शनिवार, 25 अप्रैल 2015

संसार के सौ शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी नहीं .....

प्रतिष्ठित टाइम्स अखबार की  हायर एजुकेशन मैगज़ीन ने अभी हाल  ही में संसार के ऐसे सौ सर्वश्रेष्ठ  विश्वविद्यालयों की सूची बनाई जिनकी स्थापना ५० वर्ष के भीतर हुई है . दुर्भाग्य से भारत का कोई भी विश्वविद्यालय इस सूची में स्थान नहीं पा सका। ये बड़ी हैरानी की बात है परंतु इसका अर्थ ये नहीं है की सूची बनाने में  भारत के साथ कोई भेदभाव किया गया . इसमें २८ देशो के विश्वविद्यालय शामिल हैं किन्तु भारत के अलावा चीन और रूस का नाम भी गायब है .
 
 समूचे विश्व में हाल  के वर्षों में पढाई  के तौर तरीको और स्तर  में बहुत अंतर आया है  तुलनात्मक रूप से छोटे छोटे देशो ने अध्ययन अध्यापन के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल की है हमारा देश  बी टी सी और बी ऐड जैसे कोर्सों के साथ संघर्ष रत है  और प्राइमरी शिक्षा सुधारने  हेतु फैक्ट्री मॉडल पर शिक्षक उत्पन्न कर रहा है . प्राइमरी शिक्षा की दशा सुधरने की बजाय दिन प्रति दिन बिगडती जा रही है . स्वयं शिक्षको की माने तो उन्हें मुफ्त के तनख्वाह मिल रही है और घर के पास पोस्टिंग  . उनके पास अगर जन गणना  , चुनाव , मतदाता सूची निर्माण जैसे कार्य यदि न हों तो  वे निश्कोच कह सकते है की उनके पास कोई भी काम नहीं है . इस स्थिति ने प्राइमरी अध्यापक की नौकरी के लिए इतना अधिक आकर्षण पैदा कर दिया है कि  बी टेक , एम् टेक , एम् बी ए  आदि  बड़ी संख्या में  युवक इस अध्यापन की भीड़ में शामिल हो रहे हैं .
 
कोई भी विश्वविद्यालय या इंजीनियरिंग कॉलेज भारत में ऐसा नहीं है जहाँ के डिग्री धारको को कोई कंपनी नियुक्त करके सीधे या सामान्य  ट्रेनिंग करवा कर  काम पर लगा सके . उन्हें लम्बी ट्रेनिंग देनी होती है . यह प्रदर्शित करता है की उद्योग और विश्वविद्यालयों में कोई समन्वय नहीं है  मैकाले की शिक्षा  पद्धति को हम चाहे कितना भी दोष क्यों न दें  किन्तु  नए ज़माने की प्रोफेशनल कोर्सेज भी मैकाले की रह पर चल निकले हैं . शिक्षा के निजीकरण से ज्यादातर देशों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार  हुआ है . शायद भारत इसका अपवाद है जहाँ  निजीकरण से इस क्षेत्र को सिर्फ उद्योग धंधे की तरह चलाया जा  रहा है  बिना किसी क्वालिटी कण्ट्रोल के  इसमें निरंतर गिरावट होती जा रही है .
 
कालेजो और विश्वविद्यालयों से डिग्री लेने के बाद शायद ही कोई अत्यंत मेधावी छात्र  हो जो बिना कोचिंग के कोई भी  प्रतियोगिता  पास कर सके . चाहे  ये  प्रतियोगिता किसी नैकरी के लिए हो या फिर किसी दूसरे कोर्स में प्रवेश के लिए हो . इसी कारण कोचिंग व्यवसाय ने समान्तर बड़े उद्योग का रूप धारण कर लिया है . इससे निजात पाने का कोई साधारण तरीका ढूदना बहुत मुश्किल है .
 
कुछ विश्वविद्यालयो ने बी ए , बी कॉम  जैसी साधारण डिग्रियों के लिए ४ साल का समय कर दिया है . इसके पक्ष विपक्ष में बहुत तर्क दिए जा रहे हैं  परन्तु ये समय की बर्बादी के अतरिक्त और कुछ नहीं है . अभी बहुत वर्ष नहीं हुए जब इसका समय २ से बढ़ा कर ३ वर्ष किया गया था। इस २ साल की डिग्री करके बहुत से लोग वैज्ञानिक , प्रशासन  और प्रबंधन के उच्च पदों पर उत्कृष्टता से काम  कर रहे हैं .
 
खैर , भारत का कोई भी विश्वविद्यालय  इन सौ शीर्ष विश्वविद्यालयों की सूची में क्यों नहीं आ पाया ? ये विचारणीय विषय है . संभवता निम्न  मुख्य कारण  है .
 
- विश्वविद्यालयो की कमजोर आर्थिक स्थित 
- पाठ्यक्रम में कमी 
- शिक्षण की गुणवत्ता में कमी 
- अनुशासन का अभाव  
-शिक्षको की क्षमता  और संख्या में कमी 
-मूलभूत सुविधाओं का अभाव 
-व्योहारिकता का अभाव  
-समय के साथ बदलाव का अभाव 
-उपयोगिता  और रोजगार पूरकता का अभाव 
 
 
टाइम्स मागज़ीन द्वारा प्रकाशित सूची  निम्नवत है .
 

THE 100 Under 50 universities 2012

1
Republic of Korea
71.8
2
Switzerland
66.2
3
Hong Kong
63.0
4
United States
60.0
5
Republic of Korea
58.6
6
France
56.3
7
United States
56.0
8
United Kingdom
55.7
9
United Kingdom
53.6
10
United Kingdom
51.0
11
United States
48.7
12
Hong Kong
48.5
13
United Kingdom
48.1
14
Germany
47.7
15
France
46.8
16
Singapore
46.0
17
Spain
45.7
18
Hong Kong
45.5
19
Netherlands
44.9
20
United Kingdom
44.7
21
United States
44.6
22
Germany
43.3
23
Sweden
42.1
24
Spain
41.7
25
Italy
41.1
26
Germany
40.7
27
Sweden
40.6
28
Canada
40.4
29
United States
40.3
30
Canada
40.0
30
Taiwan
40.0
32
Turkey
38.9
33
Australia
38.5
33
Australia
38.5
35
United Kingdom
38.4
36
Denmark
37.8
37
Italy
37.5
37
United Kingdom
37.5
39
Japan
37.1
40
Australia
37.0
41
Austria
36.8
42
Germany
36.5
43
Norway
36.2
44
Brazil
35.9
45
Australia
35.8
46
France
35.4
46
Hong Kong
35.4
48
Australia
35.3
49
Spain
34.9
50
Greece
34.5
50
United Kingdom
34.5
50
Canada
34.5
53
United States
34.4
54
Finland
34.3
55
Taiwan
33.5
56
United Kingdom
33.4
57
United States
33.0
58
New Zealand
32.4
59
Sweden
32.3
60
United Kingdom
32.2
61
United Kingdom
31.9
62
United Kingdom
31.1
63
United States
30.8
64
Republic of Ireland
30.1
65
Australia
29.9
66
Portugal
29.8
67
Denmark
29.7
68
Iran
29.2
69
United Kingdom
27.9
70
Taiwan
27.8
71
United Kingdom
27.7
72
United Kingdom
27.6
72
United Kingdom
27.6
74
Spain
27.1
75
France
26.6
75
Australia
26.6
77
New Zealand
26.4
78
Australia
26.1
78
Australia
26.1
80
United Kingdom
25.9
81
Australia
25.1
81
Australia
25.1
83
United Kingdom
24.9
84
United States
24.7
85
Portugal
24.6
86
Ireland
23.9
86
Spain
23.9
88
Australia
23.4
89
Taiwan
23.3
90
United Kingdom
22.9
91
Canada
22.6
92
United Kingdom
22.4
93
Australia
22.1
94
Saudi Arabia
21.8
95
Taiwan
21.7
96
Egypt
21.0
97
Ireland
20.3
98
Malaysia
20.0
99
Brazil
19.9
100
Australia
19.8
***************************************************************************
                                                                                           - शिव प्रकाश मिश्रा 
     हमारा                                                                                      http://shivemishra.blogspot.com
 

आप, हम, किसान और राजनीति

अभी हमने देखा और  सुना कि  दिल्ली में हुयी एक  रैली में एक किसान ने आत्म ह्त्या कर ली।  कई दिन से सारे टीवी चैनलो  पर खबर छाई  है. आज ऐसा वातावरण बना हुआ है की कोई भी अच्छी और रचनात्मक खबर समाचार पत्रो और  टीवी पर जगह नहीं पा  सकती है किन्तु असामान्य खबरे  मीडिया में   छाई  रह सकती हैं।  इसका  सीधा प्रभाव  ये होता है कि लोगों को लगता है कि कुछ ऐसा किया जाय जिस से मीडिया में जगह पा  सकें।  स्वाभाविक है  है कि इसके साइड इफेक्ट तो होंगे ही  वो अच्छे हों या बुरे।  दिल्ली में निर्भया कांड ने सभी को झकझोर दिया था  लेकिन क्या इससे पहले इतने बीभत्स कांड नहीं हुए ? बहुत हुए।  फूलन देवी के साथ हुयी घटना, जिसे ज्यादातर लोग फूलन पर बनी फिल्म के माध्यम से ही जानते हैं, कितनी दुर्दांत घटना थी।  वास्तव में इससे भी अधिक भयानक घटनाये घट चुकी हैं और आगे भी होती रहेंगी क्योकि मानवीय मूल्यों के गिरावट की कोई सीमा नहीं होती है।  जितना ख़राब से ख़राब कोई व्यक्ति सोच सकता है उतना कर भी सकता है। दिल्ली में होने के कारण निर्भया कांड को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया  में बहुत कवरेज  मिला।  महीनों टीवी, रेडियो और समाचार पत्रों में ये कांड गूंजता रहा।  हर अच्छे और बुरे व्यक्ति ने इसे अपनी अपनी तरह अपनाया । लेकिन काफी समय तक बलात्कार की क्रूरता पूर्ण घटनाओं की पूरे देश में जैसे बाढ़ आ गयी। कहते है कि बदनाम होंगे  तो भी तो नाम होगा।  कुत्सित मानसिकता के लोगों ने बेहद निम्न स्तरीय बदले की भावना  से और घ्रणित प्रचार  पाने की लालसा कितने ही अजीबोगारीब  तरीके से बलात्कार की घटनाओं को अंजाम दिया।  आज किसानो की आत्महत्या का पूरा माहौल बना है।  जितना मीडिया कवरेज मिल रहा है  उतनी ही घटनाएं सामने आ रही हैं।  मेरा ये कहने का मतलब नहीं है कि इन सबके लिए मीडिया जिम्मेदार है लेकिन असामान्य घटनाओं को सबसे पहले, सबसे निर्भीक  और सबसे तेज रिपोर्ट करने की होड़ या अंधी दौड़ ने कहीं न कहीं इन घटनाओं में उत्प्रेरण का काम किया है।

दिल्ली  की रैली में गजेन्द्र सिंह की आत्म ह्त्या भी एक कृतिम असामान्य घटना  गढ़ने की प्रक्रिया में हुआ हादसा है। अब ये छिपी बात नहीं है कि गजेन्द्र सिंह पूर्णतया  किसान नहीं थे, केवल उनका सम्बन्ध एक गाँव से था और ग्रामीण थे।  न तो उनकी आर्थिक स्थिति ख़राब थी और न ही उनके पिताजी ने उन्हें घर से निकाला था. फिर उनके सुसाइड नोट में जो  संभवता उन्होंने नहीं लिखा था , ये बातें कैसे आ गयी ? किसने और  क्यों डाली   ? उनके घरवालों ने उनकी लिखावट होने से इंकार किया है.

रैली में मुख्यतया दिल्ली और आसपास के लोग थे दुसरे राज्यों से आने वालों की संख्या कम थी।  रैली का टीवी कवरेज भी बहुत नहीं था और कम से कम लाइव कवरेज तो नहीं ही था जो  कुछ नेताओं की चाहत थी।  बस फिर क्या किसी शातिर दिमाग में फितरत कौंधी और आनन् फानन में एक  किसान या किसाननुमा व्यक्ति को तलाश  कर आत्महत्या की  फुल ड्रेस ड्रामा करने की पटकथा लिखी गयी. कुछ टीवी के विडियो फुटेज में सुनायी पड़ रहा है  "सम्भल के"  "ढीला बांधना"  "पकडे रहना" "लटक गया क्या "  आदि आदि इस और इशारा कर रहा है।   बिना रिहर्शल के किये जाने वाले  ड्रामे का जो हाल होता है, वही हुआ. ये  नाटक एक गंभीर हादसे में बदल गया. जो मरने का ड्रामा कर रहा था वह सचमुच मर गया. चूंकि सबको (कम से कम कुछ लोगों  को ) पता  था कि ये नाटक है, इसलिए किसी भी ने सहायता के लिए गंभ्भीर प्रयास नहीं किया।  सब कुछ सामान्य चलता रहा  और भी भाषण भी ।  हिन्दुस्तान के सभी टीवी न्यूज चैनलों ने इस घटना का लगभग सजीव प्रसारण किया किसी भी चैनल के रिपोर्टर या कैमरा मेन ने भी अगर जरा सा मानवीय प्रयास किया होता तो   गजेन्द्र ज़िंदा होते ।  कहते है कि हर एक का अपना अपना रोल  होता है  यहाँ मानवीय सहायता का जिम्मा भी सिर्फ पुलिस को निभाना था बाकी लोगों को अपना कम करना था जैसे  नेताओं को भाषण देना , प्रेस रिपोर्टर्स को  सजीव प्रसारण करना , उपस्थिति लोगों को नेताओं और सुसाइड करने वाले की हौसला अफजाई करना आदि   कई लोगों ने मंच से चिल्ला चिल्ला कर पुलिस से किसान को बचाने की  अपील भी की और वहां उपस्थिति लोगों ने पुलिस को पहुँचने नही दिया। लोगों ने मंच से सुसाइड नोट पढ़ कर सुनाया और अपने विरोधी दलों के नेताओं को मौत का जिम्मेदार बताया उस समय तक मौत की अस्पताल से पुष्टि भी नहीं हुई थी । 

      तो क्या हुआ एक गजेन्द्र सिंह मर गए , …। तो क्या हुआ उसकी बच्चे अनाथ हो गए, ………… तो क्या हुआ उनके मां बाप भाई और बहिनो के आंसू नहीं रूक रहे,  ………। वे  नहीं समझ पा रहे कि  ऐसा क्यों हुआ ?

पर बाकी सबकुछ योजना वद्ध ढंग से हुआ जैसे

  •  रैली का सजीव प्रसारण   

  • सबसे तेज, सबसे आगे और सबसे पहले  की घोषणा  .... टी आर पी  में वृद्धि

  • लगभग हर चैनल पर पैनल डिस्कसन। ……।  पार्टी प्रवक्ताओं को तुरत फुरत काम

  • राजनैतिक नफा नुक्सान का आकलन शुरू। ……।    


कुछ दिनों में सब कुछ सामान्य हो जायेगा असामान्य समाचारों के शिकारी कोई और न्यूज पर टूट पड़ेंगे।  और शायद एक न्यूज अनायास उनके हाथ लग गयी  भूकंप आ रहा है नेपाल में और उत्तरी भारत  में।
                                                                    **************
    
 

सोमवार, 16 जून 2014

एक अटूट रिश्ता ....टूटता सा ...!

मन भटकता है,

रह रह कर ,

कभी यहाँ कभी वहां,

पता नहीं कब ? कब ? कहाँ ? कहाँ ?

बचपन ...और अपने गाँव की नदी के  किनारे..,

घूमते थे जहाँ शाम सबेरे,

और दोस्तों के साथ खेलते थे,

प्यास लगने पर

नदी का पानी पीते थे,

कभी शेर बनकर,

कभी मछली बनकर,  

तो कभी चुल्लू  लगा कर,

नहाते थे दिन में कई कई बार,

छूने, पकड़ने और छिपने के

कितने ही खेल खेलते थे,

नदी के पानी में,

और लोटते थे,

नदी की गोद में फ़ैली बालू में, 

नंगे पाँव चलते थे,

छप छप करते थे,

उथले पानी में,

कितने पिरामिड खड़े किये

बालू में

और कितनी ही आकृतियाँ बनाई,

कितने ही चींटी चींटों को कागज की नाव पर

नदी की सैर कराई,

कितने ही जल युद्ध होते थे,

पानी के थपेड़ों से,

एक दूसरे से,

सरोबोर होते थे हम सभी,

तैरने की  प्रतियोगिताएं भी होती थी कभी कभी,

जीतते थे,

हारते थे,     

पर कभी नहीं थकते थे,

कितने ही खजाने ढूँढ़ते थे ,

हम सब मिलकर,

गोताखोर बनकर , 

डुबकी लगा लगा कर,

सीपी, शंख,रंगीन सुंदर पत्थरों के टुकड़े,

और कुछ पुराने सिक्के मुड़े तुड़े,

आज भी मेरे पास अमानत है,

जो नदी से मेरे बचपन के रिश्ते की विरासत है,

ये हर चीज करती है खुद बयानी,

उस नदी की अनोखी, अनकही कहानी,  

जब बाढ़ आती थी,

लगता था जैसे

हम समुद्र के किनारे बस जाते थे

पानी की हिंसक लहरे,

और आर्तनाद करती भवरें,

दिल में अनगिनत उतार चढाव और कौतूहल भर जाते थे,  

हर रोज हम बाढ़ नापते थे,

और सरकंडे गाड़ कर बाढ़ रोकते थे,

हम इसमें सफल होते थे,

ऐसा मान कर बहुत खुश होते थे,   

पुल नहीं था,

पर गाँव में  किसी को इसका गम नहीं था,

निकसन काका की नाव शायद इसीलिये बनी थी,

जो जरूरतों  की अकेली रोशनी थी,

पैदल हो या साईकिल,

बकरी हो या भेड़

सबको इसकी जरूरत थी,

एक अटूट रिश्ते  से,

हम सब जुड़े थे,

अपने गाँव की इस सुंदर नदी से,

कई दशक बाद आज मै लौटा हूँ

उसी नदी के किनारे,

और ढूड रहा हूँ,

अपने अतीत के रिश्ते की वह कड़ी,

जिसकी नीव थी कभी यहीं पड़ी,

कभी सोचा भी न था कि

समय की सुई इतनी घूम जायेगी,

कि इस रिश्ते की जान पर बन आयेगी,     

मेरे बचपन की ये दोस्त और मेरी ये रिश्तेदार,

कृषकाय हो रही है, 

मलिन हो बीमार हो रही है,  

और सूख रही है

जगह जगह से,

शायद आख़िरी कड़ी भी टूट रही है

इस रिश्ते की

इससे....

हम सबसे .....!

********  

--शिव प्रकाश मिश्रा

  हम हिन्दुस्तानी

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

धन्यवाद


बहुत कृतघता

और विनम्रता से,

मन की ऊंचाइयों और

दिल की गहराइयों से,

मेरा प्रथम धन्यवाद,  

उन व्यक्तियों को,

जिन्होंने मुझे जीवन दिया

और दायित्व ग्रहण किया,

मेरे माता-पिता बनने का,

सौभाग्य मुझे दिया,

संतान बनने का,

रिश्तों का बोध दिलाया,

माँ की महानता और

बाप की विशालता

का अहसास कराया,

पालन पोषण किया,

और वह सब कुछ दिया ,

मेरे विचार मे,

जो चाहिए था,

एक अबोध अजनबी अनजान को,

इस संसार मे॰  

ममता, प्यार, दुलार,

भाषा और संस्कार,

मानव मूल्य, शिक्षा और सुविचार,

और दिया पूरा घर संसार ॰   

 

धन्यवाद !

मेरे पितामहों, प्रपितामहों और पूर्वजों को भी,

जिनके अंश है मुझमे

और  मेरी संरचना में भी,

और रोम रोम मे हैं साकार,

उनके  

वैज्ञानिक आविष्कार ,

विकाश के प्रयासों की आधारशिला,

जीवन के सूत्र और जीने की कला,

शक्ति, सामर्थ्य और ईश्वर मे आस्था,

प्रकृति से संबंध और धार्मिक व्यवस्था ,

उनकी

सनातन परंपरा अक्षुण्ण और ज्वलंत है,

और आज भी


हम सब के अंदर जीवंत है ॰॰

 

धन्यवाद !

परमात्मा का,

ईश्वर का,

या उस अदृश्य शक्ति का, 

जिसने हमें वह सब कुछ दिया,

जो कल्पना से परे है,

ये गंगा सी निर्मल, पावन नदियां,

मनमोहक, मनोरम, स्वर्गसम वादियाँ, 

ये बादल, ये झरने,

ये असीमित आसमान,

ये हिमालय से पर्वत,

ये मरुस्थल और रेगिस्तान

ये सर्दी, ये गर्मी, ये वर्षा और बसंत,

ये फल, ये फूल, ये पत्ते और अनंत,

ये सूर्य की रोशनी

और चन्दा की चाँदनी,

ये सितारों का उपवन

जैसे  झिलमिल छावनी,

ये मनमोहक छटाये,  

मलयागिरि से आती 

सुंदर सुरभि हवाएँ,

और सावन की घटाएँ,   

ये फूलों से पटी घाटियां,  

फलों से लदी डालियाँ

ये संजीवनी वनस्पतियाँ,

ये अनोखे दुर्लभ जीव जन्तु

अनगिनत खनिज, अनमोल रत्न,

और ये लहलहाती फसलें,

कहने को हम कुछ भी कह लें,

पर  माँ की तरह

सबका पालन करती है

ये अपनी पृथ्वी,

धारण करती है

अपने आँचल में   

पर्वत  की ऊंचाई

और

सागर की गहराई

मेरे लिए ,

हम सब के लिए,

और समूची मानवता के लिए,

बहुत बहुत धन्यवाद !

इसके लिए ॰॰॰  

 

काश !

सब को हो इसका अहसास ,

कि

कितना कुछ है खास,

हम सबके पास,

पर हम भटकते है मृग की तरह,

उन कामनाओं के लिए

जीवन मे जिंनका कोई अंत नहीं,

खोजते हैं तृष्णा के रास्ते ,

और होते संतुष्ट नहीं ॰

शोक करते हैं, उसके लिए,

जो होता नहीं हमारे लिए,

निर्धारित,     

क्यों बनते हैं हम ?

इतने कृतघ्न, अशिष्ट और अमर्यादित


कि

धन्यवाद !

भी नहीं देते उसको,

जिसने इतना कुछ दिया है,

और बदले में कुछ भी नहीं लिया है ॰

भूख का महत्व हो सकता है,

जीवन के लिए,

पर जीवन क्यों अपरिहार्य हो ?

भूख के लिए ॰

हमें खुश रहना सीखना चाहिए,

जो मिला है, पर्याप्त भले न हो,

पर कम नहीं है, जानना चाहिए,

हम पूर्ण संतुष्ट भले न हों,    

पर जो कुछ भी मिला है हमें

उसके लिए,

ईश्वर को  

धन्यवाद !

तो देना चाहिए ॰ ॰ ॰ ॰


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- शिव प्रकाश मिश्रा
 

देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था

भारत का राष्ट्रान्तरण: देश में वह शुरू हो गया, जो १५ वर्ष बाद होना था || विकसित भारत या विकसित इस्लामिक राष्ट्र? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ल...