शनिवार, 24 अक्टूबर 2020

नव रात्र का तीसरा दिन - तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा

तृतीय दुर्गा : श्री चंद्रघंटा




श्री दुर्गा का तृतीय रूप श्री चंद्रघंटा है। इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। नवरात्रि के तृतीय दिन इनका पूजन और अर्चना किया जाता है। इनके पूजन से साधक को मणिपुर चक्र के जाग्रत होने वाली सिद्धियां स्वतः प्राप्त हो जाती हैं तथा सांसारिक कष्टों से मुक्ति मिलती है।

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघंटेति विश्रुता॥

मां दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नाम 'चंद्रघंटा' है। नवरात्रि उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन-आराधन किया जाता है। इस दिन साधक का मन 'मणिपूर' चक्र में प्रविष्ट होता है।

मां चंद्रघंटा की कृपा से अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगंधियों का अनुभव होता है तथा विविध प्रकार की दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। ये क्षण साधक के लिए अत्यंत सावधान रहने के होते हैं।

 मां का यह स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है। इनके मस्तक में घंटे का आकार का अर्धचंद्र है, इसी कारण से इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। इनके दस हाथ हैं। इनके दसों हाथों में खड्ग आदि शस्त्र तथा बाण आदि अस्त्र विभूषित हैं। इनका वाहन सिंह है। इनकी मुद्रा युद्ध के लिए उद्यत रहने की होती है।

 मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाती हैं। इनकी आराधना सद्यः फलदायी है। मां भक्तों के कष्ट का निवारण शीघ्र ही कर देती हैं। इनका उपासक सिंह की तरह पराक्रमी और निर्भय हो जाता है। इनके घंटे की ध्वनि सदा अपने भक्तों को प्रेतबाधा से रक्षा करती है। इनका ध्यान करते ही शरणागत की रक्षा के लिए इस घंटे की ध्वनि निनादित हो उठती है।

 मां का स्वरूप अत्यंत सौम्यता एवं शांति से परिपूर्ण रहता है। इनकी आराधना से वीरता-निर्भयता के साथ ही सौम्यता एवं विनम्रता का विकास होकर मुख, नेत्र तथा संपूर्ण काया में कांति-गुण की वृद्धि होती है। स्वर में दिव्य, अलौकिक माधुर्य का समावेश हो जाता है। मां चंद्रघंटा के भक्त और उपासक जहां भी जाते हैं लोग उन्हें देखकर शांति और सुख का अनुभव करते हैं।

मां के आराधक के शरीर से दिव्य प्रकाशयुक्त परमाणुओं का अदृश्य विकिरण होता रहता है। यह दिव्य क्रिया असाधारण चक्षुओं से दिखाई नहीं देती, किन्तु साधक और उसके संपर्क में आने वाले लोग इस बात का अनुभव भली-भांति करते रहते हैं।

 हमें चाहिए कि अपने मन, वचन, कर्म एवं काया को विहित विधि-विधान के अनुसार पूर्णतः परिशुद्ध एवं पवित्र करके मां चंद्रघंटा के शरणागत होकर उनकी उपासना-आराधना में तत्पर हों। उनकी उपासना से हम समस्त सांसारिक कष्टों से विमुक्त होकर सहज ही परमपद के अधिकारी बन सकते हैं।

 हमें निरंतर उनके पवित्र विग्रह को ध्यान में रखते हुए साधना की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न करना चाहिए। उनका ध्यान हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देने वाला है।

प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। मां जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में तृतीय दिन इसका जाप करना चाहिए।

या देवी सर्वभू‍तेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और चंद्रघंटा के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। हे मां, मुझे सब पापों से मुक्ति प्रदान करें।

इस दिन सांवली रंग की ऐसी विवाहित महिला जिसके चेहरे पर तेज हो, को बुलाकर उनका पूजन करना चाहिए। भोजन में दही और हलवा खिलाएं। भेंट में कलश और मंदिर की घंटी भेंट करना चाहिए।

तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की आराधना करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थान पर देवी की मूर्ति की स्थापना करें. इसके बाद इन्हें गंगा जल से स्नान कराएं. इसके बाद धूप-दीप, पुष्प, रोली, चंदन और फल-प्रसाद से देवी की पूजा करें. अब वैदिक और संप्तशती मंत्रों का जाप करें. माां के दिव्य रुप में ध्यान लगाएं. ध्यान लगाने से आप अपने आसपास सकारात्मक उर्जा का संचार करते हैं.

मां चंद्रघंटा का  मंत्र

1. सरल मंत्र : ॐ एं ह्रीं क्लीं

 

माता चंद्रघंटा का उपासना मंत्र

 

पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता.

प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता..

 

2. ‘या देवी सर्वभूतेषु मां चंद्रघंटा रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नसस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:‘

 

ये मां का महामंत्र है जिसे पूजा पाठ के दौरान जपना होता है.

मां चंद्रघंटा का बीज मंत्र है- ‘ऐं श्रीं शक्तयै नम:’

 

3. पिंडजप्रवरारुढ़ा चन्दकोपास्त्रकैर्युता!

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघंटेति विश्रुता

 

माता चंद्रघंटा की कथा

देवताओं और असुरों के बीच लंबे समय तक युद्ध चला. असुरों का स्‍वामी महिषासुर था और देवाताओं के इंद्र. महिषासुर ने देवाताओं पर विजय प्राप्‍त कर इंद्र का सिंहासन हासिल कर लिया और स्‍वर्गलोक पर राज करने लगा. इसे देखकर सभी देवतागण परेशान हो गए और इस समस्‍या से निकलने का उपाय जानने के लिए त्र‍िदेव ब्रह्मा, विष्‍णु और महेश के पास गए. देवताओं ने बताया कि महिषासुर ने इंद्र, चंद्र, सूर्य, वायु और अन्‍य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए हैं और उन्‍हें बंधक बनाकर स्‍वयं स्‍वर्गलोक का राजा बन गया है. देवाताओं ने बताया कि महिषासुर के अत्‍याचार के कारण अब देवता पृथ्‍वी पर विचरण कर रहे हैं और स्‍वर्ग में उनके लिए स्‍थान नहीं है.

यह सुनकर ब्रह्मा, विष्‍णु और भगवान शंकर को अत्‍यधिक क्रोध आया. क्रोध के कारण तीनों के मुख से ऊर्जा उत्‍पन्‍न हुई. देवगणों के शरीर से निकली ऊर्जा भी उस ऊर्जा से जाकर मिल गई. यह दसों दिशाओं में व्‍याप्‍त होने लगी. तभी वहां एक देवी का अवतरण हुआ. भगवान शंकर ने देवी को त्र‍िशूल और भगवान विष्‍णु ने चक्र प्रदान किया. इसी प्रकार अन्‍य देवी देवताओं ने भी माता के हाथों में अस्‍त्र शस्‍त्र सजा दिए. इंद्र ने भी अपना वज्र और ऐरावत हाथी से उतरकर एक घंटा दिया. सूर्य ने अपना तेज और तलवार दिया और सवारी के लिए शेर दिया. देवी अब महिषासुर से युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार थीं. उनका विशालकाय रूप देखकर महिषासुर यह समझ गया कि अब उसका काल आ गया है. महिषासुर ने अपनी सेना को देवी पर हमला करने को कहा. अन्‍य देत्‍य और दानवों के दल भी युद्ध में कूद पड़े. देवी ने एक ही झटके में ही दानवों का संहार कर दिया. इस युद्ध में महिषासुर तो मारा ही गया, साथ में अन्‍य बड़े दानवों और राक्षसों का संहार मां ने कर दिया. इस तरह मां ने सभी देवताओं को असुरों से अभयदान दिलाया. 

 

नव रात्र का दूसरा दिन - द्वितीय दुर्गा : श्री मां ब्रह्मचारिणी

 द्वितीय  दुर्गा : श्री मां ब्रह्मचारिणी


दच्चना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलुदेवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||

श्री दुर्गा का द्वितीय रूप श्री ब्रह्मचारिणी हैं। यहां ब्रह्मचारिणी का तात्पर्य तपश्चारिणी है। इन्होंने भगवान शंकर को पति रूप से प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। अतः ये तपश्चारिणी और ब्रह्मचारिणी के नाम से विख्यात हैं। नवरात्रि के द्वितीय दिन इनकी पूजा और अर्चना की जाती है।

वी ब्रह्मचारिणी की उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार , संयम की वृद्धि होती है। जीवन की कठिन समय मे भी उसका मन कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता है। देवी अपने साधकों की मलिनता, दुर्गणों व दोषों को खत्म करती है। देवी की कृपा से सर्वत्र सिद्धि तथा विजय की प्राप्ति होती है. जो साधक मां के इस रूप की पूजा करते हैं उन्हें तप, त्याग, वैराग्य, संयम और सदाचार की प्राप्ति होती है और जीवन में वे जिस बात का संकल्प कर लेते हैं उसे पूरा करके ही रहते हैं।

क्या चढ़ाएं प्रसाद

 मां भगवती को नवरात्र के दूसरे दिन चीनी का भोग लगाना चाहिए मां को शक्कर का भोग प्रिय है।

ब्राह्मण को दान में भी चीनी ही देनी चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से मनुष्य दीर्घायु होता है। इनकी उपासना करने से मनुष्य में तप, त्याग, सदाचार आदि की वृद्धि होती है।

देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योर्तिमय है। ये मां दुर्गा की नौ शक्तियों में से दूसरी शक्ति हैं। तपश्चारिणी, अपर्णा और उमा इनके अन्य नाम हैं। इनकी पूजा करने से सभी काम पूरे होते हैं, रुकावटें दूर हो जाती हैं और विजय की प्राप्ति होती है। इसके अलावा हर तरह की परेशानियां भी खत्म होती हैं। देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है।

 

ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा विधि

 देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करते समय सबसे पहले हाथों में एक फूल लेकर उनका ध्यान करें और

प्रार्थना करते हुए नीचे लिखा मंत्र बोलें।

 श्लोक

दच्चना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलु| देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा ||

ध्यान मंत्र

 

वन्दे वांछित लाभायचन्द्रार्घकृतशेखराम्।

जपमालाकमण्डलु धराब्रह्मचारिणी शुभाम्॥

 

गौरवर्णा स्वाधिष्ठानस्थिता द्वितीय दुर्गा त्रिनेत्राम।

धवल परिधाना ब्रह्मरूपा पुष्पालंकार भूषिताम्॥

 

परम वंदना पल्लवराधरां कांत कपोला पीन।

पयोधराम् कमनीया लावणयं स्मेरमुखी निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

इसके बाद देवी को पंचामृत स्नान कराएं, फिर अलग-अलग तरह के फूल,अक्षत, कुमकुम, सिन्दुर, अर्पित करें। देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं।

इसके अलावा कमल का फूल भी देवी मां को चढ़ाएं और इन मंत्रों से प्रार्थना करें।

 

1. या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।

नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

 

2. दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मई ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

अर्थ : हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बेआपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं।

इसके बाद देवी मां को प्रसाद चढ़ाएं और आचमन करवाएं। प्रसाद के बाद पान सुपारी भेंट करें और प्रदक्षिणा करें यानी 3 बार अपनी ही जगह खड़े होकर घूमें। प्रदक्षिणा के बाद घी व कपूर मिलाकर देवी की आरती करें। इन सबके बाद क्षमा प्रार्थना करें और प्रसाद बांट दें।

 तपश्चारिणी त्वंहि तापत्रय निवारणीम्।

ब्रह्मरूपधरा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्॥

शंकरप्रिया त्वंहि भुक्ति-मुक्ति दायिनी।

शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणमाम्यहम्॥

“मां ब्रह्मचारिणी का कवच”

त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।

अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्धरी च कपोलो॥

पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी॥

षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो।

अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

 

नव रात्र का प्रथम दिन - प्रथम दुर्गा : श्री शैलपुत्री

 नव रात्र का प्रथम  दिन - प्रथम  दुर्गा : श्री शैलपुत्री 



श्री दुर्गा का प्रथम रूप श्री शैलपुत्री हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण ये शैलपुत्री कहलाती हैं। नवरात्र के प्रथम दिन इनकी पूजा और आराधना की जाती है।

विधि :

नवरात्र के पहले दिन सर्वप्रथम गनेश वंदना के लिए कलश की स्थापना करें फिर  एक चौकी पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धीकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका, सप्त घृत मातृका की स्थापना भी करें। इसके उपरांत व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अ‌र्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा और मंत्र पुष्पांजलि मां शैलपुत्री को अर्पित करें। मां शैलपुत्री की पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करना बहुत फलदायक होता है।

शैलपुत्री का ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्।

वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥

पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।

पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥

प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।

कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

 

मां शैलपुत्री की साधना के लिए साधक अपने मन को “मूलाधार चक्र” में स्थित करते हैं। इनको साधने से “मूलाधार चक्र” जागृत होता है और यहीं से योग चक्र आरंभ होता है जिससे अनेक प्रकार की सिद्धियों कि प्राप्ति होती है।

 

शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।

धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥

त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।

सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥

चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।

मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

 

शैलपुत्री की कवच

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।

हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥

श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।

हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।

फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

 

‘ऊं’ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊं शैलपुत्री देव्यै नम:’ का नित्य एक माला जाप करने से हर प्रकार की शुभता प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से शैलपुत्री की आराधना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

 

मां शैलपुत्री की साधना

साधकों को यह जान लेना भी आवश्यक है कि मां शैलपुत्री कि साधना मनोवांछित लाभ के लिए की जाती है। इनकी साधना का सबसे उत्तम समय सायं पांच बजे से सात बजे के बीच है। मां शैलपुत्री की पूजा श्वे़त पुष्पों से करनी चाहिए और इन्हें मावे से बने भोग लगाने चाहिए। श्रृंगार में मां शैलपुत्री को चंदन अर्पित करना सर्व फलदायक होता है।

पूजा का ज्योतिष दृष्टिकोण

देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की साधना का संबंध चंद्रमा से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में चंद्रमा का संबंध चौथे भाव से होता है। अतः मां शैलपुत्री की साधना का संबंध व्यक्ति के सुख, सुविधा, माता, निवास स्थान, पैतृक संपत्ति, वाहन सुख, और चल-अचल संपत्ति से भी है। ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार जिनकी कुण्डली में चंदमा किसी नीच ग्रह से प्रताड़ित है या चंद्रमा नीच का है। उन्हें मां शैलपुत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ फल देती है। मां शैलपुत्री की साधना का संबंध व्यक्ति के मन से भी है। इनकी साधनासे साधक की मनोविकृति दूर होती है।

 

नव रात्र : पूजन एवं विधि विधान

 नवरात्र :

जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।

तृतीय चंद्रघण्टेति कुष्माण्डेति चतुर्थकम्।

पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।

सप्तमं कालरात्रि महागौरीति चाऽष्टम्।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिताः।

नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है। पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा की जाती है। दूसरे दिन मां ब्रह्माचारिणी को पूजा जाता है।वहीं तीसरा दिन माता चंद्रघंटा को होता है। जबकि चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरुप माता कूष्माण्डा की पुजा की जाती है। पांचवें दिन मां दुर्गा के 5वें स्वरुप स्कंदमाता की पूजा की जाती है। छठे दिन मां दुर्गा के 6वें स्वरुप कात्यायनी की पूजा की जाती है। सातवें दिन मां दुर्गा के 7वें स्वरुप कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का सातवें रूप कालरात्रि है। आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा की जाती है।

गुप्त नवरात्री :-

हिंदू धर्म के अनुसार एक वर्ष में चार नवरात्रि होती है। वर्ष के प्रथम मास अर्थात चैत्र में प्रथम नवरात्रि होती है। चौथे माह आषाढ़ में दूसरी नवरात्रि होती है। इसके बाद अश्विन मास में प्रमुख नवरात्रि होती है। इसी प्रकार वर्ष के ग्यारहवें महीने अर्थात माघ में भी गुप्त नवरात्रि मनाने का उल्लेख एवं विधान देवी भागवत तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है।

इनमें अश्विन मास की नवरात्रि सबसे प्रमुख मानी जाती है। इस दौरान पूरे देश में गरबों के माध्यम से माता की आराधना की जाती है। दूसरी प्रमुख नवरात्रि चैत्र मास की होती है। इन दोनों नवरात्रियों को क्रमश: शारदीय व वासंती नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है।

इसके अतिरिक्त आषाढ़ तथा माघ मास की नवरात्रि गुप्त रहती है। इसके बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं होती, इसलिए इन्हें गुप्त नवरात्रि कहते हैं। गुप्त नवरात्रि विशेष तौर पर गुप्त सिद्धियां पाने का समय है। साधक इन दोनों गुप्त नवरात्रि में विशेष साधना करते हैं तथा चमत्कारिक शक्तियां प्राप्त करते हैं।

नवरात्रि का महत्व एवं मनाने का कारण –

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्व होता है|देवियों के शक्ति स्वरुप की उपासना का पर्व नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक, निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजा का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान किया और विजय प्राप्त की । तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व दशहरा मनाया जाने लगा। नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति माता दुर्गा के उन नौ रूपों का भी पूजन किया जाता है जिन्होंने सृष्टि के आरम्भ से लेकर अभी तक इस पृथ्वी लोक पर विभिन्न लीलाएँ की थीं। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है।

नवरात्रि के समय रात्रि जागरण अवश्य करना चाहिये और यथा संभव रात्रिकाल में ही पूजा हवन आदि करना चाहिए। नवदुर्गा में कुमारिका यानि कुमारी पूजन का विशेष अर्थ एवं महत्व होता है। गॉंवों में इन्हें कन्या पूजन कहते हैं। जिसमें कन्या पूजन कर उन्हें भोज प्रसाद दान उपहार आदि से कुमारी कन्याओं की सेवा की जाती है।

नवरात्रि व्रत विधि-

प्रातः काल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गाजी का ध्यान करके कथा पढ़नी चहिए। यदि दिन भर का व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें । इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं है। कन्याओं के लिये यह व्रत विशेष फलदायक है। कथा के अन्त में बारम्बार ‘दुर्गा माता तेरी सदा जय हो’ का उच्चारण करें ।

कलश स्थापना-

नवरात्र के दिनों में  कलश की स्थापना की जाती है एक चौकी पर मिट्टी का कलश पानी भरकर मंत्रोच्चार सहित रखा जाता है। मिट्टी के दो बड़े कटोरों में मिट्टी भरकर उसमे गेहूं/जौ के दाने बो कर ज्वारे उगाए जाते हैं और उसको प्रतिदिन जल से सींचा जाता है। दशमी के दिन देवी-प्रतिमा व ज्वारों का विसर्जन कर दिया जाता है।

महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती मुर्तियाँ बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पो को अर्ध्य देवें ।

इन नौ दिनो में जो कुछ दान आदि दिया जाता है उसका करोड़ों गुना मिलता है इस नवरात्र के व्रत करने से ही अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है।

कन्या पूजन-

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है। अष्टमी के दिन कन्या-पूजन का महत्व है जिसमें 5, 7,9 या 11 कन्याओं को पूज कर भोजन कराया जा है

नवरात्र के प्रत्येक दिन का विस्तार से वर्णन नीचे दिया जा रहा है .

सोमवार, 5 अक्टूबर 2020

ट्विटर पर बीजेपी सबसे बड़ी महामारी है (#BiggestPandemicBJP) क्यों ट्रेंड कर रहा है और इसका क्या मतलब है?


यह अभियान मुख्य रूप से “ठग्स ऑफ हिंदुस्तान” के साथ-साथ “हिंदुस्तान के दुश्मनों” द्वारा मिलकर चलाया जा रहा है ताकि न केवल, हिन्दुस्तान बल्कि योगी आदित्यनाथ और केंद्र सरकार को भी बदनाम किया जा सके ताकि वे आगामी यूपी और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावको ध्यान में रखते हुए अपने राजनीतिक लाभ के लिए वोट की फसल काट सकें। 

यूपी विधानसभा के लिए चुनाव 2022 में होने वाले हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के गठबंधन और तमाम कोशिशों के बावजूद बीजेपी दो तिहाई बहुमत से विजयी हुई थी। 2019 के आम चुनावों में, सपा और बसपा, उत्तर प्रदेश के दो विपरीत ध्रुवों ने बीजेपी को रोकने के लिए गठबंधन किया, लेकिन वे क्रमशः 5 और 10 सीटों पर ही सफल हो सके। रायबरेली से सोनिया गांधी लोकसभा में कांग्रेस की एकमात्र प्रतिनिधित्व हैं और कांग्रेस यूपी में सबसे खराब स्थिति में है। राहुल गांधी भी अपने पारंपरिक निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में हार गए थे।

यूपी की राजनीतिक स्थिति वर्तमान में बीजेपी के पक्ष में है, जो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद और मजबूत हो जायेगी । राज्य में योगी आदित्यनाथ द्वारा बहुत सारे अच्छे काम किए गए हैं और पहली बार यूपी में, मंत्रियों और उच्च स्तर के अधिकारियों पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है, जो सपा, बसपा और कांग्रेस की सरकार के दौरान उप्र में बहुत आम था।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विकासात्मक कार्यों और राजनीतिक गुंडों और माफियाओं के खिलाफ कार्रवाई के लिए हमेशा तेज और अग्रगामी मोड में रहे हैं। उन्होंने सीएए के विरोध प्रदर्शन को बहुत प्रभावी ढंग से संभाला जिसके परिणामस्वरूप राज्य में बहुत ज्यादा आंदोलन नहीं हुआ। उन्होंने न केवल आंदोलन को नियंत्रित किया, बल्कि असामाजिक तत्वों से सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करने के कारण नुकसान की राशि भी वसूल की। उन्होंने दोषी पाए गए लोगों के पोस्टरों के सडको और चौराहों पर प्रदर्शन की भी व्यवस्था की।


जाहिर है, योगी सभी विपक्षी राजनीतिक दलों, असामाजिक और भारत विरोधी तत्वों के निशाने पर हैं। अजीब बात यह है कि ये सभी समूह योगी आदित्यनाथ से लड़ने के लिए एक साथ हैं और वे राज्य में अशांति, जाति युद्ध, दंगे कराने के लिए हर संभव मौके की तलाश करते हैं।

मौजूदा हाथरस प्रकरण ऐसे सभी तत्वों द्वारा समर्थित है और खुफिया एजेंसियों के प्रारंभिक निष्कर्षों से पता चलता है कि आगामी विधानसभा चुनावों में लाभ लेने के लिए सांप्रदायिक हिंसा और जाति युद्ध फैलाने की एक बड़ी साजिश थी। दुर्भाग्य से, पूरे प्रचार का समर्थन कुछ मीडिया हाउस ने भी किया.

यह सब एक और तथ्य से देखा जा सकता है कि इसी तरह की एक घटना बलरामपुर में हुई थी, जहां 22 वर्षीय दलित लड़की के साथ 29 सितंबर, 2020 को चार मुस्लिम युवकों शाहिद, साहिल, मुहम्मद सगीर और रफीक ने सामूहिक बलात्कार किया था। महिला की मौत हो गई, और सभी चारो आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। महिला के मेडिकल परीक्षण में यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई है, और वीर्य के नमूनों को और अधिक परीक्षणों के लिए लखनऊ में फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजा गया है।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि किसी भी राजनीतिक दल, किसी भी सामाजिक संगठन और मीडिया ने पीड़ित के समर्थन में अब तक कोई बात नहीं की है। क्या कारण है?

कारण स्पष्ट है। हाथरस में पीड़ित लडकी दलित और आरोपी परिवार उच्च जाति (ठाकुर) से संबंधित है। योगी बनने से पहले योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के ठाकुर (बिष्ट) थे और इन राजनीतिक दलों और निहित स्वार्थ के लोगों का आरोप है कि योगी आदित्यनाथ चूंकि ठाकुर हैं , वह हाथरस मामले में बलात्कारी के पक्षधर हैं। राजनीतिक दल जाति से संबंधित राजनीति फैलाना चाहते हैं ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में वे इसका इस्तेमाल कर सकें।

हाथरस की घटना के विपरीत , बलरामपुर में भी, पीड़ित दलित समुदाय से है, लेकिन बलात्कारी मुस्लिम समुदाय से हैं, जो सपा, बसपा और कांग्रेस का वोट बैंक है। इसलिए, समुदाय के थोक वोट को अपने पक्ष में करने के लिए, राजनीतिक दल बलरामपुर के मुद्दे पर कोई भी आवाज उठाने से बच रहे हैं।

हाथरस के मामले में, कुछ राजनीतिक दलों, कुछ गैर-सरकारी संगठनों, भारत-विरोधी तत्वों और उन सभी को बीजेपी ने उनके निहित स्वार्थ के कारण नापसंद किया है। वे अपने पैसे को बर्बाद नहीं होने देना चाहते हैं और इसलिए वे हुक द्वारा या बदमाश द्वारा अपनी "हाथरस योजना" को सांप्रदायिक दंगों, कास्ट वॉर, सामाजिक अशांति फैलाने में एक बड़ी सफलता बनाने के लिए प्रयास कर रहे हैं ताकि वे न केवल छीन सकें वोट की फसल लें, लेकिन योगी आदित्य नाथ को हमेशा के लिए ठीक कर दें।

निष्कर्ष :

राजनैतिक शिगूफेबाजी से राजनैतिक दलों का कोई भला नहीं हो सकता, उन्हें जनता की अदालत में अपनी कार्यकुशलता सिद्ध करनी पड़ेगी.

हाथरस घटना क्रम के सन्दर्भ में यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस सरकार और सभी राजनीतिक दल नरेंद्र मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ गए थे जब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इन लोगों ने इतनी मेहनत की कि नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बनाने में सफल रहे।

यूपी के मामले में भी, ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्षी दलों और भारत विरोधी तत्वों के प्रयास बेकार नहीं जाएंगे, और यदि वे गंभीरता से काम करते रहे, तो मुझे पूरा यकीन है कि वे योगी आदित्य नाथ को भी भारत का अगला प्रधानमंत्री बना कर ही दम लेंगे .

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