रविवार, 26 सितंबर 2010

पतझड़ का पेड़

मैं पतझड़ का पेड़ हूँ,
छाया और हरित विहीन,
अपने आप टूट रहा हूँ,
अनगिनत आशाएं
फूली फली कभी,
और अनगिनत बहारों में,
आये कितने ही फूल और  फल,
मोहक आकर्षण में ,
कितने ही पंथियों का था,
मै आश्रय स्थल,
बहारों के साथ,
काफिला खिसक गया,
प्यार और अपनापन,
छूमंतर हो गया,
और अब है
यहाँ वीरान,
मरघट सा सुनसान
शायद
फिर कोई आये
अपना हाथ बढाये
प्रेम का दिया जलाये
 और
मेरे  सूखेपन का श्राप
फलित हो जाये,
इस आशा में,
थोडा सा ही सही
जमीन से जुड़ा हूँ मै,
और
प्रतीक्षा में
सूखा ही सही
न जाने कब से,
खड़ा हूँ मै.
____________________
  - शिव प्रकाश मिश्र
____________________

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास

  रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास || मर्यादविहीन राजनीति, दिशाहीन आक्रोश में तड़प तड़प कर मरती काँग्रेस || कांग्रेस का भविष्य 1. शब...