने की योजना काफी पहले से काम कर रही थी और और ये उस समय स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ा जब राबड़ी देवी की रोजा अफ्तार की पार्टी में नीतीश कुमार शामिल हुए और नीतीश कुमार की रोजा इफ्तार पार्टी में तेजस्वी और राबड़ी शामिल हुए. ये ऐसा मौका था जब नीतीश कुमार और लालू यादव के परिवार में आमने सामने बैठकर बहुत सारी बातों पर चर्चा हुई. बिहार में जातिवादी राजनीति अभी भी चल रही है और किसी पार्टी की जीत के लिए दलित और पिछड़े मतदाताओं के अलावा मुस्लिम मतदाता बहुत महत्वपूर्ण है.

आरजेडी की राजनैतिक सफर में तो यादव और मुस्लिम का बहुत बड़ा हाथ रहता आया है. मोदी और भाजपा के प्रति ज्यादातर भारतीय मुसलमानों का व्यवहार जगजाहिर है और अगर उनका बस चले तो वह एक मिनट भी मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर न रहने दें. लेकिन इतने मुखर विरोध के कारण ध्रुवीकरण भी बहुत तेज होता है जिसके कारण मुसलमानों के निर्णायक रहते आये मत भी भाजपा को सत्ता से नहीं हटा पाते.

हाल में खुफिया एजेंसियों के इनपुट के आधार पर बिहार के फुलवारी शरीफ इलाके के नया टोला में स्थित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के दफ्तर में 11 जुलाई को छापेमारी की गई। इस दौराना वहां से कई संदिग्ध दस्तावेज और आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई। इसमें पीएफआई के मिशन-2047 से जुड़ा एक गोपनीय दस्तावेज भी मिला है। इसमें भारत को अगले 25 सालों में इस्लामिक राष्ट्र बनाने की साजिश का जिक्र है। बिहार पुलिस इसकी व्यापक छानबीन कर रही है और इस संबंध में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

नीतीश तो चुप रहे लेकिन आरजेडी के नेताओं ने खुलकर पीएफआई और मुसलमानों का पक्ष लिया उन्होंने कहा कि जैसे आरएसएस अपने कैंप में शस्त्र चलाने की ट्रेनिंग देता है वैसे ये लोग देते हैं और इसमें गलत क्या है?

कई नेताओं ने तो यहाँ तक कहा कि अगर हिंदुओं का एक वर्ग से हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करता है तो अगर मुस्लिम इस्लामिक राष्ट्र बनाने की बात करते हैं तो इसमें गलत क्या है?

पिछले विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के भी पांच विधायक चुने गए थे, एआईएमआईएम ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए खुला समर्थन दे रखा था. इस समय उनकी पार्टी के कई विधायक आरजेडी में शामिल हो गए हैं.

यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि भारत में जेहाद की गतिविधियों को विदेशी समर्थन भी हासिल रहता है और पैसे का अंधाधुंध उपयोग किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभियान चलाकर सरकारों को अस्थिर करने का प्रयास होता है.

चाहे शाहीन बाग हो किसान आंदोलन हो या कोई भी मौका हो लेकिन इस तरह की सभी शक्तियां एकजुट हो जाती है. अगर बिहार में लंबे समय से पीएफआई का नेटवर्क फैल रहा था तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले 15 वर्ष से भी अधिक समय से नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं और गृह मंत्रालय हमेशा उनके पास रहता आया है. पीएफआई की 2047 में भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना का पर्दाफाश होने के बाद और देशभर में ताबड़तोड़ छापों के बाद PFI के अंतरराष्ट्रीय समर्थकों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया था. पैसे का खेल तो अंधाधुंध होता ही है लेकिन एक मुस्त वोटों के लालच देकर स्थानीय विधेयकों और सांसदों को भी दबाव में लेने का काम किया जाता है.

पीएफआई के बिहार के शुभचिंतकों और समर्थकों ने जेडीयू और आरजेडी विधेयकों पर दबाव बनाना शुरू किया था और किसी न किसी तरह से सख्त पुलिस कार्रवाई का विरोध भी किया था. इसलिए बिहार में पीएफआई की मिशन 2047 योजना का पर्दाफाश होने के बाद जितनी शक्ति और सामर्थ्य के साथ पुलिस कार्रवाई होनी चाहिए थी वह देखने को नहीं मिली .

इसके थोड़ा और पहले जिससमय सेना में अग्निवीर की भर्ती के विरोध में देश के कुछ शहरों में प्रदर्शन हुए थे उसमें बिहार सबसे प्रमुख था जितनी हिंसक मुखर प्रदर्शन बिहार में हुए उसने पूरे भारत में कहीं नहीं हुए और आगजनी तोड़फोड़ और रेलवे संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने का जितना काम बिहार में किया गया उतना कहीं नहीं किया गया. बिहार से अनेक ऐसे वीडियोआये और ऐसी खबरें भी आईं जिनमे आगजनी और तोड़फोड़ की गतिविधियों में असामाजिक तत्वों का लिप्त होना पाया गया लेकिन पुलिस ने न तो कोई कार्रवाई की और न ही यह पता चल पाया कि असामाजिक तत्व कौन थे.

पूरे घटनाक्रम पर नीतीश कुमार भी चुप रहे और उन्होंने विरोध में एक भी शब्द नहीं बोला. उस समय से ही संदेह गहराता चला जा रहा था कि नीतीश कहीं ना कहीं से खासे दबाव में है. पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश की पार्टी जेडीयू की सीखें घटकर 43 पर पहुँच गई थी इसलिए नीतीश कुमार को अपने वोटबैंक का विस्तार करने की चिंता सताई जा रही थी. इसलिए किसी भी तरह की सख्त पुलिस कार्रवाई नहीं की गई.

फुलवारी शरीफ ने पीएफआई के मॉड्यूल के खुलासे के बाद पटना के एसएसपी का बयान बेहद चौंकाने वाला रहा जिसमें उन्होंने पीएफआइ की तुलना आर एस एस सी की थी. मजेदार बात यह भी है कि उसके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई थी. ये कहना भी अनुचित नहीं होगा कि उसी बिंदु से भाजपा और जेडीयू के बीच में दूरियां बढ़ने लगी और भाजपा जेडीयू के संबंध विच्छेद होने की पटकथा लिखी गई थी.

और अब जब नीतीश कुमार ने पलटी मार ही दी है तो फुलवारीशरीफ के पीएफआई मॉड्यूल की राज्य की पुलिस द्वारा की जाने वाली जांच प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती जब तक कि इसकी जांच एनआईए के द्वारा नहीं की जाती. इसलिए इसमें किसी को भी कोई हैरत नहीं होनी चाहिए कि इस तरह की सत्तापलट में पीएफआई का कनेक्शन भी हो सकता है क्योंकि पीएफआई को वर्ग विशेष के बड़े नेताओं और राजनैतिक आकाओं का संरक्षण प्राप्त है.

सोमवार, 8 अगस्त 2022

नितीश पलटी मार रहे हैं .

 



नीतीश कुमार अत्यंत महत्वाकांक्षी व्यक्ति हैं, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि उनकी महत्वाकांक्षा को पर भी भारतीय जनता पार्टी ने ही लगाए हैं. चूंकि भाजपा बिहार में अपना प्रसारर करना चाहती थी और उसे एक विश्वसनीय साथी की तलाश थी, जो उसे जेडी यू और नीतीश में दिखाई पड़ रहा था किंतु यह वह समय था जब तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल जो एक वर्ग विशेष के फोटो की लालसा में तुष्टिकरण की राजनीति करते थे और इसलिए भाजपा को सांप्रदायिक कहकर लांछित भी करते थे और अछूत समझते थे. इसलिए भाजपा ने 1990 से जेडीयू से गठबंधन कर रखा था और बिहार में भाजपा की भूमिका एक छोटे भाई की थी.

जिस  समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा सरकार बनी थी उसमें नीतीश कुमार कैबिनेट मंत्री थे लेकिन साल 2000 में हुए चुनाव में भाजपा जेडीयू गठबंधन बिहार में सबसे बड़ा गठबंधन बन गया लेकिन बहुमत से काफी दूर था. राज्यपाल ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन को आमंत्रित किया. अटल जी इस तरह की सरकार नहीं बनाना चाहते थे लेकिन नीतीश कुमार  को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने हाँ कर दी. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ तो ले ली लेकिन बहुमत का जुगाड़ नहीं कर पाए और इसलिए उन्हें 7 दिन के अंदर इस्तीफा देना पड़ा. 2005 में हुए चुनाव में भाजपा जेडीयू गठबंधन ने जबरदस्त सफलता हासिल की और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और यह क्रम 2010 में भी दोहराया गया.

केंद्र में गठबंधन की सरकार बनने से नीतीश कुमार के मन में प्रधानमंत्री बनने का सपना पलने लगा था और यह सपना तब कुलांचे भरने लगा जब भाजपा के ही कुछ लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री मेटीरीअल कहना शुरू कर दिया. उन्हें लगता था की कभी ऐसा दिन आ सकता है जब भाजपा बहुमत से थोड़ी सी दूर रह जाए और दूसरी पार्टियां किसी धर्मनिरपेक्ष चेहरे के नाम पर समर्थन देने का वायदा करें उस समय नीतीश का धर्मनिरपेक्ष और सुशासन बाबू का चेहरा उन्हें प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचा सकता है. उन्हें गंभीर मानसिक आघात तब लगा जब 2013 में भाजपा ने प्रधानमंत्री के चेहरे के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना. इसके तुरंत बाद नीतीश कुमार मैं भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया और आश्चर्यजनक रूप से अपनी धुर विरोधी आरजेडी, जिसके 10 साल के शासन को नीतीश जंगलराज कहते थे, के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली और लालू के पुत्र तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बन गए.  नीतीश का आकलन था कि यदि भाजपा को बहुमत मिल गया तो उनकी  कोई भूमिका नहीं रह जाएगी और यह नहीं मिलता है तो नीतीश को एक वर्ग विशेष के वोटों से बिहार में हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि नरेंद्र मोदी पर गुजरात दंगों के दाग चस्पां करने की कोशिश की गई थी.

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली और बिहार में भाजपा का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा. 2015 में हुए विधानसभा के चुनाव में नीतीश लालू के गठबंधन ने जबरदस्त सफलता हासिल की और दोबारा सरकार बनाने में कामयाब रहे लेकिन कुछ दिनों बाद ही नीतीश को फिर लगने लगा की आरजेडी के साथ सरकार बनाकर उनकी छवि को नुकसान हो रहा है जो उनके प्रधानमंत्री बनने के रास्ते में रोड़ा बन सकता है इसलिए उन्होंने भाजपा नेता  सुशील कुमार मोदी जो उनके बेहद करीबी दोस्त थे, के माध्यम से भाजपा नेतृत्व से संपर्क किया और भाजपा के साथ सरकार बना ली. दुबारा भाजपा के साथ आने के बाद लोगों को विश्वास हो गया था कि कोई भी धीर गंभीर व्यक्ति अब दोबारा नाता नहीं तोड़ देगा. इसलिए 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पहले से ही घोषणा कर दी थी कि किसी भी दल की सीटें कुछ भी रहे मुख्यमंत्री नीतीश ही बनेंगे और भाजपा ने यह वायदा तब भी निभाया जब नीतीश को विधानसभा में केवल 43 सीटें मिलीं और भाजपा को 77 सीटें मिलीं. नीतीश का आत्मविश्वास धरातल पर आ गया और उन्हें तब और भी खराब लगा जब उनकी इच्छा के विपरीत भाजपा ने विधानसभा अध्यक्ष का पद  अपने पास रखा, दो  उप मुख्यमंत्री बनाए और भाजपा का मंत्री भी अपने सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर बनाए. भाजपा ने सुशील मोदी को उपमुख्यमंत्री ना बनाकर नीतीश को पहले ही एक झटका दे दिया था और राज्यसभा भेजकर बिहार की सक्रिय राजनीति से भी अलग कर दिया जिससे नीतीश बहुत परेशान हो गए.

नीतीश चाहते थे कि केंद्र सरकार में जेडीयू कोटे के दो कैबिनेट मंत्री रखे जाएं लेकिन भाजपा ने केवल एक पर हाँ की और इसलिए लंबे समय तक जेडीयू का प्रतिनिधित्व नहीं हो सका. बताना नीतीश के बेहद करीबी और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरसीपी सिंह केप्रयासों से जेडीयू केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुआ और आरसीपी सिंह एकमात्र मंत्री बने. बताओ इस बीच आरसीपी सिंह की भाजपा नेताओं से बहुत नजदीकी संबंध बन गए जिससे भी नीतीश बहुत परेशान थे और उनको लग रहा था कि महाराष्ट्र की तरह आरसीपी सिंह को इस्तेमाल करके भाजपा नीतीश कुमार को अलग थलग कर देगी. नीतीश ने आरसीपी सिंह का राज्यसभा का कार्यकाल नहीं बढ़ाया और इससे उनका मंत्री पद स्वतः समाप्त हो गया जिससे आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार के बीच दूरियां बढ़ गई. भागन वीर के मामले में जब बिहार में प्रदर्शन हुए तो नीतीश ने उन्हें रोकने का कोई प्रयास नहीं किया इसलिए बिहार में सार्वजनिक संपत्ति या खासतौर से रेलवे संपत्तियों को जितना नुकसान पहुंचाया गया उतना किसी भी राज्य में नहीं किया गया. यही नहीं राज्य में भाजपा के कई कार्यालयों को आग के हवाले कर दिया गया लेकिन नीतीश खामोश रहे. नीतीश उसी समय आरजेडी के साथ महागठबंधन में शामिल होना चाहते थे लेकिन भाजपा चाहते थे कि राष्ट्रपति का चुनाव होने तक किसी भी तरह नीतीश को अपने पाले में रखा जाए और वे ऐसा करने में कामयाब रही.

नीतीश कुमार की नाराजगी फिर भी दूर नहीं हुई और वह केंद्र सरकार से बुलावे के बाद भी उसके कई समारोहों से दूर रहे. भाजपा से नजदीकी को लेकर ही जेडीयू ने अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता अजय आलोक को भी पार्टी से निष्कासित कर दिया पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए और उनसे स्पष्टीकरण मांगा गया जिसपर जवाब देने की बजाय उन्होंने पार्टी से इस्तीफा दे दिया और पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए. यही से ऐसा मोड़ आ गया जिसपर नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग हो जाना ही बेहतर समझा और इसलिए राज्य में माहौल एकदम से गर्म हो गया है और अगले अड़तालीस घंटों में नीतीश कुमार आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बना सकते हैं.

मैंने 19 जून को यूट्यूब पर एक वीडियो अपलोड किया था जिसमें यह भविष्यवाणी की थी कि नीतीश कुमार पलटी मारने वाले हैं.  



आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने नीतीश कुमार को पलटू राम का नाम एकदम सही दिया था क्योंकि वह बीजेपी से पलटी मार कर आरजेडी के साथ आए और फिर आरजेडी से पलटी मार कर बीजेपी के साथ गए और अब बीजेपी से फिर पलटी मार कर आरजेडी के साथ जा रहे हैं. .

 

 

 

 

 

 

शुक्रवार, 5 अगस्त 2022

लाल सिंह चड्ढा - फिल्म का नहीं आमिर और करीना खान का बहिष्कार है



लाल सिंह चड्ढा फ़िल्म हॉलीवुड फ़िल्म फॉरेस्ट गम्प रीमेक है जिसे ऑस्कर  अवार्ड मिल चुका है. आमिर खान ने इस कहानी को नकल करके हिंदी रूपांतरित किया है और इसका कारण है इस फ़िल्म की लोकप्रियता को हिंदुस्तान में भुनाकर ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना और उस पैसे का हिंदुस्तान के विरुद्ध प्रोपगंडा फैलाने में इस्तेमाल करना. इसे   कोई भी स्वाभिमानी हिन्दुस्तानी विशेषता हिंदू बर्दाश्त नहीं कर सकता. इसलिए हमें ऐसे व्यक्ति की वित्तीय स्रोतों को भी रोकना पड़ेगा.

आमिर खान ने लगभग 50,000 लोगों को पूरे हिंदुस्तान में इस फ़िल्म के प्रचार में और फ़िल्म के बायकाट में लगे लोगों को जवाब देने के लिए लगा दिया है, इनमें अधिसंख्य हिंदू ही है इसलिए सभी को बहुत सावधान रहने की आवश्यकता है और किसी के झांसे में नहीं आना चाहिए.

फ़िल्म की कहानी, घटनाक्रम और उसके संदेश से हमें कोई समस्या नहीं है अगर समस्या है तो वह आमिर खान और करीना खान से.

आमिर खान कट्टर पंथी मुसलमान है और उन्होंने कह रखा है कि उनकी बीवी तो हिंदू होगी लेकिन बच्चे मुसलमान होंगे और इसी लव जिहाद के दृष्टिकोण से उन्होंने अभी तक दो शादियां की हैं और वह भी दोनों हिंदू लड़कियों से. पहली हिंदू पत्नी रीना दत्ता को तलाक दे दिया जिनसे पैदा हुए दोनों  बच्चे मुसलमान हैं. दूसरे लव जेहाद के बाद उन्होंने किरण राव से शादी की और उससे भी दो बच्चे हैं, दोनों मुसलमान है और किरण राव  को भी बिना किसी कारण के तलाक दे चूके हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध शेखर गुप्ता को एक इंटरव्यू देते हुए उन्होंने उनकी जमकर भर्त्सना की थी और उन्हें और उनके हिंदू साथियों को मुस्लिम नरसंहार का जिम्मेदार ठहराया था, जबकि गोधरा नरसंहार के बारे में उन्होंने जबान भी नहीं खोली थी. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद दूसरे कट्टरपंथियों की हाँ में हाँ मिलाते हुए उन्होंने भी वक्त भी दिया था कि उन्हें हिंदुस्तान में डर लग रहा है और उनकी पत्नी किरण राव बच्चों को लेकर चिंतित रहती है और किसी इस्लामिक देश में बसना चाहती है.

आमिर खान की फ़िल्म पीके को कौन भूल सकता है जिसमे उन्होंने हिंदी देवताओं का इतना अपमान किया कि अगर कोई इतना इस्लाम के बारे में करे तो शायद कयामत आ जाएगी.

इस फ़िल्म की दूसरी पात्र हैं करीना खान जो ऐसे परिवार से ताल्लुक रखते हैं जिसे विभाजन के समय पाकिस्तान मैं उसके मुस्लिम पड़ोसियों ने  मार मार कर भगा दिया गया था लेकिन उसी खानदान की लड़की ने एक अफगान लुटेरे के वंशज से शादी की जो भी चाल चलन और चरित्र में आमिर खान जैसा ही है उसने भी दो शादियां की और दोनों हिंदू लड़कियों से. पहली पत्नी से पैदा हुए दोनों बच्चे मुसलमान हैं और अमृता सिंह को तलाक दे दिया. दूसरी पत्नी करीना खान से पैदा दोनों बच्चे हिंदुओं को अपमानित करने वाले हैं क्योंकि एक का नाम है तैमूर और दूसरे का नाम है जहाँगीर. जो हिंदू लड़की अपने बच्चे का नाम तैमूर रख सकती है उसे किसी भी हिंदू से सहानुभूति की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. उसने कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू में कहा था की तो लोग मेरी फ़िल्म देखने ना जाए क्यों जाते हैं. अभी हाल ही में एक बयान दिया है कि लाल सिंह चड्ढा के विरुद्ध बायकॉट नहीं चलेगा और लोग बड़ी संख्या में फ़िल्म देखने सिनेमाघरों में आएँगे, जिसे सभी स्वाभिमानी हिंदुओं ने चुनौती के रूप में स्वीकार कर लिया है.

अब फैसला आपका है आपको क्या करना है. अच्छा तो यह है कि आप जो रुपए टिकट पर बर्बाद करेंगे वह गरीब बच्चों पर खर्च कर दे और अगर आपके पास अधिक पैसा नहीं है तो कम से कम अपने बच्चों के लिए बचा कर रखें.

ऑस्कर पुरस्कार प्राप्त फ़िल्म फॉरेस्ट गम्प यू ट्यूब पर मुफ्त में उपलब्ध है उसे देखिए और इन दोनों को सबक सिखाइए.

-    Shiv Mishra www.bakjhak.com

 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

Lal Singh Chaddha film is a remake of Hollywood film Forrest Gump which has received Oscar Award. Aamir Khan has copied this story. The reason for which is to earn maximum money by redeeming the popularity of this film in India and use that money to spread propaganda against India. This cannot be tolerated by any self-respecting Indian more especially Hindu. So, we have to curb the financial sources of such person.

Aamir Khan has engaged about 50,000 people all over India to promote this film and reply to the boycott campain of the film, majority of them are Hindus. So, everyone needs to be very careful and do not fall prey to anyone's hoax. should not come.

We have no problem with the story, events, and social message of the film, but Hindus have   problems  with Aamir Khan and Kareena Khan.

Aamir Khan is a fanatic Muslim, and he has said that his wives will be Hindu, but children will be Muslims. From the love jihad point of view, he has done two marriages so far and that too with both Hindu girls. He has already divorced the first Hindu wife Reena Dutta, from whom both the children born are Muslims. After the second love jihad, he married Kiran Rao and has two children from her, both are Muslims and have also divorced Kiran Rao without any reason.

While giving an interview to Shekhar Gupta he had strongly condemned Modi and held him and his Hindu ministers responsible for the Muslim massacre in Gujrat, while he did not even open his mouth about the Godhra massacre of Hindus.

Soon after Narendra Modi became the Prime Minister, he along with the other extremists, said  that he is afraid of  in India and his wife Kiran Rao is worried about children and wants to settle in an Islamic country.

Who can forget Aamir Khan's film PK, in which he insulted Hindi Gods so much that if someone does this much about Islam, then perhaps doom will come?

The second character in this film is Kareena Khan, who belongs to a family that was lynched by her Muslim neighbors in Pakistan at the time of partition, but the girl of the same family married the descendant of an Afghan robber Saif Ali Khan. He is similar to Aamir Khan in character, he also did two marriages and both with Hindu girls. Both the children born to the first wife are Muslims and divorced Amrita Singh. Both the children born to second wife Kareena Khan are going to humiliate Hindus because one's name is Taimur and the other's name is Jahangir. A Hindu girl who can name her child Taimur should not expect sympathy from any Hindus. She had said in an interview a few days ago that why do people go to see my film. More recently, a statement has been made that the boycott will not work against Lal Singh Chaddha and people will come in large numbers to the cinema halls to watch the film, which has been accepted as a challenge by all self-respecting Hindus.

Now the decision is yours what you must do. It is better that the money that you will be wasting on the ticket should be spent on poor children and if you do not have much money then at least save it for your children.

Watch the Oscar-winning film Forrest Gump for free on YouTube and teach them a lesson.

Jai Hind.

-    Shive Mishra www.bakjhak.com

शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

You can overtake number 1 and win the race provided you focus.

रंजन विहीन अधीर कांग्रेस - स्वत: समाप्ति की ओर

 


संवेदनाहीन कांग्रेस का बौद्धिक क्षरण

लंबे समय से कांग्रेस परिवारवाद की गंभीर बीमारी का शिकार तो है लेकिन अनुशासनहीनता, पलायन, जड़ता के बाद अब मूढ़ता ने भी कांग्रेस को घेर रखा है. 1885 में एक अंग्रेज ए ओ ह्यूम  द्वारा कांग्रेस का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि इससे भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए वार्ता करने हेतु एक माध्यम उपलब्ध कराए जा सकेगा और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा अंग्रेजी शासन के विरोध की धार को भी कुंद किया जा सके और आंदोलनों के फलस्वरूप सार्वजनिक संपत्तियों को होने वाले नुकसान को रोका जा सकेगा. शुरुआती दौर में कांग्रेस अंग्रेजों के हाथ का खिलौना थी लेकिन जैसे जैसे इसमें राष्ट्रवादी नेताओं का जुड़ाव होता गया स्वतंत्रता आंदोलन की धार दिन प्रति दिन और तेज होती गई.

अंग्रेजों ने बहुत चतुराई से दक्षिण अफ्रीका से गांधीजी को स्पीड ब्रेकर के रूप में भारत बुला लिया. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजी सरकार और आंदोलनों के बीच समन्वय बनाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे वह कांग्रेस के निर्विवाद नेता बन गए. कांग्रेस पर एक तरह से उनका पूरा पूरा आधिपत्य हो गया. उन्होंने कांग्रेस को जैसा चाहा वैसा चलाया और हमेशा अंग्रेजी सरकार से टकराव का रास्ता टालने का काम किया जो अंग्रेजी सरकार का उद्देश्य था. इसीलिए कांग्रेस बनने के बाद भी 60 वर्ष तक अंग्रेजी शासन बड़े आराम से भारत में बना रहा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब अंग्रेजों को सुभाष चंद बोस, तथा अन्य क्रांतिकारियों के दबाव तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलती परिस्थितियों और ब्रिटेन के लिए भारत की सत्ता गैर लाभकारी हो जाने के कारण भारत छोड़ना पड़ा तो गांधीजी ने कांग्रेस को समाप्त कर देने का प्रस्ताव दिया था. इसका कुछ भी अर्थ लगाया जा सकता है एक तो  अंग्रेजों का भारत से शासन खत्म हो गया था, इसलिए कांग्रेस का बने रहना अंग्रेजों की आवश्यकता नहीं थी और दूसरा चूंकि  भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो चुकी थी इसलिए भी कांग्रेस के गठन का उद्देश्य पूरा हो गया था, इसलिए भी कांग्रेस का समाप्त हो जाना  उचित था.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  भी नेहरू ने कांग्रेस को खत्म नहीं होने दिया और  गांधी के निधन के बाद कांग्रेस पूरी तरह से उनके कब्जे में आ गई थी. तब से लेकर आज तक कांग्रेस पर नेहरू परिवार का वर्चस्व कायम है. नेहरू की नीतियों के कारण कई बड़े नेता कांग्रेस छोड़ने लगे थे और ये सिलसिला इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में और बढ़ गया. यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि इंदिरा गाँधी स्वयं कांग्रेस के  विभाजन का कारण बनी और उन्होंने विभाजित कांग्रेस के एक धड़े पर अपना साम्राज्य खड़ा किया. जिसके बाद उनके कब्जे वाली कांग्रेस पूरी तरह से परिवारवादी पार्टी बन गई.

1975 में आपातकाल लगाने और उसकी ज्यादतियों के विरोध में जनता का गुस्सा चरम पर था और इसे भांपते हुए कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी. ये सिलसिला राजीव गाँधी के शासनकाल में भी चलता रहा जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी थी. कांग्रेस ने 1991 में पीवी नरसिंहा राव और 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई लेकिन दोनों ही बार सरकार जाने के बाद कई नेताओं ने पार्टी छोड़ी. 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से कांग्रेस से पलायन का सिलसिला और तेज हो गया जो अब तक जारी है. ऐसा लगता है कि अब कांग्रेस में वही नेता बचे हैं जिनका कोई विशेष जनाधार नहीं है और जिन्हें गाँधी परिवार से अलग होकर अपना कोई भविष्य दिखाई नहीं देता. वैसे तो कांग्रेस में कभी भी गाँधी परिवार के कट्टर समर्थकों की कमी नहीं रही लेकिन इंदिरागांधी के उदय के बाद से लेकर अब तक गाँधी परिवार के अति विश्वासपात्र ही सत्ता संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

कांग्रेस में होते रहे इस तरह के पलायन से न केवल प्रखर और तेजस्वी नेता कांग्रेस से निकलते चले गए बल्कि समाज के बौद्धिक वर्ग का जुड़ाव भी कांग्रेस से धीरे धीरे कम होता चला गया. गाँधी परिवार के नेताओं में भी क्रमिक रूप से बुद्धि, विवेक और राजनीतिक सूझबूझ की कमी होती चली गयी. सोनिया गाँधी का विदेशी मूल का होना उनके विरुद्ध जाता है और लगभग 54 साल पहले किसी भारतीय से विवाह करने के बाद भी आज तक ठीक से हिंदी न बोल पाना भी उनके जनता से जुड़ाव न हो पाने का एक प्रमुख कारण हैं. उनके बाद कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गाँधी भी अब तक भारत की राजनीति में कोई छाप नहीं छोड़ सके हैं. अक्सर अपनी अविवेकपूर्ण टिप्पणियों से अपनी  और कांग्रेस की जगहंसाई कराते हैं. वह अपने  गैर जिम्मेदार वक्तव्यों से अक्सर जनता के कोपभाजन का शिकार भी बनते हैं. 50 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी उनमें राजनैतिक परिपक्वता, सूझबूझ और  सुलझे हुए नेता के लक्षण दूर दूर तक नजर नहीं आते.

राहुल के बाद ट्रम्प कार्ड के तौर पर प्रियंका वॉड्रा पर दांव लगाना भी कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा नहीं हुआ क्योंकि उनकी राजनीति में आने से पहले ही उनके पति रॉबर्ट वाड्रा अपनी कारगुजारियों से देश में कुख्यात हो चुके थे जिसका भूत कभी प्रियंका वाड्रा का साथ नहीं छोड़ता. उत्तर प्रदेश में २०१७ और २०२२ में हुए विधान सभा चुनाव और २०१९ के  लोकसभा चुनाव की कमान संभालने के बाद भी वह प्रदेश में पार्टी का जनाधार भी नहीं बचा सकी. उत्तर प्रदेश से पार्टी का केवल एक लोकसभा सांसद हैं और वे स्वयं सोनिया गाँधी है, विधानसभा में पार्टी के केवल दो विधायक हैं और विधान परिषद से पार्टी का सफाया हो चुका है. पार्टी की आशा के विपरीत उन्होंने प्रदेश में जो कुछ भी किया वह काम कम कारनामे ज्यादा है. कांग्रेस ने तुष्टिकरण की पराकाष्ठा पार करने के बाद हिंदुत्व का चोला ओढ़ने की कोशिश जरूर की और राहुल और प्रियंका खूब मंदिर परिक्रमा करते रहे और अपना गोत्र बताते रहे लेकिन स्थिति हास्यास्पद होती गयी.

चापलूसो,चाटुकारों और पारिवारिक निष्ठावान नेताओं पर भरोसा करने वाले गाँधी परिवार ने पार्टी के बुद्धिमान और तेजस्वी नेताओं की हमेशा से ही उपेक्षा की और देश की राजनीति के बदलते समीकरणों में ऐसे सभी नेता एक एक करके पार्टी छोड़ते चले जा रहे हैं. शायद अब केवल ऐसे ही लोग बचे हैं जिन्हें अभी कहीं और ठिकाना नजर नहीं आता. कांग्रेस को अभी भी इस सबसे कोई चिंता नहीं है और अभी भी  अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे नेताओं को ही बैठाया जा रहा है जो केवल परिवार के प्रति निष्ठावान है.

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी भी इसी श्रेणी के नेता है जो कांग्रेस की प्रतिष्ठा केवल सदन में ही  नहीं बल्कि समूचे देश में  जनता की नजरों में गिराने का काम बड़ी मेहनत, सिद्दत  और निष्ठा से करते चले आ रहे हैं. उन्होंने धारा 370 हटाने का विरोध करते हुए कहा था कि जब मामला संयुक्त राष्ट्र में विचाराधीन है तो इसे कैसे हटाया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना यह काम करना देश हित में नहीं है. उन्होंने लद्दाख और जम्मू कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का भी विरोध किया था. नया मामला यह है कि अधीर रंजन चौधरी ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपत्नी कहकर संबोधित किया. उन्होंने पहले राष्ट्रपति शब्द स्तेमाल किया थी बाद में जानबूझ कर राष्ट्रपत्नी कहा जैसे कि पहले जो कहा था वह गलत था, "राष्ट्रपति नहीं राष्ट्रपत्नी...  हिन्दुस्तान की राष्ट्रपत्नी जी सभी के लिए है उनके लिए क्यों नहीं है. इस पर लोकसभा में काफ़ी हो हल्ला हुआ, और सोनिया गाँधी और स्मृति इरानी में काफी नोकझोंक भी हुई. यद्यपि अधीर रंजन चौधरी ने यह तो कहा कि उनसे चूक हो गयी लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में माफी नहीं मांगी. यही नहीं कांग्रेस के नेता उदयराज और रेणुका चौधरी ने भी कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इससे पहले कांग्रेस के नेता अजय कुमार ने भी द्रोपदी मुर्मू के बारे में विवादास्पद बयान दे चुके हैं. 

अधीर रंजन का पिछला रिकॉर्ड बहुत ख़राब है, उनकी जबान नहीं फिसलती बल्कि  उनके पास फिसला हुआ दिमाग है. पहले भी इंदिरा और मोदी तुलना करते  हुए उन्होंने कहा था कि कहाँ मां गंगा ( इंदिरा जी ) और कहाँ गंदी नाली (मोदी). ये सभी बयान  गांधी परिवार के सदस्यों से मिलते जुलते हैं, जैसे जहर की खेती, मौत का सौदागर, नाली का कीड़ा आदि . हो सकता है  इसीलिये उन्हें  लोकसभा में कांग्रेस का नेता पद दिया गया हो.         

आजादी के 75 साल तक कांग्रेस ने जिस आदिवासी समाज की सुधि नहीं ली, उस समाज की प्रथम राष्ट्रपति और देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति का चुनाव में विरोध करके कांग्रेस पहले ही पूरे देश को गलत संदेश दे चुकी है, रही सही कसर अधीर रंजन ने पूरी कर दी. पता नहीं कभी ऐसा समय आएगा भी या नहीं जब कांग्रेस का ब्रेन ड्रेन रुकेगा और पार्टी परिवारवाद की छाया से निकलकर वह अपने राजनैतिक उत्तरदायित्व का निर्वहन कर पाएगी या गांधी की इच्छानुरूप स्वत: समाप्त हो जायेगी.

     ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

                 - शिव मिश्रा  

            responsetospm@gmail.com

 

 

 

 

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...