शनिवार, 10 जनवरी 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण

 


सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 साल बाद इतिहास का पुनर्स्मरण || सोमनाथ का संघर्ष – गजनवी से नेहरू तक लगातार शत्रुता का शिकार || मोदी की उपस्थिति से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नया विमर्श


सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले के 1,000 साल और मंदिर के आधुनिक जीर्णोद्धार के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में 8 से 11 जनवरी 2026 तक चार दिवसीय ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ का आयोजन किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 10 और 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर में रहेंगे और पर्व का हिस्सा बनेंगे। एक हजार वर्ष पूर्व जनवरी 1026 में @स्लामी आक्रांता महमूद गजनवी ने केवल धन-सम्पत्ति की लूट के लिए नहीं, बल्कि जिहादी बर्बरता में इस्लाम के प्रचार और प्रसार तथा @स्लामिक सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए आक्रमण किया था, क्योंकि सोमनाथ मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से सर्वप्रथम है और सबसे महत्वपूर्ण भी है। उसके बाद भी धर्मांध आक्रांताओं के अनेक आक्रमण हुए, लेकिन वे भारत की शाश्वत आस्था को डिगा नहीं सके और सोमनाथ का बार-बार पुनरुद्धार होता रहा।

नेहरू के पत्रों ने खोला कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “सोमनाथ स्वाभिमान पर्व” में जाने से पूर्व ही सोशल मीडिया पर मंदिर में 50 साल बाद हुए समारोह की फोटो साझा करते हुए कहा कि भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के पक्ष नहीं थे और उन्होंने इसमें कई अवरोध खड़े किए थे। भाजपा ने नेहरू के सोमनाथ मंदिर से संबंधित 17 पत्र जारी करते हुए न केवल नेहरू बल्कि कांग्रेस को कटघरे में खड़ा कर दिया है। नेहरू के पत्रों के माध्यम से भाजपा ने कांग्रेस की ऐतिहासिक नीतियों पर सवाल उठाए, जिससे यह विमर्श पुनः रेखांकित हो गया है कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता का अर्थ हिंदू विरोध है।

पटेल का संकल्प, जनता के चंदे से पुनर्निर्मित सोमनाथ

सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के ठीक बाद 11 नवंबर 1947 को समुद्र के सामने खड़े होकर लिया था और जिसे नेहरू की उपस्थिति में केंद्रीय मंत्रिमंडल में सर्वसम्मति से स्वीकार किया था। नेहरू मंत्रिमंडल की बैठक में तो कुछ नहीं बोल सके, लेकिन बाद में उन्होंने इस प्रस्ताव का विरोध किया और उन्होंने हर संभव कोशिश की कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण न हो, लेकिन सरदार वल्लभभाई पटेल के आगे उनकी नहीं चली। नेहरू ने गांधी से शिकायत कर अपनी नाराज़गी प्रकट की। गांधी ने पटेल को सुझाव दिया कि मंदिर का पुनर्निर्माण सरकारी खर्च से न किया जाए। जिसे स्वीकार करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की और चंदा लेकर मंदिर का निर्माण कराया।

राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बनाम नेहरू: प्राण-प्रतिष्ठा का विवाद

सोमनाथ मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण नेहरू को दिया गया, जिसे उन्होंने निर्दयतापूर्वक ठुकरा दिया था। उन्होंने अपने सभी मंत्रियों, यहाँ तक कि राष्ट्रपति को भी संदेश दिया था कि वे सोमनाथ समारोह में हिस्सा न लें, लेकिन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जाने का निर्णय लिया। नेहरू गिरावट की इस श्रेणी तक पहुँच गए थे कि उन्होंने राष्ट्रपति को एक तरह से निर्देश दिया कि वे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करके इस समारोह में हिस्सा नहीं लेंगे। इस कारण उनके आने-जाने का प्रबंध व्यक्तिगत संसाधनों द्वारा के. एम. मुंशी ने किया। इसके बाद नेहरू डॉ. राजेंद्र प्रसाद से इस सीमा तक नाराज हो गए कि जीवन पर्यंत उनसे दुश्मनी निभाते रहे। नियमानुसार पदमुक्त होने के बाद राष्ट्रपति को कई भत्ते मिलते हैं और रहने के लिए जीवन पर्यंत आवास की व्यवस्था सरकार करती है, लेकिन नियम ताक पर रखकर नेहरू ने उन्हें कोई सरकारी आवास उपलब्ध नहीं कराया। स्वास के मरीज राजेंद्र प्रसाद का अंतिम समय पटना में कांग्रेस पार्टी के कार्यालय सदाकत आश्रम की एक सीलन भरी कोठरी में गुजरा और वहीं उनकी मृत्यु भी हुई।

सोमनाथ विरोध में उतरे नेहरु थे लियाकत अली के साथ

1951 में मुख्यमंत्रियों को लिखे एक पत्र में नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में “धूमधाम और समारोह” पर नाराजगी जताई थी। उन्होंने कहा था कि इससे विदेशों में भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान पहुँचता है। उन्होंने यहाँ तक निर्देश दिए थे कि सोमनाथ ट्रस्ट की ओर से पवित्र नदी का जल भेजने के अनुरोधों पर दूतावास ध्यान न दें। नेहरू ने 21 अप्रैल, 1951 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान को एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्हें 'प्रिय नवाबजादा' कहकर संबोधित किया और उन्हें भरोसा दिया कि सोमनाथ मंदिर के निर्माण जैसी कोई बात नहीं हो रही है। नेहरू ने भारतीय दूतावासों को पत्र लिखकर सोमनाथ ट्रस्ट को किसी भी तरह की सहायता देने से मना किया, जिसमें अभिषेक समारोह के लिए नदी से पानी के अनुरोध भी शामिल थे। पाकिस्तान में भारत के राजदूत को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा कि सोमनाथ मंदिर में अभिषेक के लिए सिंधु नदी के पानी के इस्तेमाल को औपचारिक रूप से नामंजूर कर दिया जाए। नेहरू ने सेक्रेटरी-जनरल और विदेश सचिव को निर्देश दिया कि दूतावासों को सोमनाथ ट्रस्ट से पवित्र नदियों के पानी के लिए आने वाले अनुरोधों पर बिल्कुल भी ध्यान न दिया जाए।

नेहरू के पत्र जारी करने से कोई नई चीज़ सामने आई हो, ऐसा नहीं है, क्योंकि नेहरू का हिंदू विरोध सार्वजनिक था और इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं।

नेहरु की चलती तो राम मन्दिर का अस्तित्व नहीं बचता

राम मंदिर के मामले में नेहरू का रुख हिंदुओं के प्रति कैसा था, यह अयोध्या मामले में उनके पत्रों से समझा जा सकता है, जो नेहरू वांग्मय में दिए गए हैं। 22/23 दिसंबर 1949 की मध्यरात्रि में राम जन्मस्थान पर रामलला के प्रकट होने की घटना से नेहरू बहुत नाराज थे। रामलला के प्रकट होने का समाचार सुनकर दूर-दराज के लोग सीधे अयोध्या चले आ रहे थे और देखते-देखते हजारों लोगों का जमावड़ा लग गया। जिला प्रशासन के लिए कानून और व्यवस्था बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गई। नेहरू के निर्देश पर जिला कांग्रेस अध्यक्ष अक्षय ब्रह्मचारी के नेतृत्व में स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन कर जिला प्रशासन पर मूर्तियाँ हटाने का दबाव बनाने लगे। नेहरू ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पंत को तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। पंत द्वारा ठोस कार्रवाई होती न देख नेहरू ने सीधे फैजाबाद के जिलाधिकारी के.के.के. नायर से फ़ोन पर बात की और गर्भगृह से तुरंत मूर्तियाँ हटवाने का निर्देश दिया। जिलाधिकारी नायर ने बताया कि जन्मभूमि पर हजारों की संख्या में लोगों का जमावड़ा है; ऐसे में मूर्तियाँ हटाना बहुत मुश्किल है।

केकेके नैयर ने बचाया राम मंदिर

बढ़ते राजनीतिक दबाव का मुकाबला करने के लिए जिलाधिकारी ने जन्मभूमि परिसर को कुर्क कर रिसीवर नियुक्त कर दिया और उन्हें रामलला की विधिवत पूजा-अर्चना का उत्तरदायित्व भी सौंप दिया। उस समय पूजा-अर्चना की जो विधि अपनाई गई, वह राम मंदिर निर्माण तक लगातार चलती रही। गुस्से में आगबबूला नेहरू ने 29 दिसंबर 1949 को पंत को एक टेलीग्राम भेजा: “मैं अयोध्या के घटनाक्रम से चिंतित हूँ। मैं उम्मीद करता हूँ कि आप जल्दी से जल्दी इस मामले में खुद दखल देंगे। वहाँ खतरनाक उदाहरण पेश किए जा रहे हैं, जिनके बुरे परिणाम होंगे।” मुख्यमंत्री पंत ने प्रदेश के मुख्य सचिव के माध्यम से जिलाधिकारी को लिखित आदेश दिया कि मूर्तियों को तुरंत गर्भगृह से बाहर रख दिया जाए और इसके लिए जितना भी बल प्रयोग करना पड़े, किया जाए। जिलाधिकारी ने बल प्रयोग करने से साफ इनकार करते हुए कहा कि ऐसा करने से जनाक्रोश होगा और बड़ी संख्या में लोग हताहत हो जाएँगे, जो प्रशासनिक और राजनीतिक रूप से बिल्कुल भी उचित नहीं होगा। जिलाधिकारी नायर की तत्परता और होशियारी से 16 जनवरी 1950 को फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में जन्मभूमि का मुकदमा दायर हो गया और मामला न्यायिक विचाराधीन हो गया। पंत ने नेहरू से कहा कि अब दखल देना ठीक नहीं, लेकिन नेहरू किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटवाना चाहते थे। उन्होंने न्यायलय को भी दबाव में लेने की कोशिश की, लेकिन असफल रहे।

नेहरू ने एक पत्र 5 मार्च 1950 को पंत को लिखा, जिसे फैजाबाद जिला प्रशासन को मूल रूप से भेजा गया, जिसमें नेहरू का गर्भगृह से मूर्तियाँ तुरंत हटाने का आदेश था। जिलाधिकारी नायर ने सीधे प्रधानमंत्री से मिले निर्देशों पर कार्य करने में असमर्थता व्यक्त की। मुख्य सचिव को भेजे पत्र में नायर ने लिखा कि अगर सरकार किसी भी कीमत पर मूर्तियाँ हटाने का फैसला करती है, तो उससे पहले उन्हें पद से हटा दिया जाए, क्योंकि मूर्तियाँ हटाने के लिए बल प्रयोग करने के कारण बड़ी संख्या में लोगों की जानें जा सकती हैं। इस पृष्ठभूमि में नेहरू ने पंत को एक और पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने लिखा कि जिलाधिकारी आदेशों की अवहेलना कर रहे हैं। वे स्वयं अयोध्या आने के लिए तैयार हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पंत, जो स्वयं रामभक्तों के आक्रोश के कारण अयोध्या नहीं जा सके थे, ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।

18 मई 1950 को नेहरू ने बिधान चंद्र रॉय को पत्र लिखा: “16 मई के आपके पत्र के लिए धन्यवाद... अयोध्या में बाबर द्वारा बनाई गई एक पुरानी मस्जिद पर वहाँ के पंडा और सनातनी लोगों के नेतृत्व वाली भीड़ ने कब्जा कर लिया। मैं बड़े दुख के साथ कहता हूँ कि यूपी सरकार ने हालात से निपटने में बहुत कमजोरी दिखाई। आपने गौर किया होगा कि यूपी से बड़े पैमाने पर मु@लमानों का पलायन हुआ है।”

नेहरू ने राम जन्मभूमि को बा@री #स्जिद बनाए रखने का हरसंभव प्रयास किया। राम मंदिर मामले में नेहरू वांग्मय में उनके बड़ी संख्या में पत्र हैं, जिन्हें पढ़कर स्पष्ट होता है कि उनके ये कृत्य हिंदू धार्मिक गतिविधियों और सनातन की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण से उनकी छटपटाहट हैं।

कांग्रेस तथा उसके सहयोगियों की प्रतिक्रिया और राजनीतिक विमर्श स्वभाविक रूप से रक्षात्मक है. भाजपा नेहरू की धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न उठाकर कांग्रेस की हिंदू विरोधी मानसिकता उजागर करते हुए हिंदू सांस्कृतिक पुनर्जागरण को राजनीतिक समर्थन दे रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी की यात्रा से भाजपा भारत की सांस्कृतिक विरासत को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में लाकर अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है, जिसमें विपक्ष बहुत बौना साबित हो रहा है। सोमनाथ का मुद्दा केवल मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस वैचारिक टकराव को भी दर्शाता है, जिसमें एक ओर नेहरू की बनावटी धर्मनिरपेक्षता है और दूसरी ओर सरदार पटेल की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा।

स्वतंत्रता के बाद से किसी न किसी तरह कांग्रेस मु@स्लिम ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करती रही है। अब उसे हिंदुओं के भाजपा के पक्ष में ध्रुवीकरण हो जाने की चुनौती मिल रही है। इससे कांग्रेस चुनाव दर चुनाव हार का मुँह देख रही है। यदि कांग्रेस को हिंदुओं का समर्थन चाहिए, तो उसे उनकी भावनाओं को समझना और सम्मान करना चाहिए; अन्यथा राजनैतिक रूप से वह भाजपा का कभी मुकाबला नहीं कर पाएगी।

वर्ष 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का निमंत्रण कांग्रेस ने ठुकरा दिया था। वे चाहते तो शामिल होकर मोदी के हिंदुत्व की धार कुंद कर सकते थे, लेकिन उन्होंने स्वयं अपने ऊपर नेहरूवादी तुष्टिकरण की नीति चस्पा कर ली। इसके पहले भी कांग्रेस 2007 में सेतु समुद्रम परियोजना में सर्वोच्च न्यायालय में शपथ-पत्र देकर कह चुकी है कि राम या रामायण का ऐतिहासिक अस्तित्व नहीं है; ये सब काल्पनिक हैं। ऐसे एक नहीं, अनेक मामले हैं, जिनमें कांग्रेस भी आक्रांताओं की ही तरह बार-बार हिंदू आस्था पर प्रहार करती आयी है। ऐसे में हिंदू जनमानस भी उन्हें लगातार सत्ता से बेदखल करता रहे, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अगर तुष्टिकरण की कीमत होती है तो विरोध की भी कीमत चुकानी होगी.

~~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~

शनिवार, 3 जनवरी 2026

आतंकवाद का बदलता चेहरा — 2025 का वैश्विक परिदृश्य || हमले घटे — असर और गहरा हुआ || भारत के लिए खतरा बढ़ा — खत्म कब होगा ?

 


आतंकवाद का बदलता चेहरा — 2025 का वैश्विक परिदृश्य || हमले घटे — असर और गहरा हुआ || भारत के लिए खतरा बढ़ा — खत्म कब होगा ?


पिछले वर्ष 2025 ने दुनिया को यह याद दिलाया कि आतंकवाद भले ही अपने पुराने रूप में कुछ जगहों पर कमजोर पड़ा हो, लेकिन उसका खतरा समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि रूप, क्षेत्र और रणनीति बदल रहा है। अफ्रीका का साहेल क्षेत्र, दक्षिण एशिया — विशेषकर भारत का सीमावर्ती इलाका — पश्चिम एशिया और कई पश्चिमी तथा विकसित देश, सभी किसी न किसी रूप में आतंकवाद की चपेट में रहे। पहली बार ऑस्ट्रेलिया जैसे अपेक्षाकृत “सुरक्षित” माने जाने वाले देश में भी बड़ा आतंकी हमला सिडनी के बॉन्डाई बीच पर हुआ। दुर्भाग्य से कट्टरता का स्तर इतना बढ़ चुका है कि समुदाय-विशेष के एक पिता-पुत्र द्वारा यहूदी समुदाय के नरसंहार को धार्मिक कृत्य मानकर अंजाम दिया गया।

2025 में यह प्रतीत हुआ कि आतंकवादी घटनाओं की संख्या कई जगह कम हुई, लेकिन घटनाएँ अधिक घातक और कई देशों तक प्रसार वाली रहीं। घटनाओं का भौगोलिक विस्तार बढ़ गया। अगर यही क्रम जारी रहा, तो आगामी कुछ वर्षों में यह पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले सकता है। वैसे तो “आतंक का कोई धर्म नहीं होता” कहने वालों की कमी नहीं है, लेकिन पिछले वर्ष की लगभग सभी प्रमुख आतंकी घटनाओं में एक धर्म-विशेष के आतंकियों का दबदबा दिखाई दिया।

भारत के लिए 2025 ऐसा वर्ष रहा जिसमें घरेलू सुरक्षा-ढाँचा मजबूत रहा, लेकिन जम्मू-कश्मीर और सीमा-पार से प्रायोजित आतंकवाद ने गंभीर चुनौती दी। भारत में पहलगाम और लाल किला हमलों ने साल भर की सुरक्षा रूपरेखा बदल दी और नीतिगत व सामुदायिक उपायों की आवश्यकता स्पष्ट कर दी। हाई-प्रोफ़ाइल, व्हाइट-कॉलर और उच्च शिक्षित आतंकियों ने सरकारी नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन तथा दृढ़ राजनीतिक इच्छा-शक्ति की आवश्यकता पर बल दिया और घर में उग रही आतंकी विचारधारा को तुरंत समाप्त करने की आवश्यकता भी दर्शाई।


“आतंकवाद अब किसी एक क्षेत्र की समस्या नहीं — यह तकनीक, प्रॉक्सी-नेटवर्क और सॉफ्ट-टारगेट रणनीतियों से संचालित एक वैश्विक सुरक्षा-चुनौती है।”


2025 की वैश्विक समीक्षा बताती है कि आतंकवाद का प्रभाव भू-राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर व्यापक रहा। इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस (जीटीआई) 2025 की रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकवादी घटनाओं का भौगोलिक प्रसार बढ़ा है और प्रभावित देशों की संख्या कई गुना हो गई है। कुछ देशों में प्रभाव घटा, पर नए-नए क्षेत्र बने और नई तकनीक अपनाई गई। ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स और अन्य रिपोर्टों के अनुसार 2023 तक दुनिया में आतंकवाद से होने वाली वार्षिक मौतें लगभग 12,000 का स्तर पार कर चुकी थीं। 2024 में लगभग 10% की गिरावट के बाद भी आतंकवाद से प्रभावित देशों की संख्या 58 से बढ़कर 80 तक पहुँच गई और आतंकवादियों द्वारा मौतों का आँकड़ा शर्मनाक स्थिति में पहुँच गया। आतंकी घटनाएँ अब अधिक देशों तक फैल रही हैं और इस वर्ष इसमें आश्चर्यजनक वृद्धि की आशंका है।

विश्व की प्रमुख आतंकी घटनाओं में भारत का पहलगाम हमला (22 अप्रैल 2025), जिसमें 26 हिंदू पर्यटकों को धर्म पूछकर मार डाला गया, वर्ष की क्रूरतम आतंकी घटना तथा नृशंस धार्मिक नरसंहार रहा। लाल किला आत्मघाती कार-विस्फोट (10 नवंबर 2025), जिसमें धर्म-विशेष के उच्च शिक्षित डॉक्टर तथा समुदाय-विशेष से जुड़े अल-फ्लाह विश्वविद्यालय के नाम सामने आए, वर्ष की हाई-प्रोफ़ाइल, व्हाइट-कॉलर घटना रही, जिसे कथित रूप से “गजवा-ए-हिन्द” को धार्मिक कृत्य मानकर अंजाम दिया गया। इन घटनाओं ने स्थानीय नागरिकों और पर्यटन-क्षेत्र को भारी क्षति पहुँचाई तथा विश्व के लगभग हर लोकतांत्रिक देश में समुदाय-विशेष के प्रति गंभीर शंका उत्पन्न कर दी। ये दोनों घटनाएँ भारत के 2025 के लेखाजोखा का अत्यंत काला अध्याय हैं और भविष्य के लिए बहुत बड़ी चेतावनी भी। भारत ही नहीं, अन्य देशों में भी धर्म-विशेष के आतंकियों द्वारा सामूहिक हमले, आत्मघाती हमले और बुनियादी ढाँचे पर निशाना साधने की हृदय-विदारक घटनाएँ दर्ज हुईं।


“भविष्य की सुरक्षा-रणनीति केवल बल पर नहीं — तकनीक, जवाबदेही और सामाजिक-विश्वास पर टिकेगी।”


ऑस्ट्रेलिया में 14 दिसंबर 2025 को बॉन्डी बीच पर यहूदियों के एक धार्मिक समारोह में धर्मांध पिता-पुत्र ने गोलीबारी की, जिसमें दर्जनों लोग घायल हुए और अनेक की मृत्यु हुई। यह घटना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा का केंद्र बनी और ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा-नीतियों पर बहस छेड़ी, लेकिन यह किसी देश की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक उदारता के साथ विश्वासघात भी है। पाकिस्तान जैसे आतंकवादियों की शरणस्थली में भी आतंकी घटनाएँ हुईं। बलूचिस्तान के मस्तूंग में पुलिस बस को निशाना बनाया गया, इस्लामाबाद में आत्मघाती हमला (नवंबर 2025), सीरिया में होम्स मस्जिद बम-विस्फोट (26 दिसंबर 2025), नाइजीरिया के मेडुगुरी में मस्जिद में आत्मघाती हमला (25 दिसंबर 2025) तथा अमेरिका के न्यू ऑरलियन्स में आतंकियों द्वारा भीड़ पर ट्रक चढ़ाकर 14 लोगों की हत्या और 57 लोगों को घायल करने जैसी घटनाएँ सामने आईं। इसके अलावा साहेल (बुर्किना फासो, माली, नाइजर), सोमालिया, कांगो, यमन, अफगानिस्तान आदि में दर्जनों छोटे-बड़े हमले हुए, जिनमें संयुक्त रूप से हजारों लोगों की जान गई और अरबों रुपये की संपत्ति नष्ट हुई।

लगभग सभी हमलों में एक धर्म-विशेष की कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों या उससे संबंधित आतंकी संगठनों की भूमिका सामने आई, यद्यपि अधिकांश लोग विश्वभर में यह कहते रहे कि उनका धर्म शांति और भाईचारे का संदेश देता है। यह स्पष्ट नहीं कि ये सभी कट्टरपंथी हैं या धार्मिक कट्टरता का बचाव करते हैं। इसलिए भारत में आतंकी हमलों के संदर्भ में “गंगा-जमुनी तहज़ीब” और भाईचारे की मिसालें बार-बार प्रश्नों के घेरे में आती हैं।

मोदी सरकार चाहे कुछ भी दावा करे, लेकिन वर्ष 2025 ने दिखा दिया कि भारत के लिए आतंकवाद का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसका स्वरूप तकनीक-सक्षम, प्रॉक्सी-आधारित और सॉफ्ट-टारगेट केंद्रित होता जा रहा है। जम्मू-कश्मीर, पश्चिमी सीमा और ड्रोन नेटवर्क इसके मुख्य क्षेत्र रहे। यह सही है कि 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद आतंकी घटनाएँ कम हुईं। यह भी तथ्य है कि पहले कार्यकाल में जो कट्टरपंथी ताकतें भयभीत थीं, वे दूसरे कार्यकाल में सामने आ गईं और अब खुलकर सक्रिय हैं।

धारा 370 हटने के बाद घाटी के कट्टरपंथी तत्व सदमे में थे और कश्मीर में आतंकवाद में उल्लेखनीय कमी भी आई थी, लेकिन सरकार ने कुछ ऐसे संशोधन छोड़ दिए जिनसे न तो कश्मीरी पंडितों की वापसी हो पाई और न ही राज्य से बाहर का कोई व्यक्ति वहाँ का निवासी बन पाया। एक तरह से यथास्थिति ही बनी रही। राज्य के केंद्र-शासित होने का भी देश को पूरा लाभ नहीं मिल सका। उप-राज्यपाल के रूप में पहले सत्यपाल मलिक घाटी के नेताओं से समीकरण साधते रहे और बाद में मनोज सिन्हा के ढुलमुल रवैये से भी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका। परिसीमन का लाभ भी भाजपा सरकार नहीं उठा सकी और राज्य में घाटी का दबदबा कायम रहा — जिसका अर्थ है यथास्थिति — तथा सही मायनों में राज्य में घाटी-केंद्रित शासन ही चलता रहा, जो जम्मू के साथ सौतेला व्यवहार करने के साथ-साथ लम्बे अरसे से घुसपैठियों को बसाकर जनसांख्यिकीय परिवर्तन की दिशा में कार्यरत रहा।

राज्य में वही घिसे-पिटे देश-विरोधी चेहरे सत्ता में बने रहे, जो कहते हैं कि कश्मीर में हिंदू पर्यटन राज्य पर सांस्कृतिक हमला है। यह कहते समय वे भूल जाते हैं कि कश्मीर का नाम और उत्पत्ति ऋषि कश्यप से जुड़ी है, जिन्होंने नीलमत-पुराण के अनुसार सतीसर नामक विशाल सरोवर को सुखाकर घाटी बसाई। यह क्षेत्र कश्मीर शैव-दर्शन (त्रिक परंपरा) का प्रमुख केंद्र रहा, जो अद्वैत शैव-तंत्र का गढ़ था। आज भी हिंदुओं का पवित्र तीर्थ अमरनाथ धाम आस्था का बड़ा केंद्र है, जहाँ कभी भगवान शिव ने तपस्या की थी। कश्मीर 10,000 वर्ष पुरानी हिंदू संस्कृति का केंद्र रहा, जहाँ आज हिंदुओं का जाना घाटी की सरकार सांस्कृतिक हमला बता रही है।

दुर्भाग्य से भाजपा सहित सभी राजनीतिक दल खामोश रहे। हज़रतबल में करदाताओं के पैसे से किए गए जीर्णोद्धार के शिलापट्ट से सरकारी अशोक की लाट को भीड़ द्वारा ईंट-पत्थरों से तोड़ दिया गया, जबकि पुलिस और कानून-व्यवस्था केंद्र के पास है। इसका दुष्परिणाम लाल किले की आत्मघाती घटना के रूप में सामने आया, जब घाटी के कट्टरपंथियों ने राज्य से बाहर घटना को अंजाम दिया।

भाजपा को राजनीतिक लाभ और चुनावी समीकरण से ऊपर उठकर देशहित में कठोर निर्णय लेने का यह अंतिम समय है, अन्यथा आक्रोशित देशभक्त यदि गुस्से में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देंगे, तो इसके साथ देश का भी भारी नुकसान होगा।

आतंकवाद के विरुद्ध भारत की रणनीति में केवल सुरक्षा-व्यवस्था और तकनीक ही नहीं, बल्कि सरकार के साहसिक कदमों की भी आवश्यकता है। भारत में मदरसा-शिक्षा की समीक्षा की सख्त आवश्यकता है, जहाँ से न केवल कट्टरता का बीज बोया जा रहा है, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों को प्रेरित और पोषित भी किया जा रहा है। जुमे की नम*ज़ में दी जाने वाली तकरीरों पर भी सकारात्मक निगरानी की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता है। इन तकरीरों में कई बार देश-विरोधी वातावरण बनाया जाता है और भारत को *स्लामी गणराज्य बनाने की प्रेरणा दी जाती है। तमाम प्रयासों के बाद भी सरकार विदेशी फंडिंग पर प्रभावी नियंत्रण और निगरानी स्थापित नहीं कर सकी है। परिणामस्वरूप नेपाल सीमा से लगे क्षेत्रों में *दरसों और *स्जिदों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जहाँ न केवल कट्टरता का पाठ पढ़ाया जाता है, बल्कि धर्मांतरण, अवैध घुसपैठ और आतंकवादियों की शरण-स्थली के रूप में भी उनका प्रयोग हो रहा है।

समुदाय-विशेष को मिलने वाले विशेष अधिकारों की समीक्षा की तत्काल आवश्यकता है। भारत में इस समुदाय के धार्मिक और सामाजिक संगठनों की जितनी संख्या है, उतनी विश्वभर में कुल मिलाकर भी नहीं है। आखिर ये क्यों बने और क्या करते हैं — इस पर निगरानी और नियंत्रण आवश्यक है। अवैध घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने का कार्य युद्ध-स्तर पर किया जाना चाहिए।


“भविष्य की लड़ाई — सॉफ्ट-टारगेट्स पर।”


देश की मजबूती का आधार राजनीतिक संस्थाओं की जवाबदेही, सामाजिक समावेशन और नागरिकों का सक्रिय समर्पण है। कड़े कानून और नीतियाँ तभी टिकाऊ होंगी, जब राजनीतिक इच्छा-शक्ति न्यायिक सुरक्षा और मानवाधिकारों में संतुलन लागू कर सके।

हर नागरिक का गिलहरी-सा योगदान — नियमों का पालन, समुदाय में संवाद और सार्वजनिक सेवा — मिलकर बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है।

राजनीतिक सुधारों का उद्देश्य केवल दंडात्मक व्यवस्था नहीं, बल्कि ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाना होना चाहिए, जहाँ वोट-बैंक राजनीति की जगह जवाबदेही, पारदर्शिता और राष्ट्रहित प्राथमिकता बनें। देश के प्रति सच्चा समर्पण तभी सार्थक होगा, जब वह कठोर नीतियों के साथ-साथ सहानुभूति, न्याय और समावेशन को भी साथ लेकर चले।

~~~~~~~~~शिव मिश्रा~~~~~~~~~

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

मद्रास उच्च न्यायलय के न्यायाधीश जी आर स्वामीनाथन पर महाभियोग || न्यायपालिका नहीं, सनातन पर प्रहार ||

 

मद्रास उच्च न्यायलय के न्यायाधीश जी आर स्वामीनाथन पर महाभियोग || न्यायपालिका नहीं, सनातन पर प्रहार || भारतीय राजनीतिज्ञ इस्लामपंथियों के जिहादी गुलाम??

विदेशों में यदि कहा जाए कि हिंदुस्तान में हिंदू खतरे में हैं, हिंदुत्व खतरे में है, तो शायद लोग इसे मज़ाक समझें। लेकिन हिंदुस्तान में रहने वाला हर जागरूक हिंदू अच्छी तरह जानता है कि भारत में वह दूसरे दर्जे का नहीं, बल्कि सातवें–आठवें दर्जे का नागरिक है, जिसके विरुद्ध कहीं भी, कभी भी, कोई भी, कुछ भी कर सकता है।

तमिलनाडु के मदुरै जिले के थिरुपरांकुंदरम की पहाड़ी पर दीप प्रज्वलन की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, परंतु इस बार स्थानीय प्रशासन ने इसे रोक दिया। हिंदुओं की याचिका पर उच्च न्यायालय ने “कार्तिगई दीपम” के अंतर्गत प्राचीन पत्थर स्तंभ पर दीप जलाने की अनुमति दे दी। इससे नाराज़ सनातन-विरोधियों ने मानसिक संतुलन खो दिया और न्यायाधीश के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। कारण स्पष्ट है — कैसे कोई न्यायाधीश वोट-बैंक की कीमत पर हिंदुओं के पक्ष में फैसला दे सकता है?

संविधान की धज्जियाँ उड़ाते हुए तमिलनाडु सरकार ने न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं किया। उच्च न्यायालय द्वारा केंद्रीय सुरक्षा बलों के संरक्षण में दीप जलाने का आदेश देने के बाद भी स्थानीय प्रशासन ने क्षेत्र में धारा 144 लागू कर किसी भी श्रद्धालु को मंदिर परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मदुरै पुलिस आयुक्त ने 200 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ उनकी टुकड़ी को अदालत के आदेश का पालन करने से रोका था। राज्य सरकार ने किसी भी कीमत पर दीप-प्रज्वलन की परंपरा पूरी नहीं होने दी।

निर्णय देने वाले न्यायाधीश जी. आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध डीएमके सरकार ही नहीं, बल्कि विपक्ष के हर छोटे-बड़े नेता विषवमन कर रहे हैं। यह न्यायपालिका को डराने और भविष्य के लिए चेतावनी देने जैसा है। भारत के न्यायिक इतिहास में अवमानना की यह एक दुर्लभ घटना है। राज्य सरकार ने संविधान का गंभीर उल्लंघन किया है और ऐसी सरकार को राष्ट्रपति द्वारा तुरंत बर्खास्त कर देना चाहिए, लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा जोखिम नहीं उठाएगी।

इस बीच, तमिलनाडु की सत्ताधारी डीएमके ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, टीएमसी, शिवसेना (उद्धव), राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार), एआईएमआईएम, इंडियन मुस्लिम लीग तथा अन्य विपक्षी दलों के साथ मिलकर न्यायाधीश जी. आर. स्वामीनाथन के विरुद्ध 120 सांसदों के हस्ताक्षरयुक्त महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया। प्रस्ताव सौंपते समय प्रियंका वाड्रा, अखिलेश यादव, टी. आर. बालू, कनिमोझी तथा अन्य नेता उपस्थित थे।

हालाँकि भाजपा का संसद के दोनों सदनों में बहुमत होने के कारण यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाएगा, परंतु यदि इसी समय कांग्रेस सत्ता में होती तो न केवल महाभियोग पारित हो जाता, बल्कि यह संदेश भी दे दिया जाता कि हिंदू आस्था को महत्व देने वालों की खैर नहीं।

भारत पर धर्मांध इस्लामिक आक्रांताओं के हजारों आक्रमण और सैकड़ों वर्ष का शासन भी जो नहीं कर सका, उसे आज इस देश की राजनीति स्वयं कर रही है। गजवा-ए-हिंद के माध्यम से भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने का जो सपना कट्टरपंथियों ने देखा था, उसे आज के स्वार्थी राजनीतिज्ञ पूरे करने में लगे हुए हैं — केवल मुस्लिम वोटों के लिए, जिनके सहारे वे सत्ता पाकर राजसी सुख भोग सकें। दुर्भाग्य की बात यह है कि इनमें अधिकांश हिंदू ही हैं, जिन्हें अपने पूर्वजों, अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति कोई सम्मान नहीं। किसी भी सभ्य समाज में इतनी बड़ी चारित्रिक गिरावट की कल्पना करना भी कठिन है।

अभी बंगाल के मुर्शिदाबाद और तेलंगाना के हैदराबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा और सरकारी संरक्षण में हुए शिलान्यास की आग ठंडी भी नहीं हुई थी कि तमिलनाडु की डीएमके सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण में पीछे न रहने के लिए सीधे न्यायपालिका से भिड़ गई, और इसी कारण न्यायाधीश स्वामीनाथन का नाम मंदिर-दरगाह विवाद में सुर्खियों में आ गया। इस समय विपक्षी दलों में मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी साबित होने की होड़ चल रही है। कांग्रेस तो बाकायदा कह चुकी है — “कांग्रेस मतलब मुसलमान और मुसलमान मतलब कांग्रेस।” इससे आसानी से समझा जा सकता है कि भारत की राजनीति देश को कहाँ ले जा रही है।

जहाँ तक विवाद का प्रश्न है — तिरुप्परनकुंद्रम, भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) के छह प्रमुख धामों में से एक है। तमिल माह ‘कार्तिगई’ के दौरान पहाड़ी पर दीप जलाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। उसी पहाड़ी के समीप एक दरगाह भी है, जिसके कारण विवाद ने संवेदनशील रूप ले लिया। यद्यपि मुस्लिम समुदाय को यहाँ दीप जलाने पर कोई आपत्ति नहीं, लेकिन राज्य सरकार मानो उन्हें स्वयं बता रही हो — “आपको मालूम नहीं, पर आपको दिक्कत है।”

यह दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भारत में हिंदुओं को अपनी आस्था और अनुष्ठानों के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ती है, और न्यायिक निर्णय आने के बाद भी हिंदू अपनी ही ज़मीन पर अपने आराध्य का शांतिपूर्ण अनुष्ठान नहीं कर सकते। यह कैसा संविधान है, जो देश की मूल संस्कृति और धर्म को सुरक्षा नहीं दे सकता? हिंदू-विरोध की हठधर्मिता के चलते दीप-प्रज्वलन की तिथि निकल चुकी है।

क्या किसी अन्य धार्मिक समुदाय से यह कहा जा सकता है कि —

रोज़ा अगले महीने रखो, मुहर्रम का जुलूस एक सप्ताह बाद निकालो, क्रिसमस जनवरी में मनाओ?

लेकिन हिंदुओं से यह कहा जा सकता है कि —

दुर्गा पंडाल की अनुमति नहीं मिलेगी, जुमे के दिन मूर्ति-विसर्जन नहीं कर सकते, दिवाली में पटाखे नहीं चला सकते, होली में रंग नहीं खेल सकते, कांवड़ यात्रा में डीजे नहीं बजा सकते, रामनवमी का जुलूस नहीं निकाल सकते, गणेश उत्सव में लाउडस्पीकर नहीं लगा सकते, डांडिया पंडाल में किसी विधर्मी को रोक नहीं सकते, मस्जिद के सामने से बारात नहीं निकाल सकते, और लव जिहाद, थूक जिहाद, भूमि जिहाद पर आवाज़ नहीं उठा सकते।

कार्यपालिका, न्यायपालिका, गैर-सरकारी संगठन, सिविल सोसाइटी, धर्मनिरपेक्षतावादी, सुधारवादी, वामपंथी, चरमपंथी, नरमपंथी, बौद्धिक वर्ग तथा केंद्र-राज्य सरकारें — सभी के निशाने पर हमेशा हिंदू ही होता है। लेकिन क्यों ?

जहाँ तक न्यायाधीश स्वामीनाथन का प्रश्न है — प्रथम दृष्टि में उनका किसी ओर झुकाव नहीं दिखता। उन्होंने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अन्नामलाई के विरुद्ध हेट-स्पीच का निर्णय सुनाया था। उनके कई फैसले मुस्लिम समुदाय के पक्ष में भी गए हैं। वे अपनी स्पष्ट टिप्पणियों और त्वरित निर्णयों के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने निष्पादन आँकड़े जारी किए थे, जिनके अनुसार उन्होंने 7 वर्षों में लगभग 65,000 मुकदमों का निपटारा किया — जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। यह न्यायिक उत्तरदायित्व का उत्कृष्ट उदाहरण है।

वास्तव में यह महाभियोग किसी न्यायाधीश के विरुद्ध नहीं, बल्कि सनातन धर्म पर सीधा आक्रमण है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन और उनका परिवार सनातन के विरुद्ध लंबे समय से कार्य कर रहा है। स्टालिन ने सनातन को “डेंगू और मलेरिया” बताया था और उसे जड़ से समाप्त करने का संकल्प लिया था।

यह प्रसन्नता का विषय है कि अनेक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, वकील और बौद्धिक वर्ग न्यायाधीश जी. आर. स्वामीनाथन के समर्थन में खड़े हो गए हैं। अन्यथा विपक्ष जिस प्रकार अपने स्वार्थ के चलते संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण कर रहा है, उससे भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में पड़ गई है।

समय की माँग है कि सभी सनातनी जाति-भाषा से ऊपर उठकर आपसी एकता स्थापित करें, अन्यथा बहुसंख्यक होकर भी अपने उत्पीड़न के लिए वे स्वयं उत्तरदायी होंगे। जो समुदाय अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं कर सकते, उनकी रक्षा कोई नहीं करता और कर भी नहीं सकता.

~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

रविवार, 30 नवंबर 2025

राम मंदिर की धर्म–ध्वजा का संदेश- मोदी ऐसे हैं, या केवल दिखते हैं?

 


अयोध्या में राम मंदिर की धर्म–ध्वजा का संदेश || मोदी ऐसे हैं, या केवल दिखते हैं? || क्यों विपक्ष राष्ट्र के साथ नहीं?


25 नवंबर 2025 का ऐतिहासिक दिन केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व और केवल हिंदुओं के लिए नहीं, समस्त मानवता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बन गया—जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर के शिखर पर भगवा धर्म–ध्वजा फहराते हुए कहा कि

“500 वर्षों की प्रतीक्षा समाप्त हो गई; वह यज्ञ पूरा हुआ जो कभी आस्था से डिगा नहीं, कभी विश्वास से टूटा नहीं।”

सदियों की प्रतीक्षा, संघर्ष, भरोसे और आशा की किरणों के बाद जब राम मंदिर के शिखर पर धर्म–ध्वजा लहराई, तब यह क्षण मात्र धार्मिक अनुष्ठान न रहकर भारत की आत्मा के पुनर्जागरण का उषाकाल बन गया—एक ऐसा क्षण जिसने पूरे विश्व को अपने दिव्य स्पंदन से प्रभावित किया। राम मंदिर पर धर्म–ध्वजा का आरोहण सनातन धर्म के लिए गहन प्रतीकात्मक एवं प्रेरणादायी महत्व रखता है—यह धर्म की निरंतरता, पारिवारिक संस्कारों की पुष्टि और आने वाली पीढ़ियों को आदर्श जीवन–मूल्यों की याद दिलाने वाला ध्रुव क्षण है। जैसा कि महाभारत में कहा गया है:

“न धर्मो हि अंशुभिः साध्यः ”

— धर्म का प्रकाश स्वयं मार्ग प्रशस्त करता है, यह घटना इसलिए भी असाधारण है कि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक नए राष्ट्रीय प्रतिमान की घोषणा है। एक ऐसा प्रतिमान, जिसकी परिभाषा स्पष्ट शब्दों में इस तरह परिभाषित कर सकते हैं —

“राम राष्ट्र की आत्मा हैं, और आत्मा के जागरण से ही राष्ट्र का उत्थान संभव है।”

मनुस्मृति का वाक्य आज नए अर्थ में गूंज रहा है इसे सभी हिन्दुओ को आत्मसात कर लेना चाहिए :

“धर्मो रक्षति रक्षितः।”

राम मंदिर पर धर्म–ध्वजा का फहराया जाना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारत के सामूहिक मानस, उसकी सांस्कृतिक यात्रा और वर्तमान राष्ट्रीय विमर्श से जुड़ी ऐतिहासिक घटना है। स्वतंत्रता के बाद यह पहला अवसर था जब दुनिया ने सनातन भारत की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में प्रतिष्ठित होते देखा और जब पूरा भारत राम मय हो गया.

“राम का नाम कोई नारा नहीं, राष्ट्र की ऊर्जा है।”

इसलिए यह ध्वजा–रोहण “केवल राम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वजा का आरोहण नहीं, बल्कि युग-परिवर्तन है”.

सही अर्थों में यह भारत की वास्तविक धर्मनिरपेक्षता को रेखांकित करता है। अब तक हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति से दूरी बनाना ही धर्मनिरपेक्षता का प्रमाण माना जाता रहा। स्वतंत्रता के बाद जब राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की आवश्यकता थी, तब नेहरू ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण पर दुर्भावनापूर्ण राजनीति की और राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन में शामिल होने से रोका। अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश दिया गया कि इस्लामी आक्रांताओं द्वारा नष्ट की गई सनातन धरोहरों की यथास्थिति ही उचित है। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि विश्व की प्राचीनतम सनातन संस्कृति के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं थी और राष्ट्र के बहुसंख्यक हिंदुओं के प्रति कोई दायित्व नहीं। यद्यपि नेहरू और इंदिरा से लेकर राहुल तक—गांधी परिवार का लगभग हर सदस्य अफगानिस्तान में बाबर की मजार पर श्रद्धांजलि अर्पित कर चुका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वयं राम मंदिर के शिखर पर धर्म–ध्वजा फहराना इस व्यापक परिवर्तन का संकेत है कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर चुका है, जहाँ राष्ट्रीय अस्मिता की सांस्कृतिक स्मृतियाँ केवल इतिहास या परंपरा नहीं, बल्कि राष्ट्र–निर्माण की सक्रिय शक्ति बन चुकी हैं। राम मंदिर के शिखर पर लहराती धर्म–ध्वजा इस उभरती सांस्कृतिक चेतना की उद्घोषणा है कि भारत अब अपनी प्राचीन गौरवमयी सभ्यता को आधुनिक राष्ट्र–निर्माण के केंद्र में स्थापित कर रहा है।

महाभारत महाकाव्य में अनेक बार उद्धृत है - “यतो धर्मस्ततो जयः।”

अर्थात जहाँ धर्म है, वहीं विजय है — और यही आज का भारत विश्व से यही कह रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने आस्था को राष्ट्र–निर्माण और सामाजिक कल्याण से जोड़ने का संदेश दिया और इस ऐतिहासिक क्षण को एक व्यापक, समावेशी और कल्याणकारी दृष्टि का प्रेरक बताया जो सामयिक भी है।

कांग्रेस सहित अधिकांश विपक्ष द्वारा समारोह का बहिष्कार विशुद्ध मुस्लिम तुष्टिकरण पर आधारित था—वही पुरानी, थोक वोट–बैंक साधने की सरल राजनीति। परंतु हिंदू जागरूकता और एकजुटता के कारण अब यह राजनीति उतनी फलदायी नहीं रही। यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं कि राम मंदिर और अयोध्या आधुनिक भारतीय राजनीति का केंद्रीय बिंदु बन चुके हैं, और इस ध्वजारोहण ने इसे और मजबूत किया है।

इस समारोह में आस्था और सत्ता का अद्भुत प्रतीकात्मक मिलन दिखाई दिया—यह स्पष्ट संकेत कि आने वाले वर्षों में भारत की दिशा केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विमर्शों से भी निर्धारित होगी। सांस्कृतिक प्रतीकों की यह पुनर्स्थापना भारत की बहुलतावादी संरचना को सुदृढ़ करेगी और साथ ही भारत अपनी पहचान को वैश्विक मंच पर अब स्पष्टता और गर्व के साथ प्रस्तुत करेगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह कदम भारत की सॉफ्ट पावर के विस्तार की नई दिशा प्रदान करेगा । योग, आयुर्वेद और भारतीय दर्शन पहले ही भारत की सांस्कृतिक छवि को विश्व में स्थापित कर चुके हैं। अब राम मंदिर और उससे जुड़े प्रतीक इस छवि को नया आयाम देंगे। विश्व–राजनीति में सांस्कृतिक संकेतों का अपना महत्व होता है। अयोध्या का दृश्य कई देशों के लिए यह स्पष्ट संदेश था कि भारत अपनी जड़ों से कटे बिना आधुनिकता की ओर बढ़ रहा है।

अयोध्या में राम मंदिर का धर्म–ध्वजारोहण केवल आस्था का राष्ट्रीय उत्सव नहीं, बल्कि रामायण की वैश्विक परंपरा और सांस्कृतिक कूटनीति का भी प्रतीक है। यह आयोजन भारत को उन देशों से जोड़ता है जहाँ राम और रामायण आज भी जीवंत हैं, जोड़ेगा।

इंडोनेशिया में रामायण लोकप्रिय है; थाईलैंड में रामाकियन राष्ट्रीय महाकाव्य है; कंबोडिया में रीमके नाम से रामायण का शाही नृत्य–नाटक प्रसिद्ध है; नेपाल में जनकपुर को सीता का जन्मस्थान माना जाता है; लाओस और म्यांमार में रामायण के स्थानीय संस्करण लोक–संस्कृति का हिस्सा हैं। अतः राम मंदिर भविष्य में पर्यटन और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण इंजन भी सिद्ध होगा। लाखों श्रद्धालु और पर्यटक प्रतिवर्ष यहाँ आएँगे, जिससे धार्मिक पर्यटन में स्थायी वृद्धि होगी।

राम मंदिर ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विस्तार किया है और भविष्य की राजनीति में इसकी भूमिका और गहराने की संभावना है। यही राष्ट्र की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। यह राष्ट्रीय हित में होगा यदि सनातन के धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक आयोजन राजनीति में प्रमुख विमर्श बनें—जिससे सांप्रदायिक तुष्टिकरण समाप्त हो सके। रामराज्य को आधुनिक शासन–व्यवस्था से यदि जोड़ा जा सका, तो राजनीति, धर्म और विकास दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ सकती है।

मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि बाहरी तौर पर ही सही— कम से कम प्रधानमंत्री मोदी हिंदुत्व–आधारित राजनीति को आगे बढ़ाने का संकेत दे रहे हैं। यह कहना कठिन है कि अब उन्हें चुनावी राजनीति की परवाह नहीं, या वे अत्यधिक राजनैतिक दबाव में हैं। परंतु वे जिस तरह बार–बार “500 वर्षों” का उल्लेख कर रहे हैं—ठीक उसी तरह, जैसे आडवाणी की रथयात्रा के दौरान करते थे—यह स्पष्ट संकेत है कि वे पुनः रेखांकित करना चाहते हैं कि हिंदू पहले कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं था, जितना आज है, और कि हिंदू उनके लिए विशेष महत्व रखता है।

परंतु प्रश्न उठते हैं —

- फिर हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण से मुक्त क्यों नहीं हुए?

- हिंदुओं को गुरुकुल संचालित करने की स्वतंत्रता क्यों नहीं?

- गजवा–ए–हिंद की साजिशों पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं?

- समान नागरिक संहिता और धर्मांतरण–निरोधक केंद्रीय कानून क्यों नहीं?

हिंदू समाज मोदी के हिंदू हितैषी वक्तव्यों और सार्वजनिक रूप से पूजा–अर्चना देखकर ही संतोष कर लेता है—क्योंकि इससे पहले ऐसा करने का साहस भी कोई प्रधानमंत्री नहीं कर सका। भारत के हिंदू–विरोधी दूषित राजनीतिक वातावरण में यह भी बड़ा कदम है, परंतु यह पेड़ की पत्तियों पर पानी डालने जैसा काम है।

लंबे समय तक प्रतीकात्मक कार्यों से न तो किसी समुदाय को संतुष्ट रखा जा सकता है और न ही किसी देश की संस्कृति को सुरक्षित रखा जा सकता है, यह बात मोदी और भाजपा को समझनी होगी और हम सभी को भी, — कांग्रेस तथा अन्य राजनीतिक दल तो कभी समझेंगे नहीं।

~~~~~~~~~~~शिव मिश्रा ~~~~~~~~

रविवार, 23 नवंबर 2025

इस्लामिक राष्ट्र में रहने के लिए आप कितने तैयार ?

 


गंगा-जमुनी तहज़ीब, भाईचारा और शांति का शोर || इस्लामिक राष्ट्र में रहने के लिए आप कितने तैयार ? || राजनीतिक इस्लाम का वैश्विक है प्रभाव


पिछले कई वर्षों से मैं अपने लेखों के माध्यम से भारत में गज़वा-ए-हिंद के जिहादी षड्यंत्रों से इस्लामीकरण के बढ़ते खतरे के प्रति आगाह करता रहा हूँ। बिहार के फुलवारी शरीफ में बरामद दस्तावेजों से यह खुलासा हुआ था कि पीएफआई 2047 तक भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहा है। मुझे अंदेशा नहीं था कि यह खतरा इतने बड़े रूप में और इतनी जल्दी सामने आ जाएगा। दिल्ली के लाल किले के पास हुए बम विस्फोट में जिहादी डॉक्टरों की भूमिका सामने आई है, जो फरीदाबाद के निकट अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। इस विश्वविद्यालय का इस्तेमाल व्हाइटकॉलर टेरर मॉड्यूल तैयार करने के लिए किया जा रहा था। महिला डॉक्टरों की संलिप्तता भी चिंता का बड़ा कारण है। दो ऐसी महिला डॉक्टरें गिरफ्तार की गई हैं जिन्होंने बांग्लादेश में पढ़ाई की है और जिनके संबंध तुर्की तथा अन्य इस्लामी देशों के आतंकी संगठनों से बताए जा रहे हैं।

दिल्ली विस्फोट में जो तथ्य सामने आ रहे हैं वे बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाले हैं। यह एक आत्मघाती विस्फोट था जिसे मुख्य आरोपी डॉ. उमर उन नबी, विशेषज्ञ डॉक्टर और अल-फलाह यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर था — ने आत्मघाती हमलावर बनकर अंजाम दिया। अब तक सुरक्षा एजेंसियों का अनुमान था कि इस्लामी आतंकवाद में आत्मघाती विस्फोट भारत में संभव नहीं होंगे क्योंकि भारतीय इस्लाम और भारतीय मुसलमान दुनिया भर के अन्य मुसलमानों से अलग हैं। मानव बम आईएसआईएस की रणनीति है, जिसने कई देशों में मानवता के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है। काफिरों को मारने या किसी देश को नुकसान पहुँचाने के लिए स्वयं को मानव बम बनाकर मार डालना इस्लामी कट्टरता की पराकाष्ठा है। जब किसी देश में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है तो उसे संभालना बहुत मुश्किल हो जाता है। भारत में भी अब इसकी शुरुआत बेहद चिंता का विषय है।

भारत में जिन गंगा-जामुनी तहज़ीब, भाईचारे और शांति की बातें लंबे समय से की जा रही हैं,वे धोखा हैं और वे भारत के इस्लामीकरण के षड्यंत्रकारी प्रयासों को छिपाने का कवच हैं। विश्वविद्यालय से जुड़े कई लोग व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल के सदस्य थे, जो आतंकवादी गतिविधियाँ को योजनाबद्ध तरीके से अंजाम दे रहे थे। जिन डॉक्टरों की गिरफ्तारी हुई है, वे पाकिस्तान‑समर्थित आकाओं के इशारों पर काम कर रहे थे। यूनिवर्सिटी को एक सुरक्षित पनाहगाह के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। इस यूनिवर्सिटी में 415 करोड़ रुपये के फर्जीवाड़े का भी खुलासा हुआ है, जिसमें विश्वविद्यालय के फंड्स का दुरुपयोग आतंकवादी मोड्यूल बनाने में किया गया था। अल-फलाह यूनिवर्सिटी में उपजे व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल का संबंध कश्मीर से भी जुड़ा हुआ पाया गया है।

घाटी में छापेमारी और गिरफ्तारियों के बीच इस्लाम का राजनीतिक स्वरूप भी खुलकर सामने आया। महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि “यह धमाका देश में बनाए गए प्रेशर‑कुकर माहौल का नतीजा है” और उन्होंने केंद्र सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना था कि कश्मीर की जो मुसीबत थी, वह लाल किले के सामने बोल पड़ी है। उन्होंने कहा कि देशभर में इस्लामोफोबिया और मुसलमानों पर उत्पीड़न बढ़ रहा है। कुछ लोग आतंकी हमले करते हैं और उसके बाद कश्मीरी समुदाय के खिलाफ बदले की कार्रवाई, सामूहिक सज़ा और जातीय‑प्रोफाइलिंग का चक्र शुरू हो जाता है। इसलिए कश्मीरी कठिन आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा‑दुविधाओं के बीच फँसे हुए हैं। उनका यह बयान आतंकी गतिविधियों को परोक्ष समर्थन देने जैसा प्रतीत होता है।

महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती ने लाल किले के पास हुए विस्फोट के मामले में आत्मघाती हमलावर डॉ. उमर नबी पर चिंता जताई है। उन्होंने इस घटना को इस्लामोफोबिया से जोड़कर सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं।

जम्मू‑कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि दिल्ली कार बम धमाके के लिए कुछ लोग जिम्मेदार हैं, पर यह धारणा बनायी जा रही है कि हम सब दोषी हैं। नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पिता फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि लाल किले के पास हमले में शामिल आतंकी कश्मीरियों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। उन्होंने देशभर में रह रहे कश्मीरियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किया। देश के दुश्मनों के साथ कश्मीरियों को नहीं खड़ा किया जा सकता और न ही उनके अपराधों की सजा निर्दोष कश्मीरियों को दी जा सकती है। पहलगाम आतंकी घटना से कुछ समय पहले नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने कहा था कि कश्मीर में टूरिज़्म पर आधारित सांस्कृतिक हमला हो रहा है और इससे कश्मीर की असल पहचान प्रभावित हो रही है।

प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से इस तरह के बयानों से आतंकवादी घटनाओं और पृथकतावादी जिहादियों का समर्थन करने, तथा पूरी कौम को पीड़ित और शोषित बताने का विमर्श फैलाने जैसी प्रवृत्तियाँ राजनीतिक इस्लाम का कार्य हैं। वैश्विक स्तर पर यह बड़ी सफलता से किया जा रहा है और यही अब इस्लाम की एक विशेषज्ञता भी है।

इसमें संदेह नहीं कि भारत को शीघ्राति‑शीघ्र इस्लामी राष्ट्र बनाने की कोशिशें हो रही हैं, जिन्हें अधिकांश मुस्लिम समूहों का समर्थन प्राप्त है। गज़वा‑ए‑हिंद को इस्लाम के धार्मिक युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसका उद्देश्य भारत को “दार‑अल-इस्लाम” या इस्लामी राष्ट्र बनाना है। दारुल उलूम देवबंद जैसे संस्थान इस विचार को वैध ठहराते दिखते हैं। व्हाइट‑कॉलर टेरर मॉड्यूल जैसे नेटवर्क, जहाँ उच्च शिक्षित लोग आतंकी गतिविधियों में शामिल हैं, इस षड्यंत्र की गंभीरता को दर्शाते हैं।

महमूद मदनी का लक्ष्य 2030 तक एक करोड़ मुस्लिम युवाओं को शारीरिक दक्षता और सामाजिक सुरक्षा हेतु लाठी‑डंडे और हथियारों का प्रशिक्षण देकर तैयार करना है। 2019 से शुरू हुए इस अभियान में अब तक लगभग 70 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। यह प्रशिक्षण कार्य वैसा ही है है जो पूर्व में पीएफआई अपने शिविरों में संचालित करता रहा है। उनका यह काम संदिग्ध है और गज़वा‑ए‑हिंद में गृह‑युद्ध छेड़ने में इसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।

वैसे तो भारत को इस्लामी बनाने के प्रयास सातवीं शताब्दी से इस्लामी आक्रमणों के साथ शुरू हुए थे, पर भौगोलिक विशालता, भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि के कारण भारत पर आक्रमण सफल नहीं हुआ। लेकिन अंदरूनी भितरघात और जिस राजनीतिक इस्लाम की कारगुजारियों के कारण भारत का विभाजन हुआ वैसी स्थितियां पुन: उत्पन्न की जा रही हैं । भारत के कई राजनीतिक दल वोट‑राजनीति के चलते मुस्लिम तुष्टिकरण करते हैं और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत के इस्लामीकरण का समर्थन कर रहे हैं। आतंकी घटनाएँ, धर्मांतरण, अवैध घुसपैठ, जनसंख्या विस्फोट, सांप्रदायिक दंगे और वक्फ बोर्ड के माध्यम से अधिक से अधिक भूमि पर कब्ज़ा करने के प्रयासों को जोड़कर देखा जाए तो इन सबका उद्देश्य एक जैसा प्रतीत होता है — गज़वा‑ए‑हिंद के एजेंडे को मूर्त रूप देना।

भारत के राष्ट्रांतरण की भूमिका संविधान के कुछ प्रावधानों में भी निहित दिखाई देती है, जो एक ओर बहुसंख्यक हिंदुओं को आज भी गुलाम बनाए हुए है और दूसरी ओर दूसरी सबसे बड़ी आबादी को अल्पसंख्यक बनाकर धार्मिक संस्थानों के संचालन की स्वायत्तता प्रदान करते हैं। उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर अनुच्छेद 25‑26 के अंतर्गत अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन करने और संस्थान चलाने की स्वतंत्रता दी गई है। इस कारण मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जैसी संस्थाओं द्वारा शरिया‑सम्बंधी प्रथाओं को लागू करने की कोशिशें और अनगिनत मदरसों के माध्यम से कट्टरता के बीज बोये जा रहे हैं। वक्फ बोर्ड भूमि‑संपत्ति पर कब्ज़ा करता जा रहा है। पूजा‑स्थल कानूनों से कई ऐसे धार्मिक स्थल और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीकों की यथास्थिति बनाए रखने के लिए हिन्दू बाध्य हैं । संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 अल्पसंख्यक समुदायों को सांस्कृतिक पहचान और शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने का विशेष अधिकार देते हैं, जिसके आड़ में मदरसे संचालित हो रहे हैं और जिनके कारण धार्मिक कट्टरता तथा पृथकतावादी मानसिकता उत्पन्न की जा रही है। वही बहुसंख्यक वर्ग इन विशेष अधिकारों से वंचित महसूस करता है।

मुसलमानों के जितने धार्मिक संगठन भारत में हैं, उतने शेष विश्व में नहीं हैं । ये संगठन मिलकर भारत को इस्लामी राष्ट्र बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। वहाबी और सलाफी जैसे समूहों पर विश्व के कई देशों में रोक और निगरानी है, पर भारत में ये कुछ भी करने को स्वतन्त्र हैं । कुछ देशों में मस्जिदें केवल नमाज़ के समय खोली जाती हैं और तत्पश्चात बंद कर दी जाती हैं, जबकि भारत में मस्जिदें लगातार खुली रहती हैं, जिससे धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है। कई देशों में शुक्रवार की तकरीरों पर नियंत्रण और वक्ताओं के लिए शैक्षणिक मान्यता व सरकारी प्रमाणन की आवश्यकता होती है; और मदरसों पर रोक है.

भारत में अल्पसंख्यकों की धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर दी गई छूट के कारण कट्टरपंथी गतिविधियाँ अनियंत्रित हो गयी हैं। इसका नतीजा यह है कि आज भारत पर इस्लामीकरण के खतरे की धार तीव्र हो गयी है। यदि शीघ्र और उपयुक्त कदम नहीं उठाए गए तो देश आत्मघाती हमलों और गृह‑युद्ध जैसी विनाशकारी दिशाओं की ओर जा सकता है। आगे का रास्ता दिन‑प्रतिदिन और कठिन होता जाएगा।

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