Tuesday, January 21, 2020

चुनाव : दिल्ली है दिल वालों की ...किसकी होगी ?


चुनाव : दिल्ली है दिल वालों की ...किसकी होगी ?

बेहद आश्चर्यजनक बात है कि दिल्ली में आपको कई ऐसे लोग मिलेंगे जो भाजपा समर्थक नहीं है, जिन्होंने पिछले चुनाव में  अरविंद केजरीवाल को बहुत उत्साह के साथ तन मन धन से समर्थन दिया था, अबकी बार वह तिराहे पर हैं और उनका कहना है कि ये जानते हुए भी कि  कांग्रेस  की स्थिति बहुत खराब है वे कांग्रेस का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन इस बार केजरीवाल का समर्थन करते हुए उन्हें शर्म आ रही है. क्यों ? ऐसा क्या किया केजरीवाल ने पिछले 5 साल में कि कुछ लोगो को उनके समर्थन में शर्म रही है? क्या होगा इन चुनावों में ? कौन जीतेगा?



२. केजरीवाल की राजनीति समझने से पहले केजरीवाल को शुरू से समझना पड़ेगा . केजरीवाल ने1989 आईंआईटी खड़कपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक करने के बाद टाटा स्टील कंपनी ज्वाइन की.  बिना देर लगाए उन्होंने अनुपस्थित के आधार पर छुट्टी ले ली ताकि वह सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अच्छी तरह से ध्यान दे सकें. इस तरह की छुट्टी से  सैलरी तो नहीं मिलती लेकिन, नौकरी बची रहती है और उन्होंने सोचा कि अगर उनका सिविल सर्विसेज में सिलेक्शन  होता है तो ठीक वरना वापस आ जाएंगे . बीच-बीच में जब भी कभी समय मिलेगा तो आते रहेंगे  और वेतन लेते रहेंगे. यानी  उपलब्ध सुविधा का भरपूर लाभ.  इसके बाद उनका सिलेक्शन आईआरएस में हो गया और वह बाकायदा नौकरी भी करने लगे तो भी उन्होंने कई बार छुट्टियां ली . 1999 में उन्होंने एक परिवर्तन नामक गैर सरकारी संगठन बनाया और जिसका मुख्य फोकस था सूचना का अधिकार कानून . जब वह पूर्णकालिक आंदोलनकर्ता बन गए और उन्हें लगा कि ये कैरियर ज्यादा अच्छा है तब उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया .  जब उनके विरुद्ध शिकायतें आयीं, तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जांच करवाई तो  पता चला  कि अवैतनिक छुट्टी के बाद भी उन्होंने कई महीने की सैलरी ली है.सभी तरह की छुट्टियां एडजस्ट करने के बाद भी लगभग दस लाख रुपए  की धनराशि उनसे रिकवरी के लिए निकली.मीडिया में सुर्खियां बनने के बाद केजरीवाल ने चेक द्वारा ये धनराशि  सरकार को वापस की. ये है उनकी ईमानदारी के एक मिशाल. दिल्ली मैं जनलोकपाल के समर्थन में अन्ना हजारे का आंदोलन अप्रैल 2011 से शुरू हुआ तो उसमें केजरीवाल ने अपने सहयोगियों के साथ जोर शोर से भाग लिया. पूरे आंदोलन को सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से जन जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया और  इसका नाम दिया गया इंडिया अगेंस्ट करप्शन . ये आंदोलन बहुत अधिक प्रभावी हुआ और ऐसा लगा कि ये आंदोलनकारी  अब देश से भ्रष्टाचार मिटा कर रहेगें  .  भ्रष्टाचार रहित भारत के सपने पर सवार  लोग लगभग हर शहर में  इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जुड़ने लगे. अन्ना आंदोलन का इतना प्रभाव हुआ  कि तत्कालीन काग्रेस की मनमोहन सरकार द्वारा अन्ना हजारे को तिहाड़ जेल भेजने और जेल से छोड़ने तक पूरे देश में आंदोलन का एक बड़ा प्लेटफार्म बन कर तैयार हो गया था .मौके का भरपूर फायदा उठाने में उस्ताद अरविंद केजरीवाल  अन्ना हजारे के प्रथम शिष्य के रूप में स्थापित हो गए.  आंदोलन की सफलता की फसल काटने के उद्देश्य से उन्होंने प्रस्ताव रखा कि  इस जन आंदोलन को राजनैतिक पार्टी में बदल दिया जाए.  अन्ना हजारे सहित संतोष हेगड़े और किरण बेदी आदि इसके खिलाफ थे किंतु अरविंद केजरीवाल  की अति महत्वाकांक्षा भविष्य के ताने-बाने बुन रही थी और उन्होंने अन्ना हजारे की इच्छा के विपरीत राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया.   पार्टी बनाने में उन्हें शांति भूषण और प्रशांत भूषण का सहयोग मिला और उसके बाद अन्य प्रमुख लोग इससे जुड़ते चले गए जिनमें कुमार विश्वास, आशुतोष कुमार,  योगेंद्र यादव आदि प्रमुख थे.





३. आम आदमी पार्टी के रूप में एक राजनीतिक दल बनाने के बाद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी और  उन्होंने वे सभी मुद्दे ढूंढ निकाले जिनसे बहुत जल्दी सफलता हासिल की जा सकती थी. शीला दीक्षित की सरकार कौमन वेल्थ खेलों में हुए घोटालों के कारण चर्चा में थी.  इसके अलावा 15 साल से सरकार सत्ता में थी तो जाहिर सी बात  है उसके विरुद्ध भी जनता की बहुत सारी शिकायतें भी  थी,  जिसमें  बिजली और पानी की बढ़ी हुई कीमतें भी शामिल थीं. केजरीवाल ने दोनों मुद्दे हाथों हाथ लिए और बिजली बिल के नाम पर कंपनी के मालिक उद्योगपतियों  के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया और उस मोर्चे में सीधे मोदी को भी लपेट लिया.  हर अच्छे बुरे काम को अपने प्रचार के लिए स्तेमाल करना कोई केजरीवाल से सीखे . हर छोटी बड़ी नाकामी के लिए  वे मोदी को लपेट लेते है. उन्होंने बिजली कंपनियों के विरुद्ध कैग जांच, स्वतंत्र ऑडिट आदि को लेकर बहुत बखेड़ा खड़ा किया  हालांकि इसमें कोई भी तथ्य नहीं निकला लेकिन वे सुर्ख़ियों में बने रहे. .  केजरीवाल हाथ मे प्लास  पेंचकस लिए एक खंबे से दूसरे खंबे पर चढ़ कर कनेक्शन जोड़ने का नाटक करते  रहे.  बात बात में केजरीवाल धरने पर बैठने लगे . संभवत जनता ने उनके इस व्यवहार को जनता के हित में किए जाने वाले कार्य के रूप में लिया.



४. आम आदमी पार्टी ने 2013 का चुनाव दिल्ली में पहली बार लड़ा. कहा जाता है कि इन चुनावों में कांग्रेस  को अपनी हार अवश्यंभावी लग रही थी और इसलिए भाजपा को रोकने के लिए उसने ढके छुपे आम आदमी पार्टी को काफी सहायता दी. उनका मत था कि यदि दिल्ली का चुनाव त्रिकोणीय संघर्ष में बदल जाएगा तो  तो कांग्रेस  एक बार फिर सरकार बना सकती है. कांग्रेस का यह दांव उल्टा पड़ गया और इस त्रिकोणीय संघर्ष में त्रिशंकु विधानसभा के नतीजे आए और सबसे अधिक नुकसान कांग्रेस का हुआ.  15 साल से दिल्ली की सत्ता पर काबिज कांग्रेस  की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपदस्थ हो गई. यद्यपि भारतीय जनता पार्टी सबसे बडे दल के रूप में उभरी फिर भी 70 सदस्यों की विधानसभा में 31 सीटें पाकर भी सरकार बनाने में नाकामयाब रही.  आप 28 सीटें पाकर दूसरे स्थान पर रही और कांग्रेस 8 सीटों के साथ तीसरे  स्थान पर चली गई. भारतीय जनता पार्टी ने पर्याप्त समर्थन के अभाव में सरकार बनाने से इंकार कर दिया क्योंकि उसका मानना था कि यदि आप और कांग्रेस की मिली जुली सरकार बनती है तो भविष्य में इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को होगा. कांग्रेस  के सहयोग से केजरीवाल मुख्यमंत्री तो बन गए लेकिन जैसा कि केजरीवाल के नजदीकी लोग बताते हैं कि वह काम कम करते हैं झगड़ा ज्यादा करते हैं, सरकार  नहीं चली . वामपंथ से प्रभावित केजरीवाल बेहद जुझारू प्रवृत्ति के हैं जो आंदोलन के चलते तो केंद्र सरकार से लड़ते रहे और उसके बाद अपने सहयोगियों  से लड़ने लगे. यह सरकार बहुत ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी और केजरीवाल ने ४९ दिन में ही इस्तीफा दे दिया . नतीजतन दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. केजरीवाल यही नहीं रुके , उन्होंने वाराणसी से मोदी के विरुद्ध लोकसभा का चुनाव भी लड़ा जहां उन्हें भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा लेकिन फिर भी अपने आप को सुर्खियों में रखने में कामयाब हो गए . उन्होंने अपने विश्वसनीय कुमार विश्वास को भी अमेठी से चुनाव लड़ाया जहां से राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा की स्मृति ईरानी चुनाव लड़ रही थी. राहुल गांधी अपनी सीट हारते हारते बचे . स्मृति ईरानी ने उनको बहुत ही निकट की टक्कर दी. कुमार विश्वास कुछ भी कर पाने में सफल नहीं रहे . लेकिन यदि वह चुनाव में नहीं होते तो शायद राहुल गांधी का जीतना मुश्किल था.

५. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व भारतीय जनता पार्टी ने बहुमत प्राप्त किया जो 30 साल बाद किसी पार्टी को सांसद  में बहुमत मिला था . भाजपा ने दिल्ली की सभी 7 सीटें जीती और उसे 46% से भी अधिक मत प्राप्त हुए. लोकसभा चुनाव के कुछ समय बाद ही दिल्ली विधानसभा के मध्यावधि चुनाव हुए . इस बीच केजरीवाल ने बेहद नाटकीय अंदाज में अपना प्रचार जारी रखा जिसके केंद्र में मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग थे.  लोकसभा चुनाव की सौ प्रतिशत सफलता के बाद भारतीय जनता पार्टी को इन चुनावों से बेहद आशा थी  किंतु इन चुनावों में बहुत बड़ा उलटफेर हुआ . आम आदमी पार्टी को जबरदस्त सफलता मिली . उस ने 70 में से 67 सीटें जीतकर एक नया कीर्तिमान बनाया. भारतीय जनता पार्टी को केवल 3 सीटें प्राप्त हो सकी. कांग्रेस का सफाया हो गया.  जिस कांग्रेस ने भाजपा को रोकने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी पार्टी की हरसंभव  सहायता की थी वह उसके लिए इतनी घातक हुई कि कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. नाटकीय  अंदाज के माहिर,  केजरीवाल ने बेहद चालाकी से अपने आप को दिल्ली के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित कर लिया.

६. चुनाव में मिली अपार सफलता से केजरीवाल के हौसले बुलंदियों छूने लगे और उन्होंने अपना ध्यान काम पर लगाने की बजाय केंद्र सरकार और उपराज्यपाल के साथ झगड़ा करने में ज्यादा लगाया. वास्तव में ऐसा करने के पीछे उनका उद्देश्य हमेशा अपने आप को सुर्खियों में रखना और अपने सहयोगियों से  जिनमें कई लोकप्रियता में उनके समकक्ष थे, से अपने आप को बेहतर साबित करना था. उन्होंने अपने ऐसे सहयोगियों को जिनसे भविष्य में उनको खतरा हो सकता था एक-एक करके पार्टी से बेदखल करना शुरू कर दिया. शांति भूषण , प्रशांत भूषण , संतोष हेगड़े,  कुमार विश्वास , आशुतोष कुमार , शाजिया इल्मी , कपिल मिश्रा आदि कुछेक नाम उल्लेखनीय है .




७. अगर अरविंद केजरीवाल का पिछले 5 साल का रिकॉर्ड देखा जाए तो जनता के हित में जो काम वह गिनाते है वह चालाकी भरे  शातिराना अंदाज ज्यादा दिखाई पड़ते हैं . जैसे 200 यूनिट तक मुफ्त बिजली यानी अगर उपयोग 200 यूनिट के अंदर है तब तो बिजली का बिल माफ होगा अगर 200 यूनिट से एक यूनिट भी अधिक हो जाएगी तो उस बिल का पूरा भुगतान करना पड़ेगा. इसी तरह कुछ लीटर तक मुफ्त पानी . अभी हाल ही में महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा शुरू की है. इसके अलावा कुछ और योजनाएं हैं जिनमें बजट खर्च के हिसाब से देखा जाए  तो कुछ काम किया हुआ लगता है लेकिन धरातल पर परिस्थितियां अलग हैं, इनमें से मोहल्ला क्लीनिक और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कुछ कार्य भी शामिल है.

८. अपनी हार भांपते हुए, आप ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस से गठबंधन करने की हर संभव कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी.  विधान सभा चुनाव के विपरीत 2019 में हुए लोकसभा के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने फिर अपनी सफलता दोहराते हुए अपने पिछले रिकॉर्ड में अत्यधिक सुधार करते हुए न केवल सभी 7 सीटें जीती वरन अपना मत प्रतिशत 46% से बढ़ाकर 56%  पर पहुंचा दिया. यह एक बड़ा कीर्तिमान है और अगर लोकसभा के चुनाव को एक संकेत माना जाए तो निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बननी चाहिए किंतु चुनाव का विशेषण और जमीनी हकीकत कुछ अलग है जो CAA प्रदर्शनों के बाद लगातार बदल रही है. एक और तकनीकी बात यह है,कि  लोकसभा का क्षेत्र काफी बड़ा होता है और एक लोकसभा के चुनाव में औसतन 10 विधानसभा की सीटें आती हैं इसलिए चुनाव क्षेत्र छोटा हो जाता है और यहां पर विभिन्न तरह के समीकरण काम कर जाते हैं और उससे थोड़े से मतों के अंतर से हार जीत हो जाती है. इस विधानसभा चुनाव में पिछले लोकसभा के चुनाव की तरह ही कांग्रेस  की स्थिति अत्यधिक खराब है .कांग्रेस  की खराब स्थिति भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी है. ऐसे मतदाता खासतौर से मुस्लिम मतदाता जो कांग्रेस को वोट करते थे अब बदले हुए माहौल में एक विशेष रणनीति के तहत आप पार्टी को वोट करेंगे. देश के अन्य हिस्सों में भी देखा गया है कि सामान्य तौर से मुस्लिम मतदाता उसी पार्टी को वोट करते हैं जो भारतीय जनता पार्टी को हराने की क्षमता रखता हो और क्योंकि वर्तमान समय में कांग्रेसका कोई अस्तित्व नहीं है इसलिए कोई अन्य विकल्प न होने के कारण यह मत आम आदमी पार्टी के खाते में जाएंगे . इसलिए आम आदमी पार्टी का पलड़ा भारी हो सकता है . फिर भी मुकाबला बहुत दिलचस्प है क्योंकि आम आदमी पार्टी ने संशोधित नागरिक कानून के विरोध में जामिया से जेएनयू तक दिल्ली की सड़कों पर तांडव मचाने में एक वर्ग विशेष की बहुत सहायता की और यही नहीं इनके कुछ विधायकों और कार्यकर्ताओं ने उत्पात मचाने की शुरुआत भी की. वास्तव में जामिया से बवाल की शुरूआत  आप के नेता ने ही की बताई जाती है . आज भी शाहीन बाग में जो प्रदर्शनकारी धरने पर बैठे हैं उन्हें केजरीवाल सरकार का प्रत्यक्ष  समर्थन प्राप्त है और उन्हें बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही है. आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुल्लाह और कई कार्यकर्ता प्रदर्शनकारियों के साथ भड़काऊ बयान देते हुए प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए देखे गए हैं. केजरीवाल ने स्वयं CAA  के विरुद्ध युवाओं को भ्रमित करने का प्रयास किया.  मुस्लिम वर्ग में भय का माहौल पैदा करने मे लगे रहे. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने भी आग में घी डालने का हर संभव प्रयास किया उन्होंने आरोप लगाया की दिल्ली की पुलिस ने स्वयं दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन की बसों को आग लगाई जो कि निहायत गैर जिम्मेदाराना और गलत है. उनका ट्वीट अभी तक उनके अकाउंट में पड़ा है. वीडियो फुटेज और दूसरे प्रत्यक्षदर्शियों से पता चला की पुलिस ने इन बसों में पानी डालकर आग बुझाने का प्रयास किया. अरविंद केजरीवाल की बहुत ही नजदीकी और एनडीटीवी की पत्रकार ने इस बात का खुलासा किया है कि कैसे अरविंद केजरीवाल ने संशोधित नागरिक कानून की आड़ में हिंदू मुस्लिम भाईचारे को ठेस पहुंचाई. दोनों समुदायों का ध्रुवीकरण किया जाना एक सोची-समझी रणनीति है और इसका मकसद अल्पसंख्यकों वोट हासिल करना है. स्वाभाविक है कि दिल्ली में इस समय मतदाता दो ग्रुपों में बंटे हुए हैं अगर मुस्लिम मतदाता आम आदमी पार्टी को वोट देंगे  तो इसकी प्रतिक्रिया भी होगी और बहुत संभव है कि हिंदू मतदाता भी संगठित रूप से भाजपा को वोट करें और अगर ऐसा होता है तो आम आदमी पार्टी को जीतना  मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा.

९. अब बात करते हैं केजरीवाल  द्वारा किए गए उन कामों की जिनकी वजह से है कुछ खुद्दार लोगों को शर्म आती है उन्हें समर्थन करने से
·       अरविंद केजरीवाल ने अपने संघर्ष के दिनों से लेकर दिल्ली के चुनाव जीतने के पहले तक अपने आपको बेहद सीधा साधा इंसान साबित करने के लिए एक बेहद साधारण किस्म का मफलर लपेट रखा था, अब  पता नहीं वह कहां चला गया.
·       खांसी अरविंद केजरीवाल की पहचान थी अब गायब हो गई क्या यह बनावटी थी या सरकारी खर्चे पर सब कुछ हो सकता है.
·       परिवारवाद के विरुद्ध बोलने वाले केजरीवाल का पूरा परिवार आज चुनाव प्रचार में लगा हुआ है.
·       साईकिल और ऑटो से विधानसभा पहुंचने वाले केजरीवाल आज मुख्यमंत्री के पद का पूरा मजा ले रहे हैं .
·       आम आदमी का चोंगा लगाएं मुख्यमंत्री बनने के पहले से ही वह चंदे के पैसे से बिजनेस क्लास में सफर करते पाए गए .
·       पहली बार मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने के बाद भी मुख्यमंत्री को आवंटित बंगले को छोड़ने में आनाकानी करते रहे और कई महीने बाद छोड़ा .
·       हर ईमानदार और संघर्षशील साथियों  को चुन-चुन कर पार्टी से निकाल दिया उदहारण कुमार विश्वाश, आशुतोष, कपिल मिश्र, शाजिया इल्मी , योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण आदि
·       जेएनयू जाकर टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ अपनी आस्था व्यक्त की यानी देश से बढ़ कर स्वार्थ .
·       इनके  प्रधान सचिव पर सीबीआई का छापा पड़ा और कई आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई
·       हाल ही में महिलाओं के लिए दिल्ली सरकार की बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा
·       संशोधित नागरिक कानून के प्रति मुस्लिमों में भय का माहौल पैदा किया और पार्टी के मंत्रियों अन्य वरिष्ठ नेताओं ने जामिया से लेकर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय तक हंगामा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
·       केजरीवाल पर आरोप है कि उन्होंने विधानसभा के टिकट बेचे . इसके पहले भी  वह कुमार विश्वास का टिकट काटकर  एक उद्योगपति को राज्यसभा भेज चुके हैं.
·        केजरीवाल की बहुत नजदीकी और एनडीटीवी के पत्रकार ने उनके बारे में बहुत गोपनीय बातें साझा की जिसे पता चलता है कि हिंदू मुस्लिम समुदाय में ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने क्या-क्या नहीं किया यानी सामाजिक सद्भाव से कोई लेना देना नहीं. समाज का क्या ? भारत का विभाजन भी हो जाय तो क्या ? सत्ता चाहिए. 
·       एक फ्री लांस पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपाई के साथ उनका एक वीडियो वायरल हुआ जिसे पता चला कि वह अपने साक्षात्कार कैसे मैनेज करते थे यानी इंटरव्यू भी नाटक.


  • उपराज्यपाल के साथ उन्होंने यहाँ तक  झगड़ा किया कि उनके कार्यालय में अनशन शुरू कर दिया . देश के इतिहास की शाय पहली घटना थी जब किसी मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडलीय सहयोगी राज्यपाल के कार्यालय में कब्जा करके धरने पर बैठे थे.

·       गणतंत्र दिवस से कुछ पहले जबकि विदेशी मेहमान आ रहे थे, मुख्यमंत्री के रूप में केजरीवाल धरने पर बैठे थे. यानी सविंधान की परवाह नहीं .
·       भारत में हो रहे हर किसी कार्य की बुराई करते हैं लेकिन उनके पास भी उसका कोई समाधान नहीं है
·       मोदी की जिन चीजों की वह बुराई करते हैं उन्हीं की बड़ी शिद्दत से नकल करते हैं जैसे कि अपने मां बाप से आशीर्वाद लेने की फोटो वायरल करते हैं. कैमरा उनके पीछे घूमता है.
·       दिल्ली का प्रदूषण केजरीवाल के लिए एक वार्षिक समारोह है, जिसमें वपड़ोसी राज्यों को रेली जलाने और दूसरी चीजों के लिए दोषी ठहराते हैं और फिर दिल्ली के करदाताओं  के खर्चे पर लगभग सभी टीवी चैनलों पर बड़े-बड़े प्रचार देकर प्रदूषण पर किए जाने वाले उपायों के बारे में बताते हैं . अपनी छवि चमकाने का सरकारी प्रयास यानी हरड़ लगे न फिटकरी रंग चोखो हो जाय.
·       प्रदूषण से मुक्ति के लिए Odd and Even मुहिम चलाते हैं और करोड़ों रुपए खर्च करके टीवी चैनल पर लंबे-लंबे प्रचार करके अपनी छवि चमकाते हैं इतने रुपयों से तो पूरी दिल्ली पर हेलिकप्टर से पानी का छिडकाव किया जा साकता था.
·       वेतन न मिलने से गुस्साए सफाई कर्मियों ने दिल्ली को बनाया कूड़ाघर. कूड़े का अम्बार लगा.

·       लगातार कहते रहते है कि मोदी काम नहीं करने देते तो अभी मोदी को कमसे कम २०२४ तक तो रहना है . कैसे करेंगे काम?
·       सादगी का ढोंग रचने वाले डिनर में मंगाते है बारह हजार प्रति प्लेट का खाना .
·       लालू से गले मिले पटना में और किया साथ साथ कम करने का वादा

·       भ्रष्टाचार के तमाम मामले सामने आये और जन लोकपाल के मुद्दे पर नेता बने केजरीवाल अपनी सरकार में भी लोकपाल नियुक्त नहीं कर पाए .
·       पार्टी के भ्रष्टाचार की जाँच के लिए एडमिरल रामदास को आन्तरिक लोकपाल बनाया गया था पता नहीं वह अब कहाँ हैं?
·       दिल्ली के करदाताओं का पैसा पूरे हिंदुस्तान में राजनैतिक उद्देश्य साधने में  बांट रहे हैं.
·       ट्रासपोर्ट मिनिस्टर को भ्रष्टाचार में स्तीफा देना पड़ा – ४५० करोड़ रुपये का नम्बर प्लेट घोटाला
·       कानून मंत्री तोमर की सभी डिग्री फर्जी पाई गयी और स्तीफा देना पड़ा.
·       मोहल्ला क्लिनिक एक अच्छा विचार लेकिन घोटालों की बुनियाद पर चल रहा है अत्यधिक किराये के मकानों से लेकर भ्रष्टाचार
·       २१ विधायक लाभ के पद पर बैठाये गए जिन्हेबाद में स्तीफा देना पड़ा . यानी रेवड़ी बाँटने में माहिर.
·       सेना के लिए अपमान सूचक शब्दावली
·       पुलवामा और एयर स्ट्राइक पर सबूत मांगे यानी राष्ट्रीय सुरक्षा से मतलब नहीं , देश के स्वाभिमान से कोइ लेनादेना नहीं .
·       केजरीवाल का वादा - काम कम, लड़ाई ज्यादा
·       अरुण जेटली सहित कई भाजपा और कांग्रेस के नेताओं पर केजरीवाल ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाये, बाद में कोर्ट में लिखित माफी मांगी
·       जनता की सहानभूति  अर्जित करने के लिए रोड शो में अपनी पार्टी के आदमी से  खुद को थप्पड़ मरवाया.


·       ईमानदारी का खोखला दावा फर्जी कंपनियों से भी चंदा लिया
·       राशन घोटाले सहित कई घोटालों में में आम आदमी पार्टी  का नाम आया
·       सगे संबंधियों को सरकारी ठेका देने का आरोप
·       करदाताओं से इकट्ठा सरकारी धन की बरबादी टीवी पर प्रचार के लिए यानी मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन
·       सेल कंपनियों से चंदा यानी सुचिता या पारदर्शिता की कोई अहमियत नहीं. इंडिया अगेंस्ट करप्शन क्या सिर्फ नाटक और जनता के साथ छल ?
·       आप वोटरों को दस बिन्दुओं का गारंटी कार्ड जारी कर रही हैं यानी मतदाताओं को संतुष्टि न होने पर वे गारंटी इनवोक करेंगे  हैं ?


ये भारत  का दुर्भाग्य है कि आजादी के ७२ साल बाद भी आज देश की राजधानी सहित ज्यादातर विधानसभा और लोकसभा  चुनावों का आज भी मुद्दा होता है भूख , गरीबी , भ्रष्टाचारमहंगाई , कानून और व्यबस्था , और दमन . आज भी देश संघर्ष कर रहा है. असली मुद्दों पर तो चुनाव आ ही नहीं पाए हैं ५०० -१०००  रुपये के फायदे के लिए लोगों के वोट प्रभावित हो जाते हैं, और इसका नतीजा होता है बेहद चालबाज, भ्रष्ट और राष्ट्र हित में काम न करने वाले लोग  चुनाव  जीत कर  सरकार   बना लेते हैं. त्वरित लाभ के लिए बड़े विकास के प्रोजेक्ट आ ही नहीं पाते . भाजपा और आम आदमी पार्टी में किसकी सरकार बनती है यह तो निश्चित तौर पर आज नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बात बिल्कुल संदेह से परे है कि  कांग्रेस  की दुर्गति होनी एकदम से तय है इसमें किसी तरह का कोई भी संदेह कांग्रेस पार्टी को भी नहीं है. यही बात भाजपा केलिए खतरे की घंटी हैं. अगर कांग्रेस का प्रदर्शन इन चुनावों में अच्छा रहा  तो निसंदेह भाजपा अपना लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराएगी. आज की तिथि में एक और फैक्टर काम कर रहा है वह है टीना (TINA) यानी  There Is No Alternate क्योंकि भाजपा और कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के नाम घोषित नहीं किये हैं इसलिए जनता में यही सन्देश जा रहा है कि कोई विकल्प नहीं है. 
                                       

1 comment:

  1. मैंने अभी आपका ब्लॉग पढ़ा है, यह बहुत ही शानदार है।

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