शुक्रवार, 29 जुलाई 2022

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रंजन विहीन अधीर कांग्रेस - स्वत: समाप्ति की ओर

 


संवेदनाहीन कांग्रेस का बौद्धिक क्षरण

लंबे समय से कांग्रेस परिवारवाद की गंभीर बीमारी का शिकार तो है लेकिन अनुशासनहीनता, पलायन, जड़ता के बाद अब मूढ़ता ने भी कांग्रेस को घेर रखा है. 1885 में एक अंग्रेज ए ओ ह्यूम  द्वारा कांग्रेस का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि इससे भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए वार्ता करने हेतु एक माध्यम उपलब्ध कराए जा सकेगा और स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा अंग्रेजी शासन के विरोध की धार को भी कुंद किया जा सके और आंदोलनों के फलस्वरूप सार्वजनिक संपत्तियों को होने वाले नुकसान को रोका जा सकेगा. शुरुआती दौर में कांग्रेस अंग्रेजों के हाथ का खिलौना थी लेकिन जैसे जैसे इसमें राष्ट्रवादी नेताओं का जुड़ाव होता गया स्वतंत्रता आंदोलन की धार दिन प्रति दिन और तेज होती गई.

अंग्रेजों ने बहुत चतुराई से दक्षिण अफ्रीका से गांधीजी को स्पीड ब्रेकर के रूप में भारत बुला लिया. भारत आकर उन्होंने अंग्रेजी सरकार और आंदोलनों के बीच समन्वय बनाना शुरू कर दिया और धीरे धीरे वह कांग्रेस के निर्विवाद नेता बन गए. कांग्रेस पर एक तरह से उनका पूरा पूरा आधिपत्य हो गया. उन्होंने कांग्रेस को जैसा चाहा वैसा चलाया और हमेशा अंग्रेजी सरकार से टकराव का रास्ता टालने का काम किया जो अंग्रेजी सरकार का उद्देश्य था. इसीलिए कांग्रेस बनने के बाद भी 60 वर्ष तक अंग्रेजी शासन बड़े आराम से भारत में बना रहा लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब अंग्रेजों को सुभाष चंद बोस, तथा अन्य क्रांतिकारियों के दबाव तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदलती परिस्थितियों और ब्रिटेन के लिए भारत की सत्ता गैर लाभकारी हो जाने के कारण भारत छोड़ना पड़ा तो गांधीजी ने कांग्रेस को समाप्त कर देने का प्रस्ताव दिया था. इसका कुछ भी अर्थ लगाया जा सकता है एक तो  अंग्रेजों का भारत से शासन खत्म हो गया था, इसलिए कांग्रेस का बने रहना अंग्रेजों की आवश्यकता नहीं थी और दूसरा चूंकि  भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो चुकी थी इसलिए भी कांग्रेस के गठन का उद्देश्य पूरा हो गया था, इसलिए भी कांग्रेस का समाप्त हो जाना  उचित था.

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद  भी नेहरू ने कांग्रेस को खत्म नहीं होने दिया और  गांधी के निधन के बाद कांग्रेस पूरी तरह से उनके कब्जे में आ गई थी. तब से लेकर आज तक कांग्रेस पर नेहरू परिवार का वर्चस्व कायम है. नेहरू की नीतियों के कारण कई बड़े नेता कांग्रेस छोड़ने लगे थे और ये सिलसिला इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में और बढ़ गया. यह कहना भी अनुचित नहीं होगा कि इंदिरा गाँधी स्वयं कांग्रेस के  विभाजन का कारण बनी और उन्होंने विभाजित कांग्रेस के एक धड़े पर अपना साम्राज्य खड़ा किया. जिसके बाद उनके कब्जे वाली कांग्रेस पूरी तरह से परिवारवादी पार्टी बन गई.

1975 में आपातकाल लगाने और उसकी ज्यादतियों के विरोध में जनता का गुस्सा चरम पर था और इसे भांपते हुए कई बड़े कांग्रेसी नेताओं ने पार्टी छोड़ दी थी. ये सिलसिला राजीव गाँधी के शासनकाल में भी चलता रहा जब विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में कई बड़े नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी थी. कांग्रेस ने 1991 में पीवी नरसिंहा राव और 2004 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनाई लेकिन दोनों ही बार सरकार जाने के बाद कई नेताओं ने पार्टी छोड़ी. 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से कांग्रेस से पलायन का सिलसिला और तेज हो गया जो अब तक जारी है. ऐसा लगता है कि अब कांग्रेस में वही नेता बचे हैं जिनका कोई विशेष जनाधार नहीं है और जिन्हें गाँधी परिवार से अलग होकर अपना कोई भविष्य दिखाई नहीं देता. वैसे तो कांग्रेस में कभी भी गाँधी परिवार के कट्टर समर्थकों की कमी नहीं रही लेकिन इंदिरागांधी के उदय के बाद से लेकर अब तक गाँधी परिवार के अति विश्वासपात्र ही सत्ता संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं.

कांग्रेस में होते रहे इस तरह के पलायन से न केवल प्रखर और तेजस्वी नेता कांग्रेस से निकलते चले गए बल्कि समाज के बौद्धिक वर्ग का जुड़ाव भी कांग्रेस से धीरे धीरे कम होता चला गया. गाँधी परिवार के नेताओं में भी क्रमिक रूप से बुद्धि, विवेक और राजनीतिक सूझबूझ की कमी होती चली गयी. सोनिया गाँधी का विदेशी मूल का होना उनके विरुद्ध जाता है और लगभग 54 साल पहले किसी भारतीय से विवाह करने के बाद भी आज तक ठीक से हिंदी न बोल पाना भी उनके जनता से जुड़ाव न हो पाने का एक प्रमुख कारण हैं. उनके बाद कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गाँधी भी अब तक भारत की राजनीति में कोई छाप नहीं छोड़ सके हैं. अक्सर अपनी अविवेकपूर्ण टिप्पणियों से अपनी  और कांग्रेस की जगहंसाई कराते हैं. वह अपने  गैर जिम्मेदार वक्तव्यों से अक्सर जनता के कोपभाजन का शिकार भी बनते हैं. 50 वर्ष की उम्र पार करने के बाद भी उनमें राजनैतिक परिपक्वता, सूझबूझ और  सुलझे हुए नेता के लक्षण दूर दूर तक नजर नहीं आते.

राहुल के बाद ट्रम्प कार्ड के तौर पर प्रियंका वॉड्रा पर दांव लगाना भी कांग्रेस के लिए फायदे का सौदा नहीं हुआ क्योंकि उनकी राजनीति में आने से पहले ही उनके पति रॉबर्ट वाड्रा अपनी कारगुजारियों से देश में कुख्यात हो चुके थे जिसका भूत कभी प्रियंका वाड्रा का साथ नहीं छोड़ता. उत्तर प्रदेश में २०१७ और २०२२ में हुए विधान सभा चुनाव और २०१९ के  लोकसभा चुनाव की कमान संभालने के बाद भी वह प्रदेश में पार्टी का जनाधार भी नहीं बचा सकी. उत्तर प्रदेश से पार्टी का केवल एक लोकसभा सांसद हैं और वे स्वयं सोनिया गाँधी है, विधानसभा में पार्टी के केवल दो विधायक हैं और विधान परिषद से पार्टी का सफाया हो चुका है. पार्टी की आशा के विपरीत उन्होंने प्रदेश में जो कुछ भी किया वह काम कम कारनामे ज्यादा है. कांग्रेस ने तुष्टिकरण की पराकाष्ठा पार करने के बाद हिंदुत्व का चोला ओढ़ने की कोशिश जरूर की और राहुल और प्रियंका खूब मंदिर परिक्रमा करते रहे और अपना गोत्र बताते रहे लेकिन स्थिति हास्यास्पद होती गयी.

चापलूसो,चाटुकारों और पारिवारिक निष्ठावान नेताओं पर भरोसा करने वाले गाँधी परिवार ने पार्टी के बुद्धिमान और तेजस्वी नेताओं की हमेशा से ही उपेक्षा की और देश की राजनीति के बदलते समीकरणों में ऐसे सभी नेता एक एक करके पार्टी छोड़ते चले जा रहे हैं. शायद अब केवल ऐसे ही लोग बचे हैं जिन्हें अभी कहीं और ठिकाना नजर नहीं आता. कांग्रेस को अभी भी इस सबसे कोई चिंता नहीं है और अभी भी  अत्यंत महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे नेताओं को ही बैठाया जा रहा है जो केवल परिवार के प्रति निष्ठावान है.

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी भी इसी श्रेणी के नेता है जो कांग्रेस की प्रतिष्ठा केवल सदन में ही  नहीं बल्कि समूचे देश में  जनता की नजरों में गिराने का काम बड़ी मेहनत, सिद्दत  और निष्ठा से करते चले आ रहे हैं. उन्होंने धारा 370 हटाने का विरोध करते हुए कहा था कि जब मामला संयुक्त राष्ट्र में विचाराधीन है तो इसे कैसे हटाया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा था कि पाकिस्तान को विश्वास में लिए बिना यह काम करना देश हित में नहीं है. उन्होंने लद्दाख और जम्मू कश्मीर को केंद्रशासित प्रदेश बनाने का भी विरोध किया था. नया मामला यह है कि अधीर रंजन चौधरी ने नवनिर्वाचित राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपत्नी कहकर संबोधित किया. उन्होंने पहले राष्ट्रपति शब्द स्तेमाल किया थी बाद में जानबूझ कर राष्ट्रपत्नी कहा जैसे कि पहले जो कहा था वह गलत था, "राष्ट्रपति नहीं राष्ट्रपत्नी...  हिन्दुस्तान की राष्ट्रपत्नी जी सभी के लिए है उनके लिए क्यों नहीं है. इस पर लोकसभा में काफ़ी हो हल्ला हुआ, और सोनिया गाँधी और स्मृति इरानी में काफी नोकझोंक भी हुई. यद्यपि अधीर रंजन चौधरी ने यह तो कहा कि उनसे चूक हो गयी लेकिन उन्होंने साफ शब्दों में माफी नहीं मांगी. यही नहीं कांग्रेस के नेता उदयराज और रेणुका चौधरी ने भी कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है. इससे पहले कांग्रेस के नेता अजय कुमार ने भी द्रोपदी मुर्मू के बारे में विवादास्पद बयान दे चुके हैं. 

अधीर रंजन का पिछला रिकॉर्ड बहुत ख़राब है, उनकी जबान नहीं फिसलती बल्कि  उनके पास फिसला हुआ दिमाग है. पहले भी इंदिरा और मोदी तुलना करते  हुए उन्होंने कहा था कि कहाँ मां गंगा ( इंदिरा जी ) और कहाँ गंदी नाली (मोदी). ये सभी बयान  गांधी परिवार के सदस्यों से मिलते जुलते हैं, जैसे जहर की खेती, मौत का सौदागर, नाली का कीड़ा आदि . हो सकता है  इसीलिये उन्हें  लोकसभा में कांग्रेस का नेता पद दिया गया हो.         

आजादी के 75 साल तक कांग्रेस ने जिस आदिवासी समाज की सुधि नहीं ली, उस समाज की प्रथम राष्ट्रपति और देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति का चुनाव में विरोध करके कांग्रेस पहले ही पूरे देश को गलत संदेश दे चुकी है, रही सही कसर अधीर रंजन ने पूरी कर दी. पता नहीं कभी ऐसा समय आएगा भी या नहीं जब कांग्रेस का ब्रेन ड्रेन रुकेगा और पार्टी परिवारवाद की छाया से निकलकर वह अपने राजनैतिक उत्तरदायित्व का निर्वहन कर पाएगी या गांधी की इच्छानुरूप स्वत: समाप्त हो जायेगी.

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                 - शिव मिश्रा  

            responsetospm@gmail.com

 

 

 

 

शुक्रवार, 22 जुलाई 2022

योगी के विरुद्ध षड्यंत्र






योगी की तपस्या और उ.प्र. की समस्या

उत्तर प्रदेश में पिछले 5 साल से अधिक समय से मुख्यमंत्री रहते हुए योगी आदित्यनाथ ने कानून व्यवस्था सहित प्रदेश की शासन व्यवस्था में कई उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किए जिसमें सबसे प्रमुख है - सांप्रदायिक दंगों से मुक्ति, माफियाओं पर कठोर शिकंजा और भ्रष्टाचार रहित सरकार. इसके लिए योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री के रूप में कड़ी तपस्या की है, और जिसके परिणाम स्वरूप जनता में उनकी छवि बेहद कुशल और निष्पक्ष प्रशासक  की बनी और  सत्ता में उनकी पुनः वापसी हुई. आज पूरे देश में बुल्डोजर बाबा के नाम से विख्यात योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री मोदी के बाद दूसरे सबसे बड़े लोकप्रिय नेता बन गए हैं. लोग उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं. सोशल मीडिया को अगर जन सामान्य की इच्छा और अभिव्यक्ति की बानगी देखा जाए तो पूरे देश में ज्यादातर लोग उन्हें मोदी के बाद प्रधानमंत्री पद का सबसे उपयुक्त उम्मीदवार मानते हैं. ऐसे में ठीक है कि उत्तर प्रदेश के  मुख्यमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल पूरे भारत में जनता की कसौटी पर हमेशा कसा जाता है और इससे योगी की जिम्मेदारी ही नहीं, पूरे भारत की जनता के प्रति जवाबदेही और भी बढ़ जाती है. उनकी निष्पक्षता, कर्मठता, ईमानदारी और सन्यासी के रूप में सनातन संस्कृति प्रति समर्पण पर किसी को कोई भी संदेह नहीं है किन्तु  राज्य सरकार के स्तर पर हुई एक भी राजनीतिक और प्रशासनिक चूक से जनता आहत होती है जो योगी की छवि पर भी प्रतिकूल असर डालती है.  

हाल  में उत्तर प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियों के कारण उपजी परिस्थितियों ने इस बात को रेखांकित किया है कि वह प्रदेश की नौकरशाही के मकड़जाल और भ्रष्टाचार के षड्यन्त्र से मुख्यमंत्री के पद को पूरी तरह से अलग करने में सफल नहीं हो पा रहे है. ठीक इसी समय एक राज्य मंत्री के इस्तीफ़े ने घटनाक्रम को बेहद जटिल और अपयशकारी बना दिया है. स्थानांतरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे सभी अधिकारी और कर्मचारी संतुष्ट नहीं हो सकते लेकिन मृतक कर्मचारियों का स्थानांतरण, एक ही कर्मचारी का एक से अधिक जगह स्थानांतरण, और नीति के विरुद्ध स्थानांतरण निश्चित रूप से संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की अक्षमता और घोर लापरवाही का ज्वलंत उदाहरण है. यह इस बात का भी प्रमाण है कि विभाग और उनके नियंत्रक  प्राधिकारी आज भी गंभीर विषयों पर उदासीनता का रवैया अपना रहे हैं.

बड़ी बड़ी कंपनियों और प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों के  स्थानांतरण आदेश जारी किए जाने से पहले एक लंबी प्रक्रिया का पालन किया जाता है जिसके अंतर्गत अनुकंपा, प्रशासनिक और तकनीकी आधार पर किए जाने वाले स्थानांतरणों की अलग अलग सूची बनाई जाती है जिसका कई स्तर पर सत्यापन और प्रमाणन किया जाता है ताकि गलती की कोई संभावना न रहे. प्रशासनिक और तकनीकी आधार पर किए जाने वाले स्थानांतरण पर गहन मंथन किया जाता है और कर्मचारियों अधिकारियों की उपयोगिता को हमेशा ध्यान में रखा जाता है. सुविधा के अनुसार छोटे छोटे समूहों में दो तीन बार में  स्थानांतरण किए जाते हैं, ताकि स्थानांतरण प्रक्रिया से सामान्य कामकाज प्रभावित न हो और मेले जैसा माहौल भी न बने. स्थानांतरण करने का उद्देश्य उत्पादकता बढ़ाना और लंबे समय तक एक ही जगह रुके रहने के कारण निजी स्वार्थ विकसित न होने देना होता है. केवल औपचारिकता निभाने के लिए स्थानांतरण करना बिल्कुल भी उचित नहीं है क्योंकि स्थानांतरण से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है.

सूचना प्रौद्योगिकी के इस युग में क्या कोई इस बात पर भरोसा कर सकता है कि उत्तर प्रदेश सरकार के पास उसके कर्मचारियों का सही डेटा भी उपलब्ध नहीं है अन्यथा कम से कम मृतक कर्मचारियों के स्थानांतरण जैसी शर्मनाक घटना नहीं होती. पहले भी प्रदेश में मृतक कर्मचारियों की चुनाव ड्यूटी लगती रही है और ये  हास्यास्पद कारनामे आज भी पहले की तरह ही हो रहे हैं. कर्मचारियों का डिजिटल रिकॉर्ड न होने के कारण न जाने कितने फर्जी शिक्षक, कर्मचारी और अधिकारी उत्तर प्रदेश सरकार के कार्यालयों में विधिवत कार्य कर रहे हैं, जो व्यवस्था पर बदनुमा दाग है. ऐसा नहीं हो सकता है कि इस स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियां केवल मानवीय भूल, अक्षमता और प्रशासनिक चूक है, बल्कि इसमें भ्रष्टाचार का भी बहुत बड़ा खेल हो सकता  है.  साथ ही साथ मुख्यमंत्री की बेदाग छवि को नुकसान पहुंचाना और विभिन्न मंत्रियों के बीच खाई पैदा करना भी एक उद्देश्य हो सकता है. स्वाभाविक है कि इस सबके पीछे केवल छोटे अधिकारी ही नहीं बल्कि प्रदेश की जिम्मेदार बड़े अधिकारी भी शामिल हो सकते हैं. प्रदेश में पहले भी स्थानांतरण के सालाना जलसे को आंधी के आम की तरह लूटने और अपनी जेब भरने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. हो सकता है आपकी बार ऐसा न हुआ हो लेकिन फिर इतनी गड़बड़ियां क्यों?  

अबकी बार हुए स्थानांतरण में सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि संबंधित मंत्री भी इसका विरोध कर रहे हैं स्वाभाविक है कि इन मंत्रियों की भी स्वीकृति नहीं ली गई होगी जो मान्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के सर्वथा विपरीत है क्योंकि अगर कोई मंत्री अपने विभाग के लिए उत्तरदायी हैं तो वह अपने विभाग के कर्मचारियों की ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए उत्तरदायी क्यों नहीं है. इसका मतलब यह बिलकुल भी नहीं है कि हर ट्रांसफर मंत्री स्तर पर ही स्वीकृत किया जाएगा किंतु कर्मचारियों की कैटेगरी के अनुसार विभिन्न अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है जो  विभागाध्यक्ष / संबंधित मंत्री के लिए जवाबदेह हों. कोई भी विभागाध्यक्ष उस विभाग के मंत्री से बड़ा तो नहीं हो सकता और जब मंत्री स्वयं इस स्थानांतरण की आलोचना कर रहे हो तो  स्थिति बहुत ही विचित्र और गंभीर हो जाती है. आखिर वे कौन अधिकारी हैं जिन्होंने संबंधित विभागों के स्थानांतरण को स्वीकृति प्रदान की और मंत्रियों को भरोसे में नहीं लिया? क्यों न  स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियों के लिए उनके विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए जो उदहारण बन सके? ऐसी कार्रवाई करते समय यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कहीं ये जिम्मेदारी भी ऐसे अधिकारियों को न दे दी जाए जो स्वयं भी इस तरह की गड़बड़ी में शामिल रहे हो और कार्रवाई के नाम पर एक बार फिर सरकार की छवि को चोट पहुँचाए. योगी जी को यह ध्यान रखना चाहिए कि पहले भी कई सरकारों में तबादला उद्योग सुनाई पड़ता था, जिसमें सरकार के मंत्री भी शामिल रहते थे. वर्तमान स्थानांतरण में की गई गड़बड़ियां कहीं उसी उद्योग को पुन: स्थापित करने का प्रयास तो नहीं है.

एक राज्य मंत्री के इस्तीफ़े ने न केवल स्थानांतरण में हुई गड़बड़ियों बल्कि सरकार के उच्चाधिकारियों द्वारा मंत्रियों की बात की अनदेखी करने के मुददे को सुर्खियों में ला दिया है. संबंधित मंत्री द्वारा अपने त्यागपत्र को केंद्रीय गृह मंत्री को भेजने और उसे मीडिया में सार्वजनिक करने के राजनीतिक निहितार्थ हो सकते हैं, फिर भी प्रदेश के उच्च अधिकारियों पर लगाए गए उनके आरोप इसी बात की पुष्टि करते हैं कि प्रदेश के अधिकारी किसी की भी नहीं सुनते, न जनता और न मंत्री, तो ये अधिकारी किसके प्रति जिम्मेदार हैं. इसके निवारण के लिए ही मुख्यमंत्री ने कई मंत्री समूह बनाकर विभिन्न क्षेत्रों में भेजे थे जिन्होंने आकर अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंपी थी, उस पर क्या कार्रवाई हुई यह तो नहीं मालूम लेकिन स्थितियों में  बहुत सुधार हुआ हो ऐसा नहीं लगता. इस विषय पर अत्यधिक गंभीरता पूर्वक कार्रवाई करने और शीर्ष स्तर पर अधिकारियों के स्वार्थपूर्ण गठजोड़ को तोड़ने की अत्यंत आवश्यकता है, अन्यथा सरकार की प्रतिष्ठा पर और अधिक चोट होगी. सत्ता के गलियारों के परे यह विषय अक्सर चर्चा में रहता है कि प्रदेश के कई अधिकारी मुख्यमंत्री योगी की भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति से खुश नहीं हैं, और इस कारण कई बार उनके द्वारा जानबूझकर मुख्यमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जाता है. इसका संज्ञान किसी और को नहीं, स्वयं मुख्यमंत्री को लेना होगा और उन्हें ये सूत्र हमेशा याद रखना चाहिए कि शीर्ष पर बैठा हुआ व्यक्ति हमेशा अकेला होता है, और इसलिए कई बार ऐसे मौके आते है जब उसे स्वयं से संवाद करना होता है और तदनुसार स्वयं ही निर्णय करना पड़ता है.

विधानसभा चुनाव से कुछ पहले से कई अधिकारियों ने बदलाव की आहट भांपकर अपनी स्वामिभक्ति और निष्ठा का भी स्थानांतरण करना शुरू कर दिया था जो भ्रष्टाचार और स्वार्थ में लिप्त अधिकारियों की बहुत स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है. ऐसे अधिकारी ही भ्रष्ट और आपराधिक कृत्यों में लिप्त अपने साथियों और शुभचिंतकों  को बचाने का प्रयास करते रहते हैं, सरकार किसी भी दल की हो, ये तंत्र हमेशा इसी तरह काम करता रहता है अन्यथा ऐसा नहीं हो सकता था कि भ्रष्टाचार और हत्या के मामले में नामजद एक आईपीएस अधिकारी आज तक पकड़ा नहीं जाता, अपने आधिकारिक आवास और कार्यालय में धर्मांतरण जैसी गतिविधियों में लिप्त एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की जाती. ऐसे स्वार्थी अधिकारियों ने ही योगी के पिछले कार्यकाल में ऐसी स्थिति बना दी थी जब भाजपा ने मुख्यमंत्री बदलने पर भी गंभीरता से विचार किया था और एक टीम लखनऊ भेज दी थी.

देश की अधिकांश जनता योगी आदित्यनाथ को अगले प्रधानमंत्री के रूप में देखती हैं. दक्षिण भारत के लोगों में भी मैंने उनके प्रति लोगों में बहुत उत्साह देखा है. यदि  योगी जी को मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री तक की अपनी यात्रा पूरी करनी है तो जनता जो चाहती है, जनता को जो पसंद है, वैसा ही करते रहने होगा क्योंकि केवल जनता का समर्थन ही उन्हें उस ऊँचाई तक ले जा सकता है. प्रदेश में अच्छे, निस्वार्थ और निष्पक्ष अधिकारियों की कमी नहीं है, उन्हें गंभीरता पूर्वक अपने आस पास देखना चाहिए और जहाँ जरूरत हो वहाँ तुरंत बदलाव करना चाहिए और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से अपनी टीम का निर्माण करना चाहिए ताकि इस तरह की अनावश्यक दुर्घटनाओं से बचा जा सके.

-    शिव मिश्रा  responsetospm@gmail.com


शुक्रवार, 15 जुलाई 2022

आयेगा तो यशवंत ही - द्रौपदी Vs यशवंत सिन्हा.अमेरिकी राष्ट्रपति की तरह चु...

हामिद अंसारी- भारत का गद्दार

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मुख्तार अंसारी के चचा हामिद अंसारी का पूरा जीवन संदेह के घेरे में रहा है. उपराष्ट्रपति बन जाने के बाद भी यह महाशय कट्टरता, धर्मान्धता, जिहाद और गजव़ा ए हिन्द की सोच से बाहर नहीं आ सके सके. ये वही व्यक्ति है जिसने ईरान के राजदूत रहते हुए दूतावास में नियुक्ति खुफिया एजेंसी रॉ के ४ अधिकारियों के बारे में ईरान सरकार को गुप्त रूप से सूचित कर दिया था, जिसके कारण इन अधिकारियों को ईरान की खुफिया एजेंसियों ने अगवा कर लिया और बमुश्किल उनकी जान बच सकी. भारत से नफरत इनके रोम रोम में भरी हैं लेकिन सोनिया गांधी इन्हें राष्ट्रपति बनाना चाहती थीं. जानिए विस्तार से . #ShiveMishra #शिवमिश्रा #HamHindustanee #हमहिन्दुस्तानी

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भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...