शनिवार, 23 मई 2026

रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास

 



रायबरेली और अमेठी में राहुल ने निकाली भड़ास || मर्यादविहीन राजनीति, दिशाहीन आक्रोश में तड़प तड़प कर मरती काँग्रेस || कांग्रेस का भविष्य


1. शब्दों का अवमूल्यन और 'राहु' बने राहुल :-

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वैचारिक मतभेदों के बावजूद शीर्ष नेताओं के बीच परस्पर सम्मान और भाषाई शुचिता की एक गौरवशाली परंपरा रही है। अटल बिहारी वाजपेयी और जवाहरलाल नेहरू से लेकर समकालीन राजनीति तक, कड़वे से कड़वे विरोध को भी संसदीय मर्यादा के दायरे में || व्यक्त किया जाता रहा है। किंतु, हालिया वर्षों में भारतीय राजनीति के भाषाई स्तर में जो गिरावट आई है, उसने इस गौरवशाली इतिहास को झकझोर कर रख दिया है। वर्तमान परिदृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होने लगा है कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की अनियंत्रित बयानबाजी और आक्रामक शैली स्वयं कांग्रेस पार्टी और गांधी परिवार के लिए राजनीतिक ‘राहु’ की भूमिका निभा रही है।

राजनीति में आलोचना का स्वागत है, और एक मजबूत विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है, परंतु जब आलोचना का स्थान व्यक्तिगत कुंठा, अभद्र शब्दावली और गाली-गलौज ले ले, तो वह विमर्श न रहकर आत्मघाती कदम बन जाता है। राहुल गांधी के हालिया बयानों और उनकी भाव-भंगिमाओं ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वे राजनीतिक परिपक्वता और संसदीय शिष्टाचार के बुनियादी सिद्धांतों से अब भी कोसों दूर हैं।

2. अमेठी और रायबरेली का मंच: मर्यादा की सभी सीमाएं लांघता नेतृत्व :-

हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में आयोजित ‘बहुजन स्वाभिमान जनसभा’ को संबोधित करते हुए राहुल गांधी ने जिस प्रकार देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के प्रति अत्यंत अपमानजनक और अमर्यादित टिप्पणियां कीं, उसने लोकतांत्रिक संवाद को एक नए निचले स्तर पर धकेल दिया है। जनसभा में उपस्थित जनता को उकसाते हुए उन्होंने सार्वजनिक मंच से कहा:

"जब आप अपने घर पहुंचें और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के लोग आपके पास आकर नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा की बात करें, तो उनसे साफ कहना कि आपका प्रधानमंत्री गद्दार है, आपका गृहमंत्री गद्दार है और आपका संगठन गद्दार है। इन्होंने देश को बेचने और संविधान को नष्ट करने का कुत्सित कार्य किया है।"

एक जिम्मेदार राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता और संवैधानिक पद (नेता प्रतिपक्ष) पर बैठे व्यक्ति के मुख से देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के लिए ‘गद्दार’ जैसे संगीन शब्द का प्रयोग न केवल हैरान करने वाला है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर भी चोट करता है। इसके बाद, अपने पूर्व संसदीय क्षेत्र अमेठी में—जहाँ से उन्हें वर्ष 2019 में स्मृति ईरानी के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था—उसी तीखे तेवर, आक्रामक भाव-भंगिमा और हठधर्मिता को दोहराते हुए उन्होंने कहा कि इन लोगों ने देश के महापुरुषों और जनता के साथ गद्दारी की है, इसलिए वे इन्हें 'गद्दार' ही कहेंगे और इसके लिए किसी भी कीमत पर माफी नहीं मांगेंगे।

इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर बेहद सतही और व्यक्तिगत टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि जब देश में गैस, पेट्रोल और रोजगार का संकट है, तब प्रधानमंत्री इटली में मेलोनी के साथ 'मेलोडी' खा रहे हैं। अपनी उम्र और अनुभव में खुद से लगभग दो दशक बड़े, देश के तीन बार निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए "मोदी रोएगा", "पिटेगा" और "गिड़गिड़ाएगा" जैसी मवालिया छाप भाषा का प्रयोग करना किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी भाषा की अपेक्षा एक हाई स्कूल अनुत्तीर्ण छात्र से भी नहीं की जा सकती। यह आचरण किसी जमाने में बड़े जमींदार या रसूखदार घरों के बिगड़े हुए बच्चों की याद दिलाता है, जो अपनी असफलता के झुंझलाहट में बड़ों का आदर भूल जाते हैं। आज के आधुनिक परिवेश में एक अनपढ़ व्यक्ति भी सार्वजनिक रूप से ऐसी भाषा बोलने से कतराता है, लेकिन राहुल गांधी अपनी इन अमर्यादित टिप्पणियों को बार-बार दोहराकर ऐसा प्रदर्शित करते हैं मानो वे कोई महान और बहादुरी का ऐतिहासिक कार्य कर रहे हों।

3. निरंतर दोहराई जाती रणनीतिक भूलों का इतिहास :-

राहुल गांधी के लिए इस प्रकार की 'सिर-पैर विहीन' और आत्मघाती बयानबाजी कोई नई बात नहीं है। यदि उनके दो दशकों के राजनीतिक जीवन का अवलोकन किया जाए, तो यह साफ दिखाई देता है कि वे 'आलोचना' और 'ओछी गाली-गलौज' के बीच के महीन अंतर को कभी समझ ही नहीं पाए। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने देश भर में "चौकीदार चोर है" का नारा उछाला था। देश की जनता ने इसे प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत द्वेष माना और अंततोगत्वा यह नारा कांग्रेस की ऐतिहासिक और करारी हार का मुख्य कारण बना। देश की संप्रभुता और सुरक्षा के संवेदनशील मुद्दों पर भी उनका रवैया बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा है। पुलवामा के कायरतापूर्ण आतंकी हमले और उसके बाद भारतीय वायुसेना की जांबाज सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री पर सैनिकों के "खून की दलाली" करने का संगीन आरोप लगाया था। इस बयान ने न केवल देश की सेना के मनोबल पर चोट की, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत के विरोधियों को एक मुद्दा थमा दिया। लोकसभा के पटल पर खड़े होकर उन्होंने अत्यंत गैर-संसदीय भाषा में कहा था कि "युवा नरेंद्र मोदी को डंडे से पीटेंगे।" एक लोकतांत्रिक संसद के भीतर ऐसी हिंसक और अमर्यादित भाषा का प्रयोग स्वतंत्र भारत के संसदीय इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है।

राहुल गांधी की यह अलोकतांत्रिक और हठधर्मी मानसिकता केवल विपक्ष में रहते हुए ही नहीं दिखाई दी, बल्कि 2004 से 2014 के यूपीए शासनकाल के दौरान भी उनका आचरण हमेशा विवादों और संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के घेरे में रहा। भारतीय संसदीय इतिहास का वह काला दिन कोई नहीं भूल सकता, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह विदेश दौरे पर थे और उनकी कैबिनेट द्वारा सर्वसम्मति से पारित एक अध्यादेश को राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सरेआम फाड़कर रद्दी की टोकरी में फेंक दिया था। यह कृत्य न केवल अपनी ही सरकार के प्रधानमंत्री और कैबिनेट का अपमान था, बल्कि देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक संस्थाओं के मुंह पर एक करारा तमाचा था।

4. 2014 का युगांतकारी परिवर्तन और कांग्रेस की हताशा :-

2004 से 2014 तक का वह दशक भारतीय इतिहास में अभूतपूर्व भ्रष्टाचार (2G, कोयला, कॉमनवेल्थ घोटाला), भाई-भतीजावाद, नीतिगत पंगुता, चरमपंथी तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज के प्रति उपेक्षा के लिए जाना जाता है। इसी जन-आक्रोश के परिणामस्वरूप वर्ष 2014 में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और पूर्ण बहुमत देकर सत्ता की चाबी सौंपी।

यह भारतीय राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन था। भाजपा ने 30 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद देश में एक पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई—एक ऐसा कीर्तिमान जो स्वयं कांग्रेस पार्टी 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उपजी सहानुभूति की प्रचंड लहर के बाद कभी अपने दम पर हासिल नहीं कर पाई थी।

यह सच है कि कोई भी सरकार शत-प्रतिशत जन-अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर सकती, और भाजपा सरकार की भी अपनी सीमाएं रही होंगी, परंतु उसने देश की जनता को निराश नहीं किया। यही कारण है कि देश के राजनैतिक मानचित्र पर भाजपा का निरंतर विस्तार हो रहा है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ कभी भाजपा का वजूद न के बराबर था, वहाँ भाजपा का एक सशक्त विकल्प के रूप में उभरना और दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस का पूरी तरह से समाप्त हो जाना इसका सबसे ताजा और ज्वलंत उदाहरण है।

अब परिस्थितियां ऐसी हो चुकी हैं कि कांग्रेस अपने बलबूते पर केंद्र की सत्ता में वापसी कर पाए, इसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नजर नहीं आती। इसी ऐतिहासिक विफलता, पराजय और हाशिए पर चले जाने के कारण राहुल गांधी गहरे अवसाद, हताशा और निराशा से घिर चुके हैं। हालांकि, कांग्रेस को इस दयनीय स्थिति में पहुंचाने के लिए स्वयं उनकी नीतियां और अपरिपक्व नेतृत्व ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं। राहुल गांधी को लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गगनचुंबी लोकप्रियता को वे गाली देकर, कीचड़ उछालकर या अभद्र भाषा का प्रयोग करके कम कर सकते हैं, तो यह उनकी भारी राजनीतिक भूल और गलतफहमी है। भारत की समझदार और जागरूक जनता इस प्रकार की मूर्खतापूर्ण और अमर्यादित भाषा को कभी स्वीकार नहीं करती, बल्कि इससे पीड़ित नेता के प्रति सहानुभूति और लोकप्रियता और अधिक बढ़ जाती है।

5. राजनैतिक हैसियत और तुष्टिकरण की शरणस्थली :-

अपनी इसी अहंकार और अपरिपक्वता की राजनीति के कारण राहुल गांधी को अपनी पारंपरिक पारिवारिक सीट अमेठी तक गंवानी पड़ी। विडंबना देखिए कि उन्हें अपनी वास्तविक राजनीतिक हैसियत और मोदी लहर की ताकत का अंदाजा तब भी नहीं हुआ। उत्तर भारत से पूरी तरह नकार दिए जाने के बाद, उन्हें संसद पहुंचने के लिए देश के सुदूर दक्षिण में केरल की मुस्लिम बहुल सीट वायनाड का रुख करना पड़ा। वे वायनाड से लोकसभा केवल इसलिए पहुंच सके क्योंकि वहाँ 'मुस्लिम लीग' और उसके कैडर का उन्हें एकतरफा और पूर्ण समर्थन प्राप्त था। एक राष्ट्रीय दल के शीर्ष नेता का संसद पहुंचने के लिए क्षेत्रीय और सांप्रदायिक ताकतों के बैसाखी पर निर्भर होना उनकी राजनीतिक लाचारी को बयां करता है।

इतना ही नहीं, राहुल गांधी की इस ऊलजुलूल और ध्यान भटकाने वाली बयानबाजी के कारण वर्तमान वैश्विक परिदृश्य (ईरान-इजरायल तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका की आर्थिक चुनौतियां) के बीच भारत के समक्ष उत्पन्न होने वाले वास्तविक आर्थिक मुद्दों की गंभीर चर्चा ही गौण हो जाती है। वे देश की आर्थिक प्रणाली को बेचने का बेतुका आरोप लगाते हुए कहते हैं कि "मोदी ने हिंदुस्तान का पूरा आर्थिक सिस्टम अडानी, अंबानी और अमेरिका को सौंप दिया है।"

वे देश के सामने एक कृत्रिम 'आर्थिक तूफान' और मंदी का खौफ पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं, और दावा कर रहे हैं कि आने वाले महीनों में पेट्रोल, डीजल और दाल-चावल के दाम इस कदर बढ़ेंगे कि देश एक बड़े झटके से दहल उठेगा। वे हर आर्थिक नीति को क्रोनी कैपिटलिज्म के चश्मे से देखते हैं। हर मंच से वे जीएसटी, नोटबंदी और कोविड लॉकडाउन के पुराने राग अलापते रहते हैं, जिन्हें देश की जनता पहले ही चुनावों के जरिए खारिज कर चुकी है। उनके पास देश के विकास के लिए कोई वैकल्पिक विज़न या ठोस ब्लूप्रिंट नहीं है, बल्कि वही घिसे-पिटे मुद्दे हैं जिन्हें वे अपने प्रायोजित विदेशी दौरों में भी दोहराते हैं, और कई बार तो इस प्रक्रिया में वे अनजाने में देश-विरोधी ताकतों की भाषा बोलते हुए दिखाई देते हैं।

6. विदेशी दौरों का रहस्य और संबित पात्रा का बड़ा खुलासा

जहाँ एक तरफ राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आधिकारिक और रणनीतिक विदेश यात्राओं पर सवाल उठाते हैं, वहीं देश की जनता यह भली-भांति जानती है कि पीएम मोदी की यात्राएं व्यक्तिगत मनोरंजन या पर्यटन के लिए नहीं होतीं। उनकी यात्राओं का उद्देश्य भारत की अर्थव्यवस्था, द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सौदों और वैश्विक मंच पर भारत के भू-राजनीतिक महत्व को बढ़ाना होता है।

इसके विपरीत, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने नई दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से एक सनसनीखेज और विस्तृत ब्योरा जारी किया है, कि राहुल गांधी ने अपने पिछले 22 वर्ष के राजनीतिक जीवन में 54 घोषित विदेशी यात्राएं की हैं जिन पर 60 करोड रुपए से भी अधिक का खर्च आया है लेकिन उनकी यह यात्राएं ना तो पार्टी ने फंड की हैं और राहुल गांधी की व्यक्तिगत आय भी इतनी नहीं है। इसका इसका सीधा अर्थ है कि राहुल गांधी की विदेश यात्राएं प्रायोजित होती हैं और इनमें राष्ट्र विरोधी शक्तियों का होना होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। इन यात्राओं में मुख्य रूप से इटली, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), यूनाइटेड स्टेट्स (अमेरिका), जर्मनी, वियतनाम, कंबोडिया, सिंगापुर, बहरीन, मालदीव, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) शामिल हैं.

7. आंतरिक कलह और राज्यों के चुनावी समीकरण

यह एक कड़वा सच है कि भारत की समझदार जनता राहुल गांधी को एक गंभीर राजनेता के रूप में स्वीकार नहीं करती और उनके द्वारा उठाए गए किसी भी तथाकथित 'संकट' पर कोई जन-प्रतिक्रिया नहीं होती। स्वयं कांग्रेस पार्टी के भीतर भी एक बहुत बड़ा, अनुभवी और वरिष्ठ नेताओं का वर्ग उनके इन अपरिपक्व बयानों से असहमत रहता है और खुद को असहज महसूस करता है। परंतु, राहुल गांधी अपने इर्द-गिर्द मौजूद कुछ चाटुकारों और गैर-राजनैतिक सलाहकारों की 'नजदीकी कोठरी' (Coterie) के सहारे हमेशा सुर्खियों में बने रहने का प्रयास करते हैं, जिससे अंततः कांग्रेस पार्टी का ही भारी अहित होता है।

हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। उनकी एकमात्र उल्लेखनीय उपलब्धि केरल में उनके गठबंधन की जीत रही। राजनैतिक पंडितों और केरल के स्थानीय कांग्रेसी नेताओं का आंतरिक रूप से यह मानना है कि केरल में क्रमिक रूप से यूडीएफ और एलडीएफ की सरकारें बदलती रहती हैं। नियमानुसार, यह जीत पिछले चुनाव में ही मिल जानी चाहिए थी।

राजनैतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मत है कि यदि पिछले चुनावों में राहुल गांधी केरल के वायनाड से स्वयं सांसद नहीं होते, तो राज्य में सत्ता-विरोधी लहर का लाभ उठाकर कांग्रेस की सरकार बहुत पहले ही बन गई होती। लेकिन उनके वहां होने से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ा और वामपंथियों को दोबारा आने का मौका मिल गया। अब, जब वे वायनाड सीट छोड़कर उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से सांसद बन गए हैं और वायनाड सीट पर उनकी बहन प्रियंका वाड्रा चुनाव लड़कर संसद पहुँची हैं, तभी जाकर केरल राज्य में कांग्रेस के लिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाना संभव हो सका है। यह साफ दर्शाता है कि राहुल गांधी का चुनावी प्रभाव पार्टी के लिए फायदे की जगह नुकसानदेह साबित हो रहा है।

8. कॉंग्रेस को आत्ममंथन की आवश्यकता

यह स्पष्ट है कि लोकतंत्र के सुचारू संचालन के लिए एक मजबूत, वैचारिक और नीति-आधारित विपक्ष का होना अनिवार्य है। सरकार की गलत नीतियों का विरोध आंकड़ों, तर्कों और संसदीय मर्यादा के भीतर रहकर होना चाहिए। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे गरिमापूर्ण पदों पर बैठे व्यक्तियों को 'गद्दार' कहना या उनके शारीरिक नुकसान को लेकर अमर्यादित टिप्पणियां करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता।

यदि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी को भारतीय राजनीति के मुख्यधारा में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखनी है, तो उन्हें इस नकारात्मकता, व्यक्तिगत द्वेष और आत्मघाती विमर्श की राजनीति का परित्याग करना होगा। गाली-गलौज और विदेशी सरजमीं पर जाकर देश की छवि खराब करने की इस परिपाटी से नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तो कम नहीं होगी, लेकिन देश की जनता के बीच कांग्रेस की बची-खुची साख अवश्य समाप्त हो जाएगी। समय आ गया है कि कांग्रेस अपने इस 'राहु काल' से बाहर निकले और देश के सामने गाली के बदले एक सकारात्मक और रचनात्मक विज़न प्रस्तुत करे।


~~~~~~~~~Shiv Mishra ~~~~~~~~~~

सोमवार, 11 मई 2026

तमिलनाडु की राजनीति में क्या बदला? सनातन पर गहराया बड़ा खतरा !

 


तमिलनाडु की राजनीति में क्या बदला? सनातन पर गहराया बड़ा खतरा !

 

तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) के अध्यक्ष सी. जोसेफ़ विजय ने रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। इसके साथ ही राज्य में लगभग छह दशकों से जारी दो प्रमुख द्रविड़ दलों—डीएमके और एआईएडीएमके के बारी-बारी से सत्ता में आने का दौर समाप्त हो गया। मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने मंच पर ही तीन आदेशों पर हस्ताक्षर किए। इन आदेशों में हर घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त करना, नशे की समस्या से निपटने के लिए हर जिले में विशेष बल बनाना और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक 'स्पेशल टास्क फोर्स' बनाना शामिल है।

आइए जानते हैं सी. जोसेफ़ विजय के राजनीतिक करियर के बारे में कि क्या उन्होंने यह करियर स्वयं चुना या उन्हें राजनीति में लाया गया।

विजय की राजनीतिक पार्टी का नाम 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) है और यह नाम डीएमके और एआईएडीएमके से मिलता-जुलता है। डीएमके का नाम 'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' है और एआईएडीएमके यानी 'अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम'। स्वतंत्रता के बाद लगभग 20 साल तक कांग्रेस की सरकार रही और उसके बाद डीएमके सत्ता में आई। 1977 में तमिल सिनेमा के मशहूर नायक एम.जी. रामचंद्रन ने डीएमके से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई और उसका नाम एआईएडीएमके रखा। उसके बाद से पिछले लगभग 60 सालों से सत्ता का हस्तांतरण डीएमके और एआईएडीएमके के बीच ही होता रहा है।

'द्रविड़ मुनेत्र कड़गम' के नाम से ऐसा लगता है कि यह कोई स्थानीय पार्टी है जो द्रविड़ भावनाओं को आधार बनाकर रखी गई है, लेकिन ऐसा केवल ऊपरी तौर पर देखने से लगता है। वास्तव में, 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' द्वारा जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' रखा गया था, इसलिए पेरियार को इस पार्टी का संस्थापक नहीं कहा जा सकता। जस्टिस पार्टी की स्थापना 1916 में अंग्रेजों के इशारे पर टी.एम. नायर, पी. त्यागराज चेट्टी और सी. नटेसा मुदलियार ने की थी।

अंग्रेजों ने देखा कि उत्तर भारत में मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा सनातन धर्म को अत्यधिक नुकसान पहुँचाया जा चुका है, मंदिरों को क्षति पहुँचाई गई है और डरे-सहमे हिंदू मंदिर जाने से घबराते हैं। प्रथम दृष्टया देखने से ऐसा लगता है कि शायद हिंदुत्व की धार कुंद हो गई है; इसके विपरीत दक्षिण भारत, और खासतौर से तमिलनाडु में, हिंदुत्व की प्रबल धारा बह रही थी। सनातन का तत्कालीन महत्वपूर्ण केंद्र तमिलनाडु ही था। पूरे प्रदेश में मंदिरों की अत्यधिक संख्या थी, जिनमें धर्म-कर्म के अलावा संस्कृत और सनातनी गतिविधियाँ होती थीं। ये मंदिर संगीत, नृत्य तथा अन्य शिल्पों के केंद्र बने हुए थे और सही अर्थ में देखा जाए तो ये भारत की अर्थव्यवस्था की धुरी थे।

आपको ज्ञात होगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा भारत की जीडीपी पर करवाए गए शोध से पता चला कि पहली शताब्दी से लेकर 11वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे बड़ी थी और उसका हिस्सा एक-तिहाई था। 17वीं शताब्दी तक भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में नंबर एक बनी रही और इसका सबसे महत्वपूर्ण कारण 'मंदिर आधारित अर्थव्यवस्था' थी। अंग्रेजों के शासनकाल में यह लगातार गिरती रही और जब अंग्रेजों ने भारत छोड़ा, उस समय भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में केवल 3% के आसपास बची थी।

अंग्रेज चाहते थे कि जो काम मुस्लिम आक्रांताओं ने उत्तर, पूर्व और पश्चिम भारत में किया, वैसा ही कुछ दक्षिण भारत में भी किया जाए ताकि हिंदुत्व को नुकसान पहुँचाया जा सके और मिशनरियों को धर्मांतरण के लिए अच्छा सुअवसर उपलब्ध हो सके। उनके अनुसार वर्तमान व्यवस्था 'ब्राह्मणवादी' थी जो उनके मार्ग में बाधक थी, इसलिए उससे छुटकारा पाने के लिए एक पार्टी की आवश्यकता थी जिसका नाम 'जस्टिस पार्टी' रखा गया। घोषित तौर पर इसका उद्देश्य गैर-ब्राह्मणों के लिए शिक्षा, नौकरियों और राजनीति में उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था, ताकि 'ब्राह्मण मुक्त' या 'ब्राह्मण विरोधी' हिंदू समाज में धर्मांतरण का काम आसानी से हो सके।

1919 के 'मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों' के बाद 1920 के पहले चुनावों में जस्टिस पार्टी ने भारी जीत हासिल की और मद्रास प्रेसीडेंसी में सरकार बनाई। इस सरकार के बनते ही पूरे मद्रास प्रेसीडेंसी में जातिगत विभेद की भयानकता बढ़ गई और ब्राह्मणों के विरुद्ध उग्र आंदोलन शुरू हो गए। इस प्रकार विभाजित हिंदू समुदाय में मिशनरियों ने अपनी जड़ें जमाईं और धर्मांतरण का काम धड़ल्ले से शुरू हो गया। चूँकि धर्मांतरण के कार्य में ब्राह्मण बड़ी रुकावट थे, इसलिए हिंदुओं में जातिगत खाई चौड़ी करने के लिए गैर-ब्राह्मणों हेतु आरक्षण की शुरुआत की गई। साथ ही, सनातन धर्म का अपमान करने के लिए देवी-देवताओं को गालियाँ देने से लेकर भ्रामक साहित्य तैयार करने का काम सरकारी संरक्षण में होने लगा।

1921 और 1922 में 'सांप्रदायिक सरकारी आदेश' पारित किए गए, जिससे नौकरियों में आरक्षण की नींव पड़ी और सामाजिक अव्यवस्था शुरू हो गई। हिंदू समाज में मंदिरों के प्रभाव को कम करने और गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों से दूर ले जाने के लिए, मंदिर प्रशासन में सुधार के नाम पर 'हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती अधिनियम' (1926) पारित किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य सनातन चेतना की धुरी रहे मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना था, ताकि समाज सेवा से जुड़े भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास प्रवाह को रोका जा सके।

इससे हिंदू समाज में जाति-पाति की खाई इतनी चौड़ी हो गई कि पूरा समाज विभाजित हो गया, जिसकी भरपाई आज तक नहीं हो पाई है और तमिलनाडु आज भी इससे बुरी तरह संकटग्रस्त है। 1930 के दशक के मध्य तक जस्टिस पार्टी की लोकप्रियता कम होने लगी। 1937 के चुनावों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने जस्टिस पार्टी को बुरी तरह हरा दिया। 1944 में ई.वी. रामास्वामी 'पेरियार' ने जस्टिस पार्टी की कमान संभाली और इसका नाम बदलकर 'द्रविड़ कड़गम' (डीके) कर दिया।

अंग्रेजों के इशारे पर पेरियार ने अपनी पार्टी को सामाजिक सुधार आंदोलन के नाम पर सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते हुए हिंदू समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँटने की नीति पर अमल शुरू कर दिया। वास्तव में इस सब की आड़ में ईसाई मिशनरी तेजी से धर्मांतरण कर रहे थे और किसी को इसकी भनक भी नहीं लग रही थी, क्योंकि हिंदू अपने जातिगत झगड़ों में ही उलझे हुए थे।

आजादी के बाद यद्यपि कांग्रेस सत्ता में आ गई, लेकिन उसने भी हिंदू समाज में हो रहे इस षड्यंत्र के प्रति आँखें बंद कर लीं और 20 साल तक शासन किया। इस दौरान मिशनरी बिना रोक-टोक के चुपचाप धर्मांतरण का काम करते रहे। बाद में मुस्लिम कट्टरपंथी भी इसी कार्य में लग गए। 1967 में सी.एन. अन्नादुरई के नेतृत्व में डीएमके ने पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। उनके बाद एम. करुणानिधि ने कमान संभाली। ब्राह्मण विरोध के नाम पर सनातन धर्म का विरोध करना इस पार्टी को विरासत में मिला था और करुणानिधि ने इस काम को बखूबी अंजाम दिया।

इसके बाद एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने डीएमके से अलग होकर एआईएडीएमके बनाई और 1977 में मुख्यमंत्री बने। 1987 में उनके निधन तक वे सत्ता में रहे। इसके बाद से राज्य में सत्ता हर पांच साल में डीएमके और एआईएडीएमके के बीच बदलती रही। दोनों ही पार्टियों में जस्टिस पार्टी के सनातन विरोधी दुर्गुण मौजूद थे। कालांतर में डीएमके स्वयं को प्रखर हिंदू विरोधी सिद्ध करती रही, जबकि एआईएडीएमके ने थोड़ा लचीला रुख अपनाया। दोनों पार्टियाँ राष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति दर्ज करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन करती रहीं और दक्षिणपंथी जनसंघ या भाजपा से उचित दूरी बनाए रखी।

केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद दक्षिण में उसकी स्वीकार्यता कुछ हद तक बढ़ी और तमिलनाडु की दोनों पार्टियों ने कभी न कभी भाजपा की केंद्र सरकार को समर्थन दिया। डीएमके की कार्यप्रणाली में बदलाव यह आया कि उन्होंने मुस्लिम कट्टरपंथियों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। स्टालिन के सत्ता में आने के बाद स्वयं स्टालिन और उनके पुत्र उदयनिधि सनातन धर्म के विरुद्ध विष-वमन करते रहे और उसे डेंगू, मलेरिया, कोरोना जैसी महामारी बताने से गुरेज नहीं किया। हाल ही में स्टालिन सरकार ने एक मंदिर में 'दीपथून' यानी दीप प्रज्वलन की परंपरा को बंद कर दिया। उच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद उन्होंने इसका पालन नहीं किया और सुप्रीम कोर्ट तक गए, लेकिन दीप प्रज्वलन नहीं होने दिया। इस प्रकार उन्होंने स्वयं को सनातन विरोधी सिद्ध कर दिया, जिससे हिंदू संगठन सतर्क और सक्रिय हो गए।

ऐसा करते समय अनजाने में डीएमके ने ईसाई मिशनरियों को भी नाराज कर दिया, जो पहले ही डीएमके की 'प्रो-मुस्लिम' नीतियों से रुष्ट थे। मिशनरी धर्मांतरण का काम बहुत शांति से करते हैं ताकि बहुसंख्यक समाज इसके विरुद्ध आंदोलित न हो। स्टालिन और उदयनिधि की हरकतों से हिंदू समाज में जो हलचल हुई, उससे मिशनरियों के काम में व्यवधान उत्पन्न हुआ। मिशनरी अब डीएमके को और बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए उनके इशारे पर विजय ने 2 फरवरी 2024 को 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (टीवीके) के गठन की घोषणा की।

विजय ने अपनी पार्टी की विचारधारा को "धर्मनिरपेक्ष सामाजिक न्याय" बताया है। उन्होंने पेरियार, बी.आर. अंबेडकर और के. कामराज को अपना प्रेरणा स्रोत बताया। ईसाई मिशनरियों ने उनका जमकर साथ दिया और कहा जाता है कि उन्हें विदेशी सहायता भी प्राप्त हुई। 2026 के चुनावों में कांग्रेस और राहुल गांधी विजय के साथ गठबंधन करना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी अपनी नीति पर चलते हुए डीएमके के साथ डटी रहीं।

लेकिन बाजी पलट गई। विजय की पार्टी टीवीके को 108 सीटें मिलीं। 234 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 117 विधायकों की आवश्यकता थी। विजय ने राज्यपाल से मिलकर दावा पेश किया। जब समर्थन की समस्या आई, तो मिशनरियों के निर्देश पर सोनिया गांधी ने (जो पहले गठबंधन नहीं चाहती थीं) विजय को समर्थन देने की घोषणा करवा दी। हालांकि, संख्या बल के अभाव में शुरुआत में राज्यपाल ने निमंत्रण देने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के इस कदम को स्टालिन ने 'पीठ में छुरा घोंपना' बताया।

अंततः मिशनरियों ने स्टालिन को समझाया कि यदि भाजपा सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया, तो सनातन के विरुद्ध टिप्पणियों और न्यायालय की अवमानना के मामले में उनका जेल जाना निश्चित है। घबराकर स्टालिन ने अपने सहयोगियों (सीपीएम, सीपीआई, मुस्लिम लीग और वीसीके) को विजय के समर्थन के लिए राजी किया। इस प्रकार तमाम मोल-भाव के बाद विजय के पास 121 विधायकों का समर्थन हो गया और जोसेफ़ विजय तमिलनाडु के पहले ईसाई मुख्यमंत्री बन गए।

अब ईसाई मिशनरी अपना काम खुलकर कर सकेंगे, जैसा उन्होंने आंध्र प्रदेश में रेड्डी परिवार के कार्यकाल में किया था। एक विशेष बात जो मिशनरियों को अलग करती है, वह यह है कि वे 'लव जिहाद' के बजाय ईसाई लड़कियों को हिंदू परिवारों में बहू बनाकर भेजते हैं और बाद में पूरे परिवार का धर्मांतरण करा लेते हैं। इसके कई राजनीतिक उदाहरण जैसे रेड्डी परिवार, सोनिया गांधी का आगमन, और अन्य चर्चित विवाहों में देखे जा सकते हैं।

इससे स्पष्ट है कि राजनीति केवल सत्ता पाने का खेल नहीं है, इसका प्रभाव अत्यंत व्यापक होता है। इसलिए हमेशा सोते रहने वाले हिंदुओं को सावधान हो जाना चाहिए। सनातन गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है और यह असावधानी इसकी उद्गम भूमि पर ही इसके विलुप्त होने का कारण बन सकती है।

रविवार, 3 मई 2026

मुंबई 'लोन वुल्फ' हमला या गहरी साजिश?

 


मुंबई 'लोन वुल्फ' हमला या गहरी साजिश? || क्या बहुसंख्यक समाज की रतौंधी का कोई इलाज है ? || क्या भारत गजवा-ए-हिंद से बच सकेगा ? ||

 

सपनों के शहर मुंबई के एंटॉप हिल इलाके में हाल ही में हुई घटना सुरक्षा और कट्टरपंथ के दृष्टिकोण से अत्यंत चिंताजनक है। एक पॉश हाउसिंग सोसाइटी के द्वार पर 31 वर्षीय मोहम्मद ज़ैब 'ज़ुबैर' अंसारी नामक युवक द्वारा दो सुरक्षाकर्मियों पर किया गया जानलेवा हमला महज एक आकस्मिक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि एक गहरी और सोची-समझी साजिश का संकेत है। जांच एजेंसियां इसे 'लोन वुल्फ अटैक' मान रही हैं।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, ज़ुबैर पूरी तैयारी के साथ आया था और उसका व्यवहार असामान्य था। उसने बिना किसी उकसावे के गार्ड्स की गर्दन और शरीर के ऊपरी हिस्सों को निशाना बनाया। हमले की यह शैली—निहत्थे और निर्दोषों पर अचानक घातक प्रहार—आमतौर पर पेशेवर हमलावरों या तीव्र कट्टरपंथ से प्रेरित व्यक्तियों की पहचान होती है।

शिक्षित जिहाद: अमेरिका से मुंबई तक का सफर

ज़ुबैर कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि उच्च शिक्षित है। उसने बीएससी किया है और वर्ष 2000 से 2020 तक अमेरिका में अपने माता-पिता के साथ रहा था। वहां केंटकी में उसने लगभग 5 वर्षों तक एक स्कूल में टेनिस प्रशिक्षक के रूप में कार्य किया। वर्क परमिट खत्म होने के बाद वह भारत लौटा। उसकी पत्नी अफगानी मूल की है, जो वर्तमान में अमेरिका में है। 2022 में उसने लंदन (UK) में भी नौकरी की तलाश की थी, लेकिन सफल न होने पर भारत लौटकर ऑनलाइन ट्यूटर के रूप में रसायन विज्ञान और गणित पढ़ाने लगा।

मुंबई पुलिस और ATS की जांच में उसके डिजिटल फुटप्रिंट से चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। वह इंटरनेट पर प्रतिबंधित चरमपंथी संगठनों के वीडियो देखता था और 'लोन वुल्फ' हमलों के तरीके सीख रहा था। उसके ISIS से प्रेरित होने के स्पष्ट संकेत मिले हैं। यह साबित करता है कि कट्टरपंथ का संबंध आर्थिक तंगी से नहीं, बल्कि वैचारिक जहर से है।

सुरक्षा बनाम 'इंसैनिटी डिफेंस' का खेल

विश्व स्तर पर जब भी ऐसे जिहादी पकड़े जाते हैं, तो एक विशेष समुदाय उन्हें "भटका हुआ युवक" या "मानसिक विक्षिप्त" ठहराने का प्रयास शुरू कर देता है। इस मामले में भी वही 'इंसैनिटी डिफेंस' (मानसिक विक्षिप्तता का बचाव) का कार्ड खेला जा रहा है। यह भारतीय और वैश्विक कानून का वह प्रावधान है जिसका सहारा लेकर अपराधियों को बचाना आसान हो जाता है। कई बार तो पुलिस पर ही आरोप मढ़ दिए जाते हैं कि समुदाय विशेष को बदनाम करने के लिए उसे फंसाया जा रहा है।

मुंबई में जिहाद का काला इतिहास और तुष्टिकरण की राजनीति

मुंबई हमेशा से संवेदनशील रही है क्योंकि यह दाऊद इब्राहिम (1993 धमाकों का मुख्य आरोपी), हाजी मस्तान, वरदराजन मुदलियार, करीम लाला, छोटा शकील, अबू सालेम और टाइगर मेमन जैसे कुख्यात जिहादियों की कार्यस्थली रही है। ये अपराधी राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को अपना 'धार्मिक कर्तव्य' मानकर करते थे। तत्कालीन सरकारों की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और स्थानीय संरक्षण के कारण ही ये लंबे समय तक कानून से बचते रहे।

26 नवंबर 2008 का मुंबई हमला (26/11) इसका सबसे भयानक उदाहरण है, जिसे लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने अंजाम दिया। उसमें पकड़े गए एकमात्र आतंकी अजमल कसाब की फांसी को रोकने के लिए भी भारत के कुछ राजनीतिक गलियारों से हर संभव प्रयास किए गए और राष्ट्रपति के पास क्षमादान याचिका तक भेजी गई। अतः यदि आज मोहम्मद ज़ैब ज़ुबैर को बचाने के लिए भी कुछ राजनीतिक दल कतार में खड़े हो जाएं, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

पहलगाम से प्रेरणा: एक ही पैटर्न

मुंबई की यह घटना केवल स्थानीय विवाद नहीं है। पूरा देश पहलगाम (बेसरन घाटी) की उस घटना को नहीं भूला होगा जिसमें हिंदुओं का धर्म पूछकर, कलमा पढ़वाकर और पहचान सुनिश्चित कर गोलियों से भून दिया गया था। इसके बाद ही भारत ने 'ऑपरेशन सिन्दूर' के माध्यम से सीमा पार आतंकी शिविरों को नष्ट किया था। ज़ुबैर की कार्यशैली भी पहलगाम से प्रेरित दिखती है, जहाँ उसने हमला करने से पहले गार्ड्स की धार्मिक पहचान पूछी।

दुखद यह है कि जहाँ पहलगाम घटना पर कुछ राजनीतिक हस्तियों ने इसे "भेदभाव की प्रतिक्रिया" बताया था, जिसमें प्रियंका वाड्रा के पति राबेर्ट वाड्रा प्रमुख थे लेकिन मुंबई की इस घटना पर तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दल पूरी तरह मौन हैं।

वैश्विक परिदृश्य: 'अर्बन टेररिज्म' का विस्तार

यह 'लोन वुल्फ' आतंक केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक आतंकवाद सूचकांक के अनुसार, पश्चिमी देशों में 93% हमले इसी तरह अकेले हमलावरों द्वारा किए जाते हैं।

फ्रांस (2016): ट्रक से भीड़ को कुचलकर 86 लोगों की हत्या।

अमेरिका (ऑरलैंडो): उमर मतीन द्वारा 49 लोगों की हत्या।

ब्रिटेन (लंदन): सांसद डेविड एमेस की चाकू घोंपकर हत्या।

न्यूजीलैंड (क्राइस्टचर्च): धार्मिक स्थल पर अंधाधुंध फायरिंग।

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल-गाजा संघर्ष के बाद इन हमलों में 200% की वृद्धि हुई है। अब हमलावर टेलीग्राम और डार्क वेब जैसे प्लेटफॉर्म्स का उपयोग कर रहे हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना एजेंसियों के लिए कठिन हो गया है।

'सर तन से जुदा' और सड़कों पर न्याय का आतंक

मुंबई की घटना में ज़ुबैर ने जिस तरह गार्ड्स का धर्म पूछा, वह सीधे तौर पर उदयपुर के कन्हैया लाल की नृशंस हत्या की याद दिलाता है। नूपुर शर्मा प्रकरण के बाद उभरा 'सर तन से जुदा' का नारा अब केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक 'स्ट्रीट जस्टिस' (सड़क पर न्याय) का तंत्र बन गया है। यह नैरेटिव युवाओं को यह विश्वास दिलाता है कि वे कानून से ऊपर हैं। यही वह माहौल है जो ज़ुबैर जैसे लोगों को 'लोन वुल्फ' बनने का साहस प्रदान करता है, जहाँ उन्हें लगता है कि वे अपनी आस्था के लिए 'काफिरों' को दंडित कर रहे हैं।

जिहाद के झंगुर बाबा और सूचना युद्ध

समाज का ध्यान भटकाने के लिए अक्सर 'झंगुर बाबा' या 'सीमा हैदर' जैसे अजीबो गरीब तत्वों की कहानी सामने आ जाती हैं । जब भारत के लाल कन्हैया लाल बन रहे हों, ज़ुबैर अंसारी जैसे गंभीर खतरों पर देश चर्चा कर रहा होता है, तब अचानक सोशल मीडिया पर बेरोजगारी, पेट्रोल की कीमत, महगाई जैसे विषयों को ट्रेंड करवा दिया जाता है। यह वर्ग विशेष की 'डिजिटल डिस्ट्रैक्शन' की वह वैश्विक रणनीति है, जिससे बहुसंख्यक समाज वास्तविक खतरों से अपनी आँखें मूंद कर तर्कहीन और अंतहीन मुद्दों में उलझ जाता है, जबकि पीछे से कट्टरपंथी नेटवर्क अपनी जड़ें और गहरी कर रहा होता है।

वक्फ बोर्ड का भूमि जिहाद

सड़क और कॉर्पोरेट के बाद, अब तीसरा मोर्चा 'वक्फ बोर्ड' और भूमि विवादों के रूप में सामने है। जिस तरह से वक्फ कानून का उपयोग कर सार्वजनिक संपत्तियों, मंदिरों और किसानों की जमीनों पर दावे किए जा रहे हैं, वह भारत के भीतर एक 'स्टेट विदइन अ स्टेट' (राज्य के भीतर राज्य) बनाने की कोशिश है। यह 'लैंड जिहाद' का वह कानूनी संस्करण है, जो भारत की भौगोलिक अखंडता के लिए ज़ुबैर के चाकू से भी अधिक घातक है।

गजवा-ए-हिंद और आधुनिक चुनौतियां

इन सभी जिहादी गतिविधियों का मूल उद्देश्य 'गजवा-ए-हिंद' यानी भारत का इस्लामीकरण करना है। चाहे वह टीसीएस जैसे संस्थानों में 'कॉर्पोरेट जिहाद' के माध्यम से घुसपैठ हो, अमरावती-नासिक की घटनाएं हों या मुंबई का यह हमला—ये सभी एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं। जब एजेंसियां किसी एक घटना पर ध्यान केंद्रित करती हैं, तो ध्यान भटकाने के लिए नया मोर्चा खोल दिया जाता है।

भारत का दुखद पहलू यह है कि यहाँ संवैधानिक अधिकारों की आड़ में घुसपैठ को वोट बैंक बनाया जा रहा है और कट्टरपंथी तत्वों को प्राथमिकता मिल रही है। इस 'मूर्ख मानसिकता' के कारण भारत के वर्तमान स्वरूप पर खतरा बढ़ता जा रहा है।

क्या हम तैयार हैं?

मोहम्मद बिन कासिम के पहले आक्रमण से लेकर आज के 'डिजिटल जिहाद' तक, उद्देश्य एक ही रहा है—भारत की सनातन पहचान को मिटाना। समुदाय विशेष के शिक्षित तबके का इन घटनाओं पर मौन रहना या दबी जुबान में समर्थन करना यह बताता है कि यह लड़ाई केवल चंद गुमराह युवाओं की नहीं है, बल्कि एक गहरी जड़ें जमा चुकी विचारधारा की है।

अंतिम चेतावनी:

खतरा अब सरहद पर खड़े दुश्मन से कहीं ज्यादा हमारे बगल में बैठे उस व्यक्ति से है जो आधुनिक तकनीक और डिग्रियों से लैस है, लेकिन जिसका वैचारिक कंपास 1400 साल पीछे अटका है। ज़ुबैर की घटना एक वेक-अप कॉल है।यह घटना हमें याद दिलाती है कि खतरा अब केवल सीमा पर नहीं, बल्कि हमारे शहर, मोहल्ले और दरवाजे तक पहुँच गया है। यदि आज हम टीसीएस के कॉर्पोरेट केबिन से लेकर हाउसिंग सोसाइटी के गेट तक फैले इस मकड़जाल को नहीं पहचान पाए, तो भविष्य का भारत केवल इतिहास की किताबों में ही सुरक्षित बचेगा।

आज प्रश्न यह नहीं है कि ज़ुबैर ने हमला क्यों किया; प्रश्न यह है कि क्या आप और आपका तंत्र अगले हमले को रोकने के लिए तैयार हैं?

~~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~


रविवार, 26 अप्रैल 2026

कॉर्पोरेट जिहाद : संस्थागत षड्यंत्र || भारत के इस्लामीकरण की कैंसर ग्रोथ

 


कॉर्पोरेट जिहाद : संस्थागत षड्यंत्र || सनातन के अस्तित्व पर सबसे संकट || भारत के इस्लामीकरण की कैंसर ग्रोथ


इतिहास के पृष्ठों में युद्ध सदैव रणभूमियों में लड़े गए, जहाँ शस्त्रों की टंकार और सेनाओं का गर्जन विजय का निर्णय करता था। किंतु २१वीं सदी का भारत एक ऐसे ‘अदृश्य युद्ध’ का साक्षी बन रहा है, जहाँ शत्रु सीमाओं पर नहीं, बल्कि महानगरों के वातानुकूलित कार्यालयों, चमचमाती बहुराष्ट्रीय कंपनियों और डिजिटल कार्यक्षेत्रों के भीतर घात लगाकर बैठा है। कार्यस्थल, जिन्हें व्यावसायिक प्रगति और राष्ट्रीय आर्थिक उन्नति का आधार स्तंभ होना चाहिए था, आज ‘धर्मान्तरण’ और ‘वैचारिक कट्टरता’ की गुप्त प्रयोगशालाओं में परिवर्तित हो रहे हैं।

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टी-सी-एस), लेंसकार्ट और ज़ोमैटो जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड्स का इस चर्चा के केंद्र में आना यह सिद्ध करता है कि यह विषय केवल व्यक्तिगत आस्था का नहीं है। यह कार्यस्थल को मतांतरण का केंद्र बनाने और परोक्ष रूप से भारत के ‘@स्लामीकरन’ के उस वैश्विक षड्यंत्र का हिस्सा है, जिसमें बड़े कॉर्पोरेट अपने स्वार्थ और विदेशी निवेश के लोभ में इस कुचक्र को न केवल अनदेखा करते हैं, बल्कि उसे संस्थागत सहायता भी प्रदान करते हैं।

मोदी सरकार का नीतिआयोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के हथियारों को गति दे रहा है. मोदी को जबतक दुनिया का हर मुस्लिम देश अपने यहाँ का सर्वोच्च सम्मान नहीं दे देता तब तक सनातन की जड़ो में मट्ठा डालने वालों को रोका नहीं जाएगा, इसलिए भारत के *स्लामिक राष्ट्र बनाने की तारीख २०४७ के पहले भी आ सकती है.

देखते हैं कॉर्पोरेट जिहाद की माया जाल.

१. प्रमुख प्रकरणों का विश्लेषण: षड्यंत्र की गहरी होती जड़ें

टी-सी-एस का मामला: पदोन्नति और शोषण का कुचक्र-

मतांतरण से जुड़ा यह विवाद तब सुर्ख़ियों में आया जब सोशल मीडिया और पुलिस, और व्यक्तिगत रिपोर्टों में यह पाया गया कि कंपनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारी अपनी स्थिति का अनुचित लाभ उठाकर कनिष्ठ कर्मचारियों को छल-कपट से मुस्लिम बना रहे हैं। इस षड्यंत्र के अंतर्गत हिंदू कन्याओं को सुनियोजित ढंग से मुस्लिम युवकों के संपर्क में लाया जाता था। इसमें चुस्लिम महिला ह्यूमन रिसोर्स प्रबंधक की मुख्य भूमिका पाई गई है, जिसके तार ‘अल्फला यूनिवर्सिटी’ की एक आतंकी महिला डॉक्टर से भी जुड़े होने की बात सामने आई है।

आरोप है कि ये अधिकारी पदोन्नति और उत्कृष्ट रेटिंग्स का लोभ दिखाकर हिंदू लड़कियों को मानसिक और शारीरिक शोषण का शिकार बनाते थे। गंभीर आरोप तो यहाँ तक लगे हैं कि इनमें से कुछ को मुस्लिम देशों में मानव तस्करी के माध्यम से भेजने की योजना थी। यद्यपि टाटा समूह ने इन आरोपों की जांच कर भेदभाव न बरतने की बात कही है, परंतु धरातल की वास्तविकता और पीड़ित कर्मचारियों का आक्रोश इस स्पष्टीकरण पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

भारत के एक प्रमुख बैंक की आई टी का विभागाध्यक्ष रहने के समय मेरे पास टीसीएस के लगभग 200, टेक महिंद्रा के 300 के अलावा इनफ़ोसिस, एम्फसिस सहित तमाम भारतीय आई टी कंपनियों के कर्मचारी थे, जिनमे सबसे अधिक संदिग्ध माहौल टीसीएस टीम के के बीच ही था लेकिन बैंक का ओन साईट सप्पोर्ट होने के कारण कार्यस्थल नियंत्रण हमारे पास था लेकिन डाटा लीकेज, आईपीआर चोरी जैसे बहुत से मामले जल्द ही सामने आ सकते हैं और ये सबकुछ कंपनियों की आपसी प्रतिस्पर्धा और लाभप्रदता के लिए हो रहा था इस पर अलग से लेख लिखूंगा.

लेंसकार्ट और अन्य डिजिटल स्टार्टअप्स-

लेंसकार्ट और कुछ अन्य स्टार्टअप्स में भी ऐसे ही पक्षपातपूर्ण मामले उजागर हुए हैं। जहाँ हिंदू कर्मचारियों के तिलक, कलावा या अन्य धार्मिक प्रतीकों पर ‘अव्यवसायिक’ होने का ठप्पा लगाकर पाबंदी लगाई गई, वहीं मुस्लिम कर्मचारियों को कार्यालय समय में नमाज़ की अनुमति और विशेष धार्मिक पहनावे की छूट दी गई। यह दोहरा मापदंड स्पष्ट करता है कि ‘विविधता’ का नारा केवल एकतरफा तुष्टीकरण का मुखौटा है।

२. क्यों हो रहा है कोर्पोरेट जिहाद : आर-ई-डी-आई इंडेक्स ( REDI) का मायाजाल -

आज के ‘आधुनिक असुर’ शारीरिक रूप से आक्रमण नहीं करते, बल्कि वे ‘वैचारिक और सांस्कृतिक’ मायाजाल बुनते हैं। इस षड्यंत्र का सबसे सूक्ष्म और घातक उपकरण है— आर-ई-डी-आई (रिलिजियस एक्विटी डाइवर्सिटी एंड इन्क्लूजन) इंडेक्स

यह सूचकांक, जिसे वामपंथी-इस्लामी गठजोड़ और वैश्विक डीप स्टेट द्वारा वित्तपोषित किया जा रहा है, भारतीय कॉर्पोरेट जगत के लिए नया ‘सॉफ्ट जिहाद’ बन गया है। विश्व की जानी-मानी बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी ग्लोबल रेटिंग सुधारने, विदेशी ऋण प्राप्त करने और टैक्स में छूट पाने के लिए इन मानदंडों को लागू करती हैं।

आर-ई-डी-आई के ११ घातक अनुदेशों में मुख्यतया ये है :

१. कंपनियों को आधिकारिक तौर पर धार्मिक समूह (जैसे मुस्लिम एम्प्लॉई नेटवर्क) बनाने की अनुमति देनी चाहिए।

२. कार्यालय परिसर के भीतर ‘साइलेंट रूम’ या ‘प्रेयर हॉल’ की अनिवार्य व्यवस्था, जो अंततः नमाज़ केंद्रों में बदल जाते हैं।

३. रमजान जैसे त्योहारों के दौरान काम के घंटों में विशेष रियायत देना।

४. हिजाब जैसे धार्मिक प्रतीकों को ‘प्रोफेशनल ड्रेस कोड’ का हिस्सा मानना।

५. कैंटीन में केवल ‘हलाल प्रमाणित’ भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करना।

आंकड़ों की भयावहता: वर्ष २०२५-२६ के नवीनतम डेटा के अनुसार, ११० अंकों के सूचकांक में

असेंचर (१०५),

डेल (९८) और

टी-सी-एस (९०)

नॉन आई टी कंपनियों में इंडिगो ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं.

जैसे दिग्गजों का उच्च स्कोर यह दर्शाता है कि भारतीय कार्यस्थलों पर अब्राहमिक प्रथाओं का प्रभाव कितनी तीव्रता से बढ़ रहा है और ये कंपनियां हिन्दू धर्म के लिए कितनी खतरनाक बनती जा रही हैं. जिसका जितना ऊंचा स्कोर उतना ही खतरनाक .

३. अमरावती और नागपुर: समाज की कोख पर प्रहार

कॉर्पोरेट के वातानुकूलित कमरों से बाहर यह षड्यंत्र समाज की धमनियों में विष घोल रहा है। अप्रैल २०२६ में अमरावती के परतवाड़ा क्षेत्र में उजागर हुई घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है।

अमरावती यौन शोषण मामला (अप्रैल २०२६):

मुख्य आरोपी अयान अहमद तनवीर (१९ वर्ष) पर लगभग १८० नाबालिग हिंदू लड़कियों को अपने जाल में फंसाने, उनके अश्लील वीडियो बनाने और उन्हें ब्लैमेल करने के आरोप हैं। स्थानीय समाज इसे ‘लव जिहाद’ का एक सुसंगठित मॉडल मान रहा है। बिना किसी संस्थागत और आर्थिक सहयोग के, एक किशोर आयु का युवक इतने व्यापक स्तर पर अपराध को अंजाम नहीं दे सकता। महाराष्ट्र सरकार ने इसके लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एस-आई-टी) का गठन किया है, जिसने अब तक ८ आरोपियों को गिरफ्तार किया है। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि एक ‘डेमोग्राफिक वॉरफेयर’ (जनसांख्यिकीय युद्ध) है।

नागपुर का एनजीओ मॉडल:

नागपुर में एक एन-जी-ओ के भीतर जिस प्रकार आर्थिक रूप से निर्बल और महत्वाकांक्षी युवतियों को नौकरी का झांसा देकर उनका यौन शोषण किया गया और अंततः उन्हें धर्म बदलने पर मजबूर किया गया, वह इस ‘अदृश्य युद्ध’ की भयावहता को रेखांकित करता है। यहाँ धर्म आस्था नहीं, बल्कि शोषण का एक शस्त्र बन चुका है।

४. केरल मॉडल: प्रशासनिक कवच और विधिक संकट

यदि हम दक्षिण की ओर देखें, तो केरल एक ऐसी प्रयोगशाला बन चुका है जहाँ कट्टरपंथ को ‘कानूनी और सरकारी’ कवच प्राप्त है। स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत ३० दिनों का सार्वजनिक नोटिस जोड़ों की सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि कट्टरपंथी समूहों के लिए ‘डेटा’ का काम करता है। सरकारी वेबसाइटों से सूचनाएं लीक होना और फिर उन हिंदू परिवारों पर सामाजिक-धार्मिक दबाव बनाना यह दर्शाता है कि प्रशासनिक मशीनरी का उपयोग किस प्रकार एक विशिष्ट एजेंडे को सफल बनाने के लिए किया जा रहा है।

केरल वर्तमान समय में लव् जिहाद के बाद सुरक्षित निकाह का सरकारी पंजीकरण का गढ़ बन गया है.

५. छद्म युद्धों के विविध आयाम (मल्टी-डायमेंशनल जिहाद)

यह षड्यंत्र केवल कार्यस्थल या प्रेम के जाल तक सीमित नहीं है, इसके कई अन्य सूक्ष्म रूप हैं:

मनोरंजन और नैरेटिव जिहाद: ओ-टी-टी प्लेटफॉर्म्स और सिनेमा के माध्यम से हिंदू प्रतीकों को नकारात्मक और अन्य कट्टरपंथी प्रथाओं को उदारवादी दिखाकर हिंदू युवाओं में अपने संस्कारों के प्रति घृणा पैदा करना।

हलाल इकोनॉमी: सौंदर्य प्रसाधनों से लेकर आवासीय परियोजनाओं तक को ‘हलाल प्रमाणित’ करना एक समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी करने की साजिश है, जिसका धन अंततः मतांतरण और विधिक लड़ाइयों में उपयोग होता है।

विधिक संकट: वक्फ कानून जैसे प्रावधानों और राष्ट्रीय स्तर पर मतांतरण विरोधी कानून की कमी ने हिंदू समाज के लिए कानूनी संघर्ष को अत्यंत कठिन बना दिया है।

६. समाधान का मार्ग आसान नहीं : हिंदू समाज का रणनीतिक उत्तर देना चाहिए

इन विषम परिस्थितियों में मौन रहना आत्मघाती सिद्ध होगा। हिंदू समाज को अब ‘रक्षात्मक’ मुद्रा छोड़कर ‘रचनात्मक और संगठित’ होना होगा:

१. आर्थिक स्वावलंबन और बहिष्कार: ऐसी कंपनियों और ब्रांड्स को चिन्हित करना होगा जो ‘समावेशन’ के नाम पर हिंदू विरोधी एजेंडा चलाते हैं। समाज को अपनी आर्थिक शक्ति का परिचय देना चाहिए।

२. विधिक मोर्चा: केंद्र सरकार पर दबाव बनाना होगा कि ‘अवैध धर्मान्तरण’ के विरुद्ध एक सशक्त राष्ट्रीय कानून और यूनिफॉर्म सिविल कोड (यू-सी-सी) को तत्काल प्रभाव से लागू किया जाए।

३. कॉर्पोरेट ऑडिट की मांग: श्रम मंत्रालय को बड़ी कंपनियों के ‘वर्क कल्चर’ और वहां होने वाली शिकायतों का समय-समय पर ऑडिट करना चाहिए। जिस तरह ‘पॉश’ (यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कानून) अनिवार्य है, उसी तरह धार्मिक भेदभाव के लिए एक स्वतंत्र सरकारी हेल्पलाइन होनी चाहिए।

४. बौद्धिक क्षत्रियत्व: हमें अपने लेखकों, स्तंभकारों और बुद्धिजीवियों का एक ऐसा वर्ग तैयार करना होगा जो आर-ई-डी-आई जैसी विदेशी नीतियों के षड्यंत्र को जनता के सामने बेनकाब कर सके।

५. पारिवारिक दायित्व: अपनी संतानों, विशेषकर कन्याओं को संस्कारित करने के साथ-साथ उन्हें ‘बौद्धिक शोषण’ के प्रति तार्किक रूप से सचेत करना होगा।

अस्तित्व की रक्षा का अंतिम आह्वान

इतिहास साक्षी है कि जो समाज अपनी संस्कृति और अपनी अगली पीढ़ी की रक्षा नहीं कर पाता, उसे भूगोल से मिटने में देर नहीं लगती। अमरावती की चीखें हों या कॉर्पोरेट कार्यालयों का वैचारिक बंधन—ये सब एक ही महायोजना के विभिन्न अध्याय हैं। आधुनिक असुर अब तलवार लेकर नहीं, बल्कि ‘ऑफर लेटर’ और ‘ग्लोबल रेटिंग’ का लोभ लेकर आते हैं।

हिंदू समाज को अब अपनी ‘सहिष्णुता’ की परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा। सहिष्णुता जब तक गुण है, तब तक वह रक्षा कवच बनी रहती है, किंतु जब वह शत्रु की कुटिलता को देखकर भी आँखें मूँद ले, तो वह केवल ‘कायरता’ का दूसरा नाम बन जाती है। समय आ गया है कि हम प्रत्येक घर में एक ‘बौद्धिक क्षत्रिय’ खड़ा करें।

स्मरण रहे, जिस दिन सनातन की यह ज्योति बुझी, उस दिन संपूर्ण विश्व मानवता के उस अंतिम प्रकाश से वंचित हो जाएगा जो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का स्वप्न देखता है। अपनी जड़ों की ओर लौटें, अपने अस्तित्व के लिए सन्नद्ध हों, और डंके की चोट पर कहें कि हम अपनी संस्कृति की बलि देकर मिलने वाली किसी भी प्रगति के कट्टर शत्रु हैं।

“धर्मो रक्षति रक्षितः”

(जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।)

और धर्म की रक्षा कैसे हो ? - भगवान परशुराम ने कहा है

"अग्रत: चतुरो वेदा: पृष्ठत: सशरं धनु:।

इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि॥"

यानी हर हिन्दू चारो वेद ( सभी हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ ) मार्ग दर्शन के लिए आगे हों और उन ग्रंथो की रक्षा के लिए बाण चढ़ा हुआ धनुष पीछे हो जो वेदों की रक्षा कर सके. जब शस्त्र और शास्त्र दोनों का संतुलन होता है, तब धर्म और व्यवस्था सुरक्षित रहती है।

हिन्दुओं की शस्त्र विहीनता उनके शास्त्रों पर ही नहीं पूरे सनातन के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर रही है.

सोचिये ….. कितना तैयार है आप ?

~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~



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