भारत में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं ?
वैचारिक विखंडन का नया नैरेटिव: क्या भारत 'सनातन-शून्य' होने की राह पर है?
- शिव मिश्रा
दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का दिया गया भाषण केवल एक तात्कालिक विवाद नहीं है। यह भारतीय राज्य व्यवस्था, इसकी आंतरिक सुरक्षा और सनातन सभ्यता के अस्तित्व पर मँडराते उस गहरे संकट का दस्तावेजीकरण है, जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर 'धर्मनिरपेक्षता' के परदे के पीछे छिपा देता है। जब एक जिम्मेदार मंच से यह दावा किया जाता है कि "भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं," तो यह कोई अज्ञानता जनित बयान नहीं होता; इसके पीछे एक अत्यंत सोची-समझी, रणनीतिक और दीर्घकालिक योजना छिपी होती है। यह योजना भारत को भीतर से खोखला करने और इसे 'सनातन-शून्य' बनाकर एक पूर्ण इस्लामिक राष्ट्र की दिशा में अग्रसर करने के अनवरत प्रयासों का हिस्सा है।
यह कड़वी सच्चाई आज देश के सामने है कि यदि भारत में हिंदू वास्तव में एक सशक्त और एकीकृत बहुसंख्यक होते, तो देश की राजनीति में उनकी इस कदर अनदेखी और उनके सांस्कृतिक प्रतीकों का इस तरह उपहास संभव नहीं था। आज स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी भारत का राजनीतिक परिदृश्य मुस्लिम तुष्टिकरण की धुरी पर घूम रहा है। राजनीतिक दल इस बात की होड़ में लगे हैं कि कौन बहुसंख्यक समाज की कीमत पर अल्पसंख्यक मतबैंक को अधिक संतुष्ट कर सकता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को वैचारिक रूप से इसका अपवाद माना जाता है, लेकिन सत्ता की मजबूरियों और वैश्विक नैरेटिव के दबाव में वह भी कई मोर्चों पर इस वर्ग को रिझाने के लिए रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देती है। वास्तविकता यह है कि भाजपा चाहे उनके लिए कितनी भी कल्याणकारी योजनाएं चला ले, वैचारिक कट्टरता के कारण वह मतबैंक किसी भी स्थिति में राष्ट्रवाद या हिंदुत्व के नाम पर मतदान नहीं करेगा। यदि यह भय न होता, तो शायद भाजपा भी उसी ढर्रे पर चल रही होती जिस पर अन्य छद्म-धर्मनिरपेक्ष दल चल रहे हैं।
पहचान का विखंडन: हिंदुओं को विभाजित करने का 'तालिबानी' मॉडल
मौलाना नोमानी का यह दावा कि सिख, जैन, बौद्ध, जाट, अनुसूचित जाति, जनजाति, आदिवासी, तमिल और लिंगायत जैसे कन्नड़ भाषी लोग हिंदू नहीं हैं, वास्तव में समाजशास्त्र का शोध नहीं बल्कि 'सोशल इंजीनियरिंग' के माध्यम से भारत को जनसांख्यिकीय रूप से हड़पने की एक खतरनाक साजिश है।
ऐतिहासिक विडंबना: भारत का इतिहास गवाह है कि यहाँ का कोई भी मुसलमान किसी अरब या मध्य-पूर्वी देश से आकर नहीं बसा। ये सभी मूल रूप से धर्मांतरित हिंदू हैं। स्वयं मौलाना नोमानी के पूर्वज भी इसी भूमि के सनातन अंग थे। लेकिन नव-धर्मांतरितों में अपनी धार्मिक वफादारी को साबित करने की जो छटपटाहट होती है, वही हिंदुओं के प्रति घृणा के इस चरम स्तर को जन्म देती है।
इस तालिबानी कट्टर मानसिकता के दो स्पष्ट रणनीतिक उद्देश्य हैं:
जनसांख्यिकीय मनोविज्ञान को बदलना: हिंदुओं को यह विश्वास दिलाना कि वे अब इस देश में एक अजेय बहुसंख्यक नहीं हैं, जिससे उनके भीतर का प्रतिरोध समाप्त हो जाए और वे 'गजवा-ए-हिंद' या भारत के इस्लामीकरण की परियोजनाओं के सामने आत्मसमर्पण कर दें।
हिंदू पुनरुत्थान को हतोत्साहित करना: जो वर्ग या संगठन भारत को सांस्कृतिक रूप से एक हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग कर रहे हैं, उनके तर्कों को कमजोर करना और उन्हें वैश्विक मंचों पर 'फासिस्ट' सिद्ध करना।मौलाना नोमानी ने अपने इस शरारतपूर्ण बयान को प्रामाणिकता देने के लिए काबा के काले पत्थर और लिहाफ पर हाथ रखकर कसम खाने का दावा किया। यह इस बात का प्रमाण है कि यह कोई हवा-हवाई बयान नहीं था, बल्कि तीन दशकों के जमीनी सफर और शोध पर आधारित एक ऐसी कार्ययोजना है, जिसका उद्देश्य हिंदुओं को उप-जातियों और क्षेत्रीय पहचानों में बांटकर उनकी सामूहिक शक्ति को समाप्त करना है।
सेक्युलर बनाम फासिस्ट: हिंदुओं का रणनीतिक विभाजन
मौलाना नोमानी ने अपने भाषण में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़वी सच्चाई को अनजाने में स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा कि रणनीतिकारों ने हिंदुओं को दो श्रेणियों में बांटा था—'सेक्युलर हिंदू' और 'फासिस्ट हिंदू'।
इस विभाजन का सीधा उद्देश्य यह था कि जब तक इस्लामीकरण का एजेंडा पूरी तरह परिपक्व नहीं हो जाता, तब तक कथित 'सेक्युलर' हिंदुओं के राजनीतिक और सामाजिक समर्थन का उपयोग करके अपने हितों को सुरक्षित रखा जाए। लेकिन नोमानी की हताशा इस बात से उजागर होती है कि इन दोनों समूहों ने मिलकर अंततः देश की कमान उन ताकतों के हाथों में सौंप दी, जिन्हें वे 'फासिस्ट' कहते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि यदि कथित धर्मनिरपेक्ष हिंदुओं ने पूरी तरह से घुटने टेक दिए होते, तो भारत में 'गजवा-ए-हिंद' का कार्य अब तक निर्बाध रूप से पूरा हो चुका होता।
इस रणनीतिक विभाजन का असर भारत के दक्षिणी राज्यों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जहाँ हिंदुओं की बहुसंख्या होने के बावजूद उनकी राजनीतिक चेतना को पूरी तरह से सुप्त कर दिया गया है।
केरल और तमिलनाडु का चुनावी यथार्थ
दक्षिण भारत की राजनीतिक जनसांख्यिकी और चुनावी परिणाम इस वैचारिक विभाजन की गवाही देते हैं:
राज्य धार्मिक जनसांख्यिकी (अनुमानित) राजनीतिक प्रतिनिधित्व का विरोधाभास (हालिया चुनाव) केरल हिंदू: 55%
मुसलमान: 27%
ईसाई: 18%
भारतीय जनता पार्टी (विशुद्ध राष्ट्रवादी/हिंदूवादी दल) को इतिहास में पहली बार केवल 3 सीटें प्राप्त हुईं, जबकि अकेले इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसी सांप्रदायिक पार्टी को 22 सीटें मिलीं। तमिलनाडु हिंदू: 82%
ईसाई: 6%
मुसलमान: 6%
हिंदू बहुल राज्य होने के बावजूद राष्ट्रवाद की बात करने वाली भाजपा को केवल 1 सीट मिली, जबकि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को 2 सीटें प्राप्त हुईं। यह आंकड़े सिद्ध करते हैं कि हिंदुओं में 'धर्मनिरपेक्षता' का पैमाना यह बन चुका है कि जो हिंदू हितों की अनदेखी करे और सनातन की बुराई करे, उसे प्रगतिशील माना जाता है, और जो हिंदू अस्मिता की बात करे, उसे 'फासिस्ट' कहकर मुख्यधारा से अलग थलग करने का प्रयास किया जाता है।
सुरक्षा एजेंसियों की विफलता और बौद्धिक विमर्श का आत्मसमर्पण
यह भारत की आंतरिक सुरक्षा, पत्रकारिता जगत और खुफिया तंत्र के लिए अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक बात है कि 2 फरवरी 2026 को दिल्ली के हृदय स्थल में दिया गया यह देशद्रोही और भड़काऊ भाषण पाँच महीने तक दबा रहा और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि जब मौलाना नोमानी मंच से हिंदुओं को तोड़ने और देश को अस्थिर करने का ताना-बाना बुन रहे थे, तब उस कार्यक्रम में कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और यहाँ तक कि भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार मूकदर्शक बने बैठे थे।
यह नोमानी का पहला विवादित बयान नहीं है। इससे पहले जब अफगानिस्तान में बर्बर तालिबान ने बंदूक के बल पर लोकतांत्रिक सरकार को उखाड़ फेंका था, तब नोमानी ने इसका जश्न मनाया था और तालिबानियों को 'सलाम' भेजा था। उन्होंने भारत में लड़कियों की आधुनिक शिक्षा का विरोध करते हुए कहा था:
"पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।"
एक तरफ तालिबान का खुला समर्थन, बच्चियों की शिक्षा को हराम बताना और दूसरी तरफ भारत के बहुसंख्यक समाज के अस्तित्व पर सवाल उठाना—यह सब कुछ खुलेआम होने के बावजूद भारत का 'लिबरल' और 'सेक्युलर' तबका उन्हें एक महान बुद्धिजीवी मानकर बड़े-बड़े मंच प्रदान करता है। स्वरा भास्कर जैसे लोग मुस्लिमों के बीच राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे वैचारिक आत्मसमर्पण कर देते हैं।
भू-राजनीतिक संजाल और वैश्विक 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' का गणित
भारत के भीतर चल रहे इस सुनियोजित इस्लामीकरण के एजेंडे को केवल स्थानीय मस्जिदों या कुछ कट्टरपंथियों के व्यक्तिगत प्रयासों के रूप में देखना भारी भूल होगी। भारत में जितने मुस्लिम संगठन सक्रिय हैं, शायद उतने पूरी दुनिया में मिलकर भी नहीं होंगे। इन संगठनों का एक बड़ा हिस्सा अरब देशों, विशेषकर सऊदी अरब से मिलने वाली गुप्त और प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता (खैरात) पर फलता-फूलता है।
इसके पीछे सऊदी अरब की एक बहुत बड़ी 'दीर्घकालिक वैश्विक धार्मिक अर्थव्यवस्था' (Global Religious Economy) काम कर रही है। सऊदी अरब भली-भांति जानता है कि उसके पास कच्चे तेल (Petroleum) के भंडार सीमित हैं और वैश्विक स्तर पर लिक्विड हाइड्रोजन तथा नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) की ओर बढ़ते कदमों के कारण उसकी तेल-आधारित अर्थव्यवस्था का पतन निश्चित है। इसलिए, सऊदी अरब अपनी राष्ट्रीय आय बढ़ाने के लिए वैकल्पिक और स्थायी रास्तों पर काम कर रहा है, जिसमें सबसे बड़ा स्रोत हज और उमराह यात्राएं हैं।
सऊदी विजन 2030 और वैश्विक धर्मांतरण का आर्थिक संबंध
सऊदी अरब के आधिकारिक 'विजन 2030' दस्तावेजों के अनुसार, धार्मिक पर्यटन को एक विशाल उद्योग में बदला जा रहा है:
वर्तमान आय: सऊदी अरब वर्तमान में हज और उमराह से हर साल औसतन $12 अरब से $15 अरब डॉलर (लगभग ₹1 लाख करोड़ से ₹1.25 लाख करोड़) की सीधी कमाई करता है।
जीडीपी में योगदान: सऊदी की गैर-तेल अर्थव्यवस्था और पर्यटन उद्योग में इसका योगदान लगभग 20% से 27% तक है। मक्का और मदीना जैसे शहरों में होटल, ट्रैवल एजेंसियों और नागरिक उड्डयन क्षेत्र की 30% कमाई सीधे तौर पर इन्हीं तीर्थयात्रियों से होती है।
विजन 2030 का लक्ष्य: सऊदी सरकार का लक्ष्य है कि साल 2030 तक सालाना हज और उमराह यात्रियों की संख्या को बढ़ाकर 3 करोड़ किया जाए, जिससे इस क्षेत्र से होने वाली वार्षिक कमाई को $150 अरब डॉलर तक पहुँचाया जा सके।अब समझने वाली बात यह है कि यदि धार्मिक पर्यटन से होने वाली इस आय को कई गुना बढ़ाना है, तो दुनिया भर में मुसलमानों की जनसंख्या में भी उसी अनुपात में वृद्धि करनी होगी। जिहाद, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और धर्मांतरण के जो खेल भारत और अफ्रीका जैसे देशों में खेले जा रहे हैं, वे अनजाने में सऊदी अरब के इस आर्थिक एजेंडे को ईंधन प्रदान करते हैं। भारत के मुसलमान खुद को अरब के मूल मुसलमानों से भी अधिक कट्टर साबित करने की होड़ में अपने ही देश और संस्कृति के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं, जबकि भारत के कथित धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल जाने-अनजाने में इस अंतरराष्ट्रीय आर्थिक-धार्मिक चक्रव्यूह के मोहरे बन रहे हैं।
मोदी युग का 'सांस्कृतिक पुनर्जागरण' और उसकी सीमाएं
निस्संदेह, वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के हिंदुओं के मानस में एक बड़ा सकारात्मक परिवर्तन आया है। दशकों से संजोए गए घावों पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण से मरहम लगा है। सदियों की हीनभावना से उबरकर हिंदुओं के भीतर अपनी पहचान और संस्कृति पर गर्व करने की भावना जागृत हुई है। जब देश का प्रधानमंत्री भगवा वस्त्रों में, माथे पर चंदन लगाकर किसी प्राचीन मंदिर में पूजा-अर्चना करता है, तो आम हिंदू को अपनी खोई हुई सांस्कृतिक संप्रभुता वापस मिलती हुई प्रतीत होती है।
इस सांस्कृतिक जागरण का सबसे बड़ा राजनीतिक परिणाम यह हुआ कि आजादी के बाद से चला आ रहा 'मुस्लिम मतों का वीटो' समाप्त हो गया। लगातार तीन बार केंद्र में पूर्ण और प्रभावी बहुमत की सरकार बनना और उन राज्यों में भी सत्ता प्राप्त करना जहाँ मुस्लिम मत निर्णायक माने जाते थे, यह सिद्ध करता है कि अब केवल एक समुदाय के तुष्टिकरण से भारत की सत्ता हासिल नहीं की जा सकती।
हाल के वर्षों में पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों और राजनीतिक संघर्षों ने यह दिखा दिया कि यदि बहुसंख्यक समाज अपने अस्तित्व के संकट को पहचानकर एकजुट हो जाए, तो छद्म-धर्मनिरपेक्षता के गढ़ को भी ध्वस्त किया जा सकता है। पश्चिम बंगाल में हिंदू एकता के पीछे वहाँ के बहुसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों और जनसांख्यिकीय आक्रमण की एक लंबी और मार्मिक कहानी है। यही कारण है कि कट्टरपंथियों, मुस्लिम परस्त दलों और वामपंथी इतिहासकारों में इस बात की छटपटाहट है कि जो जागृति बंगाल में आई है, वह कहीं केरल और तमिलनाडु में न फैल जाए।
नेहरूवादी विरासत का ऐतिहासिक बोझ और वर्तमान की विफलता
पूरी दुनिया जानती है कि भारत का संविधान और इसकी व्यवस्थाएं देश के बहुसंख्यक हिंदुओं और सनातन धर्म के प्रति एक प्रकार की संस्थागत उपेक्षा का भाव रखती हैं। धार्मिक आधार पर देश का विभाजन होने और एक स्पष्ट इस्लामिक राष्ट्र (पाकिस्तान) के निर्माण के बाद भी, भारत के भीतर मुसलमानों को वे अधिकार और विशेषाधिकार दे दिए गए जो पाकिस्तान में भी उपलब्ध नहीं हैं।
यह इतिहास की सबसे शर्मनाक सच्चाई है कि जिन लोगों ने 'लड़के लेंगे पाकिस्तान' के नारे लगाए थे, जिन्होंने प्रत्यक्ष कार्रवाई (Direct Action Day) के नाम पर हिंदुओं का नरसंहार करवाया था, उनमें से एक बहुत बड़ी आबादी विभाजन के बाद भी यहीं रुक गई और उनमें से कई लोगों को भारत की संविधान सभा का सदस्य तक बना दिया गया। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू की अत्यधिक मुस्लिम-परस्त नीतियों के कारण ही हिंदुओं की यह संवैधानिक दुर्दशा हुई। नेहरू ने हिंदुओं को नियंत्रित करने के लिए 'हिंदू कोड बिल' बनाया और हिंदुओं के प्राचीन एवं समृद्ध मंदिरों को सरकारी नियंत्रण (अधिग्रहण) में ले लिया, ताकि सनातन धर्म आर्थिक और सामाजिक रूप से पंगु हो जाए। इसके विपरीत, उन्होंने मुसलमानों के लिए 'वक्फ बोर्ड' जैसे कानून बनाए, जिसने भारत के भीतर एक समानांतर 'लैंड जिहाद' का संस्थागत बीज बो दिया।
लेकिन यह तो इतिहास की बात है। आज नरेंद्र मोदी देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के कार्यकाल की समयावधि को भी पीछे छोड़ चुके हैं। धारा 370 को निष्प्रभावी करने और राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त करने के अलावा, वर्तमान सरकार ने ऐसा कोई ठोस और संस्थागत कार्य नहीं किया जिससे दुनिया की सबसे प्राचीन सनातन संस्कृति इस भूमि पर वैधानिक रूप से सुरक्षित हो सके।
मंदिर मुक्ति कानून की उपेक्षा: सरकारी नियंत्रण से हिंदू मंदिरों को मुक्त कराना सबसे आसान और तार्किक काम था, जिसका कोई तार्किक विरोध भी नहीं हो सकता था, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
प्रभावी कानूनों का अभाव: एक राष्ट्रव्यापी कठोर धर्मांतरण विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता (UCC), और राष्ट्रीय स्तर पर सनातन परिषद या मंदिर परिषद का गठन आज भी ठंडे बस्ते में है।
वैचारिक अंतर्विरोध: जब मौलाना नोमानी जैसे कट्टरपंथी हिंदू समाज को जातियों में बांटने की बात कर रहे हैं, ठीक उसी समय स्वयं को हिंदूवादी कहने वाली सरकारें भी विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में अगड़े, पिछड़े और दलितों के लिए अलग-अलग नीतियां और कानून बनाकर अनजाने में उसी विभाजनकारी एजेंडे को हवा दे रही हैं। चरित्र निर्माण के केंद्रों में जब मेधा के बजाय जातिगत पहचान सर्वोपरि हो जाएगी, तो समाज का बिखराव अवश्यंभावी है।2047 का सपना और गृहयुद्ध की पदचाप
केवल 'विकसित भारत 2047' का नारा देने या आर्थिक प्रगति के आंकड़ों को प्रदर्शित करने से सनातन धर्म और संस्कृति सुरक्षित नहीं होने वाली। यदि देश की जनसांख्यिकी बदल गई, यदि सीमाओं और आंतरिक हिस्सों में 'गजवा-ए-हिंद' के वैचारिक स्लीपर सेल्स इसी तरह फलते-फूलते रहे, तो 2047 का विकसित भारत केवल किताबों में रह जाएगा।
ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान सरकार देश के सामने खड़ी इन अस्तित्वगत और जनसांख्यिकीय चुनौतियों को आर्थिक विकास के चमकते परदे के नीचे ढकना चाहती है। यदि समय रहते इन कट्टरपंथी मौलानाओं, उनके विदेशी वित्तपोषकों और देश के भीतर बैठे उनके राजनीतिक संरक्षकों के खिलाफ कठोर, दंडात्मक और दार्शनिक कार्रवाई नहीं की गई, तो जो परिस्थितियां तेजी से उभर रही हैं, वे भारत को विनाश की ओर ले जाएंगी। भय इस बात का है कि कहीं 'विकसित भारत' के लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही, यह देश आंतरिक वैचारिक और जनसांख्यिकीय असंतुलन के कारण एक भीषण गृहयुद्ध के मुहाने पर न खड़ा हो जाए। संप्रभुता की रक्षा के लिए अब शब्दों की नहीं, बल्कि कठोर विधायी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~
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