गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

डॉ. भीमराव अंबेडकर - सही मूल्यांकन की तलाश

डॉ.  भीमराव अंबेडकर - एक महापुरुष जिसे सबने अनदेखा किया




डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उनको शत शत नमन। डॉक्टर अंबेडकर एक अत्यंत दूरदर्शी और स्पष्ट विचारों वाले राजनेता थे उन्होंने देश और समाज के लिए जो भी किया उसका आज तक उचित मूल्यांकन नहीं हो पाया है। वैसे तो डॉक्टर अंबेडकर को किनारे लगाने, उनके विचारों और योगदान को आभाहीन करने का काम कांग्रेस ने  किया लेकिन उनके  अनुयायियों ने भी उनके साथ काम ज्यादती  नहीं की जिन्होंने अपने फायदे के लिए  उनकी मूर्तियां जरूर लगाई लेकिन उनके जैसे राष्ट्रीय महापुरुष और अंतरराष्ट्रीय विद्वान को एक जाति विशेष के खांचे में फिट कर दिया।

डॉ भीमराव अंबेडकर समकालीन राजनीति में संभवत सबसे अधिक शिक्षित राजनेता थे । दूरदर्शी और प्रखर विचारों वाले अंबेडकर तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं से पूरी तरह सजग थे और जिनके समाधान के लिए उनके पास स्पष्ट विचार थे गांधी नेहरू और कांग्रेस ने डॉ आंबेडकर की प्रतिभा का जानबूझकर अनदेखा किया और  मुख्यधारा की राजनीति में न आने देने के लिए जानबूझकर उनका मार्ग बाधित किया गया और तरह-तरह की समस्याओं में उन्हें उलझाया गया । वह संविधान की ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष अवश्य थे लेकिन वहां भी उन्हें स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं करने दिया गया जिसका पता संविधान सभा में रिकॉर्ड किए गए उनके नोट से चलता है। संविधान में ऐसी बहुत सी बातें हैं जो उनकी इच्छा के विरुद्ध डलवाई गई और बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हें वे संविधान में डालना चाहते थे नहीं डाल पाए। अगर डॉक्टर अंबेडकर के सुझाव माने गए होते तो आज संविधान का प्रारूप और भी अच्छा होता।

डॉक्टर अंबेडकर की लिखी पुस्तकों से विशेषतया पाकिस्तान या भारत का विभाजन से उनके स्पष्ट विचारों का पता चलता है । देश के विभाजन के बाद उन्होंने हिंदू मुस्लिम जनसंख्या की अदला-बदली के लिए सरकार पर दबाव बनाया और नेहरू को एक पत्र भी लिखा लेकिन नेहरू और गांधी दोनों ने हीं उनके विचार को सिरे से नकार दिया। उन्होंने सरकार को ऐसा न करने के विपरीत परिणामों के लिए चेताया भी था

डॉ आंबेडकर अपनी बुद्धिमत्ता दूरदर्शिता और स्पष्ट वादिता के  कारण  हमेशा गांधी और नेहरू के आंख की किरकिरी बने रहे। गांधी हमेशा राजनीति के शिखर पर बने रहने हेतु प्रयासरत रहते थे और जो भी नेता राजनीतिक रूप से उन्हें चुनौती देने में सक्षम लगता उसे वह प्रभावित करने की कोशिश करते  ताकि उसे अपने झंडे के नीचे लाया जा सके अन्यथा उसे एक किनारे लगाया जा सके।  इसी क्रम में गांधी  ने 1929 में  अंबेडकर को मुलाकात के लिए बुलवाया। यह  वह समय था जब अंबेडकर प्रथम गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन जाने वाले थे क्योंकि गांधी इस सम्मेलन में नहीं जा रहे थे इसलिए हो सकता है कि वह अंबेडकर को अपने विचारों से प्रभावित करने और अप्रत्यक्ष रूप से अपने विचार गोलमेज सम्मेलन में पहुंचाने के लिए बुलाया हो । अंबेडकर ने  स्वयं लिखा है कि दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान लंदन में उनकी गांधी से लंबी मुलाकात हुई थी और विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ था इस मुलाकात के बाद भी गांधी संभवत अंबेडकर को तनिक भी प्रभावित नहीं कर सके थे ।। अंबेडकर ने इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया कि गांधी दूसरे गोलमेज सम्मेलन के दौरान 5 -6 महीने तक ब्रिटेन में रुके थे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है गांधी इतने लंबे समय तक लंदन में क्या करने के लिए रुके थे .

डॉ अंबेडकर ने लिखा है कि क्या कारण है कि  पश्चिमी जगत गांधी में  इतना रूचि लेते हैं।  अगर इन दोनों बातों को जोड़ा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि गांधी और अंग्रेजों के बीच में कुछ तो था जिसके कारण गांधी अंग्रेजों की सुविधा का ध्यान रखते थे और अंग्रेज गांधी को अत्यंत महत्व देते थे।  अंबेडकर ने लिखा है कि उन्होंने गांधी को एक आम इंसान समझ कर  मुलाकात की और इस कारण वह गांधी को वास्तविक रुप से समझ सके कि उनके अंदर कितना जहर भरा हुआ है।  यह बात उनके नजदीकी लोग नहीं समझ सकते थे क्योंकि वह हमेशा गांधी को देव तुल्य  मानते थे और इसलिए हमेशा भक्तों   की तरह मिलते थे । गांधी को जब  लगा कि अंबेडकर उनके काबू में नहीं आएंगे और ना ही उनकी छत्रछाया में काम करना पसंद करेंगे इसलिए अपनी आदत के अनुसार गांधी ने अंबेडकर को व्यर्थ के कामों में उलझा दिया ताकि कहीं ऐसा ना हो अंबेडकर गांधी से भी आगे निकल जाए या भविष्य में नेहरू के लिए कोई चुनौती खड़ी करें। गांधी के  स्वभाव में एक बीमारी थी कि वह मुस्लिमों के साथ साथ दलित समाज के भी सर्व मान्य नेता बनना चाहते थे इसलिए वह दलित बस्तियों में जाकर कभी-कभी मैला साफ करने का भी काम करते थे, और डॉक्टर अंबेडकर के सूट बूट पर तंज कसते थे। 

गांधी के बाद नेहरू ने भी डॉक्टर अंबेडकर के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया । नेहरू जहां तुष्टिकरण के अंधे रास्ते पर चल निकले थे और अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए सब कुछ करने के लिए तैयार थे । वही अंबेडकर के अनुरोध के बावजूद दलित समुदाय के लिए अपेक्षित सहायता करने के लिए कंजूसी बरत रहे थे। दोनों के मतभेद बढ़ते गए और फिर रास्ते भी अलग अलग हो गए।

आज प्रत्येक राजनीतिक दल  डॉक्टर अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए उनका महिमामंडन करता है जिसमें कांग्रेश सबसे आगे रहती है लेकिन कांग्रेस से कोई ये नहीं पूछता कि जब अंबेडकर इतने ही महान थे तो उन्हें गांधी ने भारत का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बनाया जिसके वह सर्वथा योग्य थे।

  काश डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते  तो भारत के समक्ष आज जो संप्रदायिक चुनौतियां हैं वह नहीं होती , दलितों के उत्थान और जातिगत असमानता के लिए जो विमर्श खड़े किए जाते हैं उनकी आवश्यकता भी नहीं होती, विश्व स्तरीय शिक्षा व्यवस्था होती और भारत दुनिया के सबसे खुशहाल और शांतिप्रिय देशों में से एक होता.।

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- शिव मिश्रा

responsetospm@gmail.com

सोमवार, 11 अप्रैल 2022

गांधी- नेहरु के प्रति ओगों में गुस्सा बढ़ रहा है

 


मोहनदास करमचंद गांधी जी कांग्रेस के कृत्रिम रूप से बनाए हुए पैगंबर हैं, जिन्हें कांग्रेस ने अपने कुकृत्यों और गांधी के गुनाहों पर पर्दा डालने के लिए पैगंबर बनाया है. गांधी ने हिंदुओं, सनातन संस्कृति और अखंड भारत की कीमत पर नेहरू को लाभ पहुंचाया और इसलिए नेहरू ने भी गांधी को देव तुल्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. षड्यंत्र के तहत नेहरू और गांधी की छवि निखारने के लिए इतिहास से छेड़छाड़ की गई, महत्वपूर्ण दस्तावेज गायब किए गए, अंधाधुंध धन खर्च करके पब्लिसिटी स्टंट किया गया. इस कारण हम सभी ने होश संभालते ही गांधी को जहां कहीं भी पढ़ा, सुना देव तुल्य ही बताया गया . इसलिए गांधी के प्रति श्रद्धा और सम्मान जीवन रक्षक दवा के रूप में हमारे व्यक्तित्व में जबरदस्ती इंजेक्शन लगा कर डाला गया है.

बदलते वैश्विक परिवेश में सूचना प्रौद्योगिकी की व्यापकता के कारण बहुत सी ऐसी गोपनीय सूचनाएं और दस्तावेज जो आम आदमी की पहुंच से बाहर थे, सार्वजनिक हो गये हैं. लोगों को अब समझ में आ गया है कि राम और कृष्ण के इस देश में जहां राम और कृष्ण को भी धरती पुत्र माना जाता है, वहां राम को आराध्य मानने वाले एक व्यक्ति को राष्ट्रपिता घोषित कर दिया जाना एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है. आज लोगों को यह पाखंड समझ में आ रहा है. गांधी के सत्य और ब्रह्मचर्य के विवादास्पद प्रयोगों को छोड़ भी दिया जाए, तो भी उनके मन वाणी और कर्म में कहीं सामंजस्य नहीं दिखाई पड़ता.

हाल के वर्षों में बहुत से दस्तावेज ब्रिटिश सरकार द्वारा सार्वजनिक किये गए हैं और भारत सरकार ने भी बहुत सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए हैं, जिनमें गांधी के बारे में बहुत से ऐसे नए तथ्य सामने आए हैं जिनसे लोग हैरान हैं. स्वयं गांधी द्वारा लिखित किताबें मेरी आत्मकथा , सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, उनकी पोती मनु की डायरी और उसके द्वारा द्वारा लिखित किताबें, सिलेक्टेड वर्क्स ओन नेहरू, विभाजन के गुनाहगार ( डॉ राम मनोहर लोहिया), वेक अप इंडिया (एनी बेसेंट), पकिस्तान या भारत का विभाजन ( आंबेडकर) आदि पुस्तकें अगर कोई व्यक्ति पढ़ ले तो गांधी के बारे में उसका मिथक टूट जाएगा.

इसलिए जैसे जैसे लोगों को गांधी की असलियत मालूम होती जा रही है, उनके लिए अभद्र भाषा का प्रयोग बढ़ता जा रहा है, जिसे बिल्कुल भी उचित नहीं कहा जा सकता और मैं इसका समर्थन भी नहीं कर सकता लेकिन ये बढ़ता जायेगा इसे कोइ भी रोक नहीं सकता . गांधी के व्यक्तित्व में बहुत सारी अच्छाइयां भी होंगी और उनके प्रति मेरे मन में भी बहुत सम्मान है लेकिन तथाकथित गांधी वादियों द्वारा जिस तरह का गांधी युद्ध सोशल मीडिया पर लड़ा जा रहा है उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप मुझे डर है कि भारत में कभी वह दिन न आ जाए जब लोग रावण और मेघनाथ की तरह गांधी और नेहरू के पुतले न जलाना शुरू कर दें, तब रावण की तरह ही लोग गांधी नेहरु की सार्वजानिक रूप से प्रशंशा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएंगे.

विश्व के अन्य देशों के लोगों को गांधी के बारे में उतना ही मालूम है जितना बिना पढ़े हम नेलसन मंडेला, मार्टिन लूथर किंग,अब्राहम लिंकन, जुलियस सीजर, रूजवेल्ट आदि को जानते हैं. उनके मन में गांधी के प्रति कोइ दुर्भावना इसलिए भी नहीं होगी क्यों कि गांधी ने उनका कुछ नहीं बिगाड़ा लेकिन हर जागरूक हिन्दू जनता है कि गांधी ने इस देश को विशेषतया हिन्दुओं को जितना नुकशान किया उतना सभी विदेशी आक्रान्ता और अंग्रेज मिलकर भी नहीं कर सके. इससे सबके बाद ये अपेक्षा करना कि लोग उन्हें देवतुल्य मानकर पूजें, ये संभव नहीं हो सकता. किसी भी व्यक्ति से श्रद्धा और सम्मान जबरदस्ती नहीं नहीं वसूला जा सकता.

सोचिये गांधी की इतनी महानता और अनेक सिफारिशों के बाद भी उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार क्यों नहीं मिल सका ? जबकि पिस्टल लगाकर चलने वाले यासिर अराफात को ये पुरस्कार दिया गया. अपनी छवि बनाने के लिए देश और सनातन संस्कृति को दांव पर लगाने वाले नेहरू का नाम भी कम से कम २० बार नोबेल पुरस्कार के लिए भेजा गया, लेकिन नहीं मिल सका. नेहरु ने भारत रत्न खुद अपने आप को दे दिया.

उए उचित समय है जब हमें देश के वास्तविक नायकों को जानने और समझना चाहिए और देश विरोधी सनातन विरोधी व्यक्तियों से हमेशा सतर्क रहना चाहिए. जिन्होंने देश तोड़ा, हिन्दुओं और सनातन संस्कृति के विरुद्ध काम किया, उन्हें दुनिया कुछ भी कहे, वे हमारे नायक नहीं हो सकते.

सन्दर्भ - मेरी आत्मकथा - गांधी , सम्पूर्ण गाँधी वांग्मय, ( भारत सरकार प्रकाशित ), मनु की डायरी, सिलेक्टेड वर्क्स ओन नेहरू, ( भारत सरकार प्रकाशित ), विभाजन के गुनाहगार ( डॉ राम मनोहर लोहिया), वेक अप इंडिया (एनी बेसेंट), पकिस्तान या भारत का विभाजन ( डॉ भीम राव आंबेडकर )


गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

हलाल सर्टिफिकेशन

 

 भारतीय अर्थव्यवस्था का हलाल 




 


कर्नाटक में एक वर्ग विशेष द्वारा शिक्षण संस्थाओं में हिजाब पहनने के मामले को अनावश्यक  तूल दिए जाने की  स्वाभाविक प्रतिक्रिया स्वरूप बहुत सी ऐसी बातें धरातल पर आ गई हैं जिन पर बहुसंख्यक वर्ग कोई खास ध्यान नहीं देता था. इनमें धार्मिक और आर्थिक रूप से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है हलाल प्रमाणीकरण.

ज्यादातर लोगों ने हलाल मांस का नाम सुना होगा. इसके अंतर्गत जानवरों का वध इस्लामिक प्रक्रिया के द्वारा किया जाता है, जिसमें मक्का की दिशा में अल्लाह के नाम पर  इस्लामिक आयत बिस्मिल्लाह के उच्चारण के बाद वध किया जाता है. इस प्रक्रिया से जानवरों को काफी देर तक अत्यधिक पीड़ा से गुजरना पड़ता है. इसलिए कई पश्चिमी देशों में कानूनी रूप से बिना बेहोश किये जानवरों का वध निषेध किया जा चुका है. इसका धार्मिक पक्ष यह है कि इस तरह के मांस को अल्लाह को पहले ही अर्पित कर दिया गया होता है, इसलिए यह अल्लाह का प्रसाद होता है और स्वाभाविक रूप से दूसरे धर्मावलंबी इसे स्वयं खाने और अपने  धार्मिक अनुष्ठानों में इसे प्रयोग  नहीं करते हैं.


भारत में प्राचीन काल से  झटका मांस प्रचलन में है जिसके अंतर्गत जानवर का एक झटके से वध कर दिया जाता है और उसे पीड़ा और  मानसिक यंत्रणा से नहीं गुजरना पड़ता है, यह पश्चिमी देशों में भी स्वीकार्य  है, किंतु इस्लाम मानने वाले इसे हराम मानते  हैं. हलाल मांस के संदर्भ में उनका तर्क होता है कि है यह ज्यादा शुद्ध पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है किंतु इसके विपरीत नवीन खोजों से यह ज्ञात हुआ है कि चूंकि  हलाल प्रक्रिया में जानवर  बेहद पीड़ा और मानसिक यंत्रणा से गुजरते  हैं, उनके मस्तिष्क में नकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है जो जहरीले रसायन के रूप में उनके पूरे शरीर में फैल जाती है, जिस कारण इस तरह का जहरीला मांस मनुष्य में नकारात्मक प्रभाव डालता है और स्वास्थ्य के  प्रतिकूल होता है. धार्मिक रूप से कहा जाता है कि इस तरह मरने वाला जीव असहनीय पीड़ा और वेदना के कारण श्राप या बददुआएं देता है, जिससे इस तरह के मांस खाने वाले को यह बददुआएं या श्राप लगता है. कल्पना करिए कि आपका क़त्ल निश्चित है और हलाल या झटका में से किसी एक से क़त्ल होने का  विकल्प है तो आप क्या चुनेंगे ? आपका उत्तर ही जानवरों का उत्तर है.    

 

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर कुछ मुस्लिम संस्थाओं ने हलाल का सर्टिफिकेट  दे कर शुल्क वसूलना शुरू कर दिया जहाँ  विभिन्न उत्पादों और सेवाओं के लिए सरकारी  मानकीकरण पहले से ही प्रचलन में है.  खाद्य पदार्थों की शुद्धता और गुणवत्ता के लिए सरकार द्वारा  FSSAI प्रमाणन पहले से ही उपलब्ध है, अन्य उत्पादों और सेवाओं के लिए ISI (BIS), ISO होता है ऐसे में हलाल सर्टिफिकेट की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन पिछली सरकारों ने वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के चलते न केवल हलाल सर्टिफिकेशन को अनदेखा किया बल्कि  निर्यात किए जाने वाले मांस को हलाल सर्टिफाइड होना अनिवार्य भी कर दिया था, जिसके कारण मांस के निर्यात पर मुस्लिमों का पूरी तरह से कब्जा हो गया था और  गैर मुस्लिम लोग धीरे-धीरे इस व्यवसाय से बाहर हो गए. इसके दुष्परिणाम स्वरूप जहाँ  हिंदू खटीक जो सदियों से इस व्यवसाय से जुड़े हैं, बेरोजगार होकर  तंगहाली और आर्थिक बदहाली के कारण दूसरा रोजगार करने लगे.इससे स्वाभाविक रूप से अन्य रोजगार क्षेत्रों  भी दबाव पड़ा.

हाल  में केंद्र सरकार ने मांस की  निर्यात प्रक्रिया में थोड़ा  सुधार किया है और ऐसे देश जो हलाल मांस की मांग नहीं करते, उन्हें निर्यात किए जाने वाले मांस में हलाल सर्टिफिकेट की अनिवार्यता खत्म कर दी गई है लेकिन यह नाकाफी है क्योंकि देश में शुल्क लेकर इस तरह का सर्टिफिकेशन करना सरकार के समानांतर अपनी सरकार चला कर टैक्स वसूल करना है. यह रंगदारी वसूल करने जैसा ही गैरकानूनी कार्य है.

 


अगर हम भारतीय और वैश्विक परिवेश में देखें तो तो हलाल केवल एक प्रक्रिया नहीं बल्कि चालाकी से बनाया गया अर्थशास्त्र है जिसे हलाल-इकोनॉमिक्स या हलालोनॉमिक्स कहते हैं. यह सभी जिहादों की जननी और  ऐसा हथियार है जिसका उद्देश्य वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कब्जा करके गैर मुस्लिमों से पैसा वसूल कर पूरी दुनिया में  इस्लाम का वर्चस्व कायम करना है. हलाल का जाल अब केवल मांस तक सीमित नहीं है बल्कि यह दैनिक जीवन में प्रयोग किए जाने वाले सभी उत्पादों और सेवाओं  पर फैल गया है. सौंदर्य प्रसाधन, घर गृहस्थी  के सभी सामान, दवाइयां और अस्पताल भी इसके दायरे में आ गए हैं. मुसलमान जानबूझ कर ऐसी वस्तुओं की मांग करते हैं जो इस्लाम के अनुसार वैध हों यानी हलाल प्रमाणित हों और हलाल सर्टिफिकेट स्वयंभू निजी  मुस्लिम संस्थाएं देंगी अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क भी स्थापित कर लिया है. हलाल सर्टिफिकेट  के नाम पर उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं से बड़ी रकम वसूली जाती है, जिसका उपयोग घोषित रूप से इस्लाम के प्रचार और प्रसार के लिए किया जाता है लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं कि इस पैसे का उपयोग कहां कहां और क्यों किया जाता है.






भारत में हलाल सर्टिफिकेट जारी करने वाली प्रमुख संस्थाएं हैं - जमियत उलेमा-ए-हिन्‍द, हलाल इंडिया प्रा. लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेस इंडिया प्रा. लिमिटेड,  जमियत उलेमा-ए-महाराष्‍ट्र, हलाल काऊन्‍सिल ऑफ इंडिया, ग्‍लोबल इस्‍लामिक शरिया सविर्र्सेस आदि. जमीयत उलेमा ए हिंद  के बंगाल प्रदेशाध्‍यक्ष सिद्दीकुल्ला चौधरी ने संशोधित  नागरिकता कानून के विरोध में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को हवाई अड्डे से बाहर नहीं निकलने देने की धमकी दी थी.यही संगठन उत्तर प्रदेश के हिन्‍दू नेता कमलेश तिवारी के हत्‍या प्रकरण के आरोपियों का अभियोग लड़ रहे हैं । इस संगठन ने ७/११ का मुंबई रेल बम विस्‍फोट, वर्ष २००६ का मालेगांव बम विस्‍फोट, पुणे में जर्मन बेकरी बमविस्‍फोट, २६/११ का मुंबई आक्रमण, मुंबई के जवेरी बजार में बमविस्‍फोटों की शृंखला, दिल्ली जामा मस्‍जिद विस्‍फोट, कर्णावती (अहमदाबाद) बमविस्‍फोट आदि अनेक आतंकी घटनाओं के आरोपी मुसलमानों को कानूनी सहायता उपलब्‍ध कराई है । इसी संस्था ने गोधरा कांड में मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सजा पाने वाले आतंकवादियों का मामला सर्वोच्च न्यायालय ले जाने की घोषणा की है.  यह संस्था ऐसे 1000 से अधिक संदिग्‍ध आतंकियों के अभियोग लड रही  है,  जिसके लिए आवश्यक धन आप  मुहैया करा रहे हैं, हलाल उत्पाद खरीद कर या हलाल सर्टिफिकेट लेकर. यानी आपकी की जूती और आपकी चांद.

 

इस्लामी अर्थव्यवस्था या  हलाल इकोनामी को धार्मिक आधार देते हुए बहुत चतुराई से गैर मुस्लिमों को शिकंजे में कसने और इस्लामी साम्राज्य बनाने का काम बड़ी तेजी से हो रहा है. निकट भविष्य में इस बात की पूरी संभावना है की स्थानीय व्यापारियों, पारंपरिक उद्यमियों, उपभोक्ता वस्तुओं से जुड़े उद्योगों, शैक्षणिक संस्थाओं, अस्पतालों के समक्ष बहुत बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा और इसका सबसे बड़ा दुष्परिणाम गैर मुस्लिमों को बेरोजगार होने के रूप में सामने आएगा. भारत में आज बिना हलाल सर्टिफिकेशन के ही फल, सब्जी, लकड़ी और  फर्नीचर, चमड़ा,  ऑटो रिपेयरिंग सहित बाल काटने व् चूड़ी जैसे कामों पर मुसलमानों का वर्चस्व है. इन व्यवसायों  और उद्योगों से निकले हिंदू बेरोजगार केवल आरक्षण की बैसाखी के सहारे सरकारी नौकरी की आश में जीवन बर्बाद कर रहे हैं और अपनी ही सरकार के विरुद्ध आन्दोलन  करते हैं और हलाल अर्थव्यवस्था का रास्ता साफ़ करते जा रहे हैं.

 

पूरे विश्व में हलाल अर्थव्यवस्था ८ ट्रिलियन यूएस डॉलर पार कर चुकी है. विश्व हलाल कॉन्फ्रेंस में बोस्निया के ग्रैंड मुफ्ती मुस्तफा सरिक ने  कहा था कि “अब उन्हें हथियार उठाकर युद्ध और आतंक फैलाने की जरूरत नहीं है, हलाल अर्थव्यवस्था के माध्यम से ही वे  पूरे विश्व में पर राज कर सकेंगे.”  भारत के मुसलमान अन्य देशों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही मुसलमान होते हैं, इसलिए यहां हलाल सर्टिफिकेट का दायरा हलाल मांस से होता हुआ रोजमर्रा की चीजों तक पहुंच गया है इसलिए यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है की आटा, सत्तू ,नमक, बोतलबंद पानी, नमकीन, मिठाई, आयुर्वेदिक और एलोपैथिक दवाओं, सौंदर्य प्रसाधन- लिपस्टिक पाउडर क्रीम, सूखे मेवे- बदाम, अखरोट, पिस्ता, यहां तक कि शहद आदि इन सब में हलाल सर्टिफिकेट की क्या आवश्यकता है? यह पूरे देश के शरियाकरण / इस्लामीकरण की प्रक्रिया है, इससे भारतको निकट भविष्य में बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है.

 

बिक्री बढ़ाने के लिए कई उत्पादक अनावश्यक रूप से हलाल सर्टिफिकेट ले रहे हैं इनमें हल्दीराम, बिकानों, आयुर्वेदिक दवाई बनाने वाली हिमालय, ब्रिटानिया, नेस्ले, मदर डेयरी आदि अनेक कंपनियां शामिल है. बेहद आश्चर्यजनक और दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में राष्ट्रवाद की बात करने वाले स्वामी रामदेव भी  अपने शाकाहारी औषधीय उत्पादों का हलाल सर्टिफिकेशन करवाने के लिए मुस्लिम संगठनों को भारी भरकम फीस देते हैं। मैकडॉनल्ड का पिज़्ज़ा और डोमिनोस का बर्गर भी हलाल प्रमाणित है. ज्यादातर एयरलाइंस में मिलने वाला खाना भी हलाल प्रमाणित है. आईआरसीटीसी, संसद भवन और सरकारी प्रतिष्ठानों  की कैंटीन  से लेकर बड़ी संख्या में होटलों ने भी हलाल सर्टिफिकेट ले रखा है. भारत के कई नामी-गिरामी अस्पतालों ने भी हलाल सर्टिफिकेट ले रखा है. हाल ही में केरल के कोच्चि शहर में  हलाल सर्टिफाइड फ्लैट्स  बनाए गए हैं,

 

बड़ी विचित्र स्थिति यह है कि कई प्रोडक्ट के ऊपर तो हलाल प्रमाणित का लोगों बना रहता है लेकिन कई पर नहीं लिखा रहता है. इसी तरह अस्पतालों में भी ज्यादातर अस्पतालों में नहीं लिखा रहता है कि वह हलाल सर्टिफाइड है इसलिए इन उत्पादों और सेवाओं का उपभोग करने वाले गई मुस्लिमो को मालूम भी नहीं पड पाता है कि वह हलाल हो रहे हैं.


सरकार कुछ करे न करे लेकिन आप हलाल उत्पादों का बहिष्कार कर, और इस सम्बन्ध में जागरूकता फैला कर  देश और सनातन संस्कृति को काफी हद तक बचा सकते हैं, और यह काम आप आज से ही शुरू करें क्योंकि कल बहुत देर हो जायेगी.  

-                                                                                                                               - शिव मिश्रा  

सोमवार, 4 अप्रैल 2022

पृथ्वी पर अल्पसंख्यकों का स्वर्ग है भारत !

 

पृथ्वी पर अल्पसंख्यकों का स्वर्ग है भारत !


                                     

भारत सनातन संस्कृति का देश है, हिंदुओं का देश है, राम और कृष्ण का देश है, अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं. विशुद्ध रूप से भारत अल्पसंख्यकों का देश है, और वह भी   केवल मुस्लिम अल्पसंख्यकों का, जिसे बापू और चाचा ने मिलकर बड़े योजनाबद्ध तरीके से उनके लिए बनाया है. यह अलग बात है कि  इसमें बहुसंख्यक हिंदू भी रहते हैं लेकिन उनकी स्थिति  द्वितीय श्रेणी के नागरिक से ज्यादा कुछ भी नहीं है. आजादी के बाद लागू हुए नये संविधान के अंतर्गत हिंदुओं की स्थिति लगातार दयनीय होती जा रही है. इस समय   9 राज्यों  में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं. नागालैंड मे 8%, मिज़ोरम में 2.7%, मेघालय में 11.5%, अरुणाचल प्रदेश में 29%, मणिपुर में 41.4%, पंजाब में 39%, केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में 32%, लक्षद्वीप में २%, लदाख 2%  हिंदू ही बचे हैं। कुछ राज्यों में हिंदुओं की आबादी विलुप्त होने के कगार पर है.

 

भारत में अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ मुस्लिमान है इसलिए यदि किसी राज्य में अन्य संप्रदाय अल्पसंख्यक हैं तो भी मुसलमान ही अल्पसंख्यक माने जाते हैं और उन्हें ही  सारी सुविधाएं प्राप्त होती हैं. उदाहरण के लिए केंद्र शासित प्रदेश लक्ष्यदीप में मुसलमानों की जनसंख्या 97% से अधिक है और हिंदू केवल 2% हैं लेकिन वहां भी अल्पसंख्यकों की सुविधाएं बहुसंख्यक मुसलमानों को ही दी जाती हैं.  इस सब के बावजूद भारत की धर्मनिरपेक्षता और संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कितनी  है वह इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले दो दशक से मुसलमानों के विरोध के कारण लक्षद्वीप में गांधी की प्रतिमा स्थापित नहीं की जा सकी है क्योंकि  उनका कहना है कि इस्लाम में मूर्तियां वर्जित हैं.

 

हाल ही में  एक प्रखर राष्ट्रवादी एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में  एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें उन राज्यों में जहां हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं उन्हें अल्पसंख्यकों के अधिकार और सुविधाएं देने की मांग की गई है. सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है और केंद्र सरकार से जवाब दाखिल करने के लिए कहा है. संभवत: ग्रीष्मावकाश के बाद उस पर सुनवाई हो सकती है. अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका से एक बार फिर अल्पसंख्यक घोटाला सुर्खियों में आ गया है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण विचारणीय प्रश्न यह है इन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हुए क्यों और कैसे? इसका एकमात्र कारण है कि विश्व में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जहां इन सुविधा भोगी अल्पसंख्यकों द्वारा बहुसंख्यक हिंदुओं का लगातार  धर्मांतरण किया जा रहा  है. यह प्रक्रिया दशकों से बिना रोक टोक चल रही है. अपने-अपने स्वार्थ के कारण राजनैतिक दल आंखें बंद किये हैं.

 

हिंदूओं का दुर्भाग्य देखिए कि उन्हें अपने ही देश में अल्पसंख्यक होकर विलुप्त होने का खतरा गहराता जा रहा है और वे अपने लिए अल्पसंख्यकों के अधिकार दिए जाने की गुहार लगा रहे हैं किन्तु सरकार मुकर रही है, इसलिए मजबूरी में उन्हें अदालत की शरण लेनी पड़ी है. विडंबना देखिए कि जिस राष्ट्रवादी मोदी सरकार के पीछे हिंदू एकजुट होकर खड़े हैं उसने अदालत में स्वीकार किया है  कि जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं वहां  राज्य सरकारें चाहें तो हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दे सकती  हैं लेकिन फिर मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर, लद्दाख और  लक्षद्वीप जैसे  केंद्र शासित और भाजपा शासित प्रदेशों  में ऐसा क्यों नहीं किया.

 

आजादी के बाद जो संविधान लागू किया गया है, वह इस देश की सनातन संस्कृति और प्राचीन विरासत अक्षुण्ण रखने में कतई सक्षम नहीं था और न है. इसमें अनेक ऐसे प्रावधान हैं जिनके दुष्प्रभाव के कारण सनातन संस्कृति का धीरे धीरे ह्रास होता जा रहा है और अगर रोकथाम के कारगर उपाय नहीं किए गए तो सनातन संस्कृति एक दिन भारत में ही विलुप्त हो जाएगी.

 

देश का विभाजन धार्मिक आधार पर किया गया था - मुस्लिमों के लिए पाकिस्तान और हिंदुओं के लिए हिंदुस्तान. पाकिस्तान तो  मुस्लिमों के पूर्ण स्वामित्व का देश बन गया लेकिन हिंदुस्तान, हिंदुओं का देश न बनकर हिंदू और मुस्लिमों की साझे  की खेती बन गया. ऐसा जानबूझकर किया गया. विभाजन के बाद भारतीय क्षेत्र में रहने वाले ज्यादातर मुस्लिम पाकिस्तान गये ही नहीं. अधिकांश मुस्लिम नेता भी नहीं गए जिन्होंने पाकिस्तान बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जो डायरेक्ट एक्शन सहित कई दंगों में भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े थे. इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि ऐसे कई बड़े मुस्लिम नेता संविधान सभा के सदस्य भी बनाए गए. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की स्पष्ट मांग के बाद भी जवाहरलाल नेहरू हिंदू और मुस्लिम जनसंख्या की अदला बदली के लिए राजी नहीं हुए, यद्यपि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली इसके पक्ष में थे. अंबेडकर ने तो यहां तक कहा था कि दुनिया भर में मुस्लिमों के व्यवहार को देखते हुए अगर एक भी  मुस्लिम विभाजन के बाद भारत में रहता है तो, भारत कभी सुखी नहीं रह सकता. नेहरू ने साफ मना करते हुए कहा कि अदला-बदली में  हम लोगों का जीवन निकल जाएगा, और यह काम पूरा नहीं हो पाएगा. उन्होंने कहा कि मुस्लिमों के  भारत से चले जाने से देश आर्थिक रूप से कमजोर हो जाएगा, तथा देश में भुखमरी फैल जाएगी. कितनी   हास्यास्पद बात हैं क्योंकि गांधी और नेहरू दोनों ही नहीं चाहते थे कि भारतीय क्षेत्र से मुस्लिम पाकिस्तान जायें बल्कि दोनों की प्रयास कर रहे थे कि जो थोड़े से लोग पाकिस्तान चले भी गए हैं उन्हें भी वापस लाया जाए. प्रश्न है कि जब ऐसा ही करना था तो कि भारत का विभाजन क्यों हुआ जिसके लिए मुख्यतय: गांधी और नेहरू जिम्मेदार थे.

 

सरदार पटेल की निजी सचिव ने अपनी किताब में लिखा हैकि आजादी के बाद नेहरू का पूरा ध्यान मुस्लिमों की सुरक्षा में  लगा रहता था और नेहरु जी मुस्लिमों के साथ होने वाली छोटी-मोटी घटनाओं पर बहुत परेशान हो जाते थे इसके विपरीत पाकिस्तान से आने वाले हिंदू शरणार्थियों की कठिनाइयों पर वह बिल्कुल चिंतित नहीं होते थे. नेहरू भारत में मुसलमानों के कल्याण और बराबरी के अधिकार के लिए हमेशा चिंतित रहते थे और प्रधानमंत्री रहते हुए वे जो कर सकते थे वह हिंदुओं की कीमत पर भी किया.  इस तरह के व्यवहार के कारण ही  उनके हिंदू होने पर आज भी सवालिया निशान हैं, कारण चाहे जो भी हो लेकिन इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि  नेहरू ने कांग्रेस में अपनी कमजोर स्थिति को मजबूत करने के लिए मुस्लिमों को अपना वोट बैंक बनाने के उद्देश्य से तुष्टिकरण की शुरुआत की.

 

नेहरू ने आधा कश्मीर भारत से निकल जाने के बाद भी बचे कश्मीर के लिए धारा 370 और धारा 35 ए संविधान में जुड़वाने का कार्य किया, वही अपने पूरे शासनकाल में मुस्लिम शिक्षा मंत्री बनाने और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं को अंधाधुंध अनुदान देने, और हिंदू मंदिरों का अधिग्रहण करने का महापाप भी किया. 

बाबर की समाधि पर श्रद्धांजलि देने अफगानिस्तान जाने वाली इंदिरा गांधी ने भी संविधान में   धर्मनिरपेक्ष शब्द जोड़ कर  हिंदूओं  के साथ  धोखाधड़ी की, जिसे डॉ आंबेडकर के विरोध के कारण नेहरु नहीं जोड सके थे. मुस्लिम तुष्टिकरण को और मजबूत करते हुए राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में न्यायालय के फैसले को ही कानून बनाकर पलट दिया. पीवी नरसिम्हा राव  ने उपासना स्‍थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 द्वारा पूजा स्थलों की  15 अगस्त 1947 के पहले की यथास्थिति बनाए रखने का कानून बना दिया और  राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन भी किया. मनमोहन सिंह ने २००५ में मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक स्थिति के आकलन के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया, यद्यपि बहुमत के अभाव में सिफारिशें लागू नहीं हो सकी किंतु इसके बाद तुष्टीकरण की पराकाष्ठा पार करते हुए सरकार ने हिंदुओं को गुलाम बनाने के लिए सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक 2011 पेश किया. इस बिल को सोनिया गांधी की अगुवाई वाली एक समिति ने तैयार किया था जिसमें सैयद शहाबुद्दीन और तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोग भी शामिल थे. इस विधेयक के अनुसार यदि हिन्दू,  अल्पसंख्यक वर्ग के विरुद्ध घृणा फैलाने का कार्य करते हैं तो उनके विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाएगी लेकिन इसके उलट यदि अल्पसंख्यक, हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा फैलाने का कार्य करते हैं तो उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही का प्रावधान नहीं. सांप्रदायिक हिंसा होने की स्थिति में बहुसंख्यकों को इसका उत्तरदायी माना जाएगा. सांप्रदायिक हिंसा में यदि कोई अल्पसंख्यक वर्ग का व्यक्ति बहुसंख्यक वर्ग की महिला के साथ बलात्कार करता है तो यह अपराध नहीं माना जाएगा.  सोचिये हिन्दुओं के प्रति इससे ज्यादा विद्वेष पूर्ण कार्य और क्या हो सकता है? 

 

हिंदुओं के अपार समर्थन से 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार सत्ता में आई तो हिंदुओं की अपेक्षाएं  भी सातवें आसमान में पहुँच गयी. मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने और राम मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त करके अच्छी शुरूआत की. परिणाम स्वरूप हिन्दू और अधिक मजबूती से  से मोदी के पीछे खड़े हो गए. इससे  देश में विमर्श की दिशा तो बदल रही है लेकिन बदलाव के लिए  कोई ठोस कदम उठाए जा रहे हो ऐसा नजर नहीं आता. सरकार को चाहिए कि हिंदुओं की लंबे समय से चली आ रही मांगों का तुरंत समाधान निकालें, जिनमें प्रमुख  हैं, - हिंदू मंदिरों की मुक्ति, अल्पसंख्यक को भारतीय परिवेश में  परिभाषित किया जाए . विश्व के किसी भी देश में दूसरी सबसे बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त नहीं है इसलिए सरकार को आर्थिक सहायता और सुविधाएं देने का आधार सिर्फ आर्थिक ही रखना चाहिए. दुनिया में मुसलमानों की आबादी 200 करोड़ से भी अधिक है और 57 देश इस्लामिक देश हैं ऐसे में मुसलमान किसी भी अंतरराष्ट्रीय अवधारणा से अल्पसंख्यक नहीं हो सकते. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग को बदल कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बनाया जाए और समान नागरिक संहिता तुरंत लागू की जाए.

-    शिव मिश्रा

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