रविवार, 23 नवंबर 2025

इस्लामिक राष्ट्र में रहने के लिए आप कितने तैयार ?

 


गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारा और शांति का शोर || इस्लामिक राष्ट्र में रहने के लिए आप कितने तैयार ? || राजनीतिक इस्लाम का वैश्विक है प्रभाव


पिछले कई वर्षों से मैं अपने लेखों के माध्यम से भारत में गज़वा-ए-हिंद के जिहादी षड्यंत्रों से इस्लामीकरण के बढ़ते खतरे के प्रति आगाह करता रहा हूँ। बिहार के फुलवारी शरीफ में बरामद दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ था कि पीएफआई 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहा है। मुझे अंदेशा नहीं था कि यह खतरा इतने बड़े रूप में और इतनी जल्दी सामने आ जाएगा। दिल्ली के लाल किले के पास हुए बम विस्फोट में जिहादी डॉक्टरों की भूमिका सामने आई है, जो फरीदाबाद के निकट अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। इस विश्वविद्यालय का इस्तेमाल व्हाइटकॉलर टेरर मॉड्यूल तैयार करने के लिए किया जा रहा था। महिला डॉक्टरों की संलिप्तता भी चिंता का बड़ा कारण है। दो ऐसी महिला डॉक्टरें गिरफ्तार की गई हैं जिन्होंने बांग्लादेश में पढ़ाई की है और जिनके संबंध तुर्की तथा अन्य इस्लामी देशों के आतंकी संगठनों से बताए जा रहे हैं।

दिल्ली विस्फोट में जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाले हैं। यह एक आत्मघाती विस्फोट था जिसे मुख्य आरोपी डॉ. उमर उन नबी, विशेषज्ञ डॉक्टर और अल-फलाह यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था — ने आत्मघाती हमलावर बनकर अंजाम दिया। अब तक सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान था कि इस्लामी आतंकवाद में आत्मघाती विस्फोट भारत में संभव नहीं होंगे क्योंकि भारतीय इस्लाम और भारतीय मुसलमान दुनिया भर के अन्य मुसलमानों से अलग हैं। मानव बम आईएसआईएस की रणनीति है, जिसने कई देशों में मानवता के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। काफिरों को मारने या किसी देश को नुकसान पहुँचाने के लिए स्वयं को मानव बम बनाकर मार डालना इस्लामी कट्टरता की पराकाष्ठा है। जब किसी देश में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो उसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। भारत में भी अब इसकी शुरुआत बेहद चिंता का विषय है।

भारत में जिन गंगा-जामुनी तहज़ीब, भाईचारे और शांति की बातें लंबे समय से की जा रही हैं,वे धोखा हैं और वे भारत के इस्लामीकरण के षड्यंत्रकारी प्रयासों को छिपाने का कवच हैं। विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोग व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल के सदस्य थे, जो आतंकवादी गतिविधियाँ को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दे रहे थे। जिन डॉक्टरों की गिरफ्तारी हुई है, वे पाकिस्तान‑समर्थित आकाओं के इशारों पर काम कर रहे थे। यूनिवर्सिटी को एक सुरक्षित पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। इस यूनिवर्सिटी में 415 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का भी खुलासा हुआ है, जिसमें विश्वविद्यालय के फंड्स का दुरुपयोग आतंकवादी मोड्यूल बनाने में किया गया था। अल-फलाह यूनिवर्सिटी में उपजे व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल का संबंध कश्मीर से भी जुड़ा हुआ पाया गया है।

घाटी में छापेमारी और गिरफ्तारियों के बीच इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप भी खुलकर सामने आया। महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि “यह धमाका देश में बनाए गए प्रेशर‑कुकर माहौल का नतीजा है” और उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि कश्मीर की जो मुसीबत थी, वह लाल किले के सामने बोल पड़ी है। उन्होंने कहा कि देशभर में इस्लामोफोबिया और मुसलमानों पर उत्पीड़न बढ़ रहा है। कुछ लोग आतंकी हमले करते हैं और उसके बाद कश्मीरी समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई, सामूहिक सज़ा और जातीय‑प्रोफाइलिंग का चक्र शुरू हो जाता है। इसलिए कश्मीरी कठिन आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा‑दुविधाओं के बीच फँसे हुए हैं। उनका यह बयान आतंकी गतिविधियों को परोक्ष समर्थन देने जैसा प्रतीत होता है।

महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती ने लाल किले के पास हुए विस्फोट के मामले में आत्मघाती हमलावर डॉ. उमर नबी पर चिंता जताई है। उन्होंने इस घटना को इस्लामोफोबिया से जोड़कर सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।

जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि दिल्ली कार बम धमाके के लिए कुछ लोग जिम्मेदार हैं, पर यह धारणा बनायी जा रही है कि हम सब दोषी हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पिता फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि लाल किले के पास हमले में शामिल आतंकी कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने देशभर में रह रहे कश्मीरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया। देश के दुश्मनों के साथ कश्मीरियों को नहीं खड़ा किया जा सकता और न ही उनके अपराधों की सजा निर्दोष कश्मीरियों को दी जा सकती है। पहलगाम आतंकी घटना से कुछ समय पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने कहा था कि कश्मीर में टूरिज़्म पर आधारित सांस्कृतिक हमला हो रहा है और इससे कश्मीर की असल पहचान प्रभावित हो रही है।

प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के बयानों से आतंकवादी घटनाओं और पृथकतावादी जिहादियों का समर्थन करने, तथा पूरी कौम को पीड़ित और शोषित बताने का विमर्श फैलाने जैसी प्रवृत्तियाँ राजनीतिक इस्लाम का कार्य हैं। वैश्विक स्तर पर यह बड़ी सफलता से किया जा रहा है और यही अब इस्लाम की एक विशेषज्ञता भी है।

इसमें संदेह नहीं कि भारत को शीघ्राति‑शीघ्र इस्लामी राष्ट्र बनाने की कोशिशें हो रही हैं, जिन्हें अधिकांश मुस्लिम समूहों का समर्थन प्राप्त है। गज़वा‑ए‑हिंद को इस्लाम के धार्मिक युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसका उद्देश्य भारत को “दार‑अल-इस्लाम” या इस्लामी राष्ट्र बनाना है। दारुल उलूम देवबंद जैसे संस्थान इस विचार को वैध ठहराते दिखते हैं। व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल जैसे नेटवर्क, जहाँ उच्च शिक्षित लोग आतंकी गतिविधियों में शामिल हैं, इस षड्यंत्र की गंभीरता को दर्शाते हैं।

महमूद मदनी का लक्ष्य 2030 तक एक करोड़ मुस्लिम युवाओं को शारीरिक दक्षता और सामाजिक सुरक्षा हेतु लाठी‑डंडे और हथियारों का प्रशिक्षण देकर तैयार करना है। 2019 से शुरू हुए इस अभियान में अब तक लगभग 70 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। यह प्रशिक्षण कार्य वैसा ही है है जो पूर्व में पीएफआई अपने शिविरों में संचालित करता रहा है। उनका यह काम संदिग्ध है और गज़वा‑ए‑हिंद में गृह‑युद्ध छेड़ने में इसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

वैसे तो भारत को इस्लामी बनाने के प्रयास सातवीं शताब्दी से इस्लामी आक्रमणों के साथ शुरू हुए थे, पर भौगोलिक विशालता, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि के कारण भारत पर आक्रमण सफल नहीं हुआ। लेकिन अंदरूनी भितरघात और जिस राजनीतिक इस्लाम की कारगुजारियों के कारण भारत का विभाजन हुआ वैसी स्थितियां पुन: उत्पन्न की जा रही हैं । भारत के कई राजनीतिक दल वोट‑राजनीति के चलते मुस्लिम तुष्टिकरण करते हैं और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत के इस्लामीकरण का समर्थन कर रहे हैं। आतंकी घटनाएँ, धर्मांतरण, अवैध घुसपैठ, जनसंख्या विस्फोट, सांप्रदायिक दंगे और वक्फ बोर्ड के माध्यम से अधिक से अधिक भूमि पर कब्ज़ा करने के प्रयासों को जोड़कर देखा जाए तो इन सबका उद्देश्य एक जैसा प्रतीत होता है — गज़वा‑ए‑हिंद के एजेंडे को मूर्त रूप देना।

भारत के राष्ट्रांतरण की भूमिका संविधान के कुछ प्रावधानों में भी निहित दिखाई देती है, जो एक ओर बहुसंख्यक हिंदुओं को आज भी गुलाम बनाए हुए है और दूसरी ओर दूसरी सबसे बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक बनाकर धार्मिक संस्थानों के संचालन की स्वायत्तता प्रदान करते हैं। उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर अनुच्छेद 25‑26 के अंतर्गत अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने और संस्थान चलाने की स्वतंत्रता दी गई है। इस कारण मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं द्वारा शरिया‑सम्बंधी प्रथाओं को लागू करने की कोशिशें और अनगिनत मदरसों के माध्यम से कट्टरता के बीज बोये जा रहे हैं। वक्फ बोर्ड भूमि‑संपत्ति पर कब्ज़ा करता जा रहा है। पूजा‑स्थल कानूनों से कई ऐसे धार्मिक स्थल और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीकों की यथास्थिति बनाए रखने के लिए हिन्दू बाध्य हैं । संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक समुदायों को सांस्कृतिक पहचान और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का विशेष अधिकार देते हैं, जिसके आड़ में मदरसे संचालित हो रहे हैं और जिनके कारण धार्मिक कट्टरता तथा पृथकतावादी मानसिकता उत्पन्न की जा रही है। वही बहुसंख्यक वर्ग इन विशेष अधिकारों से वंचित महसूस करता है।

मुसलमानों के जितने धार्मिक संगठन भारत में हैं, उतने शेष विश्व में नहीं हैं । ये संगठन मिलकर भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। वहाबी और सलाफी जैसे समूहों पर विश्व के कई देशों में रोक और निगरानी है, पर भारत में ये कुछ भी करने को स्वतन्त्र हैं । कुछ देशों में मस्जिदें केवल नमाज़ के समय खोली जाती हैं और तत्पश्चात बंद कर दी जाती हैं, जबकि भारत में मस्जिदें लगातार खुली रहती हैं, जिससे धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। कई देशों में शुक्रवार की तकरीरों पर नियंत्रण और वक्ताओं के लिए शैक्षणिक मान्यता व सरकारी प्रमाणन की आवश्यकता होती है; और मदरसों पर रोक है.

भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर दी गई छूट के कारण कट्टरपंथी गतिविधियाँ अनियंत्रित हो गयी हैं। इसका नतीजा यह है कि आज भारत पर इस्लामीकरण के खतरे की धार तीव्र हो गयी है। यदि शीघ्र और उपयुक्त कदम नहीं उठाए गए तो देश आत्मघाती हमलों और गृह‑युद्ध जैसी विनाशकारी दिशाओं की ओर जा सकता है। आगे का रास्ता दिन‑प्रतिदिन और कठिन होता जाएगा।

शनिवार, 15 नवंबर 2025

दिल्ली विस्फोट: निहितार्थ और चिंताएँ

 


दिल्ली विस्फोट: निहितार्थ और चिंताएँ || हिन्दुस्तान कब तक बच पायेगा पूर्ण इस्लामीकरण से || आतंकवाद का धर्म होता है ! ये निर्विवाद सत्य है और इस धर्म को सब जानते हैं ||


10 नवंबर 2025 को, बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक एक दिन पहले, दिल्ली के लाल किला क्षेत्र में हुए विस्फोट ने पूरे देश को झकझोर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 11 वर्षों के कार्यकाल में यह पहला और अभूतपूर्व आतंकी हमला था, और वह भी उस स्थान पर जहाँ हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराया जाता है। इस विस्फोट में 13 लोगों की मृत्यु हुई और 20 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

अब तक आतंकवाद की घटनाएँ मुख्यतः कश्मीर तक सीमित थीं, लेकिन यह पहली बार था जब देश की राजधानी में इतनी बड़ी घटना हुई। सुरक्षा एजेंसियों ने तत्परता से जांच शुरू की और कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

चिंता की बात यह है कि बिहार चुनाव में भाजपा गठबंधन को तीन-चौथाई बहुमत मिलने के बाद, इस जाँच की गति कहीं धीमी न पड़ जाए। विस्फोट से ठीक पहले पुलिस ने तीन क्विंटल से अधिक विस्फोटक बरामद किया था, जो दस लाख से अधिक लोगों को नुकसान पहुँचाने में सक्षम था। आतंकवादियों के प्रायोजकों और समर्थकों का उद्देश्य भारी संख्या में हिन्दू नरसंहार करने का था, लेकिन क्यों? हिन्दुओं ने उनका क्या बिगाड़ा है? इनका असली उद्देश्य समझने के लिए प्रत्येक भारतवासी को चिंतन करने की आवश्यकता है अन्यथा चिता भी नहीं बन सकेगी.

इस घटना का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि इसमें शामिल अधिकांश आतंकवादी पेशे से डॉक्टर थे—विशेषज्ञ चिकित्सक। मुख्य आरोपी डॉ. उमर मोहम्मद, पुलवामा निवासी, इंटरनल मेडिसिन में एमडी और मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर थे। उनकी विशेषज्ञता वीबीआईईडी (व्हीकल बोर्न इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) में थी, जिसे उसने इस हमले में प्रयोग किया। दूसरी प्रमुख आरोपी डॉ. शाहीन सय्यद, लखनऊ निवासी, जैश-ए-मोहम्मद की महिला भर्ती विंग की संचालिका थीं। वह अल-फलाह मेडिकल कॉलेज में कार्यरत थीं और उनके पास से हथियार और धन की व्यवस्था के प्रमाण मिले हैं। अन्य गिरफ्तार डॉक्टरों में डॉ. उमर उन नवी, डॉ. मुजम्मिल गनाई और डॉ. अदिल अहमद रदर शामिल हैं, जिनका संबंध अल-फलाह मेडिकल यूनिवर्सिटी से है। हैदराबाद निवासी डॉ. अहमद मोइनुद्दीन सैयद को भी गिरफ्तार किया गया है, जो “रेसिन” नामक घातक रसायन तैयार कर रहा था, जिसका उपयोग हिन्दू नरसंहार के लिए किया जाना था।

पुलिस ने इस नेटवर्क को “व्हाइट कॉलर टेरर” कहा है—एक ऐसा आतंकवादी तंत्र जिसमें वित्त, भर्ती, हथियार प्रबंधन और संगठनात्मक चैनलों का प्रयोग हुआ। यह जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद से जुड़ा हुआ है।

चिकित्सा क्षेत्र में नैतिक संकट

चिकित्सकों का धर्म मानवता की सेवा करना है। वे जीवन रक्षक होते हैं, न कि जीवन संहारक। लेकिन जब डॉक्टर के वेश में आतंकवादी छिपे हों, तो यह न केवल नैतिक संकट है, बल्कि पूरे चिकित्सा क्षेत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न है।

ऐसी घटनाओं के बाद समाज में अविश्वास फैलता है। अब यदि कोई हिंदू, मुस्लिम चिकित्सकों से परामर्श लेने से परहेज करता है, तो उसे केवल पूर्वाग्रह नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह उनके लिए एक सुरक्षात्मक सतर्कता का उपाय है.

यह एक गहरी सामाजिक चिंता है, जिसे हिन्दुओं सहित सभी को समझना होगा।

ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान चुनौतियाँ

भारत में इस्लामी आक्रमणों का इतिहास सातवीं शताब्दी से शुरू होता है, जिसने सनातन संस्कृति को गहरे घाव दिए। भारत भूमि पर आक्रान्ताओं द्वारा 10 करोड़ हिंदुओं का नरसंहार हुआ, मंदिरों को तोड़ा गया, और उन पर मस्जिदें बनाई गईं. दुर्भाग्य से अमानवीय अत्याचारों और गुलामी के ये अवशेष आज भी ज्यों के त्यों हैं और कांग्रेस सरकार द्वारा पूजा स्थल कानून बना कर हिन्दुओं के लिए न्यायपालिका के दरवाजे भी बंद कर दिए गए लेकिन भाजपा की सरकार ने भी इस सम्बन्ध में कुछ लिया नहीं.

गजवा-ए-हिंद, जिसका उद्देश्य भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाना है, आज भी मुस्लिम कट्टरपंथी संगठनों के एजेंडे में शामिल है, जिसे अधिकांश मुस्लिमों का भी प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन प्राप्त है। जनसंख्या वृद्धि, धर्मांतरण और अवैध घुसपैठ जैसे कार्य इस एजेंडे को जल्द से जल्द पूरा करने के प्रमाण हैं। राजनैतिक इस्लाम इन सभी कुकृत्यों को ढंकने का कार्य करता है.

यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में ऐसे मुसलमान भी हैं जो आतंकवाद और कट्टरता का विरोध करते हैं, लेकिन गजवा-ए-हिंद के खिलाफ खुलकर बोलने वाला कोई नहीं है जिसका मतलब समझना मुश्किल नहीं है.

राजनीतिक दृष्टिकोण

मोदी सरकार ने धारा 370 हटाने और राम मंदिर निर्माण जैसे कार्य किए हैं, लेकिन मंदिरों की स्वतंत्रता, हिंदू शिक्षा और सांस्कृतिक पुनरुद्धार के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।

हिंदू मंदिरों का सरकारी नियंत्रण, चढ़ावे का अन्य समुदायों के लिए उपयोग, आक्रान्ताओं द्वारा नष्ट कर कब्जाए गए धार्मिक स्थलों की मुक्ति जैसे मुद्दे आज भी अनसुलझे हैं।

विश्व के हर राष्ट्र में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय अस्मिता और स्वाभिमान की पुनर्स्थापना के लिए आक्रांताओं द्वारा नष्ट किए गए धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों का जीर्णोद्धार किया. लेकिन भारत में स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने होने नहीं दिया और भाजपा ने सत्ता में आने के बाद किया नहीं. फिर भी हिन्दू उनका समर्थन विकल्प हीनता में इसलिए करता है क्योंकि यदि अन्य दलों की सरकार बनी तो कट्टर पंथियों का भारत को 2047 तक इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना समय से पहले ही पूरा हो सकता है. मोदी 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की धुन में हिंदुओं को विकास की मृग मरीचिका में उलझाए रखना चाहते हैं.

निष्कर्ष

लाल किला विस्फोट जैसी घटनाएँ केवल सुरक्षा संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतावनी भी हैं। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में प्रयास सराहनीय हैं, लेकिन यह विकास केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय अस्मिता से भी जुड़ा होना चाहिए।

यदि समाज अपनी पहचान और सुरक्षा खो देता है, तो यह राष्ट्र के लिए गंभीर संकट होगा।

~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~

शनिवार, 8 नवंबर 2025

"हाइड्रोजन बम" और कांग्रेस की कठिन राह,

 

"हाइड्रोजन बम" और कांग्रेस की कठिन राह ||राहुल के बेतुके करतब के पीछे का काला सच || राजीव - राहुल की समानता


पिछले कुछ महीनों से कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार सत्ताधारी भाजपा पर आरोपों की बौछार कर रहे हैं। वे अपने खुलासों को "राजनीतिक बम" का नाम देते हैं—कभी "एटम बम", कभी "हाइड्रोजन बम" लेकिन इन बयानों का असर कांग्रेस के लिए लाभकारी होने के बजाय आत्मघाती साबित होता दिख रहा है। दुष्परिणों से निश्चिन्त राहुल गांधी बिना किसी शर्म और संकोच के वह सब कर रहे हैं, जो किसी राष्ट्रीय स्तर के नेता विशेष कर जब वह नेता प्रतिपक्ष हो, के पद की गरिमा के अनुकूल नहीं होता. महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अवसरों की अनदेखी कर उनका बार-बार बिना किसी उचित कारण के विदेश जाना, और वहां राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध भारत की अनावश्यक आलोचना करना, उनकी भूमिका को पहले ही अत्यंत संदिग्ध बना चुका है. कांग्रेस के अन्य नेता भारत में नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे हालात बनाने की चेतावनी देते रहते हैं. स्वयं राहुल गांधी भी अपनी सभाओं में जातिवादी और सांप्रदायिक विभेद बढ़ाने तथा युवाओं को उकसाने वाले भड़काऊ बयान देते रहते हैं. हाल में उन्होंने न्यायपालिका और सुना को निशाने पर लेटे हुए कहा कि उसे पर 10% सवर्ण लोगों का कब्जा होने की बात कही. ऐसे में, जबकि उनकी ब्रिटिश नागरिकता का मामला जांच के दायरे में है, वैवाहिक स्थितिपर प्रश्न चिन्ह लगा है, एसोसिएटेड जनरल की संपत्तियां हड़पने का भ्रष्टाचार का मामला अदालत में चल रहा है, मान हानि के एक मामले दो साल के सजा हो चुकी हो, देश की कई अदालतों में अनेक मामले विचाराधीन हो, पूरे राष्ट्र को संदेह होना स्वाभाविक है कि कहीं उनके संबंध भारत विरोधी संगठनों और विदेशी शक्तियों के साथ तो नहीं जुड़े हैं.

हरियाणा विधानसभा चुनाव पर आरोप

बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक 24 घंटे पहले राहुल गांधी ने हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उनका दावा था कि लगभग 25 लाख फर्जी वोट डाले गए, जिससे कांग्रेस की जीत भाजपा की जीत में बदल गई। उन्होंने चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल उठाए।

हरियाणा के वास्तविक आंकड़े बताते हैं कि भाजपा को 55.48 लाख (39.94%) वोट मिले, जबकि कांग्रेस को 54.30 लाख (39.09%) वोट। दोनों दलों के बीच महज़ 1.18 लाख वोटों का अंतर रहा, जिससे भाजपा को 48 और कांग्रेस को 37 सीटें मिलीं। यह चुनावी गणित असामान्य नहीं है—कभी एक पार्टी बहुत भारी अंतर से कुछ सीट जीतती है, जिससे राज्य स्तर पर मत प्रतिशत तो बढ़ जाता है लेकिन ज्यादा सीटें नहीं मिलती क्योंकि मतों की बढ़ोत्तरी सामान रूप से सभी सीटों पर नहीं होती. इसके विपरीत यदि मतों की वृद्धि लगभग सामान रूप से सभी सीटों पर होती है तो ज्यादा सीटें जीती जा सकती हैं भले ही जीत का अंतर मामूली हो. भाजपा के मामले यही हुआ जिसने मामूली अंतर से ज्यादा सीटें जीतीं .

किसी विधान सभा या लोकसभा चुनाव में किसी पार्टी को ज्यादा वोट प्रतिशत मिलकर भी वह चुनाव हार सकती है क्योंकि जीत सीटों की संख्या पर निर्भर करती है, न कि कुल वोट प्रतिशत पर। यह भारत की चुनाव प्रणाली की विशेषता है. इसका कारण है भारत में "फर्स्ट - पास्ट - द - पोस्ट" चुनाव प्रणाली का होना। इसमें हर निर्वाचन क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि चुना जाता है. जो उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट पाता है, वह जीत जाता है। जिस दल या गठबंधन के पास विजयी सीट सबसे अधिक होती हैं, सरकार बनाता है.

आसान नहीं है सीटों का गणित

हरियाणा विधान सभा २०२४ चुनाव में कांग्रेस ने फिरोजपुर झिरका सीट 98,441 वोटों के अंतर से जीती, जबकि पुनहाना और लोहारू सीटें मात्र 700–800 वोटों के अंतर से। राज्य की कुल 90 सीटों में से 31 सीटें लगभग 1000 वोटों के अंतर से जीती गईं, इनमें से 12 भाजपा, 10 कांग्रेस और 9 सीटें अन्य दलों ने जीती। यह दर्शाता है कि चुनावी परिणाम अक्सर बेहद छोटे अंतर पर निर्भर करते हैं।ऐसे में राहुल गांधी के कुतर्क किसी के गले नहीं उतर सकते.

राजीव गाँधी और राहुल

1984 में कांग्रेस को 49.1% वोट के साथ 414 सीटें मिली थीं, जो कि अब तक का कीर्तिमान है.। 1989 में उसका वोट प्रतिशत घटकर 40.62% हुआ और सीटें घटकर 197 रह गईं। वहीं भाजपा को 1984 में 7.4% वोट और केवल 2 सीटें मिली थीं, लेकिन 1989 में उसका वोट प्रतिशत 11.87% हो गया और सीटें बढ़कर 88 हो गईं। यह उदाहरण बताता है कि सीटों का गणित केवल वोट प्रतिशत पर नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वितरण पर आधारित होता है। लेकिन राजीव गांधी ने भी उस समय चुनाव परिणाम पर संदेह जताया था और कहा था कि मात्र 4% वोट बढ़ने से भाजपा की सीटें 88 कैसे हो साक्ती हैं, यह गणित उनके समझ से बाहर है.

ब्राजील मॉडल का विवाद

राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि हरियाणा में एक ब्राजील की मॉडल ने अलग-अलग नामों से 22 स्थानों पर वोट डाले। उनकी टीम ने फोटोग्राफर का नाम ही मॉडल का नाम बता दिया । मॉडल ने स्वयं वीडियो जारी कर आरोपों को नकार दिया, लेकिन सोशल मीडिया पर वह अचानक प्रसिद्ध हो गई, इसलिए रहुल की कृतज्ञ भी है । राहुल गांधी ने जिन नामों के साथ ब्राजील मॉडल की फोटो लगी होना बताया, उन सभी के मूल मतदाता पहचान पत्र में उनकी खुद की फोटो लगी है. इस सम्बन्ध में कई महिलाओं ने कैमरे के सामने आकर अपने बयान दिए और अपने मतदाता पहचान पात्र भी दिखाए . इससे लगता है कि राहुल के लिए पीपीटी तैयार करने वाली टीम ने राहुल के आरोपों को सनसनीखेज बनाने के लिए स्वयं धोखा धड़ी करके ब्राजील मॉडल की फोटो लगाई. इस घटना ने कांग्रेस की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुँचाई।

चुनाव आयोग और सरकार को चाहिए कि वह एक विशेष जांच टीम बनाकर इस धोखाधड़ी की जांच करें और यदि राहुल गांधी की टीम द्वारा धोखाधड़ी करने की बात साबित होती है तो उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए भारतीय लोकतंत्र और चुनावों की गरिमा बनाई रखी जा सके. देश की संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और प्रतिष्ठा को किसी असामान्य व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए दांव पर नहीं लगाया जा सकता.

मकान नंबर और मतदाता सूची

राहुल गांधी ने यह भी कहा कि एक ही घर में सैकड़ों वोटर पाए गए। लेकिन भारत के कई नगरों में "आहाता" जैसी परंपरागत संरचनाएँ होती हैं, जिनमें दर्जनों मकान और सैकड़ों लोग रहते हैं। ऐसे में एक ही मकान नंबर पर कई वोटर होना असामान्य नहीं है। जहां तक शून्य संख्या वाले घरों की बात है, भारत के कई गांवों में विशेष कर छोटे-छोटे गांवों जिन्हें ग्राम पंचायत से सम्बद्ध मजरे कहा जाता है, में अभी भी कोई भवन संख्या आवंटित नहीं है. सभी के घर चिट्ठी पत्री भी ग्राम और पोस्ट लिखकर ही आती जाती है. कंप्यूटर की सामान्य समझ रखने वाले व्यक्ति को यह मालूम होगा कि डेटाबेस का स्टैंडर्ड कॉमन फॉर्मेट होता है जिसमें यदि मकान नंबर की फील्ड भरा जाना अनिवार्य ( मैंडेटरी फील्ड )है, तो डाटा एंट्री करने के लिए शून्य भरना मजबूरी है. मकान नंबर न होना या शून्य होना एक ही बात है. यह तकनीकी मजबूरी है, न कि धांधली।

कांग्रेस की चुनौतियाँ और दिशा

भारतीय राजनीति के परिदृश्य में कांग्रेस पार्टी एक ऐतिहासिक और दीर्घकालिक भूमिका निभाती रही है। किंतु पिछले 11 वर्षों से केंद्र की सत्ता से बाहर रहने के बाद, पार्टी आज एक गहरे आत्ममंथन के दौर से गुजर रही है। राहुल गांधी, जो पार्टी के विभिन्न पदों पर रह चुके हैं और विपक्ष के प्रमुख चेहरों में से एक हैं, अब तक संगठन में नई ऊर्जा भरने में अपेक्षित सफलता नहीं पा सके हैं। कांग्रेस की उपस्थिति अब कुछ गिने-चुने राज्यों तक सीमित रह गई है. जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने अपनी जड़ें मजबूत की हैं, वहाँ कांग्रेस का आधार लगातार कमजोर हुआ है। उड़ीसा और पंजाब जैसे राज्य पार्टी के हाथ से फिसल चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस की उपस्थिति लगभग नगण्य हो चुकी है।

यह स्थिति केवल राज्य स्तर पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी कांग्रेस की भूमिका सीमित हो गयी है। कांग्रेस यदि केवल क्षेत्रीय दलों के सहारे केंद्र में सत्ता प्राप्त करने की रणनीति अपनाती है, तो वह न केवल अपनी स्वतंत्र पहचान खोती है, बल्कि गठबंधन की अस्थिरता और वैचारिक असंतुलन का भी शिकार बनती है—जैसा कि यूपीए-2 के कार्यकाल में देखा गया। आज कांग्रेस के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दल हैं, जो अपने-अपने राज्यों में कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को विभाजित कर चुके हैं लेकिन भाजपा को रोकने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार है, और किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार है. नीतिगत स्तर पर भी कांग्रेस को अपनी विचारधारा और गठबंधन नीति पर पुनर्विचार करना होगा। किसी संप्रदाय विशेष के तुष्टिकरण या वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर यदि पार्टी राष्ट्रव्यापी समावेशी दृष्टिकोण अपनाती है, तभी वह मुख्यधारा में लौट सकती है अन्यथा हिन्दू विरोधी होने के कारण एक मुस्लिम पार्टी बनकर रह जायेगी.

राहुल गांधी के "हाइड्रोजन बम" जैसे बयान कांग्रेस को राजनीतिक लाभ पहुँचाने के बजाय नुकसान ही पहुँचा रहे हैं। आरोपों की जाँच में तथ्य सामने आते ही कांग्रेस की विश्वसनीयता और कमजोर होती है। भारतीय लोकतंत्र की गरिमा को बार-बार संदेहास्पद बताना जनता के विश्वास को चोट पहुँचाता है।

सनसनीखेज आरोपों से राजनीति नहीं चलती। जनता ठोस तथ्य और भरोसे की तलाश करती है। राहुल गांधी स्वयं कांग्रेस के लिए आत्मघाती बम साबित हो रहे हैं।

~~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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