सोमवार, 6 अप्रैल 2026

राष्ट्र शर्मसार है मोदी की ममता से

 


बंगाल ही नहीं, संपूर्ण राष्ट्र शर्मसार है मोदी की ममता से || किसकी हठधर्मिता और किसकी विवशता ? आज की स्थिति का कौन जिम्मेदार?


लोकतंत्र के दुर्ग में दरकती दीवारें

पश्चिम बंगाल, जिसे कभी अपनी बौद्धिक चेतना और सांस्कृतिक शुचिता के लिए "भारतीय पुनर्जागरण का केंद्र" माना जाता था, आज राजनीतिक हिंसा और प्रशासनिक पतन के एक अंतहीन भंवर में फंसा हुआ है। वर्तमान परिदृश्य में यह प्रश्न उठाना अनिवार्य हो गया है कि क्या बंगाल में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसके लिए केवल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का प्रशासन उत्तरदायी है, या फिर केंद्र की मोदी सरकार भी अपनी 'मौन सहमति' या 'रणनीतिक विवशता' के कारण परोक्ष रूप से जिम्मेदार है? एक संघीय ढांचे में जब नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सुरक्षा की धज्जियां उड़ाई जा रही हों, तब केंद्र की निष्क्रियता राष्ट्र की अखंडता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

मालदा की घटना: न्यायपालिका बंधक

हाल ही में मालदा जिले के कालियाचक क्षेत्र में जो हुआ, वह आधुनिक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक काला अध्याय है। सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश पर मतदाता सूची के विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) के कार्य में संलग्न सात न्यायिक अधिकारियों को, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, दिनदहाड़े एक उन्मादी भीड़ द्वारा बंधक बना लिया गया।

यह घटना केवल एक आपराधिक कृत्य नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर न्यायपालिका की गरिमा पर प्रहार था। कोलकाता उच्च न्यायालय के निरंतर अनुरोधों और हस्तक्षेप के बावजूद, घंटों तक पुलिस और प्रशासन का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी घटनास्थल पर नहीं पहुंचा। यह कर्तव्यहीनता किसी प्रशासनिक चूक का परिणाम नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से उच्च-स्तरीय राजनीतिक दबाव का संकेत देती है। जब सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को स्वयं रात भर जागकर न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष करना पड़े और रात 1 बजे जाकर पुलिस बल मौके पर पहुंचे, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में 'कानून का शासन' नहीं, बल्कि 'शासक का कानून' प्रभावी है।

मतदाता सूची और 'फर्जी मतदाताओं' का सच

एसआईआर (SIR) का कार्य कोई सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी। यह चुनाव आयोग और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायिक अधिकारियों का एक निष्पक्ष प्रयास था ताकि ममता बनर्जी की उन शिकायतों का निस्तारण किया जा सके जिनमें उन्होंने आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाया था। किंतु जब इन अधिकारियों ने काम शुरू किया, तो वे 'खिसियाहट' और 'हिंसा' का शिकार हुए।

इस हिंसा का मूल कारण गहरा है। न्यायिक अधिकारियों की उपस्थिति ने उस 'फर्जी मतदाता' नेटवर्क के भंडाफोड़ का डर पैदा कर दिया, जिसके दम पर सत्ताधारी दल अपनी जीत सुनिश्चित करता रहा है। यदि मतदाता सूची से संदिग्ध नाम कट जाते, तो वर्तमान सरकार की चुनावी जमीन खिसक सकती थी। इसी असुरक्षा ने उस भीड़ को उकसाया जिसने अधिकारियों के काफिले पर पथराव किया। यह भारतीय लोकतंत्र के निम्नतम स्तर का प्रमाण है।

ऐतिहासिक तुलना: लखनऊ से कोलकाता तक

राजनीतिक पतन का ऐसा ही उदाहरण उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल के दौरान देखा गया था, जब समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ पर "हल्ला बोल" दिया था और मायावती के विरुद्ध "स्टेट गेस्ट हाउस कांड" रचा गया था। किंतु उस समय के राज्यपाल मोतीलाल वोहरा ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सरकार को बर्खास्त करने का साहस दिखाया था। इसके विपरीत, बंगाल की स्थिति यह है कि यहाँ राज्यपाल स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं करते। मालदा की घटना ने सिद्ध कर दिया है कि आगामी चुनाव केवल एक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की जीवित रहने की एक परीक्षा है।

सर्वोच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणी और एनआईए की जांच

स्थिति की भयावहता को देखते हुए, मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने स्वतः संज्ञान लिया। न्यायालय ने इसे 'संवैधानिक व्यवस्था का ध्वस्त होना' करार दिया। मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह सचिव को अवमानना का नोटिस जारी करना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक मशीनरी का किस कदर राजनीतिकरण हो चुका है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक 'योजनाबद्ध और प्रेरित' घटना थी जिसका उद्देश्य न्यायिक मनोबल को तोड़ना था। वर्तमान में, एनआईए (NIA) द्वारा इस मामले की जांच शुरू कर दी गई है, जो इस बात की पुष्टि करती है कि मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और चुनावी शुचिता से जुड़ा है।

केंद्र सरकार की 'रहस्यमयी' चुप्पी

सबसे विचलित करने वाला तथ्य यह है कि चुनाव आयोग द्वारा राज्य के मुख्य सचिव और डीजीपी को बदले जाने के बावजूद, नव-नियुक्त अधिकारी भी उसी 'सिंडिकेट' के अधीन काम करते प्रतीत हो रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि केंद्र सरकार अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का प्रयोग करने से क्यों कतरा रही है?

ममता बनर्जी का एक खास कौशल रहा है—हर हिंसात्मक घटना का दोष विरोधियों पर मढ़ना। अब भी संभावना है कि राज्य की एजेंसियां (CID) इस मामले में हुमायूँ कबीर या असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के लोगों को बलि का बकरा बनाएंगी ताकि मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण को अपने पक्ष में रखा जा सके। केंद्र की मोदी सरकार, जो राष्ट्रवाद के मुद्दे पर मुखर रहती है, बंगाल के मामले में 'मूकदर्शक' क्यों बनी हुई है? क्या यह किसी राजनैतिक लाभ की प्रतीक्षा है या साहस की कमी?


बंगाल में हिंसा की एक लंबी और रक्तरंजित श्रृंखला

बंगाल की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों की इन वीभत्स घटनाओं पर दृष्टि डालना आवश्यक है:

    1. आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज कांड (2024): एक महिला डॉक्टर के साथ कार्यस्थल पर जघन्य बलात्कार और हत्या। प्रशासन का संदिग्ध रवैया और सबूतों के साथ कथित छेड़छाड़।
    2. संदेशखाली हिंसा (2024): महिलाओं का व्यवस्थित यौन उत्पीड़न और शाहजहां शेख जैसे नेताओं द्वारा जमीन हड़पने का संगठित तंत्र।
    3. बोगतुई नरसंहार (2022): महिलाओं और बच्चों सहित 10 लोगों को जिंदा जला देना। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इसे "बर्बर" करार दिया था।
    4. 2021 विधानसभा चुनाव पश्चात हिंसा: चुनाव परिणामों के बाद हुई व्यापक हिंसा, जिसे एनएचआरसी (NHRC) ने राज्य समर्थित करार दिया।
    5. सांप्रदायिक दंगों का सिलसिला: कैनिंग (2013), धुलागढ़ (2016), बसीरहाट (2017) और रिसड़ा (2023) में हुई हिंसा ने यह सिद्ध किया कि तुष्टीकरण की नीति ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है।

घोटालों का 'सिंडिकेट' राज

बंगाल की सत्ता केवल हिंसा के दम पर नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के विशाल तंत्र पर भी टिकी है।

    • शिक्षक भर्ती घोटाला (SSC Scam): मंत्री के घर से करोड़ों की नकदी बरामद होना और हजारों मेधावी छात्रों का भविष्य अंधकार में डालना।
    • शारदा और रोज वैली: लाखों गरीबों की मेहनत की कमाई डकारने वाली पोंजी स्कीमें, जिनके तार सत्ता के गलियारों तक जुड़े पाए गए।

घुसपैठ: राष्ट्र की सुरक्षा पर मंडराता खतरा

ममता बनर्जी ने बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों को अपना वोट बैंक बनाकर जो कीर्तिमान स्थापित किया है, वह कश्मीर के अलगाववाद से भी अधिक घातक सिद्ध हो रहा है। सीमावर्ती जिलों में बदलती जनसांख्यिकी और घुसपैठियों को सरकारी संरक्षण देना देश की एकता और अखंडता के साथ सीधा खिलवाड़ है।

राष्ट्र के प्रति कर्तव्य से विमुख भारतीय राजनीति

प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और यहाँ तक कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का बार-बार अपमान होने के बाद भी केंद्र सरकार का कोई ठोस कदम न उठाना चिंताजनक है। यदि केंद्र केवल राजनीतिक लाभ-हानि के गणित में बंगाल को जलने के लिए छोड़ देता है, तो यह राष्ट्र के प्रति उसके कर्तव्य का उल्लंघन होगा।

बंगाल की अराजकता आज एक 'गेटवे' बन चुकी है—घुसपैठ के लिए, भ्रष्टाचार के लिए और संवैधानिक अवमानना के लिए। अब समय आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर बंगाल में कानून के शासन को पुनः स्थापित किया जाए। यदि आज बंगाल नहीं बचा, तो कल राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। बंगाल का यह संकट केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र की अस्मिता का प्रश्न है।

बंगाल की अराजकता आज एक 'गेटवे' बन चुकी है—घुसपैठ के लिए, भ्रष्टाचार के लिए और संवैधानिक अवमानना के लिए। अब समय आ गया है कि राजनीति से ऊपर उठकर बंगाल में कानून के शासन को पुनः स्थापित किया जाए। यदि आज बंगाल नहीं बचा, तो कल राष्ट्र की एकता को अक्षुण्ण रखना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। बंगाल का यह संकट केवल एक राज्य का संकट नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र की अस्मिता का प्रश्न है।

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