शनिवार, 11 सितंबर 2021

भ्रष्टाचार, विकाश और राजनीति - उ.प्र के आयने में

 

 


 

भ्रष्टाचार भारत में बिल्कुल भी नया नहीं है लेकिन यह कब शुरू हुआ इसके लिए कोई सटीक उत्तर नहीं मिलता. फिर भी भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप में शुरू करने का श्रेय अंग्रेजी शासन को देना अनुचित नहीं होगा.  अंग्रेजों की सरकार  में भारतीय कर्मचारियों के वेतन और भत्ते इतने  कम होते थे कि जिनसे उनका गुजारा होना भी संभव नहीं था, लेकिन अंग्रेजों ने एक रास्ता खुला छोड़ रखा था  कि कर्मचारी चाहे तो अपने लिए स्वयं जनता से व्यवस्था कर सकते हैं बशर्ते सरकार का कोई नुकसान न हो. उस जमाने में सरकारी विभागों के नाम पर पुलिस  और राजस्व विभाग प्रमुख थे, और ऐसा माना जाता है कि इन विभागों में भ्रष्टाचार था जो आज तक बदस्तूर कायम है.

आजादी के बाद भी इसमें कुछ भी नहीं बदला क्योंकि आजादी सत्ता का हस्तांतरण मात्र थी कर्मचारी भी वही और जनता भी वही  केवल शासक बदल गए थे जिनकी मानसिकता भी अंग्रेजों वाली ही थी. समय के साथ जैसे-जैसे नई विभाग बनते गए भ्रष्टाचार भी अपना दायरा बढ़ाता चला गया. धीरे धीरे भ्रष्टाचार ने पूरे देश को जकड़ लिया और  सरकार में सर्वोच्च स्तरों पर भी भ्रष्टाचार शुरू हो गया, यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों में भी भ्रष्टाचार होने लगा और हथियारों की खरीद  भी इससे अछूती नहीं रही. न्याय के मंदिर कहे जाने वाले न्यायालय में भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जमा ली. राज्यों के  मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्रियों के ऊपर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगते रहे हैं और कई  मामलों में यह साबित भी हो गए. कई मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और केंद्र केंद्रीय मंत्रियों को सजा भी हुई लेकिन भ्रष्टाचार अनवरत कायम रहा. हां यह जरूर है कि सरकारें बदलने के साथ उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले कम ज्यादा होते रहे  लेकिन विभागों  और कर्मचारियों के स्तर पर भ्रष्टाचार में कोई उल्लेखनीय सुधार अभी तक नहीं हुआ है. यह बात किसी से भी छिपी नहीं है, मुख्यमंत्री,  प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इस से अवगत हैं और उनके प्रयासों से उच्च स्तर पर भ्रष्टाचार में तो कमी जरूर आई है लेकिन निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की गति में कोई खास परिवर्तन नहीं आया है जो निश्चित रूप से बहुत चिंता का विषय है.

 

ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार भारतीय परिवेश का एक हिस्सा बन गया और इसलिए ज्यादातर लोगों ने इससे समझौता कर लिया है . ऐसा भी नहीं है कि भ्रष्टाचार का कभी विरोध नहीं हुआ लेकिन विरोध करने वाले चंद लोग होते हैं और उन्हें भी अपने काम कराने के लिए कहीं न कहीं झुकना पड़ता है या समझौता करना पड़ता है. सवाल यह है

 

·       क्या भ्रष्टाचार लाइलाज मर्ज है ? या

·       सत्तासीन राजनीतिक दल किसी न किसी कारणवश इसे नजरअंदाज करते हैं?

मुझे लगता है कि सत्ता में बैठे ज्यादातर राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के मामले में इसलिए गंभीर नहीं हो पाते हैं क्योंक वे  स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं और इसलिए नैतिक रूप से कर्मचारियों की लगाम कसने का साहस नहीं दिखा पाते. सत्तापरिवर्तन होते ही पुरानी सरकार के भ्रष्टाचार की कहानियां सतह पर आ जाती  हैं और फिर राजनीतिक फायदा लेने की कवायद भी शुरू हो जाती है. भ्रष्टाचार करने वाला दल इसे बदले की कार्यवाही बताता है और फिर मामला पूरी तरह से राजनीतिक होकर खत्म हो जाता है. फिर भी ज्यादातर सरकारे विभिन्न विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए  दृढ़ इच्छा शक्ति  नहीं दिखा पाती. इसके विपरीत कुछ सरकारे इस तरह के भ्रष्टाचार में साझीदार बन जाती  हैं.

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में अगर बात की जाए तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकांश मामलों में दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दिया है और उसका लाभ प्रदेश की जनता के साथ साथ देश को भी हुआ है. पूरे देश में आज उनकी छवि एक शख्त और कुशल प्रशासक के रूप में और भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति रखने वाले मुख्यमंत्री के रूप में   चर्चित है. मैं  व्यक्तिगत रूप से योगी जी को तब से जानता हूं जब उन्होंने शायद  मुख्यमंत्री बनने की कल्पना भी नहीं की होगी. इसलिए मैं इस बात को विश्वास पूर्वक कह सकता हूं कि अगर योगी भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा सकते हैं तो फिर प्रदेश में  भ्रष्टाचार पर नियंत्रण लगाना बहुत ही मुश्किल है.  इक्का-दुक्का संदिग्ध मामलों को छोड़ कर योगी सरकार में भ्रष्टाचार का कोई  मामला अभी तक मंत्री या अन्य उच्च स्तर पर सुनने को नहीं मिला है. इस सब के बावजूद  भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात  विभागों और पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार में कोई बहुत  उल्लेखनीय सुधार नजर नहीं आता जिससे  कम से कम जनता के नजरिए में तो सुधार की कोई अनुभूति नहीं हुई है.

 

मैं एक छोटी सी घटना का उल्लेख करना चाहूंगा.  कुछ दिन पहले  मैं प्रदेश के एक शहर में सुबह टहलने के लिए निकला. एक पार्क में कई लोग योग और व्यायाम कर रहे थे. उनकी  आपस में हो रही बातचीत में  एक व्यक्ति ने बहुत जोर देकर कहा कि आज भी बिना पैसा दिए सरकार में कोई काम नहीं हो रहा.  उसका इशारा इन्हीं विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर था. हो सकता है  कि उसकी  बात में कुछ राजनीतिक पुट हो लेकिन यह जनता का दृष्टिकोण है. अगर सरकार के प्रयासों से  सुधार हो रहा है और भ्रष्टाचार में कमी आ रही है तो वह जनता को दिखाई भी पडनी चाहिए. जब तक जनता को महसूस  नहीं होता,  किसी भी सुधार का कोई बहुत महत्व नहीं.

 

समस्या की जड़

प्रायः उत्पादकता और कार्यकुशलता में प्राइवेट और सरकारी क्षेत्रों की तुलना की जाती है और यह समझना मुश्किल नहीं है कि उत्पादकता, कार्यकुशलता और इमानदारी में प्राइवेट क्षेत्र के कर्मचारी आगे क्यों हैं. एक बड़ा कारण है कि इन तीन चीजो में कमी के कारण उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड सकता है.  सरकार द्वारा  सिर्फ भ्रष्टाचार निरोधक कानून और विभाग बनाने से सरकारी तंत्र का  भ्रष्टाचार दूर नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत  गहरी हैं जिसको राजनीतिक मान्यता ही नहीं संरक्षण भी  प्राप्त है. भ्रष्टाचार से पैसा कमाने की बड़ी जगहों पर स्थानांतरण कराने के लिए कर्मचारी मोटी रकम अदा कर रहे हैं, यह पता करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है कि वे  कौन लोग हैं जो पैसा लेकर स्थानांतरण कर रहे हैं. स्वाभाविक है कि जब कोई कर्मचारी मोटी रकम चुकाने के बाद  किसी जगह पहुंचता है तो उसका उद्देश्य केवल और केवल पैसा कमाना ही होता है जो बिना भ्रष्टाचार के नहीं हो सकता. एक समय था जब समाचार पत्रों में पुलिस विभाग की जिले की पोस्टिंग और थाने नीलाम होने की सुर्खियां प्रकाशित होती थी. आज ये  सुनाई नहीं पड़ती और यह भी सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है. फिर भी थानों में एफ आई आर लिखने, खत्म करने, अंतिम रिपोर्ट लगाने के लिए पैसे लिए जाना आज भी चर्चा का विषय बनता है. ट्रैफिक पुलिस में  भ्रष्टाचार की खबरें बहुत आम बात है.

 

सरकार को भ्रष्टाचार के विरुद्ध  शुरुआत तो करनी ही होगी और यह जितनी जल्दी हो उतना ही अच्छा है. शुरुआत भी कुछ उन चुनिंदा विभागों से करनी चाहिए जिनसे जनता का संपर्क बहुत ज्यादा होता है क्योंकि यही विभाग जनता में सरकार की छवि बिगाड़ने / बनाने  का कार्य करते हैं. इनमें प्रमुख विभाग हैं- पुलिस, तहसील/ ब्लॉक, रजिस्ट्री कार्यालय, संभागीय परिवहन कार्यालय, नगर निगम / नगर पालिका, जिलाधिकारी और उसके संबंधित  कार्यालय आदि .

 

रोकथाम हेतु कुछ सुझाव

  • ·       नीतिगत उपदेश देने और कर्मचारियों को चेतावनी देने भरसे भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो सकता, इसलिए आज ऐसे उपायों की जरूरत है जिसमें कर्मचारी के विरुद्ध त्वरित कार्यवाही की जा सके और उसे नौकरी से बर्खास्त किया जा सके. बेरोजगारी के इस युग में इस तरह की कार्यवाही से नए ईमानदार युवाओं को नौकरी भी दी जा सकती है. 
  • ·        संबंधित विभागों भ्रष्ट कर्मचारियों के विरुद्ध नई भर्ती करने के उद्देश्य से प्रतीक्षा सूची तैयार की जाए. भ्रष्ट कर्मचारियों पर त्वरित कार्यवाही करते हुए उन्हें  बर्खास्त किया जाए और  उनकी जगह प्रतीक्षा सूची से लोगों को तुरंत नौकरी पर रखा जाए. पुलिस जैसे विभाग के लिए सिपाही और उप निरीक्षकों की उपयुक्त संख्या में प्रतीक्षा सूची बनाई जाए और दोषी कर्मचारियों को बर्खास्त करने के बाद प्रतीक्षा सूची से लोगों को रखा जाए. इस तरह की प्रतीक्षा सूची बनने मात्र से ही कर्मचारियों में असर होगा.
  • ·       कर्मचारियों के नियमित स्थानांतरण किए जाएं कोई  भी कर्मचारी अधिक दिनों तक एक ही सीट और एक ही स्थान पर न रहे. 
  • ·       संवेदनशील पदों पर बैठे  कर्मचारी को प्रति वर्ष 10 से 15 दिन के लिए अनिवार्य छुट्टी की व्यवस्था की जाए ताकि उनके जाने पर उनके गोरखधंधे की  अपने आप पड़ताल हो सके.
  • ·       परिवहन, रजिस्ट्री विभाग जैसे अन्य विभागों में पासपोर्ट कार्यालय जैसी आउटसोर्सिंग व्यवस्था की जाए और तकनीक आधारित कंपनियों से कर्मचारियों को लिया जाए और पारदर्शिता के लिए  इन विभागों को पूरी तरह से तकनीक चालित  बनाया जाए.
  • ·       पुलिस थानों में एफ आई आर दर्ज कराने की प्रक्रिया को ऑनलाइन उपलब्ध करा दिया जाए और थानों के सभी रिकॉर्ड  डिजिटल बनाकर ऑनलाइन कर दिया जाए ताकि उच्चाधिकारी नियमित अंतराल पर अवलोकन कर सकें.
  • ·       वर्तमान संविदा कर्मियों की व्यवस्था  कारगर साबित नहीं हो रही है इसलिए उसके स्थान पर आउटसोर्सिंग की व्यवस्था की जाए ताकि इन कर्मचारियों की उत्पादकता और अनुशासन की  जिम्मेदारी आपूर्तिकर्ता कंपनी की हो.
  • ·       जनता के कार्यों से जुड़े सभी विभागों के कर्मचारियों को सप्ताह में 1 दिन अपने कार्य क्षेत्र में गांव और कस्बों में जाकर लोगों से व्यक्तिगत और समूह में मिलने की अनिवार्यता  की जाए और इसका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाए ताकि कर्मचारियों और जनता के बीच की दूरी कम हो सके, जिससे भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है.
  • ·       राज्य सरकार की वर्तमान जनसुनवाई पोर्टल व्यवस्था एक महत्वाकांक्षी एवं   नवोन्मेषी विचार जरूर है लेकिन संबंधित विभाग में वही कर्मचारी इसका जवाब देता  है जिसके विरुद्ध शिकायत होती है इसलिए स्वाभाविक रूप से शिकायतों का निपटारा नहीं होता बल्कि केवल शिकायतों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होता है. इससे  पोर्टल बनाने के विचार और उस पर की गई मेहनत पर पानी फिर रहा है.  इसलिए अच्छा यह होगा की शिकायत का जवाब वह कर्मचारी जिस से शिकायत जुड़ी है वह नहीं दे और जवाब पर हस्ताक्षर भी कोई अन्य अधिकारी जो शिकायत के संबंध ना हो करे.   प्रत्येक विभाग की शिकायतों में से कुछ को  अनिवार्य रूप से अन्य विभाग द्वारा जांच कराई जाए और दोषी पाए जाने पर  संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध सख्त और प्रभावी कार्यवाही की जाए, तभी इस पोर्टल का औचित्य पूरा हो सकेगा.
  • ·       स्पेशल टास्क फोर्स  जैसी कोई भ्रष्टाचार निरोधक टीम बनाई जाए और उसमें तेजतर्रार युवा अधिकारियों की पोस्टिंग की जाए जो भ्रष्टाचार से संबंधित प्राप्त सूचनाओं और शिकायतों की न केवल जांच करें बल्कि औचक निरीक्षण करके भी भ्रष्ट अधिकारियों में भ्रष्टाचार के विरुद्ध भय पैदा करने का काम करें.

 

विकास और राजनीति

उत्तर प्रदेश मैं वैसे तो अतीत में कई राजनीतिक व्यक्तियों  को विकास पुरुष की संज्ञा दी जा चुकी है, लेकिन उनके द्वारा किए गए विकास के कार्य शायद ही कहीं दिखाई पड़े और प्रदेश कई अन्य प्रदेशों के मुकाबले आज भी पिछड़ा हुआ है. यह सही है  कि योगी सरकार में प्रदेश में सकल घरेलू उत्पाद बढा  है, निवेश के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ है और मूलभूत संरचना के क्षेत्र जैसे नए हवाई अड्डे, नए रोड /  एक्सप्रेस वे,  पुल और फ्लाईओवर आदि के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य हुआ है फिर भी प्रदेश में योजनाबद्ध तरीके से विकास की एक रूपरेखा तैयार किये  जाने की अत्यंत  आवश्यकता है.

चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा

कोरोना महामारी की विभीषिका और चिकित्सा  संसाधनों की उपलब्धता की चुनौती को देखते हुए सरकार को चाहिए कि वह प्रदेश के सभी जिलों में मेडिकल कॉलेज और उससे संबंधित सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की योजना तैयार करें. मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस या मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अनुमोदन प्राप्त न होने की स्थिति में राज्य सरकार स्वयं अपना डिग्री कोर्स बना सकती है और उसके साथ साथ नर्सिंग  और फार्मेसी के भी नए कोर्स शुरू किए जा सकते हैं. वित्तीय संसाधनों की कमी को देखते हुए इन्हें पब्लिक प्राइवेट पार्टिसिपेशन के आधार पर तैयार किया जा सकता है. चिकित्सा और चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने वाले उद्यमियों की कमी नहीं है और इस कारण सरकार को आर्थिक संसाधनों से नहीं जूझना पड़ेगा.

इनमें प्रवेश जिले के निवासियों और उनके लिए आरक्षित किये  जा सकते है जिन्होंने हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा है संबंधित जिले से पास की हैं. ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों के विद्यार्थियों के लिए प्रवेश में प्रोत्साहन के लिए विशेष अंक की व्यवस्था भी की जा सकती है. इन कॉलेजों से डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए उन्हीं जिलों में नौकरी या व्यवसाय करना अनिवार्य कर दिया जाए. इससे गांव और शहर में उपलब्ध संसाधनों के अंतर को कम किया जा सकेगा. जहां तक इन कॉलेजों में पढ़ाई के लिए शिक्षकों की उपलब्धता का का प्रश्न है तो उसके लिए केंद्रीकृत वीडियो आधारित ऑनलाइन पढ़ाई की व्यवस्था की जा सकती है. मेडिकल कॉलेज में बिल्डिंग की न्यूनतम व्यवस्था की जा सकती है और छात्रावास उपलब्ध नहीं भी  कराया जा सकता है क्योंकि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलने के साथ-साथ भावी डॉक्टर, नर्स और फार्मेसिस्ट का  जनता में सामंजस्य भी बना रहेगा.

प्राथमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा एक अन्य ऐसा क्षेत्र है जिसमें परिवर्तन की तुरंत आवश्यकता है. प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक नियुक्त करने की वर्तमान प्रणाली न केवल राज्य सरकार के संसाधनों पर भारी भरकम बोझ बन रही है बल्कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने में पूरी तरह से असफल सिद्ध हो रही है. ऐसा लगता है कि प्राथमिक शिक्षा का क्षेत्र शिक्षकों के रूप में लोगों को केवल रोजगार देने का एक बहुत बड़ा साधन मात्र  बन गया है. इस क्षेत्र की सोशल ऑडिट करने की  आवश्यकता है और तदनुसार भविष्य के निर्णय किए जाने चाहिए अन्यथा यह विभाग शिक्षकों को आकर्षक रोजगार देने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकेगा. यहां भी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप  या आउटसोर्सिंग मॉडल की आवश्यकता है जहां पर वर्तमान शिक्षक नियुक्ति व्यवस्था के स्थान पर  शिक्षा क्षेत्र की विशेषज्ञ कंपनियों से शिक्षकों को लिया जा सकता है  ताकि न केवल शिक्षकों की उत्पादकता बढ़ सके बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों के बच्चे भी नामी-गिरामी स्कूलों की तरह बेहतरीन  शिक्षा पा सकें और गांव से शहरों की भागमभाग रुक सके.

 

 

परियोजना प्रबन्धन

इसके अलावा एक और ऐसा क्षेत्र है जिस पर  उत्तर प्रदेश सहित ज्यादातर राज्यों में ध्यान नहीं दिया गया और वह है विभिन्न  परियोजनाओं का समय से पूरा न  होना. आज इस बात की तुरंत आवश्यकता है कि राज्य सरकार द्वारा संचालित सभी नए प्रोजेक्ट तकनीक आधारित टूल से नियमित रूप से मॉनिटर किये  जाए. इस तरह की परियोजनाओं को समय से पूरा करने के उद्देश्य पूरे विश्व में तमाम प्रोजेक्ट मैनेजमेंट टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं और परियोजना में काम करने वाले कर्मचारियों को समय से प्रोजेक्ट पूरा करने की ट्रेनिंग भी दी जाती है. एजाइल प्रोजेक्ट मैनेजमेंट में  पूरी परियोजना को कई हिस्सों में बांटकर माइलस्टोन तैयार किए जाते हैं और उन्हें निश्चित अवधि में पूरा किया जाता  है और इसके आधार पर न केवल परियोजना में होने वाली देरी से बचा जा सकता है बल्कि परियोजना की लागत बढ़ने से भी रोका जा सकता है.   प्रोजेक्ट की लागत के हिसाब से इन्हें जिले और राज्य  स्तर पर मॉनिटर किया जा सकता है.  बड़ी परियोजनाओं को संबंधित मंत्री और मुख्यमंत्री नियमित  मासिक या त्रैमासिक अंतराल पर मॉनिटर कर सकते हैं. इस तरह  सरकार अपनी विकास पूरक छवि बनाकर  न केवल राज्य में विकास की गति तेज कर सकती है बल्कि लोगों के दिलों में अमिट छाप  भी छोड़ सकती है.

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

- शिव मिश्रा 

( लेखक  आर्थिक और सूचना एवं प्रौद्योगिकी विषयो के जानकार हैं )

रविवार, 5 सितंबर 2021

क्या कारण है कि 3 लाख संख्या वाली अफगानिस्तान की सेना केवल 75,000 की संख्या वाले तालिबानियों के सामने हार गयी?

 प्रश्न : क्या कारण है कि 3 लाख संख्या वाली अफगानिस्तान की सेना केवल 75,000 की संख्या वाले तालिबानियों के सामने हार गयी?

तालिबान का अफगानिस्तान पर इस तरह कब्जा किया जाना पूरी दुनिया में चर्चा का विषय है परंतु भारत में इस चर्चा में गर्माहट इसलिए है क्योंकि यहां भी तालिबान के हमदर्द , समर्थक और मानसिकता के काफी लोग हैं जो तालिबान का समर्थन भी कर रहे हैं उनके अफगानिस्तान पर कब्जा करने का जश्न भी मना रहे हैं और इसे अफगानिस्तान की आजादी तक कह रहे हैं.

एक कुख्यात शायर मुनव्वर राणा ने तो तालिबान की महर्षि बाल्मीकि से तुलना कर दी. जावेद अख्तर ने तो आर एस एस और भाजपा को भी तालिबानी मानसिकता वाला करार दे दिया. ओवैसी, महबूबा सहित कई सांसदों ने भी तालिबान को समर्थन दे दिया और भारत की लगे हांथों लानत मलामत दी कर दी.

इस सबके बाद भी इस विषय में भारत का राष्ट्रीय निष्कर्ष लगभग वही है जो अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया की मुख्य धारा की मीडिया और लोगों का निष्कर्ष है. यानी-

  • चीन ने तालिबान को पैसा दिया और तालिबान ने अफगान सेना को रिश्वत दी और अफगान सेना तालिबान से मिल गई
  • भ्रष्टाचार, कुशासन, महंगाई, बेरोजगारी और अफगान सेना को वेतन न मिलना आदि
  • अधिसंख्य अफगान लोगों का तालिबान मानसिकता का होना या इस मानसिकता का समर्थन करना
  • एक प्रमुख विचार यह भी उभर कर आया है कि अमेरिका और तालिबान के बीच सत्ता के हस्तांतरण का समझौता हुआ था जिसके अनुसार अफगान सेना और अफ़ग़ान राष्ट्रपति को ऐसा करना ही था.

उपरोक्त सभी कारण सही हो सकते हैं लेकिन फिर भी इनमें से कोई भी कारण यह स्पष्टीकरण नहीं दे सकता कि

-तालिबान के कब्जा करते समय पूरी जनता मूकदर्शक क्यों बनी रही ?

-अफगान सेना भी नहीं लड़ी और जनता ने भी किसी तालिबान आतंकवादी का कोई प्रतिरोध क्यों नहीं किया?

इन प्रश्नों का का उत्तर ही पूछे गए प्रश्न का सबसे सही उत्तर हो सकता है.

  • यह तालिबान की विजय नहीं अमेरिकी समझौते के अनुसार सत्ता का हस्तांतरण ही है.
  • 90 के दशक में जब पहली बार तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तो वहां के राष्ट्रपति नजीब को सार्वजनिक स्थान पर फांसी पर लटका दिया गया था और इस कारण अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के पास भागने के अलावा कोई विकल्प नहीं था क्योंकि वह जानते थे कि उनका भी वही हश्र होगा.
  • अफगान सेना कहीं भी नहीं लड़ी उसने बिना संघर्ष किए आत्मसमर्पण कर दिया और अमेरिका से मिले अत्याधुनिक हथियार भी तालिबान को सौंप दिए.
  • जनता ने प्रतिरोध क्यों नहीं किया, यह भी बहुत अजीब नहीं क्योंकि अफगानिस्तान का पिछले 2000 वर्षों का इतिहास यही है कि यहां की जनता या तो आत्मसमर्पण कर देती है और या फिर भारत की तरह इस मुगालते में रहती है कि कोई नृप होय हमें क्या हानि?

अफगान जनता का यह चरित्र बहुत विचित्र नहीं है और इसमें हिंदुओं की गुलामी की दास्तान छिपी हुई है.

1204 में मोहम्मद बख्तियार खिलजी ने आक्रमण किया और चूंकि हिंदू राजा आपस में ही एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते थे, इस आक्रमण का सभी ने सामूहिक सामना नहीं किया और परिणाम स्वरूप बंगाल मुस्लिम आक्रांताओं के कब्जे में आ गया. बख्तियार खिलजी ने न केवल अपना साम्राज्य स्थापित किया बल्कि तलवार की नोक पर बड़ी संख्या में धर्मांतरण करवाया जिसके कारण बंगाल मुस्लिम बाहुल्य राज्य हो गया.

1204 में भारत के बौद्ध बाहुल्य बंगाल राज्य में मोहम्मद बख्तियार खिलजी का भी मुस्लिम शासन ऐसे ही बिना किसी प्रतिरोध के स्थापित हुआ था और फिर क्लाइव लायड ने भी प्लासी की लड़ाई में इसी तरह विजय प्राप्त की थी.

इसे भी पढ़ें -

हिन्दू गुलाम क्यों हुआ ?

अफगानिस्तान प्राचीन काल में हिंदू शासित हिंदुस्तान का क्षेत्र हुआ करता था और इसके आखिरी हिंदू राजा दाहिर थे जो सिंध के राजा थे और अफगानिस्तान सिंध का ही एक हिस्सा हुआ करता था.

वास्तव में कलिंग युद्ध के बाद जब अशोक ने शोकाकुल होकर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और उसने बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया. अफगानिस्तान के ज्यादातर लोग भी बौद्ध हो गए थे और बौद्ध धर्म वह धर्म है जहां हिंसा की तो बात ही नहीं हो सकती और इतिहास गवाह है कि जहां जहां बौद्ध धर्म था वहां वहां पराजय और गुलामी अवश्य मिली क्योंकि बौद्ध लोग शांत प्रिय होते हैं और युद्ध से दूर रहते हैं इसलिए कालांतर में उनमें वीरता का ह्रास हुआ और प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो गई.

अफगानिस्तान जो भारत में घुसने के लिए पश्चिमी द्वार कहा जाता था, वहां से कितने ही आक्रमणकारी भारत में घुसे लेकिन उन्हें अफगानिस्तान में कभी भी किसी भी तरह के प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा और आक्रमणकारी सीधे सिंध, पंजाब, दिल्ली और गुजरात तक पहुंच जाते थे.

भारत पर आक्रमण करने वाले आतंकी और लुटेरे मोहम्मद गौरी, महमूद गजनवी, बाबर तैमूर आदि अफगान नहीं थे. यह सभी बेहद हिंसक बर्बर कबीलाई संस्कृत से निकली हुए लोग थे और तालिबान भी वही है.

यह सही है कि अफगानिस्तान में भी बहुत बड़ी आबादी तालिबान को पसन्द करती है। जो मन से चाहते हैं कि उनके देश में तालिबानी कानून चले लेकिन भारत में भी बड़ी संख्या में तालिबानी मानसिकता के लोग हैं . तालिबान यह देखकर बहुत खुश हुआ कि हिंदुस्तान में इतनी बड़ी संख्या में उसके समर्थक हैं. इसी कारण वह तालिबान जो भारत से अफगानिस्तान मैं अपना दूतावास बंद न करने का अनुरोध कर रहा था और दोहा में भारतीय राजदूत से मिलकर भारतीय निवेश की सुरक्षा का आश्वासन दे रहा था, उसने पैंतरा बदलते हुए कहा वह कश्मीर के मुसलमानों के लिए आवाज उठाएगा और उन्हें समर्थन देगा क्योंकि वह उनके भाई हैं.

इसलिए यह मत समझिए कि तालिबान की संख्या 70 हजार थी, यह तो सिर्फ तालिबान आतंकी थे अफगानिस्तान की कुल चार करोड़ जनसंख्या में लगभग 70 लाख तो उनके कट्टर समर्थक हैं , उनका भी साथ मिला इसलिए उनका पूरा कब्जा करना तो स्वाभाविक है. अगर प्रतिरोध होता तो कब जा होना इतना आसान नहीं होता जैसा कि पंजशीर घाटी में हो रहा है.

बौद्ध और जैन धर्म का उद्भव सनातन धर्म से ही हुआ है और जब यह दोनों धर्म इतने अहिंसक और शांतिप्रिय हैं तो आप सनातन धर्म के बारे में सहज अंदाजा लगा सकते हैं. अफगानिस्तान का सच हमें यही बताता है कि “ अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च” (अहिंसा ही मनुष्य का परम धर्म हैं और जब जब धर्म पर आंच आये तो उस धर्म की रक्षा करने के लिए की गई हिंसा उससे भी बड़ा धर्म हैं।)


~~~~~~~~~~~~~

- शिव मिश्रा 

बुधवार, 1 सितंबर 2021

" क्या मुगल असली राष्ट्र निर्माता हैं, और मुस्लिम शासकों को बदनाम करना हिन्दुओं की फितरत है"

 

भारत में जितने भी विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किए वह वह सभी लुटेरे थे जो धन संपत्ति लूटने के लिए भारत में आते थे.

सबसे पहला आक्रमण 711 ईसवी में मोहम्मद बिन कासिम ने किया और उसके बाद महमूद गजनवी ने 17 बार भारत पर आक्रमण किया, कितनी धन-संपत्ति सोना चांदी लूटी इसका अनुमान स्वयं उसके द्वारा बताए गए विवरण के आधार पर किया जाए तो भी यह आज के हिसाब से भी इतनी अधिक थी कि शायद सहज विश्वास न हो.

इसके बाद धन संपत्ति के लालच में लुटेरों के लगातार आक्रमण होते रहे. गजनी के बाद गोरी और उसके बाद चंगेज खां ने भारत पर आक्रमण किया. 1526 में बाबर नाम के लुटेरे ने भी भारत पर आक्रमण किया और उसकी लूट का विवरण बाबरनामा में दिया गया है, वह चकित करने वाला है . लूट के समय बाबर ने छल कपट का सहारा लिया और संपत्ति लूटने के बाद तालाबों और नदियों में जहर भी मिलवाया . उसने महसूस किया कि भारत के लोग उसे बेहद नफरत करते हैं लेकिन लुटेरों से बहुत डरते हैं और इसलिए उसने यहां हुकूमत करने का निर्णय लिया और उसका वंश मुग़ल वंश कहलाया .

इन सभी आक्रमणकारी धन संपत्ति लूटने के अलावा हिंदू महिलाओं को जबरन उठा ले जाते थे और उन्हें सेक्स स्लेव बनाते थे. इन महिलाओं को लुटेरों और उनके दोस्तों में अय्याशी करने के लिए बांट दिया जाता था. इन किस्मत की मारी हिंदू महिलाओं पर कितने अत्याचार किए जाते थे इसका वर्णन तो छोड़िए कल्पना करना भी बहुत मुश्किल है. इसकी थोड़ी सी झलक उन मुस्लिम इतिहासकारों की कुछ किताबों से मिलती है जो इन आतंकवादियों / आक्रांताओं के साथ भारत आए थे और जिन्होंने इन आक्रांताओं के कथनानुसार ही इतिहास लिखा था. जो वर्णन है वह दिल दहलाने के साथ ही समस्त मानवता के लिए लज्जा से सर झुकाने वाला है.

इन किस्मत की मारी हिंदू महिलाओं की जुल्म और सितम की कहानियां दिल दहलाने वाली हैं . इनसे तो कोई निकाह भी नहीं करता था और इसलिए उनकी संतानों को उनके अब्बा का नाम भी नसीब नहीं होता था लेकिन इन अवैध संतानों को एक चीज अवश्य मिलती थी और वह था जन्मजात इस्लाम धर्म.

इन महिलाओं ने करुण क्रंदन करते समय यह कामना की थी कि इनकी संताने इन पर जुल्म ढाने वालों से बदला लेंगी लेकिन इनका दुर्भाग्य देखिए कि इनकी संताने भी उन आक्रांताओं में शामिल हो गई है और उन्हीं आक्रांताओं और आतंकवादियों में अपने पिताओं के दर्शन कर रही हैं. यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा कि इन आक्रांताओं की ये अवैध संताने आक्रांताओं से भी ज्यादा खूंखार और धर्मांध है और आज यह सब मिलकर किसी न किसी रूप में भारत के राष्ट्रीय सनातन स्वरूप को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास कर रही हैं.

आज आप २१वीं सदी के तालिबान के देखिये क क्या कर रहे हैं और अंदाजा लगाइए कि आज से पांच सौ से हजार वर्ष पूर्व के आक्रान्ता  जो तालिबान से भी ज्यादा बर्बर और खूंख्वार थे,  कैसे रहे होंगे ? 

बॉलीवुड इसका अपवाद नहीं प्रोपेगेंडा चलाने का गढ़ है. अल्लामा इकबाल से लेकर राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा तक सब के सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं. इस देश का नैरेटिव बदलने में वामपंथी इतिहासकारों और भारतीय सिनेमा का जितना हाथ है उतना तो स्वयं इन आक्रांताओं का भी नहीं रहा.

लेकिन इन लोगो के सिरफिरेपन का आरोप हम पूरे समुदाय पर नहीं लगा सकते क्योंकि हमारी नैतिकता इसकी अनुमति नहीं देती.

कबीर खान भी इन्हीं आक्रांताओं की संतानी सेना के सिपाही है, इसलिए उनसे मुगलों और आक्रांताओं को महिमामंडित करने के अलावा और क्या अपेक्षा की जा सकती है. भारत का विभाजन भी आक्रांताओं कि इसी इसी संतानी सेना ने करवाया, अपने लिए पाकिस्तान मांगा और फिर एक गहरे षड्यंत्र के अंतर्गत गए भी नहीं. आज भारत की अनेक समस्याओं के लिए यह संतानी सेना ही उत्तरदाई है.

पता नहीं ऐसे लोगों को सजा देने में कानून अपना काम कब करेगा ? करेगा भी या नहीं ? लेकिन सभी जागृत राष्ट्रवादी व्यक्तियों को ऐसे लोगों का बहिष्कार अवश्य करना चाहिए क्योंकि ऐसा तो हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि आपके पैसे पर ही ऐसे लोग ऐश करें और आपके पैसे से ही आपके विरुद्ध कोई षड्यंत्र चलायें.

~~~~~~~~~~~~~~

    - शिव मिश्रा 

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

राम भक्त कल्याण सिंह - “राम काज कीन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम"

  


राम भक्त कल्याण को शत शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि !

कल्याण सिंह अब हमारे बीच नहीं है, यह अफवाह नहीं हकीकत है, लेकिन जब तक अयोध्या में राम मंदिर रहेगा और राम मंदिर के संघर्ष का इतिहास रहेगा, वह इस लोक में हमेशा विराजमान रहेंगे. उन्हें समस्त हिन्दू जनमानस और राम भक्तों की ओर से विनम्र श्रद्धांजलि. जय श्रीराम

कल्याण सिंह कौन थे ? उनका जन्म कहां हुआ था? उनकी शिक्षा दीक्षा कहां हुई? उन्होंने राजनीति में कब प्रवेश किया? यह सब महत्वपूर्ण है, लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण वह है जब समूचे विश्व में कल्याण सिंह का महामानव स्वरूप देखा और वह तिथि थी ६ दिसम्बर १९९२, जब उन्होंने साफ ऐलान कर दिया था कि वह अयोध्या में एकत्रित लगभग चार लाख राम भक्त कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएंगे क्योंकि ऐसा करने से हजारों लोगों की जान जाएगी, भारी नरसंहार होगा. उन्होंने यह आदेश पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को लिखित में दे दिया. अयोध्या से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली तक राजनीतिक माहौल बेहद तनावपूर्ण और गहमागहमी भरा रहा लेकिन दृढ़ निश्चचयी कल्याण सिंह अपने फैसले पर अटल रहे.

उस दिन पूरी दुनिया ने जाना कि कल्याण सिंह जैसे महामानव सैकड़ों वर्षो में जन्म लेते हैं. राम मंदिर से बाबर का अतिक्रमण उनके शासनकाल में ही हटाया गया इसलिए सही अर्थों में राममन्दिर की नींव उन्होंने ही रखी. अगर 6 दिसंबर १९९२ को बाबर का अतिक्रमण नहीं हटाया गया होता तो शायद राम मंदिर बनने का सपना आज भी साकार नहीं हुआ होता.

दिसंबर 1992 को दोपहर होते-होते अयोध्या में कारसेवक विवादित परिसर में घुस गए और वह गुम्बदों पर चढ़ गए . उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक ने कल्याण सिंह से गोली चलाने की अनुमति देने का आग्रह किया जिसे उन्होंने ठुकरा दिया और स्पष्ट किया कि अन्य सभी तरह के विकल्प आजमाये जाएं लेकिन गोली नहीं चलेगी. दोपहर तक कारसेवकों ने तीनों गुंबदों को ढहा दिया और राम मंदिर से आतंकी बाबर का अतिक्रमण पूरी तरह से साफ कर दिया गया.

कल्याण सिंह ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दाखिल कर यह जरूर कहा था कि वह विवादित ढांचे की सुरक्षा करने का हर संभव प्रयास करेंगे और यही उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में भी कहा था लेकिन यह साफ-साफ कह दिया था कि वह कारसेवकों पर गोली नहीं चलाएंगे इसलिए उनका मस्तिष्क इस विषय में पहले से ही पूरी तरह साफ था और कहीं कोई भ्रम की गुंजाइश नहीं थी.

विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद उन्होंने इस घटना की पूरी जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली और साफ साफ शब्दों में कहा कि उन्होंने गोली न चलाने का लिखित आदेश दिया था और जो हुआ उसमें किसी भी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी की कोई भूमिका नहीं है. “ इस घटना में कोई कार्यकर्ता, नागरिक, राम भक्त कारसेवक जिम्मेदार नहीं है, घटना की पूरी जिम्मेदारी मेरी है. किसी का कोई दोष नहीं, कोई कसूर नहीं, कोई कमी नहीं। सारी जिम्मेदारी मैं अपने ऊपर लेता हूं। कहीं कोई दंड देना हो तो किसी को ना देकर मुझे दिया जाए।”

कल्याण सिंह का ये बेबाक और बेहद जिम्मेदारी भरा बयान भला कौन भूल सकता है? विवादित ढांचा गिरने के बाद उन्होंने कहा था कि उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित गाइडलाइंस का पूरी तरह से पालन किया है और यदि विवादित ढांचे की रक्षा नहीं की जा सके तो इसकी पूरी जिम्मेदारी लेते हुए मैंने त्यागपत्र दे दिया है.

उन्होंने कहा कि “ ढांचा नहीं बचा इसका मुझे कोई गम नहीं, न मुझे इसका खेद है और ना ही प्रायश्चित नो रिग्रेट नो रिपेंटेंस नो सॉरी नो ग्रीफ . 6 दिसंबर की घटना राष्ट्रीय गर्व का विषय है” [

उन्होंने कहा था कि "राम मंदिर राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है विवादित ढांचा गिराए जाना सैकड़ों बरसों से हिंदू जनमानस की दबी कुचली भावनाओं का स्वत: स्फूर्त विस्फोट है, इसमें कोई धोखा नहीं कोई षड्यंत्र नहीं है."

अपनी जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया. यह छोटा काम नहीं . ऐसे समय जब ज्यादातर लोग कुर्सी से चिपके रहते हैं और मुख्यमंत्री बने रहने के लिए क्या क्या जतन नहीं करते हैं, उन्होंने हंसते-हंसते अपनी सत्ता कुर्बान कर दी और कहा भी कि यह सरकार राम के कार्य के लिए ही बनी थी और राम काज के लिए ऐसी हजारों सरकारे कुर्बान की जा सकती हैं.

इस्तीफा देने के बाद भी कल्याण सिंह पर सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना का मामला चला और उन्हें 1 दिन के लिए तिहाड़ जेल भी जाना पड़ा.

कल्याण सिंह दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे - पहली बार 24 जून 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और विवादित ढांचा गिर जाने के बाद अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए उन्होंने 6 दिसंबर 1992 को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था.

दूसरी बार वह सितंबर 1997 से नवंबर 1999 तक मुख्यमंत्री रहे उनके दोनों कार्यकाल बेहद घटना प्रधान रहे.

अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने स्कूलों में भारत माता की प्रार्थना और वंदे मातरम को अनिवार्य किया और नकल विरोधी कानून बनाया क्योंकि उस समय शिक्षा का स्तर रसातल में था पूरी शिक्षा व्यवस्था गैस पेपर और नकल के भरोसे थी. नकल विरोधी कानून के अंतर्गत नकल करने और कराने वाले दोनों जेल जाने लगे जिसका ज्यादातर लोगों ने स्वागत किया लेकिन कुछ लोगों ने विरोध भी किया. मुलायम सिंह जैसे कुछ राजनेताओं ने तो यहां तक कहा कि यदि उनकी सरकार बनती है तो वह नकल विरोधी कानून को समाप्त कर देंगे . उनका पहला कार्यकाल उनके कुशल प्रशासक होने का साक्षी बना.

दूसरी बार बसपा और भाजपा के 6 -6 महीने के मुख्यमंत्री के आधार पर मायावती ने 6 महीने का अपना मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा कर लिया और उसके बाद कल्याण सिंह का नंबर आया वह मुख्यमंत्री बने लेकिन 1 महीने बाद ही मायावती ने समर्थन वापस ले लिया. राज्यपाल रोमेश भंडारी ने 2 दिन के अंदर उन्हें बहुमत साबित करने का आदेश दिया और कल्याण सिंह ने सदन में बहुमत साबित भी कर दिया लेकिन विपक्षी दलों ने सदन में जमकर हंगामा किया जिसे आधार बनाकर राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने अस्वीकार कर दिया.

21 फरवरी 1998 को राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त कर उनके कैबिनेट मंत्री जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. राज्यपाल के इस फैसले के विरोध में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई लखनऊ में अनशन पर बैठ गए. मामला उच्च न्यायालय तक गया और उच्च न्यायालय ने राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और मुख्यमंत्री के रूप में कल्याण सिंह की पुनः ताजपोशी सुनिश्चित कर दी.

कल्याण सिंह हमेशा राष्ट्रीय सेवक संघ में सक्रिय रहे और पूर्णकालिक सदस्य के रूप में काम करते 1975 में आपातकाल के दौरान 21 माह तक जेल में बंद रहे. भारतीय जनता पार्टी के राजनीति में मजबूत होने की बात होगी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पूर्व उपप्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी का नाम ऐसा है जो कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. उनके साथ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह एक ऐसा नाम है जिन्हें उत्तर प्रदेश की राजनीति में तो कम से कम नहीं भुलाया जा सकता. कल्याण सिंह ने भाजपा को उस मुकाम पर लाकर खड़ा किया था कि पार्टी ने 1991 में अपने दम पर उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई थी और कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने थे .

पार्टी के शीर्ष नेतृत्व खासतौर से अटल बिहारी वाजपेई से अनबन हो जाने के कारण कल्याण सिंह ने दिसंबर 1999 में भाजपा छोड़ दी और मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए. विरोधी राजनीतिक ध्रुव पर पले बढ़े दोनों नेताओं में बहुत दिनों तक तालमेल नहीं रह सका और 2004 के आम चुनाव में अटल बिहारी वाजपेई के अनुरोध पर वह भाजपा में पुनः शामिल हो गए. 2009 में एक बार फिर उन्होंने भाजपा छोड़ दीऔर एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये। 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी से हुई वार्ता के आधार पर उन्होंने पुनः भाजपा मैं शामिल हो गए. 4 सितंबर 2014 को उन्हें राजस्थान का राज्यपाल नियुक्त किया गया . कुछ समय तक उनके पास हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार भी रहा.

राज्यपाल के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह फिर भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में सक्रिय हो गए .

अस्पताल में भर्ती होने से कुछ समय पहले कल्याण सिंह ने कहा था कि उत्तर प्रदेश में भाजपा अब अपराजेय बन गई है. केंद्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा का कोई विकल्प नहीं है. कई पार्टियां बन रही, फिर टूट रही हैं. ऐसे में लोगों का विश्वास किसी अन्य दल पर नहीं बचा है. सपा-बसपा की सत्ता में वापसी के सवाल पर कल्याण सिंह ने कहा कि प्रदेश में अब इन दोनों दलों की वापसी संभव नहीं है. ये पार्टियां और इनके नेता जनाधार व जनता का विश्वास खो चुके हैं. भाजपा अपने काम के दम पर आगे बढ़ रही है. भाजपा के उप्र में वर्तमान में सबसे ज्यादा सदस्य बन चुके हैं. देश में मोदी और प्रदेश में योगी का कोई विकल्प ही नहीं है, बल्कि कोई पात्र भी नहीं है.

अस्वस्थ होने के बाद उन्हें लखनऊ के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था और इस बीच उनकी मृत्यु की एक झूठी खबर फैल गई, लेकिन २१ अगस्त 2021 को सायंकाल 9:00 बजे वह इस लोक से विदा हो गए.प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों, विपक्षी नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की.

राम के प्रति उनकी श्रद्धा का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले ही उन्होंने हाथ उठाकर जय श्री राम कहा और अस्पताल कर्मचारियों से हाथ उठाकर जय श्री राम कहलवाया. इसका एक फोटो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है बताया जाता है कि इसके बाद उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए.

वैसे तो अयोध्या में भगवान श्री राम के मंदिर के साथ उनका नाम हमेशा जुड़ा रहेगा लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ये घोषणा करके कि अयोध्या से राम मंदिर जाने वाले मार्ग को कल्याण सिंह मार्ग नाम दिया जाएगा, उनका नाम सदा सर्वदा केलिए रामंदिर के साथ जोड़ दिया है . अब श्रद्धालु उनके रास्ते पर चलकर ही राम मंदिर पहुंचेंगे और भगवान श्री राम के दर्शन करेंगे.

तुलसीदास द्वारा हनुमान जी के लिए रचित चौपाई उनके लिए बिल्कुल सटीक बैठती है

“राम काज कीन्हें बिनु, मोहि कहां विश्राम”

राम काज पूरा करने के बाद ही उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा .

सनातन धर्म के महा मानव रामभक्त कल्याण को समस्त हिंदू जनमानस की विनम्र श्रद्धांजलि और शत-शत नमन ..


सोमवार, 16 अगस्त 2021

तालिबान का हुआ अफगानिस्तान

 


आखिर वही हुआ जिसकी आशंका  थी और संभावना भी,   तालिबान ने  पूरे अफगानिस्तान को अपने कब्जे में कर लिया है.  ताजा समाचार यह है कि तालिबान ने बिना किसी विशेष  विरोध के समूचे अफगानिस्तान पर पूरी तरह से नियंत्रण कर लिया है. तालिबान के सूत्रों ने  बताया है कि  शीघ्र  ही  अफगानिस्तान को “इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान”  घोषित कर दिया जाएगा.  


मैं वैश्विक राजनीति मामलों का विशेषज्ञ तो नहीं हूं लेकिन मुझे यह बड़ा हास्यास्पद लगा कि एक तरफ समझौता वार्ता चलती रही, दुनिया की तमाम तथाकथित शक्तियां वार्ता करती रही  और दूसरी तरफ तालिबान  अफगानिस्तान के  राज्यों पर कब्जा करते हुए  काबुल पहुंच गया और  और राष्ट्रपति भवन पर कब्जा करके पूरे अफगानिस्तान पर अपना परचम फहरा दिया.  इसके बाद वार्ता ख़त्म. ऐसा लगता है कि यह वार्ता शायद तालिबान को अफगानिस्तान पर  विजय सुनिश्चित करने के लिए ही  आयोजित की गई थी. किसी भी मुस्लिम देश ने इस पर कोई भी विपरीत प्रतिक्रिया नहीं दी है,   तो क्या यह समझा जाए  कि पूरा इस्लामिक जगत तालिबान के  अफगानिस्तान पर कब्जे का समर्थन करता है?  


 जैसा कि  हमेशा होता आया है, संयुक्त राष्ट्र संघ जो  पूरे विश्व का  मुखिया है वह देखता ही रह गया और देखता ही  रहेगा. 

  • क्या संयुक्त राष्ट्र संघ   केवल भाषण देने की जगह  भर रह गया है?  
  • यदि कोई  आतंकवादी संगठन  किसी  देश  पर  आक्रमण करके कब्जा  कर ले  तो क्या संयुक्त राष्ट्र संघ तमाशा देखता रहेगा?  
  • उस राष्ट्र के नागरिकों के मानवाधिकार का क्या होगा  जिसकी संयुक्त राष्ट्र संघ बार-बार दुहाई देता रहता है?
  •  जो भी हो  संयुक्त राष्ट्र संघ  अपनी भूमिका का सही  सही निर्वहन  नहीं  कर रहा है  और न ही मानवता के प्रति कोई  सदाशयता ही  दिखा रहा है? फिर क्या औचित्य  है ऐसे वैश्विक संगठन का? 


ज्यादातर शक्तिशाली देश अपने राजनयिकों और नागरिकों को अफगानिस्तान से निकालने में जुट गए हैं,जिससे स्पष्ट है  कि  अपने देश के नागरिकों के लिए तो वह  अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं  लेकिन  अफगान नागरिकों के लिए उनके मन में कोई दर्द  और पीड़ा नहीं है जिसका मतलब साफ़  है कि उनका मानवता से कोई लेना देना नहीं है. 

 

 अफगानिस्तान के  समृद्ध  और सक्षम लोग पहले ही भाग चुके थे और  बचे हुए लोगों में जो लोग  देश छोड़ सकते हैं,  वह जहां कहीं संभव है भाग रहे हैं.  जिनके पास कोई विकल्प नहीं है वह तालिबान का स्वागत कर रहे हैं और उनके समर्थन में तालियां बजा रहे हैं. 

                       https://twitter.com/i/status/1427204278695997442



  • एक सवाल यह भी उठता है  कि केवल 70 हजार  आतंकवादियों के दम पर तालिबान ने अमेरिका और नाटो सैनिकों द्वारा प्रशिक्षित लाखों सैनिको वाली अफगान सेना को बिना लडे ही  आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर  कैसे कर दिया? 

  • क्या अफगान सेना और सरकार में तालिबान समर्थित लोग थे? 

  • क्या अफगानिस्तान का एक बहुत बड़ा  वर्ग  तालिबान  की मानसिकता के अत्यंत नजदीक है?  


इन सभी प्रश्नों का उत्तर  हम सभी को  ढूंढना होगा.   


पूरा घटनाक्रम ऐसा लग रहा है  जो शायद  1000 वर्ष पहले भारत में  हुआ होगा ,  आक्रमणकारी आंधी की तरह आते थे और तूफान की तरह विजयी  हो जाते थे,  कुछ भारतीय राजा  लड़ते थे और कुछ  बिना लडे  ही   पराजय स्वीकार कर लेते थे और बड़ी संख्या में लोग  तमाशबीन होते थे या  आक्रमणकारियों का  स्वागत करते थे.  


तालिबान का दोबारा अफगानिस्तान पर कब्जा लगभग 20 साल बाद हुआ है और इन 20 सालों में अमेरिका   के नेतृत्व में नाटो की सेनाएं अफगानिस्तान में रहीं  और उन्होंने तालिबान को रोके  भी रखा और   अफगान सेनाओं को भविष्य  मैं तालिबान की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रशिक्षित भी किया.  सबसे आश्चर्यजनक घटना क्रम  यह रहा कि तालिबान को  पूरे अफगानिस्तान में  कहीं भी  बहुत ज्यादा प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा  और  उसकी सबसे आसान  विजय काबुल पर  रही जहां  अफगान राष्ट्रपति  अशरफ गनी  स्वयं  भाग खड़े हुए . उनके जहाज को तजाकिस्तान ने  तालिबान के दबाव में  ने अपने यहां उतरने की  अनुमति नहीं दी.  बताया जा रहा है कि वह अब अमेरिका जाएंगे. 


 तालिबान वस्तुत:  एक आतंकवादी संगठन है, जिसने 20 वर्ष पहले भी अफगानिस्तान पर कब्जा करके   अमानुषिक  कानून लागू कर लोगों पर  भयानक  अत्याचार किए थे.  आज इतने साल  बाद भी तालिबान न केवल  मौजूद है बल्कि पहले से ज्यादा शक्तिशाली भी है.   


  • कौन हैं इसके पीछे ? 

  • कौन   इन्हें  टैंक, बख्तरबंद गाड़ियां  और अत्याधुनिक हथियार  देता है? 

  • कौन इनकी फंडिंग करता है? 

यह समझना मुश्किल नहीं 


सबसे बड़ी बात अमेरिका ने तालिबान से वार्ता की थी  और उसके बाद ही अफगानिस्तान छोड़ने का फैसला किया था. 


क्या तालिबान का कब्जा अमेरिका की डील का एक हिस्सा है?   


हो सकता है  कि  इसके बारे में अफगान  सेना के उच्चाधिकारियों को मालूम  था इसीलिए तालिबान आतंकवादियों का कोई प्रतिरोध नहीं हुआ और सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया. 


यह सही है कि अफगानिस्तान में  बने रहना अमेरिका के लिए आर्थिक रूप से बहुत बड़ा बोझ था,  लेकिन अचानक  अफगानिस्तान की जनता को उसके हाल पर छोड़ देना क्या  धोखा देने जैसा नहीं है? क्या अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के लिए नैतिक रूप से यह सही कदम है?


काफी समय  तक अमेरिका के राष्ट्रपति बिडेन इस पर  मौन रहे जिससे संदेह गहरा गया किन्तु जब उन्होंने मुह खोला तो ऐसा लगा कि किसी छोटे गरीब देश का स्वार्थी राजनयिक बोल रहा हो. उन्होंने कहा कि अमेरिका का उद्देश्य अफगानिस्तान का पुनर्निर्माण करना कभी नहीं था और न ही अमेरिका  वहां जबाबी कार्यवाही के लिए था. हम वहां आतंकवाद के मुकाबले के लिए थे और वह पूरा हो गया था.  उन्होंने यह भी जोड़ा कि सैनिको को वापस बुलाने का फैसला भी ट्रम्प का था. इससे अमेरिका की अफगानिस्तान में हुई हार, १९७५ में विएतनाम में हुई हार से भी ज्यादा अपमान जनक और शर्मनाक बन  गयी.       

ऐसी हालत में बेचारे अफगान नागरिक जो तालिबान के समर्थक नहीं  हैं,  मजबूरी में  यदि तालिबान का समर्थन करें तो इसमें क्या आश्चर्य होगा?   

   

पिछले तालिबान शासन में  सबसे ज्यादा  अत्याचार महिलाओं पर हुए थे और वह फिर शुरू हो गए हैं.  राज्यों पर कब्जा करते समय ही तालिबान आतंकियों ने अफगान  पुलिस और सरकारी कर्मचारियों से  घर की 15 वर्ष से 45 वर्ष की महिलाओं को  सौंप देने का हुक्म सुनाया था.  स्थानीय मस्जिदों से  लाउडस्पीकर द्वारा जनता से भी यही आग्रह किया गया था. अभी तो शुरुआत है लेकिन यह भी एक तथ्य है कि  काबुल हवाई अड्डे पर भागने के लिए पुरुष तो है लेकिन  महिलायें नहीं हैं. क्यों? कहाँ गयी अफगान महिलायें? ज्यदातर टीवी चैनेल ने अपने यहाँ से महिला एंकर और कर्मचारियों  को हटा दिया है या वे बुर्के में बुरी  तरह लिपटी हैं.     

 जहां तक भारत का प्रश्न है,  उसने अफगानिस्तान की पुनर्रचना में  लगभग  तीन अरब  डॉलर  का निवेश किया है  और  और इस समय ४०० से अधिक बड़ी परियोजनाओं पर  भारत काम कर रहा है.  अब उसके न केवल  इस  निवेश पर संकट के बादल गहरा गए  हैं,  बल्कि चाबहार पोर्ट से अफगानिस्तान को जोड़ने और  अफगानिस्तान के  माध्यम से पश्चिम एशिया  में  व्यापारिक  सामान  की पहुंच बनाने का सपना  अधर में लटक गया है.  यद्यपि तालिबान ने कहा है  कि अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत ने बहुत अच्छा काम किया है और उसे  चिंतित होने  की आवश्यकता नहीं है  लेकिन यदि उसने सैन्य मामलों में हस्तक्षेप किया तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा.  


भारत ने  कभी भी तालिबान को मान्यता नहीं दी  और तालिबान ने कभी इसके लिए प्रयास भी नहीं किया बल्कि इसके विपरीत वह  आतंक का पर्याय बनने के लिए मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ता रहा.  उसके पाकिस्तान की सरकारों से बेहद मधुर संबंध रहे और उनकी आड़ में भारत में भी आतंकवादी गतिविधियों को प्रश्रय देता रहा. 


बदले  माहौल में पाकिस्तान ने अफगानिस्तान  में  स्थिरता लाने के लिए  नई सरकार को हर संभव सहायता देने का बिना मांगे वचन दे दिया है  और उसके एक अन्य दोस्त टर्की ने भी कहा है कि वे पाकिस्तान के साथ मिलकर अफगानिस्तान को हर संभव सहायता देगा. तालिबान खान के नाम से मशहूर हो रहे इमरान ने तालिबान कब्जे करने को अफगानिस्तान का स्वतन्त्र होना बताया. रूस और चीन ने ने भी कहा है  कि काबुल पहले से बेहतर है.   ये सब तालिबान को  सकारात्मक संदेश 


सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि ऐसे समय में तालिबान  रूस और चीन को भरोसे में लेकर कदम बढ़ा रहा है लेकिन भारत से अभी तक कोई भी ऐसी पहल नहीं की है


 निवेश के अलावा भारत के लिए दूसरा सबसे बड़ा चिंता का कारण है शरणार्थियों की समस्या जो पाकिस्तान के रास्ते भारत में  प्रवेश कर सकते हैं.  भारत में पहले ही बड़ी संख्या में अफगान लोग हैं  इनमें विद्यार्थी व्यापारी और अन्य लोग शामिल है जिन्होंने वीजा बढ़ाने के लिए आवेदन कर रखा है.  अफरातफरी के माहौल में भारत सरकार पर अफगानिस्तान से हिंदू और सिखों को वापस लाने का  नैतिक  दबाव  भी बढ़ता जा रहा है. 

 

एक तीसरा कारण  है  कि यदि नई तालिबान सरकार  और पाकिस्तान चीन के मधुर संबंध बनते हैं  तो भारत न  केवल सामरिक दृष्टि से पिछड़ जाएगा बल्कि  उस पर  तालिबान आतंकियों का  दबाव भी बढ़ सकता है  क्योंकि  तालिबान आतंकवादी  अफगानिस्तान पर कब्जा करने का  टारगेट पूरा करने के बाद खाली नहीं  बैठेंगे और वह  दूसरा टारगेट  बनाएंगे जो गजवा ए हिंद भी हो सकता है.  



आज जब भारत में काफी लोग  लोग तालिबान के समर्थन में खड़े हो गए हैं तो कल्पना करिए  कि यदि  महमूद गजनवी की तरह तालिबान भारत पर आक्रमण कर देता है तो कितने लोग तालिबान के समर्थन में खड़े हो जायेंगे? 

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

- शिव मिश्रा


देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...