मंगलवार, 4 जुलाई 2023
सोमवार, 12 जून 2023
हिंदू साम्राज्य दिवस और हिंदवी स्वराज
हिंदू
साम्राज्य दिवस और हिंदवी स्वराज
आधुनिक भारत में छत्रपति शिवाजी
महाराज ने हिन्दू सम्राज्य को नए सिरे से पुनः स्थापित किया था और 1674 में
ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तदनुसार 6 जून 1674 को महाराष्ट्र में पांच हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित
रायगढ़ किले में एक भव्य समारोह में शिवाजी का राज्याभिषेक किया गया था । प्रत्येक
वर्ष इस दिन को हिंदू साम्राज्य दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को हिन्दू साम्राज्य, संस्कृति, सभ्यता और
सौहार्द के प्रति जागरूक करना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित कई हिंदूवादी
संगठन हर वर्ष इसे त्यौहार के रूप में मनाते हैं. जहाँ कुछ संगठन हिंदू पंचांग के
अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को मनाते हैं, वही पूरे भारत में प्रत्येक वर्ष 6
जून को बहुत उत्साह और गौरव पूर्वक मनाया जाता है। 4 अक्टूबर 1674 को शिवाजी ने
दूसरी बार छत्रपति की उपाधि ग्रहण की जिसमे उन्होंने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना
का उदघोष करते हुए स्वतंत्र शासक के रूप में अपने नाम का सिक्का भी चलाया। इसके पश्चात् शिवाजी पूर्णरूप से छत्रपति अर्थात् एक प्रखर हिंदू
सम्राट के रूप में स्थापित हुए। शिवाजी ने
अनुशासित सेना व सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों के सहयोग से सुव्यवस्थित प्रशासन की
स्थापना की।
शिवाजी के राज्याभिषेक का भारत के
लिए अत्यंत महत्त्व है क्योंकि इसने सभी को भारत के हिंदू चरित्र और एक नए साम्राज्य के
उद्देश्य से परिचित कराया। सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय तक जो भी
हिंदू राजा थे उन्हें किसी मुस्लिम सम्राट ने ही यह उपाधि प्रदान की थी। मेवाड़ और
बुंदेलखंड को छोड़कर कोई भी राजा अपनी शक्ति सामर्थ्य के बल पर राजा नहीं था लेकिन इन दोनों राज्यों में संपूर्ण
भारत में हिंदू साम्राज्य स्थापित करने की दूर दृष्टि नहीं थी। इसलिए शिवाजी का
प्रसंग सर्वथा भिन्न है क्योंकि उन्होंने
न केवल अपने बलबूते दिल्ली सल्तनत को चुनौती देते हुए अपना राज्य स्थापित किया और
संपूर्ण भारत में हिंदवी स्वराज स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयास किया।
शिवाजी उन प्रारंभिक शासकों में से एक थे
जिन्होंने समुद्री युद्ध की सर्वोच्च महत्ता को समझते हुए पश्चिमी तट पर दुर्गों
का निर्माण किया और समुद्री जहाजों का प्रयोग सेना और व्यापार दोनों के लिए किया. इसलिए
शिवाजी को भारतीय नौसेना का जनक माना जाता है. 15 से 50 वर्ष की आयु के मध्य उन्होंने
276 युद्ध लड़ें और उसमें से 268 में उनकी विजय हुई. आसानी से समझा जा सकता है कि
उनकी सफलता का प्रतिशत कितना अच्छा था. शिवाजी का कहना था कि मानसरोवर से लेकर
कन्याकुमारी तक और कन्याकुमारी से लेके ईरान तक यह राष्ट्र हमारा है और इसे हम
लेकर रहेंगे. अपना उद्देश्य प्राप्त करने के लिए उन्होंने उत्तर भारत के
सभी राजाओं महाराजाओं को एकजुट करने का
कार्य किया. सही अर्थों में मुगल साम्राज्य समाप्त करने का श्रेय क्षत्रपति शिवाजी
को ही है.
638 से 711 ई. के बीच
खलीफ़ाओं के निर्देश पर भारत पर 15 आक्रमण किए गए जिसमें 14 बार खलीफा की सेना को
बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा. 15 वां आक्रमण 711 में मोहम्मद बिन कासिम के
नेतृत्व में किया गया था, जिसे भी सिंध के राजा दाहिर ने परास्त कर दिया. मोहम्मद
बिन कासिम ने पुनः बड़ी सेना लेकर सिंध पर
आक्रमण किया। उसने राजा दाहिर के सिपहसलार
को यह लालच देकर अपने साथ मिल लिया कि युद्ध में विजय के बाद उसे सिंध का राजा बना
दिया जाएगा. राजा दाहिर ने सभी भारतीय राजाओं से मुस्लिम आक्रमण के विरुद्ध मदद
मांगी लेकिन अधिकांश राजाओं ने कोई सहायता नहीं की. मोहम्मद बिन कासिम ने राजा
दाहिर के विश्वासघाती सिपहसालार की सहायता से षड्यंत्र रचकर जीत हासिल की और बाद
में विश्वासघाती सिपहसलार को भी मार दिया. इस तरह भारत में इस्लामिक साम्राज्य की
स्थापना की नींव पड़ी. ग्यारहवीं शताब्दी तक दिल्ली पर इस्लामिक आक्रांताओं का
कब्जा हो गया. हजरत मोहम्मद की मृत्यु के बाद छह वर्षों के अंदर उनके
उत्तराधिकारियों ने सीरिया, मिस्र, उत्तरी अफ्रीका, स्पेन और ईरान को जीत लिया था,
जिसके पीछे बहशीपन, क्रूरता, विश्वासघात और धोखाधड़ी का महत्वपूर्ण योगदान था. सारे
षड्यंत्रों के बाद भी इस्लामिक जेहाद को दिल्ली तक पहुँचने में 400 वर्ष लग गए.
तलवार की दम पर पूरी दुनिया में फैल रहे इस्लाम का जब
भारतीय संस्कृति से सामना हुआ तो भारी खून खराबा और नरसंहार हुआ. अमेरिकी
इतिहासकार स्टैनले वोलपर्ट ने लिखा है कि इस्लाम और हिंदू धार्मिक जीवन शैली में
इतनी अधिक भिन्नता है कि इनके बीच शांति या सामंजस्य की कल्पना करना भी असंभव है. अनुमान
के अनुसार भारत में लगभग 8 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार किया गया है जो मानव सभ्यता के
इतिहास में सर्वाधिक है। हिंदुस्तान ने
पहली बार ऐसे बाहरी हमलावरों को देखा था, जो मजहब के नाम पर लोगों का क़त्ल करते थे, महिलाओं का बलात्कार करते
थे और लूट-पाट करते थे. 1202 में तुर्क-अफगान हमलावरों ने बौद्ध धर्म के महान
केंद्र नालंदा पर हमला करके तहस-नहस कर दिया। नालंदा के महाविहार में रह रहे
हज़ारों बौद्ध भिक्षुओं का क़त्ल कर दिया गया और हजारों को अपनी जान बचाकर नेपाल और
तिब्बत भागना पड़ा। यह इस्लाम का ही असर था कि जिस मिट्टी में बौद्ध धर्म पैदा हुआ
था, वहीं से उसे देश निकाला दे दिया गया था।
पृथ्वीराज चौहान ने 17
बार मुहम्मद गौरी को युद्ध में परास्त किया था और भारतीय संस्कृति की महान
परंपराओं को ध्यान में रखते हुए लेकिन युद्धनीति और कूटनीति को अनदेखा करते हुए
क्षमा कर दिया था। अठारहवीं बार मुहम्मद
गौरी ने जयचंद की सहायता से पृथ्वीराज चौहान को युद्ध में हरा दिया और बंदी बनाकर
अपने साथ ले गया. मोहम्मद गौरी के हाथों पृथ्वीराज की हार ने भारत में हिंदू
साम्राज्य और सनातन संस्कृति को पराभव के अंधे
मोड़ पर खड़ा कर दिया जिसने दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता तथा संस्कृति,
वैज्ञानिकता पूर्ण जीवन शैली और ज्ञान के वैभव पर ग्रहण लगा दिया। कालांतर में यह
भारतीय इतिहास में अमानवीय क्रूरता, मजहबी कट्टरता और मानसिक संकीर्णता का निकृष्टतम काला
अध्याय साबित हुआ.
शिवाजी ने इतिहास की भूलों
से शिक्षा लेते हुए नया दृष्टिकोण अपनाया और कम संसाधनों के बाद भी, शक्तिशाली मुस्लिम
साम्राज्य से लोहा लेने के लिए छापा मार शैली का उपयोग किया और दिल्ली सल्तनत की
चूलें हिला कर अपना साम्राज्य स्थापित किया. यद्यपि छत्रपति शिवाजी
महाराज का कार्यकाल बहुत संक्षिप्त, केवल छह वर्ष के लिए 1674 से 1680 तक रहा लेकिन उन्होंने सार्वभौमिक सम्राट के रूप में
अपना दायित्व निभाया और साम्राज्य स्थापित करने के संघर्ष, सुचिता,
वीरता और नैतिकता के जो मापदंड स्थापित किये उसने कालांतर में भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक और
राजनैतिक दिशा तय कर दी जिसे इस्लामिक आक्रांता परिवर्तित करने का प्रयास कर रहे
थे.
मुस्लिम
आक्रांताओं ने इस देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाने के लिए जितनी बर्बर कार्रवाइयां
की थी, तलवार के ज़ोर पर धर्मांतरण करने का प्रयास किया था और सनातन धर्मावलंबियों का
मान मर्दन किया था, जिससे उनके अंदर हीन ग्रंथि की भावना घर कर गयी थी. शिवाजी नें
इसे बाहर निकलने और नई ऊर्जा से नई दिशा देने का कार्य किया. उनकी युद्ध कला, रणनीतिक
कौशल ओर कूटनीतिक सफलता ने सनातन धर्म और
संस्कृति को संजीवनी देने का कार्य किया. जिस इस्लामिक जिहाद ने विश्व की अनेक
सभ्यताओं को निगल लिया था, वह भारत में अब तक पूरी तरह से सफल नहीं हो पायी है.
शिवाजी की मृत्यु के बाद हुई अनेक
घटनाओं से उनकी दूरदृष्टि और हिंदवी स्वराज की परिकल्पना को और अधिक रेखांकित किया. शिवाजी
की विरासत इतनी मजबूत थी कि उनकी मृत्यु के बाद स्वयं औरंगजेब को उनके राज्य पर
चढ़ाई करने के लिए आना पड़ा. मुगलों की क्रूरता के प्रत्युत्तर में प्रत्येक घर एक
किला और शारीरिक रूप से योग्य हर युवा हिंदवी स्वराज का सैनिक बन गया था। अप्रतिम वीरता
और छापामार पद्धति के नए सेनापति सामने आए, जिन्होंने
शत्रुओं की सेना पर जोरदार हमले किए। अपनी
विशाल सेना और सभी पारंगत योद्धाओं के बावजूद औरंगजेब को चार वर्ष तक चले लंबे
संघर्ष में आखिरकार हार का सामना करना पड़ा और औरंगजेब की मृत्यु भी वही हो गयी.
उसकी कब्र औरंगाबाद, जिसका नाम अब संभाजी नगर रख दिया गया
है, में ही बनी, जहाँ इस समय औरंगजेब की फोटो सिर पर रखकर एक धर्म विशेष
के लोग उत्पात मचा रहे हैं. औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही मुगलों के उत्कर्ष का भी
अंत हो गया। इस तरह हिंदवी स्वराज के चढ़ते
सूरज के साथ भगवा प्रभात का आगमन हुआ।
भारत
के धर्मांतरित इस्लाम को यह बात रास नहीं आई उन्होंने अफगानिस्तान के अब्दाली को
भारत पर हमले हेतु बुलाया, जिसके पश्चात 1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा
साम्राज्य की पराजय हुई लेकिन कुछ ही
वर्षों में मराठियों ने वापसी की ओर अटक से कटक तक भगवा परचम लहरा दिया एक प्रकार
से संपूर्ण भारतवर्ष छत्रपति शिवाजी द्वारा प्रतिपादित हिंदवी स्वराज्य की ओर बढ़ चला
था.
शिवाजी के राजनैतिक आदर्श आज भी प्रासंगिक है, और जब भारत में सनातन
धर्म और संस्कृति पर षड्यंत्र पूर्वक खतरे आज उत्पन्न किये जा रहे हैं, उनका
समाधान शिवाजी के आदर्शों से ही संभव है।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा
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रविवार, 14 मई 2023
सोमवार, 8 मई 2023
सच का सामना : दि केरल स्टोरी
सच का सामना : दि केरल स्टोरी
सुदीप्तो सेन द्वारा निर्देशित और अम्रत लाल साह द्वारा
निर्मित फ़िल्म “दि केरल स्टोरी” ने एक बार फिर वैसा वातावरण तैयार कर दिया है जैसा
“दि कश्मीर फाइल्स” रिलीज होने के समय बन गया था. छद्म धर्मनिरपेक्षतावियों के नेतृत्व
में वामपंथी और इस्लामिस्ट गठजोड़ इस फ़िल्म का कुतर्कों के सहारे पुरज़ोर विरोध कर
रहा है और लव जिहाद तथा धर्मांतरण जैसे मुद्दों को सिरे से नकार रहा है. कांग्रेस
और वामपंथी पार्टियां पहले से ही इस फ़िल्म का विरोध कर रही हैं. जनहित याचिकाओं के
माध्यम से इस फ़िल्म पर रोक लगाने की मांग की गई है. याचिकाकर्ताओं का दावा है कि
इस फ़िल्म के रिलीज होने से सामाजिक सद्भावना का तानाबाना छिन्न भिन्न हो जाएगा. यद्यपि
कोई वैध कारण न होने के कारण सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर
दिया है.
फ़िल्म दि केरल स्टोरी के बारे में बताया गया है कि यह
सत्य घटनाओं पर आधारित है, जिसके अनुसार लगभग 32 हजार लड़कियों को इस्लाम में
धर्मांतरित किया गया है. फ़िल्म कश्मीर फाइल्स में जहाँ कश्मीर घाटी में हिंदुओं के
वीभत्स नरसंहार का सांकेतिक चित्रण किया गया था ताकि कश्मीर से हिंदुओं का पलायन करवाकर मुस्लिम बाहुल्य बनाकर भारत से अलग किया जा सके, वही केरल स्टोरी
में सांकेतिक रूप से बताने की कोशिश की गई है कि कैसे हिंदू और क्रिश्चियन लड़कियों
को केरल में लव जेहाद और जबरन धर्मांतरण द्वारा मुस्लिम बनाया जा रहा है. इनमें बहुतों
को आईएसआईएस जैसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों में कार्य करने के लिए इराक और सीरिया
भेजा जा रहा है जहाँ उन्हें सेक्स गुलाम के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. बाकी
को जनसंख्या बढ़ाने की फैक्टरी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.
इस फ़िल्म द्वारा लव जिहाद और धर्मांतरण के घृणित षड्यंत्र
के बारे में जन जागरूकता बढ़ेगी और वर्ग विशेष की जनसंख्या बढ़ाने के षड्यंत्र का
पर्दाफाश होगा, इसलिए इस पर हो हल्ला मचना बहुत स्वाभाविक है. विरोध करने वाले
ज्यादातर लोग लव जिहाद और धर्मांतरण से इनकार नहीं करते, उनका विरोध 32 हजार की
बड़ी संख्या को लेकर है. ऐसे लोग ये भूल जाते हैं कि इस समय केरल की लगभग 3.5 करोड़
(2023 की प्रोजेक्टेड) की जनसंख्या में मुस्लिमों की संख्या लगभग 1 करोड़ है, जिसमे
55 लाख से अधिक संख्या मुस्लिम महिलाओं की है. ये सभी धर्मांतरित हिंदू ही है. इसलिए
32 हजार की संख्या ज्यादा नहीं, बहुत कम है. यह संख्या कितने अंतराल की है, ये
ज्यादा महत्वपूर्ण है.
भारत में लंबे समय से धर्मांतरण किया जा रहा है जिसके
लिए तरह तरह की योजनायें और तिकड़में इस्तेमाल की जा रही है. लव जिहाद भी इनमें से
एक है, जो कथित तौर पर मुस्लिम पुरुषों द्वारा गैर-मुस्लिम
महिलाओं को झूठे प्रेम जाल में फंसाकर इस्लाम में धर्मान्तरित करने का षड्यन्त्र है. केरल भारत में इस्लाम की प्रयोगशाला है, जो स्वतंत्रता के पहले से ही कट्टरपंथियों
का पोषण करती आई है. अध्ययन में
यह बात सामने आई है कि लव जेहाद का उद्देश्य अन्य धर्मों की युवा महिलाओं का उपयोग
जनसंख्या बढ़ाने की फैक्टरी के तौर पर करना है ताकि जल्दी से जल्दी आबादी बढ़ाकर देश
पर कब्जा किया जा सके. लव जिहाद का एक फायदा यह भी होता है कि इससे दूसरे समुदाय
में युवा महिलाओं की संख्या कम हो जाती है जिससे उस समुदाय की जनसंख्या वृद्धि अपने
आप कम हो जाती है. इसके लिए बड़ी मात्रा में धन विदेशों से प्राप्त होता है, जिससे लव
जेहाद का नाटक करने वाले युवकों को काफी पैसा दिया जाता है ताकि वह न केवल अपने
उपयोग के लिए महंगे महंगे सामान खरीद सकें बल्कि दूसरे समुदाय की लड़कियों को अपने
जाल में फंसाने के लिए महंगे उपहार भी दे सके. इसी षड्यंत्र के अंतर्गत वर्ग विशेष
के फिल्मी कलाकार और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति हिन्दू समुदाय की लड़कियों
से ही शादी करके मुस्लिम युवकों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. हिंदी फ़िल्म जगत
के अनेक नामचीन चेहरे इसके कुख्यात उदाहरण हैं.
अब केरल ही नहीं, लव जेहाद ने पूरे उत्तर
भारत को अपनी चपेट में ले लिया है. मामले कम रिपोर्ट होने के बाद भी उत्तर भारत से
प्रकाशित समाचार पत्र इस तरह की खबरों से भरे रहते हैं. भारत का लचर संवैधानिक और
कानूनी ढांचा भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है और समान नागरिक संहिता न होना भी
देश के लिए अभिशाप शाबित हो रहा है.
केरल की कैथोलिक बिशप काउंसिल के अनुसार 2009 में 4500 से अधिक क्रिश्चियन लड़कियों का धर्मांतरण
इस्लाम में किया गया था. कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले की हिंदू जनजागृति समिति ने
दावा किया था कि 30,000 हिन्दू युवतियों को लव जेहाद में फंसाकर
धर्मांतरित किया गया है. कर्नाटक पुलिस ने भी स्वीकार किया था कि 400-500 लड़कियों
की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. पुलिस की एफआईआर दर्ज करने की कार्य
प्रणाली से समझा जा सकता है कि वास्तविक मामलों की संख्या कितनी होगी.
2009 में केरल हाई कोर्ट ने लव जेहाद की अवधारणा को
बिल्कुल सही पाया और पुलिस को विस्तृत जांच करने का आदेश के साथ साथ सरकार को लव
जेहाद के विरुद्ध कानून बनाने का भी निर्देश दिया. न्यायालय को
सौंपी गयी पुलिस रिपोर्ट के अनुसार नेशनल
डेमोक्रेटिक फ्रंट, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, सिमी आदि केरल के स्कूल और कॉलेजों में सक्रिय होकर लव जेहाद को
अंजाम दे रहे हैं. पिछले दो सालों में 4 से 6 हजार संपन्न घर की हिंदू और क्रिश्चियन लड़कियों को
धर्मांतरित किया गया है. उच्च न्यायालय ने अखिला अशोकन से धर्मांतरित होकर हदिया बनी कोयम्बटूर की
एक मेडिकल छात्रा का एक मुस्लिम युवक से किया
गया निकाह रद्द कर दिया था क्योंकि उसका कथित पति प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन का सदस्य था और आतंकवादी गतिविधियों में संलग्न था. हदिया को उसके माता पिता को सौंप दिया गया लेकिन
सर्वोच्च न्यायालय ने इस निकाह को पुन: वैधता प्रदान कर दी. केरल उच्च न्यायालय ने
जहाँ लव जिहाद को उसकी जड़ में नष्ट करने का प्रयास किया था, वही सर्वोच्च न्यायालय
ने लव जेहाद को जीवन दान दे दिया. आतंकवाद से संबंधित होने के कारण सर्वोच्च
न्यायालय ने एनआइए से जांच कराने का आदेश जरूर दिया था लेकिन उसने कभी भी एनआईए की
रिपोर्ट का न तो संज्ञान लिया और न ही उस पर कोई कार्रवाई की.
जून 2010 में केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने विधानसभा में एक लिखित उत्तर में
बताया था कि 2009 से 2012 के बीच में 2667 लड़कियों को इस्लाम में धर्मांतरित किया
गया था जिसमें से 2195 हिंदू और 492 क्रिश्चियन थी. केरल के ही एक मुख्यमंत्री वी
एस अच्युतानंदन ने पीएफआई पर आरोप लगाया था कि उसने अगले 20 वर्षों में केरल को
अलग इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना बनाई है. उन्होंने ये भी आरोप लगाया था कि
पीएफआई राज्य में दूसरे धर्म के युवकों को धर्मान्तरित करवा रहा है और मुस्लिम
महिलाओं से उनका निकाह कर रहा है ताकि कौम के लिए ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा किए
जा सके. एक तरह से उन्होंने उच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई चिंता को ही रेखांकित
किया था.
भारत सरकार ने संसद में इस बात को स्वीकार किया कि केरल
से लगभग 200 मुस्लिम युवक आइएस आईएस जॉइन कर चुके हैं. केरल की ही चार धर्मान्तरित
लड़कियां अफगानिस्तान में आईएसआईएस खुरासान जॉइन करने अफगानिस्तान गयी थीं जहाँ
उनके कथित पति लड़ाई में मारे जा चुके हैं. ये लडकियां अभी भी अफगानिस्तान में हैं,
जिन्हें भारत सरकार ने वापस लेने से इनकार कर दिया है.
केरल में धर्मान्तरित हुई हिंदू लड़कियों की घर वापसी के
बाद एक चौंकाने वाला तथ्य उजागर हुआ है, जिसके अनुसार अधिकांश हिंदू घरों में
बच्चों को धार्मिक शिक्षा न दिए जाने के कारण वे धर्म विमुख हो जाते हैं. उन्हें
अपने धर्म के बारे में ज्यादा कुछ मालूम नहीं होता है. मुस्लिम संगठनों द्वारा
संचालित विद्यालयों और जहाँ मुस्लिम
छात्रों की संख्या ज्यादा होती है एक षड्यंत्र के तहत हिन्दू छात्रों से हिंदू धर्म
के बारे में लगभग सामान प्रश्न किए जाते हैं और फिर उनके प्रदुषित तथा हिंदू धर्म विरोधी
उत्तर उन्हें बताए जाते हैं. इस्लाम के तारीफों के पुल बांधे जाते हैं, जिससे इन
बच्चों में हीन ग्रंथि विकसित कर दी जाती है और फिर उन्हें आसानी से धर्मांतरित कर
दिया जाता है. इसलिए हिंदू परिवारों के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि वह बच्चों को
स्कूली शिक्षा की कीमत पर भी धार्मिक शिक्षा से संस्कारित करना न भूलें. उन्हें
नित्य धार्मिक क्रियाओं में सहभागी बनाकर प्रोत्साहित करें. हिंदू संगठनो में इस
बात पर चर्चा करके सामूहिक रूप से बच्चों को धार्मिक संस्कार देने के उपाय करें. जब
धर्मांतरण के शिकारी संगठनात्मक रूप से षडयंत्रपूर्ण अभियान चला रहे हों, तब
हिंदुओं के लिए यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, अन्यथा वर्तमान
परिस्थितियों में धर्मांतरण को कभी भी रोका नहीं जा सकेगा. हम षड्यंत्र को केवल
कश्मीर फाइल्स और केरल स्टोरी के माध्यम से जानते रहेंगे. सावधान हो जाएँ, अगली
स्टोरी आपके मोहल्ले या आपके परिवार की भी हो सकती है.
शनिवार, 29 अप्रैल 2023
हिंदू फोबिया का वैश्विक षडयंत्र
भारत में तो हिंदू फोबिया बहुत पहले से अपने चरम पर थी ही लेकिन अब कुछ समय से ही बड़ी तीव्र गति से इसका अंतरराष्ट्रीयकरण होना शुरू हो
गया है. हिंदू फोबिया का अर्थ है हिंदू धर्म के प्रति पूर्वाग्रह या घृणा की भावना.
जिन लोंगो के अंदर हिंदू धर्म के प्रति नफरत की भावना होती है, वे हिंदू धर्म और हिंदुओं को लांछित और अपमानित करने
का हर स्तर हर पर संभव प्रयास करते हैं. इसके
लिए प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया पर अभियान चलाए जाते हैं, झूठे विमर्श
गढ़े जाते हैं, झूठे समाचार बनाए जाते हैं, झूठ पर आधारित पुस्तकें लिखी जाती है और
फिर इन पुस्तकों को सोशल मीडिया और दूसरे प्लेटफॉर्म पर संदर्भित किया जाता है,
जिसमें हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति मनगढ़ंत बातें लिखी होती है. इस सब का
उद्देश्य हिंदू धर्म को निशाना बनाकर उसे कट्टर और असहिष्णु बताना होता है जिससे सामाजिक
रूप से हिन्दुओं को नीचा दिखाया जा सके और हिन्दुओं की नयी पीढी के अंदर भी अपने
धर्म के प्रति आस्था कमजोर कि जा सके ताकि पढ़े लिखे प्रबुद्ध, धार्मिक और साधन
संपन्न हिंदुओं का भी धर्मांतरण आसानी से किया जा सके.
हाल ही में उत्तर प्रदेश के दुर्दांत माफिया, जो दुर्भाग्य से तुष्टिकरण
आधारित परिवारवादी पार्टियों के सहयोग और संरक्षण से सांसद और विधायक भी रहा, की
पुलिस हिरासत में हुई हत्या की केवल देश
में ही नहीं विदेशों में भी कुछ इस तरह से
निंदा की गई कि जैसे किसी बड़े समाजसेवी राष्ट्रभक्त की हत्या केवल इसलिए की गई
क्योंकि वह अल्पसंख्यक समाज से था. ओवैसी आज भी अतीक की हत्या को बार बार एनकाउंटर
बताते हैं, और हिंदू फोबिया से ग्रस्त विदेशी मीडिया तथा मुस्लिम देशों की मीडिया
भी इसे समुदाय विशेष के पूर्व सांसद पूर्व विधायक और रॉबिनहुड छवि वाले व्यक्ति की
पुलिस द्वारा निर्मम हत्या बताता है. अतीक के आतंक के बारे में सभी खामोश हैं. उसे
ऐसा लगता है कि एक समुदाय विशेष के व्यक्ति की हत्या, चाहे वह देश और समाज के लिए कितना
ही खतरनाक और विध्वंसक क्यों न हो, पूरे हिंदू समाज, पूरे राष्ट्र और हिंदू धर्म
को लांछित और अपमानित किया जाएगा.
समुदाय विशेष के व्यक्तियों के साथ हुई सामान्य घटनाओं को भी इतना बढ़ा
चढ़ाकर पेश किया जाता है और यह बताने की कोशिश की जाती है कि भारत में मजहब विशेष
के लोग खतरे में है, उन पर अत्याचार किया जा रहा है. भारत में हिंदू फोबिया के
इतने अधिक गिरोह सक्रिय है, कि वे वीडियो में काट
छांटकर पुराने वीडियो लगाकर भ्रामक समाचार फैलातें है. दुर्भाग्य से केंद्र सरकार
भी उन पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है और कई बार तो ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार और
राज्य सरकारे, हिंदुओं पर कार्रवाई करने
के लिए हिंदूफोबिक गैंग द्वारा प्रसारित झूठे और कपटपूर्ण समाचारों का इंतजार करती
है. गुजरात सरकार द्वारा काजल हिन्दुस्तानी की गिरफ्तारी इसका ताजा उदाहरण है.
हाल में अमेरिका ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में हुई कुछ घटनाएं इन देशों
में बढ़ती हिंदू फोबिया का उदाहरण है. ब्रिटेन में हिंदुओं और मंदिरों पर हमले किए
जाते हैं और वहाँ की सरकार असहाय बनी रहती
है. ऑस्ट्रेलिया में भी मंदिरों पर हमले और हिंदुओं के प्रति भेदभाव बेहद सामान्य
है. सबसे ज्यादा चिंतित करने वाली घटनाएं अमेरिका में हो रही है जिससे शायद
अमेरिका की राजनीति उसी तरह बेखबर है जैसे भारत में. आजादी के बाद भारत में नेहरू
ने एक समुदाय विशेष को वोट बैंक बनाने के लिए वह सबकुछ किया जो संभव था. उसके बाद कांग्रेस
ने सत्ता बनाए रखने के लिए समुदाय विशेष को संतुष्ट करने के लिए इतना किया कि देश
की एकता और अखंडता को भी दांव पर लगा दिया लेकिन यह समुदाय संतुष्ट नहीं हुआ.
इसलिए उनके प्रयास से तुष्टीकरण को किसी
सीमा में न बांधने वाले क्षेत्रीय दल उभर आए जिन्होंने समुदाय विशेष की गैरकानूनी
और देश विरोधी गतिविधियों को अनदेखा किया और कुछ भी करने की खुली छूट दे दी.
समुदाय विशेष के बहुत लोग इससे भी संतुष्ट
नहीं हए क्योंकि उनका उद्देश्य अपनी समाज की गरीबी दूर कर शिक्षा और संपन्नता लाना
नहीं बल्कि भारत को काफिरों से मुक्त कर इस्लामिक राष्ट्र बनाना लगता है. इसलिए
सनातन विरोधी लॉबी ने भारत की जातिगत संरचना का लाभ उठाकर नए ध्रुवीकरण बनाने की योजना बनायी. जिसके अनुसार
समुदाय विशेष के साथ दलित, आदिवासी और पिछड़े लोगों को जोड़ कर सत्ता हासिल करना और इस्लामिक राष्ट्र बनाने के सपने को साकार करना
है. बाद में इन दलित आदिवासी और पिछड़े लोगों का क्या होगा ये बताने की आवश्यकता
नहीं. पाकिस्तान और बांग्लादेश इसके उदाहरण हैं. पीएफआई से बरामद किए गए दस्तावेज़
में इसका उल्लेख है.
भारत में चालाकी भरी इस सोशल इंजीनियरिंग का उल्लेखनीय फायदा भी हुआ
और कई राज्यों में ऐसी सरकारें बनीं जिन्होंने समुदाय विशेष के लिए सब कुछ झोंक
दिया और उनके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. गजवा ए हिंद का सुचारू रूप से चलने लगा. भारत
में प्राप्त की गई इस सफलता को अब विदेशों में दोहराया जा रहा है. इसकी शुरुआत अमेरिका में हो रही है जहाँ पर
हिन्दुओं की जाति गति संरचना को उभारकर एक
वोट बैंक तैयार करने की कोशिश की जा रही है ताकि उन्हें राजनीतिक समर्थन हासिल हो
सके और वे अपना काम खुलकर कर सके. इसकी शुरुआत 2018 में हुई जब भारतीय दलितों के
कंधे पर बंदूक रखकर इक्वैलिटी लैब की स्थापना की गयी जिसका उद्देश्य केवल हिंदू
धर्म और हिंदुओं को अपमानित करना ही नहीं है बल्कि हिंदूओं का अमेरिका में प्रवेश
रोकना और नागरिकता मिलने में अड़चनें डालना भी है. इसके पीछे सभी हिंदू फोबिक संगठन, और वामपंथ-इस्लामिक गठजोड़
की लॉबी है.
इक्वैलिटी लैब ने एक चालाकी भरा सर्वे किया जिसका नाम रखा गया “अमेरिका
में जातियां, - दक्षिण एशियाई अमेरिकियों में जाति-गत सर्वे”. इस सर्वे रिपोर्ट की
शुरुआत में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की फोटो लगाई गई है और जिसके नीचे उन्हें कोट
करते हुए लिखा गया है कि “अगर हिंदू विश्व के अन्य देशों में जाकर बसते है तो
जातिगत भेदभाव वैश्विक समस्या हो जाएगी.” इस सर्वे रिपोर्ट को छद्म वैज्ञानिक जामा
पहनाते हुए वही सब कुछ दर्शाया गया है जो भारत में उच्च जातियों के विरुद्ध वर्षों
से कहा सुना जा रहा है. समझा जा सकता है कि इस जातिगत सर्वे का उद्देश्य केवल
भारतीय हिंदू समाज की उच्च जातियों को निशाना बनाना
है ताकि अमेरिका में भी हिंदू समाज के बीच जातिगत भावना को धार दी जा सके और उच्च
जातियों का उत्पीड़न किया जाए और कुछ कुछ वैसा ही वातावरण बनाया जाए जैसा भारत में
एससीएसटी एक्ट लागू करने के पहले और बाद में बनाया गया था जिससे से दलितों का कितना फायदा
हुआ ये तो पता नहीं लेकिन हिंदू समाज का जितना नुकसान हुआ उसकी भरपाई संभवत: कभी
नहीं की जा सकेगी.
इक्वालिटी लैब की तय योजना को आगे बढ़ते हुए अफगान मूल की एक मुस्लिम
अमेरिकी महिला और कैलिफोर्निया की डेमोक्रेट सीनेटर आयशा बहाब ने एसबी-403 नाम से
कानून का एक मसौदा तैयार किया जिसके अनुसार राज्य के रंगभेद के लिए बनाए गए भेदभाव
विरोधी कानून में जातिगत भेदभाव को भी जोड़ा जा सके. अनेक संगठनों और पीढ़ियों से
वहाँ रह रहे भारतीयों के भारी विरोध के
बावजूद, कानून के इस मसौदे को सीनेट की न्यायिक कमेटी ने 8-0 के पूर्ण बहुमत से
अनुमोदित भी कर दिया है. जिसे कानून बनाने के लिए अब आगे भेज दिया गया है. अगर यह
कानून बन जाता है तो कैलिफोर्निया अमेरिका का पहला ऐसा राज्य होगा जहाँ इक्वैलिटी
लैब की हिंदू फोबिक पॉलिटिकल प्रयोगशाला काम करना शुरू कर देगी.
यह जान लेना अत्यंत आवश्यक है कि कैलिफोर्निया अमेरिका का सर्वाधिक
जनसंख्या वाला राज्य है, और सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित बड़ी और नामी गिरामी
कंपनियां कंपनियों के मुख्यालय यहाँ पर है और उनमें बड़ी संख्या में भारतीय काम
करते हैं. इस कानून के पहले ही सिस्को और गूगल जैसी कंपनियां भेदभाव आधारित वर्तमान
कानूनों के अंतर्गत दायर किए गए मुकदमे का सामना कर रही है. इस तरह का कानून बन
जाने के बाद मुकदमो की संख्या कितनी गुना बढ़ जाएगी, और इन कंपनियों का कितना
नुकसान होगा, इसका अनुमान लगाना बहुत मुश्किल है. इसलिए कंपनियां भी डरी हुई है और
वे भारतीय भी जो संभावित रूप से इस नए कानून का शिकार होने वाले हैं. इसकी परिणिति
यह होगी कि कैलिफोर्निया में स्थापित कोई भी कंपनी या व्यापारिक समूह भारत से खासतौर से सवर्ण जातियों से
नियुक्तियां करने से बचेगा. इसका एक प्रतिफल यह भी होगा कि कैलिफोर्निया आधारित ये
कंपनियां विश्व के किसी भी देश में काम कर रही होंगी उन्हें तो भी उस देश में भी
इस कानून का पालन करना होगा. इसलिए गूगल, ओरेकल और सिस्को जैसी कंपनियों के लिए
भारत में कार्य करना अत्यंत दुष्कर हो जाएगा. इसके पहले सीएटल (वॉशिंग्टन) में भी जातिगत भेदभाव को रंगभेद / भेदभाव विरोधी कानून में शामिल कर चुका है यह उल्लेखनीय
है कि यहाँ पर माइक्रोसॉफ्ट का मुख्यालय है, जिसमें भी भारतीय कर्मचारियों की
अधिकता है. जातिगत भेदभाव विरोधी कानून के लिए इन राज्यों का चयन एक सोची समझी
रणनीति का हिस्सा है.
अमेरिका, ब्रिटेन और कई पश्चिमी देशों में किए
गए विभिन्न सर्वे में ये बात सामने आई है कि हिंदू बच्चों के साथ स्कूलों में
अवांछित टिप्पणियां की जाती है. उनके प्रतीक चिन्हों, पूजा पद्धतियों, रहन सहन और
पहनावे पर कटाक्ष किए जाते हैं. उन पर मजाक बनाएं जाते हैं और सोशल मीडिया में
प्रसारित किए जाते हैं. इन सबका परिणाम होता है कि इन बच्चों के मन मस्तिष्क में
अपने धर्म के प्रति आस्था डगमगा जाती है. हाल ही में अपनी दो महीने की अमेरिका
यात्रा के दौरान मैं कई ऐसे भारतीयों से मिला जो दशकों से वहाँ रह रहे हैं और
अमेरिका के नागरिक हैं. उनकी वर्तमान पीढ़ी परंपरागत भारतीय और धार्मिक रीति
रिवाजों का पूर्ण रूप से न सही लेकिन काफी हद तक पालन करती है लेकिन उनकी अगली
पीढ़ी हिंदू धर्म से लगभग विमुख हो गई लगती है और उनके अंदर धर्म के प्रति कोई
आकर्षण नहीं है. मैंने देखा, ये संयोग भी हो सकता है, कि ऐसे अधिकांश परिवारों के लड़के
और लड़कियां अन्य धर्मों विशेषतया क्रिश्चियन के लड़के लड़कियों के साथ या तो शादी
करते है या लिव इन रिलेशनशिप में रहते हैं. इस बात की संभावना बहुत अधिक है कि इन हिंदू परिवारों में अधिकांश की अगली पीढ़ी हिंदू
नहीं होगी. मैंने महसूस किया कि भारत में
क्रिश्चियन मिशनरी आक्रामक ढंग से धर्मांतरण कराते हैं, यही कार्य अमेरिका
में बहुत शांति और सहजता से किया जा रहा है.
भारत सरकार भारत में ही हिंदू फोबिया को
रोकने में सफल नहीं हो पा रही है, फिर भी उससे निवेदन है कि हिंदू फोबिया पर अंकुश
लगाने के लिए संबंधित सरकारों के समक्ष मामला उठा कर सख्ती से कार्यवाही के लिए
दबाव बनाया जाए.
~~~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~
बुधवार, 19 अप्रैल 2023
भगवान परशुराम
परशुराम जयन्ती
पर विशेष रूप से
अनूदित
~~~~~~~~~~~~
- शिव मिश्रा
भगवान परशुराम
भगवान परशुराम की जयंती वैशाख शुक्ल
तृतीया को आती है। इस बार यह जयंती 22 अप्रैल 2023 दिन शनिवार को मनाई जाएगी। परशुराम
जयंती का पूरे भारत के लिए बहुत महत्त्व
है खासतौर से ब्राह्मण समुदाय के लिए अत्यंत व्यापक महत्त्व है और सभी ब्राह्मण इसे बहुत उत्साह से मनाते है. इसलिए
भगवान परशुराम ब्राह्मण एकता के केंद्र बिन्दु है.
भगवान परशुराम का जन्म ब्राह्राण कुल में हुआ था, लेकिन उनका स्वभाव और गुण क्षत्रियों
जैसा था, उसके
पीछे भी एक कथा है।
भगवान परशुराम
जी विष्णु के छठे अवतार थे, और इन्हें कई
विद्वान विष्णु और शिव का संयुक्त आवेशावतार मानते हैं। इनके अवतार का मुख्य
उद्देश्य पृथ्वी से पाप और बुराइयों का नाश करना है। सर्वशक्तिमान विश्वात्मा
भगवान् श्रीहरि ने इस प्रकार भृगुवंशियों में अवतार ग्रहण करके पृथ्वी के भारभूत
राजाओं को दंडित कर पृथ्वी पर सत्य, दया
तथा शांति युक्त कल्याणमय धर्म की स्थापना की।
वे सात
चिरंजीवियों में से एक हैं.
अश्वत्थामा
बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:। कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान्
संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्। जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
भगवान परशुराम जी ने सामाजिक न्याय तथा
समानता की स्थापना के उद्देश्य से तथा समाज के शोषित तथा पीड़ित वर्ग के अधिकारों
की रक्षा के लिए शस्त्र उठाया। धर्म की स्थापना के लिए भगवान परशुराम प्रत्येक युग
के किसी न किसी कालखंड में अवश्य उपस्थिति होंगे. आज भी वे महेन्द्र पर्वत पर
समाधिस्थ हैं। कल्कि पुराण के अनुसार ये भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के
गुरु होंगे और उन्हें युद्ध की शिक्षा देंगे। वे ही भगवान कल्कि को भगवान शिव की
तपस्या करके उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे।
भगवान परशुराम कलियुग में भी एक जीवित देवता हैं,
इसलिए इनकी पूजा नहीं की जाती है। उनकी महान पितृ-मातृ भक्ति वन्दनीय है। उन्होंने समस्त पृथ्वी को दान
स्वरूप कश्यप ऋषि को प्रदान किया। कमल लोचन जमदग्नि नन्दन भगवान् परशुराम आगामी
मन्वन्तर में सप्तर्षियों के मंडल में रहकर वेदों का विस्तार करेंगे।
ऋद्धि
सिद्धिप्रदाता विधाता
भुवो
ज्ञानविज्ञानदाता प्रदाता
सुखम् विश्वधाता
सुत्राताऽखिलं विष्टपम्
तत्वज्ञाता सदा
पातु माम् निर्बलम्
पूज्यमानं
निशानाथभासं विभुम्
रेणुकानन्दनं
जामदग्न्यं भजे॥
क्यों पड़ा
परशुराम नाम?
परशुराम नाम दो शब्दों से मिलकर बना है
‘परशु’ अर्थात कुल्हाड़ी और ‘राम’,
जिसका शाब्दिक अर्थ है, कुल्हाड़ी के साथ राम। महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार परशुराम जी
का मूल नाम राम था, परन्तु
जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया, तो उनका नाम परशुराम हो गया। इन्हे वीरता
का प्रतीक माना जाता है।
माता पिता के
लिए समर्पण की कहानी
वे अपने माता पिता के प्रति बहुत अधिक
समर्पित थे। एक बार की बात है, उनकी
माता रेणुका गंगा नदी के तट पर हवन के लिए जल लेने गईं थीं। वहाँ पर गंधर्वराज
चित्रसेन को अप्सराओं के साथ विहार और मनोरंजन करते देख वे मंत्रमुग्ध हो गईं। इस
प्रकार उन्हें आश्रम पहुँचने में बहुत देर हो गई। ऋषि जमदग्नि ने अपनी दिव्य
दृष्टि से माता रेणुका के देरी से आने की वजह का पता लगा लिया। देर से आने के लिए
देवी रेणुका की अनुचित मनोवृत्ति जान क्रोधवश ऋषिश्रेष्ठ ने सभी पुत्रों को बुलाया
और माता का वध करने का आदेश दे दिया। उनके बाकी के पुत्रों ने माँ के प्यार के
वशीभूत पिता की आज्ञा का पालन करने से
इंकार कर दिया। जमदग्नि ने सभी पुत्रों को
अवज्ञा करने पर पत्थर बना दिया।
जब परशुराम जी की बारी आई तो उन्होंने
पिता की आज्ञा का पालन कर माँ का सिर धड़ से अलग कर दिया। इस पर ऋषि जमदग्नि अपने
पुत्र परशुराम से बहुत प्रसन्न हुए और मनचाहा वर मांगने के लिए कहा। परशुराम जी ने
वरदान स्वरूप अपने सभी भाइयों और माता को पुनर्जीवित करने को कहा। ऋषि जमदग्नि
अपने पुत्र के कर्तव्यपरायणता से इतने प्रसन्न थे कि उन्होंने उनकी इच्छा पूरी कर
पत्नी रेणुका सहित बाकी चारों पुत्रों को जीवित कर दिया। इस प्रकार परशुराम जी ने
अपने पिता और माता दोनों के लिए अपने कर्तव्य, प्रेम, और
समर्पण का पालन किया।
पिता के वध का
प्रतिशोध
हैहय क्षत्रिय वंश के अधिपति
सहस्त्रार्जुन ने भगवान नारायण के अंशावतार दत्तात्रेय को कठिन तपस्या कर प्रसन्न
कर लिया था। वह दत्तात्रेय से से सैंकड़ों भुजाओं और कभी पराजित ना होने का वरदान
पाकर घमंड में चूर हो गया था। एक बार वह वन में आखेट करते हुए ऋषि जमदग्नि के
आश्रम जा पहुँचा। वहाँ मिले आदर सत्कार से बहुत प्रफुल्लित हुआ जब उसे पता
चला कि इन सब का कारण कामधेनु गाय है तो वह कामधेनु को बलपूर्वक ऋषि जमदग्नि के
आश्रम से छीनकर ले गया। जब परशुराम जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने क्रोधवश
फरसा से प्रहार कर सहस्त्रार्जुन की सारी भुजाएं काट दी।
तत्पश्चात सहस्त्रार्जुन के पुत्रों ने
प्रतिशोधवश परशुराम जी की अनुपस्थिति में उनके पिता जमदाग्नि की हत्या कर दी। तब
परशुराम जी ने प्रतिज्ञा ली और 21 बार इस पृथ्वी से हैहय वंशीय क्षत्रियों का
विनाश कर दिया। उन्होंने लगभग सारी पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर ली थी। अंत में
उन्होंने पूरा साम्राज्य ऋषि कश्यप को सौंप दिया और स्वयं महेन्द्रगिरि पर्वत पर
जाकर घोर तप में लीन हो गए।
जन्म
भगवान परशुराम का जन्म सतयुग और त्रेता
के संधिकाल में 5142 वि.पू. वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन-रात्रि के प्रथम प्रहर
प्रदोष काल में हुआ था। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को पुनर्वसु
नक्षत्र में रात्रि के प्रथम प्रहर में 6 उच्च के ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर
राहु के स्थित रहते माता रेणुका के गर्भ से भृगु ऋषि के कुल में परशुराम का
प्रादुर्भाव हुआ था। पराक्रम के प्रतीक भगवान परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के
योग में हुआ, इसलिए
वह तेजस्वी, ओजस्वी
और वर्चस्वी महापुरुष बने। ऋचीक-सत्यवती के पुत्र जमदग्नि, जमदग्नि-रेणुका के पुत्र परशुराम थे।
ऋचीक की पत्नी सत्यवती राजा गाधि (प्रसेनजित) की पुत्री और विश्वमित्र (ऋषि
विश्वामित्र) की बहिन थी। परशुराम सहित जमदग्नि के 5 पुत्र थे।
भृगुक्षेत्र के शोधकर्ताओं के अनुसार परशुराम का जन्म वर्तमान बलिया के
खैराडीह में हुआ था। उन्होंने अपने शोध और खोज में अभिलेखिय और पुरातात्विक
साक्ष्यों प्रस्तुत किए हैं। शोध कर्ता श्री कौशिकेय के अनुसार उत्तर प्रदेश के
शासकीय बलिया गजेटियर में इसका चित्र सहित संपूर्ण विवरण है. 1981 ई. में बीएचयू
के प्रोफेसर डॉ. केके सिन्हा की देखरेख में हुई पुरातात्विक खुदाई में यहां 900
ईसा पूर्व के समृद्ध नगर होने के प्रमाण मिले थे। ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर पाण्डुलिपि संरक्षण
के जिला समन्वयक श्रीकौशिकेय द्वारा की गई इस ऐतिहासिक खोज से वैदिक ॠषि परशुराम
की प्रामाणिकता सिद्ध होने के साथ-साथ इस कालखण्ड के ॠषि-मुनियों वशिष्ठ, विश्वामित्र, पराशर, वेदव्यास के आदि के इतिहास की कड़ियां भी सुगमता से जुड़ जाती है।
एक अन्य मत के अनुसार मध्यप्रदेश के
इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित है जानापाव की पहाड़ी पर भगवान
परशुराम का जन्म हुआ था। जिसके अनुसार
मध्यप्रदेश के इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरी पर स्थित है जानापाव की
पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म हुआ था। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि
का आश्रम था। कहते हैं कि प्रचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित
रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं।
एक तीसरी मान्यता अनुसार छत्तीसगढ़ के
सरगुजा जिले में घने जंगलों के बीच स्थित कलचा गांव में उनका जन्म हुआ था। जिसके अनुसार
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में घने जंगलों के बीच स्थित कलचा गांव में स्थित एक
ऑर्कियोलॉजिकल साइट है जिसे शतमहला कहा जाता है। मान्यता है कि जमदग्नि ऋषि की
पत्नी रेणुका इसी महल में रहती थीं और भगवान परशुराम को जन्म दिया था। कलचा गांव
देवगढ़ धाम से महज दो किलोमीटर दूर है और उस पूरे क्षेत्र में ऋषि-मुनियों के
इतिहास से जुड़े कई अवशेष बिखरे पड़े हैं। हरे-भरे जंगलों और पहाड़ों से घिरा
छत्तीसगढ़ का सरगुजा क्षेत्र प्राचीन काल के दंडकारण्य का हिस्सा है।
एक अन्य चौथी मान्यता अनुसार उत्तर
प्रदेश में शाहजहांपुर के जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व
दिशा में हजारों साल पुराने मन्दिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान परशुराम की
जन्मस्थली कहा जाता है। जिसके अनुसार जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो
किलोमीटर पूर्व दिशा में हजारों साल पुराने मन्दिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान
परशुराम की जन्मस्थली कहा जाता है। महर्षि ऋचीक ने महर्षि अगत्स्य के अनुरोध पर
जमदग्नि को महर्षि अगत्स्य के साथ दक्षिण में कोंकण प्रदेश मे धर्म प्रचार का
कार्य करने लगे। कोंकण प्रदेश का राजा जमदग्नि की विद्वता पर इतना मोहित हुआ कि
उसने अपनी पुत्री रेणुका का विवाह इनसे कर दिया। इन्ही रेणुका के पांचवें गर्भ से
भगवान परशुराम का जन्म हुआ। जमदग्नि ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद धर्म
प्रचार का कार्य बन्द कर दिया और राजा गाधि की स्वीकृति लेकर अपना जमदग्नि आश्रम
स्थापित किया और पत्नी रेणुका के साथ वहीं रहने लगे। राजा गाधि ने वर्तमान
जलालाबाद के निकट की भूमि जमदग्नि के आश्रम के लिए चुनी थी। जमदग्नि ने आश्रम के
निकट ही रेणुका के लिए कुटी बनवाई थी आज उस कुटी के स्थान पर एक अति प्राचीन
मन्दिर बना हुआ है जो आज 'ढकियाइन
देवी' के नाम से
सुप्रसिद्ध है।
'ढकियाइन' शुद्ध संस्कृत का शब्द है जिसका
शाब्दिक अर्थ है वह देवी जिसका जन्म दक्षिण में हुआ हो। रेणुका कोंकण नरेश की
पुत्री थी तथा कोंकण प्रदेश दक्षिण भारत में स्थित है। यह वही पवित्र भूमि है जिस
पर भगवान परशुराम पैदा हुए थे। जलालाबाद से पश्चिम करीब दो किलोमीटर दूर माता
रेणुका देवी तथा ऋषि जमदग्नि की मूर्तियों वाला अति प्राचीन मन्दिर इस आश्रम में
आज भी मौजूद है तथा पास में ही कई एकड़ मे फैली जमदग्नि नाम की बह रही झील भगवान
परशुराम के जन्म इसी स्थान पर होने की प्रामाणिकता को और भी सिद्ध करती है।
परशुराम के गुरु
:
परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा
ऋचीक, पिता जमदग्नि
तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वमित्र और भगवान शंकर
से प्राप्त हुई। परशुराम योग, वेद
और नीति में पारंगत थे। ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में भी
वे पारंगत थे। उन्होंने महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में शिक्षा प्राप्त
की।
परशुराम के
शिष्य :
त्रैतायुग से द्वापर युग तक परशुराम के
लाखों शिष्य थे। महाभारतकाल के वीर योद्धाओं भीष्म, द्रोणाचार्य और कर्ण को अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा देने वाले गुरु, शस्त्र एवं शास्त्र के धनी ॠषि परशुराम
का जीवन संघर्ष से भरा रहा है।
हैहयवंशी राजाओं
से युद्ध :
आम धारणा यह है कि परशुराम ने 21 बार
धरती को क्षत्रियविहीन कर दिया था। यह धारणा गलत है। भृगुक्षेत्र के शोधकर्ता
साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार जिन राजाओं से इनका युद्ध हुआ उनमें
से हैहयवंशी राजा सहस्त्रार्जुन इनके सगे मौसा थे। जिनके साथ इनके पिता जमदग्नि
ॠषि कई बातों को लेकर विवाद था जिसमें दो बड़े कारण थे। पहला कामधेनु और दूसरा
रेणुका।
परशुराम राम के समय में हैहयवंशीय
क्षत्रिय राजाओं का अत्याचार था। भार्गव और हैहयवंशियों की पुरानी दुश्मनी चली आ
रही थी। हैहयवंशियों का राजा सहस्रबाहु अर्जुन भार्गव आश्रमों के ऋषियों को सताया
करता था। एक समय सहस्रबाहु के पुत्रों ने जमदग्नि के आश्रम की कामधेनु गाय को लेने
तथा परशुराम से बदला लेने की भावना से परशुराम के पिता का वध कर दिया। परशुराम की
मां रेणुका पति की हत्या से विचलित होकर उनकी चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गई।
इस घोर घटना ने परशुराम को क्रोधित कर दिया और उन्होंने संकल्प लिया- मैं हैहय वंश
के सभी क्षत्रियों का नाश कर दूंगा।
हैहयवंशियों के राज्य की राजधानी
महिष्मती नगरी थी जिसे आज महेश्वर कहते हैं जबकि परशुराम और उनके वंशज गुजरात के
भड़ौच क्षेत्र में रहते थे। परशुराम ने अपने पिता के वध के बाद भार्गवों को
संगठित किया और सरस्वती नदी के तट पर भूतेश्वर शिव तथा महर्षि अगस्त्य मुनि की
तपस्या कर अजेय 41 आयुध दिव्य रथ प्राप्त किए और शिव द्वारा प्राप्त परशु को
अभिमंत्रित किया।
इस जबरदस्त तैयारी के बाद परशुराम ने
भड़ौच से भार्गव सैन्य लेकर हैहयों की नर्मदा तट की बसी महिष्मती नगरी को घेर लिया
तथा उसे जीतकर व जलाकर ध्वस्त कर उन्होंने नगर के सभी हैहयवंशियों का भी वध कर
दिया। अपने इस प्रथम आक्रमण में उन्होंने राजा सहस्रबाहु का महिष्मती में ही वध कर
ऋषियों को भयमुक्त किया।
इसके बाद उन्होंने देशभर में घूमकर अपने 21
अभियानों में हैहयवंशी 64 राजवंशों का नाश किया। इनमें 14 राजवंश तो पूर्ण अवैदिक
नास्तिक थे। इस तरह उन्होंने क्षत्रियों के हैहयवंशी राजाओं का समूल नाश कर दिया
जिसे समाज ने क्षत्रियों का नाश माना जबकि ऐसा नहीं है। अपने इस 21 अभियानों के बाद
भी बहुत से हैहयवंशी छुपकर बच गए होंगे।
चारों युग में
परशुराम :
सतयुग में जब एक बार गणेशजी ने परशुराम
को शिव दर्शन से रोक लिया तो, रुष्ट
परशुराम ने उन पर परशु प्रहार कर दिया, जिससे गणेश का एक दांत नष्ट हो गया और वे एकदंत कहलाए।
त्रेतायुग में जनक, दशरथ आदि राजाओं का उन्होंने समुचित सम्मान किया। सीता स्वयंवर में
श्रीराम का अभिनंदन किया। द्वापर में उन्होंने कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया
और इससे पहले उन्होंने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध करवाया था। द्वापर में
उन्होंने ही असत्य वाचन करने के दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत हो जाने
का श्राप दिया था। उन्होंने भीष्म,
द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी। इस तरह परशुराम के अनेक
किस्से हैं।
मान्यता है कि पराक्रम के प्रतीक भगवान
परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग में हुआ, इसलिए वह तेजस्वी,
ओजस्वी और वर्चस्वी महापुरुष बने।
चिरंजीवी हैं परशुराम :
कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने
उन्हें कल्प के अंत तक तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। भगवान परशुराम किसी समाज
विशेष के आदर्श नहीं है। वे संपूर्ण हिन्दू समाज के हैं और वे चिरंजीवी हैं।
उन्हें राम के काल में भी देखा गया और कृष्ण के काल में भी। उन्होंने ही भगवान
श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। कहते हैं कि वे कलिकाल के अंत में
उपस्थित होंगे। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत तक धरती पर ही तपस्यारत
रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तप की
जगह थी और अंतत: वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्यारत होने के लिए चले गए
थे।
भगवान परशुराम किसी समाज विशेष के
आदर्श नहीं है। वे संपूर्ण हिन्दू समाज के हैं। उन्हें राम के काल में भी देखा गया और कृष्ण के
काल में भी। उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। कहते
हैं कि वे कलिकाल के अंत में उपस्थित होंगे। ऐसा माना जाता है कि वे कल्प के अंत
तक धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे। पौराणिक कथा में वर्णित है कि महेंद्रगिरि पर्वत
भगवान परशुराम की तप की जगह थी और अंतत: वह उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए
तपस्यारत होने के लिए चले गए थे।
आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं
ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य
वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ।
तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर
विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण
का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में
किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण
के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।
उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव
पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा।
इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-
"ॐ
जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नः परशुराम:
प्रचोदयात्।"
वे पुरुषों के
लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य
की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट
नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था।
अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।
पौराणिक परिचय
परशुरामजी का उल्लेख रामायण, महाभारत,
भागवत
पुराण और कल्कि पुराण इत्यादि अनेक ग्रन्थों में किया गया है। वे अहंकारी और धृष्ट
हैहय वंशी क्षत्रियों का पृथ्वी से २१ बार संहार करने के लिए प्रसिद्ध हैं[2]। वे
धरती पर वैदिक संस्कृति का प्रचार-प्रसार करना चाहते थे। कहा जाता है कि भारत के
अधिकांश ग्राम उन्हीं के द्वारा बसाये गये। जिस मे कोंकण, गोवा एवं केरल
का समावेश है।
पौराणिक कथा के अनुसार भगवान परशुराम
ने तीर चला कर गुजरात से लेकर केरला तक समुद्र को पिछे धकेल ते हुए नई भूमि का
निर्माण किया। और इसी कारण कोंकण, गोवा और केरला मे भगवान परशुराम वंदनीय
है। वे भार्गव गोत्र की सबसे आज्ञाकारी सन्तानों में से एक थे, जो
सदैव अपने गुरुजनों और माता पिता की आज्ञा का पालन करते थे। वे सदा बड़ों का
सम्मान करते थे और कभी भी उनकी अवहेलना नहीं करते थे। उनका भाव इस जीव सृष्टि को
इसके प्राकृतिक सौंदर्य सहित जीवन्त बनाये रखना था। वे चाहते थे कि यह सारी सृष्टि
पशु पक्षियों, वृक्षों, फल फूल औए समूची प्रकृति के लिए जीवन्त रहे। उनका कहना था कि राजा का
धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है नाकि अपनी प्रजा से आज्ञापालन करवाना।
वे एक ब्राह्मण
के रूप में जन्में अवश्य थे लेकिन कर्म से एक क्षत्रिय थे। उन्हें भार्गव के नाम
से भी जाना जाता है।
यह भी ज्ञात है कि परशुराम ने अधिकांश
विद्याएँ अपनी बाल्यावस्था में ही अपनी माता की शिक्षाओं से सीख ली थीँ (वह शिक्षा
जो ८ वर्ष से कम आयु वाले बालको को दी जाती है)। वे पशु-पक्षियों तक की भाषा समझते
थे और उनसे बात कर सकते थे। यहाँ तक कि कई खूँख्वार वनैले पशु भी उनके स्पर्श
मात्र से ही उनके मित्र बन जाते थे।
उन्होंने सैन्यशिक्षा केवल ब्राह्मणों
को ही दी, सही नहीं है क्योंकि इनके शिष्यों में भीष्म और कर्ण भी हैं।
कर्ण को यह ज्ञात नहीं था कि वह जन्म
से क्षत्रिय है। वह सदैव ही स्वयं को शुद्र समझता रहा लेकिन उसका सामर्थ्य छुपा न
रह सका। उन्होन परशुराम को यह बात नहीं बताई की वह शुद्र वर्ण के है। और भगवान
परशुराम से शिक्षा प्राप्त कर ली। किन्तु जब परशुराम को इसका ज्ञान हुआ तो
उन्होंने कर्ण को यह श्राप दिया की उनका सिखाया हुआ सारा ज्ञान उसके किसी काम नहीं
आएगा जब उसे उसकी सर्वाधिक आवश्यकता होगी। इसलिए जब कुरुक्षेत्र के युद्ध में कर्ण
और अर्जुन आमने सामने होते है तब वह अर्जुन द्वारा मार दिया जाता है क्योंकि उस
समय कर्ण को ब्रह्मास्त्र चलाने का ज्ञान ध्यान में ही नहीं रहा।
क्यों हुआ क्षत्रिय
स्वभाव
प्राचीन काल में कन्नौज में (ये कोंकण भी
हो सकता है) गाधि नाम के एक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त
रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया।
सत्यवती के विवाह के पश्चात् वहाँ भृगु ऋषि ने आकर अपनी पुत्रवधू को आशीर्वाद
दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्वसुर को प्रसन्न देखकर
उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने
उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो
तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करें और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना।
फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। इधर
जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु
दिया है तो उसने अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार
सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्ति से भृगु को इस बात का
ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने
तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान
ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान
क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगी। इस पर सत्यवती ने भृगु से विनती की कि
आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा
पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली।
समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे।
बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच
पुत्र हुए जिनके नाम थे - रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्वानस
और परशुराम।
क्या है 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने की कहानी
हैहय वंशाधिपति कार्त्तवीर्यअर्जुन
(सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र
भुजाएँ तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट
करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुँचा और देवराज इन्द्र द्वारा उन्हें प्रदत्त
कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश
जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया। ऋषि वशिष्ठ से शाप का भाजन बनने के
कारण सहस्रार्जुन की मति मारी गई थी।
कुपित परशुराम ने फरसे के प्रहार से
उसकी समस्त भुजाएँ काट डालीं व सिर को धड़ से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के
पुत्रों ने प्रतिशोध स्वरूप परशुराम की अनुपस्थिति में उनके ध्यानस्थ पिता जमदग्नि
की हत्या कर दी। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गयीं। इस काण्ड से
कुपित परशुराम ने पूरे वेग से महिष्मती नगरी पर आक्रमण कर दिया और उस पर अपना
अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक पूरे इक्कीस बार इस पृथ्वी से हैहय
क्षत्रियों का विनाश किया। यही नहीं उन्होंने हैहय वंशी क्षत्रियों के रुधिर से
स्थलत पंचक क्षेत्र के पाँच सरोवर भर दिये और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के
पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर
कृत्य करने से रोका।
इसके पश्चात उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ
किया और सप्तद्वीप युक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी। केवल इतना ही नहीं,
उन्होंने
देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये और सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग
महेन्द्र पर्वत पर आश्रम बनाकर रहने लगे।
अन्य कथाएँ
ब्रह्मवैवर्त पुराण में कथानक मिलता है
कि कैलाश स्थित भगवान शंकर के अन्त:पुर में प्रवेश करते समय गणेश जी द्वारा रोके
जाने पर परशुराम ने बलपूर्वक अन्दर जाने की चेष्ठा की। तब गणपति ने उन्हें स्तम्भित
कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों का भ्रमण कराते हुए गोलोक में भगवान
श्रीकृष्ण का दर्शन कराके भूतल पर पटक दिया। चेतनावस्था में आने पर कुपित
परशुरामजी द्वारा किए गए फरसे के प्रहार से गणेश जी का एक दाँत टूट गया, जिससे
वे एकदन्त कहलाये।
उन्होंने त्रेतायुग में रामावतार के
समय शिवजी का धनुष भंग होने पर आकाश-मार्ग द्वारा मिथिलापुरी पहुँच कर प्रथम तो
स्वयं को "विश्व-विदित क्षत्रिय कुल द्रोही" बताते हुए "बहुत भाँति
तिन्ह आँख दिखाये" और क्रोधान्ध हो "सुनहु राम जेहि शिवधनु तोरा,
सहसबाहु
सम सो रिपु मोरा" तक कह डाला।
तदुपरान्त अपनी शक्ति का संशय मिटते ही
वैष्णव धनुष श्रीराम को सौंप दिया और क्षमा याचना करते हुए "अनुचित बहुत कहेउ
अज्ञाता, क्षमहु क्षमामन्दिर दोउ भ्राता" तपस्या के निमित्त वन को लौट
गये। रामचरित मानस की ये पंक्तियाँ साक्षी हैं- "कह जय जय जय रघुकुलकेतू,
भृगुपति
गये वनहिं तप हेतू"।
वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा के
अनुसार दशरथनन्दन श्रीराम ने जमदग्नि कुमार परशुराम का पूजन किया और परशुराम ने
रामचन्द्र की परिक्रमा कर आश्रम की ओर प्रस्थान किया।
जाते जाते भी उन्होंने श्रीराम से उनके
भक्तों का सतत सान्निध्य एवं चरणारविन्दों के प्रति सुदृढ भक्ति की ही याचना की
थी।
महाभारत काल
भीष्म द्वारा स्वीकार न किये जाने के
कारण अंबा प्रतिशोध वश सहायता माँगने के लिये परशुराम के पास आयी। तब सहायता का
आश्वासन देते हुए उन्होंने भीष्म को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच २३
दिनों तक घमासान युद्ध चला। किन्तु अपने पिता द्वारा इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरुप
परशुराम उन्हें हरा न सके। परशुराम को जब भीष्म
की प्रतिज्ञा के बारे में पता चल तब उन्होंने
युद्ध रोक दिया।
परशुराम अपने जीवन भर की कमाई दान कर
रहे थे, तब द्रोणाचार्य उनके पास पहुँचे। किन्तु तब तक वह सब कुछ दान कर चुके
थे। तब परशुराम ने दयाभाव से द्रोणचार्य से कोई भी अस्त्र-शस्त्र चुनने के लिये
कहा। तब चतुर द्रोणाचार्य ने कहा कि मैं आपके सभी अस्त्र शस्त्र उनके मन्त्रों
सहित चाहता हूँ ताकि जब भी उनकी आवश्यकता हो, प्रयोग किया जा
सके। परशुरामजी ने कहा-"एवमस्तु!" अर्थात् ऐसा ही हो। इससे द्रोणाचार्य
शस्त्र विद्या में निपुण हो गये।
परशुराम कर्ण के भी गुरु थे। उन्होने
कर्ण को भी विभिन्न प्रकार कि अस्त्र शिक्षा दी थी और ब्रह्मास्त्र चलाना भी
सिखाया था। लेकिन कर्ण एक क्षत्रिय पुत्र था जिसका पालन पोषण सारथी के घर गया था इसलिए
सूत का पुत्र समझा जाता था। कर्ण
ने छल करके झूठ बोलकर परशुराम से विधा प्राप्त की । परशुराम ने उसे ब्राह्मण समझ
कर बहुत सी विद्यायें सिखायीं, लेकिन एक दिन जब परशुराम एक वृक्ष के
नीचे कर्ण की गोदी में सर रखके सो रहे थे, तब एक भौंरा आकर कर्ण के पैर पर काटने
लगा, अपने गुरुजी की नींद में कोई अवरोध न आये इसलिये कर्ण भौंरे को सहता
रहा, भौंरा कर्ण के पैर को बुरी तरह काटे जा रहा था, भौरे
के काटने के कारण कर्ण का खून बहने लगा। वो खून बहता हुआ परशुराम के पैरों तक जा
पहुँचा। परशुराम की नींद खुल गयी और वे इस खून को तुरन्त पहचान गये कि यह खून तो
किसी क्षत्रिय का ही हो सकता है जो इतनी देर तक बगैर उफ़ किये बहता रहा। ये जानकर
की एक ब्राम्हण पुत्र में इतनी सहनशीलता नहीं हो सकती कर्ण के मिथ्याचरण पर उन्होंने उसे ये श्राप दे दिया कि जब उसे
अपनी विद्या की सर्वाधिक आवश्यकता होगी, तब वह उसके काम नहीं आयेगी।
जो भौरा कर्ण की जांघ पर बैठ कर काट रहा था वह इंद्रदेव थे जो पता लगाने आए थे क्योंकि कर्ण ने अपनी धनुर
विद्या और दिव्य शक्ति से इंद्रदेव को भी परास्त कर दिया था. कर्ण को श्रापित कराने में इन्द्र की भी बड़ी भूमिका थी।
मार्शल आर्ट में
योगदान
भगवान परशुराम शस्त्र विद्या के
श्रेष्ठ जानकार थे। परशुराम केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली
वदक्कन कलरी के संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु हैं। वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली
शैली है। वे स्वयं अत्यंत वीर और बृहद शरीर के थे। तुलसीदास जी भगवान परशुराम जी की पावन छवि का
वर्णन करते हुए कहते हैं-
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला ॥ कटि मुनिबसन तून दुइ
बांधें। धनु सर कर कुठारु कल कांधें॥
बृषभ के समान ऊंचे और पुष्ट कंधे हैं,
छाती
और भुजाएं विशाल हैं। सुंदर यज्ञोपवीत धारण किए, माला पहने और
मृगचर्म लिए हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र (वल्कल) और दो तरकश बांधे हैं। हाथ
में धनुष-बाण और सुंदर कंधे पर फरसा धारण किए हैं। जब क्रोधित हुए भगवान परशुराम
जी सभा में पधारे तो सभा में सभी उपस्थित राजा उनके क्रोधित रूप को देखकर भय से
व्याकुल हो गए थे।
भगवान परशुराम जी के महान पराक्रम से
अधर्मी राजा थर-थर कांपते थे। भगवान शिव से उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य
विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मंत्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए।
भगवान परशुराम के जीवन से संबंधित विडिओ
के 8 एपिसोड भी बनाए गए हैं जिन्हे यू ट्यूब
पर नीचे दिए गए लिंक से सुना और देखा जा सकता है।
विडिओ -
Parashu Ram EP1- Is he still alive?|
Where is he and what is he doing?जिन्दा हैं परशुराम? हैं कहाँ?
https://www.youtube.com/watch?v=k4rj8-sv8jU&t=360s
EP2-राम से कैसे बने परशुराम? | विश्वामित्र मित्र जैसे गुरु और
भीष्म जैसे शिष्य | कृष्ण
को दिया चक्र
https://www.youtube.com/watch?v=ZJ4qqFfeLmQ&t=86s
EP3- कितना सच है परशुराम का 21 बार भूमंडल को क्षत्रिय विहीन करना |
https://www.youtube.com/watch?v=mGcn5SDlnU8&t=464s
EP4- ब्राह्मण और ऋषि कुल में जन्में परशुराम स्वभाव से क्षत्रिय क्यों
थे?
https://www.youtube.com/watch?v=gMI18kHXMlY&t=25s
EP5-क्या परशुराम ने अपनी मां
का सिर धड़ से अलग कर दिया था |
Did Parashu Ram killed his mother ?
https://www.youtube.com/watch?v=cI-wEnoj2PQ
परशुराम EP6:क्यों तोडा था गणेश का दांत |क्या सीता स्वयंबर में लक्ष्मण ने
परशुराम को हरा दिया था
https://www.youtube.com/watch?v=lI4qMTJT06s&t=9s
परशुराम EP7 : क्या परशुराम ने
कर्ण को केवल इसलिए श्राप दिया था कि वह सूत पुत्र या गैर ब्राह्मण था ?
https://www.youtube.com/watch?v=4-0S8T-qtnc
परशुराम EP8 : भीष्म और परशुराम
युद्ध | मार्शल आर्ट के जनक | कोंकण, गोवा और
केरल के निर्माता
https://www.youtube.com/watch?v=mnE6lQh2OnE
संकलन कर्ता – शिव मिश्रा
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