सोमवार, 23 जनवरी 2023

क्या भारत में हिन्दू स्वतन्त्र हैं?

 

क्या भारत में हिन्दू स्वतन्त्र हैं





जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने "एक देश दो विधान दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे" का नारा दिया था और इसे पूरा करने के लिए अपना बलिदान भी दिया था. धारा 370 खत्म होने के बाद दो विधान और दो निशान खत्म हो गए लेकिन स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी  भारत में दो विधान अभी भी अस्तित्व में हैं, हिंदुओं के लिए अलग कानून और  अन्य धार्मिक समुदायों के लिए दूसरे कानून. इसका सबसे ज्वलंत उदहारण है  मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण. जबकि  अन्य  समुदायों के धार्मिक स्थलों पर कोई सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है.

भारत में इस समय लगभग 9 लाख  पंजीकृत मंदिर हैं, इनमें से चार लाख सरकारी नियंत्रण में है. इन मंदिरों के दान का लगभग 85% भाग सरकार ले लेती है और 15% मंदिर के रखरखाव और सामान्य खर्चों के लिए छोड़ देती है. इस कारण कई मंदिरों की स्थिति अत्यंत जर्जर हो गयी है और वहां पुजारियों और कर्मचारियों को वेतन भी नहीं मिल पाता है. अकेले तमिलनाडु में इस तरह के मंदिरों की संख्या 35000 से भी अधिक है. मैंने तमिलनाडु में अपनी मंदिर यात्रा के दौरान देखा कि कई मंदिर बेहद खराब स्थिति में है जहां रखरखाव के अलावा दोनों  समय  पूजा अर्चना की व्यवस्था भी बमुश्किल हो पाती है. मंदिर के पुजारियों और कर्मचारियों की हालत लगभग भिखारियों जैसी है जबकि सरकार के अधीन मंदिरों से प्रतिवर्ष सरकार को लगभग 13 लाख करोड़ से भी अधिक की आय प्राप्त होती होती है. 

सरकार द्वारा  मंदिरों से हड़पी  जाने वाली दान की राशि, सरकार के लिए आय का एक बहुत बड़ा स्रोत है और  विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा इसका  दुरुपयोग किया जा रहा है. यहां तक कि इसे  मस्जिदों, मदरसों, चर्च और यतीमखाना को दिया जाता है. बताया जाता है कि तमिलनाडु सरकार ने अप्रैल 2020 में राज्य के 47 मंदिरों को मुख्यमंत्री राहत कोष में ₹10 करोड़ प्रति मंदिर जमा  करने का आदेश दिया था और इसके विपरीत उसी अप्रैल में रमजान के महीने के कारण  2,895 मस्जिदों को 5,450 टन मुफ्त चावल वितरित करने का आदेश दिया था, ताकि रोजेदारों को परेशानी ना हो. आंध्र प्रदेश में तिरुपति बालाजी मंदिर के लिए बनाए गए तिरुपति तिरुमला देवस्थानम बोर्ड को सालाना 13000 करोड रुपए से अधिक आय होती है, जिसका अधिकांश हिस्सा आंध्र प्रदेश सरकार हड़प लेती है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी जो स्वयं  क्रिस्चियन है, मंदिर में दान की राशि बढ़ाने के लिए लक्ष्य निर्धारित किये  है और उन्होंने अपने क्रिस्चियन ससुर को इस बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया है. केरल की  सरकार भी स्वामी पद्मनाभ मंदिर से इसी तरह की लूट करती  है. 

सरकार द्वारा की जाने वाली यह लूटसातवीं शताब्दी से 16वीं शताब्दी के बीच  मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा कुछ हिंदू मंदिरों को लूटने से ज्यादा खतरनाक, पीड़ादायक  और निंदनीय है  क्योंकि मुस्लिम आक्रांता तो मंदिरों की संपत्ति लूट कर  चले जाते थे, इसलिए  इतने आक्रमण और लूट के बाद भी मंदिर धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण के रूप में  आज भी अक्षुण हैं लेकिन भारत की केंद्र और राज्य सरकारें 4 लाख से भी अधिक मंदिरों को प्रतिदिन लूट रही हैं, जिससे  सनातन धर्म के अस्तित्व पर भी  खतरा बढ़ गया है. मंदिरों से होने वाली इस सरकारी लूट का  दुष्कृत्य  हिंदू और सनातन संस्कृति को पूरी तरह नष्ट कर देने की  खतरनाक योजना का अंग है. एक तरफ जहां चर्च और मस्जिदें विदेशों से भारी मात्रा  में चंदा प्राप्त करती हैं, जिसका प्रयोग धर्म के प्रचार प्रसार के साथ-साथ बड़ी संख्या में धर्मांतरण कराने के लिए भी किया जाता है, वहीं दूसरी ओर 4 लाख से भी अधिक हिंदू मंदिरों  को सरकार लगातार लूट कर असहाय और  कंगाल बनाए रखने का कार्य कर रही है, जिस कारण सनातन धर्म के प्रचार और प्रसार की बात तो छोड़ दीजिए, इन मंदिरों में  विधिवत पूजा अर्चन भी हो पाना मुश्किल होता जा रहा  है. यही कारण है कि आज दुसरे  धर्म सनातन धर्म पर आक्रामक प्रहार कर रहे हैं और पराधीनता की बेड़ियों  में जकड़ा  सनातन धर्म अपनी बेबसी पर छटपटा रहा है. 

यह सही है कि भारत में अपना साम्राज्य स्थाई करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने हिंदू समाज में तमाम बुराइयों को बोया, उगया और पनपाया, जिसका दुष्प्रभाव आज भी कम होने की वजाय  बढ़ता जा रहा है. इन बुराइयों में प्रमुख थींनिचली जातियों पर उच्च जातियों के  अत्याचारों की झूठी और काल्पनिक कहानियां बना कर प्रचारित प्रसारित करना, आर्यों  को बाहरी बताकर द्रविड़यन  को भारत का मूल निवासी बताने की झूठी अवधारणा बनाना और पोषित करना, और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को बुरा बताकर  मिथ्या प्रचार करना कि यह लोग निम्न जातियों के लोगों को मंदिर में प्रवेश नहीं करने देते. जातियों में बटे भारतीय समाज में इस मिथ्या प्रचार ने जड़े जमा लीं जिस कारण हिंदू समाज में एकता की बेहद कमी है. रही सही कसर जातिगत आरक्षण ने पूरी कर दी जिसके कारण जाति प्रथा अब शायद कभी समाप्त नहीं हो सकेगी. 

हिंदू समाज में कृत्रिम रूप से फैलाई गई मन गढ़ंत विषमता का लाभ उठाकर अंग्रेज़ों ने 1925 में मद्रास धार्मिक और धर्मार्थ दान अधिनियम बना कर सभी धर्मों के सभी धार्मिक स्थलों को अपने अधिकार में कर  लिया।  मुस्लिम और ईसाईयों के विरोध के कारण अंग्रेजों ने चर्च और मस्जिदों को तो छोड़ दिया लेकिन मंदिरों को सरकार के अधीन बनाए रखा. विडंबना देखिए कि हिंदू समाज ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी  और तथाकथित बापू और चाचा भी अंग्रेजों के इस कार्य से सहमत हो गए.

स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 26 के अनुसार सरकार किसी भी धर्म की धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप न करने के लिए कृत संकल्प थी और इस तरह हिंदुओं को अपने मंदिर वापस मिल जाने चाहिए थे, लेकिन नेहरू ने हिंदू विरोधी रुख और  कुटिलता के कारण हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम 1951 बनाकर लागू कर दिया जिससे अन्य धर्म तो अनुच्छेद 26 के  कारण और अधिक स्वतंत्र हो गए लेकिन हिंदू धर्म को एक बार फिर गुलाम बना दिया गया. इसके अनुसार राज्य कानून बनाकर मंदिरों पर कब्जा कर सकता है लेकिन मस्जिद और चर्च को इससे अलग रखा गया है. सरकार को यह भी अधिकार दिया गया कि वह किसी भी व्यक्ति को मंदिर का प्रशासक अध्यक्ष या प्रबंधक बना सकती है. सरकार मंदिर का दान ले सकती है और उसका उपयोग किसी भी उद्देश्य के लिए कर सकती है. सरकार मंदिर की जमीन  बेंच  सकती है और प्राप्त धन का किसी भी कार्य में इस्तेमाल कर सकती हैं. सरकार सुरक्षा और अपरिहार्य कारणों से मंदिर की परंपराओं में भी हस्तक्षेप कर सकती हैं.

इस कानून के आने के बाद राज्यों में  मंदिरों के चढ़ावे और संपत्तियों की लूट मच गई. कांग्रेश शासित तमिलनाडु ने अकेले 35000 से भी अधिक मंदिरों का अधिग्रहण कर लिया. इसके बाद आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि ने  भी अपने-अपने कानून बनाकर मंदिरों पर कब्जा कर लिया. आज 15 राज्यों में 4 लाख  से भी अधिक मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण है. यह सही है कि मुस्लिम आक्रांता ओं ने भारत में आठ करोड़ से भी अधिक हिंदुओं का कत्लेआम किया जो मानव सभ्यता का सबसे बड़ा नरसंहार है लेकिन  कई बार ऐसा लगता है कि कि आज जब  सरकारें हिंदू धर्म की आस्था के साथ  खिलवाड़ और हिंदुओं पर  अत्याचार कर रहीं हैं तो  वे  शायद सबसे क्रूर शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों से कम नहीं लगते तब  जबकि भारत स्वतंत्र है, और केंद्र की मोदी सरकार को हिंदूवादी सरकार कहा जाता है. संभवत भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां देश के मूल निवासी और बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय को उसके सभी मौलिक और धार्मिक अधिकार तथा पूजा स्थलों पर स्वयं के अधिकार से स्वतंत्रता मिलने के 75 साल बाद भी वंचित रखा गया है.  क्या स्वतंत्र भारत में हिंदू वास्तव में स्वतंत्र हैं?

मंदिरों का अधिग्रहण केवल कांग्रेस या अन्य सरकारों ने किया ऐसा भी नहीं है, भाजपा भी पीछे नहीं है. उत्तराखंड में त्रिवेंद्र सिंह रावत  सरकार ने 2019 में चार धाम  देवस्थानम बोर्ड की स्थापना कर दी थी. पुजारियों और आम जनता ने आंदोलन किया और सत्ता गंवाने के लालच में मुख्यमंत्री बदल गये. नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने 51 अधिग्रहित मंदिरों को मुक्त करने की घोषणा की. बेहद संतोष की बात है कि  अभी कुछ दिन पहले ही कर्नाटक की बसवराज बोम्मई सरकार ने भी कांग्रेस द्वारा अधिग्रहीत किए गए 35000 से भी अधिक मंदिरों की सरकारी नियंत्रण से मुक्ति की घोषणा की है . यद्यपि यह केवल अभी घोषणा है और इस पर कानून बनना बाकी है .इस बीच कांग्रेस ने सरकार की इस मुहिम की आलोचना करते हुए कहा है कि वह किसी भी हालत में मंदिर  मुक्ति का कानून नहीं बनने देगी. 

सरकारी नियंत्रण से मंदिरों को मुक्त कराने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन और सर्वोच्च न्यायालय की सकारात्मक प्रतिक्रिया के करण कुछ प्रगति दिखाई पड़ती है जो पर्याप्त नहीं है. यह बात किसी के गले नहीं उतरती कि जब सरकार चर्चों, मस्जिदों, गुरुद्वारों और बौद्ध विहारों के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करती है, तो हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में रख कर उनका दान हड़पने का कार्य क्यों करती है. 

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने लगभग ९ साल सत्ता में रहने के बाद भी इस दिशा में कुछ  नहीं किया है. एक हाथ में कुरान और दूसरे  में लैपटॉप का नारा देकर मदरसों का अनुदान वर्षों कई गुना बढ़ा दिया गया है.  जब कई देशों ने मदरसों पर प्रतिबंध लगा रखा है, भाजपा शासित राज्यों में मदरसों का सर्वे कराकर उनमें सुविधाएं बढ़ा कर सभी छात्रों को छात्रवृत्ति देने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन विशाल हिंदू समुदाय जिसने  कथित हिंदूवादी मोदी सरकार को सत्ता के शिखर पर पहुंचाने का कार्य किया है, अपने मंदिरों की मुक्ति की बाट जो रहा है.

आज की परिस्थितियों में क्या कोई भी सरकार मस्जिदों या चर्च को सरकारी नियंत्रण में लेने के बारे में सोच भी नहीं सकती है तो हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में रखना हिंदुओं को निरंतर पराधीन बनाए रख कर विश्व की प्राचीनतम सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म को  तिल तिल कर मार देने के प्रयास के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता. 

-    शिव मिश्रा (responsetospm@gmail.com)

भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोषणा कर सकते हैं ये हिन्दू नेता

मंगलवार, 17 जनवरी 2023

जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड

 

जनाक्रोश है बायकाट बॉलीवुड

योगी आदित्यनाथ के हाल के मुंबई दौरे में हिंदी फिल्म जगत के लोगों से भी उनकी वार्ता प्रस्तावित थी जिसका मुख्य विषय उत्तर प्रदेश के नोएडा में बन रही फिल्म सिटी था किंतु विषय से अलग हटकर सुनील शेट्टी द्वारा योगी से बायकाट बॉलीवुड रोकने का आग्रह किया गया. सुनील शेट्टी ने जितने आत्मविश्वास से यह कहा कि योगी और मोदी बॉयकॉट रुकवा सकते हैं, उससे न केवल उनकी बुद्धि विवेक का पता चला, बल्कि यह भी उजागर हुआ कि वह किसी अन्य का मुखौटा बनकर बॉलीवुड का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. जैसा अपेक्षित था, सुनील शेट्टी के इस बयान का वीडियो मीडिया में वायरल हो गयाइस प्रकार एक बार फिर “बायकॉट बॉलीवुड” सुर्खियों में आ गया.

बॉयकॉट यानी बहिष्कार, विरोध का गांधीवादी तरीका है, जिसे स्वयं तथाकथित महात्मा ने कई बार आजादी के आंदोलन में प्रयोग किया था  और  देशवासियों को भी उससे जोड़ा था. बहिष्कार से दो प्रभाव होते हैं - एक तो समस्या चर्चा के केंद्र में आ जाती है और दूसरा इसके समर्थक आपस में जुड़ जाते हैं. इस समूह के लोग  समस्या के पक्ष विपक्ष के विचारों का आदान प्रदान करते हैं. इस प्रकार जागरूकता का दायरा बड़ा होता जाता है. यही बहिष्कार की सबसे बड़ी शक्ति है. प्रश्न है कि जिस अहिंसक हथियार का प्रयोग स्वाधीनता संग्राम में किया गया, उसी अहिंसक हथियार का विरोध आज क्यों किया जा रहा है. यह बहिष्कार किसी धर्म, संप्रदाय या व्यक्ति विशेष का नहीं है, बल्कि फिल्मों में  सनातन संस्कृति का विकृत चित्रण और हिंदुओं के खिलाफ दिखाई जा रही आपत्तिजनक सामिग्री के विरोध में है. हिंदी फिल्मों में अश्लीलता स्तर यह हो गया है कि शायद ही कोई फिल्म अब ऐसी आती हो जो परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके. 

इसके विपरीत दक्षिण भारत की फिल्में आज भी भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होती हैं और यही उनकी सफलता का रहस्य भी है. दर्शक दक्षिण भारत की फिल्मों के नायक नायिकाओं को देवतुल्य मानते हैं और जब भी कभी उनकी कोई नई फिल्म आती है तो लोग पटाखे फोड़ते हैं,जश्न मनाते हैं. लोगों में होड़ लग जाती है कि कैसे फिल्म को पहले दिन पहले शो में देखा जाय. दक्षिण भारत की ज्यादातर फिल्में जो हिंदी में डब की जाती हैं, वह भी सुपरहिट हो जाती हैं. इनमें ऐसा क्या खास होता है, यह हिंदी फिल्म जगत को समझ में क्यों नहीं आता. दक्षिण भारत की फिल्मों के विरुद्ध कभी बहिष्कार या विरोध प्रदर्शन की नौबत नहीं आई बल्कि इसके नायक - नायिकाओं के प्रति दर्शकों में सम्मान की भावना का ज्वार इतना अधिक होता है कि जब कभी वे सार्वजनिक जीवन में आते हैं तो सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले जाते हैं. आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में ऐसे नायक और नायिकाएं  मुख्यमंत्री बने और जनता ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया. इसके विपरीत हिंदी फिल्म जगत में मदांध नायक स्वयं अपने को किंग और बादशाह घोषित कर देते हैं.

जहां तक योगी से की गई अपील का प्रश्न है, तो उसमें गंभीरता का अभाव है. ऐसा लगता है कि सुनील शेट्टी ने निहित स्वार्थ के कारण योगी की इन्वेस्टर्स मीट में जानबूझकर यह शिकायत उछाली. अगर उनकी अपील में गंभीरता थी तो इसके पहले उन्होंने योगी से संपर्क क्यों नहीं किया. यदि उनमें साहस था तो उन्हें अपनी बात बॉयकॉट ट्रेंड  चलाने वालों के समक्ष रखनी चाहिए थी और उनका पक्ष भी समझना चाहिए था. अगर उन्हें यह भी नहीं मालूम कि बॉलीवुड का बहिष्कार क्यों किया जा रहा है, तो फिर वह जनता और समाज से पूरी तरह से अलग-थलग है और यही बॉलीवुड की सबसे बड़ी समस्या भी है. शेटटी ने अप्रत्यक्ष रूप से योगी और मोदी दोनों को  बॉलीवुड बॉयकॉट के  समर्थक और संरक्षक के रूप में आरोपित भी कर दिया. 

आजादी के बाद से ही बॉलीवुड में वामपंथ - इस्लामिक गठजोड़ के स्वयंभू उदारवादियों ने कब्जा कर लिया था. हिंदू देवी देवताओं का अपमान करके हिंदू धर्म को निकृष्ट साबित करने का कार्य उसी समय से शुरू कर दिया गया था ताकि विश्व की सबसे प्राचीन सनातन संस्कृति को धीमा जहर दे कर मारा जा सके. हिंदू धर्म और संस्कृति को हिंदुओं की नजरों में ही इतना विकृत कर दिया जाए कि उनका विश्वास डगमगाने लगे. इसके विपरीत एक धर्म विशेष को बहुत बड़ा चढ़ाकर आदर्श स्थिति में प्रस्तुत किया जाए कि लोग इसके प्रति  आकर्षित हों. इन दोनों  योजनाओं का एक ही उद्देश्य था हिंदुओं को आसान शिकार बनाकर धर्मांतरण को गति प्रदान करना. इसमें फिल्म जगत के छोटे बड़े सभी कलाकार शामिल हैं. इसके लिए छल कपट का सहारा लिया गया और हिंदुओं को भ्रमित करने के लिए कई  मुस्लिम कलाकारों ने अपने हिन्दू नाम रख लिए. विडंबना है कि ज्यादातर हिंदू कलाकार भी इसी टोली में शामिल हो गए. आश्चर्यजनक है कि यह तब हो रहा था जब हिंदी फिल्म उद्योग की कमाई का 95% हिस्सा हिंदुओं से आ रहा था.

 

इस दुष्प्रचार का असर यह हुआ है कि आज हिंदुओं में बड़ी संख्या में इसे लोग हैं जो अपने हिंदू धर्म के विरुद्ध ऊटपटांग टिप्पणियां करते हैं. सामान्य हिंदू वर्ग इतना सहिष्णु है  कि कभी दूसरे धर्मों का अपमान नहीं करता, इसके विपरीत मुस्लिम समुदाय में ऐसे निम्न मानसिकता वाले तथाकथित बड़े शायर, गीतकार, टिप्पणीकार, चित्रकार आदि की कमी नहीं है, जिन्होंने हिंदू देवी देवताओं का और सनातन संस्कृति का घोर अपमान किया और यह कार्य आज भी अनवरत जारी है.

सोशल मीडिया की सक्रियता के कारण सनातन चेतना का पुनर्जागरण हुआ है इसलिए क्रिया के विरुद्ध प्रतिक्रिया शुरू हो गयी हैं. परिणाम स्वरुप बॉलीवुड उद्योग में कुख्यात व्यक्तियों का बहिष्कार शुरू हो गया है. इन राष्ट्र वादियों का आक्रोश पूरे हिंदी फिल्म जगत से नहीं है बल्कि उन लोगों से है जो अपनी फिल्मों में सनातन संस्कृति और हिंदू धर्म का अपमान करते हैं. क्या किसी समुदाय की सामाजिक और धार्मिक भावनाओं को आघात पहुंचा कर उनको जबरदस्ती सिनेमाघरों तक लाकर ऐसी फिल्में दिखाई जा सकती हैं. आखिर कोई घटिया और निम्न स्तरीय फिल्मों पर अपने पैसे क्यों बर्बाद करें. 

आज जो बॉयकॉट बॉलीवुड से हिंदी फिल्म जगत को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, वे तब कहां रहते हैंजब पीके, काली, लाल सिंह चड्ढा आदि जैसी फ़िल्में बनती हैं. जब फिल्मों में हिंदू साधू, सन्यासियों को ढोंगी, चोर, ठग और बलात्कारी दिखाया जाता है. जब 786 का बिल्ला लगाने वाले जूते पहनकर मंदिर में घुसते  दिखाये जाते हैं. जब गोमांस खाने और उसे महिमा मंडित करने वाले कलाकार हिंदू धार्मिक चरित्र निभाते हैं. जब  कुछ अभिनेता अपने बच्चों के नाम उन क्रूर अक्रांताओं के नाम पर रखते हैं जिन्होंने लाखों हिंदुओं को मौत के घाट उतारा था.

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट अहमदाबाद  के तत्कालीन प्रोफेसर धीरज शर्मा के 2015 में एक अध्ययन में यह बात सामने आई कि  बॉलीवुड की फिल्में हिंदू और सिख धर्म के विरुद्ध झूठे विमर्श गढ रही हैं और लोगों के दिमाग में धीमा ज़हर भर रही हैं. उनके अध्ययन के अनुसार बॉलीवुड की फिल्मों में 58% भ्रष्ट नेताओं को ब्राह्मण दिखाया गया है. 62% फिल्मों में बेईमान कारोबारी को वैश्य  दिखाया गया है. 74% सिख किरदारों को मज़ाक का पात्र बनाया गया है. 78% मामलों में बदचलन महिलाओं को ईसाई दिखाया गया है.  84 प्रतिशत फिल्मों में मुस्लिम किरदारों को मजहब में पक्का यकीन रखने वाला और बेहद ईमानदार दिखाया गया है, अगर वह घृणित अपराधी है, तो भी उसूलों का पक्का दिखाया जाता है. यह संयोग नहीं, षड़यंत्र है. दुर्भाग्य से इसके विरुद्ध कोई आवाज बॉलीवुड के अन्दर से आज तक नहीं उठायी गयी.

बहिष्कार किसी समस्या का समाधान नहीं है, और बॉलीवुड का बहिष्कार भी किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं है. जिन फिल्मों में अश्लीलता और हिंदू धर्म विरोधी काली करतूतें पता चलती हैं, तो विरोध होता है और आपत्तिजनक दृश्यों  को हटाने की मांग की जाती है. जब लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ऐसा नहीं किया जाता तो लोग बहिष्कार जैसी रणनीति अपनाते हैं. आखिर ऐसी परिस्थिति पैदा ही क्यों हो कि बहिष्कार करने की नौबत आए. लगभग 100 वर्ष पुराने हिंदी फिल्म जगत में क्या अभी तक इतनी समझ नहीं आ पाई है कि समाज को क्या स्वीकार्य नहीं है. 

जब दक्षिण भारत की  "आरआरआर"  फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सफलता के झंडे गाड़ रही है और उसके  एक लोक गीत नाटू नाटू  को गोल्डन ग्लोब अवार्ड 2023 मिल चुका है, उस समय बॉलीवुड बहिष्कार के संघर्ष से जूझ रहा है. हिंदी फिल्म जगत को यह समझ लेना चाहिए कि उसकी काली करतूतों का भंडाफोड़ हो चुका है और यदि वह अपना एजेंडा नहीं छोड़ता और फिल्मों में कलात्मकता, सृजनात्मकता, राष्ट्रीय भावना, सनातन संस्कृति और सभी धर्मों के  प्रति  सम्मान की भावना अंगीकार नहीं करता, तो उसका विनाश निश्चित है, जिसे न योगी बचा  सकते हैं न मोदी. इसे बचाने के लिए स्वयं बॉलीवुड को आगे आकर आत्म विश्लेषण करना चाहिए और  शीघ्रातिशीघ्र  सुधारात्मक कदम लागू करना चाहिए. 

                                 - शिव मिश्रा (https://www.youtube.com/@hamhindustanee123)



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