शनिवार, 4 अप्रैल 2026

नकली दलित बनाम असली दलित


 

 

सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय: नकली दलित बनाम असली दलित | 75 साल से हो रही एक धोखाधडी का अंत


“धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे.”


धर्मांतरित होकर ईसाई या मुसलमान बन चुके दलित, अब दलित होने का फायदा नहीं उठा पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उस समय आया है जब पिछले 75 वर्षों से संविधान की अवहेलना करते हुए धर्मांतरण के बाद भी धड़ल्ले से इसका फायदा उठाया जा रहा था। धर्मांतरण के लिए दलित आसान शिकार होते हैं जिन्हें सब्ज बाग़ दिखाया जाता था कि उन्हें जातिगत भेदभाव से छुटकारा मिल सकेगा और साथ ही साथ उन्हें जातिगत आधार पर मिलने वाले आरक्षण तथा अन्य लाभ भी मिलते रहेंगे — यानी आम के आम, गुठलियों के दाम। तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के संरक्षण में पनपा यह गोरखधंधा आज भी केंद्र सरकार की नाक के नीचे हो रहा था।

24 मार्च 2026 को सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट निर्णय सुनाया है, जो सामाजिक और कानूनी दृष्टिकोण से एक बड़ी नजीर है। यह मामला आंध्र प्रदेश के एक ईसाई पादरी, चिंतादा आनंद से जुड़ा था, जिनका जन्म दलित परिवार में हुआ था, लेकिन वे धर्मांतरित होकर ईसाई बन गए थे। उन्होंने जन्म से दलित होने का दावा करते हुए अपने ऊपर हुए कथित हमले के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। पीड़ित पक्ष ने निचली अदालतों और फिर हाईकोर्ट में इसे इस आधार पर चुनौती दी कि ईसाई होने के कारण वे अब अनुसूचित जाति की श्रेणी में नहीं आते।

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जैसे ही कोई व्यक्ति ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, उसका अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। न्यायालय ने संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 का हवाला दिया, जो कहता है कि केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानने वाले ही अनुसूचित जाति के सदस्य माने जा सकते हैं। चूँकि जो व्यक्ति अब ईसाई बन चुका है, इसलिए वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रहा; इसलिए वह एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत सुरक्षा या सरकारी आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

यह निर्णय कई मामलों में ऐतिहासिक है, लेकिन यह गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है कि पिछले 75 वर्षों से संवैधानिक व्यवस्था के साथ की जा रही धोखाधड़ी के लिए कौन जिम्मेदार है — राजनीति, सरकार या सर्वोच्च न्यायालय।

दलितों में समानता के उद्देश्य से की गई आरक्षण की व्यवस्था तथा अन्य संवैधानिक कानूनों का किस हद तक दुरुपयोग हुआ है, बहुत चिंताजनक है। इसमें सबसे अधिक नुकसान असली दलितों का हुआ है, जिनके हक पर ईसाई और मुस्लिम बन चुके नकली दलितों ने डाका डाला है। अगर यह सब नहीं किया गया होता तो उनकी स्थिति आज काफी बेहतर होती।

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज यही नकली दलित यूजीसी मामले में विभिन्न संगठनों के बैनर तले सवर्ण और सामान्य वर्ग से मोर्चा खोल रहे हैं, जिन्हें निहित स्वार्थ वाली हिंदू-विरोधी शक्तियाँ वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध करा कर सामाजिक विद्वेश फैलाने का काम कर रहीं हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने उन सभी संशयों को खत्म कर दिया जहाँ लोग धर्म परिवर्तन के बाद भी जाति प्रमाण पत्र का लाभ लेते थे और ईसाई या मुस्लिम होते हुए भी कागजी दलित बने रहते थे। इस निर्णय के प्रभाव बहुत व्यापक होंगे और इनका सीधा लाभ दलित समुदायों को होगा।

अब ईसाई और मुस्लिम बन चुके दलित सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ नहीं उठा पाएंगे और न ही उन्हें प्रोन्नति के मामले में कोई लाभ मिलेगा। शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के मामले में भी उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिलेगा। अनुसूचित जाति को मिलने वाली तमाम सरकारी रियायतें — जैसे शिक्षण शुल्क में छूट, मुफ्त कोचिंग, नौकरी तथा प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निशुल्क आवेदन और अन्य सरकारी सुविधाएँ — भी इन नकली दलितों को नहीं मिलेंगी। धर्मांतरित नकली दलित उत्पीड़न के मामलों में एससी/एसटी एक्ट के अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट दर्ज नहीं कर पाएंगे। लोकसभा और विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में भी इन नकली दलितों की घुसपैठ बंद हो जाएगी।

अनुसूचित जाति का दर्जा मुख्य रूप से ‘अस्पृश्यता’ की ऐतिहासिक सामाजिक बुराई से जुड़ा है, जिसके लिए संवैधानिक अधिकार 1950 के राष्ट्रपति आदेश (अनुच्छेद 341) द्वारा दिया गया है; इसके अनुसार अनुसूचित जाति का दर्जा केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म के व्यक्तियों को ही मिल सकता है। इसलिए यदि कोई दलित, ईसाई या मुस्लिम बनता है तो वह कानूनन अपनी अनुसूचित जाति की श्रेणी खो देता है।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह नियम अनुसूचित जनजाति पर लागू नहीं होगा, क्योंकि अनुसूचित जनजाति का दर्जा धर्म से नहीं, बल्कि उनकी ‘नृवंशविज्ञान’ और ‘विशिष्ट संस्कृति’ से तय होता है। संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत अनुसूचित जनजाति के निर्धारण के लिए धर्म की कोई शर्त नहीं है। एक आदिवासी व्यक्ति की पहचान उसके रक्तपूर्वजों, विशिष्ट भाषा, रीति-रिवाजों और भौगोलिक अलगाव से होती है। ये गुण धर्म बदलने से नहीं बदलते।

इस संवैधानिक व्यवस्था में भी पिछले दरवाजे से सेंध लगाई जा रही है। झारखंड में भीषण समस्या उत्पन्न हो गयी है जहाँ बांग्लादेशी घुसपैठियों ने स्थानीय आदिवासी महिलाओं से शादियाँ कर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित कर लिया है। उनकी संतानों में नृवंशविज्ञान, एथनिक और सांस्कृतिक पहचान समाप्त हो जाती है, तो उनका अनुसूचित जनजाति बने रहना एक बड़ी धोखाधड़ी है। इसलिए जितनी जल्दी संभव हो सके इस संदर्भ में केंद्र सरकार को उचित संवैधानिक संशोधन करना चाहिए अन्यथा वहां का मूल आदिवासी समूह पूरी तरह समाप्त हो सकता है।

मुस्लिम बन चुके लोगों को वोटों की राजनीति और मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण अनुसूचित जाति की तरह ही, अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ दिया जा रहा है। मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 13 अगस्त 1990 से सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27% आरक्षण की घोषणा की गई थी, जिसे 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने मंजूरी दी थी। अनुसूचित जाति के मामले में 1950 का राष्ट्रपति आदेश इसे केवल हिंदू, सिख और बौद्धों तक सीमित रखता है; लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए इस तरह की कोई स्पष्ट संवैधानिक या कानूनी व्यवस्था नहीं है।

कई राज्य सरकारों ने मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग के कोटे से सरकारी आरक्षण देकर उन्हें लाभान्वित भी कर दिया है। सैयद, शेख, मुगल तथा पठान, जिनकी संख्या कुल मुसलमानों में 10% से भी कम है, को छोड़कर शेष सभी मुसलमानों को पसमांदा कह कर अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया गया है।

यदि एक ही पृष्ठभूमि का कोई व्यक्ति ईसाई होने के बाद अनुसूचित जाति होने का लाभ नहीं ले सकता, तो फिर मुसलमान होने के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग का लाभ कैसे ले सकता है — यह एक बड़ी विसंगति है जिस पर सर्वोच्च न्यायालय को ध्यान देना चाहिए। केंद्र सरकार से इसकी अपेक्षा करना व्यर्थ है क्योंकि भाजपा शासित महाराष्ट्र तथा अन्य राज्यों ने मुसलमानों की अनेक जातियों को पहले ही अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया है।

यह एक यक्ष प्रश्न है। यदि उन्हें बराबरी का हक देने की गारंटी देकर धर्मांतरित करवाया, लेकिन फिर भी उनकी सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ तो फिर धर्मांतरण का उद्देश्य क्या था !

यह व्यवस्था की विसंगति है, या हिंदुओं को उनके ही देश में धर्मांतरित कर दिए जाने का सुनियोजित षड्यंत्र, ताकि भारत का राष्ट्रीयकरण किया जा सके — यह विचारणीय प्रश्न है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नकली दलितों पर दिया गया ऐतिहासिक निर्णय अंतिम नहीं है। इसके विरुद्ध पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है । सरकार भी इस मामले में हस्तक्षेप करके कानून बना सकती है, जैसा कि मोदी सरकार ने एससी/एसटी एक्ट के मामले में किया था।

सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि केंद्र की मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया है, जो यह अध्ययन कर रहा है कि क्या दलित ईसाइयों और दलित मुस्लिमों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाना चाहिए। आयोग को इसी वर्ष अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। यदि आयोग पाता है कि धर्म परिवर्तन के बाद भी इन समुदायों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति में सुधर नहीं हुआ है, तो केंद्र सरकार संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में संशोधन करके हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के साथ ‘ईसाई’ और ‘इस्लाम’ धर्म को भी शामिल करने का प्रावधान कर सकती है; ऐसी स्थिति में न्यायालय का वर्तमान निर्णय स्वतः निष्प्रभावी हो जाएगा।

मोदी सरकार की मंशा कुछ ऐसा करने की प्रतीत भी होती है, अन्यथा इस आयोग के गठन की कोई आवश्यकता नहीं थी। यदि मोदी सरकार ऐसा नहीं भी करती है तो भविष्य की कोई भी सरकार कभी भी इस रिपोर्ट को निकाल कर लागू कर सकती है, जैसा कि बी. पी. सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट के मामले में किया था। इसलिए मोदी सरकार द्वारा गठित वालकृष्णन आयोग की रिपोर्ट विष का बीज साबित होगी।

जो भी हो, नकली दलितों और नकली पिछड़ों के आरक्षित कोटे में शामिल होने का सबसे बड़ा नुकसान अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को उठाना पड़ेगा। इसका एहसास जितनी जल्दी उन्हें हो जाए उतना ही अच्छा है; अन्यथा यह व्यवस्था उनके तथा राष्ट्र दोनों के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगी।

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

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