बुधवार, 15 सितंबर 2021

गाय, सनातन संस्कृति और न्यायिक दृष्टिकोण

 


 


अभी हाल ही में प्रयागराज उच्च न्यायालय ने वैदिक, पौराणिक, सांस्कृतिक महत्व व सामाजिक उपयोगिता को देखते हुए गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने का सुझाव दिया है जो बहुत ही स्वागत योग्य है। हिंदुस्तान के वर्तमान हालात को देखते हुए किसी न्यायाधीश द्वारा इस तरह का निर्णय और सुझाव निश्चित रूप से साहसिक है, वरना आज  कुछ  न्यायाधीश प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष दिखाई देने के चक्कर में संवैधानिक बाध्यता ओं का हवाला देते हुए अजीबोगरीब फैसले दे  देते हैं, या फिर फैसले देने से बचते रहते हैं.

 

न्यायाधीश महोदय का बहुत-बहुत साधुवाद  खास तौर से इस बात के लिए कि उन्होंने  पौराणिक, धार्मिक और आर्थिक महत्व को रेखांकित  करते हुए कहा कि भारत में गाय को माता माना जाता है और यह हिंदुओं की आस्था का विषय है और आस्था पर चोट  करने से देश कमजोर होता है। उच्च न्यायालय ने कहा कि  गौमांस खाना किसी का मौलिक अधिकार नहीं है। जीभ के स्वाद के लिए जीवन का अधिकार नहीं छीना जा सकता। बूढ़ी बीमार गाय भी कृषि के लिए उपयोगी होती है इसलिए  इसकी हत्या की अनुमति देना ठीक नहीं। यह भारतीय कृषि की रीढ़ है।

 

न्यायाधीश ने गौ माता को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की बात इसलिए की क्योंकि ऐसा करने से गाय संरक्षित पशु की श्रेणी में आ जाएगी और फिर गोवध पर लोगों को सख्त सजा का प्रावधान हो जाएगा. हाल के वर्षों में किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को दी गई यह बेहद अच्छी सलाह  है, लेकिन केंद्र सरकार इस पर अमल करेगी इसकी संभावना बिल्कुल भी दिखाई पड़ती है क्योंकि ऐसा करने से राजनीतिक वातावरण बहुत गर्म हो जाएगा और तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों की जमात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार में लग जाएगी. इसके पहले भी विभिन्न उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय भी केंद्र सरकार को समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सिफारिश कर चुके हैं  लेकिन केंद्र कि किसी भी सरकार ने राजनीतिक कारणवश उस पर  विचार तक नहीं किया.

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत उम्मीदें हैं लेकिन अब तो वह भी अपने लोकप्रिय  नारे “सबका साथ, सबका विकास” में “सबका विश्वास” भी  जोड़ चुके हैं, और ऐसा लगता है कि इस समय वह छद्म  धर्मनिरपेक्षता वादियों के दबाव में हैं, इसलिए बहुत कम उम्मीद है कि वह भी इस दिशा में जल्द ही कोई कदम उठाएंगे.

गाय इतनी महत्वपूर्ण  क्यों ?

सनातन ​ग्रंथों के अनुसार गाय सृष्टि मातृका कही जाती है। गाय के रूप में पृथ्वी की करुण पुकार और विष्णु से अवतार के लिए निवेदन के प्रसंग पुराणों में बहुत मिलते  हैं। इसलिए  गाय सहज रूप से भारतीय जनमानस में रची-बसी है। गौ सेवा को एक सनातन  कर्तव्य के रूप में माना जाता  है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार गाय के सन्दर्भ में निम्न बिंदु बहुत महत्वपूर्ण हैं  -

  • ·       ऋग्वेद में गाय को अघन्या कहा गया है। यजुर्वेद के अनुसार गौ अनुपमेय है। अथर्ववेद में गाय को संपतियों का घर कहा गया है ।
  • ·       पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गौएँ  साक्षात विष्णु रूप होती है, गौयें  सर्व वेदमयी और वेद गौमय है.
  • ·       भगवान शिव के प्रिय पत्र ‘बिल्वपत्र’ की उत्पत्ति गाय के गोबर में से ही हुई थी।
  • ·       गरुड़ पुराण में  वैतरणी पार करने के लिए गौ दान का महत्व बताया गया है।
  • ·       सप्त ऋषियों ने कामधेनु नामक गाय को देवताओं को प्रदान किया था . कामधेनु के बारे में कहा जाता है कि वह जहां भी होती थीं, वहां किसी भी चीज की कमी नहीं होती थी और संपन्नता, समृद्धि और शक्ति का अनुपम समन्वय होता था.
  • ·       गाय में 33 कोटि देवी-देवता निवास करते हैं। ( कोटि का अर्थ करोड़ नहीं होता बल्कि प्रकार होता है ) ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं।
  • ·       गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय के नए परिवार और प्रकार बनाए थे उनके नाम उस समय  कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था।
  • ·       भगवान श्रीकृष्ण  तो गाय के महत्व को रेखांकित करने के लिए स्वयं गोपालक (ग्वाला ) बने और गाय पूजा शुरू की. गौशालाओं के निर्माण शुरुआत उन्होंने ही की थी. उन्हें सार ज्ञानकोष गोचरण से ही प्राप्त हुआ था।
  • ·       भगवान राम के पूर्वज महाराजा दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे।

 


सनातन धर्म की बहुत बड़ी विशेषता है कि इसमें किसी नियम को किसी पर  जबरदस्ती नहीं थोपा जाता  है. वेद पुराण भी केवल  मार्गदर्शन का काम करते हैं  और उनमें गाय का इतना महिमामंडन  यह संकेत करता है कि अगर संसार को बचाना है तो गाय को बचाना ही होगा. कम से कम भारत के संदर्भ में तो हमें कह सकते हैं कि गाय को बचा कर ही हम इस देश को बचा सकते है|

 

ऐसा भी  नहीं है कि केवल सनातन धर्म या हिंदू समाज ही गाय के बारे में ऐसी पवित्र सोच रखता है,  बल्कि दूसरे धर्म के संस्थापको, प्रवर्तकों और अन्य महापुरुषों ने भी गाय को अत्यंत पूजनीय और महत्वपूर्ण बताया है.

  • ·       ईसा मसीह ने कहा था  कि एक गाय या बैल को मारना एक मनुष्य को मारने के समान है।
  • ·       गुरु गोविंदसिंहजी ने कहा, ‘यही देहु आज्ञा तुरुक को खापाऊं, गौ माता का दुःख सदा मैं मिटाऊं।'
  • ·       जैन आगमों में कामधेनु को स्वर्ग की गाय कहा गया है और प्राणिमात्र को अवध्या माना है। भगवान महावीर के अनुसार गौ रक्षा बिना मानव रक्षा संभव नहीं।
  • ·       पं. मदनमोहन मालवीय की अंतिम इच्छा थी कि भारतीय संविधान में सबसे पहली धारा सम्पूर्ण गौवंश हत्या निषेध की बने। पंडित मदनमोहन मालवीय का कथन था कि यदि हम गायों की रक्षा करेंगे तो गाएं हमारी रक्षा करेंगी।
  • ·       महर्षि अरविंद ने कहा था कि गौ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की धात्री होने के कारण कामधेनु है। इसका अनिष्ट चिंतन ही पराभव का कारण है।
  • ·       मुस्लिम कवि रसखान ने कहा- 'जो पशु हों तो कहा बसु मेरो, चरों नित नंद की धेनु मंझारन।'
  • ·       स्वामी दयानन्द सरस्वती ने  गाय के लिए आर्थिक व्याख्या करते हुए कहा कि एक गाय अपने जीवनकाल में 4,10,440 मनुष्यों हेतु एक समय का भोजन जुटाती है जबकि उसके मांस से 80 मांसाहारी लोग अपना पेट भर सकते हैं।


क्या कहते हैं प्राचीन ग्रंथ और वैज्ञानिक शोध

    सनातन परम्परा में माना जाता है कि गाय का दूध अमृत और दूध के सभी पदार्थ अमृत तुल्य  होते हैं.  संभवत गाय संसार में एकमात्र प्राणी है जिसके मल मूत्र में भी अनेक औषधीय गुण हैं. आयुर्वेदिक पद्धति में गाय के  मूत्र और गोबर से अनेक जटिल और असाध्य बीमारियों का  सफलतापूर्वक उपचार किया जाता है.

    गाय सकारात्मक ऊर्जा का सृजन करती है और यह दुर्लभ गुण गाय  के अलावा किसी अन्य प्राणी में नहीं देखा गया है.

    गाय की पीठ पर रीढ़ की हड्डी में स्थित सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोक कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं। यह पर्यावरण के लिए लाभदायक है।

    गाय की रीढ़ में स्थित सूर्यकेतु नाड़ी सर्वरोगनाशक, सर्वविषनाशक होती है जो सूर्य के संपर्क में आने पर स्वर्ण  उत्पादन करती है जो गाय के सभी उत्पादों में विद्यमान होता है.

    पृथ्वी पर सामान्यतया सभी जीव ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड गैस छोड़ते हैं लेकिन  गाय  एकमात्र ऐसा जीव है जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है.

    गाय के दूध दही घी मूत्र और गोबर द्वारा निर्मित पंचगव्य मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर कई असाध्य रोगों का उपचार करता है ।

    गाय के गोबर में विटामिन B12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो रेडियोधर्मी किरणों को भी सोख  लेने की क्षमता रखता हैइससे से निकला धुंआ  कीटाणु और दुर्गंध नाशक होता है ।

    गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिए लाभदायक हैं जो  सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते। अनुमानत:  एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।

    गाय का गोबर प्राचीन काल से ही चर्म रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है और यह अत्यंत लाभकारी पाया गया है. गोबर में अनेक जीवाणु होते हैं जो कीटाणु नाशक होते हैं और भूमि को उर्वरा बनाते हैं । गाय के गोबर का प्रयोग घर और मकानों की लिपाई पुताई में काम आता है. मांगलिक कार्यों में गाय के गोबर आंगन की लिपाई की जाती है.

·       गौ उत्पादों पर किये गए वैज्ञानिक शोधों से  अनेक आश्चर्यजनक तथ्य सामने  आये हैं जिन्हें सम्पूर्ण मानवजाति की भलाई के लिए उपयोग किया जा सकता है. 

 

भारत में गौ हत्या का प्रारंभ उस समय से हुआ जब से राक्षसी प्रवृत्ति के पाशविक और  बर्बर  आक्रांताओं ने भारत में प्रवेश किया। हिन्दू लाख समझाते रहे कि गौमाता सारे संसार की जननी के समान है।उसके शरीर के हर अंश में लोक कल्याण छिपा है. इसलिये उसकी हत्या नहीं, उसका पूजन किया जाना चाहिये पर इन राक्षसों पर कोई असर नहीं पड़ा। आज भी मूर्खता और विद्वेष के कारण बहुत से विधर्मी गौहत्या करते हैं और इसलिए यह गौ रक्षकों और गौ भक्षकों  के बीच विवाद का सबसे बड़ा कारण है.

वैसे तो सनातन संस्कृति नष्ट करने के प्रयास लगभग 2000 वर्षों से किए जा रहे हैं लेकिन आज स्वतंत्र भारत में भी सनातन संस्कृति को आघात पहुंचाने और आस्था को ठेस पहुंचा कर हिंदुओं का अपमान करने के उद्देश्य से कई अन्य धर्मावलंबी सार्वजनिक रूप से गोकशी करते हैं और गौ मांस खाने की पार्टियां ( बीफ फेस्टिवल) आयोजित करते हैं और सरकार असहाय साबित होती हैं. अंग्रेजी शासन में हिंदुओं का इसलिए मजाक उड़ाया जाता था कि वह गाय को माता मानते हैं.  वे अपने अल्प ज्ञान के कारण कभी यह नहीं समझ सके कि हिन्दू गौवंश का इतना सम्मान क्यों करते हैं ?

स्वतंत्रता के बाद भी तथाकथित  धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वालों ने भी बहुसंख्यक हिन्दुओं की इस धार्मिक सामाजिक और वैज्ञानिक मान्यता को बेरहमी से नजरअंदाज किया. कांग्रेसी सांसदों द्वारा गौ हत्या निषेध का बिल लाने पर नेहरू ने कहा था कि पूरे देश में गोवध निषेध का कानून लागू करना बेहद बेतुका और पिछड़ेपन का परिचायक होगा. इस बिल के विरोध में उन्होंने अपने सांसदों को धमकी देते हुए कहा था कि  यदि यह बिल पास हो जाता है तो वह अपने पद से त्यागपत्र दे देंगे. कुछ समकालीन लेखकों के अनुसार जवाहरलाल नेहरू स्वयं गौ मांस खाते थे और इसलिए वह गौ हत्या निषेध विधेयक के बिलकुल  खिलाफ थे.  


गाय और भारत की  राजनीति

भारत में राजनीतिक तुष्टिकरण का धंधा बहुत पुराना है किंतु अब यह निम्नता  के उस  स्तर तक पहुँच चुका  है जब कई राजनीतिक दल भारत की प्राचीन सनातन संस्कृति पर भी सीधा आघात करने से नहीं चूकते. अयोध्या, मथुरा और  काशी के मुद्दे इसी तुष्टीकरण की पराकाष्ठा है तो हिन्दुओं की भीरुता या बर्दास्त करने की असीमित क्षमता. स्वतन्त्र भारत में गौ हत्या की निरंतरता राजनीतिक तुष्टिकरण और  केंद्र सरकार की दीन हीन स्थिति का परिचायक रही है. ऐसा नहीं है कि यह स्थिति आज आ गई है, आजादी के बाद से यही स्थित चली आ रही है .

 

गोकशी  विदेशी आक्रांताओं  ने जो पाशविक  स्वभाव के  बहसी कबीलाई और बर्बर थे, ने शुरू किया था और अंग्रेजों ने इसे चलने दिया और  हिंदुओं के लिए सबसे ज्यादा मर्माहत करने वाली शर्मनाक बात यह  है कि आजादी के बाद भी तत्कालीन सरकार ने इसे चलते रहने दिया. प्रसिद्ध साधू-सन्यासियों, पंडित मदन मोहन मालवीय सहित कई कांग्रेसी नेता चाहते थे कि गौ हत्या के लिए एक राष्ट्रव्यापी कानून बनाया जाए लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेसी नेताओं द्वारा लाए गए बिल का धमकी देकर विरोध किया था कि यदि बिल पास हो गया तो वह इस्तीफा दे देंगे. इसके पीछे का कारण केवल यह नहीं है कि उन पर स्वयं गौ मांस खाने का आरोप लगता था, बल्कि यह विशुद्ध वोटों की तुष्टिकरण नीति थी. दूसरा कारण कांग्रेस सहित सभी दलों के हिंदू नेताओं  और जनता का अत्यंत भीरू और सब कुछ सहन करनेवाला  स्वभाव था जो हजारों साल के गुलामी के कारण  आज भी बरकरार है.

दूसरे धर्मावलंबियों की धमकियों के आगे नतमस्तक होते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए प्रगतिशील फैसले को रद्द करके रूढ़िवादी कानून बना दिया जाते हैं लेकिन हिंदुओं के इस देश में हिंदुओं की सुनने वाला शायद कोई नहीं है. 1966 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने साधू-सन्यासियों को वचन दिया था कि यदि उनकी  सरकार बनी  तो वह गौ हत्या बंद  करने के लिए कानून बनाएंगी किंतु बाद में वह वामपंथ इस्लामिक गठजोड़ के आगे झुक गई और अपने वायदे से मुकर गई. विरोध स्वरूप साधु सन्यासियों ने संसद के सामने विशाल प्रदर्शन किया जिसकी अगुवाई स्वामी करपात्री जी महाराज कर रहे थे. इंदिरा गांधी  ने निहत्थे साधू सन्यासियों पर गोली चलवा दी, जिससे सैकड़ों साधु मारे गए. बाद में कई साधुओं ने दिल्ली में गौ हत्या कानून बनाने के लिए आमरण अनशन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए. 7 नवम्बर 1966 को  घटी इस घटना के बाद स्थिति जस की तस है अंतर केवल यह आया है कि कुछ राज्य सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में गौ हत्या कानून बनाये हैं लेकिन ये  कानून भी प्रभावी नहीं है और ज्यादातर क़त्लखानों में आज भी गौ हत्या की जा रही हैं.


आश्चर्यजनक बात यह भी है कि ऐसे राज्यों जहां गौ हत्या पर प्रतिबंध है, से गोवंश की तस्करी दूसरे राज्यों में की जाती है जहां इन पर प्रतिबंध नहीं है और वहां इनका कत्ल कर दिया जाता है.  यही नहीं उत्तर भारत के कई राज्यों से गोवंश  तस्करी करके नेपाल और बांग्लादेश ले जाये  जाते हैं, और सुरक्षा एजेंसियां कुछ नहीं करती जिसका मुख्य कारण सीमा पर  भ्रष्टाचार है.  सिस्टम इतना लाचार और लचर हो गया है कि वह स्वयं देश के विरुद्ध काम कर रहा है. जब कभी गौ रक्षक ऐसे लोगों को पकड़ते हैं, तो अपना अपराध छिपाने के लिए, धर्म विशेष के लोग राजनीतिक दलों की शरण में हाय तौबा मचा कर मॉब लिंचिंग का हव्वा खड़ा करते हैं और   बहुसंख्यको को डराने का काम करते हैं.

 

गौ हत्या निषेध कानून बनाने के अलावा भी केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें गौ संरक्षण की दिशा में सक्रियता नहीं दिखा रही है और न ही गौ संरक्षण के लिए कोई प्रोत्साहन या प्रयाप्त भरण-पोषण राशि ही दी जाती है. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद यद्यपि गौ हत्या निषेध का कानून बहुत सख्ती से अमल में लाया जा रहा है और अनधिकृत रूप से चल रहे क़त्ल खानों पर लगाम लगाई गई है. इसके बहुत ही सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं और गोवंश की रक्षा की जा रही है लेकिन इसके कारण कई नई समस्याओं का भी उदय हो गया है. पर्याप्त संख्या में गौशाला ना होने के कारण, गोवंश  छुट्टा घूमते  हैं और किसानों की फसल बर्बाद करते हैं. किसान और ग्रामीण इनको वंश को पकड़कर  गौशाला में ले जाते हैं लेकिन संसाधन ना होने के कारण गौशाला संचालक इन्हें पुनः छोड़ देते हैं. ग्रामीण अंचलों में यह स्थिति अत्यंत विकराल हो रही है.


 राज्य सरकार को तुरंत इसमें हस्तक्षेप करके पर्याप्त संख्या में नई गौशालाये खोलना चाहिए और इनमें गोवंश के भरण-पोषण के लिए समुचित संसाधन उपलब्ध कराने चाहिए. पूरे देश में ज्यादातर गौशालाये गो भक्तों के अंशदान से चल रही हैं लेकिन इनकी बढ़ती संख्या जो हर्ष का विषय होनी चाहिए थी वह लोगों की परेशानियों का कारण बनती जा रही है. जब तक केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारें अधिक से अधिक नई गौशालाएं  नहीं खोलती और इन्हें  आर्थिक रूप से मजबूत  नहीं करती, इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकल सकता.


समय की मांग है कि सरकारें तुरंत  न केवल गौहत्या निषेध कानून  बनाए बल्कि गौसंरक्षण के लिए अधिकाधिक धन उपलब्ध कराएं अन्यथा इस दिशा में कोई विशेष  प्रगति नहीं हो सकेगी. 

                            - शिव मिश्रा 

-    लेखक भारतीय  स्टेट बैंक के सेवा निवृत्त उप महाप्रबंधक एवं समसामयिक मामलो के लेखक हैं

 

       

शनिवार, 11 सितंबर 2021

भ्रष्टाचार, विकाश और राजनीति - उ.प्र के आयने में

 

 


 

भ्रष्टाचार भारत में बिल्कुल भी नया नहीं है लेकिन यह कब शुरू हुआ इसके लिए कोई सटीक उत्तर नहीं मिलता. फिर भी भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप में शुरू करने का श्रेय अंग्रेजी शासन को देना अनुचित नहीं होगा.  अंग्रेजों की सरकार  में भारतीय कर्मचारियों के वेतन और भत्ते इतने  कम होते थे कि जिनसे उनका गुजारा होना भी संभव नहीं था, लेकिन अंग्रेजों ने एक रास्ता खुला छोड़ रखा था  कि कर्मचारी चाहे तो अपने लिए स्वयं जनता से व्यवस्था कर सकते हैं बशर्ते सरकार का कोई नुकसान न हो. उस जमाने में सरकारी विभागों के नाम पर पुलिस  और राजस्व विभाग प्रमुख थे, और ऐसा माना जाता है कि इन विभागों में भ्रष्टाचार था जो आज तक बदस्तूर कायम है.

आजादी के बाद भी इसमें कुछ भी नहीं बदला क्योंकि आजादी सत्ता का हस्तांतरण मात्र थी कर्मचारी भी वही और जनता भी वही  केवल शासक बदल गए थे जिनकी मानसिकता भी अंग्रेजों वाली ही थी. समय के साथ जैसे-जैसे नई विभाग बनते गए भ्रष्टाचार भी अपना दायरा बढ़ाता चला गया. धीरे धीरे भ्रष्टाचार ने पूरे देश को जकड़ लिया और  सरकार में सर्वोच्च स्तरों पर भी भ्रष्टाचार शुरू हो गया, यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों में भी भ्रष्टाचार होने लगा और हथियारों की खरीद  भी इससे अछूती नहीं रही. न्याय के मंदिर कहे जाने वाले न्यायालय में भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा ली. राज्यों के  मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्रियों के ऊपर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं और कई  मामलों में यह साबित भी हो गए. कई मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र केंद्रीय मंत्रियों को सजा भी हुई लेकिन भ्रष्टाचार अनवरत कायम रहा. हां यह जरूर है कि सरकारें बदलने के साथ उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले कम ज्यादा होते रहे  लेकिन विभागों  और कर्मचारियों के स्तर पर भ्रष्टाचार में कोई उल्लेखनीय सुधार अभी तक नहीं हुआ है. यह बात किसी से भी छिपी नहीं है, मुख्यमंत्री,  प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इस से अवगत हैं और उनके प्रयासों से उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार में तो कमी जरूर आई है लेकिन निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की गति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है जो निश्चित रूप से बहुत चिंता का विषय है.

 

ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार भारतीय परिवेश का एक हिस्सा बन गया और इसलिए ज्यादातर लोगों ने इससे समझौता कर लिया है . ऐसा भी नहीं है कि भ्रष्टाचार का कभी विरोध नहीं हुआ लेकिन विरोध करने वाले चंद लोग होते हैं और उन्हें भी अपने काम कराने के लिए कहीं न कहीं झुकना पड़ता है या समझौता करना पड़ता है. सवाल यह है

 

·       क्या भ्रष्टाचार लाइलाज मर्ज है ? या

·       सत्तासीन राजनीतिक दल किसी न किसी कारणवश इसे नजरअंदाज करते हैं?

मुझे लगता है कि सत्ता में बैठे ज्यादातर राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के मामले में इसलिए गंभीर नहीं हो पाते हैं क्योंक वे  स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं और इसलिए नैतिक रूप से कर्मचारियों की लगाम कसने का साहस नहीं दिखा पाते. सत्तापरिवर्तन होते ही पुरानी सरकार के भ्रष्टाचार की कहानियां सतह पर आ जाती  हैं और फिर राजनीतिक फायदा लेने की कवायद भी शुरू हो जाती है. भ्रष्टाचार करने वाला दल इसे बदले की कार्यवाही बताता है और फिर मामला पूरी तरह से राजनीतिक होकर खत्म हो जाता है. फिर भी ज्यादातर सरकारे विभिन्न विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए  दृढ़ इच्छा शक्ति  नहीं दिखा पाती. इसके विपरीत कुछ सरकारे इस तरह के भ्रष्टाचार में साझीदार बन जाती  हैं.

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में अगर बात की जाए तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकांश मामलों में दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है और उसका लाभ प्रदेश की जनता के साथ साथ देश को भी हुआ है. पूरे देश में आज उनकी छवि एक शख्त और कुशल प्रशासक के रूप में और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति रखने वाले मुख्यमंत्री के रूप में   चर्चित है. मैं  व्यक्तिगत रूप से योगी जी को तब से जानता हूं जब उन्होंने शायद  मुख्यमंत्री बनने की कल्पना भी नहीं की होगी. इसलिए मैं इस बात को विश्वास पूर्वक कह सकता हूं कि अगर योगी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा सकते हैं तो फिर प्रदेश में  भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाना बहुत ही मुश्किल है.  इक्का-दुक्का संदिग्ध मामलों को छोड़ कर योगी सरकार में भ्रष्टाचार का कोई  मामला अभी तक मंत्री या अन्य उच्च स्तर पर सुनने को नहीं मिला है. इस सब के बावजूद  भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात  विभागों और पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार में कोई बहुत  उल्लेखनीय सुधार नजर नहीं आता जिससे  कम से कम जनता के नजरिए में तो सुधार की कोई अनुभूति नहीं हुई है.

 

मैं एक छोटी सी घटना का उल्लेख करना चाहूंगा.  कुछ दिन पहले  मैं प्रदेश के एक शहर में सुबह टहलने के लिए निकला. एक पार्क में कई लोग योग और व्यायाम कर रहे थे. उनकी  आपस में हो रही बातचीत में  एक व्यक्ति ने बहुत जोर देकर कहा कि आज भी बिना पैसा दिए सरकार में कोई काम नहीं हो रहा.  उसका इशारा इन्हीं विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर था. हो सकता है  कि उसकी  बात में कुछ राजनीतिक पुट हो लेकिन यह जनता का दृष्टिकोण है. अगर सरकार के प्रयासों से  सुधार हो रहा है और भ्रष्टाचार में कमी आ रही है तो वह जनता को दिखाई भी पडनी चाहिए. जब तक जनता को महसूस  नहीं होता,  किसी भी सुधार का कोई बहुत महत्व नहीं.

 

समस्या की जड़

प्रायः उत्पादकता और कार्यकुशलता में प्राइवेट और सरकारी क्षेत्रों की तुलना की जाती है और यह समझना मुश्किल नहीं है कि उत्पादकता, कार्यकुशलता और इमानदारी में प्राइवेट क्षेत्र के कर्मचारी आगे क्यों हैं. एक बड़ा कारण है कि इन तीन चीजो में कमी के कारण उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड सकता है.  सरकार द्वारा  सिर्फ भ्रष्टाचार निरोधक कानून और विभाग बनाने से सरकारी तंत्र का  भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत  गहरी हैं जिसको राजनीतिक मान्यता ही नहीं संरक्षण भी  प्राप्त है. भ्रष्टाचार से पैसा कमाने की बड़ी जगहों पर स्थानांतरण कराने के लिए कर्मचारी मोटी रकम अदा कर रहे हैं, यह पता करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि वे  कौन लोग हैं जो पैसा लेकर स्थानांतरण कर रहे हैं. स्वाभाविक है कि जब कोई कर्मचारी मोटी रकम चुकाने के बाद  किसी जगह पहुंचता है तो उसका उद्देश्य केवल और केवल पैसा कमाना ही होता है जो बिना भ्रष्टाचार के नहीं हो सकता. एक समय था जब समाचार पत्रों में पुलिस विभाग की जिले की पोस्टिंग और थाने नीलाम होने की सुर्खियां प्रकाशित होती थी. आज ये  सुनाई नहीं पड़ती और यह भी सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है. फिर भी थानों में एफ आई आर लिखने, खत्म करने, अंतिम रिपोर्ट लगाने के लिए पैसे लिए जाना आज भी चर्चा का विषय बनता है. ट्रैफिक पुलिस में  भ्रष्टाचार की खबरें बहुत आम बात है.

 

सरकार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध  शुरुआत तो करनी ही होगी और यह जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है. शुरुआत भी कुछ उन चुनिंदा विभागों से करनी चाहिए जिनसे जनता का संपर्क बहुत ज्यादा होता है क्योंकि यही विभाग जनता में सरकार की छवि बिगाड़ने / बनाने  का कार्य करते हैं. इनमें प्रमुख विभाग हैं- पुलिस, तहसील/ ब्लॉक, रजिस्ट्री कार्यालय, संभागीय परिवहन कार्यालय, नगर निगम / नगर पालिका, जिलाधिकारी और उसके संबंधित  कार्यालय आदि .

 

रोकथाम हेतु कुछ सुझाव

  • ·       नीतिगत उपदेश देने और कर्मचारियों को चेतावनी देने भरसे भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता, इसलिए आज ऐसे उपायों की जरूरत है जिसमें कर्मचारी के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही की जा सके और उसे नौकरी से बर्खास्त किया जा सके. बेरोजगारी के इस युग में इस तरह की कार्यवाही से नए ईमानदार युवाओं को नौकरी भी दी जा सकती है. 
  • ·        संबंधित विभागों भ्रष्ट कर्मचारियों के विरुद्ध नई भर्ती करने के उद्देश्य से प्रतीक्षा सूची तैयार की जाए. भ्रष्ट कर्मचारियों पर त्वरित कार्यवाही करते हुए उन्हें  बर्खास्त किया जाए और  उनकी जगह प्रतीक्षा सूची से लोगों को तुरंत नौकरी पर रखा जाए. पुलिस जैसे विभाग के लिए सिपाही और उप निरीक्षकों की उपयुक्त संख्या में प्रतीक्षा सूची बनाई जाए और दोषी कर्मचारियों को बर्खास्त करने के बाद प्रतीक्षा सूची से लोगों को रखा जाए. इस तरह की प्रतीक्षा सूची बनने मात्र से ही कर्मचारियों में असर होगा.
  • ·       कर्मचारियों के नियमित स्थानांतरण किए जाएं कोई  भी कर्मचारी अधिक दिनों तक एक ही सीट और एक ही स्थान पर न रहे. 
  • ·       संवेदनशील पदों पर बैठे  कर्मचारी को प्रति वर्ष 10 से 15 दिन के लिए अनिवार्य छुट्टी की व्यवस्था की जाए ताकि उनके जाने पर उनके गोरखधंधे की  अपने आप पड़ताल हो सके.
  • ·       परिवहन, रजिस्ट्री विभाग जैसे अन्य विभागों में पासपोर्ट कार्यालय जैसी आउटसोर्सिंग व्यवस्था की जाए और तकनीक आधारित कंपनियों से कर्मचारियों को लिया जाए और पारदर्शिता के लिए  इन विभागों को पूरी तरह से तकनीक चालित  बनाया जाए.
  • ·       पुलिस थानों में एफ आई आर दर्ज कराने की प्रक्रिया को ऑनलाइन उपलब्ध करा दिया जाए और थानों के सभी रिकॉर्ड  डिजिटल बनाकर ऑनलाइन कर दिया जाए ताकि उच्चाधिकारी नियमित अंतराल पर अवलोकन कर सकें.
  • ·       वर्तमान संविदा कर्मियों की व्यवस्था  कारगर साबित नहीं हो रही है इसलिए उसके स्थान पर आउटसोर्सिंग की व्यवस्था की जाए ताकि इन कर्मचारियों की उत्पादकता और अनुशासन की  जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता कंपनी की हो.
  • ·       जनता के कार्यों से जुड़े सभी विभागों के कर्मचारियों को सप्ताह में 1 दिन अपने कार्य क्षेत्र में गांव और कस्बों में जाकर लोगों से व्यक्तिगत और समूह में मिलने की अनिवार्यता  की जाए और इसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए ताकि कर्मचारियों और जनता के बीच की दूरी कम हो सके, जिससे भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है.
  • ·       राज्य सरकार की वर्तमान जनसुनवाई पोर्टल व्यवस्था एक महत्वाकांक्षी एवं   नवोन्मेषी विचार जरूर है लेकिन संबंधित विभाग में वही कर्मचारी इसका जवाब देता  है जिसके विरुद्ध शिकायत होती है इसलिए स्वाभाविक रूप से शिकायतों का निपटारा नहीं होता बल्कि केवल शिकायतों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होता है. इससे  पोर्टल बनाने के विचार और उस पर की गई मेहनत पर पानी फिर रहा है.  इसलिए अच्छा यह होगा की शिकायत का जवाब वह कर्मचारी जिस से शिकायत जुड़ी है वह नहीं दे और जवाब पर हस्ताक्षर भी कोई अन्य अधिकारी जो शिकायत के संबंध ना हो करे.   प्रत्येक विभाग की शिकायतों में से कुछ को  अनिवार्य रूप से अन्य विभाग द्वारा जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर  संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध सख्त और प्रभावी कार्यवाही की जाए, तभी इस पोर्टल का औचित्य पूरा हो सकेगा.
  • ·       स्पेशल टास्क फोर्स  जैसी कोई भ्रष्टाचार निरोधक टीम बनाई जाए और उसमें तेजतर्रार युवा अधिकारियों की पोस्टिंग की जाए जो भ्रष्टाचार से संबंधित प्राप्त सूचनाओं और शिकायतों की न केवल जांच करें बल्कि औचक निरीक्षण करके भी भ्रष्ट अधिकारियों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध भय पैदा करने का काम करें.

 

विकास और राजनीति

उत्तर प्रदेश मैं वैसे तो अतीत में कई राजनीतिक व्यक्तियों  को विकास पुरुष की संज्ञा दी जा चुकी है, लेकिन उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य शायद ही कहीं दिखाई पड़े और प्रदेश कई अन्य प्रदेशों के मुकाबले आज भी पिछड़ा हुआ है. यह सही है  कि योगी सरकार में प्रदेश में सकल घरेलू उत्पाद बढा  है, निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ है और मूलभूत संरचना के क्षेत्र जैसे नए हवाई अड्डे, नए रोड /  एक्सप्रेस वे,  पुल और फ्लाईओवर आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुआ है फिर भी प्रदेश में योजनाबद्ध तरीके से विकास की एक रूपरेखा तैयार किये  जाने की अत्यंत  आवश्यकता है.

चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा

कोरोना महामारी की विभीषिका और चिकित्सा  संसाधनों की उपलब्धता की चुनौती को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह प्रदेश के सभी जिलों में मेडिकल कॉलेज और उससे संबंधित सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की योजना तैयार करें. मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस या मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अनुमोदन प्राप्त न होने की स्थिति में राज्य सरकार स्वयं अपना डिग्री कोर्स बना सकती है और उसके साथ साथ नर्सिंग  और फार्मेसी के भी नए कोर्स शुरू किए जा सकते हैं. वित्तीय संसाधनों की कमी को देखते हुए इन्हें पब्लिक प्राइवेट पार्टिसिपेशन के आधार पर तैयार किया जा सकता है. चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने वाले उद्यमियों की कमी नहीं है और इस कारण सरकार को आर्थिक संसाधनों से नहीं जूझना पड़ेगा.

इनमें प्रवेश जिले के निवासियों और उनके लिए आरक्षित किये  जा सकते है जिन्होंने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा है संबंधित जिले से पास की हैं. ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश में प्रोत्साहन के लिए विशेष अंक की व्यवस्था भी की जा सकती है. इन कॉलेजों से डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए उन्हीं जिलों में नौकरी या व्यवसाय करना अनिवार्य कर दिया जाए. इससे गांव और शहर में उपलब्ध संसाधनों के अंतर को कम किया जा सकेगा. जहां तक इन कॉलेजों में पढ़ाई के लिए शिक्षकों की उपलब्धता का का प्रश्न है तो उसके लिए केंद्रीकृत वीडियो आधारित ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की जा सकती है. मेडिकल कॉलेज में बिल्डिंग की न्यूनतम व्यवस्था की जा सकती है और छात्रावास उपलब्ध नहीं भी  कराया जा सकता है क्योंकि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलने के साथ-साथ भावी डॉक्टर, नर्स और फार्मेसिस्ट का  जनता में सामंजस्य भी बना रहेगा.

प्राथमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा एक अन्य ऐसा क्षेत्र है जिसमें परिवर्तन की तुरंत आवश्यकता है. प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक नियुक्त करने की वर्तमान प्रणाली न केवल राज्य सरकार के संसाधनों पर भारी भरकम बोझ बन रही है बल्कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने में पूरी तरह से असफल सिद्ध हो रही है. ऐसा लगता है कि प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र शिक्षकों के रूप में लोगों को केवल रोजगार देने का एक बहुत बड़ा साधन मात्र  बन गया है. इस क्षेत्र की सोशल ऑडिट करने की  आवश्यकता है और तदनुसार भविष्य के निर्णय किए जाने चाहिए अन्यथा यह विभाग शिक्षकों को आकर्षक रोजगार देने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकेगा. यहां भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप  या आउटसोर्सिंग मॉडल की आवश्यकता है जहां पर वर्तमान शिक्षक नियुक्ति व्यवस्था के स्थान पर  शिक्षा क्षेत्र की विशेषज्ञ कंपनियों से शिक्षकों को लिया जा सकता है  ताकि न केवल शिक्षकों की उत्पादकता बढ़ सके बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों के बच्चे भी नामी-गिरामी स्कूलों की तरह बेहतरीन  शिक्षा पा सकें और गांव से शहरों की भागमभाग रुक सके.

 

 

परियोजना प्रबन्धन

इसके अलावा एक और ऐसा क्षेत्र है जिस पर  उत्तर प्रदेश सहित ज्यादातर राज्यों में ध्यान नहीं दिया गया और वह है विभिन्न  परियोजनाओं का समय से पूरा न  होना. आज इस बात की तुरंत आवश्यकता है कि राज्य सरकार द्वारा संचालित सभी नए प्रोजेक्ट तकनीक आधारित टूल से नियमित रूप से मॉनिटर किये  जाए. इस तरह की परियोजनाओं को समय से पूरा करने के उद्देश्य पूरे विश्व में तमाम प्रोजेक्ट मैनेजमेंट टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं और परियोजना में काम करने वाले कर्मचारियों को समय से प्रोजेक्ट पूरा करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है. एजाइल प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में  पूरी परियोजना को कई हिस्सों में बांटकर माइलस्टोन तैयार किए जाते हैं और उन्हें निश्चित अवधि में पूरा किया जाता  है और इसके आधार पर न केवल परियोजना में होने वाली देरी से बचा जा सकता है बल्कि परियोजना की लागत बढ़ने से भी रोका जा सकता है.   प्रोजेक्ट की लागत के हिसाब से इन्हें जिले और राज्य  स्तर पर मॉनिटर किया जा सकता है.  बड़ी परियोजनाओं को संबंधित मंत्री और मुख्यमंत्री नियमित  मासिक या त्रैमासिक अंतराल पर मॉनिटर कर सकते हैं. इस तरह  सरकार अपनी विकास पूरक छवि बनाकर  न केवल राज्य में विकास की गति तेज कर सकती है बल्कि लोगों के दिलों में अमिट छाप  भी छोड़ सकती है.

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- शिव मिश्रा 

( लेखक  आर्थिक और सूचना एवं प्रौद्योगिकी विषयो के जानकार हैं )

रविवार, 5 सितंबर 2021

क्या कारण है कि 3 लाख संख्या वाली अफगानिस्तान की सेना केवल 75,000 की संख्या वाले तालिबानियों के सामने हार गयी?

 प्रश्न : क्या कारण है कि 3 लाख संख्या वाली अफगानिस्तान की सेना केवल 75,000 की संख्या वाले तालिबानियों के सामने हार गयी?

तालिबान का अफगानिस्तान पर इस तरह कब्जा किया जाना पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है परंतु भारत में इस चर्चा में गर्माहट इसलिए है क्योंकि यहां भी तालिबान के हमदर्द , समर्थक और मानसिकता के काफी लोग हैं जो तालिबान का समर्थन भी कर रहे हैं उनके अफगानिस्तान पर कब्जा करने का जश्न भी मना रहे हैं और इसे अफगानिस्तान की आजादी तक कह रहे हैं.

एक कुख्यात शायर मुनव्वर राणा ने तो तालिबान की महर्षि बाल्मीकि से तुलना कर दी. जावेद अख्तर ने तो आर एस एस और भाजपा को भी तालिबानी मानसिकता वाला करार दे दिया. ओवैसी, महबूबा सहित कई सांसदों ने भी तालिबान को समर्थन दे दिया और भारत की लगे हांथों लानत मलामत दी कर दी.

इस सबके बाद भी इस विषय में भारत का राष्ट्रीय निष्कर्ष लगभग वही है जो अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया की मुख्य धारा की मीडिया और लोगों का निष्कर्ष है. यानी-

  • चीन ने तालिबान को पैसा दिया और तालिबान ने अफगान सेना को रिश्वत दी और अफगान सेना तालिबान से मिल गई
  • भ्रष्टाचार, कुशासन, महंगाई, बेरोजगारी और अफगान सेना को वेतन न मिलना आदि
  • अधिसंख्य अफगान लोगों का तालिबान मानसिकता का होना या इस मानसिकता का समर्थन करना
  • एक प्रमुख विचार यह भी उभर कर आया है कि अमेरिका और तालिबान के बीच सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हुआ था जिसके अनुसार अफगान सेना और अफ़ग़ान राष्ट्रपति को ऐसा करना ही था.

उपरोक्त सभी कारण सही हो सकते हैं लेकिन फिर भी इनमें से कोई भी कारण यह स्पष्टीकरण नहीं दे सकता कि

-तालिबान के कब्जा करते समय पूरी जनता मूकदर्शक क्यों बनी रही ?

-अफगान सेना भी नहीं लड़ी और जनता ने भी किसी तालिबान आतंकवादी का कोई प्रतिरोध क्यों नहीं किया?

इन प्रश्नों का का उत्तर ही पूछे गए प्रश्न का सबसे सही उत्तर हो सकता है.

  • यह तालिबान की विजय नहीं अमेरिकी समझौते के अनुसार सत्ता का हस्तांतरण ही है.
  • 90 के दशक में जब पहली बार तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तो वहां के राष्ट्रपति नजीब को सार्वजनिक स्थान पर फांसी पर लटका दिया गया था और इस कारण अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के पास भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि वह जानते थे कि उनका भी वही हश्र होगा.
  • अफगान सेना कहीं भी नहीं लड़ी उसने बिना संघर्ष किए आत्मसमर्पण कर दिया और अमेरिका से मिले अत्याधुनिक हथियार भी तालिबान को सौंप दिए.
  • जनता ने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, यह भी बहुत अजीब नहीं क्योंकि अफगानिस्तान का पिछले 2000 वर्षों का इतिहास यही है कि यहां की जनता या तो आत्मसमर्पण कर देती है और या फिर भारत की तरह इस मुगालते में रहती है कि कोई नृप होय हमें क्या हानि?

अफगान जनता का यह चरित्र बहुत विचित्र नहीं है और इसमें हिंदुओं की गुलामी की दास्तान छिपी हुई है.

1204 में मोहम्मद बख्तियार खिलजी ने आक्रमण किया और चूंकि हिंदू राजा आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे, इस आक्रमण का सभी ने सामूहिक सामना नहीं किया और परिणाम स्वरूप बंगाल मुस्लिम आक्रांताओं के कब्जे में आ गया. बख्तियार खिलजी ने न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया बल्कि तलवार की नोक पर बड़ी संख्या में धर्मांतरण करवाया जिसके कारण बंगाल मुस्लिम बाहुल्य राज्य हो गया.

1204 में भारत के बौद्ध बाहुल्य बंगाल राज्य में मोहम्मद बख्तियार खिलजी का भी मुस्लिम शासन ऐसे ही बिना किसी प्रतिरोध के स्थापित हुआ था और फिर क्लाइव लायड ने भी प्लासी की लड़ाई में इसी तरह विजय प्राप्त की थी.

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हिन्दू गुलाम क्यों हुआ ?

अफगानिस्तान प्राचीन काल में हिंदू शासित हिंदुस्तान का क्षेत्र हुआ करता था और इसके आखिरी हिंदू राजा दाहिर थे जो सिंध के राजा थे और अफगानिस्तान सिंध का ही एक हिस्सा हुआ करता था.

वास्तव में कलिंग युद्ध के बाद जब अशोक ने शोकाकुल होकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और उसने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. अफगानिस्तान के ज्यादातर लोग भी बौद्ध हो गए थे और बौद्ध धर्म वह धर्म है जहां हिंसा की तो बात ही नहीं हो सकती और इतिहास गवाह है कि जहां जहां बौद्ध धर्म था वहां वहां पराजय और गुलामी अवश्य मिली क्योंकि बौद्ध लोग शांत प्रिय होते हैं और युद्ध से दूर रहते हैं इसलिए कालांतर में उनमें वीरता का ह्रास हुआ और प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो गई.

अफगानिस्तान जो भारत में घुसने के लिए पश्चिमी द्वार कहा जाता था, वहां से कितने ही आक्रमणकारी भारत में घुसे लेकिन उन्हें अफगानिस्तान में कभी भी किसी भी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा और आक्रमणकारी सीधे सिंध, पंजाब, दिल्ली और गुजरात तक पहुंच जाते थे.

भारत पर आक्रमण करने वाले आतंकी और लुटेरे मोहम्मद गौरी, महमूद गजनवी, बाबर तैमूर आदि अफगान नहीं थे. यह सभी बेहद हिंसक बर्बर कबीलाई संस्कृत से निकली हुए लोग थे और तालिबान भी वही है.

यह सही है कि अफगानिस्तान में भी बहुत बड़ी आबादी तालिबान को पसन्द करती है। जो मन से चाहते हैं कि उनके देश में तालिबानी कानून चले लेकिन भारत में भी बड़ी संख्या में तालिबानी मानसिकता के लोग हैं . तालिबान यह देखकर बहुत खुश हुआ कि हिंदुस्तान में इतनी बड़ी संख्या में उसके समर्थक हैं. इसी कारण वह तालिबान जो भारत से अफगानिस्तान मैं अपना दूतावास बंद न करने का अनुरोध कर रहा था और दोहा में भारतीय राजदूत से मिलकर भारतीय निवेश की सुरक्षा का आश्वासन दे रहा था, उसने पैंतरा बदलते हुए कहा वह कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाएगा और उन्हें समर्थन देगा क्योंकि वह उनके भाई हैं.

इसलिए यह मत समझिए कि तालिबान की संख्या 70 हजार थी, यह तो सिर्फ तालिबान आतंकी थे अफगानिस्तान की कुल चार करोड़ जनसंख्या में लगभग 70 लाख तो उनके कट्टर समर्थक हैं , उनका भी साथ मिला इसलिए उनका पूरा कब्जा करना तो स्वाभाविक है. अगर प्रतिरोध होता तो कब जा होना इतना आसान नहीं होता जैसा कि पंजशीर घाटी में हो रहा है.

बौद्ध और जैन धर्म का उद्भव सनातन धर्म से ही हुआ है और जब यह दोनों धर्म इतने अहिंसक और शांतिप्रिय हैं तो आप सनातन धर्म के बारे में सहज अंदाजा लगा सकते हैं. अफगानिस्तान का सच हमें यही बताता है कि “ अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च” (अहिंसा ही मनुष्य का परम धर्म हैं और जब जब धर्म पर आंच आये तो उस धर्म की रक्षा करने के लिए की गई हिंसा उससे भी बड़ा धर्म हैं।)


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- शिव मिश्रा 

बुधवार, 1 सितंबर 2021

" क्या मुगल असली राष्ट्र निर्माता हैं, और मुस्लिम शासकों को बदनाम करना हिन्दुओं की फितरत है"

 

भारत में जितने भी विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए वह वह सभी लुटेरे थे जो धन संपत्ति लूटने के लिए भारत में आते थे.

सबसे पहला आक्रमण 711 ईसवी में मोहम्मद बिन कासिम ने किया और उसके बाद महमूद गजनवी ने 17 बार भारत पर आक्रमण किया, कितनी धन-संपत्ति सोना चांदी लूटी इसका अनुमान स्वयं उसके द्वारा बताए गए विवरण के आधार पर किया जाए तो भी यह आज के हिसाब से भी इतनी अधिक थी कि शायद सहज विश्वास न हो.

इसके बाद धन संपत्ति के लालच में लुटेरों के लगातार आक्रमण होते रहे. गजनी के बाद गोरी और उसके बाद चंगेज खां ने भारत पर आक्रमण किया. 1526 में बाबर नाम के लुटेरे ने भी भारत पर आक्रमण किया और उसकी लूट का विवरण बाबरनामा में दिया गया है, वह चकित करने वाला है . लूट के समय बाबर ने छल कपट का सहारा लिया और संपत्ति लूटने के बाद तालाबों और नदियों में जहर भी मिलवाया . उसने महसूस किया कि भारत के लोग उसे बेहद नफरत करते हैं लेकिन लुटेरों से बहुत डरते हैं और इसलिए उसने यहां हुकूमत करने का निर्णय लिया और उसका वंश मुग़ल वंश कहलाया .

इन सभी आक्रमणकारी धन संपत्ति लूटने के अलावा हिंदू महिलाओं को जबरन उठा ले जाते थे और उन्हें सेक्स स्लेव बनाते थे. इन महिलाओं को लुटेरों और उनके दोस्तों में अय्याशी करने के लिए बांट दिया जाता था. इन किस्मत की मारी हिंदू महिलाओं पर कितने अत्याचार किए जाते थे इसका वर्णन तो छोड़िए कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है. इसकी थोड़ी सी झलक उन मुस्लिम इतिहासकारों की कुछ किताबों से मिलती है जो इन आतंकवादियों / आक्रांताओं के साथ भारत आए थे और जिन्होंने इन आक्रांताओं के कथनानुसार ही इतिहास लिखा था. जो वर्णन है वह दिल दहलाने के साथ ही समस्त मानवता के लिए लज्जा से सर झुकाने वाला है.

इन किस्मत की मारी हिंदू महिलाओं की जुल्म और सितम की कहानियां दिल दहलाने वाली हैं . इनसे तो कोई निकाह भी नहीं करता था और इसलिए उनकी संतानों को उनके अब्बा का नाम भी नसीब नहीं होता था लेकिन इन अवैध संतानों को एक चीज अवश्य मिलती थी और वह था जन्मजात इस्लाम धर्म.

इन महिलाओं ने करुण क्रंदन करते समय यह कामना की थी कि इनकी संताने इन पर जुल्म ढाने वालों से बदला लेंगी लेकिन इनका दुर्भाग्य देखिए कि इनकी संताने भी उन आक्रांताओं में शामिल हो गई है और उन्हीं आक्रांताओं और आतंकवादियों में अपने पिताओं के दर्शन कर रही हैं. यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इन आक्रांताओं की ये अवैध संताने आक्रांताओं से भी ज्यादा खूंखार और धर्मांध है और आज यह सब मिलकर किसी न किसी रूप में भारत के राष्ट्रीय सनातन स्वरूप को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास कर रही हैं.

आज आप २१वीं सदी के तालिबान के देखिये क क्या कर रहे हैं और अंदाजा लगाइए कि आज से पांच सौ से हजार वर्ष पूर्व के आक्रान्ता  जो तालिबान से भी ज्यादा बर्बर और खूंख्वार थे,  कैसे रहे होंगे ? 

बॉलीवुड इसका अपवाद नहीं प्रोपेगेंडा चलाने का गढ़ है. अल्लामा इकबाल से लेकर राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा तक सब के सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं. इस देश का नैरेटिव बदलने में वामपंथी इतिहासकारों और भारतीय सिनेमा का जितना हाथ है उतना तो स्वयं इन आक्रांताओं का भी नहीं रहा.

लेकिन इन लोगो के सिरफिरेपन का आरोप हम पूरे समुदाय पर नहीं लगा सकते क्योंकि हमारी नैतिकता इसकी अनुमति नहीं देती.

कबीर खान भी इन्हीं आक्रांताओं की संतानी सेना के सिपाही है, इसलिए उनसे मुगलों और आक्रांताओं को महिमामंडित करने के अलावा और क्या अपेक्षा की जा सकती है. भारत का विभाजन भी आक्रांताओं कि इसी इसी संतानी सेना ने करवाया, अपने लिए पाकिस्तान मांगा और फिर एक गहरे षड्यंत्र के अंतर्गत गए भी नहीं. आज भारत की अनेक समस्याओं के लिए यह संतानी सेना ही उत्तरदाई है.

पता नहीं ऐसे लोगों को सजा देने में कानून अपना काम कब करेगा ? करेगा भी या नहीं ? लेकिन सभी जागृत राष्ट्रवादी व्यक्तियों को ऐसे लोगों का बहिष्कार अवश्य करना चाहिए क्योंकि ऐसा तो हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि आपके पैसे पर ही ऐसे लोग ऐश करें और आपके पैसे से ही आपके विरुद्ध कोई षड्यंत्र चलायें.

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    - शिव मिश्रा 

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...