Saturday, November 26, 2016

पीओके किसके बाप का ?


फारुख अब्दुल्ला ने कल एक जनसभा को संबोधित करते हुए भारत के 125 करोड  लोगों की भावनाओं पर कुठाराघात किया और  कहा कि क्या पीओके क्या आपकी (हिन्दुस्तान) बपौती है ? क्या पीओके उनके (हिन्दुस्तानियों) बाप का है ? जी हाँ हमारे....हम सबके बाप का है और रहेगा. असली मुद्दा है कि जो कश्मीर  पाकिस्तान के कब्जे में है वह कब वापस आएगा ? फारूक का ये बयान पूरे हिन्दुस्तान के लिए एक गाली है इसलिए बिना राजनीति किये सारे दलों को चाहिए कि न केवेल इसकी निंदा करें बल्कि उनके खिलाफ क्या कार्यवाही की जाय उस पर भी एकमत होना चाहिए.


कुछ लोग बहुत भ्रम में जीते है उन्हें संदेह रहता है कि वे खुद  किसकी बपौती है ? हिन्दुस्तान की या पकिस्तान की ? क्या पीओके  उनकी बपौती है ? या पाकिस्तान उनका बाप है ? इतिहास गवाह है फारूक के बाप के नेहरू से बड़े अच्छे सम्बब्ध थे (कारण कुछ भी हो). उनके बाप शेख अब्दुल्ला ने भारत के साथ विश्वाश घात किया और  देशद्रोह किया. मजबूरी में नेहरू को उन्हें देश द्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डालना पड़ा. कम से कम हम हिन्दुस्तानियों के बाप देशद्रोही तो नहीं थे. आपके बाप की तुलना हमारे बाप से नहीं हो सकती. एक देश द्रोही का बेटा भी देश द्रोही  ही निकला .

कश्मीर को शुरू से ही केंद्र से इतनी वित्तीय सहायता मिलती रही है जितनी उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्यों को भी नहीं मिली और  जिसका वहा के नेताओं ने सिर्फ अपने हितों में स्तेमाल किया. क्या फारूक बता सकते है कि लन्दन में उनके पास अकूत संम्पति कहाँ से आई ? ये हम हिन्दुस्तानियों के बाप का पैसा है. आज नोट बंदी की वजह से फारूक के सिर्फ कुछ सौ करोड़ रुपये बेकार हुए हैं और इतनी बौखलाहट ? उन्हें चिंता है कि अब पत्त्थर कैसे फेंके जायेंगे ? आतंकबादी कैसे पाले जायेंगे और जब ये सब नहीं हो पायेगा तो भारत सरकार को ब्लैक मेल कैसे कर पाएंगे ? हिन्दुस्तान के पैसे से बाप बेटे दोनों ऐश कर रहे है. कश्मीर की समस्या सुलझ जायेगी तो इनका धंधा चौपट हो जायेगा. पुश्तैनी धंधा है भाई, भला कोइ इतनी आसानी से बंद करना चाहेगा?

इस तरह के देशद्रोहियों और पकिस्तान के समर्थन में खड़े होने वाले हर व्यक्ति का का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए और इन्हें इनकी औकात में लाना चाहिए.
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शिव प्रकाश मिश्रा

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Wednesday, June 8, 2016

और उड़ता पंजाब बन गई उड़ता विवाद



अनुराग कश्यप की फिल्म उड़ता पंजाब गहरे विवादों में आ गई है और यह पता चलने के बाद कि इस फिल्म को बनाने में आम आदमी पार्टी ने  आर्थिक मदद की है  हड़कंप मच गया है.  मजेदार बात यह है की आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल  फिल्म के पक्ष में खुलकर उतरे लेकिन यह तथ्य सामने आने के बाद वह परिद्रश्य से  एकदम गायब हो गए और अब आम आदमी पार्टी का कोई भी नेता खुलकर इस फिल्म के समर्थन में नहीं आ रहा.

मेरे एक मित्र जो फिल्मी पत्रकार हैं ने बताया कि विवादों में आने वाली अनुराग कश्यप की यह पहली फिल्म नहीं है. इससे पहले 2003 में उनके द्वारा बनाई गई फिल्म “पांच” आज तक सिनेमाघरों का मुहं  नहीं देख पाई  है क्योंकि उस फिल्म में भी ड्रग्स, हिंसा जैसे कई पहलू थे जिन्हें सेंसर बोर्ड ने अनुमति देने लायक नहीं समझा. इसके बाद 1993  के मुम्बई दंगों पर आधारित एक फिल्म “ब्लैक फ्राइडे”  भी विवादों में आई और अनुराग कश्यप द्वारा 2 साल तक कोर्ट में मुकदमा लड़ने और  तमाम परिवर्तनों के बाद फिल्म को सेंसर बोर्ड की अनुमति मिली.

पहले से ही तैयार बैठे अनुराग कश्यप हैं ने सिने जगत के कई लोगों को अपने साथ खड़ा किया है और  वह प्रत्यक्ष रूप से फिल्म सेंसर बोर्ड और अप्रत्यक्ष रूप से केंद्र सरकार और पंजाब सरकार  के खिलाफ आ जायेंगे ये योजना वद्ध ढंग से होगा. जो लोग अनुराग कश्यप के साथ खड़े हैं उनमें से काफी बड़ी संख्या में वह लोग हैं जिन्होंने फिल्म एवं टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में गजेंद्र सिंह की नियुक्ति  का विरोध किया था. जब भी कभी सेंसर बोर्ड किसी फिल्म में परिवर्तन करने की सलाह देता है या द्रश्यों  को काटता है तो यह निर्माताओं  को काफी नागवार गुजरता है क्योंकि ये ऐसे अंश होते हैं जो फिल्म के लिए पैसे कमाने का बहुत बड़ा स्रोत होते हैं.

कश्यप में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है क्योंकि उन्होंने अपनी इस फिल्म को रिलीज करने के लिए 17 जून का समय निश्चित कर रखा था जो अब  मुश्किल लगता है. अच्छा हो यदि कोर्ट के बजाए फिल्म सेंसर बोर्ड और फिल्म बनाने वाले लोग आपस में बैठकर यह फैसला करें और उसके बाद फिल्म बनाने वाले लोग अगर इससे सहमत नहीं है तो उसके विरुद्ध अपील में जा सकते हैं, जो एक अच्छा कदम होगा. बहुत से फिल्म निर्माता अपनी फिल्मों में  सेंसर बोर्ड द्वारा दिए गए सुझाव पर  बहुत बड़े विवाद खड़ा करते हैं इसका एक कारण  फिल्म को अपेक्षित पब्लिसिटी दिलाना होता है. अगर वास्तव में निर्माता अपने विषय वस्तु के लिए इतना कमिटेड है और वह चाहते हैं कि उनके विषय वस्तु देश के लोग देखें तो उन्हें अपनी ऐसी सभी फिल्मों को इंटरनेट पर रिलीज कर देना चाहिए.

 अभी हाल में एक फिल्म “ मोहल्ला अस्सी घाट” गाली गलौज के अत्यधिक प्रयोग के कारण फिल्म सेंसर बोर्ड ने इसे अप्रूव नहीं किया और यह फिल्म आज तक रिलीज नहीं हो सकी. बाद में निर्माताओं ने इस फिल्म को इंटरनेट पर रिलीज कर दिया मैंने इस फिल्म को सिर्फ विवादों में आने के कारण  देखा और पाया कि अगर इस फिल्म से गालियां हटा दी जाए तो यह एक बेहतरीन  फिल्म है. लेकिन आज इसे आप फूहड़ और भद्दी गलियों के कारण अपनी पत्नी के साथ भी सहज रूप से नहीं देख सकते.  मोहल्ला अस्सी में  सनी देओल और एक से एक जाने माने कलाकार हैं जिनकी एक्टिंग बहुत ही बेहतरीन  है लेकिन क्या कारण है उन्होंने भी  भी गाली गलौज डायलॉग के रूप में इस्तेमाल की ? यहाँ तक कि  भगवान शंकर के मुहं से भी गली दिलवा दी . ये फिल्म  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार जीत सकती थी जिससे वंचित रह गयी.

इस तरह की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि ऐसी फिल्मे आँख बंद कर पास होनी चाहिए .

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Friday, May 13, 2016

बिहार का आगाज ........ क्या सचमुच आ गया आ गया जंगलराज....?

बारहवीं क्लास में पढ़ने वाले एक 19 वर्षीय छात्र आदित्य सचदेवा की बिहार में हत्या इसलिए की गयी क्योंकि उसने माफिया डॉन बिंदी यादव और सत्तारुढ़ दल की विधान परिषद सदस्य मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव की कार को ओवरटेक करने की गुस्ताखी  की थी, जो अछम्य थी. शायद लोग सही कहते थे “ओवरटेक न करना बिहार में वरना गोली पड़ेगी कपार में ” इस घटना के बाद मेंरे एक मित्र ने अपनी मारुति कार  के पीछे लिख लिया है “जगह मिलने पर तुरन्त पास दिया जायेगा, कृपया गोली न मारें ”  आदित्य सचदेवा के परिजनों का करुण क्रंदन दिल को दहला देने वाला है और इसने  जन आक्रोश को जन्म दिया है किंतु सत्तारूढ़ दल इसे समझ नहीं सका है और, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सहित इसके  नेता  अनाप-शनाप और अनावश्यक बयान दे  रहे हैं जिससे न केवल सरकार की बल्कि समूचे बिहार की छवि खराब हो रही है और लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि  शायद जंगलराज का आगाज हो रहा है.  हो सकता है इसमें थोड़ी अतिश्योक्ति हो या राजनातिक विद्वेष की भावना हो. किन्तु  सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा खासतौर से उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और वाज जले पर नमक छिड़कने जैसा है . यह सत्ता का अहंकार है और यह अंग्रेजों के जमाने की  उस मानसिकता से भी खराब है जिसमें भारतीय अंग्रेजों के बराबर खड़े नहीं हो सकते थे अंग्रेजों के साथ ट्रेन में यात्रा नहीं कर सकते थे और  सड़कों पर चल नहीं  सकते थे.

बिहार की वर्तमान सरकार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी है और इसके पास 80 विधायक हैं नीतीश कुमार जो मुख्यमंत्री हैं उनके पास केवल ७१  विधायक हैं और उनकी पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी है. किसी भी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी का प्रतिनिधि सरकार का मुखिया होता है किंतु चुनाव से पहले लालू यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी 80 सीटें प्राप्त कर बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनेगी.  शायद इसीलिए उन्होंने नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मानकर चुनाव प्रचार किया था और सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे और उन्होंने ऐसा  किया भी.  लेकिन चुनाव के बाद  दोनों पार्टियों में एक अंदुरुनी सहमत बन गई थी कि जब तक लालू यादव का  बच्चा लोग ट्रेनिंग करेंगे तब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे और जैसे ही बच्चा लोगों की ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी, नीतीश कुमार बड़े गठबंधन के  मुखिया बनकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करेंगे. लालू प्रसाद यादव उन्हें समर्थन देंगे. हालाकि नितीश ने अपने लिए पार्टी के अध्यक्ष का पद पहले से ही शरद यादव से लेकर अपने पास रख लिया है . आप देखेंगे कि इस प्रकरण में अचानक उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी यादव की भूमिका बहुत महत्व पूर्ण हो गयी है. उन्होंने सामने आकर कई बयान दिए और यह जताने की कोशिश की इस सरकार में दबदबा किस पार्टी का है इस पूरे प्रकरण में नितीश कुमार नेपथ्य में चले गए और बताया गया कि वह वाराणसी में, जो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है वहां पर कोई रैली को संबोधित कर रहे हैं. हो सकता है किसी नैतिक आधार का सहारा लेकर स्तीफा भी दे दे लेकिन फिर सुशासन का क्या होगा ....?
शिव प्रकाश मिश्रा
लखनऊ ट्रिब्यून  http://lucknowtribune.blogspot.in ,
लखनऊ सेन्ट्रल  http://lucknowcentral.blogspot.in  तथा

हम हिन्दुस्तानी http://mishrasp.blogspot.in में एकसाथ प्रकाशित 

बिहार का आगाज ........ क्या सचमुच आ गया आ गया जंगलराज....?

बारहवीं क्लास में पढ़ने वाले एक 19 वर्षीय छात्र आदित्य सचदेवा की बिहार में हत्या इसलिए की गयी क्योंकि उसने माफिया डॉन बिंदी यादव और सत्तारुढ़ दल की विधान परिषद सदस्य मनोरमा देवी के बेटे रॉकी यादव की कार को ओवरटेक करने की गुस्ताखी  की थी, जो अछम्य थी. शायद लोग सही कहते थे “ओवरटेक न करना बिहार में वरना गोली पड़ेगी कपार में ” इस घटना के बाद मेंरे एक मित्र ने अपनी मारुति ८०० के पीछे लिख लिया है “जगह मिलने पर तुरन्त पास दिया जायेगा, कृपया गोली न मारें ”  आदित्य सचदेवा के परिजनों का करुण क्रंदन दिल को दहला देने वाला है और इसने  जन आक्रोश को जन्म दिया है किंतु सत्तारूढ़ दल इसे समझ नहीं सका है और, उप मुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री सहित इसके  नेता  अनाप-शनाप और अनावश्यक बयान दे  रहे हैं जिससे न केवल सरकार की बल्कि समूचे बिहार की छवि खराब हो रही है और लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि  शायद जंगलराज का आगाज हो रहा है.  हो सकता है इसमें थोड़ी अतिश्योक्ति हो या राजनातिक विद्वेष की भावना हो. किन्तु  सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा खासतौर से उपमुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए बयान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है और वाज जले पर नमक छिड़कने जैसा है . यह सत्ता का अहंकार है और यह अंग्रेजों के जमाने की  उस मानसिकता से भी खराब है जिसमें भारतीय अंग्रेजों के बराबर खड़े नहीं हो सकते थे अंग्रेजों के साथ ट्रेन में यात्रा नहीं कर सकते थे और  सड़कों पर चल नहीं  सकते थे.

बिहार की वर्तमान सरकार में लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी है और इसके पास 80 विधायक हैं नीतीश कुमार जो मुख्यमंत्री हैं उनके पास केवल ७१  विधायक हैं और उनकी पार्टी दूसरे नंबर की पार्टी है. किसी भी गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी का प्रतिनिधि सरकार का मुखिया होता है किंतु चुनाव से पहले लालू यादव ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उनकी पार्टी 80 सीटें प्राप्त कर बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बनेगी.  शायद इसीलिए उन्होंने नीतीश कुमार को गठबंधन का नेता मानकर चुनाव प्रचार किया था और सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी थी कि  मुख्यमंत्री नीतीश कुमार होंगे और उन्होंने ऐसा  किया भी.  लेकिन चुनाव के बाद  दोनों पार्टियों में एक अंदुरुनी सहमत बन गई थी कि जब तक लालू यादव का  बच्चा लोग ट्रेनिंग करेंगे तब तक नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहेंगे और जैसे ही बच्चा लोगों की ट्रेनिंग पूरी हो जाएगी, नीतीश कुमार बड़े गठबंधन के  मुखिया बनकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करेंगे. लालू प्रसाद यादव उन्हें समर्थन देंगे. हालाकि नितीश ने अपने लिए पार्टी के अध्यक्ष का पद पहले से ही शरद यादव से लेकर अपने पास रख लिया है . आप देखेंगे कि इस प्रकरण में अचानक उप मुख्यमंत्री और लालू के बेटे तेजस्वी यादव की भूमिका बहुत महत्व पूर्ण हो गयी है. उन्होंने सामने आकर कई बयान दिए और यह जताने की कोशिश की इस सरकार में दबदबा किस पार्टी का है इस पूरे प्रकरण में नितीश कुमार नेपथ्य में चले गए और बताया गया कि वह वाराणसी में, जो  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनाव क्षेत्र है वहां पर कोई रैली को संबोधित कर रहे हैं. हो सकता है किसी नैतिक आधार का सहारा लेकर स्तीफा भी दे दे लेकिन फिर सुशासन का क्या होगा ....?

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शिव प्रकाश मिश्रा 

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Friday, April 15, 2016

शाहरुख का फिर ऊल जलूल बयान


फिल्म स्टार शाहरुख खान ने इंडिया टीवी के प्रोग्राम जनता की अदालत”   के एक प्रोग्राम में, जिसका प्रसारण कल शनिवार को किया  जाना है,  रजत शर्मा के सवालों का जवाब देते हुए अपने पिछले असहिष्णुता के बयान पर बहुत सफाई दी. ये  कहना अप्रासंगिक नहीं होगा कि यह सफाई उनकी आगामी फिल्म फेनके रिलीज होने के उपलक्ष में की गई है. अपने परिवार के देशभक्त होने के दावे को मजबूत करते हुए और  अपनी स्थिति  साफ करते  करते उन्होंने एक बहुत लंबा, बेतुका और हास्यापद दावा कर दिया कि उनसे बड़ा देशभक्त हिंदुस्तान में कोई नहीं है.

हिंदुस्तान का सबसे बड़ा देशभक्त  होने का दावा इतना मूर्खतापूर्ण है के इससे उनकी मानसिक स्थित का पता चलता है. अपने दावे से उन्होंने  125 करोड़ की जनसंख्या वाले  हिंदुस्तान में सबको अपने से छोटा कर दिया. इससे कम से कम इतना  संदेह तो  हो ही गया कि वे पूरे देशभक्त तो नहीं हैं या फिर उनमे बुदधि  और विवेक की काफी कमी है . इससे ये भी सिद्ध होता है कि परदे का हीरो असल जिन्दगी में जीरो भी हो सकता है.

 एक बहुत सामान्य जानकारी का व्यक्ति भी बहुत आसानी से  समझ सकता है कि उनके बयान में कितना अहंकार है और शायद इसी अहंकार की वजह से पिछली बार  दर्शकों ने उनका मानमर्दन किया था. सोशल मीडिया पर उनकी बहुत भद्द  हुई थी. लोगों ने उनकी फिल्मों का बायकाट करना शुरू किया था और इसका बहुत नुकसान  उनको भुगतना पड़ा था. इसके लिए उन्होंने पूरी जनता से माफी भी मांगी थी लेकिन फिर भी अपनी आगामी फिल्म को ध्यान में रखते हुए नुकसान की भरपाई को पूरा करने के लिए जानबूझ कर सफाई दी. और तो और इंडिया टीवी के रजत शर्मा ने आज दिनांक १५ अप्रैल को शो टेलीकास्ट होने के एक दिन पहले ही इस प्रोग्राम के चुनिन्दा अंश  प्राइम टाइम के प्रोग्राम आज की बात जो मूलत: समाचारों का कार्यक्रम हैमें विस्तार से दिखाए. प्रोग्राम के शुरू के १० मिनट में सिर्फ शाहरुख़ खान की शहनाई बजाई गयी. कल १६ अप्रैल को शाहरुख़ की फिल्म रिलीज हो रही है और आज का ये प्रचार  सयोंग नहीं हो सकता. हालाकि शाहरुख़ खान विभिन्न चैनलों पर और विभिन्न कार्यक्रमों में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में जाते रहे हैं.

ईश्वर ऐसे सभी लोगो को सद्बुद्धि दे जिससे वह सच्चे देशभक्त बनने का प्रयाश कर सकें.
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                              -शिव प्रकाश मिश्र

Monday, February 22, 2016

हिंदुस्तान जवानों के साथ ....? या राष्ट्र द्रोहियों के साथ ..?



आज जम्मू कश्मीर के एक आतंकवादी अभियान में सेना के 2 अधिकारियों सहित कुल 5 जवान शहीद हो गए. इसका कारण क्या है ? आतंकवाद के विरुद्ध बात नहीं हो रही है. बात चल रही है  तो जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के उन  छात्रों की जिन्हीने  भारत की बर्बादी तक जंग लड़ने की बात कही थी ....और जम्मू कश्मीर की आजादी तक जंग की  बात की  थी . वे छात्र  अभी तक पकड़े नहीं जा सके हैं . कई राजनीतिक दलों के लोग उनका साथ दे रहे हैं . इन राष्ट्र विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों के साथ खड़े हुए हैं. इनका मकसद क्या है ? इसका मतलब क्या है ? पहली बार  केंद्र में ऐसी सरकार है जो चाहे और जो भी न कर पा रही हो पर बहुसंख्यक वर्ग और देशभक्त लोगो में आशा का संचार कर रही है. जिससे पाकिस्तान समर्थक और देश के विरुद्ध काम करने कई गैर सरकारी संगठन सर्कार के विरुद्ध खड़े हो गए है. कभी अवार्ड वापसी, कभी असहिष्णुता, कभी FTII आन्दोलन, कभी IIT मद्रास, कभी हैदराबाद विश्वविद्यालय तो कभी JNU जैसी घटनाओं द्वारा न केवल सरकार  के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं बल्कि ये देश का बेडा गर्क कर रहे हैं .

 क्या इसका मतलब सिर्फ और सिर्फ मोदी का विरोध करना और उनके विरुद्ध एक संयुक्त प्लेटफार्म खड़ा करना है ? ताकि आगे आने वाले चुनावों में  एक बेहतर विकल्प साबित कर सके और अल्पसंख्यकों के बोट  भी पा  सकें . कितनी दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि  भारत जैसे देश में जहाँ  अभिव्यक्ति की इतनी अधिक आजादी है, वहां पर इसका कितना अधिक दुरूपयोग किया जा रहा है. क्या किसी अन्य देश में इस तरह की नारेबाजी की जा सकती है ? सरकार के इस निर्णय पर कि  केंद्रीय विश्वविद्यालयों के  कैंपस में राष्ट्रीय ध्वजा रोहण किया जाएगा, कई  राजनीतिक दलों के नेता इसके विरोध में आ गए हैं. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज फहराना इन विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर असर डालेगा. आज ज्यादा तर टी वी चैनलों पर आप  देख सकते हैं कि  एक अभियान चल रहा है और कई  चैनल्स इन राष्ट्र विरोधी तत्वो के साथ खड़े हैं .
  
JNU, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय है  या जिन्ना विश्वविद्यालय ? पुलिस गेट पर खड़ी है और विश्वविद्यालय के कुलपति उसे अंदर आने की अनुमति नहीं दे रहे. वे  छात्र जिन्होंने भारत विरोधी नारे लगाए थे, वह कैंपस में घूम रहे हैं, सभाएं  कर रहे हैं और वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. वेवस पुलिस  छात्रों के  स्वयं ही सरेंडर करने का इंतजार कर रही है.  क्या ऐसे कुलपति को किसी विश्वविद्यालय के कुलपति बने रहने का अधिकार है ?  जादवपुर विश्वविद्यालय में एक कुलपति है, उन्होंने भी विश्वविद्यालय के अंतर्गत राष्ट्र विरोधी नारे लगाने, अफजल गुरु के समर्थन में नारे लगाने, याकूब मेमन की फांसी के विरोध में नारे लगाने वालों के खिलाफ कार्यवाही करने से इंकार कर दिया . उन्होंने कहा कि इस तरह की कोई शिकायत उनके संज्ञान में नहीं आई है, और जो हो गया सो हो गया आगे से कोशिश की जाएगी कि ऐसा न हो. ये क्या बात हुई ? यह कुलपति है या किसी विशेष मिशन के लिए रखे गए राजनीतिक दल के कार्यकर्ता . हिंदुस्तान की सबसे पुरानी पार्टी होने का दावा करने वाली पार्टी के सर्वे सर्वा इन छात्रों के समर्थन में है, और वह हर जगह बयान दे रहे हैं कि छात्रों का शोषण  किया जा रहा है. उन नेता को समझ नहीं है .... ये पूरा हिंदुस्तान समझता है. आज शहीद होने वाले सेना के जवानों के लिए कोई बात करने के लिए तैयार नहीं है लेकिन उन छात्रों के पक्ष में हवा बनायी जा रही है, जिन के खिलाफ सरकार ने मामले दर्ज किए हैं . उन वकीलों को जिन्होंने कन्हैया पर कोर्ट हमले का प्रयास किया था, ऐसे उदृत किया  जा रहा है जैसे इन वकीलों की हरकत देश द्रोहियों से  भी कहीं खराब  है. उनको भी देशद्रोही का दर्जा दिया जा रहा है और इसी ग्राउंड पर न्याय  पालिका की अवमानना को  बड़ी जोर शोर से उठाया जा रहा है. इन दोनों की तुलना की जा रही है कि मैं कौन ज्यादा देश्द्रोही  है .

संदेश साफ है जहां पर लोगों का नैतिक पतन इस हद तक हो  जाय कि वे अपने व्यक्तिगत या राजनैतिक स्वार्थ के लिए देश विरोधी गतिविधियों पर उतर आए और उन  के साथ खड़े हो जाएं हो देश द्रोही हो और देश के विरुद्ध युद्ध चला रहें है. ऐसे देश और ऐसे लोकतंत्र, का भगवान ही मालिक है .


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शिव प्रकाश मिश्र 
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Tuesday, November 24, 2015

आमिर भी दंगल में........... या दलदल में ........

एक सम्मान समारोह में आमिर खान ने कुछ ऐसा बयान दे दिया जिसे उनके प्रशंसक सकते में हैं.  कुछ प्रश्नों के जबाब में उन्होंने कहा कि  देश में डर और असुरक्षा का माहौल है और उनकी पत्नी ने  कुछ समय पहले उनसे हिंदुस्तान छोड़ने के लिए उनसे कहा था, क्यों कि वह अपने बच्चों के लिए बहुत चिंतित है. उन्होंने कहा कि पिछले  सात आठ महीने से ऐसा हुआ है, पता नहीं इसके पीछे कौन है ? स्वाभाविक है इस बयान से भूचाल आना ही था.


कुछ फिल्मो में बेहतरीन अदाकारी के कारण मैं आमिर खान का बहुत बड़ा फैन हूँ और देश के पर्यटन के ब्रांड एंबेसडर होने के कारण, जिसमे वह देश की इज्जत, मान- मर्यादा की बात करते हैं उनके प्रति  मेरा  सम्मान  और बढ़ गया था  लेकिन अनायास मुझे ऐसा क्यों लगने लगा  है कि मैं ठगा गया हूँ ? आमिर में जो मैंने देखा सुना वह सिर्फ ...... एक नाटक था और वे अच्छे कलाकार तो हैं लेकिन अच्छे इंसान नहीं. थ्री इडियट के, एक  इडियट वे नहीं, मैं हूँ और वे सारे लोग है जो उनके प्रसंशक हैं . अफ़सोस ... मैं उनकों क्या समझता था और वे क्या निकले. क्या एक कलाकार  जिसने तमाम ऐसे  किरदार निभाये हों  जिसमें जाति-पात धर्म  और संप्रदाय से  ऊपर उठकर काम करने की शिक्षा दी  हो, देश का  गौरव बढ़ाने की बात की हो और वह  लोकप्रियता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बाद भी सिर्फ एक .... मुसलमान बन कर रह जाय, ....ये करोडों लोगो के दिल दुखाने की बात है. बड़े दिखने वाले लोग अंदर से कितने छोटे होतें हैं, इसका पता ऐसे वक्त में ही चलता है. पता नहीं उनकी बात में कितनी  सच्चाई है किन्तु  आमिर जैसा कोई व्यक्ति (या मुसलमान) जो इतना बड़ा व्यक्ति हो, पैसे वाला हो, इतना बड़ा स्टार हो, अगर वह अपने बच्चों के लिए चिंतित हैं, तो  स्वाभाविक कि आम  मुसलमान क्या सोचेगा ? और उसका क्या हाल होगा ? 

 आमिर खान ने अपने  इस बयान से देश का, समाज का और विशेष कर मुसलमानों का कितना अहित किया है, शायद इसका अंदाजा उन्हें नहीं है.  हर समाज में हर कौम में कुछ न कुछ तत्व मुख्यधारा से अलग होते हैं.  तमाम प्रयासों के वावजूद फैक्ट्री में भी तो कुछ डिफेक्टेड आइटम बन जाते हैं. हिन्दू समाज के ऐसे सिरफिरे लोगों की कुछ बातों को लेकर, जो बिलकुल भी नयी नहीं है हर शासनकाल में ऐसी बातें होती रहीं हैं, एक सुनियोजित अभियान चलाना, समझ से बाहर है.   हिन्दू समाज से ही नहीं किसी समाज से आदर्श की अपेक्षा करना बेमानी है. अगर आप राम जैसे भाई की कल्पना करते है, तो लक्ष्मण बनना सीखना होगा. आमिर का  बयान पूरे हिन्दू समाज के मुहँ पर एक तमाचा है.  इतने वर्षों तक मुझे कभी हिन्दू और मुसलमानों का अंतर समझ में नहीं आया आज उम्र के इस पड़ाव पर जैसे मुझे झकझोरा जा रहा कि मैं  हिन्दू हूँ ...मै  हिन्दू हूँ ....और मैं सोच रहा हूँ कि मैंने क्या गलती की ? हिंदुस्तान में मोदी सरकार बनने के बाद एक बड़ा वर्ग  जहां जोश और जश्न के मूड में था वही एक बड़ा वर्ग सदमे में था. इसमें ज्यादातर कांग्रेसी और बामपंथी विचारधारा से जुड़े ऐसे लोग भी थे, जिन्हें कालांतर में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के का डर दिखाकर उन के विरुद्ध खडा कर  दिया गया था. कई दशक बाद पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार बहुतों के लिए अप्रत्याशित थी.. और बहुतों के लिए आज भी असहनीय है. मेरा और मेरे जैसे बहुत लोगों का मत बनता जा रहा है कि मोदी जरूर कुछ न कुछ अच्छा  कर रहे होंगे तभी तो उनका इतना विरोध किया जा रहा है यहाँ तक उनकी पार्टी के ही बहुत से लोग विरोध के स्वर दे रहें हैं. कई पार्टियों के लोग पाकिस्तान और आई एस आई से मोदी को  हटाने की गुहार लगा रहें हैं.  कई  संस्थान, राजनैतिक दल और देश  मिलकर ऐसी कूट रचनाएँ कर रहें हैं जिससे  सरकार को बदनाम किया जाय और ऐसा  करने में  वे चाहे अनचाहे हिन्दुस्तान को भी बदनाम कर रहे हैं ये उचित नहीं है.
आज जब तथा कथित बड़ी बड़ी हस्तियाँ देश को बदनाम करने की मुहिम में लग गयी हैं, हम सामान्य जनो को चाहिए कि वे देश हित में आगे आयें और ऐसे सुन्योजित अभियानों का पर्दाफास करे. जय हिन्द .                      ***********************************                                                          - शिव प्रकाश मिश्रा 

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Wednesday, October 21, 2015

आप सभी को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाये







माँ दुर्गा के मंत्र 


१.       नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै  सततं  नमः .
      नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियता: प्रणिता:स्मताम .. 

२.       या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मीरुपेण संस्थिता 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै  नमो नमः ..

३.       या देवी सर्व भूतेषु बुद्धिरुपेण संस्थिता .
   नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

४.       या देवी  सर्व भूतेषु मातृरुपेण  संस्थिता
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः

५.       जयंती मंगला   काली भद्रकाली कपालिनी.
   दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नामेस्तु ते..

६.       देहि सौभाग्यमारोग्यम देहि में परम सुख़म .
    रुपम देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ..

७.       सर्व   मंगलमंगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके .
      शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणि नमोस्तु ते ..

८.       सर्व बाधा विनुर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वित:
    मनुष्यों मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय: ..

९.       शरणागत    दीनार्त   परित्राण परायणे .
  सर्वस्यर्तिहरे देवि नारायणि नमोस्तु ते ..

१०.    सर्वबाधाप्रश्मनं त्रिलोक्यस्याखिले श्वरि .
     एवमेव त्वया यर्मस्मद्वैरि  विनाशनम ..


*******शिव प्रकाश मिश्रा ***********

Tuesday, October 20, 2015

हिंदुस्तान का मुंह काला कर रहे है तथाकथित बुद्धिजीवी !

      तस्लीमा नसरीन ने अभी हाल में दिए अपने इंटरव्यू  कहा कि हिंदुस्तान में यह एक फैशन हो गया है जो लोग धर्म निरपेक्ष होते है (या कहलाते हैं ) वह हिंदुओं के विरुद्ध होते है.  उनका इंटरव्यू साहित्यकारों द्वारा वापस किए जा रहे साहित्य अकादमी पुरस्कारों के परिपेक्ष में था. उन्होंने कहा जब पश्चिम बंगाल में उनकी किताब पर प्रतिबन्ध लगाया गया और राज्य से बाहर कर  दिया गया तो उन्हें दिल्ली आकर रहना पड़ा था. कट्टर पंथियों के दबाव में  उन्हें हिंदुस्तान भी छोड़ना  पड़ा, उस समय कम से कम साहित्यकारों ने तो कोई आवाज नहीं उठाई.

      अब तक लगभग 24 साहित्यकार अपने पुरस्कार वापस कर चुके है . और तो और मोहान की पतली पगडंडी से चल कर हजरतगंज पहुँचने वाले अपने प्रिय मुनव्वर राना भी उसी श्रेणी में गिर चुके है. और न जाने कितने लोग गिरेंगे ? और कितना गिरेंगे ? इन्हे नहीं मालूम जो ये काम कर रहे है, उससे विदेशों में भारत की छवि कितनी  खराब हो रही है ? पुरुस्कार वापसी का सिलसिला कुलवर्गी जैसे लेखक की ह्त्या से शुरू होकर अख़लाक़ की हत्या से जुड़ गया. अब तो पाकिस्तान ने भी कहना शुरु कर दिया है कि हिंदुस्तान में मुसलमानो के साथ बहुत अत्याचार किया जा रहा है. इसका जबाब तो हिन्दुस्तान का मुसलमान ही दे सकता है और उन्हें पाक को कड़ा सन्देश देना चाहिए.

      पकिस्तान और उनके समर्थको की जानकारी के लिए ये बताना उचित होगा पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक हैं जिनकी जनसंख्या 1947 में  17 प्रतिशत से कुछ अधिक थी, जो 1998 में घटकर एक दशमलव छह प्रतिशत रह गई है और आज की तारीख में यह लगभग एक प्रतिशत से भी कम है. कम से कम पकिस्तान जैसे  देश को अल्पसंख्यको की दशा पर बोलने का कोई हक नहीं है. क्या किसी धर्मनिरपेक्ष साहित्यकार ने इस बारे कभी पुरुस्कार वापस करने के बारे सोचा ? जब कश्मीर में भयानक नरसंघार हुआ था और कश्मीरी पंडितो को घाटी से बाहर कर दिया गया, जब गोधरा कांड हुआ, जब मुंबई बम कांड हुआ, जब दंगों में हजारों सिखों की हत्या हुयी, तब कोई भी साहित्यकार पुरस्कार वापस करने क्यों नहीं आया ?

      केंद्र में नई सरकार बनने के बाद पिछले डेढ़ साल में ऐसा क्या हो गया जिससे इन साहित्यकारों ने इतना हाय तौबा  मचा रखा है. क्या साहित्य अकादमी के पास राज्य सरकारों से भी अधिक अधिकार है कि सम्पूर्ण भारत में कानून व्यवस्था सम्भाल ले. कानून व्यबस्था राज्य सरकार का विषय है. क्या राज्य सरकारों को सख्त कारवाही से कोई रोकता है ?

      एक टी वी  शो में सुब्रमंयम स्वामी ने बताया कि  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक एजेंसी  काम कर रही है जो भारत में इस तरह की घटनाओं को अंजाम देकर माहौल को खराब करने की कोशिश कर रही है. इसका मकसद न सिर्फ केंद्र में मोदी सरकार को परेशान करना अपितु  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करना भी है . श्री स्वामी ख्याति प्राप्त व्यक्ति है उनके कहने में अगर कुछ भी सच्चाई है तो सरकार को चाहिए कि  पूरी घटना की जाँच  कराई जाए और अगर कोई इस तरह की कोई एजेंसी काम कर रही है तो उसे बेनकाब किया जाए. ऐसा लगता है कि सुब्रमणयम स्वामी की बात में काफी सच्चाई है. पंजाब में हो रहे उन्माद के पीछे किसी सुनियोजित अभियान का पता चला है . अभी पश्चिम बंगाल मे हुए नन  रेप कांड,  दिल्ली और मुंबई में चर्चों  पर  हुए हमले द्वारा माहौल ख़राब करने के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया गया. लेकिन बड़े ताज्जुब की बात यह है केंद्र सरकार ने भी इन घटनाओं पर आ बहुत ज्यादा संज्ञान नहीं लिया और ना ही इन घटनाओं की तह तक जाने की कोशिश की गई ताकि उस अभियान की पोल  खोली जा सके और उसके पीछे छिपे व्यक्ति  की  पहचान की जा सके. अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार को चाहिए भारत में इस तरह  चलने वाले किसी भी अभियान को रोका जाना चाहिए ताकि भारत के अच्छे कार्यो को दुनिया को बताया जा सके और  भारत में तीव्र गति से विकास हो सके . हिदुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति पहले हिन्दुस्तानी है चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो और हर हिन्दुस्तानी का फर्ज है कि वह सांप्रदायिक सौहार्द और भाई चारा बनाये रखे .
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Monday, October 12, 2015

साहित्य अकादमी पुरस्कार या राजनैतिक हथियार ..

नयनतारा सहगल जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरु की भांजी है, ने कुछ समय पूर्व साहित्य अकादमी पुरस्कार यह कहते हुए वापस कर दिया था कि भारत में लिखने की आजादी नहीं बची है और धर्मनिरपेक्षता के प्रति असम्वेदनशीलता बढ़ती जा रही है. ऐसा उन्होंने हाल ही में उत्तर प्रदेश के दादरी गाँव में  गोमांस  के संदेह में  एक मुसलमान की हत्या होने के विरुद्ध में किया. उन्होंने  कहा के वर्तमान सरकार के शासन में लेखकों  के प्रति आक्रामकता  बढ़ती जा रही है और जिसके विरोध में  उन्होंने अपना पुरस्कार वापस करने का फैसला किया . देखते ही देखते कई कवि और साहित्यकारों ने अपने अपने पुरस्कार वापस कर दिए है.  इनमे से कन्नड़ लेखक अरविन्द बलगती का साहित्य अकादमी आम परिषद से इस्तीफा देना भी शामिल है. पंजाब के तीन तथाकथित सुप्रसिद्ध लेखकों ने भी  साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है. गुरबचन भुल्लर,औलख, अजमेर सिंह, नयनतारा सहगल आत्मजीत सिंह, उदय प्रकाश और अशोक बाजपेई जैसे लेखकों ने भी पुरुस्कारों के वापस करने की घोषणा की है. इस  बीच साहित्य अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति  की स्वतंत्रता के पक्ष मे है और किसी भी लेखक के कलाकार पर आक्रमण या हमले की निंदा करती है .

यहां पर यह बात करना समोचित है कि यह पुरस्कार क्यों वापस किए जा रहे है ? पुरस्कार प्राप्त करने वाले कौन लोग है ? पुरस्कार किसे दिया जाता है ?और क्यों दिया जाता है ?

साहित्य अकादमी  एक स्वायत्तता संस्था  है और यह भारत की विभिन्न भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन  के लिए मौलिक कार्य (किताब) पर दिया जाता है. वस्तुतः यह पुरस्कार रचना पर दिया जाता है और रचनाकार को सम्मानित किया जाता है. इस पुरस्कार की वर्तमान राशि एक लाख रुपए और प्रशस्ति पत्र है. जिन्होंने  ने यह पुरस्कार वापस किया है, अभी तक पता नहीं चला है कि उंन्होंने  पुरस्कार की धनराशि भी वापस की है या नहीं. अगर पुरस्कार की धनराशि वापस हुई है तो जिस समय यह पुरुस्कार  दिया गया था तब  से लेकर आज तक इस पर बैंक की ब्याज दर के हिसाब से पूरा व्याज  भी  अदा करना चाहिये . लेखकों को  यह भी बताना चाहिए कि जिस समय उन्हें यह  पुरस्कार दिया गया  था, क्या पहले उन्होंने  इस बात की सहमति सरकार को दी थी कि  अगर इस देश में कभी धार्मिक उन्माद फैलेगा या लेखकों  के प्रति अनादर होगा  तो वे  पुरस्कार वापस करेंगे. इस तरह के  ज्ञानी और बुद्धिमान साहित्यकारों से अब इस तरह की अपेक्षा नहीं की जा सकती. देश में जब तक सब कुछ आदर्श ढंग से चलेगा तब तक वह अपना पुरस्कार लिए रहेंगे. किन्तु  देश के सामने अगर कोई चुनौती आएगी तो वह अपना पुरस्कार वापस कर देंगे और केंद्र में जो भी सरकार होगी उसका विरोध करेंगे. ये कायरता है.

ऐसा लगता है कि इन पुरस्कार और वापस करने के पीछे एक तुच्छ राजनीति काम कर रही है और उस राजनीति के दुष्प्रभाव के कारण  यह पुरस्कार वापस किए जा रहे है जो किसी भी साहित्यकार के लिए सर्वथा अनुचित है. कहा तो यह जाता है कि साहित्यकार देश और समाज के लिए दर्पण का काम करते है ताकि उसमें  समाज और देश अपनी छवि देख कर अपने आप को व्यवस्थित करने की कोशिश करता रहे और साहित्यकार लेखक स्वतंत्र रूप  से अपना काम करते हुए सभी कुरीतियों और आलोकतान्त्रिक गतविधियों  के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे  और लोकतंत्र की रक्षा करेंगे. लेकिन आजकल ऐसे साहित्यकार भी पाए जाते  है जो स्वयं यह घोषणा करते है अगर अमुक  व्यक्ति प्रधानमंत्री बन जाएगा तो वह  देश छोड़ देंगे, अगर अमुक पार्टी की सरकार बन जाएगी तो देश छोड़ देंगे. पुरस्कार लौटाने वाले ज्यादातर लेखक  देश में  भगवा करण से बहुत परेशान है. कितनी विडंबना है कि इस समाज और देश का मार्गदर्शन करने वाले तथाकथित लेखक और साहित्यकार सिर्फ इस बात से परेशान है कि इस  देश में कौन सा राजनैतिक दल शासन करें और कौन सत्ता से  दूर रहें. यह कहना अनुचित  नहीं होगा कि  जितने भी लेखक है उनमे से ज्यादातर को पुरस्कार  अपने राजनीतिक संबंधो के कारण दिए गए थे और शायद यही कारण है कि वह अपने राजनीतिक संबंधो को महत्व देते हुए यह पुरस्कार वापस कर रहे है. इससे थोड़े समय के लिए ऐसा लग सकता है कि  केंद्र सरकार के विरुद्ध एक जनादेश बना है लेकिन इस बात का  बहुत जल्दी पता लग जाएगा कि  इसके पीछे कौन सा राजनैतिक दल है. क्या इसमें कहीं किसी व्यक्ति विशेष के प्रति और किसी राजनीतिक दल विशेष के प्रति उनका दुराग्रह है ? और इसके पीछे क्या कोई षड्यंत्र काम कर रहा है ? निश्चित रुप से इस बात की जांच की ही जानी चाहिए. ऐसी क्या बात  हो गई है जिनकी वजह से इन ज्ञानियों  को त्याग पत्र देना पड़ रहा है. क्या इस तरह के त्यागपत्र  लेखकों को किसी तरह की सुरक्षा दे पाएंगे ? और क्या उनके यह त्याग पत्र, देश में यदि कोई खराब वातावरण बन रहा है या साहित्यिक संस्थाओं का भगवा कारण हो रहा है, तो उसे रोकने में मदद मिलेगी ? कई प्रश्न है और यह जनमानस पूछ रहा है कि अभी कुछ समय पहले केरल मे एक प्रोफेसर के हाथ काट दिए गए थे और उनके ऊपर आरोप था कि उन्होंने  एक धर्म विशेष के खिलाफ लिखा हुआ था, तब ये महानुभाव कहाँ थे ?


 बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन, जिन्हें कट्टरपंथियों के दबाव में अपना देश छोड़ना  और  जो कोलकाता को अपना दूसरा घर मानती थी, लेकिन उन्हें कलकत्ता भी छोड़ कर जाना पड़ा.  उनके बीजा न बढ़ाने में तत्कालीन सरकार के ऊपर अत्यधिक दबाव बनाया गया और उन्हें कुछ समय के लिए भारत  भी छोड़ना पडा.  पता नहीं उस समय क्रांतिकारी विचारो वाले और लोकतंत्र के ये महान जननायक कहाँ  थे ? और लेखकों  के अधिकार के प्रति जागरुक ये साहित्यकार कहां थे ? जयपुर में हुए एक साहित्यिक सम्मेलन में सलमान रश्दी  को प्रवेश नहीं दिया जाता है, सिर्फ इसलिए प्रवेश नहीं दिया गया कि उन्होंने इस्लाम के विरुद्ध काफी लिखा है. उनकी किताब शैतानिक  वर्सेस पर भारत ने प्रतिबंध लगाया गया. भारत के किसी भी साहित्यकार ने  इस बात का विरोध नहीं किया.  किसी भी लेखक को किसी भी संस्थान के प्रति विरोध व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन इनका प्रथम दायित्व है कि वह समाज के लिए ऐसा लिखे जिससे समाज और देश में रचनात्मक बदलाव आए और हमारी आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ें. जिससे  लोकतंत्र मजबूत हो और देश की विचारधारा प्रगतिशील बने. बजाय इसके लेखक अपने निजी स्वार्थ में लगे हुए है. इस तरह के कृत्य से किसी भी सरकार का न तो मनोबल गिराया जा सकता है, ना ही किसी भी देश का वातावरण समृद्ध किया जा सकता है और ना ही है ही देश में कोई विचारधारा का प्रसार किया जा सकता है. अगर किसी व्यक्तिगत कारण से किसी किसी व्यक्ति का या किसी विशेष राजनीतिक दल का  विरोध करना है तो अच्छा होगा कि ये साहित्यकार  राजनीति में प्रवेश करें और अगर उनमे  इतना आत्मविश्वास है कि वे इस  देश की दुर्दशा को दूर कर सकते है. इस देश में फ़ैली  तमाम बुराइयों को दूर कर सकते हैं और इस देश में बढ़ गई धार्मिक असहिष्णुता को खत्म कर सकते है. लेखको  को और अधिक आजादी दिला सकते है तो निश्चित रुप से उन्हें राजनेति करने चाहिए और सत्ता के शिखर पर पहुंच कर देश के लिए कुछ करना चाहिए. अगर वे राजनीति में नहीं आते है तो देख ही समझेगा कि वह किसी ने किसी राजनीतिक दल के इशारे पर यह काम कर रहें हैं जो बेहद शर्मनाक है.  जो पुरस्कार उन्हें  उनकी रचना पर दिया गया है उसे वह राजनीतिक  हथियार के रूप में इस्तेमाल न करें.
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- शिव प्रकाश मिश्रा 

Thursday, May 7, 2015

न्याय निर्णय ~ देर, दुरुस्त और चुस्त

सलमान खान को मुंबई की सत्र न्यायलय ने पांच वर्ष की सश्रम कारावास  की सजा सुनायी है।  सजा सुनाने के तुरंत बाद हाईकोर्ट से उनकी जमानत भी हो गयी।  अब उनके पक्ष में कई नामी गिरामी हस्तियां आ गयी हैं और लगभग हर टीवी चैनल पर इसकी चर्चा हो रही है। सलमान के घर मिलने वालों का ताँता लगा है।  इनमे बालीबुड  की सभी प्रमुख हस्तिया और राजनैतिक लोग भी शामिल   हैं।  लोग सलमान के पक्ष में मीडिया में बेतुके बयान दे रहें हैं।   ऐसा लग रहा है जैसे पीड़ित सलमान हैं।

इस देश में कितने मुक़दमे लंबित हैं ?  कितने लोगों को न्याय का इन्तजार है और कितने लोग न्याय का इन्तजार करते करते परलोक चले गए ? शायद इसका आंकड़ा नहीं मिल सकता  सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि यदि आज के बाद सारे नए मुक़दमे रोक कर सिर्फ लंबित मुकदमों का निपटारा किया जाय तो कम से कम १००  साल लग सकते हैं ( एक मोटे अनुमान के अनुसार निचली अदालतों में दो करोड़,  हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में ५० लाख मुक़दमे लंबित हैं )।  हिट  एंड रन नाम से प्रसिद्ध  इस मुक़दमे का निर्णय केवल १३ साल में हुआ (अभी सिर्फ  निचली अदालत से ) ये भी काफी संतोष जनक है। ये निर्णय सत्र न्यायाधीश  श्री देशपांडे ने दिया जिनका हाल में ही मुम्बई के बाहर स्थान्तरण हो चुका है।  सलमान खान बालीबुड के दबंग हैं बहुत पैसे वाले हैं।  उनके पिता श्री सलीम खान भी एक प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं।  अगर अन्यथा दबाव न भी रहा हो तो भी न्यायाधीशों पर कितना  मानसिक दबाव रहा  होगा इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं है।  फिर भी तेरह साल बाद ही सही... दुरुस्त निर्णय देना बहुत साहस का काम है और अत्यधिक स्वागत योग्य है।  ऐसे जज का नमन किया जाना चाहिए ।  स्वागत किया जाना चाहिए।  निर्णय ने सन्देश दिया है कि कानून की नजर में सभी बराबर है।  अपराधी को सजा तो मिलनी ही चाहिए चाहे वह कितना ही बड़ा क्यों न हो ।  लेकिन संम्भवता  एक छोटी सी  भूल मुझे नजर आती है कोर्ट ने माना है कि कार सलमान चला रहे थे तो फिर झूठी गवाही देने वाले अशोक सिंह जिसने कहा था कि कार वह चला रहा था , के विरुद्ध भी कार्यवाही की जानी चाहिए थी ताकि भविष्य में कोई इस तरह की गवाही देने की कोई हिम्मत न जुटा सके। 

हाई कोर्ट ने दो घंटे के अन्दर जमानत दे दी, ये निराशा जनक लगा। हाई कोर्ट का निर्णय जरूर ये सोचने को मजबूर करता है कि क्या सामान्य व्यक्ति के लिए भी इतनी तत्परता दिखाई जाती है ।  सामान्य तौर पर इतनी जल्दी जमानत नहीं मिलती और चुस्ती तो कभी दिखाई नहीं पड़ती। इससे सलमान के प्रसंसक तो खुश हुए किन्तु सामान्य जनता को बहुत अच्छा सन्देश नहीं गया।  न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए बल्कि ऐसा लगना भी चाहिए कि न्याय  हुआ है।   ऐसा लगता है कि सलमान को जमानत मिल ही जायेगी  और मीडिया में ऐसा माहौल भी बनाया जा रहा है। अगर ऐसा होता है तो अगले दस पंद्रह साल लग जायेंगे हाईकोर्ट में और फिर भी निर्णय नहीं बदलता है तो सुप्रीम कोर्ट।   कितने साल लगेंगे पता नहीं ?  सलमान आज ४९ साल के है और सुप्रीम कोर्ट से निर्णय होते होते ७५ - ८० साल के हो जायेंगे। जो मर गए वो तो चले गए लेकिन पांच परिवार उजड़ गए। उन्हें कोई मुवावजा भी नहीं मिला।

क्या सलमान जैसे लोगों के लिए अलग कानून  के जरूरत है ? अगर ऐसा है तो पूर्ण स्वराज और अच्छे दिन आने में अभी बहुत देर है। 
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                 - शिव प्रकाश मिश्र





Monday, May 4, 2015

यात्रा वृतांत ~ श्री हरिहरेश्वर , देवघर , रायगढ़ महाराष्ट्र

 श्री हरिहरेश्वर  को दक्षिण का काशी कहा जाता है।  ये रायगढ़ जिले की देवघर तैह्सील के अंतर्गत स्थिति है।  ये चारो तरफ से चार पहाड़ो   हरिहरेश्वर, हर्शिनाचल ,  ब्रह्माद्री और पुश्पाद्री  से घिरा है।  अरब सागर के किनारे को छूते हुए सिरे पर श्री हरिहरेश्वर  यानी भगवांन  शंकर का मंदिर स्थित है। पास ही भैरव नाथ जी का मंदिर है ये मंदिर १८वी शताब्दी में बनाये गए थे . 

 पश्चिमी घाट यों ही बहुत मनमोहक हरेभरे क्षेत्रो से भरा पड़ा है, पर  पहाड़ों से घिरी हरी भरी घाटियों और सुंदर बीचों वाला ये  क्षेत्र  बहुत खूबसूरत है  और  इसलिए इस इलाके को देवभूमि कहा जाता है। पहाड़ियों से होकर गुजरने वाले रास्ते बेहद हरेभरे और खूबसूरत है।  बर्षात के दिनों में  कई झरने , रास्ते में आपका स्वागत करते मिल जायेंगे। सावित्री नदी यहाँ अरब सागर से मिलती है . 

राय गढ़  क्षत्र पति शिवाजी महाराज का जन्म और कार्य भूमि  है।   हरिहरेश्वर मंदिर  जिस जगह स्थिति है उस गाँव का नाम भी  हरिहरेश्वर गाँव है।  मंदिर का रखरखाव एक ट्रस्ट करता है जिसे उस गाँव के सरदार ने दान में दे दी थी।  आज यहाँ बहुत से रिसोर्ट और होटल हैं और यहाँ के सुंदर बीच आकर्षण का केंद्र हैं।  मुम्बई से लगभग २०० किमी स्थिति इस स्थान पर सप्ताहांत पुण्य लाभार्थियों के अलावा भी बड़ी संख्या में लोग आते हैं।  कोंकण क्षेत्र का महत्व् पूर्ण टूरिस्ट स्पॉट है।





ये है मंदिर का बहार से दिखने वाला स्वरूप . मंदिर जैसे पहाड़ो पर परम्परागत रूप से बनाया जाता है . मंदिर के सामने एक बड़ा सा हाल है जो यात्रियों के ठहरने और धुप से बचने के लिए है .








मंदिर के अन्दर का द्रश्य 

















कैम्पस में स्थिति श्री हनुमान मंदिर






 श्री हनुमान मंदिर के अन्दर का द्रश्य



 बीच के मनोरम द्रश्य

















बीच के पास रिसोर्ट के कोटेज





बीच में तांगा चलाने वाले व्यक्ति का बेटा शनी जिसे जब पता चल कि उसकी फोटो खींची जायेगी तो वह बहुत खुश हुआ 
 और तांगा चलाने वाले व्यक्ति को मालूम हुआ तो वह भी खुशी खुशी फोटो खिचवाने के लिए तैयार हो गया .
 शनी को सेल्फी के बारे बताया गया तो बहुत खुश हुआ और जानकारी हेतु उत्सुकता दिखाता हुआ








पहाड़ के ऊपर से नीचे समुद्र तक जाने का रास्ता 








                                                                          बीच का एक विडियो


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                                                       -   शिव प्रकाश मिश्रा