क्या सचमुच केवल डॉ आंबेडकर संविधान के निर्माता हैं ? || संविधान की ड्राफ्ट कमेटी, जिसके अध्यक्ष डॉ आंबेडकर थे, बनने के पहले ही संविधान का मसौदा तो तैयार हो चुका था || कई विद्वानों की मेहनत शामिल है संविधान बनाने में लेकिन आंबेडकर के अलावा शायद ही किसी को लोग जानते हों
भारतीय संविधान की सार्वजनिक स्मृति प्रायः कुछ गिने-चुने महान व्यक्तित्वों तक सीमित रहती है—विशेष रूप से डॉ. भीमराव अंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल। उनके योगदान निस्संदेह केंद्रीय थे, परंतु यह तथ्य अक्सर ओझल हो जाता है कि संविधान निर्माण एक सामूहिक, विचारशील और लंबी प्रक्रिया थी, जिसमें 1946 से 1949 के बीच लगभग 300 सदस्यों ने भाग लिया। इस प्रक्रिया में कई ऐसे लोग थे, जिनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, पर वे आज अपेक्षाकृत कम पहचाने जाते हैं।
ऐसे ही कम चर्चित संविधान-निर्माताओं, उनकी भूमिकाओं और उनके अनदेखे रह जाने के कारणों का विवेचन हमने किया है—
1. बी. एन. राव — परदे के पीछे के संविधान शिल्पकार
भूमिका और योगदान
- संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार (1946–1948)।
- प्रारंभिक संवैधानिक ढाँचा और मसौदा तैयार किया, जो ड्राफ्टिंग कमेटी के गठन से पहले अस्तित्व में आया।
- विश्व के प्रमुख संविधानों—ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि—का तुलनात्मक अध्ययन किया।
- न्यायिक पुनरावलोकन और मौलिक अधिकारों जैसे विषयों पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर सहित अंतरराष्ट्रीय विधिवेत्ताओं से परामर्श किया।
क्यों उपेक्षित रहे
बी. एन. राव एक नौकरशाह थे, जननेता नहीं। उन्होंने संविधान सभा में अधिक भाषण नहीं दिए और न ही सार्वजनिक पहचान की आकांक्षा रखी। ड्राफ्टिंग कमेटी के गठन के बाद उनका कार्य सामूहिक प्रक्रिया में समाहित हो गया।
2. अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर — संवैधानिक तर्क और संघवाद
भूमिका और योगदान
- ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्य और प्रख्यात विधिवेत्ता।
- संघीय ढाँचे, केंद्र–राज्य संबंधों और न्यायपालिका से संबंधित प्रावधानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका।
- एक सशक्त केंद्र के पक्ष में कानूनी और संवैधानिक तर्क प्रस्तुत किए।
क्यों उपेक्षित रहे
डॉ. अंबेडकर ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष और प्रमुख प्रवक्ता थे, इसलिए सार्वजनिक पहचान उन्हें मिली। अय्यर का योगदान तकनीकी और विधिक था, जो लोकप्रिय कथाओं में कम स्थान पाता है।
3. के. एम. मुंशी — सांस्कृतिक निरंतरता के पक्षधर
भूमिका और योगदान
- मौलिक अधिकारों, विशेषकर धर्म की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों पर गहन हस्तक्षेप।
- अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता) को नीति-निर्देशक तत्व के रूप में शामिल कराने में भूमिका।
- आधुनिक संविधान में भारत की सभ्यतागत पहचान को बनाए रखने के पक्षधर।
क्यों उपेक्षित रहे
मुंशी को अधिकतर एक साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी या शिक्षाविद् के रूप में याद किया जाता है, न कि एक संवैधानिक विचारक के रूप में। बाद के राजनीतिक विवादों ने भी उनके संतुलित विचारों को ढक दिया।
4. दक्षायणी वेलायुधन — सामाजिक न्याय की नैतिक आवाज़
भूमिका और योगदान
- संविधान सभा की एकमात्र दलित महिला सदस्य।
- बार-बार यह रेखांकित किया कि सामाजिक और आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अधूरी है।
- अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध सशक्त, अनुभव-आधारित वक्तव्य दिए।
क्यों उपेक्षित रहीं
वे किसी प्रमुख समिति में पद पर नहीं थीं और न ही सत्ता-केन्द्रित राजनीतिक समूहों से जुड़ी थीं। इतिहास लेखन में प्रायः संस्थागत सत्ता को प्राथमिकता दी गई, नैतिक हस्तक्षेपों को नहीं।
5. हंसा मेहता — संवैधानिक समानता की भाषा
भूमिका और योगदान
- संविधान में लैंगिक-तटस्थ भाषा के लिए संघर्ष—“पुरुष” के बजाय “नागरिक” शब्द के प्रयोग पर बल।
- अनुच्छेद 14–16 (समानता और भेदभाव निषेध) के स्वरूप पर प्रभाव।
- बाद में संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा के निर्माण में योगदान।
क्यों उपेक्षित रहीं
महिला योगदान को प्रायः सामूहिक रूप में देखा गया, व्यक्तिगत संवैधानिक हस्तक्षेपों को कम महत्व मिला। संविधान के अध्ययन में लैंगिक दृष्टि लंबे समय तक गौण रही।
6. एन. गोपालस्वामी अय्यंगार — व्यावहारिक राष्ट्र-निर्माण
भूमिका और योगदान
- सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्रों के प्रशासन से जुड़े प्रावधानों के प्रारूप में भूमिका।
- अनुच्छेद 370 (मूल स्वरूप) के निर्माण में प्रमुख भूमिका।
- जम्मू-कश्मीर के प्रशासनिक अनुभव से यथार्थवादी दृष्टिकोण।
क्यों उपेक्षित रहे
अनुच्छेद 370 पर बाद के राजनीतिक विवादों ने उनके मूल संवैधानिक तर्क और संदर्भ को पीछे धकेल दिया।
इन योगदानकर्ताओं के उपेक्षित रहने के संरचनात्मक संक्षिप्त कारण
- नायक-केंद्रित इतिहास लेखन
- तकनीकी और समिति-आधारित कार्य की कम दृश्यता
- संविधान सभा की बहसों की जटिलता और विशालता
- स्वतंत्रता के बाद की राजनीति द्वारा स्मृति का चयन
- जाति, लिंग और वर्ग से जुड़ी ऐतिहासिक असमानताएँ
समापन विचार
भारतीय संविधान कुछ महान व्यक्तियों की रचना मात्र नहीं है, बल्कि यह संवाद, असहमति, विविधता और समझौते से गढ़ा गया एक सामूहिक लोकतांत्रिक दस्तावेज़ है। इन कम चर्चित योगदानकर्ताओं को याद करना डॉ. अंबेडकर या अन्य केंद्रीय नेताओं के महत्व को कम नहीं करता, बल्कि संविधान की गहराई और व्यापकता को और स्पष्ट करता है।
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केवल आंबेडकर नहीं, कौन हैं संविधान के निर्माता | भारत का संविधान कैसे बना?