मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

ईरान-इजरायल / अमेरिका युद्ध के बीच भारत का 'भीतरी' संकट उजागर

 


ईरान-इजरायल / अमेरिका युद्ध के बीच भारत का 'भीतरी' संकट उजागर | अमेरिका का प्रशंसनीय कार्य भी विमर्श का शिकार | इजरायल के बाद भारत पर होगा ईरान का आक्रमण


ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच दो सप्ताह का युद्धविराम भले ही हो गया हो, लेकिन इसे शांति समझना आत्मघाती भूल होगी। यह केवल एक 'विराम' है, अल्प विराम, युद्ध का अंत नहीं। पूरी दुनिया राहत की सांस ले रही है, लेकिन भारत के लिए यह मंथन का समय है। विडंबना देखिए, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वैश्विक और आंतरिक दबाव झेल रहे थे, जब नाटो जैसे संगठन बिखर रहे थे, तब भारत सहित पूरे विश्व में एक अलग तरह का 'युद्ध' लड़ा जा रहा था—नैरेटिव का युद्ध।

यूरोप के कई देशों में बढ़ते सामाजिक ध्रुवीकरण का असर उनकी विदेश नीति पर भी पड़ा। फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और स्पेन जैसे देशों द्वारा अमेरिकी सैन्य अभियानों में प्रत्यक्ष सहयोग से हिचकिचाहट ने नाटो जैसे संगठनों की एकजुटता पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए।

भारत के भीतर 'विदेशी' वफादारी का प्रदर्शन

मानसिक और सामरिक रूप से भारत आज इजरायल के साथ खड़ा है, लेकिन तुष्टिकरण की राजनीति हमें आज भी फिलिस्तीन के पक्ष में खड़े होने को मजबूर करती है। हद तो तब हो गई जब भारतीय मीडिया के एक धड़े ने ट्रंप को 'अस्थिर' बताकर उपहास उड़ाया और ईरान को ऐसे पेश किया जैसे उसने किसी 'सुपरपावर' को घुटने पर ला दिया हो।

जब पाकिस्तान की मध्यस्थता की खबरें आईं, तो भारत की विदेश नीति को 'विफल' बताने वालों की बाढ़ आ गई। असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं ने तो इसे प्रधानमंत्री मोदी की 'गलती' बता दिया। क्या यह विडंबना नहीं है कि जब देश का नेतृत्व वैश्विक संकट में कूटनीति कर रहा हो, तब देश के भीतर ही कुछ लोग विदेशी ताकतों के पक्ष में बैटिंग कर रहे हों?

लखनऊ से कश्मीर तक: वफादारी का 'ईरानी' टेस्ट

हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता के प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही का लखनऊ और कश्मीर दौरा कई सवाल खड़े करता है। प्रश्न यह है कि समर्थन सरकार से मांगा जाता है या किसी विशेष समुदाय के नागरिकों से? कश्मीर में ईरान के समर्थन में हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए। क्या इसे 'राष्ट्रभक्ति' की श्रेणी में रखा जा सकता है? बिल्कुल नहीं। जब देश की घोषित विदेश नीति के विपरीत जाकर प्रदर्शन किए जाएं और देश विरोधी नारे लगें, तो वह स्पष्ट रूप से राष्ट्रद्रोह है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि भारतीय महिलाओं ने अपने गहने-जेवर तक ईरान की युद्ध सहायता के लिए दान कर दिए। समुदाय ने ईरान के लिए चंदा इकठ्ठा किया ताकि युद्ध के लिए धन की कमी न हो।

सोचने वाली बात है कि जिस धन का उपयोग भारत की प्रगति में होना चाहिए था, वह एक विदेशी युद्ध की आग सुलझाने के लिए भेजा जा रहा है। क्या इन लोगों की प्राथमिकता भारत है या उनकी धार्मिक पहचान?

यूरोप का 'इस्लामीकरण' और भारत को चेतावनी

आज जो सांप्रदायिक समस्या भारत झेल रहा है, वही आग अब यूरोप (फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, स्पेन) में भी लग चुकी है। अवैध घुसपैठियों ने इन देशों के जनसांख्यिकीय ढांचे को इतना बिगाड़ दिया है कि वहां की सरकारें अब नाटो का साथ देने से भी डर रही हैं। तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति ने नाटो जैसे सशक्त संगठन में दरार डाल दी है। यह भारत के लिए एक कड़ा सबक है—यदि समय रहते जनसांख्यिकीय असंतुलन और अवैध घुसपैठ को नहीं रोका गया, तो भारत की विदेश नीति भी 'भीतरी दबाव' की बंधक बन कर तुष्टिकरण की भेंट चढ़ जाएगी, जैसा कि पहले होता था।

नैरेटिव का खेल: जब 'मक्का' से ऊपर कट्टरपंथ हो गया

ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे मुस्लिम देशों पर मिसाइलें दागीं, लेकिन दुनिया भर का कट्टरपंथी तबका फिर भी ईरान के साथ खड़ा रहा। क्यों? क्योंकि इस्लामिक नैरेटिव का मूल मंत्र ही यही है—जो सबसे कट्टर होगा, समर्थन उसे ही मिलेगा। मस्जिदों की तकरीरों के माध्यम से पूरी दुनिया में यह नैरेटिव फैला दिया है कि वह इस्लाम का रक्षक है, इसलिए उस पर युद्ध थोपा गया है। और इसी नैरेटिव के जाल में फंसकर कई देशों के नागरिक अपनी ही चुनी हुई सरकारों के खिलाफ खड़े हो गए।

ईरान ने स्वयं को फ़िलिस्तीन के समर्थन में अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित किया है और हमास तथा हिज़बुल्लाह जैसे संगठनों के प्रति उसके रुख ने इस संघर्ष को और जटिल बनाया है। यदि ईरान इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार कर ले और इन संगठनों को समर्थन देना बंद कर दे, तो संघर्ष की तीव्रता कम हो सकती है—परंतु वर्तमान परिस्थितियाँ इसके विपरीत संकेत देती हैं।

प्राचीन परसिया से आधुनिक शरिया तक: एक सभ्यता का पतन

ईरान के लोग अपनी भूमि को हमेशा से 'ईरान' ही कहते थे। यह शब्द प्राचीन अवेस्तन भाषा के 'ऐर्यानाम' से निकला है, जिसका अर्थ है "आर्यों की भूमि"। सासैनियन राजाओं के समय तीसरी शताब्दी ईस्वी के शिलालेखों में भी इस देश को 'ईरान-शह्र' अर्थात आर्यों का साम्राज्य, कहा गया है। ईरान को कभी 'परसिया' भी कहा गया लेकिन यह एक महान प्राचीन संस्कृति थी जो भारत से विशेष रूप से जुडी थी। हम 'देव' पूजक थे, वे 'अहुर' (असुर) पूजक थे, दोनों ही मूर्तिपूजक और प्रकृति पूजक थे। लेकिन इस्लामिक आक्रांताओं ने उस महान सभ्यता को निगल लिया।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने उसे एक कट्टर शरिया राष्ट्र बना दिया। जिसमे कितना बड़ा नरसंहार किया गया, ये आज शायद ही किसी को याद हो। इसके बाद ही अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाये जो आज तक चले आ रहे हैं। क्या अमेरिका का यह कदम गलत था? इस्लामिक आक्रमणों ने दुनिया की कई सभ्यताओं को निगल लिया और जो मौत के मुँह से निकलकर बची, यहूदी उनमें से एक है । आज इजरायल उसी कट्टरपंथ के खिलाफ अपनी संप्रभुता की लड़ाई लड़ रहा है। यहूदी अपनी ही जमीन पर अस्तित्व बचाने को संघर्ष कर रहे हैं, जबकि ईरान ने हमास और हिजबुल्लाह जैसे आतंकी पालकर उन्हें मिटाने की कसम खाई है। इजराइल के बाद गजवा-ए-हिन्द को वैश्विक धार्मिक नारा नहीं दिया जाएगा, इस ओर से आँखे बंद नहीं की जा सकती ।

भारत के लिए सीधा खतरा: क्या हम अगला निशाना हैं?

भारत के लिए सीधा खतरा: क्या हम अगला निशाना हैं?

ईरान के सर्वोच्च नेता खामनेई ने बार-बार कश्मीर की 'स्वतंत्रता' और भारत में मुसलमानों के 'शोषण' का राग अलापा है। उन्होंने खुलेआम जेहाद की अवधारणा को हवा दी है। कल्पना कीजिए:

· यदि ईरान परमाणु शक्ति संपन्न हो गया, तो उसका पहला निशाना इजरायल होगा और दूसरा भारत हो सकता है।

· यदि भविष्य में ईरान और पाकिस्तान 'मुस्लिम ब्रदरहुड' के नाम पर एक हो गए, तो भारत के अस्तित्व पर बड़ा संकट मंडराएगा।

· भारत के भीतर मौजूद कट्टरपंथी इलाके, इस स्थिति में देश के लिए कैंसर बन सकते हैं।

इस युद्ध के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि ईरान के पास पर्याप्त सैन्य संसाधन—मिसाइल, ड्रोन और उन्नत हथियार—उपलब्ध हैं। यदि इन क्षमताओं के साथ परमाणु शक्ति जुड़ती है, तो यह क्षेत्रीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसी संदर्भ में अमेरिका की नीतियों को समझा जा सकता है, जो स्वयं को इज़राइल की सुरक्षा और व्यापक रणनीतिक स्थिरता से जोड़ता है।

अंततः, यह संघर्ष केवल सीमाओं का विवाद नहीं, बल्कि विचारधाराओं, पहचान और शक्ति संतुलन का जटिल संगम है। युद्धविराम अस्थायी राहत दे सकता है, किंतु स्थायी समाधान तभी संभव है जब सभी पक्ष एक-दूसरे के अस्तित्व और संप्रभुता को स्वीकार करें—और वैचारिक टकराव को संवाद में परिवर्तित करें।

यहीं से एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील प्रश्न उठता है—यदि भविष्य में परिस्थितियाँ बदलती हैं और भारत व ईरान के संबंधों में टकराव उत्पन्न होता है, तो उसका स्वरूप क्या हो सकता है? वर्तमान में भारत और ईरान के बीच प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की संभावना अत्यंत कम है, किंतु भू-राजनीतिक समीकरण—विशेषकर पाकिस्तान जैसे कारकों की भूमिका—इस परिदृश्य को जटिल बना सकते हैं।

कल्पना कीजिए कि यदि पश्चिम एशिया की अस्थिरता दक्षिण एशिया तक फैलती है, या वैचारिक ध्रुवीकरण क्षेत्रीय सुरक्षा को प्रभावित करता है, तो भारत के लिए चुनौतियाँ बढ़ सकती हैं। यही कारण है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसकी सैन्य क्षमताओं को लेकर वैश्विक चिंता केवल इज़राइल तक सीमित नहीं है।

राष्ट्रहित सर्वोपरि

राष्ट्रहित सर्वोपरि

अमेरिका का ईरान पर प्रतिबंध लगाना केवल इजरायल को बचाने के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को एक 'परमाणु कट्टरपंथी' देश से बचाने के लिए विचारणीय विषय है। हिंसा को रोकने के लिए कभी-कभी बड़ी हिंसा होती है और शक्ति प्रदर्शन अनिवार्य हो जाता है।

ईरान की जनता आज खुद अपनी सत्ता से त्रस्त है। बुनियादी ढांचा तबाह हो चुका है और अर्थव्यवस्था गर्त में है। भारत को भी अब स्पष्ट होना होगा—हमारी सहानुभूति किसी विदेशी कट्टरपंथी देश के साथ नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों और अपनी सुरक्षा के साथ होनी चाहिए। जो लोग भारत में रहकर ईरान के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि यदि कल भारत पर संकट आया, तो ईरान की मिसाइलें उन्हें बचाने नहीं आएंगी। इसलिए - राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम।

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~

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